श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 861–870

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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तथैव विश्वेदेवेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् ।

निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिं नक्तं तथा हरेत् ॥ १४ ॥

विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे। निशाचरों और भूतोंके लिये रातमें बलि दे ॥ १४ ॥

एवं कृत्वा बलिं सम्यग् दद्याद् भिक्षां द्विजाय वै ।

अलाभे ब्राह्मणस्याग्नावग्रमुद्धृत्य निक्षिपेत् ॥ १५ ॥

इस प्रकार बलि समर्पण करके ब्राह्मणको विधिपूर्वक भिक्षा दे । यदि ब्राह्मण न मिले तो अन्नमेंसे थोड़ा - सा अग्रग्रास निकालकर उसका अग्निमें होम कर दे ॥

यदा श्राद्धं पितृभ्योऽपि दातुमिच्छेत मानवः ।

तदा पश्चात् प्रकुर्वीत निवृत्ते श्राद्धकर्मणि ॥ १६ ॥

पितॄन् संतर्पयित्वा तु बलिं कुर्याद् विधानतः ।

वैश्वदेवं ततः कुर्यात् पश्चाद् ब्राह्मणवाचनम् ॥ १७ ॥

जिस दिन पितरोंका श्राद्ध करनेकी इच्छा हो, उस दिन पहले श्राद्धकी क्रिया पूरी करे । उसके बाद पितरोंका तर्पण करके विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव - कर्म करे । तदनन्तर ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे ॥

ततोऽनेन विशेषेण भोजयेदतिथीनपि ।

अर्चापूर्वं महाराज ततः प्रीणाति मानवान् ॥ १८ ॥

महाराज! इसके बाद विशेष अन्तके द्वारा अतिथियोंको भी सम्मानपूर्वक भोजन करावे । ऐसा करनेसे गृहस्थ पुरुष सम्पूर्ण मनुष्योंको संतुष्ट करता है ॥

पृष्ठ 862

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गृहस्थ - धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद

अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते ।

आचार्यस्थ पितुश्चैव सख्युपराप्तस्य चातिथेः ॥ १ ९ ॥

इदमस्ति गृहे मह्यमिति नित्यं निवेदयेत् ।

ते यद् वदेयुस्तत् कुर्यादिति धर्मों विधीयते ॥ २० ॥

जो नित्य अपने घरमें स्थित नहीं रहता, वह अतिथि कहलाता है। आचार्य, पिता, विश्वासपात्र मित्र और अतिथिसे सदा यह निवेदन करे कि ' अमुक वस्तु मेरे घरमें मौजूद है, उसे आप स्वीकार करें । ' फिर वे जैसी आज्ञा दें वैसा ही करे । ऐसा करनेसे धर्मका पालन होता है ॥ १ ९ -२० ॥

गृहस्थः पुरुषः कृष्ण शिष्टाशी च सदा भवेत् ।

राजर्त्विजं स्नातकं च गुरुं श्वशुरमेव च ॥ २१ ॥

अर्चयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान् ।

पृष्ठ 863

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श्रीकृष्ण! गृहस्थ पुरुषको सदा यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करना चाहिये । राजा, ऋत्विज्, स्नातक, गुरु और श्वशुर — ये यदि एक वर्षके बाद घर आवें तो मधुपर्कसे इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ २१ ॥

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि ।

वैश्वदेवं हि नामैतत् सायंप्रातर्विधीयते ॥ २२ ॥

कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियोंके लिये भूमिपर अन्न रख देना चाहिये । यह वैश्वदेव नामक कर्म है । इसका सायंकाल और प्रातःकाल अनुष्ठान किया जाता है ॥

एतांस्तु धर्मान् गार्हस्थ्यान् यः कुर्यादनसूयकः ।

स इहर्षिवरान् प्राप्य प्रेत्य लोके महीयते ॥ २३ ॥

जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इन गृहस्थोचित धर्मोंका पालन करता है, उसे इस लोकमें ऋषि- महर्षियोंका वरदान प्राप्त होता है और मृत्युके पश्चात् वह पुण्यलोकोंमें सम्मानित होता है ॥ २३ ॥

भीष्म उवाच

इति भूमेर्वचः श्रुत्वा वासुदेवः प्रतापवान् ।

तथा चकार सततं त्वमप्येवं सदाचर ॥ २४ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पृथ्वी देवीके ये वचन सुनकर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हींके अनुसार गृहस्थधर्मोंका विधिवत् पालन किया । तुम भी सदा इन धर्मोंका अनुष्ठान करते रहो ॥ २४ ॥

एतद् गृहस्थधर्मं त्वं चेष्टमानो जनाधिप ।

इहलोके यशः प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥

जनेश्वर! इस गृहस्थ- धर्मका पालन करते रहनेपर तुम इहलोकमें सुयश और परलोकमें स्वर्ग प्राप्त कर लोगे ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बलिदानविधिर्नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधिनामक सत्तानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥

पृष्ठ 864

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अष्टनवतितमोऽध्यायः तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद - पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य युधिष्ठिर उवाच

आलोकदानं नामैतत् कीदृशं भरतर्षभ ।

कथमेतत् समुत्पन्नं फलं वा तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ! यह जो दीपदान नामक कर्म है, यह कैसे किया जाता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? अथवा इसका फल क्या है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

मनोः प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

तपस्वी कश्चिदभवत् सुवर्णो नाम भारत ।

वर्णतो हेमवर्णः स सुवर्ण इति पप्रथे ॥ ३ ॥

भरतनन्दन! सुवर्णनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी ब्राह्मण थे । उनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी । इसीलिये वे सुवर्णनामसे विख्यात हुए थे ॥ ३ ॥

कुलशीलगुणोपेतः स्वाध्याये च परंगतः ।

बहून् सुवंशप्रभवान् समतीतः स्वकैर्गुणैः ॥ ४ ॥

वे उत्तम कुल, शील और गुणसे सम्पन्न थे । स्वाध्यायमें भी उनकी बड़ी ख्याति थी । वे अपने गुणोंद्वारा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए बहुत-से श्रेष्ठ पुरुषोंकी अपेक्षा आगे बढ़े हुए थे ॥ ४ ॥

स कदाचिन्मनुं विप्रो ददर्शोपससर्प च ।

कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ चोभौ तत्र चक्रतुः ॥ ५ ॥

एक दिन उन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा । देखकर वे उनके पास चले गये ।

फिर तो वे दोनों एक- दूसरे से कुशल- समाचार पूछने लगे ॥ ५ ॥

ततस्तौ सत्यसंकल्पौ मेरौ काञ्चनपर्वते ।

रमणीये शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरुके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये ॥ ६ ॥

पृष्ठ 865

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तत्र तौ कथयन्तौ स्तां कथा नानाविधाश्रयाः ।

ब्रह्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम् ॥ ७ ॥

वहाँ वे दोनों ब्रह्मर्षियों, देवताओं, दैत्यों तथा प्राचीन महात्माओंके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी कथा - वार्ता करने लगे ॥ ७ ॥

सुवर्णस्त्वब्रवीद् वाक्यं मनुं स्वायम्भुवं प्रति ।

हितार्थं सर्वभूतानां प्रश्नं मे वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥

सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर ।

किमेतत् कथमुत्पन्नं फलं योगं च शंस मे ॥ ९ ॥

उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा-' प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये । फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ है? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये ' ॥ ८ - ९ ॥ मनुरुवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

शुक्रस्य च बलेश्चैव संवादं वै महात्मनोः ॥ १० ॥

- मनुजीने कहा – मुने! इस विषयमें विज्ञजन शुक्राचार्य और बलि — इन दोनों महात्माओंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १० ॥

बलेर्वैरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासतः ।

समीपमाजगामाशु शुक्रो भृगुकुलोद्वहः ॥ ११ ॥

पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे । उन दिनों भृगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ॥ ११ ॥

तमर्घ्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गवं सोऽसुराधिपः ।

निषसादासने पश्चाद् विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥

पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले असुरराज बलिने भृगुपुत्र शुक्राचार्यको अर्घ्य आदि देकर उनकी विधिवत् पूजा की और जब वे आसनपर बैठ गये, तब बलि भी अपने सिंहासनपर आसीन हुए ॥ १२ ॥

कथेयमभवत् तत्र त्वया या परिकीर्तिता ।

सुमनो धूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति ॥ १३ ॥

ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्रः कवीन्द्रं प्रश्नमुत्तमम् ॥ १४ ॥

वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है । देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था । उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 866

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बलिरुवाच

सुमनोधूपदीपानां किं फलं ब्रह्मवित्तम ।

प्रदानस्य द्विजश्रेष्ठ तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १५ ॥

बलिने पूछा — ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! द्विजशिरोमणे! फूल, धूप और दीपदान करनेका क्या फल है? यह बतानेकी कृपा करें ॥ १५ ॥

शुक्रउवाच

तपः पूर्वं समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम् ।

एतस्मिन्नन्तरे चैव वीरुदोषध्य एव च ॥ १६ ॥

शुक्राचार्यने कहा —राजन्! पहले तपस्याकी उत्पत्ति हुई है, तदनन्तर धर्मकी । इसी बीचमें लता और ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १६ ॥

सोमस्यात्मा च बहुधा सम्भूतः पृथिवीतले ।

अमृतं च विषं चैव ये चान्ये तृणजातयः ॥ १७ ॥

इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई । अमृत, विष तथा दूसरी - दूसरी जातिके तृणोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १७ ॥

अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च ।

मनो ग्लपयते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ॥ १८ ॥

अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है । जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ॥ १८ ॥

अमृतं मंगलं विद्धि महद्विषममंगलम् ।

ओषध्यो ह्यमृतं सर्वा विषं तेजोऽग्निसम्भवम् ॥ १ ९ ॥

अमृतको मंगलकारी जानो और विष महान् अमंगल करनेवाला है । जितनी ओषधियाँ हैं, वे सब - की-- सब अमृत मानी गयी हैं और विष अग्निजनित तेज है ॥ १ ९ ॥

मनो ह्लादयते यस्माच्छ्रियं चापि दधाति च ।

तस्मात् सुमनसः प्रोक्ता नरैः सुकृतकर्मभिः ॥ २० ॥

फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है ॥ २० ॥

देवताभ्यः सुमनसो यो ददाति नरः शुचिः ।

तस्य तुष्यन्ति वै देवास्तुष्टाः पुष्टिं ददत्यपि ॥ २१ ॥

जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं ॥ २१ ॥

यं यमुद्दिश्य दीयेरन् देवं सुमनसः प्रभो ।

मंगलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप ॥ २२ ॥

पृष्ठ 867

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प्रभो! दैत्यराज! जिस - जिस देवताके उद्देश्यसे फूल दिये जाते हैं, वह उस पुष्पदानसे दातापर बहुत प्रसन्न होता और उसके मंगलके लिये सचेष्ट रहता है ॥ २२ ॥

ज्ञेयास्तूग्राश्च सौम्याश्च तेजस्विन्यश्च ताः पृथक् ।

ओषध्यो बहुवीर्या हि बहुरूपास्तथैव च ॥ २३ ॥

उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा– अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं ।

उन सबको जानना चाहिये ॥ २३ ॥

यज्ञियानां च वृक्षाणामयज्ञीयान् निबोध मे ।

आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च ॥ २४ ॥

अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो । असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ॥

रक्षसामुरगाणां च यक्षाणां च तथा प्रियाः ।

मनुष्याणां पितॄणां च कान्तायास्त्वनुपूर्वशः ॥ २५ ॥

राक्षस, नाग, यक्ष, मनुष्य और पितरोंको प्रिय एवं मनोरम लगनेवाली ओषधियोंका भी वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २५ ॥

वन्या ग्राम्याश्चेह तथा कृष्टोप्ताः पर्वताश्रयाः ।

अकण्टकाः कण्टकिनो गन्धरूपरसान्विताः ॥ २६ ॥

फूलोंके बहुत - से वृक्ष गाँवोंमें होते हैं और बहुत-से जंगलोंमें । बहुतेरे वृक्ष जमीनको जोतकर क्यारियोंमें लगाये जाते हैं और बहुत से पर्वत आदिपर अपने - आप पैदा होते हैं । इन वृक्षोंमें कुछ तो काँटेदार होते हैं और कुछ बिना काँटोंके । इन सबमें रूप, रस और गन्ध विद्यमान रहते हैं ॥ २६ ॥

द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोऽनिष्टश्च पुष्पजः ।

इष्टगन्धानि देवानां पुष्पाणीति विभावय ॥ २७ ॥

फूलोंकी गन्ध दो प्रकारकी होती है — अच्छी और बुरी । अच्छी गन्धवाले फूल

देवताओंको प्रिय होते हैं । इस बातको ध्यानमें रखो ॥ २७ ॥

अकण्टकानां वृक्षाणांश्वेतप्रायाश्च वर्णतः ।

तेषां पुष्पाणि देवानामिष्टानि सततं प्रभो ॥ २८ ॥

( पद्मं च तुलसी जातिरपि सर्वेषु पूजिता । ) प्रभो! जिन वृक्षोंमें काँटे नहीं होते हैं, उनमें जो अधिकांश श्वेतवर्णवाले हैं, उन्हींके फूल देवताओंको सदैव प्रिय हैं । कमल, तुलसी और चमेली - ये सब फूलोंमें अधिक प्रशंसित ॥ २८ ॥

जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि वै ।

गन्धर्वनागयक्षेभ्यस्तानि दद्याद् विचक्षणः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 868

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जलसे उत्पन्न होनेवाले जो कमल- उत्पल आदि पुष्प हैं, उन्हें विद्वान् पुरुष गन्धर्वों, नागों और यक्षोंको समर्पित करे ॥ २ ९ ॥

ओषध्यो रक्तपुष्पाश्च कटुकाः कण्टकान्विताः ।

शत्रूणामभिचारार्थमाथर्वेषु निदर्शिताः ॥ ३० ॥

अथर्ववेदमें बतलाया गया है कि शत्रुओंका अनिष्ट करनेके लिये किये जानेवाले अभिचार कर्ममें लाल फूलोंवाली कड़वी और कण्टकाकीर्ण ओषधियोंका उपयोग करना चाहिये ॥ ३० ॥

तीक्ष्णवीर्यास्तु भूतानां दुरालम्भाः सकण्टकाः ।

रक्तभूयिष्ठवर्णाश्च कृष्णाश्चैवोपहारयेत् ॥ ३१ ॥

जिन फूलोंमें काँटे अधिक हों, जिनका हाथसे स्पर्श करना कठिन जान पड़े, जिनका रंग अधिकतर लाल या काला हो तथा जिनकी गन्धका प्रभाव तीव्र हो, ऐसे फूल भूत-प्रेतोंके काम आते हैं । अतः उनको वैसे ही फूल भेंट करने चाहिये ॥ ३१ ॥

मनोहृदयनन्दिन्यो विशेषमधुराश्च याः ।

चारुरूपाः सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो ॥ ३२ ॥

प्रभो! मनुष्योंको तो वे ही फूल प्रिय लगते हैं, जिनका रूप- रंग सुन्दर और रस विशेष मधुर हो, तथा जो देखनेपर हृदयको आनन्ददायी जान पड़ें ॥ ३२ ॥

न तु श्मशानसम्भूता देवतायतनोद्भवाः ।

संनयेत् पुष्टियुक्तेषु विवाहेषु रहःसु च ॥ ३३ ॥

श्मशान तथा जीर्ण - शीर्ण देवालयोंमें पैदा हुए फूलोंका पौष्टिक कर्म, विवाह तथा एकान्त विहारमें उपयोग नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥

गिरिसानुरुहाः सौम्या देवानामुपपादयेत् ।

प्रोक्षिताऽभ्युक्षिताः सौम्या यथायोग्यं यथास्मृति ॥ ३४ ॥

पर्वतोंके शिखरपर उत्पन्न हुए सुन्दर और सुगन्धित पुष्पोंको धोकर अथवा उनपर जलके छींटे देकर धर्मशास्त्रोंमें बताये अनुसार उन्हें यथायोग्य देवताओंपर चढ़ाना चाहिये ॥ ३४ ॥

गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद् यक्षराक्षसाः ।

नागाः समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषाः ॥ ३५ ॥

देवता फूलोंकी सुगन्धसे, यक्ष और राक्षस उनके दर्शनसे, नागगण उनका भलीभाँति उपभोग करनेसे और मनुष्य उनके दर्शन, गन्ध एवं उपभोग तीनोंसे ही संतुष्ट होते हैं ॥ ३५ ॥

सद्यः प्रीणाति देवान् वै ते प्रीता भावयन्त्युत ।

संकल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्च मनोरमैः ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 869

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फूल चढ़ानेसे मनुष्य देवताओंको तत्काल संतुष्ट करता है और संतुष्ट होकर वे सिद्धसंकल्प देवता मनुष्योंको मनोवांछित एवं मनोरम भोग देकर उनकी भलाई करते हैं ॥ ३६ ॥

प्रीताः प्रीणन्ति सततं मानिता मानयन्ति च ।

अवज्ञातावधूताश्च निर्दहन्त्यधमान् नरान् ॥ ३७ ॥

देवताओंको यदि सदा संतुष्ट और सम्मानित किया जाता है तो वे भी मनुष्योंको संतोष एवं सम्मान देते हैं तथा यदि उनकी अवज्ञा एवं अवहेलना की गयी तो वे अवज्ञा करनेवाले नीच मनुष्यको अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डालते हैं ॥ ३७ ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धूपदानविधेः फलम् ।

धूपांश्च विविधान् साधूनसाधूंश्च निबोध मे ॥ ३८ ॥

इसके बाद अब मैं धूपदानकी विधिका फल बताऊँगा । धूप भी अच्छे और बुरे कई

तरहके होते हैं । उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ ३८ ॥

निर्यासाः सारिणश्चैव कृत्रिमाश्चैव ते त्रयः ।

इष्टोऽनिष्टो भवेद् गंधस्तन्मे विस्तरशः शृणु ॥ ३ ९ ॥

धूपके मुख्यतः तीन भेद हैं –निर्यास, सारी और कृत्रिम । इन धूपोंकी गंध भी अच्छी

और बुरी दो प्रकारकी होती है । ये सब बातें मुझसे विस्तारपूर्वक सुनो ॥ ३ ९ ॥

निर्यासाः सल्लकीवर्ज्या देवानां दयिताऽस्तु ते ।

गुग्गुलुः प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चयः ॥ ४० ॥

वृक्षोंके रस ( गोंद ) को निर्यास कहते हैं, सल्लकीनामक वृक्षके सिवा अन्य वृक्षोंसे प्रकट हुए निर्यासमय धूप देवताओंको बहुत प्रिय होते हैं । उनमें भी गुग्गुल सबसे श्रेष्ठ है । ऐसा मनीषी पुरुषोंका निश्चय है ॥ ४० ॥

अगुरुः सारिणां श्रेष्ठो यक्षराक्षसभोगिनाम् ।

दैत्यानां सल्लकीयश्च काङ्क्षतो यश्च तद्विधः ॥ ४१ ॥

जिन काष्ठोंको आगमें जलानेपर सुगंध प्रकट होती है, उन्हें सारी धूप कहते हैं । इनमें अगुरुकी प्रधानता है । सारी धूप विशेषतः यक्ष, राक्षस और नागोंको प्रिय होते हैं । दैत्य लोग सल्लकी तथा उसी तरह अन्य वृक्षोंकी गोंदका बना हुआ धूप पसंद करते हैं ॥ ४१ ॥

अथ सर्जरसादीनां गंधैः पार्थिव दारवैः ।

फाणितासवसंयुक्तैर्मनुष्याणां विधीयते ॥ ४२ ॥

पृथ्वीनाथ! राल आदिके सुगन्धित चूर्ण तथा सुगन्धित काष्ठौषधियोंके चूर्णको घी और

शक्करसे मिश्रित करके जो अष्टगंध आदि धूप तैयार किया जाता है, वही कृत्रिम है ।

विशेषतः वही मनुष्योंके उपयोगमें आता है ॥ ४२ ॥

देवदानवभूतानां सद्यस्तुष्टिकरः स्मृतः ।

येऽन्ये वैहारिकास्तत्र मानुषाणामिति स्मृताः ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 870

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वैसा धूप देवताओं, दानवों और भूतोंके लिये भी तत्काल संतोष प्रदान करनेवाला माना गया है । इनके सिवा विहार ( भोग - विलास ) के उपयोगमें आनेवाले और भी अनेक प्रकारके धूप हैं, जो केवल मनुष्योंके व्यवहारमें आते हैं ॥ ४३ ॥

य एवोक्ताः सुमनसां प्रदाने गुणहेतवः ।

धूपेष्वपि परिज्ञेयास्त एव प्रीतिवर्धनाः ॥ ४४ ॥

देवताओंको पुष्पदान करनेसे जो गुण या लाभ बताये गये हैं, वे ही धूप निवेदन करनेसे भी प्राप्त होते हैं । ऐसा जानना चाहिये । धूप भी देवताओंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले हैं ॥ ४४ ॥

दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम् ।

यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्च ते ॥ ४५ ॥

अब मैं दीप- दानका परम उत्तम फल बताऊँगा । कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो ॥ ४५ ॥

ज्योतिस्तेजः प्रकाशं वाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते ।

प्रदानं तेजसां तस्मात् तेजो वर्धयते नृणाम् ॥ ४६ ॥

दीपक ऊर्ध्वगामी तेज है, वह कान्ति और कीर्तिका विस्तार करनेवाला बताया जाता है । अतः दीप या तेजका दान मनुष्योंके तेजकी वृद्धि करता है ॥ ४६ ॥

अन्धन्तमस्तमिस्रं च दक्षिणायनमेव च ।

उत्तरायणमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्यते ॥ ४७ ॥

अंधकार अंधतामिस्र नामक नरक है । दक्षिणायन भी अंधकारसे ही आच्छन्न रहता है । इसके विपरीत उत्तरायण प्रकाशमय है । इसलिये वह श्रेष्ठ माना गया है । अतः अन्धकारमय नरककी निवृत्तिके लिये दीपदानकी प्रशंसा की गयी है ॥ ४७ ॥

यस्मादूर्ध्वगमेतत् तु तमसश्चैव भेषजम् ।

तस्मादूर्ध्वगतेर्दाता भवेदत्रेति निश्चयः ॥ ४८ ॥

दीपककी शिखा ऊर्ध्वगामिनी होती है । वह अंधकाररूपी रोगको दूर करनेकी दवा है ।

इसलिये जो दीपदान करता है, उसे निश्चय ही ऊर्ध्वगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४८ ॥

देवास्तेजस्विनो ह्यस्मात् प्रभावन्तः प्रकाशकाः ।

तामसा राक्षसाश्चैव तस्माद् दीपः प्रदीयते ॥ ४ ९ ॥

देवता तेजस्वी, कांतिमान् और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ॥

आलोकदानाच्चक्षुष्मान् प्रभायुक्तो भवेन्नरः ।

तान् दत्त्वा नोपहिंसेत न हरेन्नोपनाशयेत् ॥ ५० ॥

दीपदान करनेसे मनुष्यके नेत्रोंका तेज बढ़ता है और वह स्वयं भी तेजस्वी होता है । दान करनेके पश्चात् उन दीपकोंको न तो बुझावे, न उठाकर अन्यत्र ले जाय और न नष्ट ही