श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 871–880

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880

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करे ॥ ५० ॥

दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः ।

दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमालेव राजते ॥ ५१ ॥

दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद नरकमें पड़ता है, किंतु जो दीपदान करता है, वह स्वर्गलोकमें दीपमालाकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ ५१ ॥

हविषा प्रथमः कल्पो द्वितीयश्चौषधीरसैः ।

वसामेदोऽस्थिनिर्यासैर्न कार्यः पुष्टिमिच्छता ॥ ५२ ॥

घीका दीपक जलाकर दान करना प्रथम श्रेणीका दीप दान है । ओषधियोंके रस अर्थात् तिल - सरसों आदिके तेलसे जलाकर किया हुआ दीपदान दूसरी श्रेणीका है । जो अपने शरीरकी पुष्टि चाहता हो- उसे चर्बी, मेदा और हड्डियोंसे निकाले हुए तेलके द्वारा कदापि दीपक नहीं जलाना चाहिये ॥ ५२ ॥

गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे । ( गोब्राह्मणालये दुर्गे दीपो भूतिप्रदः शुचिः । ) दीपदानं भवेन्नित्यं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ५३ ॥

जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप - दान करना चाहिये । उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ॥

कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति ।

ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा ॥ ५४ ॥

दीप-दान करनेवाला पुरुष अपने कुलको उद्दीप्त करनेवाला, शुद्धचित्त तथा श्रीसम्पन्न होता है और अंतमें वह प्रकाशमय लोकोंमें जाता है ॥ ५४ ॥

बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान् कर्मफलोदयान् ।

देवयक्षोरगनृणां भूतानामथ रक्षसाम् ॥ ५५ ॥

अब मैं देवताओं, यक्षों, नागों, मनुष्यों, भूतों तथा राक्षसोंको बलि समर्पण करनेसे जो लाभ होता है, जिन फलोंका उदय होता है, उनका वर्णन करूँगा ॥ ५५ ॥

येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिबालकाः ।

राक्षसानेव तान् विद्धि निर्विशङ्कानमङ्गलान् ॥ ५६ ॥

जो लोग अपने भोजन करनेसे पहले देवताओं, ब्राह्मणों, अतिथियों और बालकोंको भोजन नहीं कराते, उन्हें भयरहित अमंगलकारी राक्षस ही समझो ॥ ५६ ॥

तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्यः प्रतिपूजितम् ।

शिरसा प्रयतश्चापि हरेद् बलिमतन्द्रितः ॥ ५७ ॥

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अतः गृहस्थ मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह आलस्य छोड़कर देवताओंकी पूजा करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करे और शुद्धचित्त हो सर्वप्रथम उन्हींको आदरपूर्वक अन्नका भाग अर्पण करे ॥ ५७ ॥

गृह्णन्ति देवता नित्यमाशंसन्ति सदा गृहान् ।

बाह्याश्चागन्तवो येऽन्ये यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ५८ ॥

इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा ।

ते प्रीताः प्रीणयन्तेनमायुषा यशसा धनैः ॥ ५ ९ ॥

क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं । देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं ॥ ५८-५९ ॥

बलयः सह पुष्पैस्तु देवानामुपहारयेत् ।

दधिदुग्धमयाः पुण्याः सुगंधाः प्रियदर्शनाः ॥ ६० ॥

देवताओंको जो बलि दी जाय, वह दही- दूधकी बनी हुई, परम पवित्र, सुगंधित, दर्शनीय और फूलोंसे सुशोभित होनी चाहिये ॥ ६० ॥

कार्या रुधिरमांसाढ्या बलयो यक्षरक्षसाम् ।

सुरासवपुरस्कारा लाजोल्लापिकभूषिताः ॥ ६१ ॥

आसुर स्वभावके लोग यक्ष और राक्षसोंको रुधिर और मांससे युक्त बलि अर्पित करते हैं । जिसके साथ सुरा और आसव भी रहता है तथा ऊपरसे धानका लावा छींटकर उस बलिको विभूषित किया जाता है ॥ ६१ ॥

नागानां दयिता नित्यं पद्मोत्पलविमिश्रिताः ।

तिलान् गुडसुसम्पन्नान् भूतानामुपहारयेत् ॥ ६२ ॥

नागोंको पद्म और उत्पलयुक्त बलि प्रिय होती है । गुड़मिश्रित तिल भूतोंको भेंट करे ॥ ६२ ॥

अग्रदाताग्रभोगी स्याद् बलवीर्यसमन्वितः ।

तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्यः प्रतिपूजितम् ॥ ६३ ॥

जो मनुष्य देवता आदिको पहले बलि प्रदान करके भोजन करता है, वह उत्तम भोगसे सम्पन्न, बलवान् और वीर्यवान् होता है । इसलिये देवताओंको सम्मानपूर्वक अन्न पहले अर्पण करना चाहिये ॥ ६३ ॥

ज्वलन्त्यहरहो वेश्म याश्चास्य गृहदेवताः ।

ताः पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदायिना ॥ ६४ ॥

गृहस्थके घरकी अधिष्ठातृ देवियाँ उसके घरको सदा प्रकाशित किये रहती हैं, अतः कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि भोजनका प्रथम भाग देकर सदा ही उनकी पूजा किया

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करे ॥ ६४ ॥

इत्येतदसुरेन्द्राय काव्यः प्रोवाच भार्गवः ।

सुवर्णाय मनुः प्राह सुवर्णो नारदाय च ॥ ६५ ॥

नारदोऽपि मयि प्राह गुणानेतान् महाद्युते ।

त्वमप्येतद् विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक ॥ ६६ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया । तत्पश्चात् तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये । महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो ॥ ६५-६६ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णमनुसंवादो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्ण और मनुका संवादविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं ) FUEL O FUTTE

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नवनवतितमोऽध्यायः नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं मे भरतश्रेष्ठ पुष्पधूपप्रदायिनाम् ।

फलं बलिविधाने च तद् भूयो वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! फूल और धूप देनेवालोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मैंने सुन लिया । अब बलि समर्पित करनेका जो फल है, उसे पुनः ANTARकृपा करें ॥ १ ॥

धूपप्रदानस्य फलं प्रदीपस्य तथैव च ।

बलयश्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभिः ॥ २ ॥

धूपदान और दीपदानका फल तो ज्ञात हो गया! अब यह बताइये कि गृहस्थ पुरुष बलि किसलिये समर्पित करते हैं? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

नहुषस्य च संवादमगस्त्यस्य भृगोस्तथा ॥३ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! इस विषयमें भी जानकार मनुष्य राजा नहुष और अगस्त्य एवं भृगुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

नहुषो हि महाराज राजर्षिः सुमहातपाः ।

देवराज्यमनुप्राप्तः सुकृतेनेह कर्मणा ॥ ४ ॥

महाराज! राजर्षि नहुष बड़े भारी तपस्वी थे । उन्होंने अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे देवराज इन्द्रका पद प्राप्त कर लिया था ॥ ४ ॥

तत्रापि प्रयतो राजन् नहुषस्त्रिदिवे वसन् ।

मानुषीश्चैव दिव्याश्च कुर्वाणो विविधाः क्रियाः ॥ ५ ॥

राजन्! वहाँ स्वर्गमें रहते हुए भी शुद्धचित्त राजा नहुष नाना प्रकारके दिव्य और मानुष कर्मोंका अनुष्ठान किया करते थे ॥ ५ ॥

मानुष्यस्तत्र सर्वाः स्म क्रियास्तस्य महात्मनः ।

प्रवृत्तास्त्रिदिवे राजन् दिव्याश्चैव सनातनाः ॥ ६ ॥

नरेश्वर! स्वर्गमें भी महामना राजा नहुषकी सम्पूर्ण मानुषी क्रियाएँ तथा दिव्य सनातन क्रियाएँ भी सदा चलती रहती थीं ॥ ६ ॥

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अग्निकार्याणि समिधः कुशाः सुमनसस्तथा ।

बलयश्चान्नलाजाभिर्धूपनं दीपकर्म च ॥ ७ ॥

सर्वं तस्य गृहे राज्ञः प्रावर्तत महात्मनः ।

जपयज्ञान्मनोयज्ञांस्त्रिदिवेऽपि चकार सः ॥ ८ ॥

अग्निहोत्र, समिधा, कुशा, फूल, अन्न और लावाकी बलि, धूपदान तथा दीपकर्म — ये सब - के - सब महामना राजा नहुषके घरमें प्रतिदिन होते रहते थे । वे स्वर्गमें रहकर भी जप-यज्ञ एवं मनोयज्ञ ( ध्यान) करते रहते थे ॥ ७-८ ॥

देवानभ्यर्चयच्चापि विधिवत् स सुरेश्वरः ।

सर्वानेव यथान्यायं यथापूर्वमरिंदम ॥ ९ ॥

शत्रुदमन! वे देवेश्वर नहुष विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूर्ववत् यथोचितरूपसे पूजन किया करते थे ॥ ९ ॥

अथेन्द्रोऽहमिति ज्ञात्वा अहंकारं समाविशत् ।

सर्वाश्चैव क्रियास्तस्य पर्यहीयन्त भूपतेः ॥ १० ॥

किंतु तदनन्तर ' मैं इन्द्र हूँ' ऐसा समझकर वे अहंकारके वशीभूत हो गये। इससे उन भूपालकी सारी क्रियाएँ नष्टप्राय होने लगीं ॥ १० ॥

स ऋषीन् वाहयामास वरदानमदान्वितः ।

परिहीणक्रियश्चैव दुर्बलत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥

वे वरदानके मदसे मोहित हो ऋषियोंसे अपनी सवारी खिंचवाने लगे । उनका धर्म - कर्म छूट गया । अतः वे दुर्बल हो गये - उनमें धर्मबलका अभाव हो गया ॥ ११ ॥

तस्य वाहयतः कालो मुनिमुख्यांस्तपोधनान् ।

अहंकाराभिभूतस्य सुमहानभ्यवर्तत ॥ १२ ॥

वे अहंकारसे अभिभूत होकर क्रमशः सभी श्रेष्ठ तपस्वी मुनियोंको अपने रथमें जोतने लगे । ऐसा करते हुए राजाका दीर्घकाल व्यतीत हो गया ॥ १२ ॥

अथ पर्यायशः सर्वान् वाहनायोपचक्रमे ।

पर्यायश्चाप्यगस्त्यस्य समपद्यत भारत ॥ १३ ॥

नहुषने बारी - बारीसे सभी ऋषियोंको अपना वाहन बनानेका उपक्रम किया था ।

भारत! एक दिन महर्षि अगस्त्यकी बारी आयी ॥ १३ ॥

अथागत्य महातेजा भृगुर्ब्रह्मविदां वरः अगस्त्यमाश्रमस्थं वै समुपेत्येदमब्रवीत् ॥ १४ ॥

उसी दिन ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भृगुजी अपने आश्रमपर बैठे हुए अगस्त्यके निकट आये और इस प्रकार बोले- ॥ १४ ॥

एवं वयमसत्कारं देवेन्द्रस्यास्य दुर्मतेः ।

नहुषस्य किमर्थं वै मर्षयाम महामुने ॥ १५ ॥

पृष्ठ 876

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' महामुने! देवराज बनकर बैठे हुए इस दुर्बुद्धि नहुषके अत्याचारको हमलोग किसलिये सह रहे हैं ' ॥ अगस्त्य उवाच

कथमेष मया शक्यः शप्तुं यस्य महामुने ।

वरदेन वरो दत्तो भवतो विदितश्च सः ॥ १६ ॥

अगस्त्यजीने कहा — महामुने! मैं इस नहुषको कैसे शाप दे सकता हूँ, जब कि वरदानी ब्रह्माजीने इसे वर दे रखा है । उसे वर मिला है, यह बात आपको भी विदित ही है ॥ १६ ॥

यो मे दृष्टिपथं गच्छेत् स मे वश्यो भवेदिति ।

इत्यनेन वरं देवो याचितो गच्छता दिवम् ॥ १७ ॥

स्वर्गलोकमें आते समय इस नहुषने ब्रह्माजी से यह वर माँगा था कि ' जो मेरे दृष्टिपथमें आ जाय, वह मेरे अधीन हो जाय' ॥ १७ ॥

एवं न दग्धः स मया भवता च न संशयः ।

अन्येनाप्यृषिमुख्येन न दग्धो न च पातितः ॥ १८ ॥

ऐसा वरदान प्राप्त होनेके कारण ही मैंने और आपने भी अबतक इसे दग्ध नहीं किया है । इसमें संशय नहीं है । दूसरे किसी श्रेष्ठ ऋषिने भी उसी वरदान के कारण न तो अबतक उसे जलाकर भस्म किया और न स्वर्गसे नीचे ही गिराया ॥ १८ ॥

अमृतं चैव पानाय दत्तमस्मै पुरा विभो ।

महात्मना तदर्थं च नास्माभिर्विनिपात्यते ॥ १ ९ ॥

प्रभो! पूर्वकालमें महात्मा ब्रह्माने इसे पीनेके लिये अमृत प्रदान किया था । इसीलिये हमलोग इस नहुषको स्वर्गसे नीचे नहीं गिरा रहे हैं ॥ १ ९ ॥

प्रायच्छत वरं देवः प्रजानां दुःखकारणम् ।

द्विजेष्वधर्मयुक्तानि स करोति नराधमः ॥ २० ॥

भगवान् ब्रह्माजीने जो इसे वर दिया था, वह प्रजाजनोंके लिये दुःखका कारण बन गया । वह नराधम ब्राह्मणोंके साथ अधर्मयुक्त बर्ताव कर रहा है ॥ २० ॥

तत्र यत्प्राप्तकालं नस्तद् ब्रूहि वदतां वर ।

भवांश्चापि यथा ब्रूयात् तत्कर्तास्मिन संशयः ॥ २१ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ भृगुजी! इस समय हमारे लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, वह बताइये । आप जैसा कहेंगे वैसा ही मैं करूंगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

भृगुरुवाच

पितामहनियोगेन भवन्तं सोऽहमागतः ।

प्रतिकर्तुं बलवति नहुषे दैवमोहिते ॥ २२ ॥

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भृगु बोले — मुने! ब्रह्माजीकी आज्ञासे मैं आपके पास आया हूँ । बलवान् नहुष दैववश मोहित हो रहा है । आज उससे ऋषियोंपर किये गये अत्याचारका बदला लेना है ॥ २२ ॥

अद्य हि त्वां सुदुर्बुद्धी रथे योक्ष्यति देवराट् ।

अद्यैनमहमुद्वृत्तं करिष्येऽनिन्द्रमोजसा ॥ २३ ॥

आज यह महामूर्ख देवराज आपको रथमें जोतेगा । अतः आज ही मैं इस उच्छृंखल नहुषको अपने तेजसे इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर दूँगा ॥ २३ ॥

अद्येन्द्रं स्थापयिष्यामि पश्यतस्ते शतक्रतुम् ।

संचाल्य पापकर्माणमैन्द्रात् स्थानात् सुदुर्मतिम् ॥ २४ ॥

आज इस पापाचारी दुर्बुद्धिको इन्द्रपदसे गिराकर मैं आपके देखते - देखते पुनः शतक्रतुको इन्द्रपदपर बिठाऊँगा ॥ २४ ॥

अद्य चासौ कुदेवेन्द्रस्त्वां पदा धर्षयिष्यति ।

दैवोपहतचित्तत्वादात्मनाशाय मन्दधीः ॥ २५ ॥

दैवने इसकी बुद्धिको नष्ट कर दिया है । अतः यह देवराज बना हुआ मन्दबुद्धि नीच नहुष अपने ही विनाशके लिये आज आपको लातसे मारेगा ॥ २५ ॥

व्युत्क्रान्तधर्मं तमहं धर्षणामर्षितो भृशम् ।

अहिर्भवस्वेति रुषा शप्स्ये पापं द्विजद्रुहम् ॥ २६ ॥

आपके प्रति किये गये इस अत्याचारसे अत्यंत अमर्षमें भरकर मैं धर्मका उल्लंघन करनेवाले उस द्विजद्रोही पापीको रोषपूर्वक यह शाप दे दूँगा कि ' तू सर्प हो जा ' ॥ २६ ॥

तत एनं सुदुर्बुद्धिं धिक्शब्दाभिहतत्विषम् ।

धरण्यां पातयिष्यामि पश्यतस्ते महामुने ॥ २७ ॥

नहुषं पापकर्माणमैश्वर्यबलमोहितम् ।

यथा च रोचते तुभ्यं तथा कर्तास्म्यहं मुने ॥ २८ ॥

महामुने! तदनन्तर चारों ओरसे धिक्कारके शब्द सुनकर यह दुर्बुद्धि देवेन्द्र श्रीहीन हो जायगा और मैं ऐश्वर्यबलसे मोहित हुए इस पापाचारी नहुषको आपके देखते - देखते पृथ्वीपर गिरा दूँगा । अथवा मुने! आपको जैसा जँचे वैसा ही करूँगा ॥ २७-२८ ॥

एवमुक्तस्तु भृगुणा मैत्रावरुणिरव्ययः ।

अगस्त्यः परमप्रीतो बभूव विगतज्वरः ॥ २९ ॥

भृगुके ऐसा कहनेपर अविनाशी मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजी अत्यंत प्रसन्न और निश्चिन्त हो गये ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥

पृष्ठ 878

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इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और? संवादनामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥

पृष्ठ 879

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शततमोऽध्यायः नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुनः अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा युधिष्ठिर उवाच

कथं वै स विपन्नश्च कथं वै पातितो भुवि ।

कथं चानिन्द्रतां प्राप्तस्तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! राजा नहुषपर कैसे विपत्ति आयी? वे कैसे पृथ्वीपर गिराये गये और किस तरह वे इन्द्रपदसे वंचित हो गये? इसे आप बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

एवं तयोः संवदतोः क्रियास्तस्य महात्मनः ।

सर्वा एव प्रवर्तन्ते या दिव्या याश्च मानुषीः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! जब महर्षि भृगु और अगस्त्य उपर्युक्त वार्तालाप कर रहे थे । उस समय महामना नहुषके घरमें दैवी और मानुषी सभी क्रियाएँ चल रही थीं ॥ २ ॥

तथैव दीपदानानि सर्वोपकरणानि वै ।

बलिकर्म च यच्चान्यदुत्सेकाश्च पृथग्विधाः ॥ ३ ॥

सर्वे तस्य समुत्पन्ना देवेन्द्रस्य महात्मनः ।

देवलोके नृलोके च सदाचारा बुधैः स्मृताः ॥ ४ ॥

दीपदान, समस्त उपकरणोंसहित अन्नदान, बलिकर्म एवं नाना प्रकारके स्नान- अभिषेक आदि पूर्ववत् चालू थे । देवलोक तथा मनुष्यलोकमें विद्वानोंने जो सदाचार बताये हैं, वे सब महामना देवराज नहुषके यहाँ होते रहते थे ॥

ते चेद् भवन्ति राजेन्द्र ऋद्ध्यन्ते गृहमेधिनः ।

धूपप्रदानैर्दीपैश्च नमस्कारैस्तथैव च ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! गृहस्थके घर यदि उन सदाचारोंका पालन हो तो वे गृहस्थ सर्वथा उन्नतिशील होते हैं, धूपदान, दीपदान तथा देवताओंको किये गये नमस्कार आदिसे भी गृहस्थोंकी ऋद्धि- सिद्धि बढ़ती है ॥ ५ ॥

यथा सिद्धस्य चान्नस्य ग्रहायाग्रं प्रदीयते ।

बलयश्च गृहोद्देशे अतः प्रीयन्ति देवताः ॥ ६ ॥

जैसे तैयार हुई रसोईमेंसे पहले अतिथिको भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार घरमें

देवताओंके लिये अन्नकी बलि दी जाती है । जिससे देवते प्रसन्न होते हैं ॥ ६ ॥

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यथा च गृहिणस्तोषो भवेद् वै बलिकर्मणि ।

तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते ॥ ७ ॥

बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है ॥ ७ ॥

एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधवः ।

प्रयच्छन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम् ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं ॥ ८ ॥

स्नानेनाद्भिश्च यत् कर्म क्रियते वै विपश्चिता ।

नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवताः ॥ ९ ॥

पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधनाः ।

गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीयन्ते विधिनार्चिताः ॥ १० ॥

विद्वान् पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ९ -१० ॥

इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुषः स नरेश्वरः ।

सुरेन्द्रत्वं महत् प्राप्य कृतवानेतदद्भूतम् ॥ ११ ॥

इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान् देवेन्द्रपद पाकर यह अद्भुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था ॥ ११ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते ।

सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम् ॥ १२ ॥

किंतु कुछ कालके पश्चात् जब उनके सौभाग्य- नाशका अवसर उपस्थित हुआ, तब उन्होंने इन सब बातोंकी अवहेलना करके ऐसा पापकर्म आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥

ततः स परिहीणोऽभूत् सुरेन्द्रो बलदर्पतः ।

धूपदीपोदकविधिं न यथावच्चकार ह ॥ १३ ॥

बलके घमण्डमें आकर देवराज नहुष उन सत्कर्मोंसे भ्रष्ट हो गये । उन्होंने धूपदान, दीपदान और जलदानकी विधिका यथावत्रूपसे पालन करना छोड़ दिया ॥ १३ ॥

ततोऽस्य यज्ञविषयो रक्षोभिः पर्यबध्यत ।

अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठं वाहनायाजुहाव ह ॥ १४ ॥

द्रुतं सरस्वतीकूलात् स्मयन्निव महाबलः ।

ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत् ॥ १५ ॥

उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया । उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए- से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना