श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 881–890
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890
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रथ ढोनेके लिये बुलाया । तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा ॥ १४-१५ ॥
निमीलय स्वनयने जटां यावद् विशामि ते ।
स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटां प्राविशदच्युतः ॥ १६ ॥
भृगुः स सुमहातेजाः पातनाय नृपस्य च ।
ततः स देवराट् प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै ॥ १७ ॥
' मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ । ' महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये । अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया । इतनेहीमें देवराज हु 'ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे ॥ १६-१७ ॥
ततोऽगस्त्यः सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते ।
योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते ॥ १८ ॥
यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप ।
इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास तं मुनिम् ॥ १ ९ ॥
प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराज से कहा – ' राजन्! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वर! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा । ' उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया ॥ १८-१९ ॥
भृगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम् ।
न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा ॥ २० ॥
यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए । उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया ॥ २० ॥
वरदानप्रभावज्ञो नहुषस्य महात्मनः ।
न चुकोप तदागस्त्यो युक्तोऽपि नहुषेण वै ॥ २१ ॥
अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए ॥ २१ ॥
तं तु राजा प्रतोदेन चोदयामास भारत ।
न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट् ॥ २२ ॥
अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिरः । भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया । तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया ॥ २२ ॥
तस्मिन् शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भृगुः ॥ २३ ॥
शशाप बलवत्क्रुद्धो नहुषं पापचेतसम् ।
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यस्मात् पदाऽऽहतः क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम् ॥ २४ ॥
तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पो भूत्वा सुदुर्मते । उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भृगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया- ' ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा' ॥ इत्युक्तः स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह ॥ २५ ॥
अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! भृगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे । उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २५३ ॥
भृगुं हि यदि सोऽद्रक्ष्यन्नहुषः पृथिवीपते ॥ २६ ॥
न च शक्तोऽभविष्यद् वै पातने तस्य तेजसा । पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भृगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते ॥ २६३ ॥
स तु तैस्तैः प्रदानैश्च तपोभिर्नियमैस्तथा ॥ २७ ॥
पतितोऽपि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत् ।
प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति ॥ २८ ॥
महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए । उन्होंने भृगुको प्रसन्न करते हुए कहा– 'प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये ' ॥
ततोऽगस्त्यः कृपाविष्टः प्रासादयत तं भृगुम् ।
शापान्तार्थं महाराज स च प्रादात् कृपान्वितः ॥ २ ९ ॥
महाराज! तब अगस्त्यने दयासे द्रवित होकर उनके शापका अंत करनेके लिये भृगुको प्रसन्न किया । तब कृपायुक्त हुए भृगुने उस शापका अंत इस प्रकार निश्चित किया ॥ २ ९ ॥ भृगुरुवाच
राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुलोद्वहः ।
स त्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ३० ॥
भृगुने कहा— राजन्! तुम्हारे कुलमें सर्वश्रेष्ठ युधिष्ठिर नामसे प्रसिद्ध एक राजा होंगे, जो तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे- ऐसा कहकर भृगुजी अंतर्धान हो गये ॥ ३० ॥
अगस्त्योऽपि महातेजाः कृत्वा कार्यं शतक्रतोः ।
स्वमाश्रमपदं प्रायात् पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ ३१ ॥
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महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये ॥ ३१ ॥
नहुषोऽपि त्वया राजंस्तस्माच्छापात् समुद्धृतः ।
जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप ॥ ३२ ॥
राजन्! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया । नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते -देखते ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ३२ ॥
तदा स पातयित्वा तं नहुषं भूतले भृगुः ।
जगाम ब्रह्मभवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत् ॥ ३३ ॥
भृगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया ॥ ३३ ॥
ततः शक्रं समानाय्य देवानाह पितामहः ।
वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान् ॥ ३४ ॥
स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः । तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा — ‘ देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था । परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया । अब वे पृथ्वीपर चले गये ॥ न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित् ॥ ३५ ॥
तस्मादयं पुनः शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम् । ‘ देवताओ! बिना राजाके कहीं भी रहना असंभव है । अतः अपने पूर्व इन्द्रको पुनः देवराजके पदपर अभिषिक्त करो ' ॥ २५३ ॥
एवं सम्भाषमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् ॥ ३६ ॥
एवमस्त्विति संहृष्टाः प्रत्यूचुस्तं नराधिप । कुन्तीनंदन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले — ‘ भगवन्! ऐसा ही हो' ॥ ३६३ ॥
सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासवः ॥ ३७ ॥
ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत । राजसिंह! भगवान् ब्रह्माके द्वारा देवराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत् शोभा पाने लगे ॥ ३७३३ ॥
एवमेतत् पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात् ॥ ३८ ॥
स च तैरेव संसिद्धो नहुषः कर्मभिः पुनः । इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार- बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे ॥ ३८३ ॥
तस्माद् दीपाः प्रदातव्याः सायं वै गृहमेधिभिः ॥ ३ ९ ॥
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दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्य दायकः । इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये । दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है ॥ ३ ९ ३ ॥ पूर्णचन्द्रप्रतीकाशा दीपदाश्च भवन्त्युत ॥ ४० ॥
यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावतीः समाः ।
रूपवान् बलवांश्चापि नरो भवति दीपदः ॥ ४१ ॥
दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होते हैं । जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोंतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान् और बलवान् होता है ॥ ४०-४१ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भृगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥
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एकाधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणस्वानि ये मंदा हरन्ति भरतर्षभ ।
नृशंसकारिणो मूढाः क्व ते गच्छन्ति मानवाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ॥ भीष्म उवाच ( पातकानां परं ह्येतद् ब्रह्मस्वहरणं बलात् । सान्वयास्ते विनश्यन्ति चण्डालाः प्रेत्य चेह च ॥ ) भीष्मजीने कहा— राजन्! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण- यह सबसे बड़ा पातक है । ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल- स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुल-परिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
चाण्डालस्य च संवादं क्षत्रबंधोश्च भारत ॥ २ ॥
भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
राजन्य उवाच
वृद्धरूपोऽसि चाण्डाल बालवच्च विचेष्टसे ।
श्वखराणां रजः: सेवी कस्मादुद्विजसे गवाम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियने पूछा— चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों - जैसी चेष्टा करता है । कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्यों इतना उद्विग्न हो रहा है ॥ ३ ॥
साधुभिर्गर्हितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते ।
कस्माद् गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिञ्चसि ॥ ४ ॥
चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं । तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है? ॥ ४ ॥
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चाण्डाल उवाच
ब्राह्मणस्य गवां राजन् हियतीनां रजः पुरा ।
सोममुध्वंसयामास तं सोमं येऽपिबन् द्विजाः ॥ ५ ॥
दीक्षितश्च स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत् ।
सह तैर्याजकैः सर्वैर्ब्रह्मस्वमुपजीव्य तत् ॥ ६ ॥
चाण्डालने कहा — राजन्! पहलेकी बात है —एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था । जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया । उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे । उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए ॥ ५-६ ॥
येऽपि तत्रापिबन् क्षीरं घृतं दधि च मानवाः ।
ब्राह्मणाः सहराजन्याः सर्वे नरकमाविशन् ॥ ७ ॥
जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े ॥ ७ ॥
जघ्नुस्ताः पयसा पुत्रांस्तथा पौत्रान् विधुन्वतीः ।
पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती ॥ ८ ॥
वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं । उन दिनों सद्भावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति- पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया ॥ ८ ॥
अहं तत्रावसं राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप ॥ ९ ॥
राजन्! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था । नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षान्न भी दूषित हो गया ॥ ९ ॥
चाण्डालोऽहं ततो राजन् भुक्त्वा तदभवं नृप ।
ब्रह्मस्वहारी च नृपः सोऽप्रतिष्ठां गतिं ययौ ॥ १० ॥
महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये ॥ १० ॥
तस्माद्धरेन्न विप्रस्वं कदाचिदपि किंचन ।
ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम् ॥ ११ ॥
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इसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूल-धूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें ॥ ११ ॥
तस्मात् सोमोऽप्यविक्रेयः पुरुषेण विपश्चिता ।
विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिणः ॥ १२ ॥
इसीलिये विद्वान् पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये । मनीषी पुरुष इस जगत्में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं ॥ १२ ॥
ये चैनं क्रीणते तात ये च विक्रीणते जनाः ।
ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वशः ॥ १३ ॥
तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं ॥ १३ ॥
सोमं तु रजसा ध्वस्तं विक्रीणन् विधिपूर्वकम् ।
श्रोत्रियो वार्धुषी भूत्वा न चिरं स विनश्यति ॥ १४ ॥
वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा व्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है ॥ १४ ॥
नरकं त्रिंशतं प्राप्य स्वविष्ठामुपजीवति ।
श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम् ॥ १५ ॥
तुलया धारयन् धर्ममभिमान्यतिरिच्यते । वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है । कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार- इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा ॥ १५३ ॥
श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्णं हरिणं कृशम् ॥ १६ ॥
अभिमानेन भूतानामिमां गतिमुपागतम् । आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है । यह पहले मनुष्य था । परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है ॥ १६३ ॥
अहं वै विपुले तात कुले धनसमन्विते ॥ १७ ॥
अन्यस्मिञ्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारगः ।
अभवं तत्र जानानो ह्येतान् दोषान् मदात् सदा ॥ १८ ॥
संरब्ध एव भूतानां पृष्ठमांसमभक्षयम् ।
सोऽहं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै ॥ १ ९ ॥
इमामवस्थां सम्प्राप्तः पश्य कालस्य पर्ययम् । तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान् कुलमें उत्पन्न हुआ था । ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत था । इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब
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प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्य-भक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ । कालके इस उलट - फेरको देखिये ॥ आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम् ॥ २० ॥
धावमानं सुसंरब्धं पश्य मां रजसान्वितम् । मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार- मारकर पीड़ित कर दिया हो । मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत
रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये ॥ २० ॥
स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिनः ॥ २१ ॥
दानैः पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिणः । गृहस्थ मनुष्य वेद- शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान्
पापको दूर कर देते हैं । जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ २१३ ॥
तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते ॥ २२ ॥
सर्वसंगविनिर्मुक्तं छन्दांस्युत्तारयन्त्युत । पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मणको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं ॥ २२ ॥
अहं हि पापयोन्यां वैप्रसूतः क्षत्रियर्षभ निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत ॥ २३ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा? ॥ २३ ॥
जातिस्मरत्वं च मम केनचित् पूर्वकर्मणा ।
शुभेन येन मोक्षं वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप ॥ २४ ॥
नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व- जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ ॥ २४ ॥
त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते ।
चाण्डालत्वात् कथमहं मुच्येयमिति सत्तम ॥ २५ ॥
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ । आप मुझे इसका समाधान बताइये । मैं चाण्डाल- योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ? ॥ २५ ॥
राजन्य उवाच
चाण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्ययसि ।
ब्राह्मणार्थे त्यजन् प्राणान् गतिमिष्टामवाप्स्यसि ॥ २६ ॥
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क्षत्रियने कहा- चाण्डाल! तू उस उपायको समझ ले, जिससे तुझे मोक्ष प्राप्त होगा । यदि तू ब्राह्मणकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करे तो तुझे अभीष्ट गति प्राप्त होगी ॥ २६ ॥
दत्त्वा शरीरं क्रव्याद्भयो रणाग्नौ द्विजहेतुकम् ।
हुत्वा प्राणान् प्रमोक्षस्ते नान्यथा मोक्षमर्हसि ॥ २७ ॥
यदि ब्राह्मणकी रक्षाके लिये तू अपना यह शरीर समराग्निमें होमकर कच्चा मांस खानेवाले जीव- जन्तुओंको बाँट दे तो प्राणोंकी आहुति देनेपर तेरा छुटकारा हो सकता है, अन्यथा तू मोक्ष नहीं पा सकेगा ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तदा तेन ब्रह्मस्वार्थे परंतप ।
हुत्वा रणमुखे प्राणान् गतिमिष्टामवाप ह ॥ २८ ॥
भीष्मजी कहते हैं- परंतप! क्षत्रियके ऐसा कहनेपर उस चाण्डालने ब्राह्मणके धनकी रक्षाके लिये युद्धके मुहानेपर अपने प्राणोंकी आहुति दे अभीष्ट गति प्राप्त कर ली ॥ २८ ॥
तस्माद् रक्ष्यं त्वया पुत्र ब्रह्मस्वं भरतर्षभ ।
यदीच्छसि महाबाहो शाश्वतीं गतिमात्मनः ॥ २ ९ ॥
बेटा! भरतश्रेष्ठ! महाबाहो! यदि तुम सनातन गति पाना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मणके धनकी पूरी रक्षा करनी चाहिये ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि राजन्यचाण्डालसंवादो नामैकोत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं) Pled
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द्वयधिकशततमोऽध्यायः भिन्न - भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न - भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख युधिष्ठिर उवाच
एके लोकाः सुकृतिनः सर्वे त्वाहो पितामह ।
तत्र तत्रापि भिन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! ( मृत्युके पश्चात्) सभी पुण्यात्मा एक ही तरहके लोकमें जाते हैं या वहाँ उन्हें प्राप्त होनेवाले लोकोंमें भिन्नता होती है? दादाजी! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
कर्मभिः पार्थ नानात्वं लोकानां यान्ति मानवाः ।
पुण्यान् पुण्यकृतो यान्ति पापान् पापकृतो नराः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – कुन्तीनंदन! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें जाते हैं । पुण्यकर्म करनेवाले पुण्यलोकोंमें जाते हैं और पापाचारी मनुष्य पापमय लोकोंमें ॥ २ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य मुनेस्तात संवादं वासवस्य च ॥ ३ ॥
तात! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और गौतम मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥
ब्राह्मणो गौतमः कश्चिन्मृदुर्दान्तो जितेन्द्रियः ।
महावने हस्तिशिशुं परिद्यूनममातृकम् ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा जीवयामास सानुक्रोशो धृतव्रतः ।
स तु दीर्घेण कालेन बभूवातिबलो महान् ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें गौतम नामवाले एक ब्राह्मण थे, जिनका स्वभाव बड़ा कोमल था । वे मनको वशमें रखनेवाले और जितेन्द्रिय थे । उन व्रतधारी मुनिने विशाल वनमें एक हाथीके बच्चेको अपने माताके बिना बड़ा कष्ट पाते देखकर उसे कृपापूर्वक जिलाया । दीर्घकालके पश्चात् वह हाथी बढ़कर अत्यंत बलवान् हो गया ॥
तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं पर्वतोपमम् ।
धृतराष्ट्रस्य रूपेण शक्रो जग्राह हस्तिनम् ॥ ६ ॥