श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 891–900
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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उस महानागके कुम्भस्थलसे फूटकर मदकी धारा बहने लगी । मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो । एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ६ ॥
ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा गौतमः संशितव्रतः ।
अभ्यभाषत राजानं धृतराष्ट्रं महातपाः ॥ ७ ॥
कठोर व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी गौतमने उस हाथीका अपहरण होता देख राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ॥ मा मेऽहार्षीर्हास्तिनं पुत्रमेनं दुःखात् पुष्टं धृतराष्ट्राकृतज्ञ । मैत्रं सतां सप्तपदं वदन्ति मित्रद्रोहो मैव राजन् स्पृशेत् त्वाम् ॥ ८ ॥
‘कृतज्ञताशून्य राजा धृतराष्ट्र! तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ । यह मेरा पुत्र है । मैंने बड़े दुःखसे इसका पालन- पोषण किया है । सत्पुरुषोंमें सात पग साथ चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है । इस नाते हम और तुम दोनों मित्र हैं । मेरे इस हाथीको ले जानेसे तुम्हें
मित्रद्रोहका पाप लगेगा । तुम्हें यह पाप न लगे, ऐसी चेष्टा करो ॥ ८ ॥
इध्मोदकप्रदातारं शून्यपालं ममाश्रमे ।
विनीतमाचार्यकुले सुयुक्तं गुरुकर्मणि ॥ ९ ॥
शिष्टं दान्तं कृतज्ञं च प्रियं च सततं मम ।
न मे विक्रोशतो राजन् हर्तुमर्हसि कुञ्जरम् ॥ १० ॥
' राजन्! यह मुझे समिधा और जल लाकर देता है । मेरे आश्रममें जब कोई नहीं रहता है, तब यही रक्षा करता है । आचार्यकुलमें रहकर इसने विनयकी शिक्षा ग्रहण की है । गुरुसेवाके कार्यमें यह पूर्णरूपसे संलग्न रहता है । यह शिष्ट, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ तथा मुझे सदा ही प्रिय है । मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूँ, तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ ' ॥ ९ -१० || धृतराष्ट्रउवाच गवां सहस्रं भवते ददानि दासीशतं निष्कशतानि पञ्च । अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे किं ब्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम् ॥ ११ ॥
धृतराष्ट्रने कहा– महर्षे! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा । सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान करूँगा और भी नाना प्रकारका धन समर्पित करूँगा । ब्राह्मणके यहाँ हाथीका क्या काम है? ॥ ११ ॥
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गौतम उवाच तवैव गावो हि भवन्तु राजन् दास्यः सनिष्का विविधं च रत्नम् । अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र किं ब्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम् ॥ १२ ॥
गौतम बोले — राजन्! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्णमुद्राएँ, नाना प्रकारके रत्न तथा और भी तरह - तरहके धन तुम्हारे ही पास रहें । नरेन्द्र! ब्राह्मणके यहाँ धनका क्या काम है? ॥ १२ ॥
धृतराष्ट्रउवाच ब्राह्मणानां हस्तिभिर्नास्ति कृत्यं राजन्यानां नागकुलानि विप्र । स्वं वाहनं नयतो नास्त्यधर्मो नागश्रेष्ठं गौतमास्मान्निवर्त ॥ १३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा- विप्रवर गौतम! ब्राह्मणोंको हाथियोंसे कोई प्रयोजन नहीं है । हाथियोंके समूह तो राजाओंके ही काम आते हैं । हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथीको ले जानेमें कोई अधर्म नहीं है । आप इसकी ओरसे अपनी तृष्णा हटा लीजिये ॥ १३ ॥
गौतम उवाच यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा
यत्र प्रेतः शोचते पापकर्मा ।
वैवस्वतस्य सदने महात्मं- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १४ ॥
गौतमने कहा — महात्मन्! जहाँ जाकर पुण्यकर्मा पुरुष आनंदित होता है और जहाँ जाकर पापकर्मा मनुष्य शोकमें डूब जाता है, उस यमराजके लोक मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्रउवाच ये निष्क्रिया नास्तिकाश्रद्दधानाः पापात्मान इन्द्रियार्थे निविष्टाः । यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा- जो निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापात्मा और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, वे ही यमयातनाको प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्रको वहाँ नहीं जाना
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है ॥ १५ ॥
गौतम उवाच वैवस्वती संयमनी जनानां यत्रानृतं नोच्यते यत्र सत्यम् । यत्राबला बलिनं यातयन्ति तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १६ ॥
गौतम बोले — जहाँ कोई भी झूठ नहीं बोलता, जहाँ सदा सत्य ही बोला जाता है और जहाँ निर्बल मनुष्य भी बलवान्से अपने प्रति किये गये अन्यायका बदला लेते हैं, मनुष्योंको संयममें रखनेवाली यमराजकी वही पुरी संयमनी नामसे प्रसिद्ध है । वहीं मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रउवाच ज्येष्ठां स्वसारं पितरं मातरं च यथा शत्रुं मदमत्ताश्चरन्ति । तथाविधानामेष लोको महर्षे परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ १७ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – महर्षे! जो मदमत्त मनुष्य बड़ी बहिन, माता और पिताके साथ शत्रुके समान बर्ताव करते हैं, उन्हींके लिये यह यमराजका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ जानेवाला नहीं है ॥ १७ ॥
गौतम उवाच मन्दाकिनी वैश्रवणस्य राज्ञो महाभागा भोगिजनप्रवेश्या । गंधर्वयक्षैरप्सरोभिश्च जुष्टा तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १८ ॥
गौतमने कहा — महान् सौभाग्यशाली मंदाकिनी नदी राजा कुबेरके नगरमें विराज रही हैं, जहाँ नागोंका ही प्रवेश होना संभव है, गंधर्व, यक्ष और अप्सराएँ उस मंदाकिनीका सदा सेवन करती हैं; वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ॥ १८ ॥
धृतराष्ट्रउवाच अतिथिव्रताः सुव्रता ये जना वै प्रतिश्रयं ददति ब्राह्मणेभ्यः । शिष्टाशिनः संविभज्याश्रितांश्च मंदाकिनीं तेऽपि विभूषयन्ति ॥ १ ९ ॥
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धृतराष्ट्र बोले-जो सदा अतिथियोंकी सेवामें तत्पर रहकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं, जो लोग ब्राह्मणको आश्रयदान करते हैं, तथा जो अपने आश्रितोंको बाँटकर शेष अन्नका भोजन करते हैं, वे ही लोग उस मंदाकिनीतटकी शोभा बढ़ाते हैं ( राजा धृतराष्ट्रको तो वहाँ भी नहीं जाना है ) ॥ १ ९ ॥ गौतम उवाच मेरोरग्रे यद् वनं भाति रम्यं सुपुष्पितं किन्नरीगीतजुष्टम् । सुदर्शना यत्र जम्बूर्विशाला तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २० ॥
गौतम बोले — मेरुपर्वतके सामने जो रमणीय वन शोभा पाता है, जहाँ सुंदर फूलोंकी छटा छायी रहती है और किन्नरियोंके मधुर गीत गूँजते रहते है, जहाँ देखनेमें सुंदर विशाल जम्बूवृक्ष शोभा पाता है, वहाँ पहुँचकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २० ॥
धृतराष्ट्रउवाच ये ब्राह्मणा मृदवः सत्यशीला बहुश्रुताः सर्वभूताभिरामाः । येऽधीयते सेतिहासं पुराणं मध्वाहुत्या जुह्वति वै द्विजेभ्यः ॥ २१ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र । यद् विद्यते विदितं स्थानमस्ति तद् ब्रूहि त्वं त्वरितो ह्येष यामि ॥ २२ ॥
धृतराष्ट्र बोले- महर्षे! जो ब्राह्मण कोमलस्वभाव, सत्यशील, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंको प्यार करनेवाले हैं, जो इतिहास और पुराणका अध्ययन करते तथा ब्राह्मणोंको मधुर भोजन अर्पित करते हैं; ऐसे लोगोंके लिये ही यह पूर्वोक्त लोक है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है । आपको जो- जो स्थान विदित हैं, उन सबका यहाँ
वर्णन कर जाइये । मैं जानेके लिये उतावला हूँ। यह देखिये, मैं चला ॥
गौतम उवाच सुपुष्पितं किन्नरराजजुष्टं प्रियं वनं नंदनं नारदस्य । गंधर्वाणामप्सरसां च शश्वत् तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २३ ॥
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गौतमने कहा – सुंदर- सुंदर फूलोंसे सुशोभित, किन्नर- राजोंसे सेवित तथा नारद, गंधर्व और अप्सराओंको सर्वदा प्रिय जो नंदननामक वन है, वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रउवाच ये नृत्यगीते कुशला जनाः सदा ह्ययाचमानाः सहिताश्चरन्ति । तथाविधानामेष लोको महर्षे परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्र बोले- महर्षे! जो लोग नृत्य और गीतमें निपुण हैं; कभी किसीसे कुछ याचना नहीं करते हैं तथा सदा सज्जनोंके साथ विचरण करते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह नंदनवनका जगत् है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ २४ ॥
गौतमउवाच यत्रोत्तराः कुरवो भांति रम्या देवैः सार्धं मोदमाना नरेन्द्र । यत्राग्नियौनाश्च वसंति लोका अब्योनयः पर्वतयोनयश्च ॥ २५ ॥
यत्र शक्रो वर्षति सर्वकामान् यत्र स्त्रियः कामचारा भवन्ति । यत्र चेर्ष्या नास्ति नारीनराणां तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २६ ॥
गौतम बोले- नरेन्द्र! जहाँ रमणीय आकृतिवाले उत्तर कुरुके निवासी अपूर्व शोभा पाते हैं, देवताओंके साथ रहकर आनंद भोगते हैं, अग्नि, जल और पर्वतसे उत्पन्न हुए दिव्य मानव जिस देशमें निवास करते हैं, जहाँ इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करते हैं, जहाँकी स्त्रियाँ इच्छानुसार विचरनेवाली होती हैं तथा जहाँ स्त्रियों और पुरुषोंमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २५-२६ ॥ धृतराष्ट्रउवाच ये सर्वभूतेषु निवृत्तकामा अमांसादा न्यस्तदण्डाश्चरन्ति । न हिंसन्ति स्थावरं जङ्गमं च भूतानां ये सर्वभूतात्मभूताः ॥ २७ ॥
निराशिषो निर्ममा वीतरागा
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लाभालाभे तुल्यनिन्दाप्रशंसाः । तथाविधानामेष लोको महर्षे परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ २८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – महर्षे! जो समस्त प्राणियोंमें निष्काम हैं, जो मांसाहार नहीं करते, किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, स्थावर- जंगम प्राणियोंकी हिंसा नहीं करते, जिनके लिये समस्त प्राणी अपने आत्माके ही तुल्य हैं, जो कामना, ममता और आसक्तिसे रहित हैं, लाभ-हानि, निंदा तथा प्रशंसामें जो सदा समभाव रखते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह उत्तर कुरुनामक लोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ २७-२८ ॥ गौतम उवाच ततोऽपरे भांति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगन्धा विरजा वीतशोकाः ।
सोमस्य राज्ञः सदने महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २ ९ ॥
गौतमने कहा- राजन्! उससे भिन्न बहुत - से सनातन लोक हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है । वहाँ रजोगुण तथा शोकका सर्वथा अभाव है । महात्मा राजा सोमके लोकमें उनकी स्थिति है । वहाँ पहुँचकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २ ९ ॥ धृतराष्ट्रउवाच ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा न चाप्यर्थांश्चाददते परेभ्यः । येषामदेयमर्हते नास्ति किंचित् सर्वातिथ्याः सुप्रसादा जनाश्च ॥ ३० ॥
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्यान् सत्रीभूताः सततं पुण्यशीलाः । तथाविधानामेष लोको महर्षे परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३१ ॥
धृतराष्ट्रने कहा — महर्षे! जो सदा दान करते हैं, किंतु दान लेते नहीं, जिनकी दृष्टिमें सुयोग्य पात्रके लिये कुछ भी अदेय नहीं है, जो सबका अतिथि सत्कार करते तथा सबके प्रति कृपाभाव रखते हैं, जो क्षमाशील हैं, दूसरोंसे कभी कुछ नहीं बोलते हैं और जो पुण्यशील महात्मा सदा सबके लिये अन्नसत्ररूप हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३०-३१ ॥ गौतम उवाच
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ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातना
विरजसो वितमस्का विशोकाः ।
आदित्यदेवस्य पदं महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३२ ॥
गौतमने कहा — राजन्! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित है । वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं । वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ॥ धृतराष्ट्रउवाच स्वाध्यायशीला गुरुशुश्रूषणे रता- स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसंधाः । आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ॥ ३३ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे विशुद्धानां भावितो वाग्यतानाम् । सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ गौतमउवाच ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगंधा विरजा विशोकाः ।
वरुणस्य राज्ञः सदने महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३५ ॥
गौतमने कहा — उसके सिवा दूसरे भी बहुत - से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है । वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही । महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं । वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ३५ ॥
धृतराष्ट्रउवाच चातुर्मास्यैर्ये यजन्ते जनाः सदा
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तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति । ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ॥ ३६ ॥
सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् । धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३७ ॥
धृतराष्ट्रने कहा — जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोंतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं । धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है । यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ॥ ३६-३७ ॥ गौतमउवाच इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका दुरन्वयाः काङ्क्षिता मानवानाम् । तस्याहं ते भवने भूरितेजसो राजन्निमं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३८ ॥
गौतमने कहा- राजन्! इन्द्रके लोक रजोगुण और शोकसे रहित हैं । उनकी प्राप्ति बहुत कठिन है । सभी मनुष्य उन्हें पानेकी इच्छा करते हैं । उन्हीं महातेजस्वी इन्द्रके भवनमें चलकर मैं आपसे अपने इस हाथीको वापस लूँगा ॥ ३८ ॥
धृतराष्ट्रउवाच शतवर्षजीवी यश्च शूरो मनुष्यो वेदाध्यायी यश्च यज्वाप्रमत्तः । एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३ ९ ॥ धृतराष्ट्रने कहा-जो सौ वर्षतक जीनेवाला शूरवीर मनुष्य वेदोंका स्वाध्याय करता, यज्ञमें तत्पर रहता और कभी प्रमाद नहीं करता है, ऐसे ही लोग इन्द्रलोकमें जाते हैं ।
धृतराष्ट्र उससे भी उत्तम लोकमें जायगा । उसे वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३ ९ ॥
गौतम उवाच प्राजापत्याः सन्ति लोका महान्तो नाकस्य पृष्ठे पुष्कला वीतशोकाः ।
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मनीषिताः सर्वलोकोद्भवानां तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४० ॥
गौतम बोले — राजन्! स्वर्गके शिखरपर प्रजापतिके महान् लोक हैं जो हृष्ट-पुष्ट और शोकरहित हैं । सम्पूर्ण जगत्के प्राणी उन्हें पाना चाहते हैं । मैं वहीं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४० ॥
धृतराष्ट्रउवाच ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता
धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् ।
ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगा- स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ४१ ॥
धृतराष्ट्रने कहा –मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृथ- स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते
हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं । धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ॥ ४१ ॥
गौतम उवाच ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः सुपुण्यगंधा विरजा वीतशोकाः । तस्मिन्नहं दुर्लभे चाप्यधृष्ये गवां लोके हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४२ ॥
गौतम बोले-उससे परे जो पवित्र गन्धसे परिपूर्ण, रजोगुणरहित तथा शोकशून्य सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, उन्हें गोलोक कहते हैं । उस दुर्लभ एवं दुर्धर्ष गोलोकमें जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४२ ॥
धृतराष्ट्रउवाच यो गोसहस्री शतदः समां समां गवां शती दश दद्याच्च शक्त्या । तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ॥ ४३ ॥
ये जीर्यन्ते ब्रह्मचर्येण विप्रा
बाह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव ।
मनस्विनस्तीर्थयात्रापरायणा- ते तत्र मोदन्ति गवां निवासे ॥ ४४ ॥
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धृतराष्ट्रने कहा- जो सहस्र गौओंका स्वामी होकर प्रतिवर्ष सौ गौओंका दान करता है, सौ गौओंका स्वामी होकर यथाशक्ति दस गौओंका दान करता है, जिसके पास दस ही गौएँ हैं, वह यदि उनमें से एक गायका दान करता है अथवा जो दानशील पुरुष पाँच गौओंमेंसे एक गायका दान कर देता है, वह गोलोकमें जाता है । जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका पालन करते - करते ही बूढ़े हो जाते हैं, जो वेदवाणीकी सदा रक्षा करते हैं तथा जो मनस्वी ब्राह्मण सदा तीर्थयात्रामें ही तत्पर रहते हैं, वे ही गौओंके निवास स्थान गोलोकमें आनंद भोगते हैं ॥ ४३-४४ ॥
प्रभासं मानसं तीर्थं पुष्कराणि महत्सरः ।
पुण्यं च नैमिषं तीर्थं बाहुदां करतोयिनीम् ॥ ४५ ॥
गयां गयशिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् ।
कृष्णां गंगां पञ्चनदं महाह्रदमथापि च ॥ ४६ ॥
गोमतीं कौशिकीं पम्पां महात्मानो धृतव्रताः ।
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये तु यान्ति च ॥ ४७ ॥
तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः ।
प्रयान्ति पुण्यगंधाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ॥ ४८ ॥
प्रभास, मानसरोवर तीर्थ, त्रिपुष्कर नामक महान् सरोवर, पवित्र नैमिषतीर्थ, बाहुदा नदी, करतोया नदी, गया, गयशिर, स्थूल बालुकायुक्त विपाशा ( व्यास ), कृष्णा, गंगा, पंचनद, महाह्रद, गोमती, कौशिकी, पम्पासरोवर, सरस्वती, दृषद्वती और यमुना – इन तीर्थोंमें जो व्रतधारी महात्मा जाते हैं, वे ही दिव्य रूप धारण करके दिव्य मालाओंसे अलंकृत हो गोलोकमें जाते हैं और कल्याणमय स्वरूप तथा पवित्र सुगंधसे व्याप्त होकर
वहाँ निवास करते हैं । धृतराष्ट्र उस लोकमें भी नहीं मिलेगा ॥
गौतम उवाच
यत्र शीतभयं नास्ति न चोष्णभयमण्वपि ।
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दुःखं न सुखं तथा ॥ ४ ९ ॥
न द्वेष्यो न प्रियः कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथा ।
न जरामरणे तत्र न पुण्यं न च पातकम् ॥ ५० ॥
तस्मिन् विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते ।
स्वयम्भुभवने पुण्ये हस्तिनं मे प्रदास्यसि ॥ ५१ ॥
गौतम बोले — जहाँ सर्दीका भय नहीं है, गर्मीका अणुमात्र भी भय नहीं है, जहाँ न भूख लगती है न प्यास, न ग्लानि प्राप्त होती है न दुःख - सुख, जहाँ न कोई द्वेषका पात्र है न प्रेमका, न कोई बन्धु है न शत्रु, जहाँ जरा - मृत्यु, पुण्य और पाप कुछ भी नहीं है, उस