श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 901–910
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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रजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा ॥ ४ ९ –५१ ॥ धृतराष्ट्रउवाच
निर्मुक्ताः सर्वसंगैर्ये कृतात्मानो यतव्रताः ।
अध्यात्मयोगसंस्थानैर्युक्ताः स्वर्गगतिं गताः ॥ ५२ ॥
ते ब्रह्मभवनं पुण्यं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः ।
न तत्र धृतराष्ट्रस्ते शक्यो द्रष्टुं महामुने ॥ ५३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – महामुने! जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त है, जिन्होंने अपने मनको वशमें कर लिया है, जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं जो अध्यात्मज्ञान और योगसंबंधी आसनोंसे युक्त हैं, जो स्वर्गलोकके अधिकारी हो चुके हैं, ऐसे सात्त्विक पुरुष ही पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाते हैं । वहाँ तुम्हें धृतराष्ट्र नहीं दिखायी दे सकता ॥ ५२-५३ ॥ गौतम उवाच रथन्तरं यत्र बृहच्च गीयते यत्र वेदी पुण्डरीकैस्तृणोति । यत्रोपयाति हरिभिः सोमपीथी तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ५४ ॥
गौतम बोले- जहाँ रथन्तर और बृहत्सामका गान किया जाता है, जहाँ याज्ञिक पुरुष वेदीको कमलपुष्पोंसे आच्छादित करते हैं तथा जहाँ सोमपान करनेवाला पुरुष दिव्य अश्वोंद्वारा यात्रा करता है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ५४ ॥
बुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं
व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा ।
कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदाचि- दकार्षं ते मनसोऽभिषंगात् ॥ ५५ ॥
मैं जानता हूँ, आप राजा धृतराष्ट्र नहीं, वृत्रासुरका वध करनेवाले शतक्रतु इन्द्र हैं और सम्पूर्ण जगत्का निरीक्षण करनेके लिये सब ओर घूम रहे हैं । मैंने मानसिक आवेशमें आकर कदाचित् वाणीद्वारा आपके प्रति कोई अपराध तो नहीं कर डाला? ॥ ५५ ॥
शतक्रतुरुवाच मघवाहं लोकपथं प्रजाना- मन्वागमं परिवादे गजस्य । तस्माद् भवान् प्रणतं मानुशास्तु
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ब्रवीषि यत् तत् करवाणि सर्वम् ॥ ५६ ॥
शतक्रतु बोले — मैं इन्द्र हूँ और आपके हाथीके अपहरणके कारण मानव प्रजाके दृष्टिपथमें निन्दित हो गया हूँ। अब मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ । आप मुझे
कर्तव्यका उपदेश दें । आप जो - जो कहेंगे, वह सब करूँगा ॥ ५६ ॥
गौतमउवाच श्वेतं करेणुं मम पुत्रं हि नागं
यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि बालम् ।
यो मे वने वसतोऽभूद् द्वितीय- तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ॥ ५७ ॥
गौतम बोले — देवेन्द्र! यह श्वेत गजराजकुमार जो इस समय नवजवान हाथीके रूपमें परिणत हो चुका है, मेरा पुत्र है और अभी दस वर्षका बच्चा है । यही इस वनमें रहते हुए मेरा सहचर एवं सहयोगी है । इसे आपने हर लिया है । मेरी प्रार्थना है कि मेरे इसी हाथीको आप मुझे लौटा दें ॥ ५७ ॥
शतक्रतुरुवाच अयं सुतस्ते द्विजमुख्य नाग आगच्छति त्वामभिवीक्षमाणः । पादौ च ते नासिकयोपजिघ्रते श्रेयो ममाध्याहि नमश्च तेऽस्तु ॥ ५८ ॥
शतक्रतुने कहा — विप्रवर! आपका पुत्रस्वरूप यह हाथी आपहीकी ओर देखता हुआ आ रहा है और पास आकर आपके दोनों चरणोंको अपनी नासिकासे सूँघता है । अब आप मेरा कल्याण - चिंतन कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ गौतम उवाच शिवं सदैवेह सुरेन्द्र तुभ्यं ध्यायामि पूजां च सदा प्रयुञ्जे । ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व त्वया दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ॥ ५ ९ ॥ गौतम बोले- सुरेन्द्र! मैं सदा ही यहाँ आपके कल्याणका चिंतन करता हूँ और सदा आपके लिये अपनी पूजा अर्पित करता हूँ। शक्र! आप भी मुझे कल्याण प्रदान करें । मैं आपके दिये हुए इस हाथीको ग्रहण करता हूँ ॥ ५ ९ ॥ शतक्रतुरुवाच येषां वेदा निहिता वै गुहायां
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मनीषिणां सत्यवतां महात्मनाम् । तेषां त्वयैकेन महात्मनास्मि वृद्धस्तस्मात् प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ॥ ६० ॥
हन्तैहि ब्राह्मण क्षिप्रं सह पुत्रेण हस्तिना ।
त्वं हि प्राप्तुं शुभाँल्लोकानह्नाय च चिराय च ॥ ६१ ॥
शतक्रतुने कहा–जिन सत्यवादी मनीषी महात्माओंकी हृदय- गुफामें सम्पूर्ण वेद निहित हैं, उनमें आप प्रमुख महात्मा हैं । केवल आपके कल्याण-चिंतनसे मैं समृद्धिशाली हो गया । इसलिये आज मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ । ब्राह्मण! मैं बड़े हर्षके साथ कहता हूँ कि आप अपने इस पुत्रभूत हाथीके साथ शीघ्र चलिये । आप अभी चिरकालके लिये कल्याणमय लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी हो गये हैं ॥ ६०-६१ ॥
स गौतमं पुरस्कृत्य सह पुत्रेण हस्तिना ।
दिवमाचक्रमे वज्री सद्भिः सह दुरासदम् ॥ ६२ ॥
पुत्रस्वरूप हाथीके साथ गौतमको आगे करके वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ दुर्गम देवलोकमें चले गये ॥ ६२ ॥
इदं यः शृणुयान्नित्यं यः पठेद्वा जितेन्द्रियः ।
स याति ब्रह्मणो लोकं ब्राह्मणो गौतमो यथा ॥ ६३ ॥
जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनेगा, अथवा इसका पाठ करेगा, वह गौतम ब्राह्मणकी भाँति ब्रह्मलोकमें जायगा ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हस्तिकूटो नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन -व्रतकी विशेष महिमा युधिष्ठिर उवाच
दानं बहुविधाकारं शांतिः सत्यमहिंसितम् ।
स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत् ॥ १ ॥
पितामहस्य विदितं किमन्यत् तपसो बलात् ।
तपसो यत्परं तेऽद्य तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! आपने अनेक प्रकारके दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदिका वर्णन किया । अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेकी बात बतायी और दानके फलका भी निरूपण किया । आपकी जानकारीमें तपोबलसे बढ़कर दूसरा कौन बल है? यदि आपकी रायमें तपस्यासे भी कोई उत्कृष्ट साधन हो तो हमारे समक्ष उसकी व्याख्या करें ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच
तपः प्रचक्षते यावत् तावल्लोको युधिष्ठिर ।
मतं ममात्र कौन्तेय तपो नानशनात् परम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! मनुष्य जितना तप करता है, उसीके अनुसार उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; किन्तु कुंतीकुमार! मेरी रायमें अनशनसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भगीरथस्य संवादं ब्रह्मणश्च महात्मनः ॥ ४ ॥
इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा भगीरथ और महात्मा ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
अतीत्य सुरलोकं च गवां लोकं च भारत ।
ऋषिलोकं च सोऽगच्छद् भगीरथ इति श्रुतम् ॥ ५ ॥
भारत! सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ देवलोक, गौओंके लोक और ऋषिलोकको भी लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ५ ॥
तं तु दृष्ट्वा वचः प्राह ब्रह्मा राजन् भगीरथम् ।
कथं भगीरथागास्त्वमिमं लोकं दुरासदम् ॥ ६ ॥
राजन्! राजा भगीरथको वहाँ उपस्थित देख ब्रह्माजीने उनसे पूछा— ' भगीरथ! इस लोकमें तो आना बहुत ही कठिन है, तुम कैसे यहाँ आ पहुँचे ॥ ६ ॥
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न हि देवा न गंधर्वा न मनुष्या भगीरथ ।
आयान्त्यतप्ततपसः कथं वै त्वमिहागतः ॥ ७ ॥
‘ भगीरथ! देवता, गंधर्व और मनुष्य बिना तपस्या किये यहाँ नहीं आ सकते । फिर तुम कैसे यहाँ आ गये? ' ॥ ७ ॥
भगीरथ उवाच निष्काणां वै ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः शतं सहस्राणि सदैव दानम् । बाह्मं व्रतं नित्यमास्थाय विद्वन् न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ॥ ८ ॥
भगीरथने कहा — विद्वन्! मैं ब्रह्मचर्यव्रतका आश्रय लेकर प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण- मुद्राओंका ब्राह्मणोंके लिये दान किया करता था; परंतु उस दानके फलसे मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ८ ॥
दशैकरात्रान् दशपञ्चरात्रा- नेकादशैकादशकान् क्रतूंश्च । ज्योतिष्टोमानां च शतं यदिष्टं फलेन तेनापि च नागतोऽहम् ॥ ९ ॥
मैंने एक रातमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, पाँच रातोंमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, ग्यारह रातोंमें समाप्त होनेवाले ग्यारह यज्ञ और ज्योतिष्टोम नामक एक सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, परंतु उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ९ ॥
यच्चावसं जाह्नवीतीरनित्यः शतं समास्तप्यमानस्तपोऽहम् । अदां च तत्राश्वतरीसहस्रं पुरं न च तेनाहमागाम् ॥ १० ॥
मैंने जो घोर तपस्या करते हुए लगातार सौ वर्षोंतक प्रतिदिन गंगाजीके तटपर निवास किया है और वहाँ सहस्रों खच्चरियों तथा झुंड-की-झुंड कन्याओंका दान किया, उस पुण्यके प्रभावसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १० ॥
दशायुतानि चाश्वानां गोऽयुतानि च विंशतिम् ।
पुष्करेषु द्विजातिभ्यः प्रादां शतसहस्रशः ॥ ११ ॥
सुवर्णचन्द्रोत्तमधारिणीनां कन्योत्तमानामददं सहस्रम् । षष्टिं सहस्राणि विभूषितानां जाम्बूनदैराभरणैर्न तेन ॥ १२ ॥
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पुष्करतीर्थमें जो सैकड़ों- हजारों बार मैंने ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े और दो लाख गौएँ दान कीं तथा सोनेके उत्तम चन्द्रहार धारण करनेवाली जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित हुई साठ हजार सुन्दरी कन्याओंका जो सहस्रों बार दान किया, उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ दशार्बुदान्यददं गोसवेज्या- स्वेकैकशो दश गा लोकनाथ । समानवत्साः पयसा समन्विताः सुवर्णकांस्योपदुहा न तेन ॥ १३ ॥
लोकनाथ! गोसव नामक यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें मैंने दूध देनेवाली सौ करोड़ गौओंका दान किया । उस समय एक-एक ब्राह्मणको दस-दस गायें मिली थीं । प्रत्येक गायके साथ उसीके समान रंगवाले बछड़े और सुवर्णमय दुग्धपात्र भी दिये गये थे; परंतु उस यज्ञके पुण्यसे भी मैं यहाँतक नहीं पहुँचा हूँ ॥ १३ ॥
आप्तोर्यामेषु नियतमेकैकस्मिन् दशाददम् ।
गृष्टीनां क्षीरदात्रीणां रोहिणीनां शतानि च ॥ १४ ॥
अनेक बार सोमयागकी दीक्षा लेकर उन यज्ञोंमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको पहले बारकी ब्यायी हुई दूध देनेवाली दस-दस गौएँ और रोहिणी जातिकी सौ -सौ गौएँ दान की ॥ १४ ॥
दोग्ध्रीणां वै गवां चापि प्रयुतानि दशैव ह ।
प्रादां दशगुणं ब्रह्मन् न तेनाहमिहागतः ॥ १५ ॥
ब्रह्मन्! इनके अतिरिक्त भी मैंने दस बार दस - दस लाख दुधारू गौएँ दान की हैं; किंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ १५ ॥
वाजिनां बाह्लिजातानामयुतान्यददं दश ।
कर्काणां हेममालानां न च तेनाहमागतः ॥ १६ ॥
वाह्लीक देशमें उत्पन्न हुएश्वेतरंगके एक लाख घोड़ोंको सोनेकी मालाओंसे सजाकर मैंने ब्राह्मणोंको दान किया; किंतु उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥
कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां ब्रह्मन् दशान्वहम् ।
एकैकस्मिन् क्रतौ तेन फलेनाहं न चागतः ॥ १७ ॥
ब्रह्मन्! मैंने एक- एक यज्ञमें प्रतिदिन अठारह - अठारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १७ ॥
वाजिनां श्यामकर्णानां हरितानां पितामह ।
प्रादां हेमस्रजां ब्रह्मन् कोटीर्दश च सप्त च ॥ १८ ॥
ईषादन्तान् महाकायान् काञ्चनस्रग्विभूषितान् ।
पद्मिनो वै सहस्राणि प्रादां दश च सप्त च ॥ १ ९ ॥
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अलंकृतानां देवेश दिव्यैः कनकभूषणैः ।
रथानां काञ्चनाङ्गानां सहस्राण्यददं दश ॥ २० ॥
सप्त चान्यानि युक्तानि वाजिभिः समलंकृतैः । ब्रह्मन्! पितामह! फिर स्वर्णहारसे विभूषित हरे रंगवाले सत्रह करोड़ श्यामकर्ण घोड़े, ईषादण्ड ( हरिस ) के समान दाँतोंवाले, स्वर्णमालामण्डित एवं विशाल शरीरवाले सत्रह हजार कमलचिह्नयुक्त हाथी तथा सोनेके बने हुए दिव्य आभूषणोंसे विभूषित स्वर्णमय उपकरणोंसे युक्त और सजे - सजाये घोड़े जुते हुए सत्रह हजार रथ दान किये ॥ १८–२०३ || दक्षिणावयवाः केचिद् वेदैर्ये सम्प्रकीर्तिताः ॥ २१ ॥
वाजपेयेषु दशसु प्रादां तेष्वपि चाप्यहम् । इनके अतिरिक्त भी जो वस्तुएँ वेदोंमें दक्षिणाके अवयवरूपसे बतायी गयी हैं, उन सबको मैंने दस वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके दान किया था ॥ २१३ ॥
शक्रतुल्यप्रभावाणामिज्यया विक्रमेण ह ॥ २२ ॥
सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम् ।
विजित्य भूपतीन् सर्वानर्थैरिष्ट्वा पितामह ॥ २३ ॥
अष्टभ्यो राजसूयेभ्यो न च तेनाहमागतः । पितामह! यज्ञ और पराक्रममें जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनके कण्ठमें सुवर्णके हार शोभा पा रहे थे, ऐसे हजारों राजाओंको युद्धमें जीतकर प्रचुर धनके द्वारा आठ राजसूययज्ञ करके मैंने उन्हें ब्राह्मणोंको दक्षिणामें दे दिया; परंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २२-२३३ ॥ स्रोतश्च यावद्गङ्गाकयाश्छन्नमासीज्जगत्पते ॥ २४ ॥
दक्षिणाभिः प्रवृत्ताभिर्मम नागां च तत्कृते । जगत्पते! मेरी दी हुई दक्षिणाओंसे गंगानदी आच्छादित हो गयी थी; परंतु उसके कारण भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २४ ॥
वाजिनां च सहस्रे द्वे सुवर्णशतभूषिते ॥ २५ ॥
वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् । उस यज्ञमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको तीन- तीन बार सोनेके सैकड़ों आभूषणोंसे विभूषित दो- दो हजार घोड़े और एक-एक सौ अच्छे गाँव दिये थे ॥ २५३ ॥
तपस्वी नियताहारः शममास्थाय वाग्यतः ॥ २६ ॥
दीर्घकालं हिमवति गंगायाश्च दुरुत्सहाम् ।
मूर्ध्ना धारां महादेवः शिरसा यामधारयत् ।
न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह ॥ २७ ॥
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पितामह! मिताहारी, मौन और शांतभावसे रहकर मैंने हिमालय पर्वतपर सुदीर्घ कालतक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने गंगाजीकी दुःसह धाराको अपने मस्तकपर धारण किया; परंतु उस तपस्याके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २६-२७ ॥ शम्याक्षेपैरयजं यच्च देवान् साद्यस्कानामयुतैश्चापि यत्तत् । त्रयोदशद्वादशाहैश्च देव सपौण्डरीकान्न च तेषां फलेन ॥ २८ ॥
देव! मैंने अनेक बार ' शम्याक्षेप* ' याग किये । दस हजार ' साद्यस्क ' यागोंका अनुष्ठान किया । कई बार तेरह और बारह दिनोंमें समाप्त होनेवाले याग और ' पुण्डरीक ' नामक यज्ञ पूर्ण किये; परंतु उनके फलोंसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ २८ ॥
अष्टौ सहस्राणि ककुद्मिनामहं शुक्लर्षभाणामददं द्विजेभ्यः । एकैकं वै काञ्चनं शृंगमेभ्यः पत्नीश्चैषामददं निष्ककण्ठीः ॥ २ ९ ॥ इतना ही नहीं, मैंने सफेद रंगके ककुवाले आठ हजार वृषभ भी ब्राह्मणोंको दान किये, जिनके एक - एक सींगमें सोना मढ़ा हुआ था तथा उन ब्राह्मणोंको सुवर्णमय हारसे विभूषित गौएँ भी मैंने दी थीं ॥ २ ९ ॥
हिरण्यरत्ननिचयानददं रत्नपर्वतान् ।
धनधान्यसमृद्धाश्च ग्रामाश्चान्ये सहस्रशः ॥ ३० ॥
शतं शतानां गृष्टीनामददं चाप्यतन्द्रितः ।
इष्ट्वानेकैर्महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो न तेन च ॥ ३१ ॥
मैंने आलस्यरहित होकर अनेक बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोने और रत्नोंके ढेर, रत्नमय पर्वत, धनधान्यसे सम्पन्न हजारों गाँव और एक बारकी ब्यायी हुई सहस्रों गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं; किंतु उनके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३०-३१ ॥
एकादशाहैरयजं सदक्षिणै- द्विर्द्वादशाहैरश्वमेधैश्च देव ।
आर्कायणैः षोडशभिश्च ब्रह्मं- स्तेषां फलेनेह न चागतोऽस्मि ॥ ३२ ॥
देव! ब्रह्मन्! मैंने ग्यारह दिनोंमें होनेवाले और चौबीस दिनोंमें होनेवाले दक्षिणासहित यज्ञ किये । बहुत - से अश्वमेधयज्ञ भी कर डाले तथा सोलह बार आर्कायणयज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु उन यज्ञोंके फलसे मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ ३२ ॥
निष्कैककण्ठमददं योजनायतं
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तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम् । वनं वृतानां रत्नविभूषितानां न चैव तेषामागतोऽहं फलेन ॥ ३३ ॥
चार कोस लंबा - चौड़ा एक चम्पाके वृक्षोंका वन, जिसके प्रत्येक वृक्षमें रत्न जड़े हुए थे, वस्त्र लपेटा गया था और कण्ठदेशमें स्वर्णमाला पहनायी गयी थी, मैंने दान किया है; किंतु उस दानके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३३ ॥
तुरायणं हि व्रतमप्यधृष्य- मक्रोधनोऽकरवं त्रिंशतोऽब्दान् । शतं गवामष्टशतानि चैव दिने दिने ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः ॥ ३४ ॥
मैं तीस वर्षोंतक क्रोधरहित होकर तुरायण नामक दुष्कर व्रतका पालन करता रहा, जिसमें प्रतिदिन नौ सौ गायें ब्राह्मणोंको दान देता था ॥ ३४ ॥
पयस्विनीनामथ रोहिणीनां तथैवान्याननडुहो लोकनाथ । प्रादां नित्यं ब्राह्मणेभ्यः सुरेश नेहागतस्तेन फलेन चाहम् ॥ ३५ ॥
लोकनाथ! सुरेश्वर! इनके अतिरिक्त रोहिणी ( कपिला) जातिकी बहुत - सी दुधारू गौएँ तथा बहुसंख्यक साँड़ भी मैं प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान करता था; परंतु उन सब दानोंके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥
त्रिंशदग्नीनहं ब्रह्मन्नयजं यच्च नित्यदा ।
अष्टाभिः सर्वमेधैश्च नरमेधैश्च सप्तभिः ॥ ३६ ॥
दशभिर्विश्वजिद्धिश्च शतैरष्टादशोत्तरैः ।
न चैव तेषां देवेश फलेनाहमिहागमम् ॥ ३७ ॥
ब्रह्मन्! मैंने प्रतिदिन एक-एक करके तीस बार अग्निचयन एवं यजन किया । आठ बार सर्वमेध, सात बार नरमेध और एक सौ अट्ठाईस बार विश्वजित् यज्ञ किया है; परंतु देवेश्वर! उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३६-३७ ॥
सरय्वां बाहुदायां च गंगायामथ नैमिषे ।
गवां शतानामयुतमददं न च तेन वै ॥ ३८ ॥
सरयू, बाहुदा, गंगा और नैमिषारण्य तीर्थमें जाकर मैंने दस लाख गोदान किये हैं; परंतु उनके फलसे भी यहाँ आना नहीं हुआ है ( केवल अनशनव्रतके प्रभावसे मुझे इस दुर्लभ लोककी प्राप्ति हुई है ) ॥ ३८ ॥
इन्द्रेण गुह्यं निहितं वै गुहायां यद्भार्गवस्तपसेहाभ्यविन्दत् ।
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जाज्वल्यमानमुशनस्तेजसेह तत्साधयामासमहं वरेण्य ॥ ३ ९ ॥ पहले इन्द्रने स्वयं अनशनव्रतका अनुष्ठान करके इसे गुप्त रखा था । उसके बाद शुक्राचार्यने तपस्याके द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त किया । फिर उन्हींके तेजसे उसका माहात्म्य सर्वत्र प्रकाशित हुआ । सर्वश्रेष्ठ पितामह! मैंने भी अंतमें उसी अनशनव्रतका साधन आरम्भ किया ॥
ततो मे ब्राह्मणास्तुष्टास्तस्मिन् कर्मणि साधिते ।
सहस्रमृषयश्चासन् ये वै तत्र समागताः ॥ ४० ॥
उक्तस्तैरस्मि गच्छ त्वं ब्रह्मलोकमिति प्रभो ।
प्रीतेनोक्तसहस्रेण ब्राह्मणानामहं प्रभो ।
इमं लोकमनुप्राप्तो मा भूत् तेऽत्र विचारणा ॥ ४१ ॥
जब उस कर्मकी पूर्ति हुई, उस समय मेरे पास हजारों ब्राह्मण और ऋषि पधारे । वे सभी मुझपर बहुत संतुष्ट थे । प्रभो! उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दी कि ' तुम ब्रह्मलोकको जाओ । ' भगवन्! प्रसन्न हुए उन हजारों ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे मैं इस लोकमें आया हूँ । इसमें आप कोई अन्यथा विचार न करें ॥ ४०-४१ ॥ कामं यथावद्विहितं विधात्रा पृष्टेन वाच्यं तु मया यथावत् । तपो हि नान्यच्चानशनान्मतं मे नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ॥ ४२ ॥
देवेश्वर! मैंने अपनी इच्छाके अनुसार विधिपूर्वक अनशनव्रतका पालन किया । आप सम्पूर्ण जगत्के विधाता हैं । आपके पूछनेपर मुझे सब बातें यथावत्रूपसे बतानी चाहिये,
इसलिये सब कुछ कहा है । मेरी समझमें अनशनव्रतसे बढ़कर दूसरी कोई तपस्या नहीं है ।
आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न होइये ॥ ४२ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तवन्तं ब्रह्मा तु राजानं स भगीरथम् ।
पूजयामास पूजार्हं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ४३ ॥
भीष्मजी कहते हैं – राजन्! राजा भगीरथने जब इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने शास्त्रोक्त विधिसे आदरणीय नरेशका विशेष आदर - सत्कार किया ॥ ४३ ॥
तस्मादनशनैर्युक्तो विप्रान् पूजय नित्यदा ।
विप्राणां वचनात् सर्वं परत्रेह च सिध्यति ॥ ४४ ॥
अतः तुम भी अनशनव्रतसे युक्त होकर सदा ब्राह्मणोंका पूजन करो; क्योंकि ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे इह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं ॥