श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 121–130
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 121–130
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ८५ उष्ण, लवणरसयुक्त तथा कटुरसयुक्त होते हैं । ये क्रिमि, शोथ, उदररोग, आनाह ( अफरा ), शूल, पाण्डुरोग, कफविकार, वातविकार, गुल्म, अरुचि, विषविकार ( विशेषकर सर्पविष ), श्वित्र ( सफेद दाग वाला कुष्ठ ), कुष्ठ तथा अर्श ( बवासीर ) रोगों को शीघ्र शान्त करते हैं ॥ ८२-८३ ॥ वक्तव्य — श्रीचक्रपाणि च. सू. ११ ९ ३ की व्याख्या करते हुए कहते हैं— ' अविमूत्रमित्यादौ स्त्रीमूत्रमेव प्रशस्तमिति लिङ्गपरिग्रहाद् दर्शयति; यतः स्त्रीणां लघ्वङ्गत्वान्मूत्रमपि लघु; वचनं हि — ‘ लाघवं जातिसामान्ये स्त्रीणां पुंसां च गौरवम् ' । ( च.सू. २७।३३८ ) वास्तव में उक्त पाठ इस प्रकार है— ' गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम् ' । हारीत का कथन है कि चौपायों में स्त्री को लघु और पक्षियों में पुरुष को लघु माना है, अस्तु । सुश्रुत का मत – इनके अनुसार गाय, भैंस, बकरी, भेड़ ( स्त्री जाति का ) और घोड़ा, हाथी, गधा, ऊँट ( पुरुष जाति ) का ग्रहण करना चाहिए । इन्होंने नरमूत्र का भी ग्रहण करते हुए कहा है — यह विषनाशक होता है । इस प्रकार मूत्रों की संख्या = ८ + १ = ९ हो जाती है । मूत्रप्रयोग का क्षेत्र — विरेचन के लिए इसका प्रयोग निरूहणबस्ति द्वारा किया जाता है । ये मूत्र विविध प्रकार के लेपों में तथा स्वेदन कार्य के लिए उपयोगी होते हैं । ये दीपन, पाचन तथा मलभेदक ( दस्तावर ) होते हैं । उक्त सभी मूत्रों में गोमूत्र उत्तम होता है । अ.सं.सू. ६।१४५-१४७ में वाग्भट ने इनके शकृत् ( मलों ) का भी वर्णन किया है । आहार को पचाने के लिए पित्ताशय से आकर जितना पित्त द्रव खाये हुए आहार में मिलता है, इसका कुछ अंश मूत्र के साथ और कुछ मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, अतः मल एवं मूत्र में पित्तवर्धक गुण पाये जाते हैं, अतएव इनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है । मरे हुए प्राणियों के पित्ताशय से पित्तद्रव का संग्रह कर लिया जाता है, जिसका बाद में औषध रूप में प्रयोग किया जाता है । गाय के पित्त को ' गोरोचन ' कहते हैं । इसका प्रयोग चिकित्सा तथा तान्त्रिक प्रयोगों में भी किया जाता है । तोयक्षीरेक्षुतैलानां वर्गैर्मद्यस्य च क्रमात् । इति द्रवैकदेशोऽयं यथास्थूलमुदाहृतः ॥ ८४ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
उपसंहार — जल, क्षीर, इक्षु, तैल तथा मद्य वर्गों का इस अध्याय में क्रमशः वर्णन कर दिया गया है । इस प्रकार स्थूल रूप से द्रव - द्रव्यों के एक विशेष अंग को कह दिया है ॥ ८४ ॥
वक्तव्य — यद्यपि उक्त पद्य अष्टांगसंग्रह ( ६।१४ ९ ) से लिया गया है, तथापि इसमें ' मूत्रवर्ग ' का उल्लेख नहीं किया गया है । इसके अतिरिक्त इन्होंने इक्षुवर्ग के अन्तर्गत ' मधुवर्ग ' को दे दिया था, उसे हमने स्वतन्त्र वर्ग के रूप में दे दिया है । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में द्रवद्रव्यविज्ञानीय नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥
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षष्ठोऽध्यायः अथातोऽन्नस्वरूपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम द्रवद्रव्यों का वर्णन करने के बाद यहाँ से अन्नद्रव्यों के स्वरूप के विज्ञान के लिए प्रस्तुत अध्याय की व्याख्या करेंगे । इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था । निरुक्ति — ‘ अन्नम् ’ – ‘ अद्यते ' इति क्तः ' । ' अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात् ' । इति मेदिनी । अन्न का अर्थ भात या खाया हुआ पदार्थ, इसका अर्थ यदि हम ' भात ' करते हैं तो विषय निर्देश में संकीर्णता आ जाती है, क्योंकि ‘ भुक्त ' शब्द का क्षेत्र विस्तृत है, वहीं यहाँ अपेक्षित है, अस्तु । ' अन्नस्वरूप ' – आहार के उपयोग में आने वाले रोटी, चावल, दाल, सब्जी आदि । स्वरूप- - उन - उन के नाम, रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव, लक्षण आदि । यह अन्न ( खाये जाने वाला पदार्थ ) स्थावर तथा जांगम भेद से दो प्रकार का होता है । यथा — गेहूँ, चावल आदि स्थावर और मांस आदि जांगम ( जंगम प्राणियों से प्राप्त होने वाला ) । स्थावर धान्य भी रबी और खरीफ भेद से दो प्रकार के होते हैं । इनका वर्गीकरण आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से पुनः दो प्रकार का होता है । यथा – १. शूकधान्य — शूक का अर्थ है नुकीले अग्रभाग वाले धान्य । जैसे — गेहूँ, जौ, धान आदि । २. शिम्बी या शमी धान्य — छीमी में उत्पन्न होने वाला दो दल युक्त अन्न । जैसे — चना, उड़द, कुलथी, सेम आदि । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. २७, सु.सू. ४६ तथा अ.सं.सू.७ तथा १२ में देखें । अथ शूकधान्यवर्गः रक्तो महान् सकलमस्तूर्णकः शकुनाहृतः । सारामुखो दीर्घशूको रोध्रशूकः सुगन्धिकः ॥१ ॥
पुण्ड्रः पाण्डुः पुण्डरीकः प्रमोदो गौरसारिवौ । काञ्चनो महिषः शूको दूषकः कुसुमाण्डकः ॥ लाङ्गला लोहवालाख्याः कर्दमाः शीतभीरुकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ स्वादुपाकरसाः स्निग्धाः वृष्या बद्धाल्पवर्चसः । कषायानुरसाः पथ्या लघवो मूत्रला हिमाः ॥ शूकधान्यों का वर्णन — रक्तशालि, महाशालि, कलमशालि, तूर्णकशालि, शकुनाहृतशालि, सारामुख, दीर्घशूक, रोध्रशूक ( लोध के फूल के सदृश शूक वाला ), सुगन्धक ( बासमती ), पुण्ड्रशालि, पाण्डुशालि, पुण्डरीकशालि, प्रमोद, गौर, शारिव, काञ्चन, महिष, शूकशालि, लोहबाल नामक शालि, कर्दमशालि, शीतभीरुकशालि, पतंग भी जो अनेक शालियों की जातियाँ होती हैं, वे सब शालि विपाक में मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक होते हैं । इनको खाने से कुछ कषाय रसवाले होते हैं । ये सभी के लिए पथ्य, लघु ( होते हैं॥१-४ ॥ वक्तव्य – शकुनाहृत नामक शालिधान्य के सम्बन्ध में दूषकशालि, कुसुमाण्डकशालि, लांगलशालि, तथा तपनीय शालि; इनके अतिरिक्त और उत्तम कोटि के होते हैं । वे सभी रस एवं बँधा हुआ थोड़ा - सा मल बनता है । वे सब हलके ), मूत्रकारक तथा हिम ( शीतवीर्य ) कहा गया है कि इसे शकुनि ( गरुड़ ) पक्षी द्वीपान्तर से ले आया था, अतएव इसे शकुनाहृत या गरुड़शालि भी कहते हैं । आजकल तो व्यापारीवर्ग भी बासमती को ' गरुड़ब्राण्ड ' कहने लगे हैं । किसी संस्करण में ' पुण्ड्र शीतभीरुका ' ये पंक्तियाँ नहीं मिलतीं । यह पाठ सम्पूर्ण अष्टांगसंग्रह ७ से लिया गया है ।
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स्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ८७ जेषु वरस्तत्र रक्तस्तृष्णात्रिदोषहा । रक्तशालि का वर्णन — ऊपर कहे गये सब शूकधान्य हैं, इनमें रक्तशालि उत्तम होता है । यह प्यास
को कम करता है और त्रिदोषनाशक ( शामक ) होता है ।
महांस्तमनु कलमस्तं चाप्यनु ततः परे ॥५ ॥
क्रमशः गुणहीनता— रक्तशालि की तुलना में महाशालि, उससे कलमशालि, उससे भी तूर्णकशालि हीन गुणवाले होते हैं ॥ ५ ॥
वक्तव्य- - वाग्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं— ' रक्तशालेः पश्चात् महान् शालिर्वरः ’ । और श्रीहेमाद्रि कहते हैं — ' तमनु रक्तशालेर्हीनो महान् ' । उक्त दोनों टीकाकारों का स्पष्ट मतभेद है । इस मतभेद के समाधान के लिए हम महर्षि सुश्रुत की शरण में जाते हैं— ' तेषां लोहितकः श्रेष्ठः ’ ‘ “ तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयोऽवराः ’ ॥ ( सु.सू. ४६।६-७ ) अर्थ स्पष्ट है । यवका हायनाः पांसुबाष्पनैषधकादयः । स्वादूष्णा गुरवः स्निग्धाः पाकेऽम्लाः श्लेष्मपित्तलाः ॥ सृष्टमूत्रपुरीषाश्च पूर्वं पूर्वं च निन्दिताः । यवक आदि शालिधान्य — यवक ( जई ), हायनक, पांसु, बाष्प, नैषधक आदि अन्य अनेक प्रकार के शालिधान्य होते हैं । इनके गुण – ये स्वाद में मधुर, उष्ण, गुरु, स्निग्ध, पाक में अम्ल, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं । इनके सेवन से मल - मूत्र की प्रवृत्ति सरलता से हो जाती है । ये क्रमशः अपने से पूर्व निन्दित होते हैं, इस क्रम से सबसे अधिक निन्दित यवक होता है ॥ ६ ॥
वक्तव्य — चरक ने सूत्रस्थान के २५ वें अध्याय में ' अहिततमानुपदेक्ष्यामः — यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा ' भवन्ति ' । ( ३ ९ ) कहा है और ' लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति ' । ( वहीं ३८ ) चरक के इस वचन से इनकी गुणहीनता तथा गुणवत्ता का स्पष्ट संकेत
मिल जाता है ।
स्निग्धो ग्राही लघुः स्वादुस्त्रिदोषघ्नः स्थिरो हिमः ॥७ ॥
षष्टिको व्रीहिषु श्रेष्ठो गौरश्चासितगौरतः । व्रीहिधान्य का वर्णन — व्रीहिधान्यों में षष्टिक ( साठीधान्य ) स्निग्ध, ग्राही ( मल को बाँधने वाला ), लघु ( शीघ्र पचने वाला ), स्वादु ( मधुर ), वात आदि तीनों दोषों का शामक, स्थिर ( शरीर को स्थिर रखने वाला ), हिम ( शीतल ) गुणवाला होता है । व्रीहिधान्यों से साठीधान्य उत्तम होता है । यह दो प्रकार का होता है —१. गौर ( सफेद रंग वाला ) तथा २. हलका काला । इनमें गौर साठी उत्तम होता है ॥ ७ ॥
वक्तव्य — षष्टिक धान्य ग्रीष्म ऋतु में पकता है । षष्टिक ( सफेद सांठी ), कंगु, मुकुन्दक, पीतक, काकलक, असन, पुष्पक, महाषष्टिक, चूर्णक, कुरबक, केदार आदि ये सांठी धान्य की जातियाँ हैं । देखें—
सु.सू. ४६।८ से ११ तक ।
ततः क्रमान्महाव्रीहिकृष्णव्रीहिजतूमुखाः ॥ ८ ॥
कुक्कुट्टाण्डकलावाख्यपारावतकशूकराः । वरकोद्दालकोज्ज्वालचीनशारददर्दुराः॥९ ॥
गन्धनाः कुरुविन्दाश्च गुणैरल्पान्तराः स्मृताः । सामान्य गुणवाले षष्टिक — उक्त षष्टिक धान्यों से ये सामान्य ( कुछ कम ) गुण वाले होते हैं — महाव्रीहि, कृष्णव्रीहि, जतुमुख, कुक्कुटाण्ड, कपाल, पारावतक, शूकर, वरक, उद्दालक, उज्ज्वाल ज्वार, मक्का, जुन्हरी ), चीन ( कौणी ), शारद, दर्दुर, गन्धन तथा कुरुविन्द ॥। ८ - ९ ॥
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८८ अष्टाङ्गहृद स्वादुरम्लविपाकोऽन्यो व्रीहिः पित्तकरो गुरुः ॥ १० ॥
बहुमूत्रपुरीषोष्मा, त्रिदोषस्त्वेव पाटलः । अन्य व्रीहिधान्य- वर्णन —— ये रस में मधुर, विपाक में अम्ल, पित्तकारक, पाचन में गुरु तथा उष्ण होते हैं । इनका अधिक भाग मल - मूत्र के रूप में परिणत हो जाता है अर्थात् ये पौष्टिक नहीं होते । इनमें ' पाटल ' नामक व्रीहि त्रिदोषकारक होता है ॥ १० । वक्तव्य — शालि - षष्टिक व्रीहिधान्यों का संक्षिप्त परिचय - १. शालिधान्य - इनकी फसल उगाने से पकने तक इन्हें जल से भरे खेतों की जरूरत होती है, फिर भी ये शरद् ऋतु के बाद में पकते हैं । ये अधिक सफेद होते हैं । २. षष्टिक धान्य — ये प्रायः साठ दिन में पककर तैयार हो जाते हैं । ३. व्रीहिधान्य — चरक के टीकाकार श्रीचक्रपाणि के अनुसार ये शरत् काल में पकने वाले आशुधान्य हैं । कङ्गुकोद्रवनीवारश्यामाकादि हिमं लघु ॥ ११ ॥
तृणधान्यं पवनकृल्लेखनं कफपित्तहृत् । तृणधान्यों का वर्णन — कंगु ( कंगुनी या कौणी ), कोद्रव ( जंगली कोदों ), नीवार ( तीनी - मुनि अन्न ), श्यामाक ( साँवा ) आदि ये तृण ( निःसार ) धान्य हैं । ये सभी शीरत, हलके, वातकारक, लेखन ( खुरच कर मल या मैल को निकालने वाले ), कफ तथा पित्त नाशक होते हैं ॥ ११ ॥
वक्तव्य — ये तृणधान्य बिना जोते- बोये स्वयं उग जाते हैं और कहीं - कहीं बोये भी जाते हैं । हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार अनेक व्रत ऐसे भी हैं, जिनमें ' हलकृष्टं न भुञ्जीत ' अर्थात् हल जोतकर जो अन्न पैदा होते हैं, उन्हें व्रत के दिन खाने का निषेध रहता है, तब ये अन्न खाये जाते हैं । यही स्थिति वनवासी मुनियों की भी होती है, अतएव इन्हें मुनिअन्न भी कहते हैं । सुश्रुत ने इन अन्नों का परिगणन ' कुधान्यवर्ग ’ में किया है । देखें — सु.सू. ४६ । २१ । वास्तव में ये ' कुत्सितं धान्यं कुधान्यम् ' हैं । भग्नसन्धानकृत्तत्र प्रियङ्गुर्बृहणी गुरुः ॥ १२ ॥
प्रियंगुधान्य का वर्णन – तृणधान्यों में प्रियंगु ( कंगुनी ) भग्न ( टूटे हुए शरीरावयव अर्थात् अस्थि ) को जोड़ता है । यह शरीर को मोटा बनाता है और पाचन में गुरु है अर्थात् देर में पचता है ॥ १२ ॥
वक्तव्य — सुश्रुत में प्रियंगु का वर्णन इस प्रकार है— प्रियंगु काला - लाल - पीला - सफेद वर्णभेद से चार प्रकार का होता है । ये उत्तरोत्तर रूक्ष तथा कफनाशक होते हैं । देखें — सु.सू. ४६।२४ । इस दृष्टि से वाग्भटोक्त लक्षणों से ये लक्षण विपरीत प्रतीत होते हैं । कोरदूषः परं ग्राही स्पर्शे शीतो विषापहः । कोदधान्य का वर्णन — कोदोंधान्य अत्यन्त ग्राही ( मल को बाँधने वाला ) होता है । यह स्पर्श में शीतल होता है और विषजनित विकारों को नष्ट करता है । वक्तव्य- - दाह की स्थिति में इसे पीसकर माथा में, पैरों में, उदर में, पेडुओं में लेप लगाया जाता है । यह स्पर्श में शीत होने के कारण दाहनाशक है । अष्टांगसंग्रह में कोरदूष = कोदों के बाद तृणधान्यों में एक ‘ उद्दालक ' तथा ' मधूलिका ' का भी ग्रहण किया है । इसे ' बड़ा कोदों ' कहते हैं । यह उष्णवीर्य होता है । मधूलिका — यह शीतवीर्य, स्निग्ध तथा वृष्य होती है । श्री अरुणदत्त का कथन है कि ' श्यामाकादि ' में प्रयुक्त आदि शब्द से तोयश्यामाक, हस्तिश्यामाक, शिविर, प्रशान्तिका, मधूलिका, गवेधु, काण्डलोहित आदि का ग्रहण कर लेना चाहिए । देखें — ऊपर ११ वें
श्लोक की व्याख्या ।
रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः सरो विड्वातकृद्यवः ॥ १३ ॥
वृष्यः स्थैर्यकरो मूत्रमेदः पित्तकफान् जयेत् । पीनसश्वासकासोरुस्तम्भकण्ठत्वगामयान् ॥ १४ ॥
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अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ८ ९ जौ का वर्णन — जौ रूक्ष, शीतल, पचने में गुरु ( भारी ), स्वाद में मधुर, सर ( मल को सरकाने वाला ), इसे खाने से मल ( पुरीष ) अधिक मात्रा में बनता है, यह वातदोष को बढ़ाता है । यह वीर्यवर्धक है, शरीर में स्थिरता को उत्पन्न करता है; मूत्रदोष, मेदोदोष, पित्त तथा कफविकारों को जीतता है । यह पीनस, श्वास, कास, ऊरुस्तम्भ, गले तथा त्वचा के रोगों को नष्ट करता है न्यूनो यवादनुयवः-अनुयव का वर्णन - अनुयव ( छोटा जौ ) के उक्त प्रसिद्ध जौ से उक्त जौ से गुणों में भी कम होता है । - रूक्षोष्णो वंशजो यवः । वंशज जौ का वर्णन — बाँस से उत्पन्न लगभग जौ की आकृति के जौ कहते हैं । ये खाने में रूक्ष तथा उष्णवीर्य होते हैं ॥। १३-१४ ॥ दाने भी छोटे होते हैं और यह वाले होने के कारण इन्हें बाँस वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह में वेणुयवों का वर्णन इस प्रकार मिलता है— ' बाँस के जौ उष्ण, सर, कषाय
रस - प्रधान, वात तथा पित्त कारक होते हैं ' । देखें — अ.सं.सू. ७।२१ ।
वृष्यः शीतो ' गुरुः स्निग्धो जीवनो वातपिराहा ॥ १५ ॥
सन्धानकारी मधुरो गोधूमः स्थैर्यकृत्सरः । गोधूम का वर्णन — गेहूँ के गुण - धर्म —यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध, जीवनीय शक्ति प्रदान करने वाला, वात तथा पित्त का नाशक, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, स्वाद में मधुर, स्थिरता को देने वाला तथा सर होता है ॥ १५ ॥
पथ्या नन्दीमुखी शीता कषायमधुरा लघुः ॥। १६ ॥ इति शूकधान्यवर्गः । नन्दीमुखी का वर्णन – नन्दीमुखी ( मुँडा गेहूँ ) पथ्य ( हितकर ), शीतवीर्य, कषैला, मधुर तथा पाचन में लघु ( हलका ) होता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य — ‘ नन्दीमुखी ’ यह नाम छोटे शूक वाले मुँडा गेहूँ का है, अतः व्याकरण की दृष्टि से इसका नाम ' नन्दीमुखा ' होना चाहिए ' गौरमुखा ' की भाँति । देखें— ' नखमुखात् संज्ञायाम् ' ( ४१११५८ ) — ङीष् न स्यात् । अथ शिम्बीधान्यवर्गः मुद्गाढकीमसूरादि शिम्बीधान्यं विबन्धकृत् । कषायं स्वादु सङ्ग्राहि कटुपाकं हिमं लघु ॥ १७ ॥
मेदः श्लेष्माम्रपित्तेषु हितं लेपोपसेकयोः । शिम्बीधान्य - परिचय — मूँग, अरहर, मसूर आदि शिम्बीधान्य कहे जाते हैं । ये शिम्बीधान्य स्वाद में कषैले तथा मधुर होते हैं । मल को बाँधते हैं, इनका कटु विपाक होता है । ये शीतवीर्य तथा लघुपाकी होते हैं । इनका प्रयोग मेदोविकार, कफविकार, रक्तविकार तथा पित्तविकारों में लेप तथा उपसेक अर्थात् दाल, कढ़ी आदि के रूप में भी किया जाता है ॥ १७ ॥
वक्तव्य — इसके आगे कुछ संस्करणों में ' चना ' नामक शिम्बीधान्य का इस प्रकार वर्णन मिलता है — ‘ असृपित्तहरो रूक्षो वातलश्चवणकः स्मृतः ' । इसका अर्थ है — चना । यह रक्तपित्तनाशक, रूक्ष तथा वातकारक होता है । अष्टांगसंग्रह ७।२६ - २७ में इनके बारे में कुछ विशेष कहा गया है— दालों में मूँग की दाल श्रेष्ठ होती है, छोटे मूँग वातकारक होते हैं, हरे मूँग सबमें उत्तम होते हैं । मोठ — ये कृमिकारक
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अष्टाङ्गहृदये होते हैं । मसूर — लेप, उबटन आदि के रूप में प्रयुक्त मसूर मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाते हैं । ये मल को बाँधते हैं । राजमाष ( लोबिया ) गुरु होता है । यह मलकारक, रूक्ष तथा वातकारक होता है । वरोऽत्र मुद्गोऽल्पचलः, कलायस्त्वतिवातलः ॥ १८ ॥
राजमाषोऽनिलकरो रूक्षो बहुशकृद्गुरुः । मूँग, मटर, राजमाष — मूँग, अरहर, मसूर नामक दालों में मूँग श्रेष्ठ है, यह थोड़ा वातकारक होता है । कलाय ( मटर ) अत्यधिक वातकारक होता है । राजमाष ( लोबिया ) वातकारक, रूक्ष तथा गुरु ( पचने में देर लगाने वाला ) होता है । इसका अधिकांश भाग मल ( पुरीष ) बन जाता है ॥१८ ॥
उष्णाः कुलत्थाः पाकेऽम्लाः शुक्राश्मश्वासपीनसान् ॥ १ ९ ॥ कासार्शः कफवातांश्च घ्नन्ति पित्तास्रदाः परम् । कुलथी का वर्णन — यह उष्ण, पाक में अम्ल, शुक्राश्मरी, श्वास, पीनस, कास, अर्श ( बवासीर ), कफविकार तथा वातविकारों को नष्ट करती है; पित्त और रक्त को बढ़ाती है ॥ १ ९ ॥ निष्पावो वातपित्ताम्रस्तन्यमूत्रकरो गुरुः ॥ २० ॥
सरो विदाही दृक्शुक्रकफशोफविषापहः । सेम का वर्णन — निष्पाव ( सेम ) वात- - 1 पित्तकारक, स्तन्य ( दूध ) तथा मूत्र को बढ़ाता है । यह गुरुपाकी होता है, सर, विदाही ( पाचनकाल में दाहकारक होता है ), नेत्रविकार, शुक्रदोष, कफविकार शोथ एवं विषविकारों को नष्ट करता है ॥ २० ॥
वक्तव्य — निष्पाव — निस् + पू + धञ् । इसका अर्थ होता है— फटकना या अनाज को साफ करना । इस अर्थ की इस प्रसंग में कोई उपयोगिता नहीं है । आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से यह एक शिम्बीधान्य है । निष्पाव ( Phaseolus radiatus or a sort of pulse ), सफेद सेम, राजशिम्बीबीज, भटवाँस ( यह काला तथा सफेद रंग का होता है ), कृष्णात्रेय ने— ' निष्पावा मधुरा रूक्षाः सकषाया विदाहिनः ' कहकर इनकी अनेक
जातियाँ होती हैं, कहा है, अतएव बहुवचन का प्रयोग किया है ।
माषः स्निग्धो बलश्लेष्ममलपित्तकरः सरः ॥२१ ॥
गुरूष्णोऽनिलहा स्वादुः शुक्रवृद्धिविरेककृत् । माष का वर्णन – माष ( उड़द ) स्निग्ध, बलवर्धक, कफकारक, मलवर्धक, पित्तकारक, सर, पाचन में गुरु, उष्ण, वातनाशक, स्वाद में मधुर, शुक्रवर्धक एवं विरेचक है ॥२१ ॥
वक्तव्य — माष ( उड़द ) - पाकविधि— उड़दों को खौलते हुए पानी में डालकर पकाया जाता है, जब उसके दाने फूटने लगते हैं, तो उसमें तेल डालकर ढक दिया जाता है । इस स्थिति में वे फिर मन्द आँच पर पकाये जाते हैं । इसमें नमक, मिर्च - मसाले इच्छानुसार डालकर हींग का छौंक भी लगाया जाता है । इस प्रकार पकायी गयी उड़द की दाल के गुणों का ही उक्त श्लोक में वर्णन है । पंजाब प्रान्त में इसी प्रकार उड़द की दाल बनायी जाती है । यह सूखी सब्जी की भाँति रोटियों तथा चावलों के साथ खायी जाती है । माष के अनेक वृष्य - प्रयोगों का वर्णन आयुर्वेद में प्राप्त होता है । माष का दाल के रूप में प्रयोग
पश्चिम में अधिक होता है ।
फलानि माषवद्विद्यात्काकाण्डोलात्मगुप्तयोः ॥ २२ ॥
काकाण्डोला तथा केवाँच— काकाण्डोला ( शूकर सेम ) तथा केवाँच के बीज भी माष ( उड़द ) के समान गुण - धर्मवाले होते हैं ॥ २२ ॥
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अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९ १ वक्तव्य — केवाँच की सेम जब पक जाती है, तो उसके रोम झड़ने लगते हैं । बन्दर उस सेम को खाने के लिए जाते हैं तो वे रोम उनके शरीर पर गिरते हैं, वे दिनभर खुजलाते रहते हैं । इस दृष्टि से केवॉच को संस्कृत में ' कपिकच्छु ' कहते हैं । इसके बीज अत्यन्त पौष्टिक होते हैं । इन्हें घिसकर गोंद का भी काम लिया जाता है । उष्णकटिबन्ध में इसकी लताएँ होती हैं, यह शारदीय फल है । सुकोमल केवाँच की फलियों की सब्जी सेम की भाँति बनायी जाती है । केवाँच के बीजों की खीर अत्यन्त पौष्टिक एवं वीर्यवर्धक होती है । उष्णस्त्वच्यो हिमः स्पर्शे केश्यो बल्यस्तिलो गुरुः । अल्पमूत्रः कटुः पाके मेधाऽग्निकफपित्तकृत् ॥ तिल का वर्णन — तिल उष्णवीर्य, त्वचा के लिए हितकर, स्पर्श में शीत, बालों के लिए हितकर, बलवर्धक, गुरुपाकी, मूत्र को घटाने वाला, विपाक में कटु, बुद्धिवर्धक, अग्निवर्धक, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं ॥ २३ ॥
वक्तव्य — ‘ त्वच्यः ' तथा ' केश्यः ' तिलों के ये दो विशेषण प्रायः इनके तेल के हैं । तिलों को पीसकर इनका उबटन भी लगाया जाता है, तेल की मालिश भी की जाती है, अतः इन दोनों प्रकारों से यह त्वच्य है । ‘ केश्यः ’ केवल तेल के कारण है । अल्पमूत्रः — जाड़ों में वृद्धजनों को बार - बार पेशाब करने जाना पड़ता है, अतएव इन दिनों तिलकुट, तिलवट, तिलवा, गजक आदि भक्ष्यपदार्थ तिल को भूँजकर कूटकर गुड़ या चीनी मिलाकर बनाये जाते हैं । इनका सेवन करने से मूत्र की मात्रा कम हो जाती है । यही वाग्भट का सन्देश है । स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा कफपित्तकरी गुरुः । दृक्शुक्रहृत्कटुः पाके, तद्वद्द्द्बीजं कुसुम्भजम् ॥ अतसी एवं कुसुम्भबीज — उमा ( अलसी, तीसी या अतसी ) स्निग्ध ( तेल से युक्त ), स्वाद में मधुर, कुछ तिक्त, उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, गुरुपाकी, दृष्टिनाशक, शुक्रनाशक और विपाक में क्टु होती है । कुसुम्भ ( बर्रे ) के बीज भी अतसी के समान गुण - कर्म वाले होते हैं ॥२४ ॥
वक्तव्य — तिल, अतसी तथा कुसुम्भबीज ये तीनों द्रव्य तिलहन में गिने जाते हैं, यहाँ इनका परिगणन शिम्बीधान्य के रूप में किया गया है । यह भी तो है कि एक द्रव्य अपने गुण - धर्मों से अनेक से सम्बन्धित रहता है । माषोऽत्र सर्वेष्ववरो, यवकः शूकजेषु च । माष एवं यवक वर्णन — शिम्बीधान्यों में माष ( उड़द ) उक्त सभी धान्यों में अवर ( निकृष्ट ) होता है और शूकधान्यों में यवक ( जई ) अधम होता है । वक्तव्य — ‘ माषाः शमीधान्यानाम् अपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति ' । ( च.सू. २५।३ ९ ) शमीधान्यों में माष अपथ्यतम होते हैं । यहाँ शूकधान्यों में यवक को जो पुनः अपथ्य कहा है, इससे ऐसा लगता है कि शास्त्रकार का यह वचन ' द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति ' वाली सूक्ति है अर्थात् दो बार बाँधी हुई गाँठ जल्दी खुलती नहीं । इसके पहले शूकधान्यवर्ग में ' पूर्वं पूर्वं च निन्दिताः ' पद्यार्ध द्वारा यवक के गुणों की निन्दा की जा चुकी है, अस्तु । ' माषाः श्लेष्मपित्तजननानां श्रेष्ठाः ' । ( च.सू. २५/४० ) इस वचन से अब आप किसी द्रव्य को सहसा उत्तम, मध्यम, अधम नहीं कह सकते, उसके लिए पूर्वापर की संगति अपेक्षित होती है । यही स्थिति ' यवक ' की भी है । वक्तव्य — चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि ने जिन द्रव्यों के जो नाम दिये हैं, देशभेद के कारण वे नाम बदल भी जाते हैं । इसलिए शूक, शमी, कुधान्य आदि को वहाँ - वहाँ के किसानों से, पशु - -पक्षियों प के नामों को व्याधों या शिकारियों से, कन्द - मूल - फलों के नामों को वनवासियों से, पकाये व्यञ्जनों के नामों को रसोइयों से, औषधद्रव्यों के नामों को औषधसंग्रह करके बाजारों में बेचने वालों ( अत्तारों ) से पूछें और प्रयोग करके उन - उन के गुण - धर्मों से मिलाकर प्रयोग में लायें ।
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९ २ अष्टाङ्गहृदये नवं धान्यमभिष्यन्दि, लघु संवत्सरोषितम् ॥ २५ ॥
शीघ्रजन्म तथा सूप्यं निस्तुषं युक्तिभर्जितम् । इति शिम्बीधान्यवर्गः । धान्य - विवेचन — उक्त दोनों प्रकार के ( शूक तथा शिम्बी ) धान्य नयी ( कफकारक ) होते हैं और वे ही सालभर पुराने होने पर लघु ( शीघ्र पचने वाले ) शीघ्र पक जाते हैं । जैसे साठी आदि तथा छिलका उतारी हुई घी - तेल आदि में होती हैं ॥ २५ ॥
वक्तव्य — खारणादि ने कहा है— एक साल पुराना हो जाने पर सभी प्रकार अवस्था में अभिष्यन्दी हो जाते हैं, जो धान्य भूँजी हुई दालें भी लघु के धान्य अपनी गुरुता छोड़ देते हैं, किन्तु वे अपना वीर्य नहीं छोड़ते अर्थात् वे शक्तिहीन नहीं होते । शीघ्रजन्म —साठी आदि जो धान्य जितने शीघ्र पकते हैं वे उतने ही लघु होते हैं, इसके विपरीत देर में पकने वाले गेहूँ आदि धान्य स्वभावतः गुरु होते हैं । सूप्य – दाल के उपयोग में आने वाले मूँग, माष आदि । निस्तुष — छिलका उतारी हुई दालें, इन्हीं को वितुष भी कहते हैं । युक्तिभर्जितम् —ये दालें भड़भूँजे से भी भुँजवायी जाती हैं या घरों में घी - तेल में भूँजकर खायी जाती हैं, बिना घी - तेल के भूँजी हुई लघु होती है, शेष गुरु । अथ कृतान्नवर्गः मण्डपेया विलेपीनामोदनस्य च लाघवम् ॥ २६ ॥
यथापूर्वं शिवस्तत्र मण्डो वातानुलोमनः । तृङ्ग्लानिदोषशेषघ्नः पाचनो धातुसाम्यकृत् ॥ २७ ॥
स्रोतोमार्दवकृत्स्वेदी सन्धुक्षयति चानलम् । पकाये गये अन्नों का वर्णन – मण्ड ( माँड़ ), पेया, विलेपी तथा ओदन ( भात ) – ये क्रमश: अपने पूर्ववर्ती पदार्थ से लघुपाकी होते हैं । मण्ड- परिचय — यह शिव ( कल्याणकारक ) होता है, वातदोष का अनुलोमन करता है, तृषा ( प्यास ), ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, विरेचन आदि से शोधन कराने के बाद बचे हुए दोष का विनाशक है, पाचनकारक एवं धातुसाम्यकारक हैं, स्रोतों को मुलायम बना देता है, पसीना लाता है और यह जठराग्नि को विधिवत् सुलगाता ( तेज करता ) है ॥ २६-२७ ॥ वक्तव्य – मण्ड – चावलों से चौदह गुना अधिक जल डालकर पकाये गये और सिक्थ ( भात ) के अंश को निकाल कर जो पेय द्रवद्रव्य शेष बचता है, उसे ' मण्ड ' या ' माँड़ ' कहते हैं । इसमें सोंठ और सेंधानमक भी मिला लिया जाता है, तो यह दीपन - पाचन हो जाता है । इसके भेद - १. यवमण्ड तथा २. लाजमण्ड आदि । पेया — आहारद्रव्य से चौदह गुना जल में बनायी गयी अत्यन्त पतली तथा थोड़ी - सी सीठी से युक्त वस्तु को पाकविशेषज्ञ ‘ पातुं योग्या पेया ' अर्थात् पीने योग्य कहते हैं । विलेपी — आहारद्रव्य से चौगुने पानी में डालकर तैयार की हुई, जिसमें सीठी का अंश विशेष हो, उसे विलेपी ( लपसी ) कहते हैं । ओदन — चार पल ( १६ तोला ) चावलों को चौदह गुना जल में पकायें । चावलों के भलीभाँति
गल जाने पर माँड़ को निकाल दें, इसे ओदन ( भात ) कहते हैं ।
क्षुत्तृष्णाग्लानिदौर्बल्यकुक्षिरोगज्वरापहा ॥ २८ ॥
मलानुलोमनी पथ्या पेया दीपनपाचनी । पेया का वर्णन - यह भूख तथा प्यास को शान्त करती है, ग्लानि ( उत्साहहीनता ), दुर्बलता, उदररोगों एवं ज्वर का विनाश करती है । पुरीष आदि मलों का अनुलोमन करती है, रोगी तथा नीरोग
दोनों के लिए हितकर है । यह दीपन और पाचन है ॥ २८ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९ ३ विलेपी ग्राहिणी हृद्या तृष्णाघ्नी दीपनी हिता ॥ २ ९ ॥ व्रणाक्षिरोगसंशुद्धदुर्बलस्नेहपायिनाम् विलेपी का वर्णन — इसमें मल को बाँधने की शक्ति होती है, अतः यह अतिसाररोग को नष्ट करती है, हृदय को बल देती है, प्यास को शान्त करती है, मन्द अग्नि को प्रदीप्त करती है, सभी स्थितियों में हितकर है । यह व्रण ( घाव ), नेत्ररोग, वमन - -1 विरेचन आदि द्वारा शुद्ध शरीर वाले दुर्बल व्यक्तियों तथा स्नेहपान करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए लाभदायक होती है ॥ २ ९ ॥ सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नोऽत्यक्तोष्मा चौदनो लघुः ॥ ३० ॥
यश्चाग्नेयौषधक्वाथसाधितो भृष्टतण्डुलः । विपरीतो गुरुः क्षीरमांसाद्यैर्यश्च साधितः ॥ ३१ ॥
ओदन का वर्णन — जो भात चावलों को भलीभाँति धोकर पकाया जाता है, पकने पर जिसमें से माँड़ निकाल लिया गया हो ( स्वाद की दृष्टि से नये चावलों का माँड़ प्रायः नहीं निकाला जाता, तभी वह स्वादिष्ट एवं गुरु होता है ), जिसमें अभी तक गर्मी बनी हुई हो, ऐसा भात लघु ( सुपच ) होता है । जो भात चित्रक ( चीता ) के अथवा सोंठ के क्वाथ में बनाया जाता है या चावलों को भूजकर बनाया जाता है, वह भी लघु होता है । इसके विपरीत अर्थात् दूध में पकाये हुए चावलों की खीर, मांसरस में पकाये हुए चावलों का भात या बिना माँड़ निकाला हुआ भात ये सब गुरु ( देर में पचने वाले ) होते हैं ॥ ३०-३१ ॥ इति द्रव्यक्रियायोगमानाद्यैः सर्वमादिशेत् । संक्षिप्त निर्देश – इस प्रकार द्रव्य ( जिससे जो पदार्थ बनाया गया हो ), कर्म ( निर्माणविधि के भेद - उपभेद ), योग ( सहयोगी द्रव्यों का संयोग ) तथा उनके मान ( नाप - तौल ), आदि शब्द से देश, काल का ग्रहण करके सभी प्रकार के आहारद्रव्यों के लघुत्व, गुरुत्व आदि गुण - दोषों का स्वयं भी विचार
कर लेना चाहिए और दूसरों को उसका निर्देश देना चाहिए ।
बृंहणः प्रीणनो वृष्यश्चक्षुष्यो व्रणहा रसः ॥ ३२ ॥
मांसरस के गुण — यह धातुओं को पुष्ट करने वाला, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर ( नेत्र - ज्योतिवर्धक ) तथा व्रणनाशक ( घाव को शीघ्र भरने वाला ) होता है ॥ ३२ ॥
मौद्गस्तु पथ्यः संशुद्धव्रणकण्ठाक्षिरोगिणाम् । मूँग का यूष — यह वमन - विरेचन आदि क्रियाओं से शुद्ध शरीर वालों के लिए, व्रण, कण्ठ तथा
नेत्ररोगियों के लिए पथ्य ( हितकर ) होता है ।
वातानुलोमी कौलत्थो गुल्मतूनीप्रतूनिजित् ॥ ३३ ॥
कुलथी का यूष — यह वातदोष को अनुलोम ( अनुकूल ) करता है, गुल्मरोग, तूनी तथा प्रतूनी नामक वातरोगों का विनाशक है ॥ ३३ ॥
तिलपिण्याकविकृतिः शुष्कशाकं विरूढकम् । शाण्डाकीवटकं दृग्ध्घ्नं दोषलं ग्लपनं गुरु ॥ ३४ ॥
तिल, पिण्याक आदि— तिल की खली से बने हुए भोज्य पदार्थ, चना एवं सरसों के पत्तों को सुखाकर बनाये गये शाक, विरूढ़क ( अंकुर निकले हुए चना, मोठ, मूँग आदि ) तथा काँजी में डाले गये बड़े — ये सब पदार्थ दृष्टिनाशक, वात आदि दोषकारक, ग्लानिकारक तथा गुरु होते हैं ॥ ३४ ॥
रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा । रसाला के गुण — रसाला ( श्रीखण्ड या शिखरन ) — रस - रक्त आदि धातुओं को बढ़ाने वाली, वीर्यवर्धक, स्निग्ध ( स्नेहयुक्त ), बलवर्धक तथा रुचि को बढ़ाने वाली होती है ।
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९ ४ अष्टाङ्गहृदये रसाला, श्रीखण्ड, शिखरिणी या सिखरन - पाकक्रियाकुशल भीमसेन ने इसका निर्माण करके श्रीकृष्ण को खिलाया था, ऐसी चर्चा महाभारत में आई हैं । हम यहाँ उसी निर्माण - विधि का निर्देश कर रहे हैं — मलाई सहित उत्तम दही को एक स्वच्छ वस्त्र बाँधकर लटका दें । उसका जलीय तत्त्व निकल जाने पर उस दही को एक पात्र में निकाल लें, फिर किसी चौड़े बर्तन के मुख पर मोटा कपड़ा बाँधकर उस दही में चीनी मिलाकर उस कपड़ा के ऊपर रखकर उसे हाथ से रगड़ें । वह दही उस कपड़े से छनकर जब सब उस पात्र में आ जाये, तब उसमें उचित मात्रा में कालीमिर्च, जावित्री, केशर, इलायची आदि मिलाकर रख दिया जाता है, यह रसाला है । इसके भेद - उपभेदों का विस्तृत वर्णन देखें— ' क्षेमकुतूहल ' नामक ग्रन्थ में । श्रमक्षुत्तृट्क्लमहरं पानकं प्रीणनं गुरु ॥ ३५ ॥
विष्टम्भि मूत्रलं हृद्यं यथाद्रव्यगुणं च तत् । पानक ( शीतल पेय ) गुण- -यह शारीरिक थकावट, भूख, प्यास तथा मानसिक सुस्ती को हटाता है, तृप्तिकारक तथा गुरु होता है । यह विष्टम्भकारक ( मलावरोधक ), मूत्र को निकाल देने वाला, रुचिकर होता है । विशेष करके यह जिस प्रकार के द्रव्यों से बनाया जाता है, तदनुसार गुणों वाला होता है ॥ ३५ ॥
वक्तव्य — यह एक प्रकार का पेय है, जो पकाये हुए कच्चे आम, पकी हुई इमली आदि के गूदे में पानी, नमक, मिर्च आदि मिलाकर तैयार किया जाता है; इसे ' पना ' भी कहते हैं । इसके अन्य अनेक प्रकार हैं — फालसा, आलूबुखारा, काफल ( नैनीताल, अलमोड़ा में सुलभ जंगली फल ) —– इनमें से किसी एक का उक्त विधि से पानक बनाया जाता है । बादाम, पोस्तादाना, भाँग के बीज, कद्दू, खरबूजा आदि के बीजों को एक साथ पानी डालकर पीस लें, फिर इसे कपड़े में डालकर छान लें । इसमें चीनी या उत्तम शहद डालकर पीया जाता है, यह भी एक सुमधुर पानक है । ग्रीष्मऋतु का यह उत्तम पौष्टिक पेय है ।
कुछ शौकीन लोग इसमें गुलकन्द भी मिलाते हैं । यह सोने में सुगन्ध है ।
लाजास्तृट्छर्द्यतीसारमेहमेदःकफच्छिदः ॥३६ ॥
कासपित्तोपशमना दीपना लघवो हिमाः । लाजा ( लावा, खील ) – ये तृष्णा ( प्यास ), वमन, अतिसार, प्रमेह, मेदोवृद्धि तथा कफदोष का 1 विनाश करते हैं; कास एवं पित्तविकार को शान्त करते हैं, जठराग्नि को प्रदीप्त करते हैं, लघुपाकी, शीतल तथा शीतवीर्य होते हैं ॥ ३६ ॥
वक्तव्य —— भृष्टं सुपुष्पितं धान्यं लाजेति परिकीर्तितम् । अर्थात् धानों को भाड़ में भूँजकर जो फूल जैसा खिल जाता है, उसे ' लावा ' कहते हैं । ये लाजा अन्य धान्यों के भी बनाये जाते हैं । लावा शब्द
संस्कृत में पुल्लिंग एवं नित्य बहुवचनान्त है ।
पृथुका गुरवो बल्याः कफविष्टम्भकारिणः ॥ ३७ ॥
पृथुक ( च्यूड़ा ) – ये पाचन में गुरु, बलवर्धक, कफकारक तथा विष्टम्भकारक ( मल को बाँधने वाले ) होते हैं ॥ ३७ ॥
वक्तव्य — श्रीअरुणदत्त का कथन है कि हरे धानों को भूँजकर मुशल से कूटकर चिपटे जो बनाये जाते हैं, उन्हें ‘ पृथुक ' कहते हैं । यही मत श्रीहेमाद्रि तथा डल्हण का भी है । किन्तु आजकल सूखे धानों को भिगाकर भूनकर तब कूटकर च्यूड़ा बनाया जाता है । उक्त आचार्यों द्वारा कथित विधि से बनाया गया च्यूड़ा शुद्ध एवं उत्तम होता है । धाना विष्टम्भिनी रूक्षा तर्पणी लेखनी गुरुः । धाना ( भूने हुए जौ या चावल ) – यह विष्टम्भकारक, रूक्ष ( स्नेह रहित ), तृप्तिकारक, लेखन करने वाली तथा पचने में गुरु होती है ।