श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 131–140
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 131–140
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अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९ ५ वक्तव्य — वाग्भट ने उक्त ' धाना ' को ' गुरु ' कहा है, सुश्रुत का मत इसके विपरीत है — ' धानोलुम्बास्तु लघवः कफमेदोविशोषणा: ' । ( सु.सू. ४६।४१० ) अर्थात् धाना तथा उलुम्बा ( होलक ) ये लघु होते हैं, कफ एवं मेदोधातु को सुखाते हैं । ऐसा क्यों? समाधान- - ' सुश्रुत ' के मत में ये द्रव्य पाक में लघु हैं और गुणों में गुरु होते हैं । ' उलुम्बा ' को
हिन्दी में ' होरहा ' भी कहते हैं ।
सक्तव लघवः क्षुत्तृट्श्रमनेत्रामयव्रणान् ॥ ३८ ॥
घ्नन्ति सन्तर्पणाः पानात्सद्य एव बलप्रदाः । नोदकान्तरितान्न द्विर्न निशायां न केवलान् ॥ ३ ९ ॥ न भुक्त्वा न द्विजैश्छित्त्वा सक्तूनद्यान्न वा बहून् । सत्तुओं का वर्णन – प्रायः सभी प्रकार के सत्तू लघु होते हैं । ये भूख, प्यास, थकावट, नेत्ररोग तथा व्रणों को नष्ट करते हैं । ये पीने से तत्काल तृप्तिकारक तथा बल ( शक्ति ) कारक होते हैं । सत्तू खाते समय बीच - बीच में पानी नहीं पीना चाहिए । दिनभर में दो बार सत्तू का सेवन न करे, इसे रात में नहीं खाना चाहिए । केवल ( बिना नमक या गुड़ मिलाये ) सत्तू नहीं खाने चाहिए । भोजन कर लेने के बाद भी सत्तू का सेवन न करे । आटा की भाँति सानकर दाँतों से काट - काट या चबा - चबा कर इनका सेवन न करे और अधिक मात्रा में भी सत्तू न खाये ॥ ३८-३९ ॥ वक्तव्य- -अन्य प्रकार के भोजनों के बीच - बीच में जिस प्रकार लोग पानी पीते हैं, वैसा सत्तुओं के साथ न करें । ' न केवलान् ' का अर्थ श्री अरुणदत्त तथा हेमाद्रि ने किया है— ' उदकादिरहितान् ' । इसमें आदि पद से नमक या गुड़ या मिश्री समझना चाहिए । कुछ लोग इसकी रूक्षता कम करने के लिए इसमें घी मिला लेते हैं । घी मिलाने की सलाह संग्रहकार की भी है । सत्तुओं को घोलकर पीना यही उचित है, आटा जैसा सानकर खाना उचित नहीं है । सत्तू - निर्माण — जौ, चना, मसूर, बेर आदि को भूँजकर पीस लिया जाता है, इस प्रकार जो आटा बनाया जाता है, उसे ‘ सत्तू ' कहते हैं । इसका प्रचार पूर्वी उत्तरप्रदेश में अधिक है । इधर इसके ' होटल '
भी देखे जाते हैं, उनका नाम होता है— ' तुरन्ता भोजनालय ' ।
पिण्याको ग्लपनो रूक्षो विष्टम्भी दृष्टिदूषणः ॥ ४० ॥
पिण्याक - वर्णन — पिण्याक ( तिल या सरसों की खली ) ग्लानिकारक, रूक्षताकारक, विष्टम्भ ( मल को रोकने वाला ), दृष्टि को दूषित करने वाला होता है ॥ ४० ॥
वक्तव्य — पिण्याक का सेवन रात्रि में नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह रूक्ष होने के कारण विष्टम्भ करता है । उसके बाद यह विदाह करता है, फिर मन में ग्लानि को करता है । वेसवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः । वेसवार वर्णन —यह गुरु, स्निग्ध ( चिकना ), बलवर्धक तथा शरीर को स्थूल बनाता है । वक्तव्य — वेसवार का परिचय श्रीचक्रपाणि ने च. सू. २७ / २६ ९ की टीका में इस प्रकार दिया है — ‘ मांसं निरस्थि सुस्विन्नं पुनर्दृषदि पेषितम् । पिप्पलीशुण्ठिमरिचगुडसर्पिःसमन्वितम् । ऐकध्यं विपचेत् सम्यग्वेशवार इति स्मृतः ’ । ( सूदशास्त्र ) अर्थात् अस्थिरहित मांस के छोटे - छोटे टुकड़ों को पकाकर उन्हें फिर सिल पर पीसकर पीपल, सोंठ, मरिच, गुड़, घी मिलाकर फिर से एक साथ पकायें, इसे वेसवार कहते हैं । इसी का अविकल पाठ सुश्रुत में देखें — सु.सू. ४६ । ३६४- ३६५ । यह मांसाहारियों का ' वेसवार ' है । शाकाहारियों का ' वेसवार ’
आगे कहा जायेगा ।
मुद्गादिजास्तु गुरवो यथाद्रव्यगुणानुगाः ॥ ४१ ॥
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९ ६ अष्टाङ्गहृदये मूँग आदि के वेसवार — मूँग, उड़द आदि वेसवार भी गुरु होते हैं, जिन घटकों द्वारा वे बनाये जाते हैं, उन्हीं के समान उन वेसवारों के गुण तथा कर्म भी होते हैं ॥ ४१ ॥
वक्तव्य — ‘ सिद्धसार ' में कहा गया है— ' अत्युष्णा मण्डकाः पथ्याः शीतला गुरवो मताः ' । अर्थात् उक्त मूँग आदि द्वारा निर्मित मण्डक गरमागरम यदि खाये जाते हैं, तो हितकर होते हैं और वे शीतल हो जाने पर गुरु हो जाते हैं अर्थात् देर में पचते हैं । वेशवार — जीरा, मरिच, सोंठ, पीपलामूल, धनियाँ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली तथा सफेद मरिच-यह सब वेशवारगण हैं । देखें— राज ० मिश्रकवर्ग २२।६२ । इन मसालों को डालकर जो मूँग आदि दालों के मण्डक ( पकौड़े, बड़े आदि ) बनाये जाते हैं, उनके गुण - धर्मों का ऊपर वर्णन किया गया है । यह शब्द तालव्य अथवा दन्त्य सकार मध्य भी देखा जाता है । कुकूलकर्परभ्राष्ट्रकन्द्वङ्गारविपाचितान् । एकयोनींल्लघून्विद्यादपूपानुत्तरोत्तरम् ॥ ४२ ॥
इति कृतान्नवर्गः । अपूपों का वर्णन – कुकूल ( भूसा की आग ), कर्पर या खर्पर अर्थात् फूटे हुए घड़े का टुकड़ा, भ्राष्ट्र ( भाड़ ), कन्दुक ( गोल आकार वाली कड़ाही ) तथा जलते हुए कोयलों को अंगार कहते हैं । इनमें पकाये गये गेहूँ आदि किसी एक ही जाति के आटा के अपूप उत्तरोत्तर हलके होते हैं ॥ ४२ ॥
वक्तव्य — ' अपूप ' शब्द सामान्यतया गेहूँ के आटे को घोलकर चीनी डालकर पकाये हुए मालपुआ के लिए प्रयुक्त होता है । यहाँ ' अपूप ' की निर्माण - विधि से ' लिट्टी ' या ' वाटी ' का बोध हो रहा है, विशेषकर ‘ कुकूलपाचितान् ' तथा ' अङ्गारपाचितान् ' को देखकर । ' कर्परभ्राष्ट्रकन्दुपाचितान् ' को देखकर रोटी का आभास हो रहा है । कर्पर या खर्पर का अर्थ है फूटे घड़े के खप्पर का तवा; भ्राष्ट्र का अर्थ है — भड़भूजे की भाड़ या भड़साँय या भड़साईं अथवा तन्दूर; कन्दु का अर्थ है— लोहे का तवा या कड़ाही । अब आप तवा या कड़ाही में जो भी बनायें किन्तु ऊपर के साधनों में अपूप का बनना या बनाना सम्भव नहीं है । इस प्रकार यहाँ अपूप का अर्थ — लिट्टी, वाटी, रोटी, फुलका, चिलड़ा, पराठा तथा मालपुआ भी हो सकता है । यद्यपि इसमें पकाये जाने वाले पदार्थों के लिए यहाँ घी - चीनी का उल्लेख नहीं किया है, फिर भी अन्न, पकाने वाले पात्र तथा अग्नि का उल्लेख तो किया ही गया है । अतः यहाँ ' एकदेशविकृत-स्यानन्यत्वात् ' इस नियम से सभी का ग्रहण कर लिया जायेगा । ' कर्पर ' शब्द का अर्थ है — घड़े का ' ठीकरा ' । संस्कृत - साहित्य में एक आचार्य हुए हैं, जिनका नाम था ‘ घटकर्पर ’ । ये यमकालंकार की रचना में अपने काल में अद्वितीय थे । इनकी एक गर्वोक्ति है— ' जीयेय येन कविना यमकैः परेण, तस्मै वहेयमुदकं घटकर्परेण ' । यहाँ भी कर्पर या खर्पर शब्द का वही अर्थ है । इस प्रकरण का नाम ‘ कृतान्नवर्ग ' है । इसका अर्थ है— किये ( पकाये ) गये अन्नों ( भक्ष्यपदार्थों ) का वर्ग । ‘ कृत ' का अर्थ संस्कृत भी होता है, इसका तात्पर्य है— मसाले आदि डालकर भलीभाँति पकाये गये और उसके बाद घी तेल से छौंके गये । इस दृष्टि से सभी प्रकार के भक्ष्य पदार्थ कृत - अकृत भेद से दो प्रकार से बनाये जाते हैं । देखें— ' ज्ञेयाः कृताऽकृतास्ते तु स्नेहादियुतवर्जिताः ' । ( अ.सं.सू. ७।५१ ) अर्थात् कृत ( संस्कृत ) अथवा अकृत ( असंस्कृत ) । अथ मांसवर्गः
हरिणैणकुरङ्गर्क्षगोकर्णमृगमातृकाः । शशशम्बरचारुष्कशरभाद्या मृगाः स्मृताः ॥४३ ॥
मृग - परिचय — हरिण, एण, कुरंग, गोकर्ण, मृगमातृका, शश, शम्बर ( साँभर — बारहसिंगा ), चारुष्क तथा शरभ आदि ‘ मृग ' कहे जाते हैं ॥ ४३ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९ ७ वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह सू. ७।६७-६८ में मृगों की गणना इस प्रकार की गयी है — हरिण, एण, कुरंग, ऋष्य, गोकर्ण ( नीलगाय ), मृगमातृका, कालपुच्छक, चारुष्क, वरपोत, शशक, उरण, श्वदंष्ट्र, राम, शरभ ( यह मृग काश्मीर में पाया जाता है, इसके आठ पैर होते हैं ), लोहकारक, शम्बर ( साँभर ), कराल ( कस्तूरीमृग ), कृतमाल तथा पृषत ( बिन्दुओं से युक्त त्वचा वाला ) । चरक ने ' मृगा जाङ्गलचारिणः, ( च.सू. २७।५५ ) कहा है अर्थात् ये जंगल में विचरण करते रहते हैं । शिकारी इन्हें ढूढ़ते हैं, अतएव इन्हें
मृग कहा जाता है ।
लाववार्तीकवर्तीररक्तवर्त्मककुक्कुभाः कपिञ्जलोपचक्राख्यचकोरकुरुवाहवः ॥ ४४ ॥
वर्तको वर्तिका चैव तित्तिरिः क्रकरः शिखी । ताम्रचूडाख्यबकरगोनर्दगिरिवर्तिकाः ॥ ४५ ॥
तथा शारपदेन्द्राभवरटाद्याश्च विष्किराः । विष्किर - परिचय — लाव ( लवा ), वर्तीक ( बटेर ), रक्तवर्त्मक, कुक्कुभ, कपिञ्जल, उपचक्र ( चकवा ), चकोर, कुरुबाहु, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तीतर, क्रकर, मोर, ताम्रचूड ( मुर्गा ), बकर, गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरट नामक पक्षी विष्किर कहे जाते हैं ॥ ४४-४५ ॥ वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।६ ९ -७१ ) में विष्किर पक्षियों की गणना इस प्रकार की गयी है — लाव, वर्तीक, वातीर, रक्तवर्त्मक ( गौरैया — गृहचटक ), कुक्कुभ ( जंगली मुरगा ), कपिञ्जल ( जंगली गौरैया ), उपचक्र ( चकवा ), चकोर, कुरुबाहु, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तित्तिर, क्रकर ( बया ), मोर, मुर्गा, वरक ( बगुला ), गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरटा ( हंस की स्त्री ) —— ये सभी पक्षी विष्किर कहे जाते हैं । विष्किर शब्द का अर्थ — पहले दानों के ढेर को पंजों से बिखेर कर बाद में एक - एक दाना चुनकर
खाने वाले पक्षियों को ' विष्किर ' कहते हैं ।
जीवञ्जीवकदात्यूहभृङ्गाहशुकसारिकाः ॥ ४६ ॥
लट्वाकोकिलहारीतकपोतचटकादयः । प्रतुदाः-प्रतुद - प परिचय — जीवजीवक, दात्यूह, भृंग या भृंगराज, शुक, सारिका ( मैना ), लट्वा, कोकिल ( कोयल ), हारीत, कपोत ( कबूतर ) तथा चटक ( गौरैया ) आदि पक्षी प्रतुद कहे जाते हैं ॥४६ ॥
वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह सू. ७।७२-७५ में प्रतुद पक्षियों की गणना इस प्रकार है — शतपत्र ( कठफोड़वा ), भृंगराज, कोयष्टि ( जलमुर्गा ), जीवंजीवक, खंजरीट ( खंजन पक्षी ); हारीत ( हरियल ), दुर्नामारि ( उल्लू ), कृशगुह, लट्वा, लडूषक, वटहा, गोक्ष्वेड, डिण्डिमाणक, जटी ( जटायु ), दुन्दुभि, पार्कार, लोहपृष्ठ, कलिंगक, सारिका, शुक, शार्ङ्ग ( सारंग ), चिरीटीक, कुयष्टिक, मञ्जरीयक, दात्यूह, गोपापुत्र, प्रियात्मज, कलविंक, कोयल, कबूतर, अंगारचूड़क, पारावत ( पेरवा वा जंगली कबूतर ) तथा पाणविक -- ये पक्षी ' प्रतुद ' कहे जाते हैं । चोंच मारकर दाना चुगने वाले पक्षियों की ' प्रतुद ' संज्ञा है । विष्किर तथा प्रतुद वर्ग के पक्षी यद्यपि ऊपर अलग - अलग गिनाये गये हैं तथापि दोनों में प्रतुद धर्म समान ही होता है । सम्प्रति ये पक्षी उक्त नामों से अपरिचित से हो चले हैं, इनका परिचय बहेलियों
( चिड़ीमारों ) से प्राप्त कर लेना चाहिए ।
— भेकगोधाहिश्वाविदाद्या बिलेशयाः ॥ ४७ ॥
बिलेशय - परिचय — भेक ( मेढक ), गोह, सर्प तथा साही आदि प्राणी ' बिलेशय ' कहे जाते हैं ॥ ४७ ॥
वक्तव्य — बिलेशय अर्थात् बिल में रहने वाले । मेढक मिट्टी के भीतर, गोह तथा सर्प का बिल होता ही है, साही के पूरे शरीर पर काँटे रहते हैं, यह बिल बना लेता है अथवा किसी गुफा को अपने लिए ढूँढ लेता है । इसके काँटे धार्मिक कृत्य तथा कृत्या प्रयोग में लिए जाते हैं । ७ अ ० हृ ०
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९ ८ अष्टाङ्गहृदये अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।७६ ) में बिलेशय प्राणियों की गणना इस प्रकार है— श्वेत, श्याम, रंग - बिरंगी पीठ वाला तथा कालक नामक प्राणी मेढक, चिल्लट, कूचीक, गोह, शल्लक, शण्डक ( साँडा ), वृष ( जंगली बिलाव ), साँप, कदली ( पौण्ड्रदेश में पाया जाने वाला प्राणी ), श्वाविध ( बड़ा साही ) तथा नेवला — ये बिलेशय प्राणी हैं । गोखराश्वतरोष्ट्राश्वद्वीपिसिंहर्क्षवानराः । मार्जारमूषकव्याघ्रवृकबभ्रुतरक्षवः ॥ ४८ ॥
लोपाकजम्बुकश्येनचाषवान्तादवायसाः । शशघ्नीभासकुररगृध्रोलूककुलिङ्गकाः ॥। ४ ९ ॥
धूमिका मधुहा चेति प्रसहा मृगपक्षिणः । प्रसह मृग — गाय, गधा, खच्चर, ऊँट, घोड़ा, द्वीपि ( चीता ), सिंह, भालू, बिलाव, चूहा, बाघ, वृक ( भेड़िया ), नेवला, तरक्षु ( लकड़बग्घा ), लोमड़ी तथा सियार । पक्षी – श्येन ( बाज ), चाष ( नीलकण्ठ ), वान्ताद ( कुत्ता ), कौआ, चील, भास, कुरर, गिद्ध, उल्लू, कुलिंगक, धूमिक तथा मधुहा नामक पक्षी प्रसह कहे जाते हैं ॥ ४८-४९ ॥ वक्तव्य — ऊपर ४८ वें श्लोक का यह उत्तरार्ध ' चाषवान्तादवायसाः ' कुछ खटक रहा है, ‘ क्योंकि यहाँ पक्षियों के बीच • में कुत्ता का समावेश कर दिया है । यही स्थिति अ.सं.सू. ७।७८ की भी है । वास्तव में वान्ताद की गणना अन्वयविधि से कर भी ली जाती तो यहाँ सम्पूर्ण पंक्ति ही समस्त है, अस्तु । भीड़ में मनुष्य भी इधर - उधर भटक जाते हैं, पशु - पक्षियों का तो कहना ही क्या है? वराहमहिषन्यङ्कुरुरुरोहितवारणाः ॥५० ॥
सृमरश्चमरः खड्गो गवयश्च महामृगाः । महामृग - परिचय — सूअर, भैंसा, न्यंकु ( बारहसिंगा का भेद ), रुरु, रोहित, भेद ), चमर, गैंडा तथा गवय ( जंगली गाय ) – ये महामृग कहे जाते हैं ॥। ५० ॥ हंससारसकादम्बबककारण्डवप्लवाः ॥५१ ॥
बलाकोत्क्रोशचक्राह्वमद्गुक्रौञ्चादयोऽप्चराः । हाथी, सृमर ( हरिण जलचर पक्षी — हंस, सारस, कादम्ब, बक ( बगुला ), कारण्डव, प्लव, बलाका, उत्क्रोश, चकवा, मद्गु ( जलकौआ ), क्रौञ्च आदि पक्षी ' जलचर ' कहे जाते हैं ॥५१ ॥
मत्स्या रोहितपाठीनकूर्मकुम्भीरकर्कटाः ॥ ५२ ॥
शक्तिशङ्खोद्रशम्बूकशफरीवर्मिचन्द्रिकाः । चुलूकीनक्रमकरशिशुमारतिमिङ्गिलाः ॥ ५३ ॥
राजीचिलिचिमाद्याश्च— मत्स्य - परिचय — रोहू, पाठीन, कछुआ, कुम्भीर, केकड़ा, शुक्ति ( सीपी ) का क्रिमि, शंख का क्रिमि, उद्र ( जलबिलाव ), शम्बूक ( घोंघा ), शफरी ( छोटी जाति की मछली ), वर्मी, चन्द्रिका, चुलुकी, नक्र ( घड़ियाल ), मकर, शिशुमार, तिमिंगिल ( ह्वेल मछली ), राजी तथा चिलचिम आदि हैं ॥ ५२-५३ ॥ - मांसमित्याहरष्टधा । ( मृग्यं वैष्किरिकं किञ्च प्रातुदं च बिलेशयम् । प्रासहं च महामृग्यमप्चरं मात्स्यमष्टधा ॥ १ ॥ )
आठ प्रकार के मांस - १. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद, ४. बिलेशय, ५. प्रसह, पक्षी तथा ८. मत्स्यवर्ग ॥ १ ॥
मत्स्यवर्ग में परिगणित ६. महामृग; ७. जलचर वक्तव्य — यहाँ ‘ जलचर ' नाम से कुछ पक्षियों का वर्णन किया गया है, उसके बाद ‘ मत्स्यमांस ’ का उल्लेख है । मछलियाँ जलज, जलेचर तथा जलेशय होती हैं; किन्तु इनमें ' चिलचिम ' नामक मछली
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स्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९९ का वर्णन चरक ने इस प्रकार दिया है— ' स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः आयो भूमौ चरति ' । ( च.सू. २६।८३ ) यह इसकी आकृति का परिचय है और यह प्रायः भूमि में चरती
है अर्थात् पानी से हटकर भी जीवित रहती है, यह इसकी विलक्षणता है ।
योनिष्वजावी व्यामिश्रगोचरत्वादनिश्चिते ॥ ५४ ॥
बकरी - भेड़ का वर्णन — बकरी तथा भेड़ की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) के सम्बन्ध में निश्चित रूप के यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों जांगल तथा आनूप देश में विचरण करती रहती हैं ॥५४ ॥
आद्यान्त्या जाङ्गलानूपा मध्यौ साधारणौ स्मृतौ । शेष प्राणियों का निर्णय —शेष मांसयोनियों का निश्चय इस प्रकार है— प्रारम्भ के तीन वर्ग ( १. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद ) जांगल देश के और अतिंम तीन वर्ग ( १. महामृग, २. जलचर पक्षी तथा मत्स्य ) आनूप देश के कहे जाते हैं तथा मध्यम दो वर्ग ( १. बिलेशय तथा २. प्रसह ) वाले दोनों लक्षणों से युक्त
साधारण देश के माने जाते हैं ।
तत्र बद्धमलाः शीता लघवो जाङ्गला हिताः ॥ ५५ ॥
पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे । मांसों का वर्णन — उक्त मांसों में जांगल देश के प्राणियों के मांस मल को बाँधते हैं, शीतवीर्य, पाचन में लघु तथा हितकर होते हैं । ये पित्त - प्रधान, मध्यम वात एवं हीन कफ वाले सन्निपात में हितकारक होते हैं ॥ ५५ ॥
दीपनः कटुकः पाके ग्राही रूक्षो हिमः शशः ॥ ५६ ॥
शशकमांस के गुण — खरगोश का मांस जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, विपाक में कटु, ग्राही ( मल को बाँधने वाला ), रूक्ष तथा शीतवीर्य होता है ॥ ५६ ॥
ईषदुष्णगुरुस्निग्धा बृंहणा वर्तकादयः । तित्तिरिस्तेष्वपि वरो मेधाग्निबलशुक्रकृत् ॥ ५७ ॥
ग्राही वर्ण्योऽनिलोद्रिक्तसन्निपातहरः परम् । वर्तक आदि के मांस — ये कुछ उष्णवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध तथा पुष्टिकारक होते हैं । इन सबमें तीतर का मांस उत्तम होता है, क्योंकि यह धारण करने की शक्ति वाली बुद्धि, बल तथा शुक्र ( वीर्य ) को बढ़ाता है एवं मल को बाँधता है, मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है और वातदोष - प्रधान सन्निपात का विनाशक है ॥ ५७ ॥
नातिपथ्यः शिखी पथ्यः श्रोत्रस्वरवयोदृशाम् ॥ ५८ ॥
मोर का मांस — मोर का मांस अधिक पथ्यकारक नहीं होता, तथापि कर्णेन्द्रिय, स्वरवाही स्रोतस्, वयस् तथा दृष्टि को स्थिरता प्रदान करता है ॥ ५८ ॥
तद्वच्च कुक्कुटो वृष्यः--कुक्कुट का मांस — कुक्कुट का मांस भी मोर के मांस के समान गुण वाला होता है और यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) भी होता है । — ग्राम्यस्तु श्लेष्मलो गुरुः । पालतू मुर्गा का मांस - ग्राम्य ( पालतू ) मुर्गा का मांस वन में होने वाले मुर्गा के मांस से कफकारक
तथा गुरु होता है ।
मेधाऽनलकरा हृद्याः क्रकराः सोपचक्रकाः ॥ ५ ९ ॥
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१०० अष्टाङ्गहृदये क्रकर तथा उपचक्रक के मांस — ये मेधा ( धारणाशक्ति ) को बढ़ाने वाले, जठराग्नि को तेज करने वाले तथा हृदय के लिए हितकारक होते हैं ॥ ५ ९ ॥ गुरुः सलवणः काणकपोतः सर्वदोषकृत् । काणकपोतक का मांस — जंगली कबूतर का मांस पाचन में गुरु, कुछ नमकीन रस वाला तथा
वात आदि तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है ।
चटकाः श्लेष्मलाः स्निग्धा वातघ्नाः शुक्रलाः परम् ॥ ६० ॥
चटक का मांस — यह मांस कफकारक, चिकना, वातदोषनाशक तथा शुक्र को अत्यन्त बढ़ाने वाला होता है ॥ ६० ॥
गुरूष्णस्निग्धमधुरा वर्गाश्चातो यथोत्तरम् । मूत्रशुक्रकृतो बल्या वातघ्नाः कफपित्तलाः ॥ ६१ ॥
आठों मांसों का वर्णन - उक्त आठों मांस अपने क्रम से उत्तरोत्तर गुरु, उष्ण, चिकने तथा मधुर होते हैं । ये मूत्रवर्धक, शुक्रवर्धक, बलवर्धक, वातनाशक एवं कफ - -1 पित्तकारक होते हैं ॥ ६१ ॥
शीता महामृगास्तेषु क्रव्यादप्रसहाः पुनः । लवणानुरसाः पाके कटुका मांसवर्धनाः ॥ ६२ ॥
जीर्णाशग्रहणीदोषशोषार्तानां परं हिताः । महामृगों के मांस — उनमें भी महामृगों के मांस शीतवीर्य होते हैं । क्रव्यादों ( कच्चा मांस खाने वाले प्राणियों ) के तथा प्रसहों ( जो दूसरे से लूटकर खा जाते हैं, उन ) के मांस कुछ नमकीन स्वाद वाले, विपाक में कटु तथा मांस को बढ़ाने वाले होते हैं । ये पुराने अर्शरोग, ग्रहणीरोग तथा शोष ( राजयक्ष्मा ) रोग से पीड़ितों के लिए अत्यन्त हितकारक होते हैं ॥ ६२ ॥
नातिशीतगुरुस्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६३ ॥
शरीरधातुसामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् । बकरा का मांस — यह मांस समशीतोष्ण होता है, अतएव कहा गया है कि यह अतिशीत नहीं होता, अतिगुरु एवं अतिस्निग्ध भी नहीं होता; इसीलिए यह किसी दोष - विशेष को नहीं बढ़ाता । यह मनुष्य के शरीर की रस आदि धातुओं के समान होने के कारण अभिष्यन्दी भी बढ़ाता है ॥ ६३ ॥
विपरीतमतो ज्ञेयमाविकं बृंहणं तु तत् ॥ भेड़ का मांस –भेड़ का मांस बकरे के मांस के गुणों से विपरीत भी शरीर की धातुओं को बढ़ाता है ॥६४ ॥
शुष्ककासश्रमात्यग्निविषमज्वरपीनसान् । कार्श्य केवलवातांश्च गाय का मांस - गाय के मांस का सेवन करने से सूखी खाँसी, श्रम नहीं है । यह सभी धातुओं को ६४ ॥ गुणों वाला होता है, किन्तु यह गोमांसं सन्नियच्छति ॥ ६५ ॥
( थकावट ), अत्यग्नि ( भस्मक रोग ), विषमज्वर, पीनस, कृशता तथा केवल ( शुद्ध ) वातरोगों का विनाशक होता है॥६५ ॥
वक्तव्य — सुश्रुत ने गोमांस के गुणों में एक गुण ' पवित्र ' भी दिया है, जो विचारणीय है । देखें — सु.. ४६।८ ९ । चरक ने भी प्रायः उक्त गुणों का ही वर्णन किया है । देखें- च. सू. २७ / ७ ९ । किन्तु इन्होंने ' गोमांस मृगमांसानाम् ' ( च.सू. २५।३ ९ ) कहकर सभी मृगमांसों में इसे अधिक अपथ्य कहा है और वाग्भट ने भी ‘ निन्दितो गौः ' ( अ.सं.सू. ७ १०८ ) कहकर अपना अभिप्राय प्रकट किया है । उष्णो गरीयान्महिषः स्वप्नदाढर्यबृहत्त्वकृत् । भैंसा का मांस —यह अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त गुरु, पर्याप्त नींद लाने वाला, शरीर को दृढ़ करने वाला तथा पुष्टिकारक होता है ।
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स्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १०१ तद्वद्वराहः श्रमहा रुचिशुक्रबलप्रदः ॥ ६६ ॥
सूअर का मांस - सूअर का मांस भी भैंसे के मांस के समान गुण - धर्म वाला होता है । यह शारीरिक कावट को दूर करता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है, वीर्यवर्धक तथा बलप्रद होता है ॥ ६६ ॥
मत्स्याः परं कफकराः-मत्स्य का मांस — सभी प्रकार की मछलियों का मांस अत्यन्त कफकारक होता है । - चिलिचीमस्त्रिदोषकृत् । चिलचिममत्स्य का मांस — चिलचिम नामक मछली का मांस त्रिदोषकारक होता है । वक्तव्य — पक्षियों में चमगादड़ और मछलियों में चिलचिम जब जिधर मौका लगता है, उधर के हो जाते हैं । चमगादड़ पंख होने के कारण पक्षियों में और दाँत होने के कारण मृग आदि पशुओं में सम्मिलित हो जाता है । इसी प्रकार चिलचिम जलचर तथा थलचरों में सम्मिलित हो जाता है । ऐसे लोगों के चरित्र
गुण - धर्म दूषित होते ही हैं ।
लावरोहितगोधैणाः स्वे स्वे वर्गे वराः परम् ॥ ६७ ॥
लाव आदि का वर्णन — अपने - अपने वर्ग में इन प्राणियों के मांस उत्तम माने गये हैं, होते भी हैं । यथा — विष्किर वर्ग में ' लाव ' पक्षी का मांस, मत्स्य वर्ग में ' रोहित मछली ' का मांस, बिलेशय वर्ग में गोधा ( गोह ) का मांस और मृगवर्ग में ' एण ' ( हरिण ) का मांस ॥ ६७ वक्तव्य — अनूप देशवासी अथवा नदियों के तटवर्ती वे लोग जो का ही आहार करते हैं । वे अपने को मांसाहारी स्वीकार नहीं करते । स्वीकार करते हैं और मछलियों को वे ' जलतोरई ' संज्ञा देते हैं । मांसं सद्योहतं शुद्धं वयःस्थं च भजेत्— भक्ष्य मांस - वर्णन — तत्काल मारे गये, जवान प्राणी के शुद्ध (
करना चाहिए ।
॥।
सदा अन्न के स्थान पर मछलियों वे इन्हें फल या शाक के रूप में साफ किये गये ) मांस का सेवन —त्यजेत् । मृतं कृशं भृशं मेद्यं व्याधिवारिविषैर्हतम् ॥ ६८ ॥
अभक्ष्य मांस- वर्णन — स्वयं मरे हुए, अत्यन्त कृश हो, जो मृत प्राणी अधिक मेदस्वी हो या रोग - विशेष के कारण मरा हुआ हो, जल में डूबने से मरे प्राणी के अथवा विष के कारण जो मरा हो, ऐसे प्राणियों के मांसों का सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ६८ ॥
वक्तव्य — गाय के मांस को बेचने वाला बूचड़ तथा अन्य सभी प्रकार के मांसों को बेचने वाला कसाई कहा जाता है । अथवा ये दोनों ही कसाई हैं । ये भक्ष्य ( हितकर ), अभक्ष्य ( अहितकर ) दोनों प्रकार के मांसों को बेचते हैं । अतः मांसभक्षण करने वाले सावधान रहें । रोगी प्राणियों का मांस खा लेने से खाने वाले व्यक्ति को वे सभी रोग हो जाते हैं जिनके कारण उस प्राणी की मृत्यु हुई थी । प्रायः ये विक्रेता बीमार पशुओं को सस्ते दामों में खरीद कर उन्हें मारकर उनका मांस बेच दिया करते हैं । पुंस्त्रियोः पूर्वपश्चार्धे गुरुणी, गर्भिणी गुरुः । लघुर्योषिच्चतुष्पात्सु, विहङ्गेषु पुनः पुमान् ॥ ६ ९ ॥ शिरःस्कन्धोरुपृष्ठस्य कट्याः सक्थ्नोश्च गौरवम् । तथाऽऽमपक्वाशययोर्यथापूर्वं विनिर्दिशेत् ॥ शोणितप्रभृतीनां च धातूनामुत्तरोत्तरम् । मांसाद्गरीयो वृषणमेढ्रवृक्कयकृद्गुदम् ॥ ७१ ॥
इति मांसवर्गः । विशिष्ट अवयवों के मांस - पुरुषों के शरीर के पूर्वार्ध भाग का और स्त्रियों के शरीर के उत्तरार्ध माना का मांस गुरु होता है । गर्भिणी स्त्री का मांस भी गुरु होता है । चौपायों में पुरुष प्राणी की तुलना
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१०२ अष्टाङ्गहृदये में स्त्रियों का मांस अधिक गुरु होता है । इसके विपरीत पक्षियों में स्त्री से पुरुष पक्षी का मांस अधिक गुरु होता है । यहाँ तक स्त्री - पुरुष के शरीर के अवयवों के मांस की गुरु - लाघव चर्चा हो गयी । अब शरीर के अवयवों की चर्चा प्रस्तुत है । सिर, कन्धे, ऊरुओं, पीठ, कमर, टाँगों, आमाशय तथा पक्वाशय का मांस पूर्व - पूर्व अर्थात् अन्तिम से पहला, फिर उससे पहला- - इस क्रम से गुरु होता है और रक्त आदि धातु भी उत्तरोत्तर गुरु होते हैं । यथा रक्त से मांस गुरु होता है । मांस से भी अधिक गुरु वृषण ( अण्डकोष ), मेढ्र ( पुरुष की मूत्रेन्द्रिय ), वृक्क ( गुरदे ), यकृत् तथा गुदभाग का मांस उत्तरोत्तर गुरु होता है ॥ ६ ९ -७१ ॥ वक्तव्य- -इस वर्ग में मांसधातु के गुण - दोषों का विवेचन किया गया है । यह सम्पूर्ण सृष्टि गुण - -दोषमयी द है । ' मांसान्मांसं प्रवर्द्धते ' अर्थात् मांस खाने से मांस बढ़ता है । ऐसा देखा भी जाता है, यह शास्त्रवचन भी है । ऐसा भी नहीं कि मांस खाने वाले ही हृष्ट - पुष्ट होते हों, शाकाहारी भी स्वस्थ, हृष्ट तथा प्रसन्न रहते ही हैं । मांसभक्षण सिंह आदि प्राणियों का धर्म है । प्राणियों में सद्भावना रखने के क्षेत्र में अहिंसा का प्रमुख स्थान है, अस्तु । मांसभक्षण जिह्वा के स्वाद का ' मिथ्यायोग ' है । इन्द्रियों का वशीभूत मानव सत् - असत् सभी कर्मों को करता है । वास्तव में यह आयुर्वेद किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष का न होकर मानव मात्र को स्वास्थ्य - सन्देश देने वाला एक प्रमुख शास्त्र है । अथ शाकवर्गः शाकं पाठाशठीसूषासुनिषण्णसतीनजम् । त्रिदोषघ्नं लघु ग्राहि सराजक्षववास्तुकम् ॥ ७२ ॥
शाकों का वर्णन — अब यहाँ से कतिपय शाकों का वर्णन किया जा रहा है— पाठा, शठी ( कचूर ), सूषा ( कासमर्द या कसौदीं ), सुनिषण्ण ( चौपतिया ), सतीनज ( तीनी ), राजक्षव ( नकछिकनी ) तथा बथुआ —ये सभी शाक त्रिदोषनाशक, लघु एवं ग्राही होते हैं ॥ ७२ ॥
वक्तव्य- - ऊपर संक्षेप से कतिपय शाकों का वर्णन किया गया है, इसके आगे प्रायः उन्हीं का स्वतन्त्र रूप में विस्तार से वर्णन किया है । शाकभेद - १. पत्र, २. पुष्प, ३. फल, ४. नाल, ५. कन्द और ६. संस्वेदज — इस प्रकार शाकों के छः भेद होते हैं । ये उत्तरोत्तर एक - दूसरे से गुरु होते हैं, शास्त्रों में शाकों की निन्दा लिखी है । यथा — ‘ शाकेन रोगा वर्धन्ते ' ( चा. नीति ) और यह भी कहा है— ये विष्टम्भी, गुरुपाकी, रूक्ष आदि भी होते हैं । फिर भी ये प्रतिदिन खाये जाते हैं, अत: इन्हें सामान्य वचन समझना चाहिए अर्थात् इनका अधिक सेवन न करें । सुनिषण्णोऽग्निकृद्वृष्यस्तेषु — सुनिषण्णक का वर्णन - सुनिषण्णक ( चौपतिया ) का शाक उक्त सभी शाकों में अग्निवर्धक तथा वीर्यवर्धक होता है । वक्तव्य — इस शाकवर्ग में कहे गये सभी शाकों के पर्याय निघण्टु - ग्रन्थों में देखें । -राजक्षवः परम् । ग्रहण्यर्शोविकारघ्नः- --राजक्षव का वर्णन — राजक्षव ( नकछिकनी ) का शाक ग्रहणीरोग तथा अर्शोरोग का नाश करने
वाले शाकों में उत्तम होता है ।
— वर्चोभेदि तु वास्तुकम् ॥ ७३ ॥
वास्तुक का वर्णन — वास्तुक ( बथुआ ) का शाक बँधे हुए मल का भेदन कर निकालने में उत्तम होता है ॥ ७३ ॥
हन्ति दोषत्रयं कुष्ठं वृष्या सोष्णा रसायनी । काकमाची सरा स्वर्या-
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १०३ काकमाची का वर्णन — काकमाची ( मकोय की पत्तियों ) का शाक तीनों दोषों का शमन करने वाला, कुष्ठरोग का विनाशक, वीर्यवर्धक, कुछ उष्णवीर्य, रसायन गुणों से युक्त, सर ( मल को सरकाने
वाला ) तथा स्वरयन्त्र के लिए हितकर होता है ।
-चाङ्गेर्यम्लाऽग्निदीपनी ॥ ७४ ॥
ग्रहण्यर्शोऽनिलश्लेष्महितोष्णा ग्राहिणी लघुः । चांगेरी ( तिपतिया ) का शाक — यह स्वाद में अम्ल, अग्निवर्धक, ग्रहणीरोग, अर्शोरोग, वातविकार तथा कफविकार नाशक होता है । यह उष्णवीर्य, मल को बाँधने वाला और लघु ( शीघ्र पचने वाला ) होता है ॥ ७४ ॥
वक्तव्य — सुनिषण्णक और चांगेरी के आकार में क्रमश: चार पात और तीन पात का अन्तर है,
ये दोनों पत्रशाक हैं ।
पटोलसप्तलारिष्टशार्ङ्गष्टावल्गुजाऽमृताः ॥ ७५ ॥
वेत्राग्रबृहतीवासाकुतिलीतिलपर्णिकाः । मण्डूकपर्णीकर्कोटकारवेल्लकपर्पटाः ॥ ७६ ॥
नाडीकलायगोजिह्वावार्ताकं वनतिक्तकम् । करीरं कुलकं नन्दी कुचैला शकुलादनी ॥ ७७ ॥
कटिल्लं केम्बुकं शीतं सकोशातककर्कशम् । तिक्तं पाके कटु ग्राहि वातलं कफपित्तजित् ॥ ७८ ॥
पटोल आदि शाक — पटोल ( परवल ), सप्तला ( सातला ), अरिष्ट ( नीम ), शाङ्गेष्टा ( काकतिक्ता — चक्रपाणि ), अवल्गुजा ( बाकुची के पत्ते, फलियाँ तथा बीज ), अमृता ( गिलोय या गुरुच के पत्ते ), वेत्राग्र ( बेंत के नये अंकुर ), बृहती ( वनभण्टा ), वासा ( अडूसा ), कुन्तली ( छोटा तिल - विशेष का पौधा ), तिलपर्णिका, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मीभेद के पत्ते ), कर्कोट ( ककोड़ा का फल ), कारवेल्लक ( करेला ), पर्पट ( पितपापड़ा ), नाड़ी ( नाड़ीशाक ), कलाय ( मटर ), गोजिह्वा ( गाजवाँ ), वार्ताक ( बैंगन ), वनतिक्तक ( पथ्यसुन्दर अर्थात् हरीतिकी— चक्र.टी.च.सू. २७ / ९ ५ ), करीर ( कैर के फल या बाँस के अंकुर ), कुलक ( छोटा जंगली करैला ), नन्दी ( पारसपीपल के पत्ते ), कुचैला ( काली पाठा ), शकुलादनी ( कुटकी ), कठिल्ल ( दीर्घपत्रा पुनर्नवा ), केम्बुक ( करेमू ), कोशातक ( कृतबेधन तरोई ) और कर्कश ( स्वल्पकर्कोटकः — चक्र. कबीला के पत्र ) – ये द्रव्य शीतवीर्य, स्वाद में तिक्त, पाक में कटु हैं, मल को बाँधने वाले हैं, वातकारक, कफ तथा पित्त दोषशामक हैं ॥ ७५-७८ ॥ वक्तव्य- - ऊपर जिन २८ शाकों के नाम गिनाये गये हैं, उनमें अनेक परिचय की दृष्टि से विवादास्पद हैं, अतएव कोई टीकाकार किसी द्रव्य का कोई पर्याय दे रहा है तो कोई कुछ । यह विवाद औषधद्रव्य - विशेषज्ञों के सामूहिक निर्णय की अपेक्षा रखता है । विशेषज्ञ भी वे हों जो पूर्वाग्रह या दुराग्रह से ग्रस्त न हों, क्योंकि विगृह्यसम्भाषा से निर्णीत विषय सिद्धान्त रूप में परिणत नहीं हो पाते । ऐसा ही एक द्रव्य है — वनतिक्तकम् । आचार्य चक्रपाणि इसे पथ्यसुन्दरम् श्री अरुणदत्त वत्सकः, श्री हेमाद्रि किराततिक्तम्, शब्दमाला — – हरीतकी, वैद्यकनि ० — लोध्रवृक्ष तथा रत्नमाला – वनतिक्तायां, पाठायाम् । इसी प्रकार हृद्यं पटोलं कृमिनुत्स्वादुपाकं रुचिप्रदम् । परवल का शाक — यह हृदय के लिए हितकारक, क्रिमिनाशक,
प्रति रुचि ( इच्छा ) को उत्पन्न करता है ।
पित्तलं दीपनं भेदि वातघ्नं बृहतीद्वयम् ॥
बृहतीद्वय का वर्णन -- वनभण्टा तथा कण्टकारी के फलों का शाक करने वाला, मलभेदक तथा वातनाशक होता है ॥ ७ ९ ॥ वृषं तु वमिकासघ्नं रक्तपित्तहरं परम् । अन्य अनेक द्रव्य हैं । पाक में मधुर तथा भोजन के ७ ९ ॥ पित्तवर्धक, जठराग्नि को प्रदीप्त
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१०४ अष्टाङ्गहृदये अडूसा का वर्णन — अडूसा के पत्तों का शाक वमन, कास ( खाँसी ) तथा रक्तपित्तरोग का नाश
करने में उत्तम होता है ।
कारवेल्लं सकटुकं दीपनं कफजित्परम् ॥ ८० ॥
करेला का शाक — यह कुछ कटु ( तिक्तरस युक्त ), अग्निदीपक तथा कफनाशक द्रव्यों में उत्तम है ॥८० ॥
वक्तव्य — लोलिम्बराज ने करेला का आलंकारिक वर्णन किया है । देखें — वैद्यावतंस । वार्ताकं कटु तिक्तोष्णं मधुरं कफवातजित् । सक्षारमग्निजननं हृद्यं रुच्यमपित्तलम् ॥ ८१ ॥
बैगन का शाक — यह दो प्रकार का होता है —१. कटु तथा तिक्त, २. मधुर । दोनों प्रकार के बैगन उष्णवीर्य, कफ तथा वात नाशक होते हैं । इनमें कुछ क्षार अंश भी होता है । ये जठराग्नि को बढ़ाने वाले, हृदय के लिए हितकर, रुचिकारक तथा कुछ पित्तकारक भी होते हैं ॥ ८१ ॥।
वक्तव्य — ‘ अपित्तलम्’– यहाँ पित्त शब्द के साथ जो नञ्समास किया गया है, वह ' ईषत् ' अर्थ में है, ऐसा समझना चाहिए । श्रीहेमाद्रि कहते हैं— ' अपित्तलत्वं बालपक्वञ्यतिरेकेण ' । यहाँ श्रीहेमाद्रि ने सुश्रुतसम्मत व्याख्यान किया है । देखें— ' जीर्णं सक्षारपित्तलम् ' । ( सु.सू. ४६ / २६ ९ ) करीरमाध्मानकरं कषायं स्वादु तिक्तकम् । करीर का शाक- -यह आध्मान ( अफरा ) कारक होता है, रस में कषाय, मधुर कोशातकावल्गुजकौ भेदिनावग्निदीपनौ ॥। ८२ ॥ तोरई तथा बाकुची का शाक — ये दोनों बँधे हुए मल का भेदन करने वाले हैं ॥ ८२ ॥
तण्डुलीयो हिमो रूक्षः स्वादुपाकरसो लघुः । मदापेत्तविषास्रघ्नः-तथा तिक्त होता है । तथा अग्निदीपक होते तण्डुलीय ( चौलाई ) का शाक — यह शीतवीर्य, रूक्ष, रस तथा पाक में मधुर एवं लघु होता है । यह मदविकार ( मदात्यय ), पित्तविकार, विषविकार तथा रक्तविकार ( विशेषकर रक्तप्रदर ) का विनाश
करता है ।
-मुञ्जातं वातपित्तजित् ॥ ८३ ॥
स्निग्धं शीतं गुरु स्वादु बृंहणं शुक्रकृत्परम् । मुञ्जातक ( कन्द - विशेष ) का शाक- -यह वात तथा पित्तविकारों का नाशक होता है; स्निग्ध, शीत, गुरु, स्वाद में मधुर, शरीर को पुष्ट करने वाला तथा शुक्रवर्धक होता है । ८३ ॥ गुर्वी सरा तु पालङ्कया— पालक का शाक- -यह गुरु होने के कारण देर में पचता है तथा मलभेदक होता है । देशभेद से
इसका स्वादभेद भी देखा जाता है ।
-मदघ्नी चाप्युपोदका ॥। ८४ ॥
उपोदिका ( पोई ) का शाक — यह भी गुरु एवं सर गुणों से युक्त होती है तथा मद का नाश भी करती है ॥८४ ॥
पालङ्कयावत्स्मृतश्चञ्चुः स तु सङ्ग्रहणात्मकः । चञ्चु का शाक — इसके सामान्य गुण पालक के समान होते हैं । इसका विशेष गुण है— ग्राही होना ।