श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 31–40
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 31–40
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( ३१ ) विषय स्नेहनस्य से लाभ ( २१ ) धूमपानविधिरध्यायः धूमपानविधि का वर्णन धूम के भेद तथा प्रयोग धूमपान का निषेध धूमपान से हानि धूमपानजनित रोगों की चिकित्सा त्रिविध धूम ' के सेवनकाल धूमनेत्र का वर्णन धूमनेत्र की लम्बाई धूमपान की विधि नासिका एवं मुख से धूमपान धूम का निर्हरण नासिका से धूम न निकालें तीन बार धूमपान करें धूमपान की संख्या मृदुधूम के द्रव्य मध्यधूम के द्रव्य तीक्ष्णधूम के द्रव्य धूम्रवर्ति - निर्माणविधि कासघ्न धूमपान -विधि -1 धूमपान के लाभ ( २२ ) गण्डूषादिविधिरध्यायः गण्डूष के भेद गण्डूषों के प्रयोग स्निग्ध- - गण्डूष शमन - गण्डूष शोधन - गण्डूष रोपण - गण्डूष गण्डूषों में द्रव्यप्रयोग रोगानुसार गण्डूषयोग स्वस्थ के लिए गण्डूष घी या दूध का गण्डूष मधुगण्डूष - प्रयोग काञ्जी के गण्डूष क्षाराम्बुगण्डूष सुखोष्णोदकगण्डूष गण्डूष -प्रयोगविधि - प्र गण्डूषधारण - अवधि पृष्ठांक | विषय २५० गण्डूष एवं कवल परिभाषा कवलधारण के लाभ २५१ प्रतिसारण के भेद २५१ प्रतिसारण का प्रयोग २५२ मुखालेप के तीन भेद २५२ मुखालेप का उपयोग २५२ मुखालेप का प्रमाण २५२ लेपसम्बन्धी निर्देश २५२ मुखालेप में अपथ्य २५२ | मुखालेप का निषेध २५३ मुखालेप का सम्यग्योग २५३ मुखालेप के ६ योग २५३ | मुखालेप से लाभ २५३ | मूर्धतैल के ४ भेद २५३ | उत्तरोत्तर गुणवत्ता २५३ अभ्यंग का प्रयोग २५४ परिषेक का प्रयोग २५४ | पिचु का प्रयोग २५४ बस्ति का प्रयोगस्थल २५४ | शिरोबस्ति - सेवनविधि २५४ शिरोबस्ति - धारणकाल २५५ पश्चात् - कर्म शिरोबस्तिसेवन - अवधि २५६ | कर्णपूरण का काल २५६ | मात्राकाल की परिभाषा २५६ | मूर्धतैल का फल २५६ ( २३ ) आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः २५६ आश्चोतन का वर्णन २५६ | दोषानुसार आश्चोतन २५७ आश्चोतन - विधि २५७ आश्चोतन का निषेध २५७ आश्चोतन के लाभ २५७ अंजनप्रयोग के लाभ २५७ अंजन के तीन भेद २५७ लेखन अंजन - परिचय २५७ रोपण अंजन - परिचय २५८ प्रसादन अंजन - परिचय २५८ प्रत्यञ्जन २५८ । अञ्जनशलाका
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( ३२ ) विषय अञ्जनों की त्रिविध कल्पना अञ्जनों की मात्रा तीक्ष्ण अञ्जनों की मात्रा अञ्जनप्रयोग - निर्देश अन्य आचार्यों का मत तीक्ष्णाञ्जन का रात्रिप्रयोग उष्णकाल में तीक्ष्णाञ्जन- निषेध लौह एवं नेत्र की समानता तीक्ष्ण अञ्जन का निषेध अञ्जन के अयोग्य व्यक्ति निषिद्ध अञ्जन का वर्णन अञ्जन - प्रयोगविधि नेत्रप्रक्षालन - विधि नेत्रशोधन - विधि नेत्रशोधन में हेतु तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान प्रत्यञ्जन का वर्णन ( २४ ) तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः तर्पणविधि - वर्णन तर्पण की दूसरी विधि स्नेह - धारणकाल तर्पण का पश्चात् कर्म दोषानुसार तर्पण तर्पण के विविध योग पुटपाक का वर्णन दोषानुसार पुटपाक - प्रयोग स्नेहन पुटपाक के द्रव्य लेखन पुटपाक के द्रव्य प्रसादन पुटपाक के द्रव्य पुटपाक - रचनाविधि धारणकाल - अवधि उष्णशीत- प्रयोगभेद पश्चात्- -कर्म योगों का निर्देश तर्पण एवं पुटपाक का निषेध तर्पण एवं पुटपाक की अवधि नेत्ररक्षा की आवश्यकता ( २५ ) यन्त्रविधिरध्यायः यन्त्रों का वर्णन पृष्ठांक | विषय २६५ यन्त्रों की विविधता २६५ स्वस्तिकयन्त्र - परिचय २६५ सन्दंशयन्त्र - परिचय २६६ | सन्दंशयन्त्र के भेद २६६ | मुचुण्डीयन्त्र का वर्णन २६६ तालयन्त्र - परिचय २६६ नाड़ीयन्त्र - परिचय २६६ | कण्ठशल्यावलोकनी नाड़ी २६६ द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाड़ीयन्त्र २६७ विविध नाड़ीयन्त्र २६७ शल्यनिर्घातनी नाड़ी २६७ | अर्शोयन्त्र - परिचय २६७ शमीयन्त्र - परिचय २६७ | भगन्दर - यन्त्र २६७ घ्राणयन्त्र - परिचय २६८ | अंगुलित्राणक यन्त्र २६८ योनिव्रणेक्षण यन्त्र नाड़ीव्रण के यन्त्र २६ ९ नाड़ीयन्त्र २६ ९ | अन्य अनेक यन्त्र २७० श्रृंगनाड़ीयन्त्र २७० तुम्बीयन्त्र - परिचय २७० घटीयन्त्र - परिचय २७० शलाकायन्त्र २७१ एषणी शलाका २७१ | स्रोतःशल्यहारिणी शलाका २७१ छः शंकुयन्त्र २७१ व्यूहन शंकुयन्त्र २७१ चालन शंकुयन्त्र २७२ आहार्य शंकुयन्त्र २७२ | गर्भशंकुयन्त्र २७२ अश्मरीहरण यन्त्र २७२ दन्तपातन यन्त्र २७२ प्रमार्जनी शलाकायन्त्रं २७२ | पायुयन्त्र २७२ घ्राण एवं कर्णयन्त्र * २७३ कर्णशोधन - यन्त्र विविध शलाकायन्त्र २७४ | अनुयन्त्रों का वर्णन
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विषय यन्त्रों के विविध कर्म कंकमुख यन्त्र ( २६ ) शस्त्रविधिरध्यायः शस्त्रों का वर्णन मण्डलाग्रशस्त्र वृद्धिपत्रशस्त्र उत्पल, अध्यर्धधारक शस्त्र सर्पवक्त्र - शस्त्र १. एषणी - शस्त्र २. एषणी - शस्त्र वेतस - शस्त्र शरारिमुख, त्रिकूर्चक शस्त्र कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र अन्तर्मुख - शस्त्र व्रीहिमुख- -शस्त्र कुठारी -शस्त्र - I ताम्रशलाका - शस्त्र अंगुली - शस्त्र बडिश - शस्त्र करपत्र - शस्त्र कर्तरी - शस्त्र नख - शस्त्र दन्तलेखनक - शस्त्र सूचीशस्त्र कूर्च - शस्त्र खजशस्त्र यूथिका - शस्त्र आराशस्त्र कर्णबेधनी सूची अनुशस्त्रों का परिगणन शस्त्रकर्मों का वर्णन शस्त्रों के आठ दोष शस्त्रग्रहण - विधि शस्त्रकोष का विस्तार जौंकों का प्रयोग त्याज्य जौंकों का वर्णन त्याज्य जौंकों का निषेध ग्राह्य जौंकों का वर्णन त्याज्य जौंकों के लक्षण ३ अ ० भू ० ( ३३ ) पृष्ठांक | विषय २८२ जौंक रखने एवं लगाने की विधि २८२ दुष्टरक्तग्रहण - दृष्टान्त जौंक छुड़ाने की स्थिति २८३ | जौंक का उपचार २८४ रक्तमद से रक्षा २८४ | रक्तवमन का सम्यग्योग २८४ | रक्तवमन का अतियोग २८४ रक्तवमन का मिथ्यायोग २८४ | जलौका - पालनविधि २८४ | जलौकावचारण का पश्चात् कर्म २८५ | रक्तावरोधक उपचार २८५ रक्तस्रावण का फल २८५ पुनः रक्तस्रावण २८५ अलाबूयन्त्र निषिद्ध २८५ | अलाबूयन्त्रप्रयोग विहित २८५ | श्रृंगयन्त्रप्रयोग - निषेध २८५ श्रृंगयन्त्रप्रयोग - निर्देश २८६ प्रच्छानकर्म - निर्देश २८६ प्रच्छान आदि का विकल्प २८६ जलौका - प्रयोग २८६ तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र २८६ | सिरावेध - प्रयोग २८६ रक्तस्रावण - विधिविकल्प २८६ | रक्तस्रावण में उपद्रव एवं शान्ति २८७ ( २७ ) सिराव्यधविधिरध्य २८७ शुद्धरक्त का वर्णन २८७ रक्तदूषक तत्त्व २८७ | रक्तज रोग २८७ सिरावेध का निर्देश २८८ | सिरावेध - विधि २८८ रोगविशेष में सिरावेध २८८ | कर्णरोग में सिरावेध २८८ नासारोग में सिरावेध २८ ९ पीनसरोग में सिरावेध २८ ९ | मुखरोग में सिरावेध २८ ९ | जत्रूर्ध्वरोगों में सिरावेध २८ ९ उन्मादरोग में सिरावेध २ ९ ० अपस्माररोग में सिरावेध २ ९ ० । विद्रधि एवं पार्श्वशूल में सिरावेध
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विषय तृतीयकज्वर में सिरावेध चतुर्थकज्वर में सिरावेध प्रवाहिकारोग में सिरावेध शुक्र एवं शिश्नरोगों में सिरावेध गलगण्डरोग में सिरावेध गृध्रसीरोग में सिरावेध अपचीरोग में सिरावेध प्रमुख वातरोगों में सिरावेध पाददाह आदि में सिरावेध विश्वाचीरोग में सिरावेध अन्यत्र सिरावेध - निर्देश सिरायन्त्रण - विधि सिरावेधन - विधि कुठारिका - प्रयोग उपनासिका - सिरावेध जिह्वासिरावेध ग्रीवासिरावेध बासिरावेध पार्श्वस्थ सिरावेध लिंग का सिरावेध जंघासिरावेध पादसिरावेध सिरावेध - निर्देश वेध का परिमाण सम्यक् वेध का वर्णन दुर्वेध आदि का वर्णन रक्त न बहने के कारण रक्तस्रावण के उपाय रक्तस्राव वर्णन स्रावण - उपायों का निषेध मूर्च्छा में कर्तव्य वातदूषित रक्त के लक्षण पित्तदूषित रक्त के लक्षण कफदूषित रक्त के लक्षण द्वन्द्वज रक्त के लक्षण त्रिदोषज रक्त के लक्षण सिरावेध में रक्त का परिमाण विविध चिकित्सा उपचार - विधि ( ३४ ) पृष्ठांक | २ ९ ६ २ ९ ६ २ ९ ६ २ ९ ८ २ ९ ७ २ ९ ७ २ ९ ७ २ ९ ७ २ ९ ७ | २ ९ ७ २ ९ ७ २ ९ ७ २ ९ ८ २ ९ ८ २ ९ ८ २ ९ ८ | २ ९ ८ २ ९९ २ ९९ २ ९९ २ ९९ २ ९९ २ ९९ २ ९९ विषय | पुनः सिरावेध | अधिक रक्तस्राव का निषेध | श्रृंगयन्त्र का प्रयोग | रक्तशुद्धि के उपाय | स्तम्भनक्रिया - निर्देश | रक्तस्तम्भन - उपचार | रक्तस्रावण का पश्चात् कर्म रक्तस्रावण में पथ्य रक्तशुद्धि के लक्षण ( २८ ) शल्याहरणविधिरध्यायः शल्य की गतियाँ अन्तःशल्य के लक्षण | त्वचागत शल्य के लक्षण | मांसगत शल्य के लक्षण | पेशीगत शल्य के लक्षण स्नायुगत शल्य के लक्षण | सिरागत शल्य के लक्षण स्रोतोगत शल्य के लक्षण धमनीगत शल्य के लक्षण | अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण अस्थिगत शल्य के लक्षण सन्धिगत शल्य के लक्षण | कोष्ठगत शल्य के लक्षण | मर्मगत शल्य के लक्षण २ ९९ | सामान्य निर्देश २ ९९ ३०० ३०० ३०० ३०० ३०० ३०० ३०१ ३०१ ३०१ ३०१ ३०१ ३०१ ३०१ शल्यव्रण का रोपण पुनः पीड़ाकर्तृत्व शल्यज्ञान के उपाय मांसगत शल्य | पेशी आदिगत शल्य | अस्थिगत शल्य | सन्धिगत शल्य स्नायु आदिगत शल्य मर्मगत शल्य सामान्य निर्देश शल्य के स्वरूपों का अनुमान शल्यनिर्हरण के उपाय अर्वाचीन आदि शल्य | तिर्य्यग्गत शल्य
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( ३५ ) विषय निर्घातन के अयोग्य शल्य विशल्यघ्न शल्याहरण- निषेध शल्यनिर्हरण - विधि दृश्यशल्यनिर्हरण अदृश्यशल्यनिर्हरण संदेशयन्त्र - प्रयोग तालयन्त्र- प्रयोग नाड़ीयन्त्र - प्रयोग शेषयन्त्र- प्रयोग निर्हृत शल्य का पश्चात्कर्म सिरा, स्नायुगत शल्य हृदयगंत शल्य शल्याहरण की अन्य विधि अस्थिगत शल्य दूसरी विधि तीसरी विधि चौथी विधि पाँचवीं विधि छठी विधि सातवीं विधि आठवीं विधि नवीं विधि दसवीं विधि पक्वाशयगत शल्य वात आदि शल्य कण्ठस्रोतोगत शल्य जतु शल्यनिर्हरण अन्य शल्यनिर्हरण गले में फँसे हुए शल्य को निकालना आँख एवं व्रण में पड़े शल्य को निकालना उदरगत जल निकालने की विधि कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि शरीर में शल्य का विलयन विलीन न होने वाले शल्य शल्यनिर्हरणोपाय शल्यनिर्हरण - निर्देश ( २ ९ ) शस्त्रकर्मविधिरध्यायः व्रण के उपचार व्रणशोथ - चिकित्सा पृष्ठांक | विषय ३०८ आमशोथ के लक्षण ३०८ | पच्यमान व्रणशोथ के लक्षण ३० ९ | पक्वशोथ के लक्षण ३० ९ व्रण में वात आदि के लक्षण ३० ९ | अतिपक्व व्रण के लक्षण ३० ९ गम्भीर पाक का वर्णन ३० ९ दारण एवं पाटन लेप ३० ९ शस्त्रकर्म का निषेध ´ ३० ९ शस्त्रकर्म का विधान ३० ९ अनिश्चितकारी वैद्य की निन्दा ३० ९ शस्त्रकर्म के पूर्वकर्म ३१० आहार एवं मद्यपान का निषेध ३१० शस्त्रप्रयोग - विधि ३१० महान् व्रणशोथ में कर्तव्य ३५० प्रशस्त शल्यचिकित्सक ३१० तिर्यक्छेदन - विधि ३१० पश्चात्कर्म - निर्देश ३१० पट्टी आदि का निर्देश ३१० व्रणरक्षा - विधान ३१० औषधधारण - निर्देश ३११ आचार- र - निर्देश ३११ दिन में सोने का निषेध ३११ अन्य निषिद्ध कर्म ३११ व्रणरोगी का आहार ३११ लाभ एवं हानि ३११ त्याज्य आहार ३११ व्रणोपचारार्थ उपदेश ३११ पुनः प्रक्षालन आदि कर्म ३१२ | विकेशिका - वर्णन ३१२ | इनके दुष्परिणाम ३१२ विकेशिका का सदुपयोग ३१२ विदग्धव्रण का उपचार ३१३ सद्योव्रण के उपचार ३१३ सीवनकर्म का निषेध ३१३ सीवनकर्म - विधि ३१४ | सीवन का पश्चात् कर्म सीवन कर्म का निर्देश ३१५ बन्धनद्रव्यों का वर्णन ३१५ | बन्धनभेदों का निर्देश
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विषय पुनः बन्धभेद - निर्देश व्रणबन्धन आवश्यक व्रणबन्धन से लाभ पत्रदान- उपक्रम व्रणबन्धन का निषेध व्रणज क्रिमियों का वर्णन • रोपण में शीघ्रता का निषेध रोपण के पश्चात् कर्म चिकित्सा - निर्देश ( ३० ) क्षाराग्निकर्मविधिरध्यायः क्षार - प्रशंसा पानीयक्षार - प्रयोग अन्यत्र क्षार - प्रयोग क्षारप्रयोग का निषेध मध्यम क्षारनिर्माण की विधि क्षारगालन - विधि मृदु क्षार बनाने की विधि तीक्ष्ण क्षार बनाने की विधि तीक्ष्ण, मध्य, मृदु क्षारों के प्रयोग क्षार के १० गुण क्षार का सम्यक् योग क्षारप्रयोग की विधि अर्शों पर क्षार - प्रयोग वर्त्मरोगों पर क्षार प्रयोग नासार्श पर क्षार - प्रयोग कर्णार्श पर क्षार - प्रयोग क्षार का पश्चात् कर्म क्षारदग्ध व्रण का रोपण सम्यग्दग्ध के लक्षण ( ३६ ) पृष्ठांक | विषय ३२४ | दुर्दग्ध के लक्षण ३२५ | पुनः क्षार - प्रयोग ३२५ | अतिदग्ध के लक्षण ३२५ | अतिदग्ध गुद के लक्षण ३२६ | अतिदग्ध नासा के लक्षण ३२६ श्रोत्रादि दग्ध के लक्षण ३२६ क्षार का शमन कर्म ३२७ क्षारप्रयोग से हानि - लाभ ३२७ | अग्निकर्म की प्रधानता अग्निकर्म का प्रयोग ३२८ | त्वचारोगों में अग्निकर्म ३२८ मांसरोगों में अग्निकर्म ३२८ सिरादि रोगों में अग्निकर्म ३२ ९ अग्निकर्म का निषेध ३२ ९ सम्यग्दग्ध का पश्चात् कर्म ३३० सम्यग्दग्ध का लक्षण ३३० दुर्दग्ध आदि के लक्षण ३३० अग्निदग्ध के भेद ३३० ३३० | तुच्छ ( त्थ ) दग्ध के लक्षण ३३१ दुर्दग्ध के लक्षण ३३१ अतिदग्ध के लक्षण ३३१ अग्निदग्ध की चिकित्सा ३३१ दुर्दग्ध की चिकित्सा ३३१ सम्यग्दग्ध -चिकित्सा -1 ३३१ अतिदग्ध - चिकित्सा ३३१ स्नेहदग्ध - चिकित्सा ३३२ | शस्त्र आदि का प्रयोग ३३२ | विविध सूत्रों का वर्णन
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॥ श्रीः ॥ श्रीमद्वाग्भटविरचितम् अष्टाङ्गहृदयम् ' निर्मला ' भिधया हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विभूषितम् सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः मङ्गलाचरणम्
रागादिरोगान् सततानुषक्तानशेषकायप्रसृतानशेषान् ।
औत्सुक्यमोहारतिदाञ्जघान योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १ ॥
व्याख्याकर्तुर्मङ्गलाचरणम् धन्वन्तरिं पशुपतिं गिरिजां गणेशं नत्वाऽधुना चरकसुश्रुतवाग्भटादीन् । स्मृत्वा भिषग्गुरुवरान् यशसा समृद्धान् श्रीलालचन्द्रचरणान् प्रणतोऽस्मि शश्वत् ॥ १ ॥
युगानुरूपसन्दर्भसंज्ञया सफलीकृतम् । अष्टाङ्गहृदयं येन वाग्भटं तं स्मराम्यहम् ॥२ ॥
कृपाकटाक्षतो येषां प्रवृत्तोऽस्म्यल्पधीरपि । टीकायां वाग्भटस्यास्य वन्दे तान् गुरुपुङ्गवान् ॥ ३ अष्टाङ्गहृदये टीकाः प्राप्यन्ते पूर्वसूरिणाम् । तथाप्यभिनवां कुर्वे ' निर्मलां ' विशदार्थदाम् ॥ ४ ॥
तारादत्ततनूजस्य ब्रह्मानन्दत्रिपाठिनः । अनया टीकया भूयात् सन्तोषो विदुषां सताम् ॥५ ॥
यदि कथमपि किञ्चिद् बुद्धिदोषात् प्रमादान्मनुजसुलभभावाट्टीकने वाग्भटस्य ।
स्खलनमिह भवेच्चेन्मत्कृतं तत्क्षमन्तां प्रसृतयुगकराब्जो याचतेऽयं त्रिपाठी ॥ ६ ॥
जो राग आदि रोग सदा मानव मात्र के पीछे लगे रहते हैं, जो सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं और जो उत्सुकता, मोह तथा अरति ( बेचैनी ) को उत्पन्न करते रहते हैं, उन अपूर्व वैद्य को हमारा ( ग्रन्थकार का ) नमस्कार हो ॥ १ ॥
वक्तव्य — रागादिरोगान् — राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, कहा गया है । इन मानसिक रोगों में मन आदि का आधार देह है, अतः के साथ - ही - साथ देह को भी पीड़ित करते हैं । जैसे तपा हुआ लोहे का में रखा रहेगा उसे भी तपाता है, ठीक उसी प्रकार राग आदि मानसिक पीड़ित करते हैं । शुद्ध चित्त वाले पुरुष को ये रागादि रोग नहीं होते । सबको जिसने नष्ट किया उस ईर्ष्या आदि को मानसिक रोग ये रोग़ आधाराधेयभाव से मन गोला जिस कड़ाही आदि पात्र रोग मन के साथ देह को भी
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अष्टाङ्गहृदये अशेषकायप्रसृतान् — जैसा कि ऊपर कहा गया है कि रागादि दोषों का प्रभाव मन तथा शरीर दोनों पर पड़ता है, अतएव ये उत्सुकता ( इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने की प्रबल अभिलाषा ), मोह ( यह कार्य करना चाहिए या नहीं— इसका ज्ञान न होना ) तथा अरति ( किसी एक स्थान पर खड़ा होना या बैठने की इच्छा का न होना अर्थात् बेचैनी ) — इन कारणों से मानव की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति विषम हो जाती है, क्योंकि ये रोग सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं, इस वाक्य से समस्त शरीरधारियों वे सभी रोगों का ग्रहण किया गया है । ‘ औत्सुक्य ' शब्द की ऊपर व्याख्या की गयी है, तदनुसार श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिया सन्देश भी यहाँ स्मरणीय है — ‘ ध्यायतो विषयान् पुंसः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' ॥ ( गीता २१६२-६३ ) अर्थात् इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों को प्राप्त करने की जब मानव चिन्ता करता है तो सर्वप्रथम उसके वास्तविक मार्ग में रुकावट आती है अर्थात् राग ( रजोगुण ) का उदय होता है, इससे कामवासना का जन्म होता है, असफलता मिलने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है. क्रोध के बाद सम्मोह ( चित्त में अनेक विकारों का उदय ) होता है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृतिविभ्रम से बुद्धि ( विवेकशक्ति ) का नाश हो जाता है और बुद्धिनाश से मानव के इस लोक तथा परलोक सभी का नाश हो जाता है । यही विनाशक्रम है ‘ रागादि रोगों ' का । अपूर्ववैद्याय – श्री अरुणदत्त कहते हैं— ' पूर्वेभ्यः अपने राग आदि दोषों को नष्ट करके फिर प्राणिमात्र को उसे श्रीवाग्भट ग्रन्थारम्भ में प्रणाम करते हैं । वाग्भट नाम से ‘ अष्टांगसंग्रह ' तथा ' अष्टांगहृदय ' संग्रह - सूत्रस्थान के प्रथम मंगलाचरण पद्य ' तृष्णादैर्घ्य हमें ' धम्मपद ' यमक वर्ग के एक पद्य का स्मरण हो आता ‘ अल्पामपि संहितां भाषमाणो रागद्वेषं प्रहाय मोहं सम्यक् प्रथमः ' अर्थात् सर्वप्रथम या सर्वश्रेष्ठ वैद्य, जिसने रोगों से मुक्त होने के उपायों का सदुपदेश दिया, दोनों ग्रन्थ जुड़े हैं । इस दृष्टि से जब हम अष्टाङ्ग-बुद्धाय तस्मै नमः ' का अवलोकन करते हैं, तो है, जो इस प्रकार है—
धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी ।
प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः ॥
अनुपादददिह वाऽमुत्र वा स भगवान् श्रामण्यस्य भवति ' अर्थात् जो मनुष्य थोड़ी - सी भी धर्मसंहिता को पढ़कर उसके अनुसार स्वयं धर्म का आचरण करने लगता है और जो राग - द्वेष आदि मानसिक विकारों का परित्याग करके सांसारिक कर्मों को भलीभाँति जानता हुआ भी उनका ग्रहण न करता हुआ विमुक्त ( उन कर्मों के प्रति अनासक्तभाव से ) रहता है, वह इस लोक तथा परलोक में श्रमणता का अधिकारी बनकर बन्धनों ( रागादि रोगों ) से मुक्त रहता है । इसी के आगे अष्टांगसंग्रह का दूसरा पद्य भी प्रायः इसी आशय का है— रागादिरोगाः ' ' ' ' पितामहादीन् । पद्य का आशय इस प्रकार है - जिसने अपने तथा संसार के प्राणियों के स्वाभाविक राग आदि सब रोगों को जड़ से उखाड़ कर दूर फेंक दिया, उस एक मात्र वैद्य को तथा आयुर्वेदशास्त्र को जानने वाले अथवा उसके प्रवर्तक ब्रह्मा आदि को मैं प्रणाम करता हूँ । यहाँ भी पितामह आदि के पूर्वकथित ‘ तमेकवैद्यं ’ शब्द ‘ अपूर्ववैद्य ' का स्मारक है, अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि उक्त अष्टांगसंग्रहोक्त पद्य की भाषा को बदल कर ही अष्टांगहृदय यह पद्य कहा गया है । अथात आयुष्कामीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । अब हम यहाँ से आयुष्कामीय ( आयु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर है, उस ) अध्याय की व्याख्या करेंगे । वक्तव्य — ' अथातः ' पद में प्रयुक्त ' अथ ' मंगलवाचक शब्द है । ग्रन्थारम्भ में मंगल ( कल्याण ) वाचक शब्दों के प्रयोग का उद्देश्य यह होता है कि उस शास्त्र की पूर्ति तथा उसके अध्ययनकर्ताओं की अभीष्ट
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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है । जैसा कि कहा गया है— ' ॐकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तेनेमौ मङ्गलौ स्मृतौ ' ॥ आयुष्कामीयम् — आयुः ( दीर्घायुः पूर्णायुः च ) कामयन्ते ये ते आयुष्कामाः, तेभ्यो हितः अध्यायः आयुष्कामीयः ' । अर्थात् दीर्घायु अथवा पूर्णायु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर अध्याय है, उसे ' आयुष्कामीय ' अध्याय कहा जाता है । यहाँ प्रयुक्त ' आयुः ' शब्द की व्याख्या महर्षि आत्रेय के अनुसार इस प्रकार है — ‘ शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् । नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ' | ( च.सू. १।४१ ) अध्यायम् —पदसमुदाय का नाम ' वाक्य ' है । यथा— ' - ' सुप्तिङन्तचयो वाक्यम् ' । वाक्यों के समूह का नाम ' प्रकरण ' है, प्रकरण - समुदाय को ही ' अध्याय ' कहते हैं, अध्याय - समूह को ' स्थान ' कहते हैं । सूत्रस्थान आदि अन्य स्थानों के समूह को ' तन्त्र ' कहते हैं । जैसे — चरकतन्त्र, सुश्रुततन्त्र आदि । काव्यालंकार में इस प्रकार की वाक्यरचना को उत्तरालंकार कहते हैं । यथा- - ' ' उत्तरवचनश्रवणादुन्नयनं यत्र पूर्ववचनानाम् । क्रियते तदुत्तरं स्यादिति ' । चरक ने अपनी संहिता में इस प्रकार के आशय से सम्पन्न अध्याय का नाम ' दीर्घञ्जीवितीय ' रखा है । व्याख्यास्यामः — यद्यपि ' अष्टांगहृदय ' नामक तन्त्र का तन्त्रकार एक ( वाग्भट ) ही है, फिर यहाँ बहुवचन के प्रयोग की क्या आवश्यकता है? इसका व्याकरणसम्मत समाधान इस प्रकार है — ' अस्मदो द्वयोश्च ( १।२।५ ९ ) – एकत्वे द्वित्वे च विवक्षितेऽस्मदो बहुवचनं वा स्यात् ' । जैसे — हम जा रहे हैं अथवा
मैं जा रहा हूँ ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था । वक्तव्य — महर्षि वाग्भट का कथन है कि प्रस्तुत तन्त्र में जो कुछ भी कहा गया है, वह महर्षि आत्रेय तथा धन्वन्तरि आदि महर्षियों के वचनों के अनुसार ही कहा गया है । ये आप्त पुरुष थे, क्योंकि प्रामाणिकता आप्तपुरुषों के वचनों में ही होती है । इसीलिए हमने उक्त महर्षियों के वचनों का अनुसरण किया है, अतएव हमारे इस तन्त्र में भी कोई अप्रामाणिक विषय नहीं आया है, इसलिए हम ( वाग्भट ) भी आप्त ( प्रामाणिक ) हैं । इसीलिए अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने कहा है— ' न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम् ' । ( अ.सं. ११२२ ) अर्थात् इस ग्रन्थ में मात्रा ( अ, आ, बिन्दु, विसर्ग ) आदि भी आगम ( शास्त्र ) से अतिरिक्त नहीं है अर्थात् जो भी कहा या लिखा गया है, वह सब शास्त्रानुकूल ही है । इस
कथन के द्वारा महर्षि ने अपने को तथा अपने ग्रन्थ को प्रामाणिक सिद्ध किया है ।
आयुः कामयमानेन धर्मार्थसुखसाधनम् । आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः॥२ ॥
आयुर्वेद का प्रयोजन — धर्म, अर्थ, सुख ( काम ) नामक इन तीन पुरुषार्थों का साधन ( प्राप्ति का उपाय ) आयु है, अतः आयु ( सुखायु ) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों में परम ( विशेष ) आदर करना चाहिए ॥ २ ॥
वक्तव्य — शास्त्रों में उपदेश दो प्रकार के मिलते हैं— एक विधानात्मक ( इन्हें करना चाहिए ) और दूसरे निषेधात्मक ( इन्हें नहीं करना चाहिए ) । इस प्रकार के उपदेशों के प्रति समाज का आदर भाव होना चाहिए अर्थात् इस प्रकार आप्त ( विश्वसनीय अतएव प्रामाणिक महर्षि ) वचनों की उपेक्षा करने से सुखायु की प्राप्ति नहीं हो पाती है । हमें तो हितायु, सुखायु तथा दीर्घायु की कामना करनो है, अतः महर्षियों के त्रिकालसत्य उपदेशात्मक वचनों के प्रति परम आदर करना ही चाहिए ।
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अष्टाङ्गहृदये महर्षि चरक ने ‘ आयुर्वेद ' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है – ' हिताऽहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताऽहितम् । मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ ( च.सू. १।४१ ) जिस शास्त्र में आयु, अहित आयु, सुख आयु तथा दुःख आयु का वर्णन हो एवं आयु के हित - अहित के लिए आहार - विहार तथा औषधों का वर्णन हो और आयु के मान ( प्रमाण ) का निर्देश किया गया हो; साथ ही आयु का भी वर्णन हो, उसे ' आयुर्वेद ' कहते हैं । हित, अहित, सुख तथा दुःख आयु का वर्णन च.सू. ३०।२० - २५ में विस्तार से देखें । धर्मार्थसुखसाधनम् —'धर्म ' – आजकल धर्माचार्य इस शब्द की अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं, किन्तु आयुर्वेदशास्त्रसम्मत व्याख्या इस प्रकार है— ' ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः ' । जिससे लोक का धारण - पोषण होता है । ' अर्थ ' - ' अर्थ्यते याच्यते इति अर्थ: ' अर्थात् जिसे समाज प्राप्त करना चाहता है । यथा— धन - सम्पत्ति तथा जीवनोपयोगी समस्त साधन । सुख —यह दो प्रकार का होता है, एक सुख वह है जिससे तत्काल सुख की प्रतीति होती है और दूसरा सुख वह होता है जिसे ' आत्यन्तिक ' कहते हैं, वह सुख है — मोक्षप्राप्ति । अथवा इस सुख को ऐहिक ( इस लोक से सम्बन्धित ) तथा पारलौकिक ( परलोक से सम्बन्धित ) रूप से समझा जा सकता है । तत्काल मिलने वाले सुख की महर्षि चरक ने निन्दा की है । देखें — च.सू. २८ | ४० । गीता में भी कहा गया है— ' ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ’ ॥ ( ५।२२ ) आयुर्वेदोपदेशेषु — प्राचीन काल से ही आयुर्वेदशास्त्र सम्बन्धी अनेक संहिताएँ विद्यमान हैं, उनमें विविध प्रकार के उपदेश मिलते हैं, उन सभी के प्रति व्यावहारिक आदरभाव रखना चाहिए । यही यहाँ उक्त वाक्य में प्रयुक्त बहुवचन की सार्थकता है । ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत् । सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन् ॥ तेऽग्निवेशादिकांस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे । आयुर्वेदावतरण — ब्रह्माजी ने सबसे पहले आयुर्वेदशास्त्र का स्मरण ( ध्यान ) करके उसे दक्षप्रजापति को ग्रहण कराया अर्थात् पढ़ाया था । दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को पढ़ाया था, अश्विनीकुमारों ने देवराज इन्द्र को पढ़ाया था, उन्होंने अत्रिपुत्र ( पुनर्वसु आत्रेय ) आदि महर्षियों को पढ़ाया था; आत्रेय आदि ने अग्निवेश, भेड़, जतूकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि आदि को पढ़ाया था और फिर अग्निवेश आदि महर्षियों ने अलग - अलग तन्त्रों ( आयुर्वेदशास्त्रों ) की विस्तार के साथ रचना की ॥ ३ ॥
वक्तव्य- -यह वाग्भटोक्त आयुर्वेद की अवतरणिका है । आयुर्वेदशास्त्र में ये अवतरणिकाएँ भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती हैं । पुराणों में भी ये स्वतन्त्र रूप से देखने को मिलती हैं । चरक - चिकित्सा-स्थान अ ० १ पाद ४।३ में कहा है कि एक बार देवराज इन्द्र के पास आयुर्वेद सम्बन्धी उपदेश सुनने के लिए भृगु, अंगिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि अनेक महर्षि गये थे । सुश्रुत - सूत्रस्थान १।३ में देवराज इन्द्र से धन्वन्तरि आदि ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था । उस काल में श्रुति ( श्रवण करना ) तथा स्मृति ( स्मरण करना ) ये ही विद्याप्राप्ति तथा संग्रह के उपाय थे । आयुषो वेदं - ' आयुषः सम्बन्धी वेदः आयुर्वेदः ', यहाँ सम्बन्ध का अर्थ है— पाल्य - पालक भाव । जैसा कि आचार्य ने अष्टांगसंग्रह में कहा है— ' आयुषः पालकं वेदमुपवेदमथर्वणः ' । ( अ.सं. सू. १।१० ) अर्थात्
अथर्ववेद का ही उपवेद यह आयुर्वेद है, जो आयु की रक्षा के उपदेशों का उपदेष्टा है ।
तेभ्योऽतिविप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्चयः ॥ ४ ॥
क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्क्षेपविस्तरम् ।