श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 41–50

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 41–50

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् अष्टांगहृदय का स्वरूप — महर्षि वाग्भट का कथन है कि इधर - उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम - से - उत्तम ( सार ) भाग को लेकर यह उच्चय ( संग्रह ) किया गया है । प्रस्तुत संग्रह - ग्रन्थ का नाम है — ‘ अष्टांगहृदय ' । इसमें प्राचीन तन्त्रों में वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से ही कहे गये हैं ॥ ४ ॥

वक्तव्य — अन्य ( इसके पहले लिखी गयी ) संहिताएँ या तो अत्यन्त संक्षिप्त रही हैं; जैसे — रविगुप्त विरचित ‘ सिद्धसारतन्त्र ’, यह आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया तथा अत्यन्त विस्तृत, जैसे — अष्टांगसंग्रह आदि । उसके बाद लिखा गया यह ' अष्टांगहृदय ' ग्रन्थ ऐसा है जैसा मानव शरीर में ' हृदय ' होता है, ऐसा स्वयं ग्रन्थकार ने इसी ग्रन्थ के उत्तरस्थान ( ४०।८ ९ ) में कहा है— ' हृदयमिव हृदयमेतत् ' । अतिविस्तृत ग्रन्थ सरलता से सबके समझ में नहीं आता है, अतएव यह ग्रन्थ सर्वसामान्य के लिए बुद्धिगम्य होगा, सोचकर ही इसकी रचना की गयी है । अन्य प्राचीन संहिताओं की तुलना में ' अष्टांगहृदय ' का प्रचार - प्रसार

भी अधिक है ।

कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् ॥५ ॥

अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता । आयुर्वेद के आठ अंग — १. कायचिकित्सा, २. बालतन्त्र ( कौमारभृत्य ), ३. ग्रहचिकित्सा ( भूतविद्या ), ४. ऊर्ध्वांगचिकित्सा ( शालाक्यतन्त्र ), ५. शल्यचिकित्सा ( शल्यतन्त्र ), ६. दंष्ट्राविषचिकित्सा ( अगदतन्त्र ), ७. जराचिकित्सा ( रसायनतन्त्र ) तथा ८. वृषचिकित्सा ( वाजीकरण - तन्त्र ) —ये आठ अंग कहे गये हैं । इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा आश्रित है ॥५ ॥

वक्तव्य — वाग्भट का यह पद्य अतिसंक्षेप का उदाहरण कहा जा सकता है, यद्यपि अन्य अंगों का अर्थ भले ही हम खींच - तान कर लगा लें, किन्तु ' दंष्ट्रा ' शब्द से प्राणिज विष के बाद स्थावर विष तथा गरविष का अर्थ निकालना अत्यन्त दुष्कर कर्म है । आचार्य अरुणदत्त ' दंष्ट्रा ' का अर्थ ' पीडाकरणसामान्य ' करते हैं । यह किसी भी विष से सम्भव है । यदि ' दंष्ट्रा ' शब्द को विष मात्र का उपलक्षण स्वीकार कर लिया जाय तो कुछ काम चल सकता है । आठों अंगों की गणना ऊपर कर दी गयी है, अब यहाँ उन अंगों का परिचय प्रस्तुत है । ( १ ) कायचिकित्सा – ' चिञ् चयने ' धातु से ' घञ् ' प्रत्यय तथा ' च ' के स्थान पर ' क ' करने से इसकी निष्पत्ति होती है । ' चीयते अन्नादिभिः इति कायः ' अथवा ' चीयते प्रशस्तदोषधातुमलैः इति कायः ' दोनों ही व्युत्पत्तियाँ यहाँ अपेक्षित हैं । इसी में सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है । अतः इसे कायचिकित्सा नामक प्रथम अंग कहते हैं । यह ' काय ' यौवन आदि अवस्थाओं वाला है । इस अंग के प्रधान तन्त्र ' अग्निवेशतन्त्र ' ( चरकसंहिता ), भेलसंहिता तथा हारीतसंहिता आदि हैं । ( २ ) बालतन्त्र या कौमारभृत्य — बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का अभाव होने के कारण इस अंग का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है । क्योंकि इनकी सभी प्रकार की औषधियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं । दूध भी इन्हें माता या धात्री ( धाय = उपमाता ) का देने की प्राचीन काल से व्यवस्था है, जिसका वर्णन साहित्यिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है । यहाँ एक शंका होती है कि बालकों की भाँति वृद्धों की चिकित्सा का भी स्वतन्त्र उपदेश आचार्यों ने क्यों नहीं किया? इसका समाधान इस प्रकार है— वृद्धावस्था पूर्ण युवावस्था के बाद में आती है, अतः इसकी चिकित्सा का अधिकांश अंग कायचिकित्सा में ही समाविष्ट हो जाता है और जो कुछ अंश शेष रह जाता है, उसके निराकरण के लिए ७ वें रसायनतन्त्र की व्यवस्था की गयी है । इस विषय का प्राचीन ग्रन्थ केवल ' काश्यपसंहिता ' है, जो सम्प्रति खण्डित उपलब्ध

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अष्टाङ्गहृदये होती है । इसके अतिरिक्त चरक शारीर अध्याय ८ तथा चरक - चिकित्सास्थान अध्याय ३०, सुश्रुत-शारीरस्थान अध्याय १० एवं सुश्रुत - उ. तं. अ. २७ से ३७ तक देखें । ( ३ ) ग्रहचिकित्सा ( भूतविद्या ) – इसमें देव, असुर, पूतना आदि ग्रहों से गृहीत ( आविष्ट ) प्राणियों के लिए शान्तिकर्म की व्यवस्था की जाती है । इनमें बालग्रह तथा स्कन्दग्रहों का भी समावेश है, साथ ही इनकी शान्ति के उपायों की भी चर्चा की गयी है । इस विषय का आज कोई प्राचीन स्वतन्त्र तन्त्र उपलब्ध नहीं है । केवल चरकसंहिता - निदानस्थान ७।१०-१६, चरक चि. ९।१६-२१ और सुश्रुतसंहिता-उत्तरतन्त्र अध्याय २७ से ३७ तक तथा अध्याय ६० में भूतविद्या का वर्णन मिलता है । इसके अतिरिक्त सुश्रुतसंहिता - सूत्रस्थान अध्याय ५।१७ - ३३ तक शस्त्रकर्म करने के बाद रक्षोघ्न मन्त्रों द्वारा रोगी की रक्षा का विधान कहा गया है । खेद है कि युगों से गुरु - परम्परा से चली आने वाली यह विद्या आज शोचनीय दशा को पहुँच गयी है, आज भी इसकी सुरक्षा के उपाय नहीं किये जा रहे हैं । ( ४ ) ऊर्ध्वाङ्गचिकित्सा ( शालाक्यतन्त्र ) – ऊर्ध्वजत्रुगत आँख, मुख, कान, नासिका आदि में आधारित रोगों की शलाका आदि द्वारा की जाने वाली चिकित्सा ही इस अंग का प्रधान क्षेत्र है । शालाक्यतन्त्र के नाम से आज कोई ग्रन्थ स्वतन्त्र रूप से नहीं मिलता । सुश्रुतसंहिता के उत्तरतन्त्र के अध्याय १ से १ ९ तक में उत्तमांग ( शिरः प्रदेश ) में स्थित नेत्ररोगों का, २० तथा २१ वें अध्यायों में कर्णरोगों का, २२ से २४ तक नासारोगों का और २५ एवं २६ वें अध्यायों में शिरोरोगों का वर्णन किया है । सुश्रुत - निदानस्थान में मुखरोगों का वर्णन तथा सुश्रुत - चिकित्सास्थान अध्याय २२ में मुखरोगों की चिकित्सा का उल्लेख किया है । चरक - चिकित्सास्थान अध्याय २६ में श्लोक १०४ से ११७ तक नासारोगनिदान, ११८ में शिरोरोगनिदान, ११ ९ से १२३ तक मुखरोगनिदान, १२७-१२८ में कर्णरोगनिदान तथा १२ ९ से १३१ तक नेत्ररोगनिदान का वर्णन मिलता है । वैसे भी शालाक्यतन्त्र पर अधिकारपूर्वक कुछ कहना यह चरक की प्रतिज्ञा के विरुद्ध विषय था । जैसा कि उन्होंने कहा है— ' पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः शस्तेति तेनाऽयत्र न नः प्रयासः ' । अतएव वे इसके विस्तार में नहीं गये । ( ५ ) शल्यतन्त्र — उक्त आयुर्वेद के आठ अंगों में यही अंग सबसे प्रधान है । क्योंकि प्रथम देवासुर-संग्राम में युद्ध में हुए घावों की सद्यःपूर्ति के लिए इसी की आवश्यकता पड़ी थी । उस समय देववैद्य अश्विनी-कुमारों ने इस तन्त्र का समुचित प्रयोग कर दिखाया था । आज भी शल्यचिकित्सा - कुशल चिकित्सक उनका प्रतिनिधित्व करते ही हैं । देखें - सु. सू. १।१७ तथा १८ । भगवान् धन्वन्तरि का अवतार शल्य आदि अंगों की पुनः प्रतिष्ठा के लिए ही हुआ था । देखें- सु. सू. १।२१ । कायचिकित्सा - प्रधान चरकसंहिता में भी अर्श, उदर तथा गुल्म आदि रोगों में शल्यकर्मविशेषज्ञ से सहायता लेने का संकेत है । मूलतः शल्यतन्त्र में यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है । ( ६ ) दंष्ट्राविषचिकित्सा ( अगदतन्त्र ) – महर्षि वाग्भट द्वारा रचित दोनों संहिताओं ( संग्रह तथा हृदय ) में अष्टाग रूपी आयुर्वेद का विभाजक सूत्र अविकल रूप से प्राप्त होता है । इससे हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इन्होंने सुश्रुतसंहिता को आदर्श मानकर ' सर्पकीटलूता ' आदि में प्रथम परिगणित ' सर्प ' शब्द को प्रमुख मानकर ' दंष्ट्रा ' शब्द का प्रयोग किया होगा, क्योंकि ' प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति ' यह सूत्र सर्वत्र अपनाया जाता है और सभी प्रकार के विषों में ' पीड़ाकरणसामान्य ' गुण तो होता ही है । अगदतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें सर्प आदि जंगम तथा वत्सनाभ आदि स्थावर विषों के लक्षणों का एवं विविध प्रकार के मिश्रित विषों ( गरविषों ) का वर्णन तथा उन - उनके शान्ति ( शमन ) के उपायों का वर्णन हो ।

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ७ सामान्य रूप से ‘ अगद ' शब्द औषध का पर्याय है । इसकी व्याख्या इस प्रकार मिलती है — ' न गदः अस्मात् ’ अथवा ‘ गदविरुद्धम् ' । ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ भी ' अगद ' शब्द का अर्थ रोग को दूर करना ही रहा होगा । अस्तु । सुश्रुत का सम्पूर्ण कल्पस्थान अगदतन्त्र है, जैसा कि सुश्रुत - सूत्रस्थान ( ३।२८ ) में कहा गया है-‘ अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात् ' ॥ इति । चूँकि इस कल्पस्थान में विषचिकित्सा की ही कल्पना की गयी है, अतः इसका नाम कल्पस्थान है । इस सन्दर्भ में चरक चिकित्सास्थान का ' विषचिकित्सित ’ नामक २३ वाँ अध्याय भी अवलोकनीय है । ( ७ ) जराचिकित्सा ( रसायनतन्त्र ) - - उक्त अगदतन्त्र के बाद रसायनतन्त्र के प्रस्तुतीकरण का औचित्य प्रतिपादित करते हुए श्री अरुणदत्त कहते हैं कि रसायनों के प्रयोग से विष का भी प्रभाव दूर हो जाता है । रसायन शब्द का विशेष परिचय देखें I च.चि. १।७-८ । रसायनतन्त्र उसे कहा गया है जो वयःस्थापन ( कुछ समय के लिए पुनः यौवन को स्थिर करने में सहायक ) होता है, आयु को बढ़ाता है, मेधा ( धारणाशक्तियुक्ता धीः ) अर्थात् जो धारणाशक्ति तथा सभी प्रकार के बल को बढ़ाने एवं रोगों का विनाश करने में समर्थ हो । इस प्रकार का भी कोई प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता । इसकी पूर्ति के लिए देखें- चरक - चिकित्सास्थान अध्याय १ के चारों पाद तथा सु.चि.अ. २७ से ३० । ( ८ ) वृषचिकित्सा ( वाजीकरणतन्त्र ) – ' अवाजी वाजीव अत्यर्थं मैथुने शक्तः क्रियते येन तद् वाजीकरणम् ' । वाजीकरणतन्त्र उसे कहते हैं जो अल्प मात्रा वाले शुक्र का सन्तर्पण करता है, दूषित शुक्र को शुद्ध करता है, क्षीण शुक्र को बढ़ाता है और सूखे हुए शुक्र के उत्पादन के उपायों का निर्देश करता है । लिंग में प्रहर्षता को उत्पन्न कर नर - नारी में सन्तानोत्पादनशक्ति को पैदा करता है । ' वर्षति इति वृष: ' इस अभिप्राय से भले ही इस तन्त्र को ' वृषचिकित्सा ' कहा जाय, अन्यथा वृष ( साँड़ ) जिन चेष्टाओं के बाद सोच - सोचकर मैथुन में प्रवृत्त होता है, उसे सुश्रुत ने सौगन्धिक नामक नपुंसक कहा है । देखें — सु.शा. २।३ ९, जैसे — साँड़ तथा कुत्ता । इस विषय से सम्बन्धित भी कोई प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है । इसके लिए केवल च.चि. २ तथा च.चि. ३०।१२६ से २०३ तक के पद्य एवं सु.शा. २ तथा सु.चि. २६ सम्पूर्ण का अवलोकन करें । वाजीकरण के लिए ' वृष ' एवं ' वाजी ' शब्दों का प्रयोग हुआ है । वृष का अर्थ है — ' वर्षतीति वृषः ' अर्थात् जो योनि में वीर्य की वर्षा करें । किन्तु वह वृष ( साँड़ ) वाजी ( घोड़े ) के समान वेग वाला नहीं होता, अतः अधिकांश क्षेत्रों में ' वाजीकरण ' शब्द ही प्रसिद्ध है । सावधान — रसायन एवं वाजीकरण प्रयोगों का उपयोग केवल स्वास्थ्यवर्धन एवं प्रजोत्पादन के लिए ही होना चाहिए, दुराचार या दुष्प्रवृत्ति के लिए कभी भी इनका प्रयोग न करें; ऐसा करने से हानि भी हो सकती है । साथ ही इनका प्रयोग योग्य चिकित्सक की देख - रेख में ही करें । इनके सेवनकाल में जितेन्द्रिय होना अति आवश्यक है, तभी पूरा लाभ मिलता है । चिकित्सा येषु संश्रिता - ऊपर दिये गये आठ अंगों के साथ चिकित्सा शब्द का सम्बन्ध है । चरकसंहिता में चिकित्सा शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है— ' चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिः धातुसात्म्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ' । ( च.सू. ९ ।५ ) रोग या रोगों की शान्ति के लिए चिकित्सक द्वारा जो - जो उपाय किये जाते हैं उन सबका सम्मिलित नाम ‘ चिकित्सा ' है । इसमें जो ' चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां पद्यांश दिया गया है, इसके

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८ अष्टाङ्गहृदये अनुसार वैद्य, औषधोपयोगी द्रव्य, उपस्थाता ( परिचारक ) तथा रोगी – ये सब अपने - अपने प्रशस्त गुणों से युक्त हों तभी उचित चिकित्सा हो सकती है । सुश्रुत के अनुसार — ' वत्स सुश्रुत! इह खलु आयुर्वेद-प्रयोजनम् — व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं च ' । ( सु.सू. १।१४ ) अर्थात् आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं — रोगियों को रोग से मुक्ति दिलाना और स्वस्थ की स्वास्थ्य रक्षा । महर्षि वाग्भट ने स्वस्थवृत्त का वर्णन अ. २ से ७ तक और रोगशान्ति का वर्णन सम्पूर्ण ग्रन्थ में किया है । वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ॥६ ॥

दोषों का वर्णन – आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते हैं; यथा — १. वात, २. पित्त तथा कफ ॥ ६ ॥

वक्तव्य — इन वात आदि दोषों का विशेष परिचय अष्टांगहृदय - सूत्रस्थान के ग्यारहवें ' दोषादिविज्ञान ' नामक अध्याय में देखें । सुश्रुत - सूत्रस्थान ( १।२२ ) में कहा गया गया है कि पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश इन पाँच महाभूतों के संयोग का नाम पुरुष है और चरक शारीरस्थान ( १।१६ ) में ' खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः ' । अर्थात् उक्त पञ्चमहाभूत और चेतना धातु ( चेतना का आधार मन सहित आत्मा ) कहा गया है । यही आशय सुश्रुत का भी है । ( मोक्ष - विषयक शास्त्र में २५ तत्त्वों के संयोग को पुरुष संज्ञा दी गयी है, अस्तु । ) यही चिकित्स्य पुरुष है । पञ्चमहाभूतों में आकाशतत्त्व अवकाश ( खाली स्थान ) के रूप में शरीर में रहता है और पृथिवीतत्त्व आधारस्वरूप है, अतएव ये दोनों निष्क्रिय ( निश्चेष्ट ) हैं, अर्थात् इन दोनों में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती है । शेष तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है— जलतत्त्व ' कफ ' है, अग्रितत्त्व ' पित्त ' है और वायुतत्त्व ही ' वात ' है । अब आगे इनके विकृत तथा अविकृत रूपों की चर्चा की जायेगी । आयुर्वेदशास्त्र में प्राणिमात्र का नाम ' पुरुष ' है । यह वनस्पति ( पुष्परहित फल वाले वृक्ष ), वानस्पत्य ( फूल - फल वाले वृक्ष ), वीरुध् ( शाखा - प्रशाखा युक्त लता ) तथा औषधियों का; हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस आदि पशु एवं पक्षियों का भी उपदेश देता है, परन्तु इन सबमें पुरुष ( मानव ) प्रधान है । जैसा कि मनु ने कहा है — ‘ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः ' ॥ ( मनु. १।९ ६ ) त्रयो दोषाः समासतः – वाग्भट ने सुश्रुत द्वारा स्वीकृत ' रक्त ' भी दोष है, इसका यहाँ खण्डन किया है, अपितु ये ' आम ' को दोष स्वीकार करते हैं । ध्यान दें— ' दोषेण भस्मनेवाग्नौ छन्नेऽन्नं न विपच्यते । तस्मादादोषपचनाज्ज्वरितानुपवासयेत् ' ॥ ( अ.हृ.चि. १११० ) यहाँ ' दोषेण ' पद के स्थान पर अनेक संस्करणों में ' आमेन ' पाठ मिलता है । वास्तव में यहाँ चर्चा ' आमदोष ' की है । इस प्रकार के सयुक्तिक विचारों या प्रसंगोचित परिवर्तनों को चरक ने उस - उस आचार्य का ' बुद्धेर्विशेषः ' कहा है । विकृताऽविकृता देहं घ्नन्ति ते वर्तयन्ति च । विकृत - अविकृत दोष ——– ये तीनों वात आदि दोष विकृत ( असम अर्थात् बढ़े हुए अथवा क्षीण हुए ) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत ( समभाव में स्थित ) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य - सम्पादन करने में सहायक होते हैं । वक्तव्य — प्राचीन टीकाकारों ने ' विकृताः ' का अर्थ ' स्वभावप्रच्युताः ' किया है, जो उचित है । तथापि दोषों का अपना स्वभाव क्या है, यह कहना थोड़ा कठिन है, क्योंकि ये मनुष्यों के आहार - विहार पर निर्भर रहते हैं और ऋतु - परिवर्तन आदि पर भी । आप ध्यान दें- -वात -1 -पित्त- -कफ का नाम केवल दोष ही नहीं है, अपितु इन्हें ' धातु ' तथा ' मल ' भी कहा गया है । देखें— ' शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात् । वातपित्तकफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मलाः ' । हमारे शरीर में इन वात आदि की स्थिति इस प्रकार है — जब

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ये शरीर को रुग्ण, विकृत या दूषित करते हैं तब ये ' दोष ' कहे जाते हैं, जब ये मानव को स्वस्थ रखते हैं तब ' धातु ' और जब ये शरीर को मलिन करते हैं तब इन्हें ' मल ' कहा जाता है । विशेष द्रष्टव्य - च. वि. १।५; च.सू. १ तथा च. सू. ११५७। कुछ संस्करणों में इसके आगे एक पद्य इस प्रकार का प्राप्त होता है — ' प्रत्येकं ते त्रिधा वृद्धिक्षयसाम्यविभेदतः । उत्कृष्टमध्याल्पतया त्रिधा वृद्धिक्षयावपि ' ॥ ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंश्रयाः ॥ ७ ॥

दोषों के स्थान तथा प्रकोपकाल – ये तीनों वात आदि दोष सदा समस्त शरीर में व्याप्त रहते हैं । फिर भी नाभि से निचले भाग में वायु का, नाभि तथा हृदय के मध्य भाग में पित्त का और हृदय के ऊपरी भाग में कफ का आश्रयस्थान है ॥ ७ ॥

वयोऽहोरात्रिभुक्तानां तेऽन्तमध्यादिगाः क्रमात् । वय आदि के अनुसार काल – यद्यपि ये दोष सदा गति ( क्रिया ) शील रहते हैं, तथापि वयस् के अन्तकाल ( वृद्धावस्था ) में, वयस् के मध्य ( यौवन ) काल में तथा वयस् के आदि ( बाल्य ) काल में और दिन - रात तथा भुक्त ( भोजन कर चुकने ) के अन्त, मध्य एवं आदि काल में विशेष रूप से गतिशील होते हैं । वक्तव्य- - उक्त विषय को आप इस प्रकार समझें — यद्यपि वात - पित्त - कफ ये सभी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहते हैं, तथापि ये क्रम से विशेष कर के किस प्रकार रहते हैं, इसे बतलाया जा रहा है — अवस्था का अन्तिम भाग वृद्धावस्था, दिन का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, रात्रि का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, भुक्त ( अन्न के पचने ) का अन्तिम काल वायु के प्रकोप होने का है । अवस्था का मध्य भाग ( युवावस्था ), दिन का मध्य भाग १० से २ बजे तक, रात्रि का मध्य भाग १० से २ बजे तक, भुक्त ( अन्न के पचने ) का मध्यकाल पित्त के प्रकोप होने का है । अवस्था का आदि भाग ( बाल्यावस्था ), दिन का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, रात्रि का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, भुक्त ( अन्न के पचने )

का आदिकाल कफ के प्रकोप का काल है ।

तैर्भवेद्विषमस्तीक्ष्णो मन्दश्चाग्निः समैः समः ॥ ८ ॥

दोषों का अग्नि पर प्रभाव- - उक्त वात आदि दोषों के प्रभाव ( वृद्धि ) से अग्नि ( जठराग्नि ) भी दोषों के क्रम ( वातदोष ) से विषम, ( पित्तदोष से ) तीक्ष्ण और ( कफदोष से ) मन्द हो जाता है तथा इन तीनों के सम मात्रा में रहने पर अग्नि भी सम प्रमाण में रहता है ॥ ८ ॥

वक्तव्य — अग्नि तथा पित्त के गुण - धर्म समान होते हैं, अतएव पित्तदोष की वृद्धि से अग्नि का तीक्ष्ण होना स्वाभाविक ही है । क्योंकि महर्षि चरक ने कहा है— ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' । ( च.सू. १।४४ ) आशय स्पष्ट है । अग्नि का विशेष वर्णन अ.हृ.शा. ३।७४, अ.सं. सू. ११ तथा सू. २१ में देखें । कोष्ठः क्रूरो मृदुर्मध्यो मध्यः स्यात्तैः समैरपि । दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव — जठराग्नि की भाँति कोष्ठ भी वातदोष से क्रूर, पित्तदोष से मृदु एवं कफदोष से मध्यम रहता है और तीनों दोषों के सम रहने पर भी मध्यम रहता है । वक्तव्य — कोष्ठ की क्रूरता आदि का वर्णन तथा उसके अनुरूप चिकित्सा का विधान अ.हृ.सू.अ. १८।३४ में देखें । कोष्ठ - परिचय — ' स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ' ॥ ( च.शा. ७।१२ तथा सु. चि. २।१२ ) अर्थात् आमाशय, पक्वाशय, अग्न्याशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उण्डुक तथा फुप्फुस इन अवयवों की परिधि को आयुर्वेदशास्त्र में ' कोष्ठ ’ नाम से परिभाषित किया है । इस दृष्टि से मृदुकोष्ठ, क्रूरकोष्ठ तथा मध्यकोष्ठ नामक पुरुषों के भेदों का वर्णन भी मिलता है । यथा— ' ‘ श्लेष्मोत्तरश्छर्दयति ह्यदुःखं विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक् ' ॥ ( च.सि. ११ ९ ) अर्थ स्पष्ट है ।

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१० अष्टाङ्गहृदये शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमेः ॥९ ॥

तैश्च तिस्रः प्रकृतयो हीनमध्योत्तमाः पृथक् । समधातुः समस्तासु श्रेष्ठा, निन्द्या द्विदोषजाः ॥ दोषों से गर्भ - प्रकृति का वर्णन – गर्भाधान काल में माता - पिता के आर्तव तथा शुक्र में अधिकता से उपस्थित या वर्तमान उक्त तीनों ( वात आदि ) दोषों के अनुसार क्रमशः गर्भ की तीन प्रकृतियाँ बनती हैं । १. वातदोष की अधिकता से हीनप्रकृति, २. पित्तदोष की अधिकता से मध्यप्रकृति तथा ३. कफदोष की अधिकता से उत्तमप्रकृति बनती है; यही सबमें श्रेष्ठ मानी गयी है । जो प्रकृतियाँ दो - दो दोषों के मिश्रण से बनती हैं, वे निन्दनीय मानी जाती हैं और समधातुज प्रकृति सबमें श्रेष्ठ होती है । शुक्र एवं आर्तव किंवा रजस् तथा वीर्य के मिश्रण से उत्पन्न गर्भ में वात आदि दोषों के गुण वैसे ही आ जाते हैं । जैसे विषक्रिमि में विष के गुण आ जाते हैं॥९ -१० ॥ वक्तव्य — सात प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन - १. वातप्रकृति हीन, २. पित्तप्रकृति मध्य, ३. कफप्रकृति उत्तम, ४. समधातुप्रकृति सबमें उत्तम । द्विदोषज प्रकृतियाँ – ५. वातपित्तप्रकृति, ६. वातकफप्रकृति तथा ७. पित्तकफप्रकृति ये तीन निन्दित होती हैं । मनुष्यों की ही भाँति अन्य प्राणियों की प्रकृति माता - पिता के अनुरूप ही होती है । जैसे -- जहरीले सर्प की सन्तान अपने माता - पिता के समान ही जहरीली होती है, यह मात्र एक उदाहरण है । चरक - विमानस्थान अध्याय ६ में इन प्रकृतियों का विस्तार से वर्णन है । भगवान् धन्वन्तरि ने प्रकृति - वर्णन के सम्बन्ध में सुश्रुत को जो उपदेश दिया था, वह इस प्रकार है— ' शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद् दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन. ' ' ॥ ( सु.शा. ४१६३ ) यह पद्यात्मक वाक्य श्रीवाग्भट द्वारा उक्त विषय का पूर्ण रूप से समर्थन कर रहा है । इसी के आगे श्लोक ८० तक वात आदि प्रकृति वाले पुरुषों के स्वभाव आदि का वर्णन करने के बाद आगे सात्त्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों का भी वर्णन किया है । दोनों प्रकृतियों के वर्णन में मात्र इतना अन्तर है कि वातादि प्रकृतियाँ शारीरिक होती हैं और सात्त्विक आदि प्रकृतियाँ मानसिक होती हैं । इनका वर्णन सु.शा. ४१८१ से ९९ तक में है । जहाँ एक ही माता - पित्ता की चार सन्तानें भिन्न - भिन्न प्रकृति की देखी जाती हैं, वहाँ गर्भाधान काल में दोषों का तर - तम भाव ही कारण होता है । कुछ कारण और भी होते हैं, जैसे — माता के दोहद का प्रभाव । देखें —–— सु.शा. ३।१ ९ से २८ तक । तत्र रूक्षो ' लघुः शीतः ः खरः सूक्ष्मश्चलोऽनिलः । वातदोष के गुण —यह रूक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म तथा चल ( सदा गतिशील ) होता है । वक्तव्य — यहाँ जो वात का गुण ' शीत ' कहा गया है, इसका विवेचन प्रस्तुत है । शरीर स्थित वातदोष अथवा प्रतिक्षण बहने वाला वायु जाड़ा में शीतल और गर्मियों में गरम प्रतीत होता है, अतः यह जैसे मौसम में होता है वैसा ही इसका स्पर्श होता है । वास्तव में यह वायु ' अनुष्णाशीत ' है अर्थात् न यह गरम है और न शीतल है । शास्त्र में इसे ' योगवाही ' कहा गया है । ऐसे कुछ पुरुष भी होते हैं जिनका कोई अपना अस्तित्व नहीं होता । जैसे— ' गंगा गये गंगादास, जमुना गये जमुनादास ', अस्तु । ' योगवाही परं वायुः संयोगादुभयार्थकृत् । दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् ॥ ( च.चि. ३।३८ ) तथा ‘ पवने योगवाहित्वाच्छीतं श्लेष्मयुते भवेत् । दाहः पित्तयुते ' । इति । ( अ.हृ.नि. २।४८ ) पित्तं सस्नेहतीक्ष्णोष्णं लघु विप्रं सरं द्रवम् ॥ ११ ॥

पित्तदोष के गुण – यह कुछ स्निग्ध, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, विम्र ( आम गन्ध वाला ), सर तथा द्रव होता है ॥ ११ ॥

वक्तव्य — जब वमन के साथ पित्तदोष हरा - पीला रंग का निकलता है तब उसे सूँघने पर इसकी ' विम्र ' गन्ध का ज्ञान होता है । यह एक प्रकार की अप्रिय गन्ध होती है । यहाँ ' सस्नेह ' का अर्थ है — थोड़ा ' स्नेहयुक्त होना । देखें — ‘ सस्नेहा गुडशर्करा ' । ( च.सू. २७।२४१ )

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ११ स्निग्धः शीतो गुरुर्मन्दः श्लक्ष्णो मृत्स्नः स्थिरः कफः । कफदोष के गुण — स्निग्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मृत्स्न तथा स्थिर होता है । वक्तव्य — ‘ मृत्स्न ' शब्द से यहाँ जो टीकाकारों ने ' पिच्छिला ' अर्थ लिया है, उसका कारण यह है — वास्तव में ' मृत्स्न ' का अर्थ मिट्टी होता है और मिट्टी दो प्रकार की होती है- १. चिकनी, जिससे लिपायी - पोतायी होती है अथवा जिससे घड़े आदि पात्र बनते हैं और २. बलुही मिट्टी होती है । इस प्रकार यहाँ तक वात आदि दोषों में रहने वाले गुणों का वर्णन कर दिया गया है, क्योंकि गुण गुणी ( अपने आधार ) में रहते हैं । अतएव वात आदि दोषों का ग्रहण चिकित्सा आदि अवसरों पर उनके गुणों को देखकर किया

जा सकता है ।

संसर्गः सन्निपातश्च तद्द्द्वित्रिक्षयकोपतः ॥ १२ ॥

संसर्ग तथा सन्निपात की परिभाषा - आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो - दो दोषों के एक साथ क्षय या वृद्धि होने का नाम ' संसर्ग ' है और तीनों दोषों का एक साथ क्षय अथवा वृद्धि होने का नाम सन्निपात है ॥ १२ ॥

वक्तव्य — इस विषय का विस्तृत वर्णन अष्टांगहृदय - सूत्रस्थान के ' दोषभेदीय ' नामक १२ वें अध्याय में किया गया है । चरकसंहिता - सूत्रस्थान के १२ वें अध्याय में इन वातादि दोषों के रहस्य को जानने के लिए विभिन्न प्रदेशों से आये हुए तत्कालीन महर्षियों ( विद्वानों ) की एक सम्भाषापरिषद् हुई थी, जिसमें इनके गुण - धर्मों के सम्बन्ध में विचार हुआ था । उसमें यह भी विचार किया गया था कि इन तीनों दोषों में वातदोष प्रधान है, शेष दो दोष पंगु हैं । आप भी इसका परिशीलन करें । यहाँ जो दोषों की क्षय - वृद्धि का वर्णन किया है, इससे चिकित्साकाल में चिकित्सक क्षीण दोषों को बढ़ाने का और बढ़े हुए दोषों को सम करने का प्रयास करता है; यही चिकित्सा है, क्योंकि दोषों का सम होना ही उत्तम स्वास्थ्य का लक्षण है । रसासृङ्गांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । सप्त दूष्याः-धातुओं का वर्णन – आयुर्वेदशास्त्र में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात ' धातु ' कहे जाते हैं और जब ये वात आदि दोषों द्वारा दूषित किये जाते हैं, तो इन्हें ' दूष्य ' कहते हैं । -मला मूत्रशकृत्स्वेदादयोऽपि च ॥१३ ॥

मलों का वर्णन – मूत्र, पुरीष तथा स्वेद ( पसीना ) आदि मल कहे जाते हैं ॥ १३ ॥

वक्तव्य — भगवान् धन्वन्तरि की मान्यता है— ' दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् ' । ( सु.सू. १५।३ ) अर्थात् वात आदि तीनों दोष, रस - रक्त आदि सातों धातु तथा मूत्र आदि शरीर के मल ही शरीर के मूल हैं अथवा यों समझिये कि यह शरीर दोष, धातु, मल मय है; ये ही इसके तत्त्व हैं । आगे वे पुनः इसी सम्बन्ध में कहते हैं — ' त एते शरीरधारणाद् धातव इत्युच्यन्ते ' । ( सु.सू. १४/२० ) अर्थात् ये रस, रक्त आदि शरीर को धारण करने से धातु कहे जाते हैं । ' धातु ' शब्द ' डुधाञ् धारणपोषणयोः ' धातु से निष्पन्न होता है । इसका अर्थ है— जो द्रव्य शरीर का धारण एवं पोषण करते हैं, उन्हें ' धातु ' कहते हैं । यही कारण है कि सम अवस्था में स्थित ' वात ' आदि दोषों को भी धातु कहा जाता है । जो शरीर को दूषित करते हैं, उन्हें ' दोष ' कहा जाता है । शास्त्रकार दोष शब्द की व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं— ' दूषयन्ति दूष्यन्ति वा दोषाः ' । जो दूसरों को दूषित करते हैं अथवा स्वयं दूषित होते हैं, वे दोष कहें जाते हैं और जो दूषित होते हैं, वे दूष्य कहे जाते हैं । महर्षि पुनर्वसु के अनुसार दात आदि दोष ही रस - रक्त आदि धातुओं को दूषित करते हैं । यथा- — ' ' तत्र त्रयः शरीरदोषा वातपित्तश्लेष्माणः, ते शरीरं दूषयन्ति ' । ( च.शा. ४।३४ ) वात आदि दोष भी शास्त्रनिर्देश- विरुद्ध आहार - विहार के सेवन करने से ही दूषित होते हैं ।

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१२ अष्टाङ्गहृदये मल - मूत्र आदि जो मल कहे गये हैं, वे भी दूष्य कहे जाते हैं । आगे चलकर वाग्भट ने अ.हृ.शा. ३।६३ में रस आदि धातुओं के मलों का इस प्रकार वर्णन किया है । यथा - १. रस का मल - कफ, २. रक्त का – पित्त, ३. कान, नाक आदि छिद्रों में जो मल होता है, वह मांस का मल है । ४. मेदस् का- स्वेद ( पसीना ), क्योंकि मेदस्वी पुरुष के पसीने से मेदस् की जैसी दुर्गन्ध आती है । ५. अस्थियों के मल – नख तथा रोम, क्योंकि अस्थिसार पुरुष के शरीर में रोम - केश खूब होते हैं । ६. मज्जा का मल त्वचागत स्नेह तथा नेत्र एवं मल का स्नेह है । मज्जासार पुरुष का शरीर चिकना रहता है और जिसके शरीर में मज्जा की कमी रहती है, उसकी त्वचा रूखी होती है तथा ७. शुक्र का मल है — ओजस् । वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैर्विपर्ययः । दोष - धातु - मलों की वृद्धि एवं क्षय - शरीर से सम्बन्धित उक्त वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा मलों के समान गुण - धर्म वाले पदार्थों का सेवन करने से उन - उन की वृद्धि होती है और उन - उन के विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से उनका क्षय होता है । वक्तव्य — उक्त पद्य अ.सं. सू. १।३२ में अविकल रूप से प्राप्त है । भगवान् पुनर्वसु ने इस आशय को पुष्ट करने वाला गद्य इस प्रकार दिया है— ' धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽ-प्याहारविकारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रासं तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारैरभ्यस्यमानैः ' । ( च.शा. ६।९ ) अर्थात् शरीरस्थित धातु ( दोष, धातु एवं मल ) समान गुण वाले या अधिकांश समान गुणों वाले आहार के निमित्त बने विविध प्रकार के पदार्थों के सेवन से बढ़ने लगते हैं और उनके विपरीत गुण वाले या अधिकांश विपरीत गुण वाले पदार्थों के सेवन करते रहने से क्षीण होने लगते हैं । इसी बात को महर्षि पुनर्वसु ने— ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् । ह्रासहेतुर्विशेषश्च ' । ( च.सू. ११४४ ) में भी कहा है । दूसरे आचार्यों ने भी इस प्रत्यक्ष सत्य को स्वीकारा है । दोष, धातु, मलों का उचित प्रकार का बढ़ना तथा क्षीण होना स्वास्थ्य - वृद्धि में कारण होता है । अनुचित प्रकार से होने वाला वृद्धि क्षय रोगोत्पत्ति का कारण हो जाता है । महर्षि सुश्रुत ने सूत्रस्थान के १५ वें अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन किया है । सारांश यह है कि समान गुण - कर्म वाले पदार्थों से सभी समान भावों ( दोष - धातु - मलों ) की वृद्धि होती है और असमान गुण - कर्म वाले पदार्थों से उन - उन भावों का क्षय हो जाता है । यही क्रम इनकी चिकित्सा का भी है— बढ़े हुए दोष -धातु -8 - - I मलों को घटाकर सम

करना और घटे हुए को बढ़ाकर सम अवस्था में ले आना ।

रसाः स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः ॥ १४ ॥

षड् द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहाः । रसों का वर्णन – आयुर्वेदशास्त्र में रसों की संख्या छ: है — १. स्वादु ( मीठा ), २. अम्ल ( खट्टा ), ३. लवण ( नमकीन ), ४. तिक्त ( नीम तथा चिरायता आदि ), ५. ऊषण ( कटु- कालीमिर्च आदि ) तथा ६. कषाय ( कसैला- हरीतकी आदि ) । ये सभी रस भिन्न - भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं । ये रस अन्त की ओर से आगे की ओर को बलवर्धक होते हैं अर्थात् मधुर रस सबसे अधिक बलवर्धक होता है और इसके बाद सभी रस उत्तरोत्तर बलनाशक होते हैं ॥ १४ ॥

वक्तव्य- - रसना ( जीभ ) के द्वारा जिसका रसास्वादन किया जाता है अथवा जो रसना का विषय है, उसे ' रस ' कहते हैं । अतएव चरक ने कहा है— ' रसनाऽर्थो रसः ' ( च.सू. १।६४ ) तथा ' रसो निपाते द्रव्याणाम् ' । ( च.सू. २६/६६ ) अर्थात् किसी द्रव्य का जब जीभ से सम्बन्ध होता है तब उसके रस की प्रतीति होती है कि यह मीठा, खट्टा आदि कैसा रस है? रसों के विशेष परिचय के लिए देखें—– अ.हृ.सू. अध्याय १० सम्पूर्ण ।

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् १३ तत्राद्या मारुतं घ्नन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम् ॥ १५ ॥

कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते । रसों का वात आदि पर प्रभाव — उनमें प्रथम तीन ( मधुर, अम्ल, लवण ) रस वातदोष को नष्ट करते हैं, तिक्त, कटु, कषाय कफदोष को नष्ट करते हैं और कषाय, तिक्त, मधुर रस पित्त को नष्ट करते हैं । इससे विपरीत रस वात, पित्त, कफ दोषों को बढ़ाते हैं ॥ १५ ॥

वक्तव्य — रसों का वात आदि पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, इसकी चर्चा भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार की है — ‘ तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति । तद्यथा— कटुतिक्त-कषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेनं ' शमयन्ति; कट्वम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्त-कषायास्त्वेनच्छमयन्ति; मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषायास्त्वेनं शमयन्ति ' । ( च.वि. १।६ ) अर्थात् तीन - तीन रस एक - एक दोष को पैदा करते हैं और तीन - तीन ही रस एक - एक दोष को शान्त करते हैं । यथा— कटु, तिक्त, कषाय रस वातदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, अम्ल, लवण रस इसे शान्त करते हैं । कटु, अम्ल, लवण रस पित्तदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, तिक्त, कषाय रस इसे शान्त करते हैं । कटु, अम्ल, लवण रस कफ को उत्पन्न करते हैं और कटु, तिक्त, कषाय रस

यही अभिप्राय महर्षि वाग्भट का भी है ।

शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥ १६ ॥

द्रव्य का वर्णन — विधिभेद से द्रव्य तीन प्रकार का होता है—- १. शमन ( शमन करने वाला ), २. कोपन ( वात आदि दोष को कुपित करने वाला ) तथा पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाला ) ॥ १६ ॥

वक्तव्य — ये द्रव्य परस्पर विपरीत गुणवाले होते हैं । जैसे — जो द्रव्य शमन इसे शान्त करते हैं । वात आदि दोषों का ३. स्वस्थहित ( स्वस्थ ( शान्तिकारक ) होता है, वह उस दोष को प्रकुपित करने वाला नहीं होता है । इसी प्रकार जो द्रव्य ' कोपन ' होगा, वह शमन नहीं हो सकता है । इन गुणों की विपरीतता को आप इस प्रकार समझें – जैसे गुरु गुण से लघु गुण एवं शीत से उष्ण सदा विपरीत रहता है । यहाँ ' इति ' शब्द भेदवाचक है । यही द्रव्य अन्य प्रकारों से दो प्रकार का या अनेक प्रकार का होता है । शमन द्रव्य — जैसे — तैल, घृत, मधु । तैल—– स्निग्ध, उष्ण, गुरु गुण वाला होने के कारण वातदोष का शमन कर देता है, क्योंकि तैल वातदोष के विपरीत गुण वाला होता है । घृत — मधुर, शीत, मन्द गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले पिंत्तदोष का शमन कर देता है । मधु —रूक्ष, तीक्ष्ण, कषाय गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले कफदोष का शमन कर देता है । कोपन — जो द्रव्य वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा मूत्र आदि मलों को कुपित करता है, उसे कोपन कहतें हैं । जैसे — यवक । ( शूकधान्य- विशेष में पठित द्रव्य; देखें च. सू. ५।११ ), पाटल ( पाटल व्रीहि— त्रिकाण्डशेष ), माष ( उड़द ), मछली, आममूलक, सरसों का तेल, मन्दक, दधि, किलाट आदि । विरुद्ध पदार्थ — जैसे— दूध तथा मछली का एक साथ सेवन करना आदि । स्वस्थहितम् — ' ऋतुचर्या ' नामक अध्याय में जिन - जिनका सेवन करने को और जिनका सेवन न करने को कहा गया है, उन सबको यथाविधि, विधि - निषेध के अनुसार स्वीकार करना ही स्वस्थ ( हितकर ) चर्या है । इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के मात्राशितीय नामक ८ वें अध्याय में विस्तार से देखें । भगवान् पुनर्वसु ने त्रिविध द्रव्य का वर्णन करते हुए कहा है— ' किञ्चिद् दोषप्रशमनं किञ्चिद् धातु-प्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ ( च.सू. १।६७ ) अर्थात् कोई द्रव्य प्रकुपित वात

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१४ अष्टाङ्गहृदये आदि दोष का प्रशमन करता है, कोई द्रव्य प्रकृतिस्थ धातु को बढ़ा या घटा देता है और कोई द्रव्य स्वस्थवृत्त के लिए उपयोगी माना जाता है । शार्ङ्गधराचार्य ने शमनद्रव्य का वर्णन इस प्रकार किया है — ' न शोधयति न द्वेष्टि समान् दोषांस्त-थोद्धतान् । समीकरोति विषमान् शभनं तद्यथाऽमृता ' ॥ ( शा.प्र.अ. ४ ( २ ) अर्थात् जो द्रव्य वमन या विरेचन द्वारा वात आदि दोषों का शोधन भी नहीं करता, सम दोषों को विकृत कुपित या विषम ( बढ़े अथवा क्षीण ) दोषों को जो सम करता है, वह ' शमन ' द्रव्य अमृता ( गिलोय ) । उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यं द्विधा स्मृतम् । वीर्य का वर्णन — द्रव्यों में शीतगुण तथा उष्णगुण की अधिकता से दो जाता है । वक्तव्य — महर्षि चरक अपनी संहिता में किन्हीं दो आचार्यों के मतों का भी नहीं करता, किन्तु कहा जाता है । यथा— प्रकार का ' वीर्य ' माना उल्लेख करने के बाद वे अपनी बात को प्रसंगवश अन्त में कह रहे हैं । एक आचार्य का मत — वीर्य आठ प्रकार का होता है— १. मृदु, २. तीक्ष्ण, ३. गुरु, ४. लघु, ५. स्निग्ध, ६. रूक्ष, ७. उष्ण और ८. शीत । दूसरे आचार्य का मत – १. शीत तथा २. उष्ण दो प्रकार का वीर्य होता है । चरक का मत— ' -'वीर्यं तु क्रियते येन या क्रिया । नावीर्यं कुरुते किञ्चित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया ' । ( च.सू. २६ / ६४-६५ ) इन्होंने द्रव्य की कर्मशक्ति को ही ' वीर्य ' संज्ञा दी है । सुश्रुत का विचार भी इन्हीं के अनुरूप है । देखें —– ' येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम् ' । ( सु.सू. ४१।५ ) इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि उक्त दोनों संहिताकारों में इस विषय में किसी प्रकार का मतभेद नहीं है । द्विविध तथा अष्टविध वीर्य को सुश्रुत ने भी स्वीकार कर अपनी संहिता में स्थान दिया है । देखें— सु.सू. ४०।५ । चरक की मान्यता का ऊपर उल्लेख कर ही दिया गया है । आप ध्यान दें — संसार में सभी पदार्थ या तो उष्ण हैं अथवा शीत हैं, अतः दो प्रकार का वीर्य होना स्वाभाविक ही है; किन्तु वायु द्रव्य ऐसा है जो ' अनुष्णाशीतस्पर्श ' वाला है, अतः यहाँ उक्त समाधान

वायु को ' योगवाही ' मान लेने से हो जायेगा ।

त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्लकटुकात्मकः ॥ १७ ॥

विपाक का वर्णन – भले ही कोई द्रव्य किसी रस से युक्त क्यों न हो, उसका विपाक तीन प्रकार का होता है— १. मधुर, २. अम्ल तथा ३. कटु ॥ १७ ॥

वक्तव्य — प्रायः सभी प्रकार के रस वाले द्रव्यों का भोजन के पाचनकाल के बाद कार्यरूप में जिसका अनुमान द्वारा निर्णय किया जा सकता है, वह रस जठराग्नि द्वारा पाक हो जाने पर उपर्युक्त तीन प्रकार का पाया जाता है । यथा— मधुर तथा लवण रस वाले द्रव्यों का मधुर, अम्ल रस वाले द्रव्यों का अम्ल और तिक्त, कटु, कषाय रस वाले द्रव्यों का कटु विपाक होता है । इसी विषय को महर्षि वाग्भट आगे अ.हृ.सू. ९ ।२० में कहेंगे । चरक ने उक्त विषय को अपनी संहिता में इस प्रकार से दिया है— ' रसो'च्चोपलभ्यते ' ॥ ( च.सू. २६/६६ ) अर्थात् रसों का भिन्न - भिन्न ज्ञान जीभ के साथ स्पर्श होने पर होता है और विपाक का ज्ञान कर्म की समाप्ति होने पर होता है । आशय यह है कि विपाक का ज्ञान आहार के पचने पर दोषों एवं धातुओं की वृद्धि अथवा क्षीणता रूपी लक्षणों से जाना जाता है और वीर्य का ज्ञान जीभ के स्पर्श से लेकर शरीर में रहने तक होता रहता है । निष्कर्ष — रस का ज्ञान जीभ के स्पर्श से, विपाक का ज्ञान उसके कार्य को देखकर और वीर्य का ज्ञान प्रत्यक्ष तथा अनुमान दोनों से होता है । इसके आगे च.सू. २६।६७-६८ इन दो श्लोकों का भी परिशीलन इस प्रसंग में कर लेना चाहिए, जो विषय को स्पष्ट करने में उपकारक हैं । इस विषय के विशेष विवेचन के लिए सु.सू. ४० का अध्ययन करें ।