श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 51–60
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् १५ शार्ङ्गधराचार्य ने विपाक का परिचय इस प्रकार दिया है— ' जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम् । रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ' ॥ ( शा.पू.खं.द्वि. ३३ ) अर्थात् मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है, वह ' विपाक ' कहा जाता है । आयुर्वेदशास्त्र में रस - गुण - वीर्य - विपाक का विपुल साहित्य है, फिर भी आप देखें — यह ‘ सम्यक् विपाक ' हुआ है या ' मिथ्या विपाक ', तभी आप ठीक निष्कर्ष पर पहुँच पायेंगे । फिर भी आप निम्न सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य करें — च. सू. २६ / ५७-५८ । च. सू. २६ / ६१-६२ । सु.सू. ४०।१०-१२ । च.चि. १५१ ९ - ११ । शा.प्र.ख. ६।१-२ । गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रमृदुस्थिराः । गुणाः ससूक्ष्मविशदा विंशतिः सविपर्ययाः ॥ १८ ॥
द्रव्य के गुणों का वर्णन - द्रव्यों में परस्पर विपरीत ये २० गुण पाये जाते हैं—– १. गुरु, २. लघु, ३. मन्द, ४. तीक्ष्ण, ५. शीत, ६. उष्ण, ७. स्निग्ध, ८. रूक्ष, ९. श्लक्ष्ण, १०. खर, ११. सान्द्र, १२. द्रव, १३. मृदु, १४. कठिन, १५. स्थिर, १६. सर, १७. सूक्ष्म, १८. स १ ९. विशद और २०. पिच्छिल ॥ १८ ॥
वक्तव्य — अ.हृ.नि. ६।१ में मद्य के १० गुण और इनके विपरीत १० ओजस् के जो गुण गिनाये हैं, वे भी ये ही २० गुण हैं । चरक ने दूध के दस गुण गिनाकर यह बतलाया है कि जो गुण दूध के कहे गये हैं वे गुण ओजस् के भी हैं, अतएव दूध को पीने से ओजोगुण की वृद्धि होती है । चरक ने जो दिव्य जल के ६ गुणों का वर्णन च.सू. २७।१ ९ ८ में किया है, यदि हम इन्हें मानते हैं तो फिर गुणों की संख्या २० ही कैसे मानी जा सकती है? इसका समाधान इस प्रकार है— ये जो ६ अतिरिक्त गुणों का वर्णन यहाँ किया गया है, इनका अन्तर्भाव उक्त २० गुणों में ही कर लिया जाता है । ध्यान दें — व्यवायि, विकाशी, आशुकारी ये गुण मद्य में कहे गये हैं और ' प्रसन्न ' नामक गुण दूध में । फिर यह भी कहा गया है कि मद्य के गुणों से विपरीत गुण ओजस् में होते हैं । साथ ही फिर यह भी कहा गया है कि जो गुण ओजस् में होते हैं वे ही गुण दूध में होते हैं । इन विषयों का समन्वय इस प्रकार किया गया है — व्यवायी गुण का अन्तर्भाव द्रव गुण में, विकाशी का खर में, आशुकारी का चल में और प्रसन्न का स्थूल में । इनका समर्थन चरक तथा सुश्रुत के वचनों द्वारा प्राप्त है । उक्त २० गुणों के अर्थ १. गुरु = भारी ६. उष्ण = गरम ११. सान्द्र = गाढ़ा १६. सर = चल २. लघु = हलका ७. स्निग्ध = चिकना १२. द्रव = पतला १७. सूक्ष्म = बारीक ३. मन्द = = चिरकारी ८. रूक्ष = रूखा १३. मृदु = कोमल १८. स्थूल = मोटा ४. तीक्ष्ण = तीखा ९. श्लक्ष्ण = साफ १४. कठिन = कठोर १ ९. विशद = टूटने वाला ५. शीत = शीतल १०. खर = खुरदरा १५. स्थिर = अचल २०. पिच्छिल = लसीला विशेष – ३. मन्द — - जो न शीघ्र हानि करता हो और न लाभ करता हो । ४. तीक्ष्ण— शीघ्र लाभ या हानि करने वाला । १६. सर - - फैलने वाला या गतिशील । १७. सूक्ष्म — छोटे - से - छोटे स्रोतों में प्रवेश करने वाला । २०. पिच्छिल — लुआबदार । कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः । सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम् ॥ १ ९ ॥ रोग एवं आरोग्य के कारण — काल, अर्थ तथा कर्म के हीनयोग, मिथ्यायोग एवं अतियोग रोग या रोगों की उत्पत्ति में एक मात्र कारण होते हैं तथा काल, अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य ( स्वस्थ रहने ) का एक मात्र कारण होता है ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य- -काल- - आयुर्वेदीय दृष्टि से यह तीन प्रकार का होता है, इसी को मौसम या मौसिम भी कहते हैं । इसका विभाजन इस प्रकार किया गया है— १. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल । इन कालों के समूह को वर्ष, वत्सर तथा संवत्सर कहते हैं । यहाँ इन्हीं तीन कालों से सम्बन्ध है । इन कालों में क्रमशः शीत, उष्ण, वर्षा का अधिक होना ' अतियोग ' है, थोड़ा होना ' हीनयोग ' है और अपनी सीमा के विपरीत होना ' मिथ्यायोग ' है । अर्थ — श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिन - जिन विषयों का ग्रहण किया जाता है, उन्हीं को इस प्रकरण में ' अर्थ ' कहा गया है । इन अर्थों का अपनी - अपनी इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग होना उन - उनका ‘ अतियोग ’ है, थोड़ा संयोग होना ' हीनयोग ' है और अनिष्टकारक संयोग होने को ' मिथ्यायोग ' कहते हैं । कर्म — वाणी, मन तथा शरीर की प्रवृत्ति या चेष्टा का नाम ' कर्म ' है । न्यायशास्त्र के अनुसार ‘ संयोग-भिन्नत्वे सति संयोगाऽसमवायिकारणत्वं कर्मत्वम् ' । ( तर्कसंग्रह ) यह कर्मत्व भी हमारा उपकारक है । उक्त तीनों के या दो के अथवा एक के कर्म की अधिकता का नाम ' अतियोग ' है, कर्म की कमी को ‘ हीनयोग ' तथा अहितकर या हानिकर कर्म के योग को ' मिथ्यायोग ' कहते हैं । इस प्रकार काल, अर्थ तथा कर्म के अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग किसी - न - किसी रोग को उत्पन्न करने में कारण होता है । उक्त अतियोग आदि शारीरिक एवं मानसिक रोगों की उत्पत्ति में कारण होते ही हैं । शीत, उष्ण एवं वर्षा का अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग प्राकृतिक रूप से भी देखा जाता है और मानव द्वारा भी किया जाता है किन्तु फल दोनों का रोगोत्पत्ति में कारण होता ही है । सम्यग्योग – काल, अर्थ एवं कर्म का अतियोग, हीनयोग तथा मिथ्यायोग के अतिरिक्त जो समुचित योग होता है, उसे ‘ सम्यग्योग ' कहते हैं । यह ' आरोग्य ' ( स्वास्थ्य - वृद्धि ) का कारण होता है । इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के ' रोगानुत्पादनीय ' नामक ४ थे अध्याय में देखें । यही विषय अष्टांगसंग्रह के पाँचवें अध्याय में देखें । प्रस्तुत पद्य अष्टांगसंग्रह ११४२ में द्रष्टव्य है । इस विषय को चरक की दृष्टि से देखें- च. सू. ११।३७ - ४१ तक । इन कर्मों को महर्षि चरक ने ' प्रज्ञापराध ' संज्ञा दी है, अन्यथा बुद्धि- -प्रधान मानव इन कर्मों की ओर कैसे प्रवृत्त हो सकता है? रोगस्तु दोषवैषम्यं, दोषसाम्यमरोगता । रोग - आरोग्य में भेद — वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों की विषमता या विषम अवस्था का नाम ' रोग ' है । अर्थात् दोषों के विषम ( किसी का बढ़ जाना और किसी का घट जाना ) हो जाने से किसी-न - किसी प्रकार का रोग हो जाता है और जब उक्त दोष समान स्थिति में रहते हैं तब आरोग्य की प्राप्ति होती है अर्थात् मानव ' सुखी ' रहता है । वक्तव्य — दोष या दोषों की विषमता अर्थात् तीनों में से एक या दो दोषों का बढ़ या घट जाना, इसी की विषमता को सम का विपरीत भाव कहा जाता है । यहाँ दोष शब्द रोग का अन्तरंग ( भीतरी ). कारण मात्र है । दोषों का सम होना ही ' आरोग्य ' है । आगे जो दो श्लोक अ.हृ.सू. में क्रम सं ० २०-२१
पर हैं, ये ही दो श्लोक अ.सं. सू. १।४३-४४ में है ।
निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः ॥ २० ॥
रोगों के दो भेद — सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते हैं—– १. निज ( वात आदि भीतरी दोषों की विषमता से होने वाले ) तथा २. आगन्तुज ( अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले ) ॥ २० ॥
वक्तव्य — महर्षि चरक के शब्दों में रोगों के दो भेद इस प्रकार कहे गये हैं— ' तत्र निजः शारीर-दोषसमुत्थः, आगन्तुर्भूतविषवाय्व्यग्निसम्प्रहारादिसमुत्थः ' । ( च.सू. ११।४५ ) अर्थात् शारीरिक वात आदि दोषों से उत्पन्न रोग ‘ निज ' कहा जाता है और ' आगन्तुज ' रोग अभिघात, भूतावेश, सर्प आदि के दंश, शीत, उष्ण, आग, तेजाब आदि आग्नेय द्रव्यों के लग जाने से या गदा, लाठी, हाकी, तलवार आदि के लग जाने से होता है ।
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् १७ तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमपि द्विधा । दो प्रकार के रोगाधिष्ठान — रोगों के अधिष्ठान ( आश्रयस्थान ) भी दो होते हैं—— १. काय ( शरीर ) तथा २. मन । वक्तव्य — प्रथम भेद से होने वाले रोगों का अधिष्ठान ' काय ' है । वे रोग ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास आदि हैं । दूसरे भेद से कहे जाने वाले रोगों का अधिष्ठान है ' मन ' । इससे सम्बन्धित रोग हैं — मद, मूर्च्छा, संन्यास, ग्रहारिष्ट, भूतोन्माद, अपस्मार, राग, द्वेष आदि । अधिष्ठान — ' अधितिष्ठन्ति रोगाः अस्मिन् इति अधिष्ठानम् ' । अर्थात् जिसमें रोग टिकते हैं । इस दृष्टि से भी कायिक एवं मानसिक दो प्रकार के रोग होते हैं । अब यहाँ शंका यह होती है कि शारीरिक रोगों की उत्पत्ति में प्रकुपित वात आदि दोष कारण कहे गये हैं, मानस रोगों की उत्पत्ति में किसे कारण माना जायेगा? उसी के समाधान के लिए
कहा जा रहा है ।
रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषादुदाहृतौ ॥ २१ ॥
मानसिक दोषों का परिचय — मनस् के दो दोष हैं— १. रजस् ( रजोगुण ) और २. तमस् ( तमोगुण ) । वक्तव्य — गुण तीन हैं— १. सत्त्व, २. रजस् और ३. तमस् । इसी विषय को महर्षि चरक ने ‘ मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ' । ( च.सू. १।५७ ) भी स्वीकार किया है और मानस रोगों की चिकित्सा के लिए उन्होंने अगले ( ५८ वें ) पद्य में कहा है— मानस रोगों की ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति तथा समाधि द्वारा चिकित्सा करें । इस विषय को आप ' नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परं, न ह्यरजस्कं तमः प्रवर्तते ' । ( च.वि. ६।९ ) अर्थात् काम आदि मानस रोगों तथा ज्वर आदि शरीर सम्बन्धी रोगों का कदाचित् परस्पर अनुबन्ध हो जाता है, परन्तु रजस् और तमस् का परस्पर अनुबन्ध होना निश्चित ही है, क्योंकि तमस् रजस् के बिना प्रवृत्त ही नहीं होता । ये दोनों कभी भी एक - दूसरे का साथ नहीं छोड़ते और सत्त्व गुण सर्वथा निर्विकार है । अत: वह ( सत्त्वगुण ) मानसिक आरोग्य को देने में कारण है । अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने सत्त्व, रजस्, तमस् को ' महागुण ' कहा है, अतः ये तीनों कारण रजस् तथा शुक्र रूप बीज में भी रहते हैं और कार्य ( भ्रूण ) में भी रहते हैं । अतएव इनके विषय में भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत से कहा है । देखें —— सु.शा. १।३ । सत्त्व - रजस् - तमस् की निरुक्ति-१. सत्त्वम् — अस्ति इति सत्, सतो भावः सत्त्वम् = अस्तित्व युक्त । २. रजस् ——– रञ्जति अनेन इति रजः = रागः, आसक्तिः वा । ३. तमस् — ताम्यति अनेन इति तमः = विनाशकारक प्रधान गुण । रजोगुण तथा तमोगुण का वर्णन करते हुए महर्षि पुनर्वसु ने कहा है— ' सृष्टि के समय पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आता है और पुनः प्रलयकाल में व्यक्त अवस्था से अव्यक्त अवस्था में चला जाता है । इस प्रकार बन्धन के कारण रजस् तथा तमस् गुणों से युक्त पुरुष संसार - चक्र के समान घूमता रहता है । ( च.शा. १।६८ ) दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परीक्षेत च रोगिणम् । रोगी की परीक्षा — दर्शन ( देखना ), स्पर्शन ( हाथ आदि से छूकर देखना ) तथा रोग सम्बन्धी विविध प्रश्न पूछकर रोगी ( रोग से पीड़ित शरीर वाले ) की परीक्षा करनी चाहिए । वक्तव्य — सुश्रुत ने ‘ ततो प्रश्नेन चेति ' । ( सु.सू. १०/४ ) प्रारम्भ में रोगी देखने के सम्बन्ध में दूसरे किसी आचार्य का मत उद्धृत किया है कि ' दूत, लक्षण, शकुन तथा मंगल की अनुकूलता होने पर रोगी के घर जाना चाहिए ' । इस मत की सामान्य दृष्टि से उपेक्षा करते हुए वे कहते हैं— रोग जानने के छः उपाय हैं— पाँच श्रोत्र आदि इन्द्रियों से और छठा प्रश्न से । २ अ ० हृ ०
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८ अष्टाङ्गहृदये आचार्य पुनर्वसु ‘ रसना इन्द्रिय ' के परीक्षा का विषय किसी को नहीं मानते । देखें — ' रसं तु ‘ ' ' रसाननुमिमीत ' । ( च.वि. ४।७ ) अर्थात् रोगी के शरीर का रस यद्यपि रसना इन्द्रिय द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, परन्तु उसे अनुमान से ही जान लेना चाहिए । इसका प्रत्यक्ष उपाय से ग्रहण करना उचित नहीं है । अतएव रोगी से पूछकर उसके मुख का स्वाद कैसा है, जान ले; जूँ यदि रोगी के शरीर से हट गयी हो तो रोगी के शरीर को नीरस समझ लें । प्राय: साफ- -सुथरे परिवार के रोगियों में यह लक्षण नहीं पाया जाता, तथापि रोगियों के शरीरों में यह लक्षण दिखलायी देता है । मक्खियों के बार - बार शरीर पर बैठने से शरीर की मधुरता समझें । रक्तपित्तरोग में निकलने वाले रक्त की परीक्षा - क्या यह जीवरक्त तो नहीं निकल रहा है, इसके लिए उसे कुत्ते या कौए के सामने डाले, यदि प्राणी खा ले तो उसे जीवरक्त समझें, अन्यथा रक्तपित्त का दूषित रक्त समझें । इस प्रकार अन्य रसों का भी अनुमान कर लेना चाहिए । यह २२ वाँ पद्य अ.सं. ११४५ में अविकल द्रष्टव्य है । रोगी परीक्षा के आधुनिक उपकरण १. थर्मामीटर —यह स्पर्श द्वारा शरीर के तापमान को बतलाता है । इसमें वात - पित्त - कफ दोषों को बतलाने की क्षमता नहीं होती है । २. स्टेथोस्कोप — यह श्रोत्रेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है । इसकी सहायता से कफ से होने वाली हृदय की आवाज सुनी जा सकती है । ब्लडप्रेशर जाँचने में भी चिकित्सक इसका उपयोग करते हैं । ३. एक्स - रे – यह चक्षुरिन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है । त्वचा तथा मांस से ढकी हुई जिन अस्थियों या अस्थिभंग को हम अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते वहाँ यह यन्त्र सहायक होता है । ४. कार्डियोग्राम — हृदय - परीक्षा के लिए इसका उपयोग होता है । जो हृदय क्या कह रहा है, उसे यह टेढ़ी - सीधी रेखाओं द्वारा निर्दिष्ट कर देता है, तदनुसार चिकित्सक उसकी चिकित्सा करते हैं । ५. अल्ट्रासाउण्ड — यह स्थान - विशेष को चित्रित कर देता है, तदनुसार चिकित्सा की जाती है । ६. लिटमस पेपर — इसकी सहायता से हम मूत्र की क्षारता तथा अम्लता का ज्ञान कर लेते हैं । ७. सेक्रोमीटर — इससे मधुमेहरोगी के मूत्र की शंकरा नापी जाती है, इस दृष्टि से यह रसनेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है । इस प्रकार के अन्य अनेक उपकरणों का इस क्षेत्र में आविष्कार होता जा रहा है, उन्हें भी देखें । विशेष — नाड़ीज्ञान के लिए अभी तक जो यन्त्र अत्यधिक प्रयुक्त हुए हैं, वे अधिक श्रद्धेय नहीं हैं । रोगं निदानप्राग्रूपलक्षणोपशयाप्तिभिः ॥ २२ ॥
रोग की परीक्षा — निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय तथा सम्प्राप्ति नामक रोगज्ञान के उपायों से रोग की परीक्षा करनी चाहिए ॥ २२ ॥
वक्तव्य — यहाँ मात्र इनके नामों का उल्लेख कर दिया गया है । विशेष देखें —अ.हृ.नि.अ. १ में । भूमिदेहप्रभेदेन देशमाहुरिह द्विधा । देशभेदों का वर्णन - आयुर्वेदीय दृष्टिकोण के अनुसार देश दो प्रकार का होता है—- १. भूमिदेश और २. देहदेश । शरीर के विभिन्न अवयवों को यहाँ देहदेश कहा गया है । भूमिदेश का वर्णन आगे किया जा रहा है । वक्तव्य — आयुर्वेदशास्त्र में प्रधान महत्त्व निदान एवं चिकित्सा का ही है । यहाँ ग्रन्थकार सूत्र रूप में विषयों का वर्णन कर आगे यथास्थान इन विषयों का विस्तृत विवेचन करेंगे । यह इनकी अपनी शैली है । देह शब्द देश के अर्थ में केवल आयुर्वेद में ही प्रयुक्त हुआ है । देहदेश का क्षेत्र है— सिर, हाथ, पैर आदि ।
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् १ ९ जाङ्गलं वातभूयिष्ठमनूपं तु कफोल्बणम् ॥ २३ ॥
साधारणं सममलं त्रिधा भूदेशमादिशेत् । भूमिदेश का वर्णन – भूमिदेश तीन प्रकार का कहा गया है— १. जांगल देश; यहाँ हवा अधिक चलती है, २. आनूप देश; इस देश में कफदोष की प्रधानता रहती है और ३. साधारण देश; इस देश में वात आदि तीनों दोष समान अवस्था में रहते हैं ॥ २३ ॥
वक्तव्य — ' भूमिदेहप्रभेदेन ' से लेकर ' भूदेशमादिशेत् ' तक की उक्त तीन पंक्तियाँ संग्रह तथा हृदय में समान हैं । इस प्रकार यहाँ संक्षेप में भूमिदेशों का वर्णन किया गया है । इनका विस्तृत वर्णन च.वि. ३।४७-४८, च.क. १।८ तथा सु.सू. के ३६ वें भूमिप्रविभागीय अध्याय में देखें । इन देशों का परिचय औषधसंग्रह, रोगनिर्णय तथा साध्य - असाध्य का विचार करते समय अवश्य कर लेना चाहिए । उक्त तीन प्रकारों के देश - विवेचन से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा सकता है । शार्ङ्गधराचार्य ने तीन प्रकार के देशभेदों की चर्चा इस प्रकार की है— ' बहूदकनगोऽनूपः कफमारुत-रोगवान् । जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मारुतोत्तरः । संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ' । ( शा.सं.पू.खं. ६४ ) १. जाङ्गल देश – रूखा - सूखा मरुस्थल; जैसे — भारत का बीकानेर तथा जैसलमेर क्षेत्र तथा बाहरी प्रदेश अरब, अफ्रीका आदि । प्रायः ये जल तथा वृक्षरहित देश हैं । यहाँ पित्तज, रक्तज एवं वातज रोग अधिक होते हैं । २. आनूप देश - विपुल जल तथा पर्वतों से युक्त देश; जैसे — आसाम, ब्रह्मा तथा बंगाल की खाड़ी, नदी - नालों से व्याप्त भू - प्रदेश । यहाँ कफज तथा वातज रोग अधिक होते हैं । ३. साधारण देश — इसमें वात आदि सभी दोष सम रहते हैं, अतएव यहाँ अधिकांश रोग नहीं होते; फलतः यहाँ के निवासी अन्य देशवासियों की अपेक्षा स्वस्थ, सुन्दर, सुडौल शरीर वाले तथा नीरोग रहते
हैं; जैसे— उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि के निवासी ।
क्षणादिर्व्याध्यवस्था च कालो भेषजयोगकृत् ॥ २४ ॥
काल के भेद – आयुर्वेद में काल दो प्रकार का माना जाता है— १. क्षण अर्थात् प्रातःकाल तथा सायंकाल और २. रोग की अवस्था ( आमावस्था एवं जीर्णावस्था ) । इन दोनों कालों के अनुसार भेषजयोग ( चिकित्सा का प्रयोग ) किया जाता है ॥ २४ ॥
वक्तव्य — कोष - साहित्य में ' क्षण ' शब्द दिन के विभाजन या प्रमाण में प्रयुक्त होता है । दूसरा यह ‘ काल - विशेष ' का भी सूचक है । क्षणादि —यहाँ आदि शब्द से लव ( ३६ निमेष का समय ), त्रुटि ( दो क्षण या क्षण के चतुर्थांश के बराबर काल ), मुहूर्त ( १२ क्षण का या ४८ मिनट का समय ), याम ( पहर या तीन घण्टे का समय ), अहोरात्र ( २४ घण्टे का समय या १ दिन १ रात ), पक्ष ( १५ दिन ), मास ( ३० दिन ), ऋतु ( २ मास का समय ), अयन ( ६ मास का समय ) तथा वर्ष से १२ मासों का ग्रहण कर लेना चाहिए । इस कालभेद का प्रयोग शास्त्र में इस प्रकार देखा जाता है । जैसे— प्रातः काल वमनकारक औषधयोग को देना चाहिए, मध्याह्न में विरेचन कराना चाहिए, फिर कुछ समय रुक कर बस्ति का प्रयोग करना चाहिए आदि । इसके पहले जो देशभेद की व्याख्या की गयी थी, तदनुसार विचार कर अर्थात् यह किस देश का निवासी है, इसका आहार - विहार, रहन - सहन कैसा है, इसे क्या सात्म्य होगा, क्या असात्म्य होगा, यह सब विचार कर तब चिकित्सा करनी चाहिए । अतएव आगे औषध प्रयोग की चर्चा प्रस्तावित है । शोधनं शमनं चेति समासादौषधं द्विधा ।
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाङ्गहृदये औषध के भेद - संक्षिप्त रूप से औषध ( चिकित्सा ) दो प्रकार की होती है— १. शोधन अर्थात् वमन- - विरेचन आदि विधियों से दोषों को निकालना शोधन कहा जाता है और २. शमन अर्थात् उभड़े हुए वात आदि दोषों को शान्त करने का उपचार । वक्तव्य — शोधन - चिकित्सा से बढ़े हुए दोषों को निकाल दिया जाता है एवं शमन - चिकित्सा द्वारा बढ़े हुए दोषों को शान्त कर दिया जाता है । आयुर्वेदोक्त समस्त औषधों का समावेश शोधन तथा शमन औषधों में हो जाता है । उक्त श्लोक में जो ' औषध ' शब्द का प्रयोग हुआ है, यहाँ इसका अर्थ है — ' चिकित्सा ' । देखें — च.सू. १०।३; च.चि. ११३ तथा अ.हृ.सू. के द्विविधोपक्रमणीय नामक १४ वें अध्याय को भी इस
प्रसंग में देखें ।
शरीरजानां दोषाणां क्रमेण परमौषधम् ॥ २५ ॥
बस्तिर्विरेको वमनं तथा तैलं घृतं मधु । शारीरिक दोषों की चिकित्सा- शरीरसम्बन्धी दोषों की उत्तम चिकित्सा क्रमश: इस प्रकार है — वातदोष की चिकित्सा बस्ति - प्रयोग, पित्तदोष की चिकित्सा विरेचन - प्रयोग तथा कफदोष की चिकित्सा वमन - प्रयोग है तथा वातदोष में तैल, पित्तदोष में घृत और कफदोष में मधु का प्रयोग उत्तम शमन - चिकित्सा है ॥ २५ ॥
वक्तव्य — उक्त श्लोक द्वारा शारीरिक दोषों की संक्षिप्त चिकित्सा कही गयी है । इनका विस्तृत विवरण अ.हृ.सू. अध्याय १६ में स्नेहविधि, १८ में वमन एवं विरेचन विधि, १ ९ में बस्तिविधि को कहा गया है । अष्टांगहृदय का यह सूत्रस्थान है । आर्ष आयुर्वेदीय संहिता -ग्रन्थों का यह प्राचीन विषय-विभागक्रम रहा है । इसमें यथासम्भव आयुर्वेद सम्बन्धी अर्थों की सूचना होती है । इसमें आयुर्वेद के सूत्रों को मणियों की भाँति गुँथा गया है और इन्हीं सूत्रों की अगले अध्यायों या स्थानों में विस्तृत व्याख्यान करने की इसमें प्रतिज्ञा की गयी है; अतः इसे ' सूत्रस्थान ' कहा गया है । अतएव उक्त २५ वाँ पद्य इसका
एक उदाहरण मात्र है ।
1 धीधैर्यात्मादिविज्ञानं मनोदोषौषधं परम् ॥ २६ ॥
मानसिक दोषों की चिकित्सा - मानसिक ( रजस् तथा तमस् ) दोषों की उत्तम चिकित्सा है— बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादि विज्ञान ( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है, यह कौन देश तथा कौन मेरे हितैषी या सहायक हैं ) का विचार कर कार्य करना ॥ २६ ॥
वक्तव्य —— नीति- उपदेष्टा आचार्य चाणक्य ने कुछ ऐसी ही स्थिति को ध्यान में रखकर यह पद्य कहा होगा — ' कः कालः कानि मित्राणि को देश: कौ व्ययागमौ । कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ' ॥ ( चाणक्यनीति ) । वस्ति, विरेचन, वमन तथा तैल, घृत, मधु के प्रयोगों से क्रमशः वात, पित्त, कफ दोषों का शमन हो जाता है और बुद्धि, धैर्य आदि से रजोगुण एवं तमोगुण जनित राग तथा क्रोध आदि की शान्ति हो जाती है । भिषग्द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । चिकित्सितस्य निर्दिष्टं, प्रत्येकं तच्चतुर्गुणम् ॥ २७ ॥
चिकित्सा के चार पाद — चिकित्सा - कर्म के चार पाद ( चरण या विभाग ) माने जाते हैं । जैसे— १. भिषक् ( वैद्य या चिकित्सक ), २. द्रव्य ( मैनफल आदि वमनकारक अर्थात् शोधन द्रव्य, गुरुच आदि शमन द्रव्य तथा बस्ति आदि शोधन उपकरण ), ३. उपस्थाता ( उप समीपे तिष्ठतीति ) – परिचारक ( जो रोगी के पास में रहकर उसकी देख - भाल करे; उसे उठाये, बैठाये, खिलाये, पिलाये तथा मल - मूत्र करने में सहायता करे ) और ४. रोगी । इन चारों में प्रत्येक में चार - चार गुण होने चाहिए ॥ २७ ॥
दक्षस्तीर्थात्तशास्त्रार्थे दृष्टकर्मा शुचिर्भिषक् ।
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् २१ वैद्य के चार लक्षण— १. दक्ष ( चिकित्साकर्म में कुशल ), २. तीर्थ ( आचार्य ) से शास्त्र ( आयुर्वेदशास्त्र ) के अर्थ को ग्रहण कर चुका हो । ३. दृष्टकर्मा ( चिकित्सा की विधियों को जो अनेक बार
देख चुका हो ) और ४. जो शुचि ( शरीर तथा आचरण से पवित्र ) हो ।
बहुकल्पं बहुगुणं सम्पन्नं योग्यमौषधम् ॥ २८ ॥
औषध - द्रव्य के चार लक्षण - १. बहुकल्प ( जो स्वरस, क्वाथ, फाण्ट, अवलेह, चूर्ण आदि अनेक रूपों में दिया जा सकता ) हो, २. बहुगुण ( जो औषध के सभी गुणों से सम्पन्न ) हो, ३. सम्पन्न ( अपने गुणों की सम्पत्ति से जो युक्त ) हो और ४. योग्य ( जो रोग - रोगी, देश, काल आदि के अनुकूल ) हो ॥ २८ ॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षो बुद्धिमान् परिचारकः । परिचारक ( उपस्थाता ) के चार लक्षण - १. अनुरक्त ( रोगी से स्नेह रखने वाला ), २. शुचि ( खान - पान, औषधि खिलाने, रखने आदि में साफ - सफाई रखने वाला ), ३. दक्ष ( कुशल ) तथा ४. बुद्धिमान्
( समयोचित सूझ - बूझ वाला ) होना चाहिए ।
आढ्यो रोगी भिषग्वश्यो ज्ञापकः सत्त्ववानपि ॥ २ ९ ॥
रोगी के चार लक्षण – १. आढ्य ( धन - जन आदि से सम्पन्न ), २. भिषग्वश्य ( वैद्य की आज्ञानुसार औषध तथा पथ्य सेवन करने वाला ), ३. ज्ञापक ( अपने सुख - दुःख कहने में सक्षम ) तथा ४. सत्त्ववान् ( मानसिक शक्तिसम्पन्न अर्थात् चिकित्साकाल में होने वाले कष्टों से न घबड़ाने वाला ) हो ॥२ ९ ॥ वक्तव्य — चरक - सूत्रस्थान अध्याय ९ का नाम ' खुड्डाकचतुष्पाद ' है । इस सम्पूर्ण अध्याय में वैद्य, द्रव्य, परिचारक तथा रोगी इन्हीं चिकित्सा के चार पादों का वर्णन किया गया है, इसे देखें । इसके अगले दसवें अध्याय में मैत्रेय की शंकाओं का आत्रेय पुनर्वसु द्वारा जो समाधान दिया है, वह भी ध्यान देने योग्य है । चिकित्सा के चार पादों में वैद्य सब में उत्तम ( प्रधान ) होता है, क्योंकि यदि वैद्य नहीं है तो अन्य तीन पाद गुणवान् होने पर भी अपना - अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर पाते । अतएव चिकित्सक को ( च.सू. ९ । १० में ) विज्ञाता, शासिता, योक्ता तथा प्रधान कहा गया है । इन विशेषणों का तात्पर्य है— १. विज्ञाता अर्थात् औषधियों का जानकार, २. शासिता — परिचारक या परिचारकों से समयोचित कार्य कराने में सक्षम एवं कुशल और ३. योक्ता — रोगी को यह खाओ, यह पीओ आदि व्यवस्था देने में चतुर । इस प्रकार औषध - द्रव्य आदि तीनों वैद्य के अधिकार में रहते हैं । इनमें विज्ञाता विशेष ज्ञानवान् होने के कारण वैद्य प्रधान एवं स्वतन्त्र होता है । अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान २८ - ९ में सुयोग्य वैद्य के तथा श्लोक १२ में राजवैद्य के लक्षण दिये हैं । इसी प्रसंग में श्लोक १० में कुवैद्य के भी लक्षण सामाजिकों के परिचयार्थ दिये गये हैं, इन्हें देखें । शार्ङ्गधराचार्य ने जो वैद्य के लक्षण दिये हैं, वे मननीय हैं— ' तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती । लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी प्रियंवदः । सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ' ॥ ( शा.सं.पू.खं. ३।२३-२४ ) अर्थ स्पष्ट है । रोगी के गुणों में एक गुण ' ज्ञापक ' है— जिसका अर्थ है— अपनी बात को जो ठीक प्रकार से कह सके । बालक रोगी में यह शक्ति नहीं होती, अतएव चिकित्सक को उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए । उसकी विधि वाग्भट ने अ.हृ. उ. २ में बतलायी है, आप ध्यान दें । चिकित्सा के चार पादों ( पैरों ) का यहाँ वर्णन किया गया है । इसका आशय है कि वह ( चिकित्सा ) अपने बल पर खड़ी रह सके, गतिशील हो और सफल हो । यदि कोई पाद कम पड़ जायेगा तो वह डगमगाने लगेगी, अतः चिकित्साकाल में चारों पादों की व्यवस्था सतर्कता से होनी चाहिए । ( साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा, तौ तु पुनर्द्विधा । सुसाध्यः कृच्छ्रसाध्यश्च, यायो यश्चानुपक्रमः ॥ )
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२ अष्टाङ्गहृदये सर्वोषधक्षमे देहे यूनः पुंसो जितात्मनः । अमर्मगोऽल्पहेत्वग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः ॥ ३० ॥
अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः पादसम्पदि । ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोषमार्गो नवः सुखः ॥ ३१ ॥
साध्य - असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद - १. साध्य तथा २. असाध्य इस प्रकार रोग के दो भेद होते हैं । इनके भी पुनः दो भेद होते हैं— १. सुखसाध्य एवं २. कृच्छ्र ( कष्ट ) साध्य । इसके बाद असाध्य के पुनः दो भेद होते हैं—– १. याप्य ( कुछ दिन चिकित्सा द्वारा चलाने योग्य ) और २. अनुपक्रम अर्थात् चिकित्सा के अयोग्य या प्रत्याख्येय ( जवाब देकर चिकित्सा करने योग्य ) ॥ १ ॥
सुखसाध्य रोग के लक्षण — जिस रोगी का शरीर सभी प्रकार की चिकित्साविधियों को सहन करने में समर्थ ( सक्षम ) हो, जो युवक ( बालक या वृद्ध न ) हो, जो जितेन्द्रिय हो, जिसका रोग किसी मर्मस्थल में उत्पन्न न हुआ हो, जिस रोग के उत्पादक हेतु ( कारण ), पूर्वरूप, रूप आदि थोड़े एवं सामान्य ( उग्र न ) हों, जिसमें अभी तक कोई उपद्रव पैदा न हुए हों तथा जिसमें दूष्य, देश, ऋतु एवं प्रकृति समान न हों, चिकित्साकाल में उक्त चारों पाद अपने - अपने गुणों से सम्पन्न हों; सूर्य - चन्द्र आदि ग्रह अनुकूल हों, रोग एक दोष से उत्पन्न हों, एकमार्गगामी हो ( जैसे रक्तपित्तरोग– ' ऊर्ध्वं साध्यम् ' ) और रोग नया हो ॥ ३०-३१ ॥ वक्तव्य — यद्यपि यह कोष्ठांकित पद्य अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान अध्याय २१२६ का है, फिर भी यह प्रसंगोचित है, अतएव कुछ विद्वान् इसका यहाँ भी संग्रह करते हैं । रोग के भेदों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ साध्य रोगी के स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है — ' सर्वौषधक्षमे देहे ' अर्थात् जो तीक्ष्ण, मध्य, मृदु सभी प्रकार की औषधियों को तथा शोधन - शमन चिकित्सा में प्रयुक्त विष - क्षार आदि द्रव्यों के प्रयोगों को सहन कर सके । इसके आगे ' श्रीअरुणदत्त ' कहते हैं— ' पुंसो न स्त्रियाः ' । ' पुंग्रहणं स्त्रीनिवृत्त्यर्थम् ' । यह विचार उनका केवल इस अंश में माना जा सकता है कि पुरुष - शरीर से स्त्री - शरीर ' मृदु ' होता है, अन्यथा चिकित्सा क्षेत्र में पुरुष शब्द से प्राणिमात्र का ग्रहण किया जाता है । आप देखें— ' खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः ' । ( च.शा. १।१६ ) और भी — ‘ वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः ' ॥ ( च.शा. १।३६ ) रोगों की साध्यता एवं असाध्यता का विचार हम स्त्री - शरीर में भी करेंगे । जितात्मनः - जिसने अपनी इन्द्रियों के साथ आत्मा को जीत लिया है अर्थात् जिसे विषयों के उपभोग की प्रवृत्ति न हो । अमर्मगः – जो रोग मर्मों ( प्राणहर मर्मो— सिर, हृदय, बस्ति आदि ) में उत्पन्न न हुआ हो । अनुपद्रवः - वर्तमान में उत्पन्न रोग के बाद जो दूसरा रोग उत्पन्न हो जाता है, उसे ' उपद्रव ' कहते हैं, उससे रहित अर्थात् पूर्व चिकित्सा में जो बाधक हो । अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः- -अतुल्य = जो रोग के समान न हो । जैसे दूष्य — मेदस् तथा मज्जा में उत्पन्न रोग, अनूपदेश में जाड़े में उत्पन्न रोग । रोगी वातप्रकृति का हो और उसका पित्तदोष प्रकुपित हो तो सुखसाध्य होता है । अतुल्यदूष्य — शीतगुण - प्रधान कफ से उष्णगुण- प्रधान रक्त का दूषित होना । अतुल्यदेशज रोग — अनूपदेश में पित्तदोष से उत्पन्न रोग । अतुल्यऋतु – शरद् ऋतु में कफज रोग । अतुल्यप्रकृति – पित्तप्रकृति वाले पुरुष को कफज रोग की उत्पत्ति । ये सुखसाध्य के लक्षण हैं । कहीं चिकित्सा क्षेत्र में विपरीत स्थिति के भी दर्शन होते हैं । यथा— ' ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्य-दूष्यता । रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ' || अर्थ स्पष्ट है । पादचतुष्टय की उपलब्धि भी चिकित्सा-सौकर्य में सहायक होती है । ग्रहेष्वनुगुणेषु – आयुर्वेद का ज्योतिषशास्त्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतएव अनुकूल ग्रह - नक्षत्र आदि की चर्चा यहाँ की गयी है । एकदोषमार्ग: - तीनों में से किसी एक दोष का होना । द्विदोषज, त्रिदोषज रोग उत्तरोत्तर कष्टसाध्य तथा असाध्य होते हैं । मार्ग तीन प्रकार के कहे गये हैं— १. बाह्य, २. अन्तर, ३. मध्य । नवः – प्रायः नये रोग सुखसाध्य होते हैं । वे ही रोग विलम्ब कर देने से कष्टसाध्य हो जाते हैं । अतएव कहा गया है— ' सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ' ।
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आयुष्कायीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्करे च ततो गदः । कष्टसाध्य रोग के लक्षण — कृच्छ्र शब्द का अर्थ है— कष्ट । कष्टसाध्य वे रोग होते हैं जिनमें शस्त्र, क्षार, अग्नि ( दाह ) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किये जाते हैं । जिन रोगों में ऊपर कहे गये
सुखसाध्य के लक्षण संकर ( मिले - जुले ) हों अर्थात् पूर्णरूप से विद्यमान न हों ।
शेषत्वादायुषो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये ॥ ३२ ॥
याप्य रोग के लक्षण- -उस रोग को ' याप्य ' कहते हैं जिसमें पूर्वोक्त सुखसाध्य के लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, किन्तु आयु के शेष ( बचे ) रहने के कारण तथा पथ्य ( हितकर ) आहार - विहार तथा औषध ( यथायोग्य चिकित्सा ) के अभ्यास ( लगातार सेवन ) करने के कारण रोगी चल - फिर सक रहा हो ॥ ३२ ॥
वक्तव्य- -'याप्य ' चिकित्सा ' की वह स्थिति है जिसे चिकित्सक पूर्ण रूप से स्वस्थ कर देना चाहता है, किन्तु ऐसा कर नहीं सकता और यह चिकित्सा तब तक चल सकती है जब तक रोगी की आयु शेष है । इसके सम्बन्ध में विशेष विवरण देखें— ' दत्त्वाऽल्पं हितैः ' । ( अ.सं.सू. २।३१-३२ ) अर्थात् जो रोग उचित चिकित्सा करने तथा पथ्य सेवन करते रहने से कुछ शान्त रहता है, उसे ' याप्य ' कहते हैं । व्याकरणशास्त्र में ' याप्य ' का अर्थ कुत्सित या निन्दित है । देखें —याप्ये पाशप् ( अ. ५।३।४७ ) । अनुपक्रम एव स्यात्स्थितोऽत्यन्तविपर्यये । औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टरिष्टोऽक्षनाशनः ॥ ३३ ॥
प्रत्याख्येय रोग के लक्षण – उस रोग को ' अनुपक्रम ' भी कहते हैं जो सुखसाध्य लक्षणों से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य, मोह तथा अरति ( बेचैनी ) लक्षणों वाला हो, जिसमें अरिष्ट लक्षण दिखलायी दे रहे हों एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का नाश हो गया हो ॥ ३३ ॥
वक्तव्य- - उक्त ३३ वें श्लोक में कहे गये सभी लक्षण असाध्य रोग के हैं । आप भी लक्षणों पर ध्यान दें । ' औत्सुक्य ' भाव को आप रोगी में इस प्रकार देखेंगे —अधिक प्रसन्न होना या उठ उठ कर दौड़ना आदि या मोह, बेहोशी, प्रलाप ( अंट - संट बकना ) आदि । ' अरति ' ( बेचैनी ), हाथ - पाँव का पटकना या सिर को घुमाते रहना । ‘ दृष्टरिष्ट: ' - जिसमें अरिष्ट ( मृत्युकारक ) लक्षण दिखलायी दे रहे हों । आयुर्वेद में ' रिष्ट ' तथा अरिष्ट ' दोनों शब्द समानार्थक हैं । ' अक्षनाशन: ' - -अक्ष का अर्थ है ज्ञानेन्द्रियाँ, इनकी क्रियाशक्ति का जिस रोगी में नाश हो गया हो अर्थात् जो संज्ञाशून्य हो गया हो । उत्तम चिकित्सक घर के लोगों से उसके रोग की विषम ( असाध्य ) स्थिति को बतला कर उसकी चिकित्सा न करे । देखें I च. सू. १०१८ । इस अध्याय में श्लोक ९ से २२ तक का अवश्य अवलोकन करें । देखें— इस विषय में महर्षि चरक ने अपने शब्दों में किस प्रकार कहा है? त्यजेदार्तां भिषग्भूपैर्द्विष्टं तेषां द्विषं द्विषम् । हीनोपकरणं व्यग्रमविधेयं गतायुषम् ॥ ३४ ॥
चण्डं शोकातुरं भीरुं कृतघ्नं वैद्यमानिनम् । त्याज्य रोगी — चिकित्सक को चाहिए कि निम्नलिखित प्रकार के रोगियों की चिकित्सा न करे— १. जिससे राजा या महाजन द्वेष करता हो और जो स्वयं अपना द्वेषी हो, २. जो राजाओं ( श्रीमानों ) से द्वेष करता हो, ३. वैद्य से द्वेष करता हो, ४. जिसके पास चिकित्सा के उपयोगी साधन न हों, ५. जो व्यग्र हो अर्थात् जो चिकित्सा कराने में सक्रिय न हो, इधर - उधर भटकता रहता हो, ६. जो रोगी चिकित्सक की आज्ञा के अनुसार चलना स्वीकार न करता हो, ७. जो गतायु हो ( इसका ज्ञान ज्योतिषी आदि से किया जा सकता है ) अर्थात् जो अब अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा, ८. जो अत्यन्त क्रोधी हो; ९. शोकातुर अर्थात् जो पुत्र - स्त्री -धन - 1 आदि के नाश से दुःखी हो, १०. जो भीरु ( डरपोक ) हो अर्थात् जो पञ्चकर्म आदि क्रियाओं से डरता हो, ११. कृतघ्न अर्थात् जो दूसरों द्वारा किये गये उपकार को न मानता हो और १२. जो वैद्यमानी हो अर्थात् जिसमें वैद्य का ज्ञान न हो, फिर भी अपने को वैद्य समझता हो ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — इन त्याज्य रोगियों के लिए सरकारी अस्पताल बने हैं, अतः व्यक्तिगत चिकित्सक इन झंझटों में न पड़ें; यह शास्त्रीय उद्बोधन है । इनसे अपयश तो मिल सकता है किन्तु धर्म, अर्थ, यश की प्राप्ति नहीं हो सकती । महर्षि चरक ने भी प्रकारान्तर से इनकी चिकित्सा करने का निषेध किया है । देखें — च.सि. २।४-६ । इसी के आगे ७ वें पद्य में कहा है— ' एभ्योऽन्ये समुपक्रम्या नराः सर्वैरुपक्रमैः ' । वाग्भट ने अ.सं.सू. २।३४ में कहा है— पहले रोग की परीक्षा कर ले, तभी चिकित्सा करना प्रारम्भ करे । तन्त्रस्यास्य परं चातो वक्ष्यतेऽध्यायसङ्ग्रहः ॥ ३५ ॥
अध्यायसंग्रह - वर्णन — अब यहाँ से सम्पूर्ण अष्टांगहृदयतन्त्र के अध्यायों के संग्रह का वर्णन किया जा रहा है ॥ ३५ ॥
वक्तव्य- -यह क्रम संहिता के रचयिताओं का अथवा तन्त्रकारों का अन्यत्र भी देखा जाता है । ' अतः परं ' = इसके बाद तथा ' अस्मात् ऊर्ध्वं ' = इसके आगे । इस प्रकार का संकेत तन्त्रकार अपने ग्रन्थ, संहिता या तन्त्र में किया करते हैं । आयुष्कामदिनवहारोगानुत्पादनद्रवाः । अन्नज्ञानान्नसंरक्षामात्राद्रव्यरसाश्रयाः ॥ ३६ ॥
दोषादिज्ञानतद्भेदतच्चिकित्साद्वयुपक्रमाः । शुद्धयादिस्नेहनस्वेदरेकास्थापननावनम् ॥ ३७ । धूमगण्डूषदृक्सेकतृप्तियन्त्रकशस्त्रकम् । शिराविधिः शल्यविधिः शस्त्रक्षाराग्निकर्मिकौ ॥ ३८ ॥
सूत्रस्थानमिमेऽध्यायास्त्रिंशत्— सूत्रस्थान के अध्याय — सूत्रस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है — १. आयुष्कामीय, २. दिनचर्या, ३. ऋतुचर्या, ४. रोगानुत्पादनीय, ५. द्रवद्रव्यविज्ञानीय, ६. अन्नस्वरूपविज्ञानीय, ७. अन्नरक्षाध्याय, ८. मात्रा-शितीय, ९. द्रव्यादिविज्ञानीय, १०. रसभेदीय, ११. दोषादिविज्ञानीय, १२. दोषभेदीय, १३. दोषोपक्रमणीय, १४. द्विविधोपक्रमणीय, १५. शोधनादिगणसंग्रह, १६. स्नेहविधि, १७. स्वेदविधि, १८. वमन विरेचनविधि, १ ९. बस्तिविधि, २०. नस्यविधि, २१. धूम्रपानविधि, २२. गण्डूषादि विधि, २३. आश्चोतनाञ्जनविधि, २४. तर्पण-पुटपाकविधि, २५. यन्त्रविधि, २६. शस्त्रविधि, २७. सिराव्यधविधि, २८. शल्याहरणविधि, २ ९. शस्त्रकर्मविधि
तथा ३०. क्षाराग्निकर्मविधि । ये अध्याय सूत्रस्थान में हैं ॥ ३६-३८ ॥
- शारीरमुच्यते । गर्भावक्रान्तितद्व्यापदङ्गमर्मविभागिकम् ॥ ३ ९ ॥
विकृतिर्दूतजं षष्ठं— शारीरस्थान के अध्याय -- शारीरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है — १. गर्भावक्रान्ति, २. गर्भव्यापद्, ३. अङ्गविभाग, ४. मर्मविभागीय, ५. विकृतिविज्ञानीय तथा ६. दूतादिविज्ञानीय । ये अध्याय शारीरस्थान में हैं ॥ ३ ९ ॥ —निदानं सार्वरोगिकम् । ज्वरासृक्श्वासयक्ष्मादिमदाद्यर्शोऽतिसारिणाम् ॥ ४० ॥
मूत्राघातप्रमेहाणां विद्रध्याद्युदरस्य च । पाण्डुकुष्ठानिलार्तानां वाताम्रस्य च षोडश ॥ ४१ ॥
निदानस्थान के अध्याय — निदानस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है — १. सर्वरोगनिदान, २. ज्वरनिदान, ३. रक्तपित्तकासनिदान, ४. श्वासहिक्कानिदान, ५. राजयक्ष्मानिदान, ६. मदात्ययनिदान, ७. अर्शोनिदान, ८. अतिसारग्रहणीरोगनिदान, ९. मूत्राघातनिदान, १०. प्रमेहनिदान, ११. विद्रधिवृद्धि - गुल्म-निदान, १२. उदररोगनिदान, १३. पाण्डुरोगशोफविसर्प निदान, १४. कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदान, १५. वातव्याधि-निदान तथा १६. वातशोणितनिदान । ये अध्याय निदानस्थान में हैं । ४०-४१ ॥ चिकित्सितं ज्वरे रक्ते कासे श्वासे च यक्ष्मणि । वमौ मदात्ययेऽर्शः सु, विशि द्वौ द्वौ च मूत्रिते ॥ विद्रधौ गुल्मजठरपाण्डुशोफविसर्पिषु । कुष्ठश्वित्रानिलव्याधिवातास्रेषु चिकित्सितम् ॥ ४३ ॥
द्वाविंशतिरिमेऽध्यायाः-