श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 61–70

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 61–70

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आयुष्कायीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् २५ चिकित्सितस्थान के अध्याय - चिकित्सितस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है — १. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४. श्वासहिक्का, ५. राजयक्ष्मादि, ६. छर्दिहृद्रोगतृष्णा, ७. मदात्ययादि, ८. अर्शसां चिकित्सित, ९. अतिसार, १०. ग्रहणीरोग, ११. मूत्राघात, १२. प्रमेह, १३. विद्रधिवृद्धि, १४. गुल्म, १५. उदर, १६. पाण्डुरोग, १७. श्वयथु, १८. विसर्प, १ ९. कुष्ठ, २०. श्वित्रक्रिमि, २१. वातव्याधि तथा २२. वातशोणित । ये अध्याय चिकित्सितस्थान में हैं ॥ ४२-४३ ॥ —कल्पसिद्धिरतः परम् । कल्पो वमेर्विरेकस्य तत्सिद्धिर्बस्तिकल्पना ॥ ४४ ॥

सिद्धिर्बस्त्यापदां षष्ठो द्रव्यकल्पः-कल्प - सिद्धिस्थान के अध्याय —–— कल्प - सिद्धिस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है— १. वमनकल्प, २. विरेचनकल्प, ३. वमनविरेचनसिद्धि, ४. बस्तिकल्प, ५. बस्तिव्यापत्सिद्धि तथा ६. भेषजकल्प । ये अध्याय कल्प - सिद्धिस्थान में हैं ॥ ४४ ॥

—अत उत्तरम् । बालोपचारे तद्व्याधौ तद्ग्रहे, द्वौ च भूतगे ॥ ४५ ॥

उन्मादेऽथ स्मृतिभ्रंशे, द्वौ द्वौ वर्त्मसु सन्धिषु । दृक्तमोलिङ्गनाशेषु त्रयो, द्वौ द्वौ च सर्वगे ॥ ४६ ॥

कर्णनासामुखशिरोव्रणे, भङ्गे भगन्दरे । ग्रन्थ्यादौ क्षुद्ररोगेषु गुह्यरोगे पृथग्द्वयम् ॥ ४७ ॥

विषे भुजङ्गे कीटेषु मूषकेषु रसायने । चत्वारिंशोऽनपत्यानामध्यायो बीजपोषणः ॥ ४८ ॥

उत्तरस्थान के अध्याय — उत्तरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—– १. बालोपचरणीय, २. बालामयप्रतिषेध, ३. बालग्रहप्रतिषेध, ४. भूतविज्ञानीय, ५. भूतप्रतिषेध, ६. उन्मादप्रतिषेध, ७. अपस्मार-( स्मृतिभंश ) प्रतिषेध, ८. वर्त्मरोगविज्ञानीय, ९. वर्त्मरोगप्रतिषेध, १०. सन्धिसितासितरोगविज्ञानीय, ११. सन्धिसितासितरोगप्रतिषेध, १२. दृष्टिरोगविज्ञानीय, १३. तिमिरप्रतिषेध, १४. लिङ्गनाशप्रतिषेध, १५. सर्वाक्षिरोगविज्ञानीय, १६. सर्वाक्षिरोगप्रतिषेध, १७. कर्णरोगविज्ञानीय, १८. कर्णरोगप्रतिषेध, १ ९. नासा-रोगविज्ञानीय, २०. नासारोगप्रतिषेध, २१. मुखरोगविज्ञानीय, २२. मुखरोगप्रतिषेध, २३. शिरोरोगविज्ञानीय, २४. शिरोरोगप्रतिषेध, २५. व्रणविज्ञानीय, २६. सद्योव्रणप्रतिषेध, २७. भङ्गप्रतिषेध, २८. भगन्दरप्रतिषेध, २ ९. ग्रन्थि - अर्बुद - श्लीपद - अपची - नाड़ीविज्ञानीय, ३०. ग्रन्थि - अर्बुद - श्लीपद - अपची - नाड़ी - प्रतिषेध, ३१. क्षुद्ररोगविज्ञानीय, ३२. क्षुद्ररोगप्रतिषेध, ३३. गुह्यरोगविज्ञानीय, ३४. गुह्यरोगप्रतिषेध, ३५. विषप्रतिषेध, ३६. सर्पविषप्रतिषेध, ३७. कीटलूतादिप्रतिषेध, ३८. मूषिकलार्कविषप्रतिषेध, ३ ९. रसायनाध्याय तथा

४०. वाजीकरणाध्याय । ये अध्याय उत्तरस्थान में हैं ॥ ४५-४८ ॥

इत्यध्यायशतं विंशं षड्भिः स्थानैरुदीरितम् ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने आयुष्कामीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अष्टांगहृदय के छः स्थान — इस प्रकार सम्पूर्ण अष्टांगहृदय के १२० अध्यायों की नाम - गणना उक्त ( १. सूत्र, २. शारीर, ३. निदान, ४. चिकित्सित, ५. कल्प - सिद्धि तथा ६. उत्तर नामक ) छः स्थानों में कर दी गयी है ॥४८ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित ‘ निर्मला ’ हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय - सूत्रस्थान में आयुष्कामीय नामक पहला अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

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द्वितीयोऽध्यायः अथातो दिनचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से दिनचर्या नामक अध्याय का वर्णन करेंगे, इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था ॥ १ ॥

उपक्रम — दिनचर्या शब्द से रात्रिचर्या, ऋतुचर्या आदि का भी ग्रहण कर लिया जाता है । दिनचर्या शब्द में इतने अर्थ छिपे हैं— ' दिने दिने चर्या, दिनस्य चर्या किं वा दिनानां चर्या = दिनचर्या ' । इस प्रकार परिभाषित करने पर उक्त सभी अर्थों का इसमें समावेश हो जाता है । इस अध्याय में उन आचरणों की चर्चा की जायेगी जो नर - नारी के लिए दोनों लोकों में हितकर होती है । हमारा यह आयुर्वेद इस लोक और परलोक को मानता है । आपको इसके अनेक प्रमाण मिलेंगे, अस्तु । विशेष देखें— इसी अध्याय के ४८ वें पद्य को । निरुक्ति — गति तथा भक्षण अर्थ में प्रयुक्त चर् धातु से यत् + टाप् प्रत्यय करने पर चर्या शब्द निष्पन्न होता है । इसका अर्थ है — आहार - विहार तथा आचरण विधि । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. ५, ७, ८; सु.चि. २४ तथा अ.सं.सू. ३ में देखें । ब्राह्मे मूहूर्त उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः । ब्राह्ममुहूर्त में जागना — स्वस्थ ( नीरोग ) स्त्री - पुरुष को अपनी आयु ( सुखायु - हितायु ) की रक्षा करने के लिए प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठना चाहिए । वक्तव्य — ब्राह्ममुहूर्त — रात के पिछले पहर की दो घड़ी या दो दण्ड । श्रीअरुणदत्त ब्राह्ममुहूर्त की व्याख्या करते हुए कहते हैं— ' राश्चतुर्दशो मुहूर्तो ब्राह्म मुहूर्तः ', किन्तु ' मुहूर्तचिन्तामणि ' के विवाह - प्रकरण में दिये गये ५३ वें पद्य में दिया गया रात्रि का १४ वाँ मुहूर्त ' त्वाष्ट्र ' है, जिसका स्वामी चित्रा नामक नक्षत्र है । हाँ, आठवें मुहूर्त का नाम ' ब्रह्मा ' है, जो प्रसंगोचित नहीं है । इसके आगे वे कहते हैं— ' ब्रह्म - ज्ञानं तदर्थमध्ययनाद्यपि ब्रह्म, तस्य योग्यो मुहूर्तो ब्राह्मः ' । यह व्याख्या युक्तियुक्त प्रतीत होती है । अन्यत्र कहा गया है — ‘ रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मुहूर्तो ब्राह्म उच्यते ' । यह नियम केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है । सूर्योदय से पहले रात्रि के अन्तिम प्रहर की चार घड़ियों को ' ब्राह्ममुहूर्त ' माना गया है ।

सततं ' ( सु.चि. २४।३ ) में प्रतिदिन प्रातः काल उठकर, इतना ही कहा है ।

शरीरचिन्तां निर्वर्त्य कृतशौचविधिस्ततः ॥

अर्कन्यग्रोधखदिरकरञ्जककुभादिजम् । प्रातर्भुक्त्वा च मृद्वग्रं कनीन्यग्रसमस्थौल्यं प्रगुणं द्वादशाङ्गुलम् । भक्षयेद्दन्तपवनं दतवन का विधान — उठते ही शरीर की चिन्ता से निवृत्त होकर अर्थात् विचार करके यदि वह अपने को दिनचर्या करने योग्य समझे तब वह शौचविधि सुश्रुत ने केवल ‘ उत्थायोत्थाय १ ॥ कषायकटुतिक्तकम् ॥ २ ॥

दन्तमांसान्यबाधयन् ॥ ३ ॥

मैं उठने योग्य हूँ या नहीं — ऐसा ( मल - मूत्र त्याग कर मल - मूत्र स्थानों को मिट्टी, जल आदि से शुद्ध करने के बाद अर्क, बरगद, खैर या बबूल, करञ्ज ( डिठौरी ), ककुभ ( अर्जुन ) आदि वृक्षों में से किसी की पतली शाखा को लेकर दतवन ( दातौन ) करे ।

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् २७ दतवन करने के दो समय होते हैं— १. प्रातः काल और २. भोजन कर लेने के बाद । इससे मुख की मलिनता दूर होती है और भोजन करने के बाद दाँतों या मसूड़ों में फँसे हुए अन्नकण आदि निकल जाते हैं । दतवन करने की विधि - दतवन के अगले भाग को दाँतों से चबाकर अथवा कूटकर मुलायम कर लेना चाहिए, नहीं तो उसकी रगड़ मसूड़ों में लग सकती है । इस ( दतवन ) का रस कसैला ( खैर या बबूल का जैसा ) या कटु ( तेजबल या तिमूर का जैसा ) अथवा तिक्त ( नीम का जैसा ) होना चाहिए । इसकी मोटाई कनीनिका ( सबसे छोटी पाँचवीं अंगुली ) के समान तथा लम्बाई बारह अँगुल होनी चाहिए । इस प्रकार की दतवन को लेकर दाँतों पर इस प्रकार घिसें जिससे मसूड़ों पर खरोश न लगे और दाँत स्वच्छ हो जायें ॥ १-३ ॥ वक्तव्य- -वाग्भट ने ‘ अर्क ' ( मदार ) की दतवन करने का विधान किया है, तथापि दूध इसकी शाखा को मुख में न डाले, अन्यथा मुख पक जायेगा, घाव हो जायेंगे । अतः इसकी बाहरी त्वचा को छीलकर तथा पानी से धोकर ही इसका दतवन के लिए प्रयोग करें । आजकल अनेक चूर्णों तथा मञ्जनों का दाँत साफ करने के लिए प्रयोग होने लगा है । इसका प्रयोग उँगली या ब्रश से किया जाता है, अतः ब्रश का मुलायम होना अति आवश्यक है । दूसरी ओर ' कोलगेट ' आदि टूथपेस्टों का प्रयोग चल पड़ा है । जहाँ उचित गुण वाली दतवन सुलभ नहीं है वहाँ सुलभ विकल्पों का प्रयोग कर लेना चाहिए । ध्यान रहे — दाँत जिससे साफ हों, मसूड़ों को हानि न पहुँचे उसका उपयोग करें । इसका प्रयोग करने से मुखरोग नहीं होते और मुख साफ बना रहता है । सुश्रुत ने चि.२४।४-१२ में जो मधुर रस वाली दतवन का विधान किया है, उसका तात्पर्य है — मुखपाक ( सर्वसर ) या मुखदाह आदि पित्तज विकारों में इसका प्रयोग करना चाहिए । इसके अतिरिक्त ऐसे अवसरों पर फिटकरी का चूर्ण डालकर तैलगण्डूष भी अत्यन्त हितकर होता है । जिह्वानिर्लेखन – इस प्रसंग में दतवन कर लेने के बाद जीभी का प्रयोग भी कर लेना चाहिए । इसका वर्णन चरक, सुश्रुत, वाग्भट ( अष्टांगसंग्रह ) ने किया है, किन्तु अष्टांगहृदय में नहीं हुआ है । इसकी हम सुश्रुतोक्त विधि कह रहे हैं— जीभ को साफ करने ( उसमें जमे हुए मैल को खुरचने ) के लिए सोने, चाँदी या लकड़ी की जीभी बनवा लेनी चाहिए । आजकल बाजार में ताँबा या स्टील की भी जीभी मिलती है । दतवन करने वाले उसी को दाँतों से चीर कर जीभी बना लेते हैं । वास्तव में यह जीभी ' वार्क्ष ' ( वृक्ष से सम्बन्धित ) है । इस विषय को च. सू. ५।७४-७५ में देखें । नाद्यादजीर्णवमथुश्वासकासज्वरार्दिती । तृष्णास्यपाकहृन्नेत्रशिरः कर्णामयी च तत् ॥४ ॥

दतवन का निषेध – अजीर्ण होने पर, छर्दिरोग में, श्वासरोग में, कासरोग में, ज्वररोग में, अर्दित ( मुख का लकवा ) रोग में, तृषारोग में, मुखपाकरोग में, हृदयरोग में, नेत्ररोग में, शिरोरोग में तथा कर्णरोग में दतवन न करें ॥ ४ ॥

वक्तव्य- - दतवन करने की क्रिया को आयुर्वेदशास्त्र में दो नामों से कहा गया है —१. दन्तपवन और २. दन्तधवन । इनमें ' पवन ' का अर्थ है - पवित्र करना और ' धवन ' का अर्थ है - धोना या साफ करना । अष्टांगसंग्रह - सू. ३।२०- २२ में निषिद्ध दतवनों का परिगणन इस प्रकार विस्तार से किया है ——१. लिसोड़ा, २. रीठा, ३. बहेड़ा, ४. धव, ५. करीर, ६. बबूल, ७. सम्भालू, ८. सहजन, ९. लोध, १०. तेन्दू, ११. कचनार, १२. शमी, १३. पीलू, १४. पीपल, १५. इंगुदी ( हिंगोट ), १६. गूगल, १७. फरहद, १८. इमली, १ ९. मोच, २०. सफेद शाल्मली, २१. सेमल तथा २२. शष ( सनई ) की दतवन न करे । इनके अतिरिक्त जिन वृक्षों का रस मीठा, खट्टा अथवा नमकीन हो उनकी भी दतवन न करे । जो दतवन सूखी, खोखली, दुर्गन्धयुक्त तथा लसीली हो उसका भी निषेध किया है और पलाश तथा विजयसार की दतवन एवं खड़ाऊँ का परित्याग करे ।

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२८ अष्टाङ्गहृदये सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत् । अञ्जन- प्रयोग — मुखशुद्धि करने के बाद प्रतिदिन सौवीर अञ्जन को आँखों में लगाना चाहिए । यह आँखों के लिए हितकर होता है । वक्तव्य — सुवीर ( सिन्धु ) देश में प्राप्त होने वाला यह अञ्जन ( काला सुरमा ) आँखों के लिए हितकर होता है । इसका विशेष विवेचन देखें— अ.सं.सू. ३२।७-८ । स्वस्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अञ्जन को प्रत्यञ्जन कहते हैं । श्रीभावमिश्र ने इस सौवीराञ्जन को ' सफेद सुरमा ' स्वीकार किया है । यह काला सुरमा से अधिक सौम्य होता है । इन दोनों सुरमों का प्रयोग नेत्रप्रसादन के लिए किया जाता है ।

सुश्रुत ने भी इस अञ्जन की प्रशंसा की है । देखें — सु.चि. २४।१८-१९ ।

चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषात् श्लेष्मतो भयम् ॥ ५ ॥

योजयेत्सप्तरात्रेऽस्मात् स्रावणार्थं रसाञ्जनम् । रसाञ्जन - प्रयोगविधि- — ग्रावण अञ्जन का प्रयोग चक्षु ( आँख ) तेजोमय अर्थात् अग्निगुण - - प्र प्रधान अवयव है । उसे ( चक्षु को ) विशेष करके शीतगुण- प्रधान कफ का भय रहता है । अतएव आँख से कफदोष को निकालने के लिए सप्ताह में एक बार रसाञ्जन का प्रयोग अवश्य करना चाहिए ॥५ ॥

वक्तव्य —— उक्त रसाञ्जन के साप्ताहिक प्रयोग से आँखों में से संचित कफदोष निकल जाता है, अतः कफदोषजनित कोई भी नेत्ररोग नहीं हो पाता । विशेष करके काच ( मोतियाबिन्द ) रोग का भय नहीं रहता है । सुश्रुत ने ' काच ' रोग को ' नीलिका ' तथा ' लिंगनाश ' भी कहा है । देखें – सु. उ. ७ १८ । ' काच ' को सफेद मोतिया और ' नीलिका ' को नीला या काला मोतिया भी कहते हैं । यह कफदोष आँख में संचित होते - होते मोती जैसा दिखलायी देता है, तब इसे मोतियाबिन्द कहते हैं । आपरेशन करके निकालने के बाद यह आकार में मसूर की दाल जैसा होता है । चरक ने उक्त स्रावणांजन का प्रयोग प्रतिदिन या पाँचवें अथवा आठवें दिन करने की सलाह दी है । चरक ने अंजन प्रयोग का समय रात्रि में बतलाया है । यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को छोड़कर प्रातःकाल रसाञ्जन का प्रयोग किया जायेगा तब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को रात में लगाना चाहिए, यह चरक के वचन का अभिप्राय है । इसी प्रसंग में मनु ने कहा है – ' मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम् । पूर्वाह्ण एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम् ' || ( मनु ० ४१५२ ) यहाँ ' मैत्र ' का अर्थ है — सूर्य की आराधना, उपासना या

पूजा । इसलिए रसवत अथवा किसी स्रावण अंजन का प्रयोग सदा करता रहे ।

ततो नावनगण्डूषधूमताम्बूलभाग्भवेत् ॥ ६ ॥

नस्य आदि सेवन - निर्देश — अंजनप्रयोग करने के बाद नस्य ( सुंघनी ), गण्डूष ( कुल्ली, देखें — बृहत् हिन्दी - कोश ), धूम्रपान तथा ताम्बूल का सेवन करे ॥ ६ ॥

वक्तव्य — उक्त नस्य आदि की विस्तृत सेवनविधियाँ क्रमशः इस प्रकार अष्टांगहृदय में दी गयी हैं । देखें —— १. नस्यसेवनविधि अ.हृ.सू. २०।१-२ । धूमपानविधि वहीं २१ तथा ३. गण्डूषादि विधि वहीं २२ । ताम्बूलभक्षण की विस्तृत विधि अ.सं.सू. ३।३६-३८ देखें । ताम्बूल- - सेवनविधि – भोजन के प्रति इच्छा अधिक हो, मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित रहे, ऐसी इच्छा रखने वाले को घुला - घुलाकर पान खाना चाहिए । इसे भोजन की भाँति मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए । पान के मसाले- -जावित्री, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमेण्ट, कंकोल ( शीतल चीनी ), कटुक ( लताकस्तूरी के बीज ) तथा इसमें सुपारी के भिगाये हुए टुकड़े भी रखें । इस प्रकार सेवन करने से पान हृदय को प्रिय लगता है और यह शक्तिवर्धक होता है । इसका सेवन सोकर उठने के बाद स्नान एवं भोजन करने के बाद तथा वमन करने के पश्चात् करना चाहिए । एक बार में अधिक - से - अधिक दो बीड़ा पान लें, जिसमें चूना, कत्था लगा हो और सुपारी के टुकड़े पड़े हों ।

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् २ ९ विशिष्ट अवसर — राजसम्मान, विद्वत्सम्मान, रतिकाल, युद्ध आदि में जाते समय इसके सेवन का विशेष महत्त्व है । अन्य अवसर भी अनेक हैं, उन्हें लोकव्यवहार से समझें । सेवनविधि — पान के जड़ की डण्डी और आगे का भाग काट देना चाहिए, तभी उसमें चूना- कत्था लगाकर सुपारी आदि मसाले डालकर मुख में लें । इसकी पहली पीक को थूककर फिर इसका रसपान करते रहें । सुर्ती आदि आधुनिक मसाले हानिकर होते हैं, इनसे दाँत कमजोर हो जाते हैं और इनसे मुख का अल्सर होता देखा गया है । देखिए ' भावप्रकाश ' – दिनचर्या - प्रकरण ' । ताम्बूलं क्षतपित्ताम्ररूक्षोत्कुपितचक्षुषाम् । विषमूर्च्छामदार्तानामपथ्यं शोषिणामपि ॥ ७ ॥

ताम्बूलसेवन निषेध — ऊपर छठे पद्य में ताम्बूल का सेवन सभी को करना चाहिए, ऐसा निर्देश करने के बाद अब यहाँ इसका सेवन किनको नहीं करना चाहिए, इस विषय का निर्देश किया जा रहा -क्षत तथा उरःक्षत से पीड़ित, पित्तविकार, रक्तविकार ( रक्तपित्त ) से पीड़ित, रूक्ष शरीर वाले, नेत्ररोगी, विषविकार से पीड़ित, मूर्च्छा एवं मदात्यय आदि रोगों से पीड़ित तथा शोषरोगी को ताम्बूल का सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ७ ॥

वक्तव्य — ताम्बूलसेवन का निषेध जिन रोगियों के लिए किया गया है, उसमें कारण हैं— ताम्बूलपत्र के ये गुण -धर्म - ध होते हैं— तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुचिकारक, कषाय, सर, तिक्त, क्षारीय गुणयुक्त, चरपरा तथा लघु । यह कामवासना, रक्तधातु तथा पित्तधातु को बढ़ाता है । इसका अधिक सेवन करना एक प्रकार का दुर्व्यसन है । इसे भूखे पेट में तथा शौच के अन्त में कदापि सेवन न करें । अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं, स जराश्रमवातहा । दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदाढर्यकृत् ॥ ८ ॥

अभ्यङ्गसेवन - विधान – प्रतिदिन अभ्यंग ( मालिश ) करना या कराना चाहिए, क्योंकि वह जरा ( बुढ़ापा ), श्रम ( थकावट ) तथा वातज विकारों को नष्ट करता है, दृष्टि को स्वच्छ करता है, शरीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ाता है, गहरी नींद लाता है, त्वचा के सौन्दर्य को स्थिर बनाये रखता है और मांसपेशियों को दृढ़ एवं सुडौल ( गठीली ) बनाता है ॥८ ॥

वक्तव्य — अभ्यंग = मालिश, उबटन, फोहा रखना, कान में तेल डालना तथा लेप लगाना, इसे अलंकरण भी कहा गया है । इसका विस्तृत क्षेत्र इस प्रकार है— दाँतों या आँखों पर तेल लगाना, स्नेहमिश्रित काजल लगाना, स्नेहमय लेप या मलहम लगाना आदि । उक्त विषय के लिए देखें — सु.सू. २१।१० तथा सु.चि. २४।३०-३७ । साथ ही उक्त श्लोकों पर आचार्य डल्हण द्वारा लिखी गयी टीका को भी देखें । अभ्यंग के लिए घी से आठ गुना अधिक तेल लाभदायक होता है, अवसर - विशेष पर घी आदि अन्य स्नेहों द्वारा भी मालिश की जाती है । सुश्रुत - चि. २४।३० श्लोक पर की गयी आचार्य डल्हण की टीका में अभ्यंग के सम्बन्ध में ये तीन पद्य मिलते हैं — ‘ रोमान्तेष्वनुदेहस्य स्थित्वा मात्राशतत्रयम् । ततः प्रविशति स्नेहश्चतुर्भिर्गच्छति त्वचाम् ॥ रक्तं गच्छति मात्राणां शतैः पञ्चभिरेव तु । षड्भिर्मांसं प्रपद्येत मेदः सप्तभिरेव च ॥ शतैरष्टाभिरस्थीनि मज्जानं नवभिर्व्रजेत् । तत्रास्थाञ् शमयेद्रोगान् वातपित्तकफात्मकान् ' || अर्थात् प्राचीन विद्वानों का अनुमान है और अभ्यंगप्रिय पहलवानों का अनुभव है कि अभ्यंग द्वारा प्रयोग किया गया तेल ३०० मात्रा समय तक वह रोमकूपों में रहता है; फिर ४०० मात्रा समय तक त्वचा में, फिर ५०० मात्रा समय तक रक्त में, फिर ६०० मात्रा समय तक मांस में, ७०० मात्रा समय तक मेदस् में, ८०० मात्रा समय तक अस्थि में और ९ ०० मात्रा समय तक मज्जा में व्याप्त होकर उन उन धातुओं में उत्पन्न वातज, पित्तज तथा कफज रोगों को शान्त कर देता है । उक्त डल्हण कृत टीका से मालिश के सम्बन्ध में उद्धृत श्लोकों में व्याकरण की दृष्टि ये प्रयोग महत्त्वपूर्ण हैं । देखें —– त्वचाम्, रक्तं, मांस, मेदः, अस्थीनि तथा मज्जानं । आप ध्यान दें — ‘ कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया ' ( अ. २।३।५ ) सूत्र के नियमानुसार ' त्वचाम् ' आदि प्रयोग बतला

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३० अष्टाङ्गहृदये रहे हैं कि मालिश ऐसी होनी चाहिए कि मसलते - मसलते उस तेल का अत्यन्त संयोग उन उन धातुओं तक हो जाय, तभी मालिश का पूरा - पूरा लाभ मिलता है । यहाँ जो ३०० तथा ५०० आदि मात्रा शब्द का प्रयोग किया है, इस मात्रा नामक काल की अवधि का प्रमाण है— ह्रस्व स्वर अ, इ या उ आदि किसी एक को उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने मात्र समय को कालविभागज्ञों ने ' मात्रा ' कहा है । ध्यान दें – मात्रा ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत भेद से तीन प्रकार की होती है । यहाँ केवल ह्रस्व स्वर वाली मात्रा से तात्पर्य है । अभ्यंग का रहस्य पहलवान लोग जानते हैं, वे बड़े चाव से मालिश करते तथा कराते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं । अभ्यंग कराने वाले को चर्मरोग कभी नहीं होते हैं । शिरःश्रवणपाद्रेषु तं विशेषेण शीलयेत् । अभ्यंग के प्रमुख स्थान- अभ्यंग सम्पूर्ण शरीर में करना चाहिए, यह आठवें पद्य में कह दिया है । अब अभ्यंग के विशेष स्थलों का निर्देश किया जा रहा है । यथा — सिर, कानों तथा पैरों के तलुओं में विशेष रूप से अभ्यंग करना चाहिए । वक्तव्य — यहाँ ‘ शीलयेत् ' क्रिया का अर्थ है — ' अभ्यसेत् ' अर्थात् बार - बार इसका अभ्यास करे । इस निर्देश की गुणवत्ता वाग्भट ने अष्टांगसंग्रह - सू. ३।५ ९ -६० में इस प्रकार बतलाई है— ' सिर पर तेलमालिश करते रहने से वह केशों का हित करता है अर्थात् उन्हें बढ़ाता है, मुलायम तथा चिकना बनाये रखता है । इससे शिरः कपालास्थियों और इन्द्रियों ( आँख, कान, नाक ) का तर्पण होता रहता है । कान के छेद में गुनगुना तेल डालते रहने से हनुसन्धियों ( गण्ड, कर्ण, शंख, वर्त्म, नेत्र तथा हनु से सम्बन्धित १२ अस्थियों ) का, मन्याओं ( गरदन के अलग - बगल में दिखलायी देने वाली दोनों ओर की धमनियों ) का, सिर तथा कानों का शूल शान्त हो जाता है । पैरों पर अभ्यंग करते रहने से पाँवों में स्थिरता आती है, निद्रा आती है और दृष्टि प्रसन्न रहती है । पैरों का सुन पड़ जाना, श्रम, स्तम्भ ( जकड़न ), सिकुड़न, विवाई फटना —ये

कष्ट दूर हो जाते हैं ।

वर्ज्योऽभ्यङ्गः कफग्रस्तकृतसंशुद्धयजीर्णिभिः ॥ ९ ॥

अभ्यंग का निषेध – प्रतिश्याय आदि कफज विकारों से पीड़ित रोगी, जिन्होंने शरीरशुद्धि के लिए वमन विरेचन आदि किया हो तथा जो अजीर्णरोग से ग्रस्त हों, वे अभ्यंग का प्रयोग न करें ॥ ९ ॥

वक्तव्य — शास्त्रीय विचार विधि - निषेधमय होते हैं, क्योंकि उनके निर्देश सभी अवस्थाओं के लिए दिये जाते हैं, अतएव वे सर्वांगीण होते हैं । इस प्रकरण में सबसे पहले प्रतिदिन अभ्यंग करने का सामान्य निर्देश दिया था, यह निषेधात्मक निर्देश विशेष परिस्थिति के लिए है । सुश्रुत का अनुसरण करने वाले आचार्य हेमाद्रि ने कहा है — ‘ कृतसंशुद्धेस्तदहरेव निषिद्धः ' । अर्थात् जिसने वमन आदि का जिस दिन प्रयोग किया हो उस दिन अभ्यंग न करे । इसी विषय को स्पष्ट रूप से सुश्रुत ने चिकित्सास्थान २४।३५-३७ में कहा है । लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः । विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते ॥ १० ॥

व्यायाम का विधान — व्यायाम करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, जठराग्नि या पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है, मेदस् ( स्थूलता ) का क्षय होता है अर्थात् मोटापा घटता है, अंग - प्रत्यंग ( मांसपेशियाँ ) स्पष्ट दिखलायी देते हैं और वे ठोस हो जाते हैं ॥ १० ॥

वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है— ' शरीरायासजनकं कर्म व्यायाम उच्यते ' । ( अ.सं. ३।६२ ) अर्थात् जिससे शरीर में थकावट पैदा हो, उसे ' व्यायाम ' कहते हैं । इस परिभाषा से सभी शारीरिक परिश्रम व्यायाम कहे जा सकते हैं, किन्तु भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में व्यायाम की परिभाषा इस प्रकार है — ‘ शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्द्धिनी । देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत् ' ॥ ( च.सू. ७।३१ ) अर्थात् जो भी शरीर की चेष्टा ( कर्म ) अपने मन को अच्छी लगे, जो शरीर को स्थिरता

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३१ प्रदान करती हो और बल को बढ़ाती हो, उसे ' व्यायाम ' कहते हैं । उसे मात्रा के अनुसार करना चाहिए । यह व्यायाम की परिभाषा सर्वोत्तम है । संसार में व्यायाम के अनेक प्रकार देखे जाते हैं, वे भी विभिन्न दृष्टियों से व्यायाम ही हैं । यथा— दण्ड, बैठक, शीर्षासन, कुश्ती, तैरना, हाकी, क्रिकेट आदि । इसी प्रसंग में आगे कहा जायेगा कि किनको व्यायाम नहीं करना चाहिए । पहलवान बनने की इच्छा हो तो उत्तम ( पौष्टिक ) खान - पान की व्यवस्था होनी चाहिए । जो प्रत्येक नर - नारी घरेलू कार्य करते हैं उनसे भी थकावट आती ही है, किन्तु वास्तव में इनकी गणना व्यायाम के रूप में नहीं होती । शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक श्रम अति आवश्यक है । वातपित्तामयी बालो वृद्धोऽजीर्णी च तं त्यजेत् । व्यायाम का निषेध – वातज तथा पित्तज रोगों से पीड़ित रोगी, बालक, वृद्ध तथा अजीर्णरोग से पीड़ित मनुष्य ' व्यायाम ' न करें । वक्तव्य — यहाँ बालक तथा वृद्ध के लिए व्यायाम करने का निषेध किया है, अतः इनकी आयुसीमा का निर्देश करते हुए वाग्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं — ' बाल: आषोडशवर्षात् ', ' वृद्धः सप्ततेरूर्ध्वम् ’ अर्थात् सोलह वर्ष तक की अवस्था वाला बालक कहा जाता है और सत्तर वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला

वृद्ध होता है ।

अर्धशक्त्या निषेव्यस्तु बलिभिः स्निग्धभोजिभिः ॥ ११ ॥

शीतकाले वसन्ते च मन्दमेव ततोऽन्यदा । अर्धशक्ति तथा काल - निर्देश – बलवान् तथा स्निग्ध ( घी - तेल आदि से बने हुए तथा बादाम, काजू आदि ) पदार्थों को खाने वाले मनुष्य शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ऋतु ) में एवं वसन्त ऋतु में आधी शक्ति भर व्यायाम करें, इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करें ॥ ११ ॥

वक्तव्य — अर्धशक्ति का परिचय – व्यायाम करते - करते हृदयस्थान में स्थित वायु जब मुख की ओर आने लगे अर्थात् जब व्यायाम करने वाला हाँफता हुआ मुख से साँस लेने लगे तो यह बलार्ध या अर्धशक्ति का लक्षण है । इस स्थिति में यह सोच लेना चाहिए कि इस समय आधा बल समाप्त हो चुका है । देखें— सु.चि. २४।४७ । और लक्षण भी देखें— काँखों में, माथे पर, नासिका के ऊपर, हाथों - पैरों तथा सभी सन्धियों में पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तब समझना चाहिए कि आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है । उस समय व्यायाम करना छोड़ दे । स्वयं बैठकर अपने शरीर के अवयवों को मसलें । सर्दी के दिनों में अर्धशक्ति पर्यन्त व्यायाम करने की शास्त्र की आज्ञा है, उसके बाद और भी कम व्यायाम करना

चाहिए, यही ' मन्दमेव ' शब्द का अभिप्राय है ।

तं कृत्वाऽनुसुखं देहं मर्दयेच्च समन्ततः ॥ १२ ॥

शरीरमर्दन - निर्देश — व्यायाम के बाद का कर्म — व्यायाम कर लेने के बाद सम्पूर्ण शरीर का अनुलोम सुखद मर्दन कर्म चारों ओर से करना चाहिए अथवा क्रमशः सभी अंगों को मसलना चाहिए ॥ १२ ॥

वक्तव्य — सुश्रुत के टीकाकार जैज्जट का कथन है कि मर्दन ( मसलना ) यह क्रिया भी व्यायाम का ही एक अंग है । यह मर्दन कर्म भी ऐसा न हो जो शरीर को कष्टकारक हो, अतएव महर्षि वाग्भट ने इसका एक विशेषण ' अनुसुखं ' दिया है अर्थात् जो सुख के अनुकूल हो । तृष्णा क्षयः प्रतमको रक्तपित्तं श्रमः क्लमः । अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥ अतिव्यायाम से हानि - अधिक व्यायाम करने से प्यास का लगना, क्षय ( राजयक्ष्मा ), प्रतमक श्वास, रक्तपित्त, श्रम ( थकावट ), क्लम ( मानसिक दुर्बलता या सुस्ती ), कास, ज्वर तथा छर्दि ( वमन ) आदि रोग हो जाते हैं अथवा हो सकते हैं ॥ १३ ॥

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३२ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य – प्रायः देखा गया है कि जो बहुत दिनों तक व्यायाम करते रहे, बाद में जिन्होंने एकाएक व्यायाम करना छोड़ दिया, उन्हें वृद्धावस्था में आमवात, ऊरुस्तम्भ, अर्शरोग ( बवासीर ) अथवा अण्डवृद्धि ( पोता का बढ़ जाना ) आदि रोग हो जाते हैं । व्यायामजागराध्वस्त्रीहास्यभाष्यादि साहसम् । गजं सिंह इवाकर्षन् भजन्नति विनश्यति ॥ १४ ॥

व्यायाम आदि का निषेध — व्यायाम, जागरण, मार्गगमन, मैथुन, हँसना, बोलना ( जोर - जोर से चिल्लाना ) तथा साहसिक कार्यों का अधिक सेवन करने से शक्ति युक्त मनुष्य का भी उस प्रकार विनाश हो जाता है जैसे सिंह अपने द्वारा मारे हुए हाथी को खींचकर ले जाने का दुःसाहस करता है, तो वह स्वयं मर जाता है ॥ १४ ॥

वक्तव्य- - व्यायाम आदि का युक्तियुक्त सेवन सुखद होता है, किन्तु इनका अधिक सेवन न करे, यही ग्रन्थकार का अभिप्राय है । इसीलिए शक्तिमान् सिंह भी यदि अपने द्वारा मारे गये हाथी को खींचकर ले जाना चाहेगा तो वह भी मर जायेगा । यह एक दुःसाहस का उदाहरण है । जागरण ( रात में अधिक जागना ), अधिक मार्ग चलना, जो कभी नहीं चलता उसके लिए थोड़ा चलना भी बहुत है, इस प्रकार विचार कर लें । ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं । दुःसाहस का अधिक प्रयोग करने से उरःक्षत हो जाता है । अधिक व्यायाम करने से ' क्षय ' हो जाता है, यह ऊपर कहा गया है । तन्त्रकार की एक अपनी शैली होती है, वह है— सूत्र तथा व्याख्यान शैली । क्षय या राजयक्ष्मा के सम्बन्ध में महर्षि पुनर्वसु के उद्गार — ‘ राजयक्ष्मा रोगसमूहानाम् ' तथा ' अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनाम् ' । ( च.सू. २५/४० ) उक्त

१४ वें श्लोक का आधार है— ' व्यायाम मात्रया ' ( च.सू. ७।३४ ) ।

उद्वर्तनं कफहरं मेदसः प्रविलायनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां त्वक्प्रसादकरं परम् ॥१५ ॥

उबटन के गुण – व्यायाम के बाद उबटन करना चाहिए, इससे कफ का नाश होता है । यह मेदोधातु को पिघला कर उसे सुखा देता है, अंगों को स्थिर ( मजबूत ) करता है और त्वचा को कान्तियुक्त करता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य — जौ या चना का आटा अथवा सरसों को पीसकर उसमें तेल तथा हल्दी मिलाकर शरीर पर मसलने को उद्वर्तन, उत्सादन या उबटन कहा जाता है । इस विधि से रोमकूपों में जमी हुई मैल भलीभाँति निकल जाती है । इससे त्वचा चिकनी तथा कोमल हो जाती है । इसका प्रयोग छोटे बच्चों के शरीर पर भी किया जाता है । इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए । परन्तु इस वैज्ञानिक युग में ये सात्त्विक सुख कहाँ सुलभ है? दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जाबलप्रदम् । कण्डूमलश्रमस्वेदतन्द्रातृड्दाहपाप्मजित् ॥ १६ ॥

स्नान के गुण – स्नान करने से जठराग्नि प्रदीप्त होता है, यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) है, आयु को बढ़ाता है, उत्साहशक्ति तथा बल को बढ़ाता है; कण्डू ( खुजली ), मल ( त्वचा का मैल ), थकावट, पसीना, उँघाई, प्यास, दाह ( जलन ) तथा पाप ( रोग ) का नाश करता है ॥ १६ ॥

वक्तव्य — स्नान करने से ऊपर जिन लाभों का वर्णन किया है, उनका यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है । स्नान वृष्य है, देखें – अ.हृ. उ. ४०।३५ । स्नान कर लेने से मन प्रसन्न होता है, अतः यह वृष्य है । उष्णाम्बुनाऽधःकायस्य परिषेको बलावहः । तेनैव तूत्तमाङ्गस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥ १७ ॥

उष्ण - शीत जलप्रयोग — उष्ण ( गरम ) जल से अधःकाय ( गरदन से नीचे के शरीर ) का परिषेक ( स्नान ) बल को बढाता है । यदि उसी ( गरम जल ) से सिर को धोया जाय अर्थात् गरम पानी से शिरःस्नान किया जाय तो इससे बालों तथा आँखों की शक्ति घटती है ॥ १७ ॥।

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३३ स्नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु । आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम् ॥१८ ॥

स्नान का निषेध — अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ), नेत्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, अतिसार, आध्मान ( अफरा ), पीनस, अजीर्ण रोगों में तथा भोजन करने के तत्काल बाद स्नान करना हानिकारक होता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य — स्नान करने के बाद बालों को सूखे अंगोछा से पोंछकर उनमें तेल लगाकर कंघी कर लें और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करें । दिनचर्या के अनेक कृत्यों का उल्लेख इसमें नहीं हो पाया है, उन्हें आप चरक - सुश्रुत से संग्रह कर लें । अ.सं.अ. ३ में दिनचर्या से सम्बन्धित अन्य अनेक विषय दिये गये हैं, आप उन्हें भी देखें । जीर्णे हितं मितं चाद्यान्न वेगानीरयेद्बलात् । न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नाजित्वा साध्यमामयम् ॥ भोजन आदि कर्तव्य – स्नान कर लेने के बाद तथा पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात् जो हितकर भोजन हो उसे मात्रा के अनुसार खाये; मूत्र, पुरीष के वेगों को बलपूर्वक न उभाड़ें । यदि मल - मूत्र का वेग मालूम पड़े तो उन्हें दबाकर अन्य कर्मों में न लग जाय । साथ ही यदि किसी प्रकार का साध्यरोग हो तो उसकी चिकित्सा किये बिना भी किसी दूसरे कार्य में नहीं लग जाना चाहिए ॥१ ९ ॥ वक्तव्य — स्मृतियों में कथित दिनचर्या से आयुर्वेदीय दिनचर्या सर्वथा भिन्न है और होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों के उद्देश्य भिन्न - भिन्न हैं । स्मृतिनिर्दिष्ट चर्या मनु. ४ ९ २ - ९ ३ में आप ही देखिए – कहाँ स्नान के बाद सन्ध्या और कहाँ सीधे भोजन, वह भी जब पहले का पच गया हो । हितं मितं — हितकारक वह भोजन है जिसमें धारण तथा पोषण करने की शक्ति हो । देखें— ' डुधाञ् धारणपोषणयोः ' धातु से क्त प्रत्यय जोड़कर बना हुआ शब्द —धा + क्त + हित । इसके बाद ऋतु, देश, काल का विचार करके जो सात्म्य हो, उसे हित कहते हैं । मितं – नपा - तुला, परिमित या थोड़ा । ' न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्’- - इस विषय का विशेष व्याख्यान आप चरकसंहिता सू.अ. ७ में विस्तारपूर्वक देखें । अथवा अ.हृ.सू. अध्याय ४ का अवलोकन करें । ‘ नाजित्वा साध्यमामयम् ' – यह वाग्भट का उपदेश विशेष करके आशुकारी रोगों के लिए है । अन्यथा प्रमेह तथा अर्श ( बवासीर ) आदि अनेक रोग ऐसे हैं, जिनमें रोगी चिकित्सा के साथ अन्य कार्यों को भी करता ही रहता है । यदि साध्य एवं आशुकारी रोगों की उपेक्षा कर रोगी अन्य कार्य करने लगता है, तो वह रोग असाध्य हो सकता है । भोजनविधि का वर्णन अ.सं.सू. ३।७६-८० तक को भी देख लें । यह भोजनविधि का आर्ष स्वरूप है । सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ॥ २० ॥

सुख का साधन धर्म - सभी प्राणी चाहते हैं कि हमें सुख मिलें, अतएव उनकी प्रवृत्तियाँ ( कार्य करने की लगन ) सुख पाने के लिए होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं होती । अतः सभी को धर्म - कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए ॥ २० । वक्तव्य— धर्म शब्द को लेकर धार्मिक नेताओं तथा राजनीतिक नेताओं ने बड़ा हंगामा चलाया है, अस्तु । वास्तव में प्राणिमात्र का यह धर्म है कि वह अपनी तथा अपने उपकारक पदार्थों की रक्षा करे । इसमें किसी को किसी प्रकार का मतभेद नहीं है । इसी प्रकार की व्युत्पत्ति हमारे शास्त्रचिन्तकों ने धर्म शब्द की की है । देखें— ' ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः ' अथवा ' धरति लोकम् असौ इति धर्मः ' । आज वास्तविक धर्म का आचरण न करने के कारण देश में जो दुरवस्था फैली है, इसको कोई नहीं देख रहा है । मनु आदि धर्माचार्यों ने धर्म का आचरण करने की सभी को आज्ञा दी है तथा सभी के अलग - अलग धर्मों का उपदेश दिया है । संक्षेप में इन स्थलों का अवलोकन करें । मनु. २।१२, २।११२. ४।२३८, २४१, २४२; ६।९ २, ८।१५ तथा १७ । उक्त उद्धरणों के अतिरिक्त महामानव मनु ने ' धर्म ' शब्द की एक परिभाषा और भी दी है — ‘ यस्तर्केणाऽनुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतर: ' । ( मनु: १२।१०६ ) अर्थात् जो तर्कबुद्धि से अनुसन्धान ( विचार ) करता है, वही धर्म को समझता है, यह एक पक्ष है । दूसरा पक्ष यह भी है— ' अतर्क्या वै ३ अ ० हृ ०

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अष्टाङ्गहृदये धर्मः ' अर्थात् धर्म के विषय में तर्क न करे । क्योंकि शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं— १. प्रभुसम्मित, २. सुहृत्सम्मित तथा ३. कान्तासम्मित । ये वेद आदि धर्मशास्त्र ' प्रभुसम्मित शास्त्र ' के अन्तर्गत आते हैं, अतः ये अतर्क्य हैं; राजशासन के समान कठोर होते हैं । सारांश — जो सत्कर्म अपनों तथा दूसरों को धारण करता है, उसका नाम ' धर्म ' है । उसी को कोषकारों ने पुण्य, श्रेयस्, सुकृत तथा वृष पर्यायों से कहा है । शुभ कर्म को ' धर्म ' और अशुभ कर्म को ' अधर्म ’ या पाप कहा है । ऐसे कर्म या कर्मों से स्वास्थ्य लाभ होता है और मनः सन्तोष प्राप्त होता है । यही कारण है कि आयुर्वेद में विधि - निषेधक्रम से धर्म की शिक्षा दी जाती है । आयुर्वेद में कहा गया सम्पूर्ण सद्वृत्त धर्म का आकर है । इसी को सदाचार कहा गया है और सत् आचार को ही चरक ने ' आचाररसायन ' कहा है । अन्य आयुर्वेदीय रसायन व्ययसाध्य हैं, किन्तु ' आचाररसायन ' संयमसाध्य है । भक्त्या कल्याणमित्राणि सेवेतेतरदूरगः । मित्र - अमित्र सेवन- विचार - अच्छे मित्रों ( शुभचिन्तक, अच्छी सलाह देने वालों ) का श्रद्धा - भक्ति से सेवन करे । इनसे विपरीत चरित्र वालों से दूर रहे अर्थात् सावधान रहे, क्योंकि इनका सेवन करने से

हानि हो सकती है ।

हिंसास्तेयान्यथाकामं पैशुन्यं परुषानृते ॥ २१ ॥

सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्विपर्ययम् । पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् ॥ २२ ॥

पापकर्मों का त्याग — नीचे लिखे गये दस प्रकार के पापकर्मों का मन, वचन तथा कर्म से सदैव परित्याग करे – १. हिंसा ( मार - पीट या किसी के मन को दुःखाना आदि ), २. स्तेय ( चोरी, लूट ), ३. अन्यथाकाम ( अनुचित ढंग से सुखभोग करना; जैसे—– अगम्यागमन आदि ) – इन शारीरिक दुष्कर्मों का शरीर से परित्याग करे । ४. पिशुनता ( चुगलखोरी ), ५. परुषवाक्य ( कठोर या अप्रियवचन ), ६. अनृत ( झूठी बात ) तथा ७. सम्भिन्न आलाप ( कभी कुछ और कभी कुछ कहना, जिसे दोगलापन कहते हैं ) —वाणी सम्बन्धी इन पापकर्मों का वाणी द्वारा परित्याग करे अर्थात् ऐसी बातें न कहें । ८. व्यापादं ( किसी को मार डालने या मरवा डालने की योजना ), ९. अभिध्या ( दूसरे की सम्पत्ति को हड़प जाने की इच्छा करना ) तथा १०. दृग्विपर्यय ( शास्त्र के निर्देशों के विपरीत सोचना, नास्तिकता, आप्त वाक्यों के विरुद्ध सोचना आदि ) - - इन मानसिक पापों का मन से परित्याग करे ॥ २१-२२- ॥ अवृत्तिव्याधिशोकार्ताननुवर्तेत शक्तितः । अनुकूल व्यवहार - निर्देश – जिनकी कोई आजीविका नहीं है, जो रोग तथा शोक से पीड़ित हैं, उनके साथ अपनी शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति के अनुरूप उचित व्यवहार करे अर्थात् आजीविकाहीनों को आर्थिक सहायता, रोगियों को चिकित्सा आदि की सहायता तथा शोकपीड़ितों को उचित आश्वासन

देकर उनके अनुकूल व्यवहार करे ।

आत्मवत्सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकम् ॥ २३ ॥

समदृष्टिता का निर्देश – सभी प्राणियों को अपने समान समझें, भले ही कीड़े - मकोड़े, चींटियाँ ही क्यों न हों अर्थात् किसी को क्षुद्र ( छोटा या नीच ) न समझें । उन्हें कष्ट न पहुँचायें, उन पर दया करें ॥ २३ ॥

अर्चयेद्देवगोविप्रवृद्धवैद्यनृपातिथीन् सम्मान करने का निर्देश – देवता, गाय, ब्राह्मण, वृद्ध, वैद्य, नृप तथा अतिथि - इनकी पूजा करे अर्थात् इन्हें उचित सम्मान दें तथा इनका सत्कार करे । वक्तव्य — यहाँ वृद्ध शब्द से माता- -पिता तथा गुरुजनों का समावेश भी कर लेना चाहिए । विमुखान्नार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत नाक्षिपेत् ॥ २४ ॥