श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1111–1120

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1111–1120

पृष्ठ 1111

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पुरा विकुरुते मायां भुजयोः सारमर्पय ॥ २३ ॥

अतः भीमसेन! जल्दी करो । इसके साथ खिलवाड़ न करो । इस भयानक राक्षसको मार डालो । यह अपनी माया फैलाये, इसके पहले ही इसपर अपनी भुजाओंकी शक्तिका प्रयोग करो ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो रोषाज्ज्वलन्निव ।

बलमाहारयामास यद् वायोर्जगतः क्षये ॥ २४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - अर्जुनके यों कहनेपर भीम रोषसे जल उठे और प्रलयकालमें वायुका जो बल प्रकट होता है, उसे उन्होंने अपने भीतर धारण कर लिया ॥ २४ ॥

ततस्तस्याम्बुदाभस्य भीमो रोषात् तु रक्षसः ।

उत्क्षिप्याभ्रामयद् देहं तूर्णं शतगुणं तदा ॥ २५ ॥

पृष्ठ 1112

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हिडिम्ब - वध aloca भीमसेन और घटोत्कच

पृष्ठ 1113

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तत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ॥ २५ ॥

भीम उवाच

वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः ।

वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ॥ २६ ॥

इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले - अरे निशाचर! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है । इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है । इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा ( बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ॥ २६ ॥

क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् ।

न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ॥ २७ ॥

राक्षस! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ॥ २७ ॥

अर्जुन उवाच

यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि ।

करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ॥ २८ ॥

अर्जुन बोले — भैया! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो

मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ । तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ॥ २८ ॥

अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर ।

कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ॥ २ ९ ॥

वृकोदर! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा । तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो । अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ॥ २ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः ।

निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ॥ ३० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये । उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ॥ ३० ॥

स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् ।

पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1114

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इस प्रकार भीमसेनकी मार पड़नेपर वह राक्षस जलसे भीगे हुए नगारेकी- सी ध्वनिसे सम्पूर्ण वनको गुँजाता हुआ जोर- जोरसे चीखने लगा ॥ ३१ ॥

बाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान् पाण्डुनन्दनः ।

मध्ये भङ्क्त्वा महाबाहुर्हर्षयामास पाण्डवान् ॥ ३२ ॥

तब महाबाहु बलवान् पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसे दोनों भुजाओंसे बाँधकर उलटा मोड़ दिया और उसकी कमर तोड़कर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाया ॥ ३२ ॥

हिडिम्बं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः ।

अपूजयन् नरव्याघ्रं भीमसेनमरिंदमम् ॥ ३३ ॥

हिडिम्बको मारा गया देख वे महान् वेगशाली पाण्डव अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठे और उन्होंने शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेनकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ३३ ॥

अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् ।

पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ॥ ३४ ॥

इस प्रकार भयंकर पराक्रमी महात्मा भीमकी प्रशंसा करके अर्जुनने पुनः उनसे यह बात कही- ॥ ३४ ॥

न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो ।

शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात् सुयोधनः ॥ ३५ ॥

' प्रभो! मैं समझता हूँ, इस वनसे नगर अब दूर नहीं है । तुम्हारा कल्याण हो । अब हमलोग शीघ्र चलें, जिससे दुर्योधनको हमारा पता न लग सके ' ॥ ३५ ॥

ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा सह मात्रा महारथाः ।

प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ॥ ३६ ॥

तब सभी पुरुषसिंह महारथी पाण्डव ' ( ठीक है,) ऐसा ही करें' यों कहकर माताके

साथ वहाँसे चल दिये । हिडिम्बा राक्षसी भी उनके साथ हो ली ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बवधे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्बासुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 1115

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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति (वैशम्पायन उवाच

सा तानेवापतत् तूर्णं भगिनी तस्य रक्षसः ।

अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ॥

अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् ।

अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! हिडिम्बा- सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे - सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेनसे बोली । हिडिम्बोवाच

अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता ।

क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ॥

राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् II ) - हिडिम्बाने कहा – ( आर्यपुत्र! ) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी । उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ । भीमसेन उवाच

स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् ।

हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ॥ १ ॥

भीमसेन बोले – हिडिम्बे! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ॥ १ ॥

युधिष्ठिरउवाच क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः ।

पृष्ठ 1116

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शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्मं गोपाय पाण्डव ॥ २ ॥

यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा - पुरुषसिंह भीम! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो । पाण्डुनन्दन! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ॥ २ ॥

वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् ।

रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ॥ ३ ॥

महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था । अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है । उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।

युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥

आर्ये जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् ।

तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ॥ ५ ॥

‘ आर्ये! स्त्रियोंको इस जगत्में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं ।

शुभे! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ॥ ५ ॥

सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया ।

सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ॥ ६ ॥

‘ मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है । अब वह समय आ गया है ।

आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ॥ ६ ॥

मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा ।

वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ॥ ७ ॥

' शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्मका परित्याग करके आपके पुत्र पुरुषसिंह भीमसेनको अपना पति चुना है ॥ ७ ॥

वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि ।

प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ८ ॥

‘ यशस्विनि! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थनाको ठुकरा देंगी तो मैं

जीवित नहीं रह सकूँगी । यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ॥ ८ ॥

तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि ।

मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1117

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‘ अतः वरवर्णिनि! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी ( सेविका ) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ॥ ९ ॥

भर्त्रानेन महाभागे संयोजय सुतेन ह ।

तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् ।

पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ॥ १० ॥

‘ महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये । मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित

समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी । शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ॥ १० ॥

अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा ।

(न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी ।

कन्या रक्षस्सु साध्व्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ॥

पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी ।

सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ॥

अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् । ) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ॥ ११ ॥

पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः ।

यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ॥ १२ ॥

‘ आप अपने मनसे जब -जब मेरा स्मरण करेंगे, तब- तब सदा ही ( सेवामें उपस्थित हो ) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी । आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ । महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है । मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है । मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी । आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी । आपको संकटोंसे बचाऊँगी । दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी । आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ॥ ११-१२ ॥

आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा ।

सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ॥ १३ ॥

‘जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ॥ १३ ॥

आपत्सु यो धारयति धर्मं धर्मविदुत्तमः ।

पृष्ठ 1118

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व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ॥ १४ ॥

‘ जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है । धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है ॥ १४ ॥

पुण्यं प्राणान् धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते ।

येन येनाचरेद् धर्मं तस्मिन् गर्हा न विद्यते ॥ १५ ॥

' पुण्य ही प्राणोंको धारण करता है, इसलिये पुण्य प्राणदाता कहलाता है; अतः जिस-जिस उपायसे धर्मका आचरण हो सके, उसके करनेमें कोई निन्दाकी बात नहीं है ॥ १५ ॥

( महतोऽत्र स्त्रियं कामाद् बाधितां त्राहि मामपि ।

धर्मार्थकाममोक्षेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥

तं तु धर्ममिति प्राहुर्मुनयो धर्मवत्सलाः ।

दिव्यज्ञानेन पश्यामि अतीतानागतानहम् ॥

तस्माद् वक्ष्यामि वः श्रेय आसन्नं सर उत्तमम् ।

अद्यासाद्य सरः स्नात्वा विश्रम्य च वनस्पतौ ॥

व्यासं कमलपत्राक्षं दृष्ट्वा शोकं विहास्यथ ॥

धार्तराष्ट्राद् विवासश्च दहनं वारणावते ।

त्राणं च विदुरात् तुभ्यं विदितं ज्ञानचक्षुषा ॥

आवासे शालिहोत्रस्य स च वासं विधास्यति ।

वर्षवातातपसहः अयं पुण्यो वनस्पतिः ॥

पीतमात्रे तु पानीये क्षुत्पिपासे विनश्यतः ।

तपसा शालिहोत्रेण सरो वृक्षश्च निर्मितः ॥

कादम्बाः सारसा हंसाः कुरर्यः कुररैः सह ।

रुवन्ति मधुरं गीतं गान्धर्वस्वनमिश्रितम् ॥

‘ मैं महती कामवेदनासे पीड़ित एक नारी हूँ, अतः आप मेरी भी रक्षा कीजिये । साधु पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके सभी पुरुषार्थोंके लिये शरणागतोंपर दया करते हैं । धर्मानुरागी महर्षि दयाको ही श्रेष्ठ धर्म मानते हैं। मैं दिव्य ज्ञानसे भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखती हूँ । अतः आपलोगोंके कल्याणकी बात बता रही हूँ । यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम सरोवर है । आपलोग आज वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान करके वृक्षके नीचे विश्राम करें। कुछ दिन बाद कमलनयन व्यासजीका दर्शन पाकर आपलोग शोकमुक्त हो जायँगे । दुर्योधनके द्वारा आपलोगोंका हस्तिनापुरसे निकाला जाना, वारणावत नगरमें जलाया जाना और विदुरजीके प्रयत्नसे आप सब लोगोंकी रक्षा होनी आदि बातें उन्हें ज्ञानदृष्टिसे ज्ञात हो गयी हैं । वे महात्मा व्यास शालिहोत्र मुनिके आश्रममें निवास करेंगे । उनके आश्रमका वह पवित्र वृक्ष सर्दी, गर्मी और वर्षाको अच्छी तरह सहनेवाला है । वहाँ केवल जल पी लेनेसे भूख-प्यास दूर हो जाती है । शालिहोत्र मुनिने

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अपनी तपस्याद्वारा पूर्वोक्त सरोवर और वृक्षका निर्माण किया है । वहाँ कादम्ब, सारस, हंस, कुररी और कुरर आदि पक्षी संगीतकी ध्वनिसे मिश्रित मधुर गीत गाते रहते हैं' । वैशम्पायन उवाच

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती वचनमब्रवीत् ।

युधिष्ठिरं महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारदम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! हिडिम्बाका यह वचन सुनकर कुन्तीदेवीने सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा । कुन्त्युवाच

त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठ मयोक्तं शृणु भारत ।

राक्षस्येषा हि वाक्येन धर्मं वदति साधु वै ॥

भावेन दुष्टा भीमं सा किं करिष्यति राक्षसी । भजतां पाण्डवं वीरमपत्यार्थं यदीच्छसि ॥ ) कुन्ती बोली- धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भारत! मैं जो कहती हूँ, उसे तुम सुनो; यह राक्षसी अपनी वाणीद्वारा तो उत्तम धर्मका ही प्रतिपादन करती है । यदि इसकी हार्दिक भावना भीमसेनके प्रति दूषित हो, तो भी यह उनका क्या बिगाड़ लेगी? अतः यदि तुम्हारी सम्मति हो तो यह संतानके लिये कुछ कालतक मेरे वीर पुत्र पाण्डुनन्दन भीमसेनकी सेवामें रहे । युधिष्ठिर उवाच

एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं हिडिम्बे नात्र संशयः ।

स्थातव्यं तु त्वया सत्ये यथा ब्रूयां सुमध्यमे ॥ १६ ॥

युधिष्ठिर बोले — हिडिम्बे! तुम जैसा कह रही हो, वह सब ठीक है; इसमें संशय नहीं है । परंतु सुमध्यमे! मैं जैसे कहूँ, उसी प्रकार तुम्हें सत्यपर स्थिर रहना चाहिये ॥ १६ ॥

स्नातं कृताह्निकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् ।

भीमसेनं भजेथास्त्वं प्रागस्तगमनाद् रवेः ॥ १७ ॥

भद्रे! जब भीमसेन स्नान, नित्यकर्म तथा मांगलिक वेशभूषा आदि धारण कर लें, तब तुम प्रतिदिन उनके साथ रहकर सूर्यास्त होनेसे पहलेतक ही उनकी सेवा कर सकती हो ॥ १७ ॥

अहस्सु विहरानेन यथाकामं मनोजवा ।

अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि ॥ १८ ॥

तुम मनके समान वेगसे चलने - फिरनेवाली हो, अतः दिनभर तो तुम इनके साथ अपनी इच्छाके अनुसार विहार करो, परंतु रातको सदा ही तुम्हें भीमसेनको ( हमारे पास ) पहुँचा देना होगा ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1120

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(प्राक् संध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्च नित्यशः ।

एवं रमस्व भीमेन यावद् गर्भस्य वेदनम् ॥

एष ते समयो भद्रे शुश्रूष्यश्चाप्रमत्तया ।

नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ॥

संध्याकाल आनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देना होगा और नित्य- निरन्तर इनकी रक्षा करनी होगी । इस शर्तपर तुम भीमसेनके साथ सुखपूर्वक तबतक रहो, जबतक कि तुम्हें यह पता न चल जाय कि तुम्हारे गर्भमें बालक आ गया है । भद्रे! यही तुम्हारे लिये पालन करनेयोग्य नियम है । तुम्हें सावधान होकर भीमसेनकी सेवा करनी चाहिये और नित्य उनके अनुकूल होकर सदा उनकी भलाईमें संलग्न रहना चाहिये ।

युधिष्ठिरेणैवमुक्ता कुन्त्या चाङ्केऽधिरोपिता ।

भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ॥

तिर्यग् युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी ।

शालिहोत्रसरो रम्यमासेदुस्ते जलार्थिनः ॥

तत् तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा ।

वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा ॥

पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा ।