श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1121–1130
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130
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आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा ॥
पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः संध्यामुपास्य च ।
तृषिताः क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन् ॥
शालिहोत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान् पाण्डवांस्तदा ।
मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजनं महत् ।
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे विश्रान्ताः पृथया सह ॥
यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत् ।
कृत्वा कथा बहुविधाः कथान्ते पाण्डुनन्दनम् ॥
कुन्तिराजसुता वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् ॥
युधिष्ठिरके यों कहनेपर कुन्तीने हिडिम्बाको अपने हृदयसे लगा लिया । तदनन्तर वह युधिष्ठिरसे कुछ दूरीपर रहकर भीमके साथ चल पड़ी । वह चलते समय भीम और अर्जुनके बीचमें रहती थी । नकुल और सहदेव सदा उसे आगे करके चलते थे । ( इस प्रकार ) वे ( सब ) लोग जल पीनेकी इच्छासे शालिहोत्र मुनिके रमणीय सरोवरके तटपर जा पहुँचे । वहाँ कुन्ती तथा युधिष्ठिरने पहले जो शर्त रखी थी, उसे स्वीकार करके हिडिम्बा राक्षसीने वैसा ही कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की । तत्पश्चात् उसने वृक्षके नीचे जाकर घरकी तरह झाड़ू लगायी और पाण्डवोंके लिये निवास स्थानका निर्माण किया । उन सबके लिये पर्णशाला तैयार करनेके बाद उसने अपने और कुन्तीके लिये एक दूसरी जगह कुटी बनायी । तदनन्तर पाण्डवोंने स्नान करके शुद्ध हो संध्योपासना किया और भूख- प्याससे पीड़ित होनेपर भी केवल जलका आहार किया । उस समय शालिहोत्र मुनिने उन्हें भूखसे व्याकुल जान मन- ही- मन उनके लिये प्रचुर अन्न - पानकी सामग्रीका चिन्तन किया ( और उससे पाण्डवोंको भोजन कराया ) । तदनन्तर कुन्तीदेवीसहित सब पाण्डव विश्राम करने लगे । विश्रामके समय उनमें नाना प्रकारकी बातें होने लगीं - किस प्रकार लाक्षागृहमें उन्हें जलानेका प्रयत्न किया गया तथा फिर राक्षस हिडिम्बने उन लोगोंपर किस प्रकार आक्रमण किया इत्यादि प्रसंग उनकी चर्चाके विषय थे । बातचीत समाप्त होनेपर कुन्तिराजकुमारी कुन्तीने पाण्डुनन्दन भीमसेनसे इस प्रकार कहा । कुन्त्युवाच
यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिरः ।
अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव ॥
तस्मात् पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु ।
निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना ।
दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ॥
तस्मात् कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति ॥
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क्षेमं दुर्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम् ।
इदमद्य महद् दुःखं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर ॥
दृष्ट्वैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता ।
युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः ॥
धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स नः श्रेयः करिष्यति । प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि ह्यावाभ्यां वचनं कुरु II ) कुन्ती बोली – युवराज! तुम्हारे लिये जैसे महाराज पाण्डु माननीय थे, वैसे ही बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं । धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे मैं उनकी अपेक्षा भी अधिक गौरवकी पात्र तथा सम्माननीय हूँ। अतः तुम महाराज पाण्डुके हितके लिये मेरी एक हितकर आज्ञाका पालन करो । वृकोदर! अपवित्र बुद्धिवाले पापात्मा दुर्योधनने हमारे साथ जो दुष्टता की है, उसके प्रतिशोधका उपाय मुझे कोई नहीं दिखायी देता । अतः कुछ दिनोंके बाद भले ही हमारा योगक्षेम सिद्ध हो । यह निवासस्थान अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण हमारे लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा । हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे । महाप्राज्ञ भीमसेन! आज यह हमारे सामने अत्यन्त दुःखद धर्मसंकट उपस्थित हुआ है कि हिडिम्बा तुम्हें देखते ही कामसे प्रेरित हो मेरे और युधिष्ठिरके पास आकर धर्मतः तुम्हें पतिके रूपमें वरण कर चुकी है । मेरी आज्ञा है कि तुम उसे धर्मके लिये एक पुत्र प्रदान करो । वह हमारे लिये कल्याणकारी होगा । मैं इस विषयमें तुम्हारा कोई प्रतिवाद नहीं सुनना चाहती । तुम हम दोनोंके सामने प्रतिज्ञा करो । वैशम्पायन उवाच
तथेति तत् प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ।
शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम् ॥ १ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ' बहुत अच्छा' कहकर भीमसेनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की ( और हिडिम्बाके साथ गान्धर्व विवाह कर लिया ) । तत्पश्चात् भीमसेन हिडिम्बासे इस प्रकार बोले— ' राक्षसी! सुनो, मैं सत्यकी शपथ खाकर तुम्हारे सामने एक शर्त रखता हूँ ॥ १ ९ ॥
यावत् कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे ।
तावत् कालं गमिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ २० ॥
‘ शुभे! सुमध्यमे! जबतक तुम्हें पुत्रकी उत्पत्ति न हो जाय तभीतक मैं तुम्हारे साथ विहारके लिये चलूँगा ' ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेति तत् प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा ।
भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे ततः ॥ २१ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब ' ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेनको साथ ले वहाँसे ऊपर आकाशमें उड़ गयी ॥ २१ ॥
शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च ।
मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ॥ २२ ॥
कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता ।
संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ॥ २३ ॥
तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु ।
सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ॥ २४ ॥
नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च ।
सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ॥ २५ ॥
काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु ।
हिमवगिरिकुञ्जेषु गुहासु विविधासु च ॥ २६ ॥
प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु ।
सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ॥ २७ ॥
पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च ।
देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ॥ २८ ॥
गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च ।
सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ॥ २ ९ ॥
बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् ।
रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ॥ ३० ॥
उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत- से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी- मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया । इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता- वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान् पर्वतके कुंजों और भाँति- भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र- तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे -छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े- बड़े शाल- वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम- फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके
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पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया । वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन- उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी ॥ २२-३० ॥
प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम् ।
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं बिभीषणम् ॥ ३१ ॥
कुछ कालके पश्चात् उस राक्षसीने भीमसेनसे एक महान् बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकुके समान थे । वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ ३१ ॥
भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम् ।
महेष्वासं महावीर्यं महासत्त्वं महाभुजम् ॥ ३२ ॥
महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम् ।
दीर्घघोणं महोरस्कं विकटोद्बद्धपिण्डिकम् ॥ ३३ ॥
उसकी आवाज बड़ी भयानक थी । सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान् बल, बहुत बड़ा धनुष, महान् पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी - बड़ी भुजाएँ, महान् वेग और विशाल शरीर — ये उसकी विशेषताएँ थीं । वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था । उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं ॥ ३२-३३ ॥
अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम् ।
यः पिशाचानतीत्यान्यान् बभूवातीव राक्षसान् ॥ ३४ ॥
यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी । उसका वेग भयंकर और बल महान् था । वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था ॥ ३४ ॥
बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते ।
सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद् बली ॥ ३५ ॥
राजन्! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था । उस बलवान् वीरने सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी ॥ ३५ ॥
सद्यो हि गर्भान् राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च ।
कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः ॥ ३६ ॥
राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं । वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं ॥ ३६ ॥
प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात् स पितुस्तदा ।
मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः ॥ ३७ ॥
उस महान् धनुर्धर बालकने पैदा होते ही पिता और माताके चरणोंमें प्रणाम किया । उसके सिरमें बाल नहीं उगे थे । उस समय पिता और माताने उसका इस प्रकार नामकरण
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किया ॥ ३७ ॥
घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत ।
अब्रवीत् तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह ॥ ३८ ॥
बालककी माताने भीमसेनसे कहा – ' इसका घट ( सिर) उत्कच- अर्थात् केशरहित है । ' उसके इस कथनसे ही उसका नाम घटोत्कच हो गया ॥ ३८ ॥
अनुरक्तश्च तानासीत् पाण्डवान् स घटोत्कचः ।
तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ॥ ३ ९ ॥
घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था ।
वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था ॥ ३ ९ ॥
संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् ।
हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ॥ ४० ॥
तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी ॥ ४० ॥
घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान् पृथया सह ।
अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान् ॥ ४१ ॥
किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्कं वदतानघाः ।
तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥ ४२ ॥
तत्पश्चात् विशालकाय घटोत्कचने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा – ' निष्पाप गुरुजन! आप निःशंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ' इस प्रकार पूछनेवाले भीमसेनकुमारसे कुन्तीने कहा- ॥ ४१-४२ ॥
त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद् भीमसमो ह्यसि ।
ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ॥ ४३ ॥
' बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है । तुम मेरे लिये साक्षात् भीमसेनके समान हो । पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हमारी सहायता करो ' ॥ ४३ ॥
वैशम्पायन उवाच पृथयाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् ।
यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः ।
वर्ष्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु ॥ ४४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा — ‘ दादीजी! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान् थे, उसी
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प्रकार इस मानव - जगत्में मैं भी उन्हींके समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ ॥ ४४ ॥
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कचः ।
आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ॥ ४५ ॥
‘ जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा । ' यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया ॥ ४५ ॥
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पाण्डवोंकी व्यासजीसे भेंट Eranco धृष्टद्युम्नकी घोषणा
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स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना ।
कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ॥ ४६ ॥
महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी । वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें घटोत्कचकी उत्पत्तिविषयक एक सौ चौवनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ७ ९ श्लोक हैं ) Fara Face * कोई- कोई उत्कचका अर्थ ' ऊपर उठे हुए बालोंवाला ' भी करते हैं ।
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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच
ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान् बहून् ।
अपक्रम्य ययू राजंस्त्वरमाणा महारथाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! वे महारथी पाण्डव उस स्थानसे हटकर एक वनसे दूसरे वनमें जाकर बहुत-से हिंसक पशुओंको मारते हुए बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़े ॥ १ ॥
मत्स्यांस्त्रिगर्तान् पञ्चालान् कीचकानन्तरेण च ।
रमणीयान् वनोद्देशान् प्रेक्षमाणाः सरांसि च ॥ २ ॥
मत्स्य, त्रिगर्त, पंचाल तथा कीचक— इन जनपदोंके भीतर होकर रमणीय वनस्थलियों और सरोवरोंको देखते हुए वे लोग यात्रा करने लगे ॥ २ ॥
जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः ।
सह कुन्त्या महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपुः ॥ ३ ॥
क्वचिद् वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः ।
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः ॥ ४ ॥
उन सबने अपने सिरपर जटाएँ रख ली थीं । वल्कल और मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँक लिया था और तपस्वीका - सा वेष धारण कर रखा था । इस प्रकार वे महारथी महात्मा पाण्डव माता कुन्तीदेवीके साथ कहीं तो उन्हें पीठपर ढोते हुए तीव्र गतिसे चलते थे, कहीं इच्छानुसार धीरे - धीरे पाँव बढ़ाते थे और कहीं पुनः अपनी चाल तेज कर देते थे ॥ ३-४ ॥
बाह्मं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः ।
नीतिशास्त्रं च सर्वज्ञा ददृशुस्ते पितामहम् ॥ ५ ॥
पाण्डवलोग सब शास्त्रोंके ज्ञाता थे और प्रतिदिन उपनिषद्, वेद- वेदांग तथा नीतिशास्त्रका स्वाध्याय किया करते थे । एक दिन जब वे स्वाध्यायमें लगे थे, पितामह व्यासजीका दर्शन हुआ ॥ ५ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा ।
तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परंतपाः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डवोंने उस समय महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायनको प्रणाम किया और अपनी माताके साथ वे सब लोग उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ६ ॥
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व्यास उवाच
मयेदं व्यसनं पूर्वं विदितं भरतर्षभाः ।
यथा तु तैरधर्मेण धार्तराष्ट्रैर्विवासिताः ॥ ७ ॥
तद् विदित्वास्मि सम्प्राप्तश्चिकीर्षुः परमं हितम् ।
न विषादोऽत्र कर्तव्यः सर्वमेतत् सुखाय वः ॥ ८ ॥
तब व्यासजीने कहा- भरतश्रेष्ठ पाण्डुकुमारो! मैंने पहले ही तुमलोगोंपर आये हुए इस संकटको जान लिया था । धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जिस प्रकार अधर्मपूर्वक राज्यसे बहिष्कृत किया है, वह सब जानकर तुम्हारा परम हित करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ । इसके लिये तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये; यह सब तुम्हारे भावी सुखके लिये हो रहा है ॥ ७-८ ॥ समास्ते चैव मे सर्वे यूयं चैव न संशयः ।
दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति मानवाः ।
तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम साम्प्रतम् ॥ ९ ॥
इसमें संदेह नहीं कि मेरे लिये तुमलोग और धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदि सब समान ही हैं । फिर भी जहाँ दीनता और बचपन है, वहीं मनुष्य अधिक स्नेह करते हैं; इसी कारण इस समय तुमलोगोंपर मेरा अधिक स्नेह है ॥ ९ ॥
स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं वस्तन्निबोधत ।
इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम् ।
वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः ॥ १० ॥
मैं स्नेहपूर्वक तुमलोगोंका हित करना चाहता हूँ। इसलिये मेरी बात सुनो । यहाँ पास ही जो यह रमणीय नगर है, इसमें रोग - व्याधिका भय नहीं है । अतः तुम सब लोग यहीं छिपकर रहो और मेरे पुनः आनेकी प्रतीक्षा करो ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स तान् समाश्वास्य व्यासः सत्यवतीसुतः ।
एकचक्रामभिगतः कुन्तीमाश्वासयत् प्रभुः ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार पाण्डवोंको भलीभाँति आश्वासन देकर सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास उन सबके साथ एकचक्रा नगरीके निकट गये । वहाँ उन्होंने कुन्तीको इस प्रकार सान्त्वना दी ॥ ११ ॥
व्यास उवाच जीवत्पुत्रि सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः ।
धर्मेण पृथिवीं जित्वा महात्मा पुरुषर्षभः ।
पृथिव्यां पार्थिवान् सर्वान् प्रशासिष्यति धर्मराट् ॥ १२ ॥