श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1161–1170

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170

पृष्ठ 1161

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः ।

प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान् ॥ २१ ॥

युधिष्ठिर! मेरे इस निश्चयसे दोनों प्रयोजन सिद्ध हो जायँगे । एक तो ब्राह्मणके यहाँ निवास करनेका ऋण चुक जायगा और दूसरा लाभ यह है कि ब्राह्मण और पुरवासियोंकी रक्षा होनेके कारण महान् धर्मका पालन हो जायगा ॥ २१ ॥

यो ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुर्यादर्थेषु कर्हिचित् ।

क्षत्रियः स शुभाँल्लोकानाप्नुयादिति मे मतिः ॥ २२ ॥

जो क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके कार्योंमें सहायता करता है, वह उत्तम लोकोंको प्राप्त होता -यह मेरा विश्वास है ॥ २२ ॥

क्षत्रियस्यैव कुर्वाणः क्षत्रियो वधमोक्षणम् ।

विपुलां कीर्तिमाप्नोति लोकेऽस्मिंश्च परत्र च ॥ २३ ॥

यदि क्षत्रिय किसी क्षत्रियको ही प्राणसंकटसे मुक्त कर दे तो वह इस लोक और परलोकमें भी महान् यशका भागी होता है ॥ २३ ॥

वैश्यस्यार्थे च साहाय्यं कुर्वाणः क्षत्रियो भुवि ।

स सर्वेष्वपि लोकेषु प्रजा रञ्जयते ध्रुवम् ॥ २४ ॥

जो क्षत्रिय इस भूतलपर वैश्यके कार्यमें सहायता पहुँचाता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण लोकोंमें प्रजाको प्रसन्न करनेवाला राजा होता है ॥ २४ ॥

शूद्रं तु मोचयेद् राजा शरणार्थिनमागतम् ।

प्राप्नोतीह कुले जन्म सद्द्द्रव्ये राजपूजिते ॥ २५ ॥

इसी प्रकार जो राजा अपनी शरणमें आये हुए शूद्रको प्राणसंकटसे बचाता है, वह इस संसारमें उत्तम धन- धान्यसे सम्पन्न एवं राजाओंद्वारा सम्मानित श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेता है ॥ २५ ॥

एवं मां भगवान् व्यासः पुरा पौरवनन्दन ।

प्रोवाचासुकरप्रज्ञस्तस्मादेवं चिकीर्षितम् ॥ २६ ॥

पौरववंशको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! इस प्रकार पूर्वकालमें दुर्लभ विवेक-विज्ञानसे सम्पन्न भगवान् व्यासने मुझसे कहा था; इसीलिये मैंने ऐसी चेष्टा की है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि कुन्तीयुधिष्ठिरसंवादे एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें कुन्ती-युधिष्ठिर- संवादविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥

पृष्ठ 1162

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका भोजन - सामग्री लेकर बकासुरके पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना युधिष्ठिर उवाच

उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद् बुद्धिपूर्वकम् ।

आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुक्रोशादिदं कृतम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले- माँ! आपने समझ- बूझकर जो कुछ निश्चय किया है, वह सब उचित है । आपने संकटमें पड़े हुए ब्राह्मणपर दया करके ही ऐसा विचार किया है ॥ १ ॥

ध्रुवमेष्यति भीमोऽयं निहत्य पुरुषादकम् ।

सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुक्रोशवत्यसि ॥ २ ॥

निश्चय ही भीमसेन उस राक्षसको मारकर लौट आयेंगे; क्योंकि आप सर्वथा ब्राह्मणकी रक्षाके लिये ही उसपर इतनी दयालु हुई हैं ॥ २ ॥

यथा त्विदं न विन्देयुर्नरा नगरवासिनः ।

तथायं ब्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः ॥ ३ ॥

आपको यत्नपूर्वक ब्राह्मणपर अनुग्रह तो करना ही चाहिये; किंतु ब्राह्मणसे यह कह देना चाहिये कि वे इस प्रकार मौन रहें कि नगरनिवासियोंको यह बात मालूम न होने पाये ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच ( युधिष्ठिरेण सम्मन्त्र्य ब्राह्मणार्थमरिंदम । कुन्ती प्रविश्य तान् सर्वान् सान्त्वयामास भारत ॥ )

ततो रात्र्यां व्यतीतायामन्नमादाय पाण्डवः ।

भीमसेनो ययौ तत्र यत्रासौ पुरुषादकः ॥ ४ ॥

आसाद्य तु वनं तस्य रक्षसः पाण्डवो बली ।

आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन् ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ब्राह्मण ( की रक्षा) - के निमित्त युधिष्ठिरसे इस प्रकार सलाह करके कुन्तीदेवीने भीतर जाकर समस्त ब्राह्मण परिवारको सान्त्वना दी । तदनन्तर रात बीतनेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन भोजनसामग्री लेकर उस स्थानपर गये, जहाँ वह नरभक्षी राक्षस रहता था । बक राक्षसके वनमें पहुँचकर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्नको स्वयं खाते हुए राक्षसका नाम ले- लेकर उसे पुकारने लगे ॥ ४-५ ॥

पृष्ठ 1163

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततः स राक्षसः क्रुद्धो भीमस्य वचनात् तदा ।

आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ ६ ॥

भीमके इस प्रकार पुकारनेसे वह राक्षस कुपित हो उठा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर जहाँ भीमसेन बैठकर भोजन कर रहे थे, वहाँ आया ॥ ६ ॥

महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् ।

लोहिताक्षः करालश्च लोहितश्मश्रुमूर्धजः ॥ ७ ॥

उसका शरीर बहुत बड़ा था । वह इतने महान् वेगसे चलता था, मानो पृथ्वीको विदीर्ण

कर देगा । उसकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं । आकृति बड़ी विकराल जान पड़ती थी ।

उसके दाढ़ी, मूँछ और सिरके बाल लाल रंगके थे ॥ ७ ॥

आकर्णाद् भिन्नवक्त्रश्च शङ्कुर्णो बिभीषणः ।

त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम् ॥ ८ ॥

मुँहका फैलाव कानोंके समीपतक था, कान भी शंकुके समान लंबे और नुकीले थे । बड़ा भयानक था वह राक्षस । उसने भौंहें ऐसी टेढ़ी कर रखी थीं कि वहाँ तीन रेखाएँ उभड़ आयी थीं और वह दाँतोंसे ओठ चबा रहा था ॥ ८ ॥

भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः ।

विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

भीमसेनको वह अन्न खाते देख राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने आँखें तरेरकर कहा - ॥ ९ ॥

कोऽयमन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम् ।

पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्मियासुर्यमसादनम् ॥ १० ॥

‘ यमलोकमें जानेकी इच्छा रखनेवाला यह कौन दुर्बुद्धि मनुष्य है, जो मेरी आँखोंके सामने मेरे ही लिये तैयार करके लाये हुए इस अन्नको स्वयं खा रहा है? ' ॥ १० ॥

भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत ।

राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः ॥ ११ ॥

भारत! उसकी बात सुनकर भीमसेन मानो जोर- जोर से हँसने लगे और उस राक्षसकी अवहेलना करते हुए मुँह फेरकर खाते ही रह गये ॥ ११ ॥

रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ ।

अभ्यद्रवद् भीमसेनं जिघांसुः पुरुषादकः ॥ १२ ॥

अब तो वह नरभक्षी राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे भयंकर गर्जना करता हुआ दोनों हाथ ऊपर उठाकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १२ ॥

तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः ।

राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा ॥ १३ ॥

अमर्षेण तु सम्पूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् ।

पृष्ठ 1164

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ॥ १४ ॥

तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे । तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥

तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः ।

नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ॥ १५ ॥

इस प्रकार बलवान् राक्षसके दोनों हाथोंसे भयानक चोट खाकर भी भीमसेनने उसकी ओर देखातक नहीं, वे भोजन करनेमें ही संलग्न रहे ॥ १५ ॥

ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः ।

ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद् बली ॥ १६ ॥

तब उस बलवान् राक्षसने पुनः अत्यन्त कुपित हो एक वृक्ष उखाड़कर भीमसेनको मारनेके लिये फिर उनपर धावा किया ॥ १६ ॥

ततो भीमः शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभः ।

वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महाबलः ॥ १७ ॥

तदनन्तर नरश्रेष्ठ महाबली भीमसेनने धीरे- धीरे वह सब अन्न खाकर, आचमन करके मुँह- हाथ धो लिये, फिर वे अत्यन्त प्रसन्न हो युद्धके लिये डट गये ॥ १७ ॥

क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् ।

सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत ॥ १८ ॥

जनमेजय! कुपित राक्षसके द्वारा चलाये हुए उस वृक्षको पराक्रमी भीमसेनने बायें हाथसे हँसते हुए - से पकड़ लिया ॥ १८ ॥

ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान् बहुविधान् बली ।

प्राहिणोद् भीमसेनाय तस्मै भीमश्च पाण्डवः ॥ १ ९ ॥

तब उस बलवान् निशाचरने पुनः बहुत-से वृक्षोंको उखाड़ा और भीमसेनपर चला दिया । पाण्डुनन्दन भीमने भी उसपर अनेक वृक्षोंद्वारा प्रहार किया ॥ १ ९ ॥

तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ।

घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयोः ॥ २० ॥

महाराज! नरराज तथा राक्षसराजका वह भयंकर वृक्षयुद्ध उस वनके समस्त वृक्षोंके विनाशका कारण बन गया ॥ २० ॥

नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् ।

भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम् ॥ २१ ॥

तदनन्तर बकासुरने अपना नाम सुनाकर महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेनकी ओर दौड़कर दोनों बाँहोंसे उन्हें पकड़ लिया ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1165

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भीमसेनोऽपि तद् रक्षः परिरभ्य महाभुजः ।

विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलाद् बली ॥ २२ ॥

महाबाहु बलवान् भीमसेनने भी उस विशाल भुजाओंवाले राक्षसको दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर- उधर खींचने लगे । उस समय बकासुर उनके बाहुपाशसे छूटनेके लिये छटपटा रहा था ॥ २२ ॥

स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्च पाण्डवम् ।

समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादकः ॥ २३ ॥

भीमसेन उस राक्षसको खींचते थे तथा राक्षस भीमसेनको खींच रहा था । इस खींचा- खींचीमें वह नरभक्षी राक्षस बहुत थक गया ॥ २३ ॥

तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत ।

पादपांश्च महाकायांश्चूर्णयामासतुस्तदा ॥ २४ ॥

उन दोनोंके महान् वेगसे धरती जोरसे काँपने लगी । उन दोनोंने उस समय बड़े - बड़े वृक्षोंके भी टुकड़े - टुकड़े कर डाले ॥ २४ ॥

हीयमानं तु तद् रक्षः समीक्ष्य पुरुषादकम् ।

निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ॥ २५ ॥

उस नरभक्षी राक्षसको कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्वीपर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनोंसे मारने लगे ॥ २५ ॥

ततोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव ।

बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम् ॥ २६ ॥

सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः ।

तद् रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम् ॥ २७ ॥

तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल- पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया । उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें चीत्कार कर रहा था ॥ २६-२७ ॥

ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात् प्रादुरासीद् विशाम्पते ।

भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ॥ २८ ॥

राजन्! भीमसेनके द्वारा उस घोर राक्षसकी जब कमर तोड़ी जा रही थी, उस समय उसके मुखसे ( बहुत -सा) खून गिरा ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुर और भीमसेनका युद्धविषयक एक सौ बासठवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १६२ ॥

पृष्ठ 1166

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २ ९ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1167

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता वैशम्पायन उवाच

ततः स भग्नपार्श्वाङ्गो नदित्वा भैरवं रवम् ।

शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद् बकः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पसलीकी हड्डियोंके टूट जानेपर पर्वतके समान विशालकाय बकासुर भयंकर चीत्कार करके प्राणरहित हो गया ॥ १ ॥

तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः ।

निष्पपात गृहाद् राजन् सहैव परिचारिभिः ॥ २ ॥

तान् भीतान् विगतज्ञानान् भीमः प्रहरतां वरः ।

सान्त्वयामास बलवान् समये च न्यवेशयत् ॥ ३ ॥

न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् ।

हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ॥ ४ ॥

जनमेजय! उस चीत्कारसे भयभीत हो उस राक्षसके परिवारके लोग अपने सेवकोंके साथ घरसे बाहर निकल आये । योद्धाओंमें श्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने उन्हें भयसे अचेत देखकर ढाढ़स बँधाया और उनसे यह शर्त करा ली कि ' अबसे कभी तुमलोग मनुष्योंकी हिंसा न करना । जो हिंसा करेंगे, उनका शीघ्र ही इसी प्रकार वध कर दिया जायगा ' ॥ २– ४ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत ।

एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ॥ ५ ॥

भारत! भीमकी यह बात सुनकर उन राक्षसोंने ' एवमस्तु ' कहकर वह शर्त स्वीकार कर ली ॥ ५ ॥

ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत ।

नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ॥ ६ ॥

भारत! तबसे नगरनिवासी मनुष्योंने अपने नगरमें राक्षसोंको बड़े सौम्य स्वभावका देखा ॥ ६ ॥

ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम् ।

द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामानुपलक्षितः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1168

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तदनन्तर भीमसेनने उस राक्षसकी लाश उठाकर नगरके दरवाजेपर गिरा दी और स्वयं दूसरोंकी दृष्टिसे अपनेको बचाते हुए चले गये ॥ ७ ॥

दृष्ट्वा भीमबलोद्भूतं बकं विनिहतं तदा ।

ज्ञातयोऽस्य भयोद्विग्नाः प्रतिजग्मुस्ततस्ततः ॥ ८ ॥

भीमसेनके बलसे बकासुरको पछाड़ा एवं मारा गया देख उस राक्षसके कुटुम्बीजन भयसे व्याकुल हो इधर- उधर भाग गये ॥ ८ ॥

ततः स भीमस्तं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् ।

आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ ९ ॥

उस राक्षसको मारनेके पश्चात् भीमसेन ब्राह्मणके उसी घरमें गये तथा वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिरसे सारा वृत्तान्त ठीक - ठीक कह सुनाया ॥ ९ ॥

ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात् कल्यमेव तु ।

ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् ॥ १० ॥

तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ और लोग नगरसे बाहर निकले, तब उन्होंने देखा बकासुर खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर मरा पड़ा है ॥ १० ॥

तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् ।

दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः ॥ ११ ॥

पर्वतशिखरके समान भयानक उस राक्षसको नगरके दरवाजेपर फेंका हुआ देखकर नगरनिवासी मनुष्योंके शरीरमें रोमांच हो आया ॥ ११ ॥

एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे ।

ततः सहस्रशो राजन् नरा नगरवासिनः ॥ १२ ॥

तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः ।

ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् ।

दैवतान्यर्चयांचक्रुः सर्व एव विशाम्पते ॥ १३ ॥

राजन्! उन्होंने एकचक्रा नगरीमें जाकर नगरभरमें यह समाचार फैला दिया; फिर तो हजारों नगरनिवासी मनुष्य स्त्री, बच्चों और बूढ़ोंके साथ बकासुरको देखनेके लिये वहाँ आये । उस समय वह अमानुषिक कर्म देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । जनमेजय! उन सभी लोगोंने देवताओंकी पूजा की ॥ १२-१३ ॥

ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने ।

ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ॥ १४ ॥

इसके बाद उन्होंने यह जाननेके लिये कि आज भोजन पहुँचानेकी किसकी बारी थी, दिन आदिकी गणना की । फिर उस ब्राह्मणकी बारीका पता लगनेपर सब लोग उसके पास आकर पूछने लगे ॥ १४ ॥

एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् ।

पृष्ठ 1169

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उवाच नागरान् सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ॥ १५ ॥

इस प्रकार उनके बार- बार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पाण्डवोंको गुप्त रखते हुए समस्त नागरिकोंसे इस प्रकार कहा - ॥ १५ ॥

आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः ।

ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ॥ १६ ॥

' कल जब मुझे भोजन पहुँचानेकी आज्ञा मिली, उस समय मैं अपने बन्धुजनोंके साथ रो रहा था । इस दशामें मुझे एक विशाल हृदयवाले मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणने देखा ॥ १६ ॥

परिपृच्छ्य स मां पूर्वं परिक्लेशं पुरस्य च ।

अब्रवीद् ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ॥ १७ ॥

' देखकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवताने पहले मुझसे सम्पूर्ण नगरके कष्टका कारण पूछा ।

इसके बाद अपनी अलौकिक शक्तिका विश्वास दिलाकर हँसते हुए - से कहा— ॥ १७ ॥

प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद् दुरात्मने ।

मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥

‘ ब्रह्मन्! आज मैं स्वयं ही उस दुरात्मा राक्षसके लिये भोजन ले जाऊँगा । ' उन्होंने यह भी बताया कि ‘ आपको मेरे लिये भय नहीं करना चाहिये ' ॥ १८ ॥

स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति ।

तेन नूनं भवेदेतत् कर्म लोकहितं कृतम् ॥ १ ९ ॥

‘ वे वह भोजन - सामग्री लेकर बकासुरके वनकी ओर गये । अवश्य उन्होंने ही यह लोक-हितकारी कर्म किया होगा ' ॥ १ ९ ॥

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः ।

वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ॥ २० ॥

तब तो वे सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित हो आनन्दमें निमग्न हो गये । उस समय उन्होंने ब्राह्मणोंके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव मनाया ॥ २० ॥

ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति ।

तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ॥ २१ ॥

इसके बाद उस अद्भुत घटनाको देखनेके लिये जनपदमें रहनेवाले सब लोग नगरमें आये और पाण्डवलोग भी ( पूर्ववत्) वहीं निवास करने लगे ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकवधे त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुरवधविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥

पृष्ठ 1170

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( चैत्ररथपर्व) चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका एक ब्राह्मणसे विचित्र कथाएँ सुनना जनमेजय उवाच

ते तथा पुरुषव्याघ्रा निहत्य बकराक्षसम् ।

अत ऊर्ध्वं ततो ब्रह्मन् किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा —ब्रह्मन्! पुरुषसिंह पाण्डवोंने उस प्रकार बकासुरका वध करनेके पश्चात् कौन - सा कार्य किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

तत्रैव न्यवसन् राजन् निहत्य बकराक्षसम् ।

अधीयानाः परं ब्रह्म ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! बकासुरका वध करनेके पश्चात् पाण्डवलोग ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले उपनिषदोंका स्वाध्याय करते हुए वहीं ब्राह्मणके घरमें रहने लगे ॥ २ ॥

ततः कतिपयाहस्य ब्राह्मणः संशितव्रतः ।

प्रतिश्रयार्थी तद् वेश्म ब्राह्मणस्य जगाम ह ॥ ३ ॥

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद एक कठोर नियमोंका पालन करनेवाला ब्राह्मण ठहरनेके लिये उन ब्राह्मणदेवताके घरपर आया ॥ ३ ॥

स सम्यक् पूजयित्वा तं विप्रं विप्रर्षभस्तदा ।

ददौ प्रतिश्रयं तस्मै सदा सर्वातिथिव्रतः ॥ ४ ॥

उन विप्रवरका सदा घरपर आये हुए सभी अतिथियोंकी सेवा करनेका व्रत था । उन्होंने आगन्तुक ब्राह्मणकी भलीभाँति पूजा करके उसे ठहरनेके लिये स्थान दिया ॥ ४ ॥

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सह कुन्त्या नरर्षभाः ।

उपासांचक्रिरे विप्रं कथयन्तं कथाः शुभाः ॥ ५ ॥

वह ब्राह्मण बड़ी सुन्दर एवं कल्याणमयी कथाएँ कह रहा था, ( अतः उन्हें सुननेके लिये ) सभी नरश्रेष्ठ पाण्डव माता कुन्तीके साथ उसके निकट जा बैठे ॥ ५ ॥

कथयामास देशांश्च तीर्थानि सरितस्तथा ।