श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1171–1180
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180
पृष्ठ 1171
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राज्ञश्च विविधाश्चर्यान् देशांश्चैव पुराणि च ॥ ६ ॥
उसने अनेक देशों, तीर्थों, नदियों, राजाओं, नाना प्रकारके आश्चर्यजनक स्थानों तथा नगरोंका वर्णन किया ॥ ६ ॥
स तत्राकथयद् विप्रः कथान्ते जनमेजय ।
पञ्चालेष्वद्भुताकारं याज्ञसेन्याः स्वयंवरम् ॥ ७ ॥
जनमेजय! बातचीतके अन्तमें उस ब्राह्मणने वहाँ यह भी बताया कि पंचालदेशमें यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीका अद्भुत स्वयंवर होने जा रहा है ॥ ७ ॥
धृष्टद्युम्नस्य चोत्पत्तिमुत्पत्तिं च शिखण्डिनः ।
अयोनिजत्वं कृष्णाया द्रुपदस्य महामखे ॥ ८ ॥
धृष्टद्युम्न और शिखण्डीकी उत्पत्ति तथा द्रुपदके महायज्ञमें कृष्णा (द्रौपदी ) -का बिना माताके गर्भके ही ( यज्ञकी वेदीसे ) जन्म होना आदि बातें भी उसने कहीं ॥ ८ ॥
तदद्भुततमं श्रुत्वा लोके तस्य महात्मनः ।
विस्तरेणैव पप्रच्छुः कथान्ते पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥
उस महात्मा ब्राह्मणका इस लोकमें अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होनेवाला यह वचन सुनकर कथाके अन्तमें पुरुषशिरोमणि पाण्डवोंने विस्तारपूर्वक जाननेके लिये पूछा ॥ ९ ॥
पाण्डवा ऊचुः
कथं द्रुपदपुत्रस्य धृष्टद्युम्नस्य पावकात् ।
वेदीमध्याच्च कृष्णायाः सम्भवः कथमद्भुतः ॥ १० ॥
पाण्डव बोले- द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नका यज्ञाग्निसे और कृष्णाका यज्ञवेदीके मध्यभागसे अद्भुत जन्म किस प्रकार हुआ? ॥ १० ॥
कथं द्रोणान्महेष्वासात् सर्वाण्यस्त्राण्यशिक्षत ।
कथं विप्र सखायौ तौ भिन्नौ कस्य कृतेन वा ॥ ११ ॥
धृष्टद्युम्नने महाधनुर्धर द्रोणसे सब अस्त्रोंकी शिक्षा किस प्रकार प्राप्त की? ब्रह्मन्! द्रुपद और द्रोणमें किस प्रकार मैत्री हुई? और किस कारणसे उनमें वैर पड़ गया? ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं तैश्चोदितो राजन् स विप्रः पुरुषर्षभैः ।
कथयामास तत् सर्वं द्रौपदीसम्भवं तदा ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पुरुषशिरोमणि पाण्डवोंके इस प्रकार पूछनेपर आगन्तुक ब्राह्मणने उस समय द्रौपदीकी उत्पत्तिका सारा वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया ॥ १२ ॥
पृष्ठ 1172
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें ब्राह्मणकथाविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥
पृष्ठ 1173
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त ब्राह्मणउवाच
गङ्गाद्वारं प्रति महान् बभूवर्षिर्महातपाः ।
भरद्वाजो महाप्राज्ञः सततं संशितव्रतः ॥ १ ॥
आगन्तुक ब्राह्मणने कहा- गंगाद्वारमें एक महाबुद्धिमान् और परम तपस्वी भरद्वाज नामक महर्षि रहते थे, जो सदा कठोर व्रतका पालन करते थे ॥ १ ॥
सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम् ।
ददर्शाप्सरसं तत्र घृताचीमाप्लुतामृषिः ॥ २ ॥
एक दिन वे गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये । वहाँ पहलेसे ही आकर सुन्दरी अप्सरा
घृताची नामवाली गंगाजीमें गोते लगा रही थी । महर्षिने उसे देखा ॥ २ ॥
तस्या वायुर्नदीतीरे वसनं व्यहरत् तदा ।
अपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे तदा ॥ ३ ॥
जब नदीके तटपर खड़ी हो वह वस्त्र बदलने लगी, उस समय वायुने उसकी साड़ी उड़ा दी । वस्त्र हट जानेसे उसे नग्नावस्थामें देखकर महर्षिने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की ॥ ३ ॥
तस्यां संसक्तमनसः कौमारब्रह्मचारिणः ।
चिरस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ॥। ४ ॥
मुनिवर भरद्वाजने कुमारावस्थासे ही दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्यका पालन किया था । घृताचीमें चित्त आसक्त हो जानेके कारण उनका वीर्य स्खलित हो गया । महर्षिने उस वीर्यको द्रोण ( यज्ञकलश) में रख दिया ॥ ४ ॥
ततः समभवद् द्रोणः कुमारस्तस्य धीमतः ।
अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ५ ॥
उसीसे बुद्धिमान् भरद्वाजजीके द्रोण नामक पुत्र हुआ । उसने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंका भी अध्ययन कर लिया ॥ ५ ॥
भरद्वाजस्य तु सखा पृषतो नाम पार्थिवः ।
तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत् सुतः ॥ ६ ॥
पृषत नामके एक राजा भरद्वाज मुनिके मित्र थे । उन्हीं दिनों राजा पृषतके भी द्रुपद नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥
स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्षतः ।
चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1174
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
क्षत्रियशिरोमणि पृषतकुमार द्रुपद प्रतिदिन भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाकर द्रोणके साथ खेलते और अध्ययन करते थे ॥ ७ ॥
ततस्तु पृषतेऽतीते स राजा द्रुपदोऽभवत् ।
द्रोणोऽपि रामं शुश्राव दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ८ ॥
वनं तु प्रस्थितं रामं भरद्वाजसुतोऽब्रवीत् ।
आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
पृषतकी मृत्युके पश्चात् द्रुपद राजा हुए । इधर द्रोणने भी यह सुना कि परशुरामजी अपना सारा धन दान कर देना चाहते हैं और वनमें जानेके लिये उद्यत हैं । तब वे भरद्वाजनन्दन द्रोण परशुरामजीके पास जाकर बोले- ' द्विजश्रेष्ठ! मुझे द्रोण जानिये । मैं धनकी कामनासे यहाँ आया हूँ' ॥ ८ - ९ ॥ राम उवाच
शरीरमात्रमेवाद्य मया समवशेषितम् ।
अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मन्नेकतमं वृणु ॥ १० ॥
परशुरामजीने कहा—ब्रह्मन्! अब तो केवल मैंने अपने शरीरको ही बचा रखा है ( शरीरके सिवा सब कुछ दान कर दिया) । अतः अब तुम मेरे अस्त्रों अथवा यह शरीर— दोनोंमेंसे किसी एकको माँग लो ॥ १० ॥
द्रोणउवाच
अस्त्राणि चैव सर्वाणि तेषां संहारमेव च ।
प्रयोगं चैव सर्वेषां दातुमर्हति मे भवान् ॥ ११ ॥
द्रोण बोले — भगवन्! आप मुझे सम्पूर्ण अस्त्र तथा उन सबके प्रयोग और उपसंहारकी विधि भी प्रदान करें ॥ ११ ॥
ब्राह्मणउवाच
तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रददौ भृगुनन्दनः ।
प्रतिगृह्य तदा द्रोणः कृतकृत्योऽभवत् तदा ॥ १२ ॥
आगन्तुक ब्राह्मणने कहा– तब भृगुनन्दन परशुरामजीने ' तथास्तु ' कहकर अपने सब अस्त्र द्रोणको दे दिये । उन सबको ग्रहण करके द्रोण उस समय कृतार्थ हो गये ॥ १२ ॥
सम्प्रहृष्टमना द्रोणो रामात् परमसम्मतम् ।
ब्रह्मास्त्रं समनुप्राप्य नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् ॥ १३ ॥
उन्होंने परशुरामजीसे प्रसन्नचित्त होकर परम सम्मानित ब्रह्मास्त्रका ज्ञान प्राप्त किया और मनुष्योंमें सबसे बढ़- चढ़कर हो गये ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1175
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् ।
अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः सखायं विद्धि मामिति ॥ १४ ॥
तब पुरुषसिंह प्रतापी द्रोणने राजा द्रुपदके पास जाकर कहा-' राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ, मुझे पहचानो' ॥ १४ ॥
द्रुपदउवाच
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ १५ ॥
द्रुपदने कहा- जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथी वीरका और इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र होनेयोग्य नहीं है; फिर तुम पहलेकी मित्रताकी अभिलाषा क्यों करते हो? ॥ १५ ॥
ब्राह्मणउवाच
स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रति बुद्धिमान् ।
जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् ॥ १६ ॥
आगन्तुक ब्राह्मणने कहा- बुद्धिमान् द्रोणने पांचालराज द्रुपदसे बदला लेनेका मन-ही- मन निश्चय किया । फिर वे कुरुवंशी राजाओंकी राजधानी हस्तिनापुरमें गये ॥ १६ ॥
तस्मै पौत्रान् समादाय वसूनि विविधानि च ।
प्राप्ताय प्रददौ भीष्मः शिष्यान् द्रोणाय धीमते ॥ १७ ॥
वहाँ जानेपर बुद्धिमान् द्रोणको नाना प्रकारके धन लेकर भीष्मजीने अपने सभी पौत्रोंको उन्हें शिष्यरूपमें सौंप दिया ॥ १७ ॥
द्रोणः शिष्यांस्ततः पार्थानिदं वचनमब्रवीत् ।
समानीय तु ताञ्शिष्यान् द्रुपदस्यासुखाय वै ॥ १८ ॥
तब द्रोणने सब शिष्योंको एकत्र करके, जिनमें कुन्तीके पुत्र तथा अन्य लोग भी थे, द्रुपदको कष्ट देनेके उद्देश्यसे इस प्रकार कहा- ॥ १८ ॥
आचार्यवेतनं किंचिद् हृदि यद् वर्तते मम ।
कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं स्यात् तदृतं वदतानघाः ।
सोऽर्जुनप्रमुखैरुक्तस्तथास्त्विति गुरुस्तदा ॥ १ ९ ॥
'निष्पाप शिष्यगण! मेरे मनमें तुमलोगोंसे कुछ गुरुदक्षिणा लेनेकी इच्छा है । अस्त्रविद्यामें पारंगत होनेपर तुम्हें वह दक्षिणा देनी होगी । इसके लिये सच्ची प्रतिज्ञा करो । ' तब अर्जुन आदि शिष्योंने अपने गुरुसे कहा — ' तथास्तु ( ऐसा ही होगा) ' ॥ १ ९ ॥
यदा च पाण्डवाः सर्वे कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः ।
ततो द्रोणोऽब्रवीद् भूयो वेतनार्थमिदं वचः ॥ २० ॥
पृष्ठ 1176
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जब समस्त पाण्डव अस्त्रविद्यामें पारंगत हो गये और प्रतिज्ञापालनके निश्चयपर दृढ़तापूर्वक डटे रहे, तब द्रोणाचार्यने गुरुदक्षिणा लेनेके लिये पुनः यह बात कही ॥ २० ॥
पार्षतो द्रुपदो नामच्छत्रवत्यां नरेश्वरः ।
तस्मादाकृष्य तद् राज्यं मम शीघ्रं प्रदीयताम् ॥ २१ ॥
‘ अहिच्छत्रा नगरीमें पृषतके पुत्र राजा द्रुपद रहते हैं । उनसे उनका राज्य छीनकर शीघ्र मुझे अर्पित कर दो ' ॥ २१ ॥
( धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः पञ्चालान् पाण्डवा ययुः ॥ यज्ञसेनेन संगम्य कर्णदुर्योधनादयः । निर्जिताः संन्यवर्तन्त तथान्ये क्षत्रियर्षभाः ॥ )
ततः पाण्डुसुताः पञ्च निर्जित्य द्रुपदं युधि ।
द्रोणाय दर्शयामासुर्बद्ध्वा ससचिवं तदा ॥ २२ ॥
( गुरुकी आज्ञा पाकर ) धृतराष्ट्रपुत्रोंसहित पाण्डव पंचाल देशमें गये । वहाँ राजा द्रुपदके साथ युद्ध होनेपर कर्ण, दुर्योधन आदि कौरव तथा दूसरे - दूसरे प्रमुख क्षत्रिय वीर परास्त होकर रणभूमिसे भाग गये । तब पाँचों पाण्डवोंने द्रुपदको युद्धमें परास्त कर दिया और मन्त्रियों - सहित उन्हें कैद करके द्रोणके सम्मुख ला दिया ॥ २२ ॥
( महेन्द्र इव दुर्धर्षो महेन्द्र इव दानवम् ।
महेन्द्रपुत्रः पाञ्चालं जितवानर्जुनस्तदा ॥
तद् दृष्ट्वा तु महावीर्यं फाल्गुनस्यामितौजसः ।
व्यस्मयन्त जनाः सर्वे यज्ञसेनस्य बान्धवाः ॥
नास्त्यर्जुनसमो वीर्ये राजपुत्र इति ब्रुवन् ॥ ) महेन्द्रपुत्र अर्जुन महेन्द्र पर्वतके समान दुर्धर्ष थे । जैसे महेन्द्रने दानवराजको परास्त किया था, उसी प्रकार उन्होंने पांचालराजपर विजय पायी । अमिततेजस्वी अर्जुनका वह महान् पराक्रम देख राजा द्रुपदके समस्त बान्धवजन बड़े विस्मित हुए और मन- ही- मन कहने लगे — ‘ अर्जुनके समान शक्तिशाली दूसरा कोई राजकुमार नहीं है ' । द्रोणउवाच
प्रार्थयामि त्वया सख्यं पुनरेव नराधिप ।
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति ॥ २३ ॥
अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन त्वया सह ।
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ॥ २४ ॥
द्रोणाचार्य बोले- राजन्! मैं फिर भी तुमसे मित्रताके लिये प्रार्थना करता हूँ । यज्ञसेन! तुमने कहा था, जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; अतः मैंने राज्यप्राप्तिके
पृष्ठ 1177
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
लिये तुम्हारे साथ युद्धका प्रयास किया है । तुम गंगाके दक्षिणतटके राजा रहो और मैं उत्तरतटका ॥ २३-२४ ॥ ब्राह्मणउवाच
एवमुक्तो हि पाञ्चाल्यो भारद्वाजेन धीमता ।
उवाचास्त्रविदां श्रेष्ठो द्रोणं ब्राह्मणसत्तमम् ॥ २५ ॥
आगन्तुक ब्राह्मण कहता है - बुद्धिमान् भरद्वाज-नन्दन द्रोणके यों कहनेपर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पंचाल नरेश द्रुपदने विप्रवर द्रोणसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥
एवं भवतु भद्रं ते भारद्वाज महामते ।
सख्यं तदेव भवतु शश्वद् यदभिमन्यसे ॥ २६ ॥
'महामते द्रोण! एवमस्तु, आपका कल्याण हो । आपकी जैसी राय है, उसके अनुसार हम दोनोंकी वही पुरानी मैत्री सदा बनी रहे ' ॥ २६ ॥
एवमन्योन्यमुक्त्वा तौ कृत्वा सख्यमनुत्तमम् ।
जग्मतुर्द्रोणपाञ्चाल्यौ यथागतमरिंदमौ ॥ २७ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्य और द्रुपद एक दूसरेसे उपर्युक्त बातें कहकर परम उत्तम मैत्रीभाव स्थापित करके इच्छानुसार अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ २७ ॥
असत्कारः स तु महान् मुहूर्तमपि तस्य तु ।
नापैति हृदयाद् राज्ञो दुर्मनाः स कृशोऽभवत् ॥ २८ ॥
उस समय उनका जो महान् अपमान हुआ, वह दो घड़ीके लिये भी राजा द्रुपदके हृदयसे निकल नहीं पाया । वे मन - ही - मन बहुत दुःखी थे और उनका शरीर भी बहुत दुर्बल हो गया ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीजन्मविषयक एक सौ पैंसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं )
पृष्ठ 1178
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति ब्राह्मणउवाच
अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान् द्विजर्षभान् ।
अन्विच्छन् परिचक्राम ब्राह्मणावसथान् बहून् ॥ १ ॥
आगन्तुक ब्राह्मण कहता है- राजा द्रुपद अमर्षमें भर गये थे, अतः उन्होंने कर्मसिद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको ढूँढ़नेके लिये बहुत- से ब्रह्मर्षियोंके आश्रमोंमें भ्रमण किया ॥ १ ॥
पुत्रजन्म परीप्सन् वै शोकोपहतचेतनः ।
नास्ति श्रेष्ठमपत्यं मे इति नित्यमचिन्तयत् ॥ २ ॥
वे अपने लिये एक श्रेष्ठ पुत्र चाहते थे । उनका चित्त शोकसे व्याकुल रहता था । वे रात-दिन इसी चिन्तामें पड़े रहते थे कि मेरे कोई श्रेष्ठ संतान नहीं है ॥ २ ॥
जातान् पुत्रान् स निर्वेदाद् धिग् बन्धूनिति चाब्रवीत् ।
निःश्वासपरमश्चासीद् द्रोणं प्रतिचिकीर्षया ॥ ३ ॥
जो पुत्र या भाई- बन्धु उत्पन्न हो चुके थे, उन्हें वे खेदवश धिक्कारते रहते थे । द्रोणसे बदला लेनेकी इच्छा रखकर राजा द्रुपद सदा लंबी साँसें खींचा करते थे ॥ ३ ॥
प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च ।
क्षात्रेण च बलेनास्य चिन्तयन् नाध्यगच्छत ॥ ४ ॥
प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत ।
अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः ।
तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः ॥ ६ ॥
जनमेजय! नृपश्रेष्ठ द्रुपद द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये यत्न करनेपर भी उनके प्रभाव, विनय, शिक्षा एवं चरित्रका चिन्तन करके क्षात्रबलके द्वारा उन्हें परास्त करनेका कोई उपाय न जान सके । वे कृष्णवर्णा यमुना तथा गंगा दोनोंके तटोंपर घूमते हुए ब्राह्मणोंकी एक पवित्र बस्तीमें जा पहुँचे । वहाँ उन महाभाग नरेशने एक भी ऐसा ब्राह्मण नहीं देखा, जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करके वेद - वेदांगकी शिक्षा न प्राप्त की हो ॥ ४–६ ॥
तथैव च महाभागः सोऽपश्यत् संशितव्रतौ ।
याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ परमेष्ठिनौ ॥ ७ ॥
इस प्रकार उन महाभागने वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले दो ब्रह्मर्षियोंको देखा, जिनके नाम थे याज और उपयाज। वे दोनों ही परम शान्त और परमेष्ठी ब्रह्माके तुल्य
पृष्ठ 1179
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रभावशाली थे ॥ ७ ||
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ ।
तारणेयी युक्तरूपी ब्राह्मणावृषिसत्तमौ ॥ ८ ॥
वे वैदिक संहिताके अध्ययनमें सदा संलग्न रहते थे । उनका गोत्र काश्यप था । वे दोनों ब्राह्मण सूर्यदेवके भक्त, बड़े ही योग्य तथा श्रेष्ठ ऋषि थे ॥ ८ ॥
स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः ।
बुद्ध्वा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपह्वरे ॥ ९ ॥
प्रपेदे छन्दयन् कामैरुपयाजं धृतव्रतम् ।
पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक् सर्वकामदः ॥ १० ॥
अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः ।
येन मे कर्मणा ब्रह्मन् पुत्रः स्याद् द्रोणमृत्यवे ॥ ११ ॥
उपयाज कृते तस्मिन् गवां दातास्मि तेऽर्बुदम् ।
यद् वा तेऽन्यद् द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत् ।
सर्वं तत् ते प्रदाताहं न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ १२ ॥
उन दोनोंकी शक्तिको समझकर आलस्यरहित राजा द्रुपदने उन्हें सम्पूर्ण मनोवांछित भोग- पदार्थ अर्पण करनेका संकल्प लेकर निमन्त्रित किया । उन दोनोंमेंसे जो छोटे उपयाज थे, वे अत्यन्त उत्तम व्रतका पालन करनेवाले थे । द्रुपद एकान्तमें उनसे मिले और इच्छानुसार भोग्य वस्तुएँ अर्पण करके उन्हें अपने अनुकूल बनानेकी चेष्टा करने लगे । सम्पूर्ण मनोभिलषित पदार्थोंको देनेकी प्रतिज्ञा करके प्रिय वचन बोलते हुए द्रुपद मुनिके चरणोंकी सेवामें लग गये और यथायोग्य पूजन करके उपयाजसे बोले –'विप्रवर उपयाज! जिस कर्मसे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो द्रोणाचार्यको मार सके । उस कर्मके पूरा होनेपर मैं आपको एक अर्बुद ( दस करोड़ ) गायें दूँगा। द्विजश्रेष्ठ! इसके सिवा और भी जो आपके मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाली वस्तु होगी, वह सब आपको अर्पित करूंगा, इसमें कोई संशय नहीं है ' ॥ ९ –१२ ॥
इत्युक्तो नाहमित्येवं तमृषिः प्रत्यभाषत ।
आराधयिष्यन् द्रुपदः स तं पर्यचरत् पुनः ॥ १३ ॥
द्रुपदके यों कहनेपर ऋषि उपयाजने उन्हें जवाब दे दिया, ' मैं ऐसा कार्य नहीं करूँगा । ' परंतु द्रुपद उन्हें प्रसन्न करनेका निश्चय करके पुनः उनकी सेवामें लगे रहे ॥ १३ ॥
ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः ।
उपयाजोऽब्रवीत् काले राजन् मधुरया गिरा ॥ १४ ॥
ज्येष्ठो भ्राता ममागृह्णाद् विचरन् गहने वने ।
अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम् ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1180
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर द्विजश्रेष्ठ उपयाजने उपयुक्त अवसरपर मधुर वाणीमें द्रुपदसे कहा – ' राजन्! मेरे बड़े भाई याज एक समय घने वनमें विचर रहे थे । उन्होंने एक ऐसी जमीनपर गिरे हुए फलको उठा लिया, जिसकी शुद्धिके सम्बन्धमें कुछ भी पता नहीं था ॥ १४-१५ ॥
तदपश्यमहं भ्रातुरसाम्प्रतमनुव्रजन् ।
विमर्शं संकरादाने नायं कुर्यात् कदाचन ॥ १६ ॥
‘ मैं भी भाईके पीछे - पीछे जा रहा था; अतः मैंने उनके इस अयोग्य कार्यको देख लिया और सोचा कि ये अपवित्र वस्तुको ग्रहण करनेमें भी कभी कोई विचार नहीं करते ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद् दोषान् पापानुबन्धकान् 1 विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् ॥ १७ ॥
‘ जिन्होंने देखकर भी फलके पापजनक दोषोंकी ओर दृष्टिपात नहीं किया, जो किसी वस्तुको लेनेमें शुद्धि - अशुद्धिका विचार नहीं करते, वे दूसरे कार्योंमें भी कैसा बर्ताव करेंगे, कहा नहीं जा सकता ॥ १७ ॥
संहिताध्ययनं कुर्वन् वसन् गुरुकुले च यः ।
भैक्ष्यमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा ॥ १८ ॥
कीर्तयन् गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः ।
तं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा ॥ १ ९ ॥
‘ गुरुकुलमें रहकर संहिताभागका अध्ययन करते हुए भी जो दूसरोंकी त्यागी हुई भिक्षाको जब - तब खा लिया करते थे और घृणाशून्य होकर बार- बार उस अन्नके गुणोंका वर्णन करते रहते थे, उन अपने भाईको जब मैं तर्ककी दृष्टिसे देखता हूँ तो वे मुझे फलके लोभी जान पड़ते हैं ॥ १८-१९ ॥
तं वै गच्छस्व नृपते स त्वां संयाजयिष्यति ।
जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् ॥ २० ॥
उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याश्रममभ्यगात् ।
अभिसम्पूज्य पूजार्हमथ याजमुवाच ह ॥ २१ ॥
‘ राजन्! तुम उन्हींके पास जाओ । वे तुम्हारा यज्ञ करा देंगे । ' राजा द्रुपद उपयाजकी बात सुनकर याजके इस चरित्रकी मन-ही- मन निन्दा करने लगे, तो भी अपने कार्यका विचार करके याजके आश्रमपर गये और पूजनीय याज मुनिका पूजन करके तब उनसे इस प्रकार बोले - ॥ २०-२१ ॥