श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1181–1190

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1181–1190

पृष्ठ 1181

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अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो ।

द्रोणवैराभिसंतप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि ॥ २२ ॥

‘ भगवन्! मैं आपको अस्सी हजार गौएँ भेंट करता हूँ । आप मेरा यज्ञ करा दीजिये । मैं

द्रोणके वैरसे संतप्त हो रहा हूँ। आप मुझे प्रसन्नता प्रदान करें ॥ २२ ॥

स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः ।

तस्माद् द्रोणः पराजैष्ट मां वै स सखिविग्रहे ॥ २३ ॥

‘ द्रोणाचार्य ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और ब्रह्मास्त्रके प्रयोगमें भी सर्वोत्तम हैं; इसलिये मित्र मानने- न- माननेके प्रश्नको लेकर होनेवाले झगड़ेमें उन्होंने मुझे पराजित कर दिया है ॥ २३ ॥

क्षत्रियो नास्ति तस्यास्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः ।

कौरवाचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः ॥ २४ ॥

‘ परम बुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोण इन दिनों कुरुवंशी राजकुमारोंके प्रधान आचार्य हैं । इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसा क्षत्रिय नहीं है, जो अस्त्र-विद्यामें उनसे आगे बढ़ा हो ॥ २४ ॥

द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च ।

षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत् ॥ २५ ॥

स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमसंशयम् ।

प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1182

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‘ द्रोणाचार्यके बाणसमूह प्राणियोंके शरीरका संहार करनेवाले हैं । उनका छः हाथका लंबा धनुष बहुत बड़ा दिखायी देता है । इसमें संदेह नहीं कि महान् धनुर्धर महामना द्रोण ब्राह्मण - वेशमें ( अपने ब्राह्मतेजके द्वारा) क्षत्रिय - तेजको प्रतिहत कर देते हैं ॥ २५-२६ ॥

क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः ।

तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रधृष्यं नरैर्भुवि ॥ २७ ॥

‘ मानो जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी भाँति क्षत्रियोंका संहार करनेके लिये उनकी सृष्टि हुई है । उनका अस्त्रबल बड़ा भयंकर है । पृथ्वीके सब मनुष्य मिलकर भी उसे दबा नहीं सकते ॥ २७ ॥

बाह्मं संधारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः ।

समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरस्सरः ॥ २८ ॥

‘ घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान वे प्रचण्ड ब्राह्मतेज धारण करते हैं और युद्धमें क्षात्रधर्मको आगे रखकर विपक्षियोंसे भिड़ंत होनेपर वे उन्हें भस्म कर डालते हैं ॥ २८ ॥

ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्मं तेजो विशिष्यते ।

सोऽहं क्षात्राद् बलाद्धीनो बाह्यं तेजः प्रपेदिवान् ॥ २ ९ ॥

‘ यद्यपि द्रोणाचार्यमें ब्राह्मतेजके साथ- साथ क्षात्रतेज भी विद्यमान है, तथापि आपका ब्राह्मतेज उनसे बढ़कर है । मैं केवल क्षात्रबलके कारण द्रोणाचार्यसे हीन हूँ; अतः मैंने आपके ब्राह्मतेजकी शरण ली है ॥ २ ९ ॥

द्रोणाद् विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् ।

द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ॥ ३० ॥

‘ आप वेदवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण द्रोणाचार्यसे बहुत बढ़े -चढ़े हैं । मैं आपकी शरण लेकर एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो युद्धमें दुर्जय और द्रोणाचार्यका विनाशक हो ॥ ३० ॥

तत् कर्म कुरु मे याज वितसम्यर्बुदं गवाम् ।

तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् ॥ ३१ ॥

‘ याजजी! मेरे इस मनोरथको पूर्ण करनेवाला यज्ञ कराइये । उसके लिये मैं आपको एक अर्बुद गौएँ दक्षिणामें दूँगा । ' तब याजने ‘ तथास्तु ' कहकर यजमानकी अभीष्ट - सिद्धिके लिये आवश्यक यज्ञ और उसके साधनोंका स्मरण किया ॥ ३१ ॥

गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् ।

याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः ॥ ३२ ॥

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः ।

आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1183

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' यह बहुत बड़ा कार्य है ' ऐसा विचार करके याजने इस कार्यके लिये किसी प्रकारकी कामना न रखनेवाले उपयाजको भी प्रेरित किया तथा याजने द्रोणके विनाशके लिये वैसा पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद महातपस्वी उपयाजने राजा द्रुपदको अभीष्ट पुत्ररूपी फलकी सिद्धिके लिये आवश्यक यज्ञकर्मका उपदेश किया ॥ ३२–३३ ॥

स च पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः ।

इष्यते यद्विधो राजन् भविता ते तथाविधः ॥ ३४ ॥

और कहा — ‘ राजन्! इस यज्ञसे तुम जैसा पुत्र चाहते हो, वैसा ही तुम्हें होगा । तुम्हारा वह पुत्र महान् पराक्रमी, महातेजस्वी और महाबली होगा' ॥ ३४ ॥

भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसंधाय भूपतिः ।

आजहे तत् तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये ॥ ३५ ॥

तदनन्तर द्रोणके घातक पुत्रका संकल्प लेकर राजा द्रुपदने कर्मकी सिद्धिके लिये उपयाजके कथनानुसार सारी व्यवस्था की ॥ ३५ ॥

याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत् तदा ।

प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ॥ ३६ ॥

(कुमारश्च कुमारी च पितृवंशविवृद्धये । ) हवनके अन्तमें याजने द्रुपदकी रानीको आज्ञा दी - ' पृषतकी पुत्रवधू! महारानी! शीघ्र मेरे पास हविष्य ग्रहण करनेके लिये आओ । तुम्हें एक पुत्र और एक कन्याकी प्राप्ति होनेवाली है, वे कुमार और कुमारी अपने पिताके कुलकी वृद्धि करनेवाले होंगे ' ॥ ३६ ॥

राज्ञ्युवाच

अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन् दिव्यान् गन्धान् बिभर्मि च ।

सुतार्थे नोपलब्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिये ॥ ३७ ॥

रानी बोली – ब्रह्मन्! अभी मेरे मुखमें ताम्बूल आदिका रंग लगा है! मैं अपने अंगोंमें दिव्य सुगन्धित अंगराग धारण कर रही हूँ, अतः मुँह धोये और स्नान किये बिना पुत्रदायक हविष्यका स्पर्श करनेके योग्य नहीं हूँ, इसलिये याजजी! मेरे इस प्रिय कार्यके लिये थोड़ी देर ठहर जाइये ॥ ३७ ॥

याज उवाच

याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् ।

कथं कामं न संदध्यात् सा त्वं विप्रेहि तिष्ठ वा ॥ ३८ ॥

याजने कहा — इस हविष्यको स्वयं याजने पकाकर तैयार किया है और उपयाजने इसे अभिमन्त्रित किया है; अतः तुम आओ या वहीं खड़ी रहो, यह हविष्य यजमानकी कामनाको पूर्ण कैसे नहीं करेगा? ॥ ३८ ॥

ब्राह्मणउवाच

पृष्ठ 1184

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एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते ।

उत्तस्थौ पावकात् तस्मात् कुमारो देवसंनिभः ॥ ३ ९ ॥

ब्राह्मण कहता है- यों कहकर याजने उस संस्कारयुक्त हविष्यकी आहुति ज्यों ही अग्निमें डाली, त्यों ही उस अग्निसे देवताके समान तेजस्वी एक कुमार प्रकट हुआ ॥ ३ ९ ॥

ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् ।

बिभ्रत् सखड्गः सशरो धनुष्मान् विनदन् मुहुः ॥ ४० ॥

उसके अंगोंकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्भासित हो रही थी । उसका रूप भय उत्पन्न करनेवाला था । उसके माथेपर किरीट सुशोभित था । उसने अंगोंमें उत्तम कवच धारण कर रखा था । हाथोंमें खड्ग, बाण और धनुष धारण किये वह बार- बार गर्जना कर रहा था ॥ ४० ||

सोऽध्यारोहद् रथवरं तेन च प्रययौ तदा ।

ततः प्रणेदुः पञ्जालाः प्रहृष्ठाः साधु साध्विति ॥ ४१ ॥

वह कुमार उसी समय एक श्रेष्ठ रथपर जा चढ़ा, मानो उसके द्वारा युद्धके लिये यात्रा कर रहा हो । यह देखकर पांचालोंको बड़ा हर्ष हुआ और वे जोर- जोरसे बोल उठे, 'बहुत अच्छा', ' बहुत अच्छा', ॥ ४१ ॥

हर्षाविष्टांस्ततश्चैतान् नेयं सेहे वसुंधरा ।

भयापहो राजपुत्रः पाञ्चालानां यशस्करः ॥ ४२ ॥

राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय वै ।

इत्युवाच महद् भूतमदृश्यं खेचरं तदा ॥ ४३ ॥

उस समय हर्षोल्लाससे भरे हुए इन पांचालोंका भार यह पृथ्वी नहीं सह सकी । आकाशमें कोई अदृश्य महाभूत इस प्रकार कहने लगा- ' यह राजकुमार पांचालोंके भयको

दूर करके उनके यशकी वृद्धि करनेवाला होगा । यह राजा द्रुपदका शोक दूर करनेवाला है ।

द्रोणाचार्यके वधके लिये ही इसका जन्म हुआ है ' ॥ ४२-४३ ॥

कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात् समुत्थिता ।

सुभगा दर्शनीयङ्गी स्वसितायतलोचना ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् यज्ञकी वेदीमेंसे एक कुमारी कन्या भी प्रकट हुई, जो पांचाली कहलायी । वह बड़ी सुन्दरी एवं सौभाग्यशालिनी थी । उसका एक- एक अंग देखने ही योग्य था । उसकी श्याम आँखें बड़ी - बड़ी थीं ॥ ४४ ॥

श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा ।

ताम्रतुङ्गनखी सुश्रूश्चारुपीनपयोधरा ॥ ४५ ॥

उसके शरीरकी कान्ति श्याम थी । नेत्र ऐसे जान पड़ते मानो खिले हुए कमलके दल हों । केश काले - काले और घुँघराले थे । नख उभरे हुए और लाल रंगके थे । भौंहें बड़ी सुन्दर

पृष्ठ 1185

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थीं । दोनों उरोज स्थूल और मनोहर थे ॥ ४५ ॥

मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी ।

नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात् प्रधावति ॥ ४६ ॥

वह ऐसी जान पड़ती मानो साक्षात् देवी दुर्गा ही मानवशरीर धारण करके प्रकट हुई हों । उसके अंगोंसे नील कमलकी - सी सुगन्ध प्रकट होकर एक कोसतक चारों ओर फैल रही थी ॥ ४६ ॥

या बिभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि ।

देवदानवयक्षाणामीप्सितां देवरूपिणीम् ॥ ४७ ॥

उसने परम सुन्दर रूप धारण कर रखा था । उस समय पृथ्वीपर उसके जैसी सुन्दर स्त्री दूसरी नहीं थी । देवता, दानव और यक्ष भी उस देवोपम कन्याको पानेके लिये लालायित थे ॥ ४७ ॥

तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी ।

सर्वयोषिद्वरा कृष्णा निनीषुः क्षत्रियान् क्षयम् ॥ ४८ ॥

सुन्दर कटिप्रदेशवाली उस कन्याके प्रकट होनेपर भी आकाशवाणी हुई— ‘ इस कन्याका नाम कृष्णा है । यह समस्त युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं सुन्दरी है और क्षत्रियोंका संहार करनेके लिये प्रकट हुई है ॥ ४८ ॥

सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा ।

अस्या हेतोः कौरवाणां महदुत्पत्स्यते भयम् ॥ ४ ९ ॥

‘यह सुमध्यमा समयपर देवताओंका कार्य सिद्ध करेगी । इसके कारण कौरवोंको बहुत बड़ा भय प्राप्त होगा ' ॥ ४ ९ ॥

तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् ।

न चैतान् हर्षसम्पूर्णानियं सेहे वसुंधरा ॥ ५० ॥

वह आकाशवाणी सुनकर समस्त पांचाल सिंहोंके समुदायकी भाँति गर्जना करने लगे ।

उस समय हर्षमें भरे हुए उन पांचालोंका वेग पृथ्वी नहीं सह सकी ॥ ५० ॥

तौ दृष्ट्वा पार्षती याजं प्रपेदे वै सुतार्थिनी ।

न वै मदन्यां जननीं जानीयातामिमाविति ॥ ५१ ॥

उन दोनों पुत्र और पुत्रीको देखकर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली राजा पृषतकी पुत्रवधू महर्षि याजकी शरणमें गयी और बोली– ' भगवन्! आप ऐसी कृपा करें, जिससे ये दोनों बच्चे मेरे सिवा और किसीको अपनी माता न समझें ' ॥ ५१ ॥

तथेत्युवाच तं याजो राज्ञः प्रियचिकीर्षया ।

तयोश्च नामनी चक्रुर्द्विजाः सम्पूर्णमानसाः ॥ ५२ ॥

तब राजाका प्रिय करनेकी इच्छासे याजने कहा- ' ऐसा ही होगा। ' उस समय सम्पूर्ण द्विजोंने सफल - मनोरथ होकर उन बालकोंके नामकरण किये ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 1186

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धृष्टत्वादत्यमर्षित्वाद् द्युम्नाद्युत्सम्भवादपि ।

धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवत्विति ॥ ५३ ॥

यह द्रुपदकुमार धृष्ट, अमर्षशील तथा द्युम्न ( तेजोमय कवच- कुण्डल एवं क्षात्रतेज) आदिके साथ उत्पन्न होनेके कारण ' धृष्टद्युम्न ' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ५३ ॥

कृष्णेत्येवाब्रुवन् कृष्णां कृष्णाभूत् सा हि वर्णतः ।

तथा तन्मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महामखे ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने कुमारीका नाम कृष्णा रखा; क्योंकि वह शरीरसे कृष्ण (श्याम ) वर्णकी थी । इस प्रकार द्रुपदके महान् यज्ञमें वे जुड़वीं संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ५४ ॥

धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम् ।

उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ५५ ॥

अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः ।

तथा तत् कृतवान् द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात् ॥ ५६ ॥

परम बुद्धिमान् प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोण यह सोचकर कि प्रारब्धके भावी विधानको टालना असम्भव है, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको अपने घर ले आये और उन्होंने उसे अस्त्र- विद्याकी शिक्षा देकर उसका बहुत बड़ा उपकार किया । द्रोणाचार्यने अपनी कीर्तिकी रक्षाके लिये वह उदारतापूर्ण कार्य किया ॥ ५५-५६ ॥ (ब्राह्मणउवाच

श्रुत्वा जतुगृहे वृत्तं ब्राह्मणाः सपुरोहिताः ।

पाञ्चालराजं द्रुपदमिदं वचनमब्रुवन् ॥

धार्तराष्ट्राः सहामात्या मन्त्रयित्वा परस्परम् ।

पाण्डवानां विनाशाय मतिं चक्रुः सुदुष्कराम् ॥

दुर्योधनेन प्रहितः पुरोचन इति श्रुतः ।

वारणावतमासाद्य कृत्वा जतुगृहं महत् ॥

तस्मिन् गृहे सुविश्वस्तान् पाण्डवान् पृथया सह ।

अर्धरात्रे महाराज दग्धवान् स पुरोचनः ॥

अग्निना तु स्वयमपि दग्धः क्षुद्रो नृशंसकृत् ।

एतच्छ्रुत्वा सुसंहृष्टो धृतराष्ट्रः सबान्धवः ॥

श्रुत्वा तु पाण्डवान् दग्धान् धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

एतावदुक्त्वा करुणं धृतराष्ट्रस्तु मारिषः ॥

अल्पशोकः प्रहृष्टात्मा शशास विदुरं तदा ।

पाण्डवानां महाप्राज्ञ कुरु पिण्डोदकक्रियाम् ॥

अद्य पाण्डुर्हतः क्षत्तः पाण्डवानां विनाशने ।

पृष्ठ 1187

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तस्माद् भागीरथीं गत्वा कुरु पिण्डोदकक्रियाम् ॥

अहो विधिवशादेव गतास्ते यमसादनम् ।

इत्युक्त्वा प्रारुदत् तत्र धृतराष्ट्रः ससौबलः ॥

श्रुत्वा भीष्मेण विधिवत् कृतवानौर्ध्वदेहिकम् ।

पाण्डवानां विनाशाय कृतं कर्म दुरात्मना ॥

एतत्कार्यस्य कर्ता तु न दृष्टो श्रुतः पुरा ।

एतद् वृत्तं महाराज पाण्डवान् प्रति नः श्रुतम् ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां यज्ञसेनो महामतिः । यथा तज्जनकः शोचेदौरसस्य विनाशने । तथातप्यत पाञ्चालः पाण्डवानां विनाशने ।

समाहूय प्रकृतयः सहिताः सह बान्धवैः ।

कारुण्यादेव पाञ्चालः प्रोवाचेदं वचस्तदा ॥

आगन्तुक ब्राह्मण कहता है - लाक्षागृहमें पाण्डवोंके साथ जो घटना घटित हुई थी, उसे सुनकर ब्राह्मणों तथा पुरोहितोंने पांचालराज द्रुपदसे इस प्रकार कहा— ‘ राजन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने अपने मन्त्रियोंके साथ परस्पर सलाह करके पाण्डवोंके विनाशका विचार कर लिया था । ऐसा क्रूरतापूर्ण विचार दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है । दुर्योधनके भेजे हुए उसके पुरोचन नामक सेवकने वारणावत नगरमें जाकर एक विशाल लाक्षागृहका निर्माण कराया था । उस भवनमें पाण्डव अपनी माता कुन्तीके साथ पूर्ण विश्वस्त होकर रहते थे । महाराज! एक दिन आधी रातके समय पुरोचनने लाक्षागृहमें आग लगा दी । वह नीच और नृशंस पुरोचन स्वयं भी उसी आगमें जलकर भस्म हो गया। यह समाचार सुनकर कि ‘ पाण्डव जल गये ’ अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रको अपने भाई-बन्धुओंके साथ बड़ा हर्ष हुआ । धृतराष्ट्रकी आत्मा हर्षसे खिल उठी थी, तो भी ऊपरसे कुछ शोकका प्रदर्शन करते हुए उन्होंने विदुरजीसे बड़ी करुण भाषामें यह वृत्तान्त बताया और उन्हें आज्ञा दी कि ' महामते! पाण्डवोंका श्राद्ध और तर्पण करो । विदुर! पाण्डवोंके मरनेसे मुझे ऐसा दुःख हुआ है मानो मेरे भाई पाण्डु आज ही स्वर्गवासी हुए हों । अतः गंगाजीके तटपर चलकर उनके लिये श्राद्ध और तर्पणकी व्यवस्था करो । अहो! भाग्यवश ही बेचारे पाण्डव यमलोकको चले गये । ' यों कहकर धृतराष्ट्र और शकुनि फूट- फूटकर रोने लगे । भीष्मजीने यह समाचार सुनकर उनका विधिपूर्वक और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न किया है । इस प्रकार दुरात्मा दुर्योधनने पाण्डवोंके विनाशके लिये यह भयंकर षड्यन्त्र किया था । आजसे पहले हमने किसीको ऐसा नहीं देखा या सुना था जो इस तरहका जघन्य कार्य कर सके । महाराज! पाण्डवोंके सम्बन्धमें यह वृत्तान्त हमारे सुननेमें आया है । ' ब्राह्मण और पुरोहितका यह वचन सुनकर परम बुद्धिमान् राजा द्रुपद शोकमें डूब गये । जैसे अपने सगे पुत्रकी मृत्यु होनेपर उसके पिताको शोक होता है उसी प्रकार पाण्डवोंके

पृष्ठ 1188

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नष्ट होनेका समाचार सुनकर पांचालराजको पीड़ा हुई । उन्होंने अपने भाई- बन्धुओंके साथ समस्त प्रजाको बुलवाया और बड़ी करुणासे यह बात कही । द्रुपदउवाच

अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यं च शिक्षितम् ।

चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवाः ॥

भ्रातृभिः सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने ।

किमाश्चर्यमिदं लोके कालो हि दुरतिक्रमः ॥

मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यामि साम्प्रतम् ।

अन्तर्गतेन दुःखेन दह्यमानो दिवानिशम् ।

याजोपयाजौ सत्कृत्य याचितौ तौ मयानघौ ॥

भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै ।

लोकस्तद् वेद यच्चैव तथा याजेन वै श्रुतम् ॥

याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादितावुभौ ।

धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ ॥

किं करिष्यामि ते नष्टाः पाण्डवाः पृथया सह । द्रुपद बोले- बन्धुओ! अर्जुनका रूप अद्भुत था । उनका धैर्य आश्चर्यजनक था । उनका पराक्रम और उनकी अस्त्र -शिक्षा भी अलौकिक थी । मैं दिन - रात अर्जुनकी ही चिन्तामें डूबा रहता हूँ । हाय! वे अपने भाइयों और माताके साथ आगमें जल गये । संसारमें इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? सच है, कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है । मेरी तो प्रतिज्ञा झूठी हो गयी । अब मैं लोगोंसे क्या कहूँगा । आन्तरिक दुःखसे दिन - रात दग्ध होता रहता हूँ। मैंने निष्पाप याज और उपयाजका सत्कार करके उनसे दो संतानोंकी याचना की थी । एक तो ऐसा पुत्र माँगा, जो द्रोणाचार्यका वध कर सके और दूसरी ऐसी कन्याके लिये प्रार्थना की, जो वीर अर्जुनकी पटरानी बन सके । मेरे इस उद्देश्यको सब लोग जानते हैं और महर्षि याजने भी यही घोषित किया था । उन्होंने पुत्रेष्टियज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्णाको उत्पन्न किया था । इन दोनों संतानोंको पाकर मुझे बड़ा संतोष हुआ । अब क्या करूँ? कुन्तीसहित पाण्डव तो नष्ट हो गये । ब्राह्मणउवाच इत्येवमुक्त्वा पाञ्चालः शुशोच परमातुरः ॥

दृष्ट्वा शोचन्तमत्यर्थं पाञ्चालगुरुरब्रवीत् ।

पुरोधाः सत्त्वसम्पन्नः सम्यग्विद्याशेषवान् ॥

आगन्तुक ब्राह्मण कहता है - ऐसा कहकर पांचालराज द्रुपद अत्यन्त दुःखी एवं शोकातुर हो गये । पांचालराजके गुरु बड़े सात्त्विक और विशिष्ट विद्वान् थे। उन्होंने राजाको

पृष्ठ 1189

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भारी शोकमें डूबा देखकर कहा । गुरुरुवाच

वृद्धानुशासने सक्ताः पाण्डवा धर्मचारिणः ।

तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ॥

मया दृष्टमिदं सत्यं शृणुष्व मनुजाधिप ।

ब्राह्मणैः कथितं सत्यं वेदेषु च मया श्रुतम् ॥

बृहस्पतिमुखेनाथ पौलोम्या च पुरा श्रुतम् ।

नष्ट इन्द्रो बिग्रन्थ्यामुपश्रुत्या तु दर्शितः ॥

उपश्रुतिर्महाराज पाण्डवार्थे मया श्रुता ।

यत्र वा तत्र जीवन्ति पाण्डवास्ते न संशयः ॥

गुरु बोले - महाराज! पाण्डवलोग बड़े -बूढ़ोंके आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले तथा धर्मात्मा हैं । ऐसे लोग न तो नष्ट होते हैं और न पराजित ही होते हैं । नरेश्वर! मैंने जिस सत्यका साक्षात्कार किया है, वह सुनिये । ब्राह्मणोंने तो इस सत्यका प्रतिपादन किया ही है, वेदके मन्त्रोंमें भी मैंने इसका श्रवण किया है । पूर्वकालमें इन्द्राणीने बृहस्पतिजीके मुखसे उपश्रुतिकी महिमा सुनी थी । उत्तरायणकी अधिष्ठात्री देवी उपश्रुतिने ही अदृष्ट हुए इन्द्रका कमलनालकी ग्रन्थिमें दर्शन कराया था । महाराज! इसी प्रकार मैंने भी पाण्डवोंके विषयमें उपश्रुति सुन रखी है । वे पाण्डव कहीं-न- कहीं अवश्य जीवित हैं, इसमें संशय नहीं है ।

मया दृष्टानि लिङ्गानि ध्रुवमेष्यन्ति पाण्डवाः ।

यन्निमित्तमिहायान्ति तच्छृणुष्व नराधिप ॥

स्वयंवरः क्षत्रियाणां कन्यादाने प्रदर्शितः ।

स्वयंवरस्तु नगरे घुष्यतां राजसत्तम ॥

यत्र वा निवसन्तस्ते पाण्डवाः पृथया सह ।

दूरस्था वा समीपस्थाः स्वर्गस्था वापि पाण्डवाः ॥

श्रुत्वा स्वयंवरं राजन् समेष्यन्ति न संशयः ।

तस्मात् स्वयंवरो राजन् घुष्यतां मा चिरं कृथाः ॥

मैंने ऐसे ( शुभ ) चिह्न देखे हैं, जिनसे सूचित होता है कि पाण्डव यहाँ अवश्य पधारेंगे । नरेश्वर! वे जिस निमित्तसे यहाँ आ सकते हैं, वह सुनिये - क्षत्रियोंके लिये कन्यादानका श्रेष्ठ मार्ग स्वयंवर बताया गया है । नृपश्रेष्ठ! आप सम्पूर्ण नगरमें स्वयंवरकी घोषणा करा दें । फिर पाण्डव अपनी माता कुन्तीके साथ दूर हों, निकट हों अथवा स्वर्गमें ही क्यों न हों -जहाँ कहीं भी होंगे, स्वयंवरका समाचार सुनकर यहाँ अवश्य आयेंगे, इसमें संशय नहीं है । अतः राजन्! आप ( सर्वत्र ) स्वयंवरकी सूवना करा दें, इसमें विलम्ब न करें । ब्राह्मणउवाच

पृष्ठ 1190

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श्रुत्वा पुरोहितेनोक्तं पाञ्चालः प्रीतिमांस्तदा ।

घोषयामास नगरे द्रौपद्यास्तु स्वयंवरम् ॥

पुष्यमासे तु रोहिण्यां शुक्लपक्षे शुभे तिथौ ।

दिवसैः पञ्चसप्तत्या भविष्यति स्वयंवरः ॥

देवगन्धर्वयक्षाश्च ऋषयश्च तपोधनाः ।

स्वयंवरं द्रष्टुकामा गच्छन्त्येव न संशयः ॥

तव पुत्रा महात्मानो दर्शनीया विशेषतः ।

यदृच्छया तु पाञ्चाली गच्छेद् वा मध्यमं पतिम् ॥

को हि जानाति लोकेषु प्रजापतिविधिं परम् ।

तस्मात् सपुत्रा गच्छेथा ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।

नित्यकालं सुभिक्षास्ते पञ्चालास्तु तपोधने ॥

यज्ञसेनस्तु राजासौ ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।

ब्रह्मण्या नागराश्चाथ ब्राह्मणाश्चातिथिप्रियाः ॥

नित्यकालं प्रदास्यन्ति आमन्त्रणमयाचितम् ॥

अहं च तत्र गच्छामि ममैभिः सह शिष्यकैः ।

एकसार्थाः प्रयाताः स्मो ब्राह्मण्यै यदि रोचते ॥

आगन्तुक ब्राह्मण कहता है- पुरोहितकी बात सुनकर पंचालराजको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नगरमें द्रौपदीका स्वयंवर घोषित करा दिया । पौषमासके शुक्लपक्षमें शुभ तिथि (एकादशी ) -को रोहिणी नक्षत्रमें वह स्वयंवर होगा, जिसके लिये आजसे पचहत्तर दिन शेष हैं । ब्राह्मणी ( कुन्ती )! देवता, गन्धर्व, यक्ष और तपस्वी ऋषि भी स्वयंवर देखनेके लिये अवश्य जाते हैं । तुम्हारे सभी महात्मा पुत्र देखने में परम सुन्दर हैं । पंचालराजपुत्री कृष्णा इनमेंसे किसीको अपनी इच्छासे पति चुन सकती है अथवा तुम्हारे मँझले पुत्रको अपना पति बना सकती है । संसारमें विधाताके उत्तम विधानको कौन जान सकता है? अतः यदि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगे, तो तुम अपने पुत्रोंके साथ पंचालदेशमें अवश्य जाओ । तपोधने! पंचालदेशमें सदा सुभिक्ष रहता है । राजा यज्ञसेन सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही ब्राह्मणोंके भक्त हैं । वहाँके नागरिक भी ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा - भक्ति रखनेवाले हैं । उस नगरके ब्राह्मण भी अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं । वे प्रतिदिन बिना माँगे ही न्यौता देंगे । मैं भी अपने इन शिष्योंके साथ वहीं जाता हूँ। ब्राह्मणी! यदि ठीक जान पड़े तो चलो । हम सब लोग एक साथ ही वहाँ चले चलेंगे । वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा वचनं ब्राह्मणो विरराम ह । ) वैशम्पायनजी कहते हैं - इतना कहकर वे ब्राह्मण चुप हो गये ।