श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1381–1390

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390

पृष्ठ 1381

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1381 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरी ओर रत्नोंका ढेर लगा था। इससे वह राजभवन निर्मल तारकाओंसे संयुक्त आकाशकी भाँति विचित्र शोभा धारण कर रहा था ॥ ८ ॥

ततस्तु ते कौरवराजपुत्रा विभूषिताः कुण्डलिनो युवानः । महार्हवस्त्राम्बरचन्दनोक्षिताः कृताभिषेकाः कृतमङ्गलक्रियाः ॥ ९ ॥

इधर युवावस्थासे सम्पन्न कौरव - राजकुमार पाण्डव वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और कुण्डलोंसे अलंकृत हो अभिषेक और मंगलाचार करके बहुमूल्य कपड़ों एवं केसर, चन्दनसे सुशोभित हुए ॥ ९ ॥

पुरोहितेनाग्निसमानवर्चसा सहैव धौम्येन यथाविधि प्रभो । क्रमेण सर्वे विविशुस्ततः सदो महर्षभा गोष्ठमिवाभिनन्दिनः ॥ १० ॥

तब अग्निके समान तेजस्वी अपने पुरोहित धौम्यजीके साथ विधिपूर्वक बड़े -छोटेके क्रमसे वे सभी प्रसन्नतापूर्वक विवाहमण्डपमें गये – ठीक उसी तरह, जैसे बड़े -बड़े साँड गोशालामें प्रवेश करें ॥ १० ॥

ततः समाधाय स वेदपारगो

जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम् ।

युधिष्ठिरं चाप्युपनीय मन्त्रवि- न्नियोजयामास सहैव कृष्णया ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् वेदके पारंगत विद्वान् मन्त्रज्ञ पुरोहित धौम्यने ( वेदीपर ) प्रज्वलित अग्निकी स्थापना करके उसमें मन्त्रोंद्वारा आहुति दी और युधिष्ठिरको बुलाकर कृष्णाके साथ उनका गँठबन्धन कर दिया ॥ ११ ॥

प्रदक्षिणं तौ प्रगृहीतपाणी समानयामास स वेदपारगः । ततोऽभ्यनुज्ञाय तमाजिशोभिनं पुरोहितो राजगृहाद् विनिर्ययौ ॥ १२ ॥

वेदोंके परिपूर्ण विद्वान् पुरोहितने उन दोनों दम्पतिका पाणिग्रहण कराकर उनसे अग्निकी परिक्रमा करवायी, फिर ( अन्य शास्त्रोक्त विधियोंका अनुष्ठान करके ) उनका विवाहकार्य सम्पन्न कर दिया । इसके बाद संग्राममें शोभा पानेवाले युधिष्ठिरको छुट्टी देकर पुरोहितजी भी उस राजभवन से बाहर चले गये ॥ १२ ॥

क्रमेण चानेन नराधिपात्मजा वरस्त्रियस्ते जगृहुस्तदा करम् ।

पृष्ठ 1382

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1382 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अहन्यहन्युत्तमरूपधारिणो महारथाः कौरववंशवर्धनाः ॥ १३ ॥

इसी क्रमसे कौरव- कुलकी वृद्धि करनेवाले, उत्तम शोभा धारण करनेवाले महारथी राजकुमार पाण्डवोंने एक-एक दिन परम सुन्दरी द्रौपदीका पाणिग्रहण किया ॥ १३ ॥

इदं च तत्राद्भूतरूपमुत्तमं जगाद देवर्षिरतीतमानुषम् । महानुभावा किल सा सुमध्यमा बभूव कन्यैव गते गतेऽहनि ॥ १४ ॥

देवर्षिने वहाँ घटित हुई इस अद्भुत, उत्तम एवं अलौकिक घटनाका वर्णन किया है कि सुन्दरकटिप्रदेशवाली महानुभावा द्रौपदी प्रतिवार विवाहके दूसरे दिन कन्याभावको ही प्राप्त हो जाती थी ॥ १४ ॥

कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ महारथेभ्यो बहुरूपमुत्तमम् । शतं रथानां वरहेममालिनां चतुर्युजां हेमखलीनमालिनाम् ॥ १५ ॥

विवाह- कार्य सम्पन्न हो जानेपर द्रुपदने महारथी पाण्डवोंको दहेज में बहुत-सा धन और नाना प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ समर्पित कीं । सुन्दर सुवर्णकी मालाओं और सुवर्णजटित जुओंसे सुशोभित सौ रथ प्रदान किये, जिनमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे ॥ १५ ॥

शतं गजानामपि पद्मिनां तथा शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् । तथैव दासीशतमग्र्ययौवनं महार्हवेषाभरणाम्बरस्रजम् ॥ १६ ॥

पद्म आदि उत्तम लक्षणोंसे युक्त सौ हाथी तथा पर्वतोंके समान ऊँचे और सुनहरे हौदोंसे सुशोभित सौ हाथी और ( साथ ही ) बहुमूल्य शृंगार सामग्री, वस्त्राभूषण एवं हार धारण करनेवाली एक सौ नवयौवना दासियाँ भी भेंट कीं ॥ १६ ॥

पृथक् पृथग् दिव्यदृशां पुनर्ददौ तदा धनं सौमकिरग्निसाक्षिकम् । तथैव वस्त्राणि विभूषणानि प्रभावयुक्तानि महानुभावः ॥ १७ ॥

सोमकवंशमें उत्पन्न महानुभाव राजा द्रुपदने इस प्रकार अग्निको साक्षी बनाकर प्रत्येक सुन्दर दृष्टिवाले पाण्डवोंके लिये अलग- अलग प्रचुर धन तथा प्रभुत्व - सूचक बहुमूल्य वस्त्र औरआभूषण अर्पित किये ॥ १७ ॥

कृते विवाहे च ततस्तु पाण्डवाः

पृष्ठ 1383

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1383 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रभूतरत्नामुपलभ्य तां श्रियम् । विजहुरिन्द्रप्रतिमा महाबलाः पुरे तु पाञ्चालनृपस्य तस्य ह ॥ १८ ॥

विवाहके पश्चात् इन्द्रके समान महाबली पाण्डव प्रचुर रत्नराशिके साथ लक्ष्मीस्वरूपा द्रौपदीको पाकर पांचालराज द्रुपदके ही नगरमें सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥ १८ ॥

( सर्वेऽप्यतुष्यन् नृप पाण्डवेया- स्तस्याः शुभैः शीलसमाधिवृत्तैः । सा चाप्येषा याज्ञसेनी तदानीं विवर्धयामास मुदं स्वसुव्रतैः ॥ ) राजन्! सभी पाण्डव द्रौपदीकी सुशीलता, एकाग्रता और सद्व्यवहारसे बहुत संतुष्ट थे ( और द्रौपदीको भी संतुष्ट रखनेका प्रयत्न करते थे ) । इसी प्रकार द्रुपदकुमारी कृष्णा भी उस समय अपने उत्तम नियमोंद्वारा पाण्डवोंका आनन्द बढ़ाती थी । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्रौपदीविवाहे सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें द्रौपदीविवाहविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १ ९ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1384

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1384 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना वैशम्पायन उवाच

पाण्डवैः सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह ।

न बभूव भयं किंचिद् देवेभ्योऽपि कथंचन ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डवोंसे सम्बन्ध हो जानेपर राजा द्रुपदको देवताओंसे भी किसी प्रकारका कुछ भी भय नहीं रहा, फिर मनुष्योंसे तो हो ही कैसे सकता था ॥ १ ॥

कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः ।

नाम संकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादौ स्वमूर्धभिः ॥ २ ॥

महात्मा द्रुपदके कुटुम्बकी स्त्रियाँ कुन्तीके पास आकर अपने नाम ले - लेकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करने लगीं ॥ २ ॥

कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला ।

कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥

कृष्णा भी रेशमी साड़ी पहने मांगलिक कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् सासके चरणोंमें प्रणाम करके उनके सामने हाथ जोड़ विनीतभावसे खड़ी हुई ॥ ३ ॥

रूपलक्षणसम्पन्नां शीलाचारसमन्विताम् ।

द्रौपदीमवदत् प्रेम्णा पृथाऽऽशीर्वचनं स्नुषाम् ॥ ४ ॥

सुन्दर रूप तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, शील और सदाचारसे सुशोभित अपनी बहू द्रौपदीको सामने देख कुन्तीदेवी उसे प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देती हुई बोलीं- ॥ ४ ॥

यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ ।

रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले ॥ ५ ॥

यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती ।

यथा नारायणो लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु ॥ ६ ॥

‘ बेटी! जैसे इन्द्राणी इन्द्रमें, स्वाहा अग्निमें, रोहिणी चन्द्रमामें, दमयन्ती नलमें, भद्रा कुबेरमें, अरुन्धती वसिष्ठमें तथा लक्ष्मी भगवान् नारायणमें भक्ति- भाव एवं प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने पतियोंमें अनुरक्त रहो ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 1385

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1385 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जीवसूर्वीरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता ।

सुभगा भोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता ॥ ७ ॥

‘ भद्रे! तुम अनन्त सौख्यसे सम्पन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीर पुत्रोंकी जननी बनो । सौभाग्यशालिनी, भोगसामग्रीसे सम्पन्न, पतिके साथ यज्ञमें बैठनेवाली तथा पतिव्रता होओ ॥ ७ ॥

अतिथीनागतान् साधून् वृद्धान् बालांस्तथा गुरून् ।

पूजयन्त्या यथान्यायं शश्वद् गच्छन्तु ते समाः ॥ ८ ॥

‘ अपने घरपर आये हुए अतिथियों, साधु पुरुषों, बड़े- बूढ़ों, बालकों तथा गुरुजनोंका यथायोग्य सत्कार करनेमें ही तुम्हारा प्रत्येक वर्ष बीते ॥ ८ ॥

कुरुजाङ्गलमुख्येषु राष्ट्रेषु नगरेषु च ।

अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपतिं धर्मवत्सला ॥ ९ ॥

' तुम्हारे पति कुरुजांगल देशके प्रधान- प्रधान राष्ट्रों तथा नगरोंके राजा हों और उनके साथ ही रानीके पदपर तुम्हारा अभिषेक हो । धर्मके प्रति तुम्हारे हृदयमें स्वाभाविक स्नेह हो ॥ ९ ॥

पतिभिर्निर्जितामुर्वी विक्रमेण महाबलैः ।

कुरु ब्राह्मणसात् सर्वामश्वमेधे महाक्रतौ ॥ १० ॥

' तुम्हारे महाबली पतियोंद्वारा पराक्रमसे जीती हुई इस समूची पृथ्वीको तुम अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंके हवाले कर दो ॥ १० ॥

पृष्ठ 1386

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1386 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुणान्विते ।

तान्याप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतम् ॥ ११ ॥

' कल्याणमयी गुणवती बहू! पृथ्वीपर जितने गुणवान् रत्न हैं, वे सब तुम्हें प्राप्त हों और तुम सौ वर्षतक सुखी रहो ॥ ११ ॥

यथा च त्वाभिनन्दामि वध्वद्य क्षौमसंवृताम् ।

तथा भूयोऽभिनन्दिष्ये जातपुत्रां गुणान्विताम् ॥ १२ ॥

' बहू! आज तुम्हें वैवाहिक रेशमी वस्त्रोंसे सुशोभित देखकर जिस प्रकार मैं तुम्हारा अभिनन्दन करती हूँ, उसी प्रकार जब तुम पुत्रवती होओगी, उस समय भी अभिनन्दन करूँगी; तुम सद्गुणसम्पन्न हो ' ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः ।

वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च ॥ १३ ॥

वासांसि च महार्हाणि नानादेश्यानि माधवः ।

कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च ॥ १४ ॥

शयनासनयानानि विविधानि महान्ति च ।

वैदूर्यवज्रचित्राणि शतशो भाजनानि च ॥ १५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर विवाह हो जानेपर पाण्डवोंके लिये भगवान् श्रीकृष्णने वैदूर्यमणि- जटित सोनेके बहुत- से आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र, अनेक देशोंके बने हुए कोमल स्पर्शवाले कम्बल, मृगचर्म, सुन्दर रत्न, शय्याएँ, आसन, भाँति-भाँतिके बड़े - बड़े वाहन तथा वैदूर्य और वज्रमणि ( हीरे ) - से खचित सैकड़ों बर्तन भेंटके तौरपर भेजे ॥ १३–१५ ॥

रूपयौवनदाक्षिण्यैरुपेताश्च स्वलंकृताः ।

प्रेष्याः सम्प्रददौ कृष्णो नानादेश्याः स्वलंकृताः ॥ १६ ॥

रूप- यौवन और चातुर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत अनेक देशोंकी सजी - धजी बहुत सी सुन्दरी सेविकाएँ भी समर्पित कीं ॥ १६ ॥

गजान् विनीतान् भद्रांश्च सदश्वांश्च स्वलंकृतान् ।

रथांश्च दान्तान् सौवर्णैः शुभैः पट्टैरलंकृतान् ॥ १७ ॥

कोटिशश्च सुवर्णं च तेषामकृतकं तथा ।

वीथीकृतममेयात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः ॥ १८ ॥

इसके सिवा अमेयात्मा मधुसूदनने सुशिक्षित और वशमें रहनेवाले अच्छी जातिके हाथी, गहनोंसे सजे हुए उत्तम घोड़े, चमकते हुए सोनेके पत्रोंसे सुशोभित और सधे हुए

पृष्ठ 1387

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1387 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

घोड़ोंसे युक्त बहुत - से सुन्दर रथ, करोड़ों स्वर्णमुद्राएँ तथा पंक्तिमें रखी हुई सुवर्णकी ढेरियाँ उनके लिये भेजीं ॥ १७-१८ ॥

तत् सर्वं प्रतिजग्राह धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

मुदा परमया युक्तो गोविन्दप्रियकाम्यया ॥ १ ९ ॥

धर्मराज युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वह सारा उपहार ग्रहण कर लिया ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९८ ॥ PPP

पृष्ठ 1388

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1388 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( विदुरागमनराज्यलम्भपर्व ) नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञां चरैराप्तैः प्रवृत्तिरुपनीयत ।

पाण्डवैरुपसम्पन्ना द्रौपदी पतिभिः शुभा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर सब राजाओंको अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यह यथार्थ समाचार मिल गया कि शुभलक्षणा द्रौपदीका विवाह पाँचों पाण्डवोंके साथ हुआ है ॥ १ ॥

येन तद् धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना ।

सोऽर्जुनो जयतां श्रेष्ठो महाबाणधनुर्धरः ॥ २ ॥

जिन महात्मा पुरुषने वह धनुष लेकर लक्ष्यको वेधा था, वे विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ तथा महान् धनुष - बाण धारण करनेवाले स्वयं अर्जुन थे ॥ २ ॥

यः शल्यं मद्रराजं वै प्रोत्क्षिप्यापातयद् बली ।

त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षेण पुरुषान् रणे ॥ ३ ॥

न चास्य सम्भ्रमः कश्चिदासीत् तत्र महात्मनः ।

स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः ॥ ४ ॥

जिस बलवान् वीरने अत्यन्त कुपित हो मद्रराज शल्यको उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया था और हाथमें वृक्ष ले रणभूमिमें समस्त योद्धाओंको भयभीत कर डाला था तथा जिस महातेजस्वी शूरवीरको उस समय तनिक भी घबराहट नहीं हुई थी, वह शत्रुसेनाके हाथी, घोड़े आदि अंगोंको मार गिरानेवाला तथा स्पर्शमात्रसे भय उत्पन्न करनेवाला महाबली भीमसेन था ॥ ३-४ ॥

ब्रह्मरूपधराञ्छ्रुत्वा प्रशान्तान् पाण्डुनन्दनान् ।

कौन्तेयान् मनुजेन्द्राणां विस्मयः समजायत ॥ ५ ॥

ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रशान्तभावसे बैठे हुए वे वीर पुरुष कुन्तीपुत्र पाण्डव ही थे, यह सुनकर वहाँ आये हुए राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५ ॥

सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता ।

पृष्ठ 1389

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1389 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः ॥ ६ ॥

उन्होंने पहले सुन रखा था कि कुन्ती अपने पुत्रोंसहित लाक्षागृहमें जल गयी । अब उन्हें जीवित सुनकर वे राजालोग यह मानने लगे कि इन पाण्डवोंका फिर नया जन्म- सा हुआ ॥ ६ ॥

धिगकुर्वस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् ।

कर्मणातिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै ॥ ७ ॥

पुरोचनके किये हुए अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मका स्मरण हो आनेसे उस समय सभी नरेश कुरुवंशी धृतराष्ट्र तथा भीष्मको धिक्कारने लगे ॥ ७ ॥

( धार्मिकान् वृत्तसम्पन्नान् मातुः प्रियहिते रतान् ।

यदा तानीदृशान् पार्थानुत्सादयितुमिच्छति ॥

‘ देखो न; धर्मात्मा, सदाचारी तथा माताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले कुन्तीकुमारोंको भी यह धृतराष्ट्र नष्ट करना चाहता है ( भला, इससे बढ़कर निन्दनीय कौन होगा ) । '

ततः स्वयंवरे वृत्ते धार्तराष्ट्राः स्म भारत ।

मन्त्रयन्ते ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिताः ॥

जनमेजय! उधर स्वयंवर समाप्त होनेपर धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जिन्हें कर्ण और शकुनिने बिगाड़ रखा था, इस प्रकार सलाह करने लगे । शकुनिरुवाच

कश्चिच्छत्रुः कर्शनीयः पीडनीयस्तथापरः ।

उत्सादनीयाः कौन्तेयाः सर्वे क्षत्रस्य मे मताः ॥

शकुनि बोला – संसारमें कोई शत्रु तो ऐसा होता है, जिसे सब प्रकारसे दुर्बल कर देना उचित है; दूसरा ऐसा होता है, जिसे सदा पीड़ा दी जाय । परंतु कुन्तीके ये सभी पुत्र तो समस्त क्षत्रियोंके लिये समूल नष्ट कर देनेयोग्य हैं । इनके विषयमें मेरा यही मत है ।

एवं पराजिताः सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ ।

अकृत्वा संविदं कांचित् तद् वस्तप्स्यत्यसंशयम् ॥

यदि इस प्रकार पराजित होकर आप सब लोग इन ( पाण्डवोंके विनाशकी ) युक्ति निश्चित किये बिना ही चले जायँगे, तो अवश्य ही यह भूल आपलोगोंको सदा संतप्त करती रहेगी ।

अयं देशश्च कालश्च पाण्डवोद्धरणाय नः ।

न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ॥

पाण्डवोंको जड़मूलसहित विनष्ट करनेके लिये हमारे सामने यही उपयुक्त देश और काल उपस्थित है । यदि आपलोग ऐसा नहीं करेंगे तो संसारमें उपहासके पात्र होंगे ।

पृष्ठ 1390

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1390 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् ।

सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम ॥

ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रुपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है ।

यावदेतान् न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः ।

चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान् ॥

जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बात से अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये ।

एकीभावं गता राज्ञा द्रुपदेन महात्मना ।

दुराधर्षतरा राजन् भविष्यन्ति न संशयः ॥

राजन्! जब ये महात्मा राजा द्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ।

यावदत्वरतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः ।

तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति ॥

जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये ।

मुक्ता जतुगृहाद् भीमाद् आशीविषमुखादिव ।

पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत् ॥

विषधर सर्पके मुख- सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं । यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है ।

तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम् ।

अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ॥

यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो जायँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढोंके बीचमें ठहरना ।

हलधृक्प्रगृहीतानि बलानि बलिनां स्वयम् ।

यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ॥

तावत् सर्वाभिसारेण पुरमेतद् विनाश्यताम् ।

एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभाः ॥

जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान् योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग