श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1401–1410

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1401–1410

पृष्ठ 1401

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ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत् ।

अस्मान् बलवतो ज्ञात्वा न यतिष्यन्ति दुर्बलाः ॥ १४ ॥

भीमसेनके बिना अपनी बहुत बड़ी दुर्बलताका अनुभव करके वे दुर्बल पाण्डव हमें अपनेसे बलवान् जानकर राज्य लेनेका प्रयत्न नहीं करेंगे ॥ १४ ॥

इहागतेषु वा तेषु निदेशवशवर्तिषु ।

प्रवर्तिष्यामहे राजन् यथाशास्त्रं निबर्हणम् ॥ १५ ॥

राजन्! अथवा यदि वे यहाँ आकर हमारी आज्ञाके अधीन होकर रहेंगे, तब हम नीतिशास्त्रके अनुसार उनके विनाशके कार्यमें लग जायँगे ॥ १५ ॥

अथवा दर्शनीयाभिः प्रमदाभिर्विलोभ्यताम् ।

एकैकस्तत्र कौन्तेयस्ततः कृष्णा विरज्यताम् ॥ १६ ॥

अथवा देखनेमें सुन्दर युवती स्त्रियोंद्वारा एक-एक पाण्डवको लुभाया जाय और इस प्रकार कृष्णाका मन उनकी ओरसे फेर दिया जाय ॥ १६ ॥

प्रेष्यतां चैव राधेयस्तेषामागमनाय वै ।

तैस्तैः प्रकारैः संनीय पात्यन्तामाप्तकारिभिः ॥ १७ ॥

अथवा पाण्डवोंको यहाँ बुला लानेके लिये राधानन्दन कर्णको भेजा जाय और यहाँ लाकर विश्वसनीय कार्यकर्ताओंद्वारा विभिन्न उपायोंसे उन सबको मार गिराया जाय ॥ १७ ॥

एतेषामप्युपायानां यस्ते निर्दोषवान् मतः ।

तस्य प्रयोगमातिष्ठ पुरा कालोऽतिवर्तते ॥ १८ ॥

यावद्धयकृतविश्वासा द्रुपदे पार्थिवर्षभे ।

तावदेव हि ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम् ॥ १ ९ ॥

पिताजी! इन उपायोंमेंसे जो भी आपको निर्दोष जान पड़े, उसीसे पहले काम लीजिये; क्योंकि समय बीता जा रहा है । जबतक वे राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदपर उनका पूरा विश्वास नहीं जम जाता, तभीतक उन्हें मारा जा सकता है । पूरा विश्वास जम जानेपर तो उन्हें मारना असम्भव हो जायगा ॥ १८-१९ ॥

एषा मम मतिस्तात निग्रहाय प्रवर्तते ।

साध्वी वा यदि वासाध्वी किं वा राधेय मन्यसे ॥ २० ॥

पिताजी! शत्रुओंको वशमें करनेके लिये ये ही उपाय मेरी बुद्धिमें आते हैं; मेरा यह

विचार भला है या बुरा, यह आप जानें । अथवा कर्ण! तुम्हारी क्या राय है? ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि दुर्योधनवाक्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥

पृष्ठ 1402

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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भप दुर्योधनवाक्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २०० ॥

पृष्ठ 1403

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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंको पराक्रमसे दबानेके लिये कर्णकी सम्मति कर्णउवाच

दुर्योधन तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।

न ह्युपायेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुवर्धन ॥ १ ॥

कर्णने कहा— दुर्योधन! मेरे विचारसे तुम्हारी यह सलाह ठीक नहीं है । कुरुवर्धन! ऐसे किसी भी उपायसे पाण्डवोंको वशमें नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥

पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मैरुपायैर्यतितास्त्वया ।

निग्रहीतुं तदा वीर न चैव शकितास्त्वया ॥ २ ॥

इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव ।

अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव बाधितुम् ॥ ३ ॥

वीर! पहले भी तुमने अनेक गुप्त उपायोंद्वारा पाण्डवोंको दबानेकी चेष्टा की है, परंतु उनपर तुम्हारा वश नहीं चल सका । भूपाल! वे जब बच्चे थे और यहीं तुम्हारे पास रहते थे, उस समय उनके पक्षमें कोई नहीं था, तब भी तुम उन्हें बाधा पहुँचानेमें सफल न हो सके ॥ २-३ ॥

जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते ।

नोपायसाध्याः कौन्तेया ममैषा मतिरच्युत ॥ ४ ॥

अब तो वे विदेशमें हैं, उनके पक्षमें बहुत से लोग हो गये हैं और सब प्रकारसे उनकी बढ़ती हो गयी है । अतः अब वे कुन्तीकुमार तुम्हारे बताये हुए उपायोंद्वारा वशमें आनेवाले नहीं हैं । पुरुषार्थसे कभी च्युत न होनेवाले वीर! मेरा तो यही विचार है ॥ ४ ॥

न च ते व्यसनैर्योक्तुं शक्या दिष्टकृतेन च ।

शकिताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम् ॥ ५ ॥

अब वे संकटमें नहीं डाले जा सकते । भाग्यने उन्हें शक्तिशाली बना दिया है और उनमें अपने बाप-दादोंके राज्यको प्राप्त करनेकी अभिलाषा जाग उठी है ॥ ५ ॥

परस्परेण भेदश्च नाधातुं तेषु शक्यते ।

एकस्यां ये रताः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम् ॥ ६ ॥

उनमें आपसमें भी फूट डालना सम्भव नहीं है । जो (एकराय होकर) एक ही पत्नीमें अनुरक्त हैं, उनमें परस्पर विरोध नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदयितुं परः ।

परिद्यूनान् वृतवती किमुताद्य मृजावतः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1404

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कृष्णाको भी उनकी ओरसे फूट डालकर विलग करना असम्भव है; क्योंकि जब पाण्डवलोग भिक्षाभोजी होनेके कारण दीन - हीन थे, उस अवस्थामें कृष्णाने उनका वरण किया है; अब तो वे सम्पत्तिशाली होकर स्वच्छ एवं सुन्दर वेषमें रहते हैं, अब वह क्यों उनकी ओरसे विरक्त होगी? ॥ ७ ॥

ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता ।

तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदयितुं क्षमा ॥ ८ ॥

प्रायः स्त्रियोंका यह अभीष्ट गुण है कि एक स्त्रीमें अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेकी रुचि हो । पाण्डवोंके साथ रहनेमें कृष्णाको यह लाभ स्वतः प्राप्त है; अतः उसके मनमें भेद नहीं उत्पन्न किया जा सकता ॥ ८ ॥

आर्यव्रतश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रियः ।

न संत्यक्ष्यति कौन्तेयान् राज्यदानैरपि ध्रुवम् ॥ ९ ॥

पांचालराज द्रुपद श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले हैं । वे धनके लोभी नहीं हैं । अतः तुम अपना सारा राज्य दे दो, तो भी यह निश्चय है कि वे कुन्ती- पुत्रोंका परित्याग नहीं करेंगे ॥ ९ ॥

यथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् ।

तस्मान्नोपायसाध्यांस्तानहं मन्ये कथंचन ॥ १० ॥

इसी प्रकार उनका पुत्र धृष्टद्युम्न भी गुणवान् तथा पाण्डवोंका प्रेमी है । अतः मैं उन्हें पूर्वोक्त उपायोंसे वशमें करनेयोग्य कदापि नहीं मान सकता ॥ १० ॥

इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ ।

यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशाम्पते ॥ ११ ॥

तावत् प्रहरणीयास्ते तत् तुभ्यं तात रोचताम् ।

अस्मत्पक्षो महान् यावद् यावत् पाञ्चालको लघुः ।

तावत् प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय ॥ १२ ॥

‘ राजन्! इस समय हमारे लिये एक ही उपाय काममें लानेयोग्य है; वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव जबतक अपनी जड़ नहीं जमा लेते, तभीतक उनपर प्रहार करना चाहिये । इसीसे वे काबूमें आ सकते हैं । ' तात! मैं समझता हूँ, तुम्हें भी यह राय पसंद होगी । जबतक हमारा पक्ष बढ़ा - चढ़ा है और जबतक पांचालराजका बल हमसे कम है, तभीतक उनपर आक्रमण कर दिया जाय । इसमें दूसरा कुछ विचार न करो ॥ ११-१२ ॥

वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि च कुलानि च ।

यावन्न तेषां गान्धारे तावद् विक्रम पार्थिव ॥ १३ ॥

राजन्! गान्धारीनन्दन! जबतक पाण्डवोंके पास बहुत- से वाहन, मित्र और कुटुम्बी नहीं हो जाते, तभीतक तुम उनके ऊपर पराक्रम कर लो ॥ १३ ॥

यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः ।

पृष्ठ 1405

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सह पुत्रैर्महावीर्यैस्तावद् विक्रम पार्थिव ॥ १४ ॥

पृथ्वीपते! जबतक पांचालनरेश अपने महा -पराक्रमी पुत्रोंके साथ हमारे ऊपर चढ़ाई करनेका विचार नहीं कर रहे हैं, तभीतक तुम अपना बल- विक्रम प्रकट कर लो ॥ १४ ॥

यावन्नायाति वार्ष्णेयः कर्षन् यादववाहिनीम् ।

राज्यार्थे पाण्डवेयानां पाञ्चाल्यसदनं प्रति ॥ १५ ॥

इसके लिये तुम्हें तभीतक अवसर है, जबतक कि वृष्णिकुलनन्दन श्रीकृष्ण यदुवंशियोंकी सेना साथ लिये पाण्डवोंको राज्य दिलानेके उद्देश्यसे पांचालराजके घरपर नहीं आ जाते ॥ १५ ॥

वसूनि विविधान् भोगान् राज्यमेव च केवलम् ।

नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे कथंचन ॥ १६ ॥

पाण्डवोंके लिये श्रीकृष्णकी ओरसे धन - रत्न, भाँति- भाँतिके भोग तथा सारा राज्य— कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १६ ॥

विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना ।

विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान् पाकशासनः ॥ १७ ॥

महात्मा भरतने पराक्रमसे ही यह पृथ्वी प्राप्त की । इन्द्रने पराक्रमसे ही तीनों लोकोंपर विजय पायी ॥ १७ ॥

विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रियस्य विशाम्पते ।

स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ॥ १८ ॥

राजन्! क्षत्रियके लिये पराक्रमकी ही प्रशंसा की जाती है । नृपश्रेष्ठ! पराक्रम करना ही शूरवीरोंका स्वधर्म है ॥ १८ ॥

ते बलेन वयं राजन् महता चतुरङ्गिणा ।

प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानयामेह पाण्डवान् ॥ १ ९ ॥

राजन्! हमलोग विशाल चतुरंगिणी सेनाके द्वारा राजा द्रुपदको कुचलकर शीघ्र ही यहाँ पाण्डवोंको कैद कर लायें ॥ १ ९ ॥

न हि साम्ना न दानेन न भेदेन च पाण्डवाः ।

शक्याः साधयितुं तस्माद् विक्रमेणैव ताञ्जहि ॥ २० ॥

न सामसे, न दानसे और न भेदकी नीतिसे पाण्डवोंको वशमें किया जा सकता है ।

अतः उन्हें पराक्रमसे ही नष्ट करो ॥ २० ॥

तान् विक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्षव मेदिनीम् ।

अतो नान्यं प्रपश्यामि कार्योपायं जनाधिप ॥ २१ ॥

पराक्रमसे पाण्डवोंको जीतकर इस सारी पृथ्वीका राज्य भोगो । नरेश्वर! इसके सिवा दूसरा कोई कार्यसिद्धिका उपाय मैं नहीं देखता ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 1406

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श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।

अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर प्रतापी धृतराष्ट्रने उसकी बड़ी सराहना की और तदनन्तर इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

उपपन्नं महाप्राज्ञे कृतास्त्रे सूतनन्दने ।

त्वयि विक्रमसम्पन्नमिदं वचनमीदृशम् ॥ २३ ॥

‘ कर्ण! तुम परम बुद्धिमान्, अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता और सूतकुलको आनन्दित करनेवाले हो । ऐसा पराक्रमयुक्त वचन तुम्हारे ही योग्य है ॥ २३ ॥

भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च ।

युवां च कुरुतं बुद्धिं भवेद् या नः सुखोदया ॥ २४ ॥

‘ परंतु मेरा विचार है कि भीष्म, द्रोण, विदुर और तुम दोनों एक साथ बैठकर पुनः विचार कर लो तथा कोई ऐसी बात सोच निकालो, जो भविष्यमें भी हमें सुख देनेवाली हो' ॥ २४ ॥

तत आनाय्य तान् सर्वान् मन्त्रिणः सुमहायशाः ।

धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा ॥ २५ ॥

महाराज! तदनन्तर महायशस्वी धृतराष्ट्रने भीष्म, द्रोण आदि सम्पूर्ण मन्त्रियोंको बुलवाकर उनके साथ उस समय विचार आरम्भ किया ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि धृतराष्ट्रमन्त्रणे एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें धृतराष्ट्रमन्त्रणासम्बन्धी दो सौ पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥

Fard

पृष्ठ 1407

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द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह भीष्म उवाच

न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन ।

यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम् ॥ १ ॥

भीष्मजी बोले- मुझे पाण्डवोंके साथ विरोध या युद्ध किसी प्रकार भी पसंद नहीं है ।

मेरे लिये जैसे धृतराष्ट्र हैं, वैसे ही पाण्डु– इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मम ।

यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र! जैसे गान्धारीके पुत्र मेरे अपने हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र भी हैं; इसीलिये जैसे मुझे पाण्डवोंकी रक्षा करनी चाहिये, वैसे तुम्हें भी ॥ २ ॥

यथा च मम राज्ञश्च तथा दुर्योधनस्य ते ।

तथा कुरूणां सर्वेषामन्येषामपि पार्थिव ॥ ३ ॥

भूपाल! मेरे और तुम्हारे लिये जैसे पाण्डवोंकी रक्षा आवश्यक है, वैसे ही दुर्योधन तथा अन्य समस्त कौरवोंको भी उनकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३ ॥

एवं गते विग्रहं तैर्न रोचे संधाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः । तेषामपीदं प्रपितामहानां राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ॥ ४ ॥

ऐसी दशामें मैं पाण्डवोंके साथ लड़ाई- झगड़ा पसंद नहीं करता । उन वीरोंके साथ संधि करके उन्हें आधा राज्य दे दिया जाय । ( दुर्योधनकी ही भाँति) उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके भी बाप - दादोंका यह राज्य है ॥ ४ ॥

दुर्योधन यथा राज्यं त्वमिदं तात पश्यसि ।

मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥

तात दुर्योधन! जैसे तुम इस राज्यको अपनी पैतृक सम्पत्तिके रूपमें देखते हो, उसी प्रकार पाण्डव भी देखते हैं ॥ ५ ॥

यदि राज्यं न ते प्राप्ताः पाण्डवेया यशस्विनः ।

कुत एव तवापीदं भारतस्यापि कस्यचित् ॥ ६ ॥

यदि यशस्वी पाण्डव इस राज्यको नहीं पा सकते तो तुम्हें अथवा भरतवंशके किसी अन्य पुरुषको भी वह कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ ६ ॥

अधर्मेण च राज्यं त्वं प्राप्तवान् भरतर्षभ ।

पृष्ठ 1408

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तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ॥ ७ ॥

भरतश्रेष्ठ! तुमने अधर्मपूर्वक इस राज्यको हथिया लिया है; परंतु मेरा विचार यह है कि तुमसे पहले ही वे भी इस राज्यको पा चुके थे ॥ ७ ॥

मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम् ।

एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ॥ ८ ॥

पुरुषसिंह! प्रेमपूर्वक ही उन्हें आधा राज्य दे दो । इसीमें सब लोगोंका हित है ॥ ८ ॥

अतोऽन्यथा चेत् क्रियते न हितं नो भविष्यति ।

तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥

यदि इसके विपरीत कुछ किया जायगा तो हमारी भलाई नहीं हो सकती और तुम्हें भी पूरा - पूरा अपयश मिलेगा — इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम् ।

नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ॥ १० ॥

अतः अपनी कीर्तिकी रक्षा करो, कीर्ति ही श्रेष्ठ बल है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, उस मनुष्यका जीवन निष्फल माना गया है ॥ १० ॥

यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव ।

तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति ॥ ११ ॥

गन्धारीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यकी कीर्ति जबतक नष्ट नहीं होती, तभीतक वह जीवित है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसका तो जीवन ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥

तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् ।

अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ॥ १२ ॥

महाबाहो! कुरुकुलके लिये उचित इस उत्तम धर्मका पालन करो । अपने पूर्वजोंके अनुरूप कार्य करते रहो ॥ १२ ॥

दिष्टया ध्रियन्ते पार्था हि दिष्टया जीवति सा पृथा ।

दिष्टया पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः ॥ १३ ॥

सौभाग्यकी बात है कि कुन्तीके पुत्र जीवित हैं; यह भी सौभाग्यकी ही बात है कि कुन्ती भी मरी नहीं है और सबसे बड़े सौभाग्यका विषय यह है कि पापी पुरोचन अपने ( बुरे ) इरादेमें सफल न होकर स्वयं नष्ट हो गया ॥ १३ ॥

यदा प्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः ।

तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥ १४ ॥

लोके प्राणभृतां कंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् ।

न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत् पुरोचनम् ।

यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1409

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गान्धारीकुमार! जबसे मैंने सुना कि कुन्तीके पुत्र लाक्षागृहकी आगमें जल गये तथा कुन्ती भी उसी अवस्थाको प्राप्त हुई है, तभीसे मैं ( लज्जाके मारे ) जगत्के किसी भी प्राणीकी ओर आँख उठाकर देख नहीं सकता था । नरश्रेष्ठ! लोग इस कार्यके लिये पुरोचनको उतना दोषी नहीं मानते, जितना तुम्हें दोषी समझते हैं ॥ १४-१५ ॥

तदिदं जीवितं तेषां तव किल्बिषनाशनम् ।

सम्मन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥

अतः महाराज! पाण्डवोंका यह जीवित रहना और उनका दर्शन होना वास्तवमें तुम्हारे ऊपर लगे हुए कलंकका नाश करनेवाला है, ऐसा मानना चाहिये ॥ १६ ॥

न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन ।

पित्र्योंऽशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥ १७ ॥

कुरुनन्दन! पाण्डववीरोंके जीते - जी उनका पैतृक अंश साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी नहीं ले सकते ॥ १७ ॥

ते सर्वेऽवस्थिता धर्मे सर्वे चैवैकचेतसः ।

अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ॥ १८ ॥

वे सब धर्ममें स्थित हैं; उन सबका एक चित्त -एक विचार है । इस राज्यपर तुम्हारा और उनका समान स्वत्व है, तो भी उनके साथ विशेष अधर्मपूर्ण बर्ताव करके उन्हें यहाँसे हटाया गया है ॥ १८ ॥

यदि धर्मस्त्वया कार्यों यदि कार्यं प्रियं च मे ।

क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्थं प्रदीयताम् ॥ १ ९ ॥

यदि तुम्हें धर्मके अनुकूल चलना है, यदि मेरा प्रिय करना है और यदि ( संसारमें ) भलाई करनी है, तो उन्हें आधा राज्य दे दो ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि भीष्मवाक्ये द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक दो सौ दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥

पृष्ठ 1410

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त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार द्रोणउवाच

मन्त्राय समुपानीतैर्धृतराष्ट्र हितैर्नृप ।

धर्म्यमर्थ्यं यशस्यं च वाच्यमित्यनुशुश्रुम ॥ १ ॥

द्रोणाचार्यने कहा- राजा धृतराष्ट्र! सलाह लेनेके लिये बुलाये हुए हितैषियोंको उचित है कि वे ऐसी बात कहें, जो धर्म, अर्थ और यशकी प्राप्ति करानेवाली हो- यह हम परम्परासे सुनते आये हैं ॥ १ ॥

ममाप्येषा मतिस्तात या भीष्मस्य महात्मनः ।

संविभज्यास्तु कौन्तेया धर्म एष सनातनः ॥ २ ॥

तात! मेरी भी वही सम्मति है, जो महात्मा भीष्मकी है । कुन्तीके पुत्रोंको आधा राज्य बाँट देना चाहिये, यही परम्परासे चला आनेवाला धर्म है ॥ २ ॥

प्रेष्यतां द्रुपदायाशु नरः कश्चित् प्रियंवदः ।

बहुलं रत्नमादाय तेषामर्थाय भारत ॥ ३ ॥

भारत! द्रुपदके पास शीघ्र ही कोई प्रिय वचन बोलनेवाला मनुष्य भेजा जाय और वह पाण्डवोंके लिये बहुत - से रत्नोंकी भेंट लेकर जाय ॥ ३ ॥

मिथः कृत्यं च तस्मै स आदाय वसु गच्छतु ।

वृद्धिं च परमां ब्रूयात् त्वत्संयोगोद्भवां तथा ॥ ४ ॥

सम्प्रीयमाणं त्वां ब्रूयाद राजन् दुर्योधनं तथा ।

असकृद् द्रुपदे चैव धृष्टद्युम्ने च भारत ॥ ५ ॥

राजा द्रुपदके पास बहूके लिये वरपक्षकी ओरसे उसे धन और रत्न लेकर जाना चाहिये । भारत! उस पुरुषको राजा द्रुपद और धृष्टद्युम्नके सामने बार-बार यह कहना चाहिये कि आपके साथ सम्बन्ध हो जानेसे राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधन अपना बड़ा अभ्युदय मान रहे हैं और उन्हें इस वैवाहिक सम्बन्धसे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ४-५ ॥

उचितत्वं प्रियत्वं च योगस्यापि च वर्णयेत् ।

पुनः पुनश्च कौन्तेयान् माद्रीपुत्रौ च सान्त्वयन् ॥ ६ ॥

इसी प्रकार वह कुन्ती और माद्रीके पुत्रोंको सान्त्वना देते हुए बार- बार इस सम्बन्धके उचित और प्रिय होनेकी चर्चा करे ॥ ६ ॥