श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1421–1430
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1421–1430
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ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ।
सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत ॥ ७ ॥
समुपादाय रत्नानि वसूनि विविधानि च ।
द्रौपद्याः पाण्डवानां च यज्ञसेनस्य चैव ह ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी द्रौपदी, पाण्डव तथा महाराज यज्ञसेनके लिये नाना प्रकारके धन - रत्नोंकी भेंट लेकर राजा द्रुपद और पाण्डवोंके समीप गये ॥ ७-८ ॥
तत्र गत्वा स धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ।
द्रुपदं न्यायतो राजन् संयुक्तमुपतस्थिवान् ॥ ९ ॥
राजन्! वहाँ पहुँचकर सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् एवं धर्मज्ञ विदुर न्यायके अनुसार बड़े-छोटेके क्रमसे द्रुपद और अन्य लोगोंके साथ हृदयसे लगकर नमस्कार आदिपूर्वक मिले ॥ ९ ॥
स चापि प्रतिजग्राह धर्मेण विदुरं ततः ।
चक्रतुश्च यथान्यायं कुशलप्रश्नसंविदम् ॥ १० ॥
राजा द्रुपदने भी धर्मके अनुसार विदुरजीका आदर-सत्कार किया । फिर वे दोनों यथोचित रीतिसे एक - दूसरेके कुशल- समाचार पूछने और कहने लगे ॥ १० ॥
ददर्श पाण्डवांस्तत्र वासुदेवं च भारत ।
स्नेहात् परिष्वज्य स तान् पप्रच्छानामयं ततः ॥ ११ ॥
भारत! विदुरजीने वहाँ पाण्डवों तथा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको भी देखा और स्नेहपूर्वक उन्हें हृदयसे लगाकर उन सबकी कुशल पूछी ॥ ११ ॥
तैश्चाप्यमितबुद्धिः स पूजितो हि यथाक्रमम् ।
वचनाद् धृतराष्ट्रस्य स्नेहयुक्तं पुनः पुनः ॥ १२ ॥
पप्रच्छानामयं राजंस्ततस्तान् पाण्डुनन्दनान् ।
प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च ॥ १३ ॥
पाण्डवानां च कुन्त्याश्च द्रौपद्याश्च विशाम्पते ।
द्रुपदस्य च पुत्राणां यथा दत्तानि कौरवैः ॥ १४ ॥
उन्होंने भी अमित - बुद्धिमान् विदुरजीका क्रमशः आदर- सत्कार किया । तदनन्तर विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अनुसार बारंबार स्नेहपूर्वक युधिष्ठिर आदि पाण्डुपुत्रोंसे कुशल - मंगल एवं स्वास्थ्यविषयक प्रश्न किया । जनमेजय! फिर विदुरजीने कौरवोंकी ओरसे जैसे दिये गये थे, उसीके अनुसार पाण्डवों, कुन्ती, द्रौपदी तथा द्रुपदके पुत्रोंके लिये नाना प्रकारके रत्न और धन भेंट किये ॥ १२–१४ ॥
प्रोवाच चामितमतिः प्रश्रितं विनयान्वितः ।
द्रुपदं पाण्डुपुत्राणां संनिधौ केशवस्य च ॥ १५ ॥
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अगाध बुद्धिवाले विदुरजी पाण्डवों तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप विनीतभावसे नम्रतापूर्वक बोले— ॥ १५ ॥
विदुर उवाच
राजञ्छृणु सहामात्यः सपुत्रश्च वचो मम ।
धृतराष्ट्रः सपुत्रस्त्वां सहामात्यः सबान्धवः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् कुशलं राजन् प्रीयमाणः पुनः पुनः ।
प्रीतिमांस्ते दृढं चापि सम्बन्धेन नराधिप ॥ १७ ॥
विदुरने कहा- राजन्! आप अपने मन्त्रियों और पुत्रोंके साथ मेरी बात सुनें । महाराज धृतराष्ट्रने अपने पुत्र, मन्त्री और बन्धुओंके साथ अत्यन्त प्रसन्न होकर बारंबार आपकी कुशल पूछी है । महाराज! आपके साथ यह जो सम्बन्ध हुआ है, इससे उनको बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १६-१७ ॥
तथा भीष्मः शांतनवः कौरवैः सह सर्वशः ।
कुशलं त्वां महाप्राज्ञः सर्वतः परिपृच्छति ॥ १८ ॥
इसी प्रकार शंतनुनन्दन महाप्राज्ञ भीष्मजी भी समस्त कौरवोंके साथ सब तरहसे आपकी कुशल पूछते हैं ॥ १८ ॥
भारद्वाजो महाप्राज्ञो द्रोणः प्रियसखस्तव ।
समाश्लेषमुपेत्य त्वां कुशलं परिपृच्छति ॥ १ ९ ॥
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आपके प्रिय मित्र महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य भी ( मन- ही- मन) आपको हृदयसे लगाकर कुशल पूछ रहे हैं ॥ १ ९ ॥
धृतराष्ट्रश्च पाञ्चाल्य त्वया सम्बन्धमीयिवान् ।
कृतार्थं मन्यतेऽऽत्मानं तथा सर्वेऽपि कौरवाः ॥ २० ॥
पांचालनरेश! राजा धृतराष्ट्र आपके सम्बन्धी होकर अपने - आपको कृतार्थ मानते हैं ।
यही दशा समस्त कौरवोंकी है ॥ २० ॥
न तथा राज्यसम्प्राप्तिस्तेषां प्रीतिकरी मता ।
यथा सम्बन्धकं प्राप्य यज्ञसेन त्वया सह ॥ २१ ॥
यज्ञसेन! उन्हें राज्यकी प्राप्ति भी उतनी प्रसन्नता देनेवाली नहीं जान पड़ी, जितनी प्रसन्नता आपके साथ सम्बन्धका सौभाग्य पाकर हुई है ॥ २१ ॥
एतद् विदित्वा तु भवान् प्रस्थापयतु पाण्डवान् ।
द्रष्टुं हि पाण्डुपुत्रांश्च त्वरन्ति कुरवो भृशम् ॥ २२ ॥
यह जानकर आप पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेज दें । समस्त कुरुवंशी पाण्डवोंको देखने और मिलनेके लिये अत्यन्त उतावले हो रहे हैं ॥ २२ ॥
विप्रोषिता दीर्घकालमेते चापि नरर्षभाः ।
उत्सुका नगरं द्रष्टुं भविष्यन्ति तथा पृथा ॥ २३ ॥
दीर्घकालसे ये परदेशमें रह रहे हैं, अतः नरश्रेष्ठ पाण्डव तथा कुन्ती- सभी लोग अपना नगर देखनेके लिये उत्सुक हो रहे होंगे ॥ २३ ॥
कृष्णामपि च पाञ्चालीं सर्वाः कुरुवरस्त्रियः ।
द्रष्टुकामाः प्रतीक्षन्ते पुरं च विषयाश्च नः ॥ २४ ॥
कौरवकुलकी सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ, हमारे हस्तिनापुर नगर तथा राष्ट्रके सभी लोग पांचालराजकुमारी कृष्णाको देखनेकी इच्छा रखकर उसके शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २४ ॥
स भवान् पाण्डुपुत्राणामाज्ञापयतु मा चिरम् ।
गमनं सहदाराणामेतदत्र मतं मम ॥ २५ ॥
अतः आप पत्नीसहित पाण्डवोंको हस्तिनापुर चलनेके लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये । इस विषयमें मेरी सम्मति यही है ॥ २५ ॥
निसृष्टेषु त्वया राजन् पाण्डवेषु महात्मसु ।
ततोऽहं प्रेषयिष्यामि धृतराष्ट्रस्य शीघ्रगान् ।
आगमिष्यन्ति कौन्तेयाः कुन्ती च सह कृष्णया ॥ २६ ॥
राजन्! जब आप महामना पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे देंगे, तब मैं यहाँसे राजा धृतराष्ट्रके पास शीघ्रगामी दूत भेजूँगा और यह संदेश कहला दूँगा कि कुन्ती तथा कृष्णाके साथ समस्त पाण्डव हस्तिनापुरमें आयेंगे ॥ २६ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरद्रुपदसंवादे पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें विदुर- द्रुपदसंवादविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २०५ ॥
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षडधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान द्रुपदउवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथाऽऽत्थ विदुराद्य माम् ।
ममापि परमो हर्षः सम्बन्धेऽस्मिन् कृते प्रभो ॥ १ ॥
द्रुपद बोले- महाप्राज्ञ विदुरजी! आज आपने जो कुछ मुझसे कहा है, सब ठीक है ।
प्रभो! ( कौरवोंके साथ ) यह सम्बन्ध हो जानेसे मुझे भी महान् हर्ष हुआ है ॥ १ ॥
गमनं चापि युक्तं स्याद् दृढमेषां महात्मनाम् ।
न तु तावन्मया युक्तमेतद् वक्तुं स्वयं गिरा ॥ २ ॥
यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ३ ॥
रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः ।
एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रियहिते रतौ ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंका अपने नगरमें जाना भी अत्यन्त उचित ही है । तथापि मेरे लिये अपने मुखसे इन्हें जानेके लिये कहना उचित नहीं है । यदि कुन्तीकुमार वीरवर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नरश्रेष्ठ नकुल सहदेव जाना उचित समझें तथा धर्मज्ञ बलराम और श्रीकृष्ण पाण्डवोंका वहाँ जाना उचित समझते हों तो ये अवश्य वहाँ जायँ; क्योंकि ये दोनों पुरुषसिंह सदा इनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं ॥ २–४ ॥ युधिष्ठिर उवाच
परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः ।
यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तत् करिष्यामहे वयम् ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने कहा — राजन्! हम सब लोग अपने सेवकोंसहित सदा आपके अधीन हैं ।
आप स्वयं प्रसन्नतापूर्वक हमसे जैसा कहेंगे, वही हम करेंगे ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो गमनं रोचते मम ।
यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ॥ ६ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कहा —'मुझे तो इनका जाना ही ठीक जान पड़ता है अथवा सब धर्मोंके ज्ञाता महाराज द्रुपद जैसा उचित समझें, वैसा किया जाय' ॥ ६ ॥
द्रुपदउवाच
यथैव मन्यते वीरो दाशार्हः पुरुषोत्तमः ।
प्राप्तकालं महाबाहुः सा बुद्धिर्निश्चिता मम ॥ ७ ॥
यथैव हि महाभागाः कौन्तेया मम साम्प्रतम् ।
तथैव वासुदेवस्य पाण्डुपुत्रा न संशयः ॥ ८ ॥
द्रुपद बोले – दशार्हकुलके रत्न वीरवर पुरुषोत्तम महाबाहु श्रीकृष्ण इस समय जो कर्तव्य उचित समझते हों, निश्चय ही मेरी भी वही सम्मति है । महाभाग कुन्तीपुत्र इस समय मेरे लिये जैसे अपने हैं, उसी प्रकार इन भगवान् वासुदेवके लिये भी समस्त पाण्डव उतने ही प्रिय एवं आत्मीय हैं - इसमें संशय नहीं है ॥ ७-८ ॥
न तद् ध्यायति कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।
यथैषां पुरुषव्याघ्रः श्रेयो ध्यायति केशवः ॥ ९ ॥
पुरुषोत्तम केशव जिस प्रकार इन पाण्डवोंके श्रेय ( अत्यन्त हित ) -का ध्यान रखते हैं, उतना ध्यान कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर भी नहीं रखते ॥ ९ ॥
(वैशम्पायन उवाच पृथायास्तु तथा वेश्म प्रविवेश महाद्युतिः ।
पादौ स्पृष्ट्वा पृथायास्तु शिरसा च महीं गतः ।
दृष्ट्वा तु देवरं कुन्ती शुशोच च मुहुर्मुहुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उसी प्रकार महातेजस्वी विदुर कुन्तीके भवनमें गये । वहाँ उन्होंने धरतीपर माथा टेककर उनके चरणोंमें प्रणाम किया । विदुरको आया देख कुन्ती बार- बार शोक करने लगी । कुन्त्युवाच
वैचित्रवीर्य ते पुत्राः कथंचिज्जीवितास्त्वया ।
त्वत्प्रसादाज्जतुगृहे त्राताः प्रत्यागतास्तव ॥
कूर्मश्चिन्तयते पुत्रान् यत्र वा तत्र वा गतान् ।
चिन्तया वर्धयेत् पुत्रान् यथा कुशलिनस्तथा ॥
तव पुत्रास्तु जीवन्ति त्वं त्राता भरतर्षभ ।
यथा परभृतः पुत्रानरिष्टा वर्धयेत् सदा ।
तथैव तव पुत्रास्तु मया तात सुरक्षिताः ॥
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दुःखास्तु बहवः प्राप्ता तथा प्राणान्तिका मया ।
अतः परं न जानामि कर्तव्यं ज्ञातुमर्हसि ॥
कुन्ती बोली - विदुरजी! आपके पुत्र पाण्डव किसी प्रकार आपके ही कृपाप्रसादसे जीवित हैं । लाक्षागृहमें आपने इन सबके प्राण बचाये हैं और अब यह पुनः आपके समीप जीते - जागते लौट आये हैं । कछुआ अपने पुत्रोंका, वे कहीं भी क्यों न हो, मनसे चिन्तन करता रहता है । इस चिन्तासे ही अपने पुत्रोंका वह पालन-पोषण एवं संवर्धन करता है । उसीके अनुसार जैसे वे सकुशल जीवित रहते हैं, वैसे ही आपके पुत्र पाण्डव ( आपकी ही मंगल- कामनासे) जी रहे हैं! भरतश्रेष्ठ! आप ही इनके रक्षक हैं । तात! जैसे कोयलके पुत्रोंका पालन - पोषण सदा कौएकी माता करती है, उसी प्रकार आपके पुत्रोंकी रक्षा मैंने की है । अबतक मैंने बहुत- से प्राणान्तक कष्ट उठाये हैं; इसके बाद मेरा क्या कर्तव्य है, यह मैं नहीं जानती । यह सब आप ही जानें! वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ता दुःखार्ता शुशोच परमातुरा ।
प्रणिपत्याब्रवीत् क्षत्ता मा शोच इति भारत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - यों कहकर दुःखसे पीड़ित हुई कुन्ती अत्यन्त आतुर होकर शोक करने लगी । उस समय विदुरने उन्हें प्रणाम करके कहा, तुम शोक न करो । विदुर उवाच न विनश्यन्ति लोकेषु तव पुत्रा महाबलाः । नचिरेणैव कालेन स्वराज्यस्था भवन्ति ते । बान्धवैः सहिताः सर्वैर्मा शोकं कुरु माधवि || ) विदुर बोले- यदुकुलनन्दिनी! तुम्हारे महाबली पुत्र संसारमें ( दूसरोंके सतानेसे ) नष्ट नहीं हो सकते । अब वे थोड़े ही दिनोंमें समस्त बन्धुओंके साथ अपने राज्यपर अधिकार करनेवाले हैं । अतः तुम शोक मत करो । वैशम्पायन उवाच
ततस्ते समनुज्ञाता द्रुपदेन महात्मना ।
पाण्डवाश्चैव कृष्णश्च विदुरश्च महीपते ॥ १० ॥
आदाय द्रौपदीं कृष्णां कुन्तीं चैव यशस्विनीम् ।
सविहारं सुखं जग्मुर्नगरं नागसाह्वयम् ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर महात्मा द्रुपदकी आज्ञा पाकर पाण्डव, श्रीकृष्ण और विदुर द्रुपद- कुमारी कृष्णा और यशस्विनी कुन्तीको साथ ले आमोद -प्रमोद करते हुए हस्तिनापुरकी ओर चले ॥ १०-११ ॥
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( सुवर्णकक्ष्याग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान् ।
जाम्बूनदपरिष्कारान् प्रभिन्नकरटामुखान् ॥
अधिष्ठितान् महामात्रैः सर्वशस्त्रसमन्वितान् ।
सहस्रं प्रददौ राजा गजानां वरवर्णिनाम् ॥
रथानां च सहस्रं वै सुवर्णमणिचित्रितम् ।
चतुर्युजां भानुमच्च पञ्चानां प्रददौ तदा ॥
सुवर्णपरिबर्हाणां वरचामरमालिनाम् ।
जात्यश्वानां च पञ्चाशत्सहस्रं प्रददौ नृपः ॥
दासीनामयुतं राजा प्रददौ वरभूषणम् ।
ततः सहस्रं दासानां प्रददौ वरधन्विनाम् ॥
हैमानि शय्यासन भाजनानि द्रव्याणि चान्यानि च गोधनानि । पृथक् पृथक् चैव ददौ स कोटिं पाञ्चालराजः परमप्रहृष्टः ॥
शिबिकानां शतं पूर्णं वाहान् पञ्चशतं नरान् ।
एवमेतानि पाञ्चालो कन्यार्थे प्रददौ धनम् ॥
हरणं चापि पाञ्चाल्या ज्ञातिदेयं तु सौमकिः ।
धृष्टद्युम्नो ययौ तत्र भगिनीं गृह्य भारत ॥
नानद्यमाने बहुभिस्तूर्यशब्दैः सहस्रशः ॥ ) उस समय राजा द्रुपदने उन्हें एक हजार सुन्दर हाथी प्रदान किये, जिनकी पीठोंपर सोनेके हौदे कसे हुए थे और गलेमें सोनेके आभूषण शोभा पा रहे थे । उनके अंकुश भी सोनेके ही थे । जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उन सबको सजाया गया था । उनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी । बड़े - बड़े महावत उन सबका संचालन करते थे । वे सभी गजराज सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न थे । राजाने पाँचों पाण्डवोंके लिये चार घोड़ोंसे जुते हुए एक हजार रथ दिये, जो सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करते थे और सब ओर अपनी प्रभा बिखेर रहे थे । इतना ही नहीं, राजाने अच्छी जाति पचास हजार घोड़े भी दिये, जो सुनहरे साज- बाजसे सुसज्जित और सुन्दर चँवर तथा मालाओंसे अलंकृत थे । इनके सिवा सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित दस हजार दासियाँ भी दीं । साथ ही उत्तम धनुष धारण करनेवाले एक हजार दास पाण्डवोंको भेंट किये । बहुत - सी शय्याएँ, आसन और पात्र भी दिये जो सब- के--सब सुवर्णके बने हुए थे । दूसरे - दूसरे द्रव्य और गोधन भी समर्पित किये । इन सबकी पृथक्- पृथक् संख्या एक -एक करोड़ थी । इस प्रकार पांचालराज द्रुपदने बड़े हर्ष और उल्लासके साथ पाण्डवोंको उपर्युक्त वस्तुएँ अर्पित कीं । सौ पालकियाँ और उनको ढोनेवाले पाँच सौ कहार दिये । इस प्रकार पांचालराजने
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अपनी कन्याके लिये ये सभी वस्तुएँ तथा बहुत - सा धन दहेज में दिया । जनमेजय! धृष्टद्युम्न स्वयं अपनी बहिनका हाथ पकड़कर सवारीपर बैठानेके लिये ले गये । उस समय सहस्रों प्रकारके बाजे एक साथ बज उठे ।
श्रुत्वा चाप्यागतान् वीरान् धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
प्रतिग्रहाय पाण्डूनां प्रेषयामास कौरवान् ॥ १२ ॥
राजा धृतराष्ट्रने पाण्डववीरोंका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये कौरवोंको भेजा ॥ १२ ॥
विकर्णं च महेष्वासं चित्रसेनं च भारत ।
द्रोणं च परमेष्वासं गौतमं कृपमेव च ॥ १३ ॥
भारत! विकर्ण, महान् धनुर्धर चित्रसेन, विशाल धनुषवाले द्रोणाचार्य, गौतमवंशी कृपाचार्य आदि भेजे गये थे ॥ १३ ॥
तैस्ते परिवृता वीराः शोभमाना महाबलाः ।
नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा ॥ १४ ॥
( पाण्डवानागताञ्छ्रुत्वा नागरास्तु कुतूहलात् ।
मण्डयाञ्चक्रिरे तत्र नगरं नागसाह्वयम् ॥
मुक्तपुष्पावकीर्णं तज्जलसिक्तं तु सर्वशः ।
धूपितं दिव्यधूपेन मण्डनैश्चापि संवृतम् ॥
पताकोच्छ्रितमाल्यं च पुरमप्रतिमं बभौ ॥
शङ्खभेरीनिनादैश्च नानावादित्रनिःस्वनैः । )
कौतूहलेन नगरं दीप्यमानमिवाभवत् ।
तत्र ते पुरुषव्याघ्राः शोकदुःखविनाशनाः ॥ १५ ॥
तत उच्चावचा वाचः पौरैः प्रियचिकीर्षुभिः ।
उदीरिता अशृण्वंस्ते पाण्डवा हृदयंगमाः ॥ १६ ॥
इन सबसे घिरे हुए शोभाशाली महाबली वीर पाण्डवोंने तब धीरे- धीरे हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया । पाण्डवोंका आगमन सुनकर नागरिकोंने कौतूहलवश हस्तिनापुर नगरको ( अच्छी तरहसे ) सजा रखा था । सड़कोंपर सब ओर फूल बिखेरे गये थे, जलका छिड़काव किया गया था, सारा नगर दिव्य धूपकी सुगन्धसे महँ- महँ कर रहा था और भाँति- भाँतिकी प्रसाधन सामग्रियोंसे सजाया गया था । पताकाएँ फहराती थीं और ऊँचे गृहोंमें पुष्पहार सुशोभित होते थे । शंख, भेरी तथा नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे वह अनुपम नगर बड़ी शोभा पा रहा था । उस समय कौतूहलवश सारा नगर देदीप्यमान -सा हो उठा । पुरुषसिंह पाण्डव प्रजाजनोंके शोक और दुःखका निवारण करनेवाले थे; अतः वहाँ उनका प्रिय करनेकी इच्छावाले पुरवासियोंद्वारा कही हुई भिन्न-भिन्न प्रकारकी हृदय-स्पर्शिनी बातें सुनायी पड़ीं— ॥ १४–१६ ॥
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अयं स पुरुषव्याघ्रः पुनरायाति धर्मवित् ।
यो नः स्वानिव दायादान् धर्मेण परिरक्षति ॥ १७ ॥
( पुरवासी कह रहे थे— ) ' ये ही वे नरश्रेष्ठ धर्मज्ञ युधिष्ठिर पुनः यहाँ पधार रहे हैं, जो धर्मपूर्वक अपने पुत्रोंकी भाँति हमलोगोंकी रक्षा करते थे ॥ १७ ॥
अद्य पाण्डुर्महाराजो वनादिव जनप्रियः ।
आगतः प्रियमस्माकं चिकीर्षुर्नात्र संशयः ॥ १८ ॥
इनके आनेसे निःसंदेह ऐसा जान पड़ता है, आज प्रजाजनोंके प्रिय महाराज पाण्डु ही मानो हमारा प्रिय करनेके लिये वनसे चले आये हों ॥ १८ ॥
किं नुनाद्य कृतं तात सर्वेषां नः परं प्रियम् ।
यन्नः कुन्तीसुता वीरा नगरं पुनरागताः ॥ १ ९ ॥
तात! कुन्तीके वीर पुत्र यदि पुनः इस नगरमें चले आये तो आज हम सब लोगोंका कौन - सा परम प्रिय कार्य नहीं सम्पन्न हो गया ॥ १ ९ ॥
यदि दत्तं यदि हुतं विद्यते यदि नस्तपः ।
तेन तिष्ठन्तु नगरे पाण्डवाः शरदां शतम् ॥ २० ॥
यदि हमने दान और होम किया है, यदि हमारी तपस्या शेष है तो उन सबके पुण्यसे ये पाण्डव सौ वर्षतक इसी नगरमें निवास करें ' ॥ २० ॥
ततस्ते धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य च महात्मनः ।
अन्येषां च तदर्हाणां चक्रुः पादाभिवन्दनम् ॥ २१ ॥
इतनेमें ही पाण्डवोंने धृतराष्ट्र, महात्मा भीष्म तथा अन्य वन्दनीय पुरुषोंके पास जाकर उन सबके चरणों में प्रणाम किया ॥ २१ ॥
कृत्वा तु कुशलप्रश्नं सर्वेण नगरेण च ।
न्यविशन्ताथ वेश्मानि धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ २२ ॥
फिर समस्त नगरवासियोंसे कुशलप्रश्न करके वे राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे राजमहलोंमें गये ॥ २२ ॥
( दुर्योधनस्य महिषी काशिराजसुता तदा ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां बधूभिः सहिता तदा ॥
पाञ्चालीं प्रतिजग्राह द्रौपदीं श्रीमिवापराम् ।
पूजयामास पूजार्हां शचीदेवीमिवागताम् ॥
ववन्दे तत्र गान्धारीं माधवी कृष्णया सह ।
आशिषश्च प्रयुक्त्वा तु पाञ्चालीं परिषस्वजे ॥
परिष्वज्य च गान्धारी कृष्णां कमललोचनाम् ।
पुत्राणां मम पाञ्चाली मृत्युरेवेत्यमन्यत ।
सा चिन्त्य विदुरं प्राह युक्तितः सुबलात्मजा ॥