श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1431–1440
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1431–1440
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उस समय दुर्योधनकी रानीने, जो काशिराजकी पुत्री थी, धृतराष्ट्रपुत्रोंकी अन्य वधुओंके साथ आकर द्वितीय लक्ष्मीके समान सुन्दरी पंचालराजकुमारी द्रौपदीकी अगवानी की । द्रौपदी सर्वथा पूजाके योग्य थी । उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् शचीदेवीने पदार्पण किया हो । दुर्योधन- पत्नीने उसका भलीभाँति सत्कार किया । वहाँ पहुँचकर कुन्तीने अपनी बहूरानी द्रौपदीके साथ गान्धारीको प्रणाम किया । गान्धारीने आशीर्वाद देकर द्रौपदीको हृदयसे लगा लिया । कमलसदृश नेत्रोंवाली कृष्णाको हृदयसे लगाकर गान्धारी सोचने लगी कि यह पाञ्चाली तो मेरे पुत्रोंकी मृत्यु ही है । यह सोचकर सुबलपुत्री गान्धारीने युक्तिसे विदुरको बुलाकर कहा— गान्धार्युवाच
कुन्तीं राजसुतां क्षत्तः सवधूं सपरिच्छदाम् ।
पाण्डोर्निवेशनं शीघ्रं नीयतां यदि रोचते ॥
करणेन मुहूर्तेन नक्षत्रेण शुभे तिथौ ।
यथासुखं तथा कुन्ती रंस्यते स्वगृहे सुतैः ॥
फिर गान्धारीने कहा- विदुर! यदि तुम्हें जँचे तो राजकुमारी कुन्तीको पुत्रवधूसहित शीघ्र ही पाण्डुके महलमें ले जाओ और वहीं इनका सारा सामान भी पहुँचा दो । उत्तम करण, मुहूर्त और नक्षत्रसहित शुभ तिथिको उस महलमें इन्हें प्रवेश करना चाहिये, जिससे कुन्तीदेवी अपने घरमें पुत्रोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें । वैशम्पायन उवाच तथेत्येव तदा क्षत्ता कारयामास तत्तदा ॥
पूजयामासुरत्यर्थं बान्धवाः पाण्डवांस्तदा ।
नागराः श्रेणिमुख्याश्च पूजयन्ति स्म पाण्डवान् ॥
भीष्मो द्रोणस्तथा कर्णो बाह्लीकः ससुतस्तदा ।
शासनाद् धृतराष्ट्रस्य अकुर्वन्नतिथिक्रियाम् ॥
एवं विहरतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् । नेता सर्वस्य कार्यस्य विदुरो राजशासनात् ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ' बहुत अच्छा' कहकर उसी समय विदुरने वैसी ही व्यवस्था की । सभी बन्धु बान्धवोंने पाण्डवोंका उस समय अत्यन्त आदर- सत्कार किया । प्रमुख नागरिकों तथा सेठोंने भी पाण्डवोंका पूजन किया । भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा पुत्रसहित बाह्लीकने धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंका आतिथ्य सत्कार किया । इस प्रकार हस्तिनापुरमें विहार करनेवाले महात्मा पाण्डवोंके सभी कार्योंमें विदुरजी ही नेता थे । उन्हें इसके लिये राजाकी ओरसे आदेश प्राप्त हुआ था । विश्रान्तास्ते महात्मानः कंचित् कालं महाबलाः ।
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आहूता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शांतनवेन च ॥ २३ ॥
कुछ कालतक विश्राम कर लेनेपर उन महाबली महात्मा पाण्डवोंको राजा धृतराष्ट्र तथा भीष्मजीने बुलाया ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
भ्रातृभिः सह कौन्तेय निबोध गदतो मम ।
( पाण्डुना वर्धितं राज्यं पाण्डुना पालितं जगत् ॥
शासनान्मम कौन्तेय मम भ्राता महाबलः ।
कृतवान् दुष्करं कर्म नित्यमेव विशाम्पते ।
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय शासनं कुरु मा चिरम् ॥
मम पुत्रा दुरात्मानो दर्पाहंकारसंयुताः ।
शासनं न करिष्यन्ति मम नित्यं युधिष्ठिर ॥
स्वकार्यनिरतैर्नित्यमवलिप्तैर्दुरात्मभिः । ) पुनर्वो विग्रहो मा भूत् खाण्डवप्रस्थमाविश ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्र बोले- कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अपने भाइयोंसहित ध्यान देकर सुनो । कुन्तीनन्दन! मेरी आज्ञासे पाण्डुने इस राज्यको बढ़ाया और पाण्डुने ही जगत्का पालन किया । मेरे भाई पाण्डु बड़े बलवान् थे । राजन्! मेरे कहनेसे सदा ही दुष्कर कार्य किया करते थे । कुन्तीकुमार! तुम भी यथासम्भव शीघ्र मेरी आज्ञाका पालन करो, विलम्ब न करो । मेरे दुरात्मा पुत्र दर्प और अहंकारसे भरे हुए हैं । युधिष्ठिर! वे सदा मेरी आज्ञाका पालन नहीं करेंगे । अपने स्वार्थसाधनमें लगे हुए उन बलाभिमानी दुरात्माओंके साथ तुम्हारा फिर कोई झगड़ा न खड़ा हो जाय, इसलिये तुम खाण्डवप्रस्थमें निवास करो ॥ २४ ॥
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न च वो वसतस्तत्र कश्चिच्छक्तः प्रबाधितुम् ।
संरक्ष्यमाणान् पार्थेन त्रिदशानिव वज्रिणा ॥ २५ ॥
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविश । वहाँ रहते समय कोई तुम्हें बाधा नहीं दे सकता; क्योंकि जैसे वज्रधारी इन्द्र देवताओंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीनन्दन अर्जुन वहाँ तुमलोगोंकी भलीभाँति रक्षा करेंगे । तुम आधा राज्य लेकर खाण्डवप्रस्थमें चलकर रहो ॥ २५३ ॥
(धृतराष्ट्रउवाच
अभिषेकस्य सम्भारान् क्षत्तरानय मा चिरम् ।
अभिषिक्तं करिष्यामि अद्य वै कुरुनन्दनम् ॥
ब्राह्मणा नैगमश्रेष्ठाः श्रेणीमुख्याश्च सर्वशः ।
आहूयन्तां प्रकृतयो बान्धवाश्च विशेषतः ॥
पुण्याहं वाच्यतां तात गोसहस्रं तु दीयताम् ।
ग्राममुख्याश्च विप्रेभ्यो दीयन्तां सहदक्षिणाः ॥
अङ्गदे मुकुटं क्षत्तः हस्ताभरणमानय ॥
मुक्तावलीश्च हारं च निष्कादीन् कुण्डलानि च ।
कटिबन्धश्च सूत्रं च तथोदरनिबन्धनम् ॥
अष्टोत्तरसहस्रं तु ब्राह्मणाधिष्ठिता गजाः ।
जाह्नवीसलिलं शीघ्रमानयन्तु पुरोहितैः ॥
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अभिषेकोदकक्लिन्नं सर्वाभरणभूषितम् ।
औपवाह्योपरिगतं दिव्यचामरवीजितम् ॥
सुवर्णमणिचित्रेण श्वेतच्छत्रेण शोभितम् ।
जयेति द्विजवाक्येन स्तूयमानं नृपैस्तथा ॥
दृष्ट्वा कुन्तीसुतं ज्येष्ठमाजमीढं युधिष्ठिरम् ।
प्रीताः प्रीतेन मनसा प्रशंसन्तु पुरे जनाः ॥
पाण्डोः कृतोपकारस्य राज्यं दत्त्वा ममैव च ।
प्रतिक्रियाकृतमिदं भविष्यति न संशयः ॥
(फिर ) धृतराष्ट्रने ( विदुरसे ) कहा - विदुर! तुम राज्याभिषेककी सामग्री लाओ, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये । मैं आज ही कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरका अभिषेक करूँगा । वेदवेत्ता विद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, नगरके सभी प्रमुख व्यापारी, प्रजावर्गके लोग और विशेषतः बन्धु - बान्धव बुलाये जायँ । तात! पुण्याहवाचन कराओ और ब्राह्मणोंको दक्षिणाके साथ एक सहस्र गौएँ तथा मुख्य मुख्य ग्राम दो । विदुर! दो भुजबंद, एक सुन्दर मुकुट तथा हाथके आभूषण मँगाओं । मोतीकी कई मालाएँ, हार, पदक, कुण्डल, करधनी, कटिसूत्र तथा उदरबन्ध भी ले आओ । एक हजार आठ हाथी मँगाओ, जिनपर ब्राह्मण सवार हों । पुरोहितोंके साथ जाकर वे हाथी शीघ्र गंगाजीका जल ले आयें । युधिष्ठिर अभिषेकके जलसे भीगे हों, समस्त आभूषणोंसे उन्हें विभूषित किया गया हो, वे राजाकी सवारीके योग्य गजराजपर बैठे हों, उनपर दिव्य चँवर ढुल रहे हों और उनके मस्तकके ऊपर सुवर्ण और मणियोंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाला श्वेत छत्र सुशोभित हो, ब्राह्मणोंद्वारा की हुई जय-जयकारके साथ बहुत -से नरेश उनकी स्तुति करते हों । इस प्रकार कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्र अजमीढकुलतिलक युधिष्ठिरका प्रसन्नमनसे दर्शन करके प्रसन्न हुए पुरवासीजन इनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करें । राजा पाण्डुने मुझे ही अपना राज्य देकर जो उपकार किया था, उसका बदला इसीसे पूर्ण होगा कि युधिष्ठिरका राज्याभिषेक कर दिया जाय; इसमें संशय नहीं है । वैशम्पायन उवाच भीष्म द्रोणः कृपः क्षत्ता साधु साध्वित्यभाषत । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह सुनकर भीष्म, द्रोण, कृप तथा विदुरने कहा ——बहुत अच्छा! बहुत अच्छा! ' श्रीवासुदेव उवाच
युक्तमेतन्महाराज कौरवाणां यशस्करम् ।
शीघ्रमद्यैव राजेन्द्र यथोक्तं कर्तुमर्हसि ॥
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( तब ) भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! आपका यह विचार सर्वथा उत्तम तथा कौरवोंका यश बढ़ानेवाला है । राजेन्द्र! आपने जैसा कहा है, उसे आज ही जितना शीघ्र सम्भाव हो सके, पूर्ण कर डालिये । वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा वार्ष्णेयस्त्वरयामास तं तदा ।
यथोक्तं धृतराष्ट्रस्य कारयामास कौरवः ॥
तस्मिन् क्षणे महाराज कृष्णद्वैपायनस्तदा ।
आगत्य कुरुभिः सर्वैः पूजितः स सुहृद्गणैः ॥
मूर्धावसिक्तैः सहितो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
कारयामास विधिवत् केशवानुमते तदा ॥
कृपो द्रोणश्च भीष्मश्च धौम्यश्च व्यासकेशवौ ।
बाह्लीकः सोमदत्तश्च चातुर्वेद्यपुरस्कृताः ॥
अभिषेकं तदा चक्रुर्भद्रपीठे सुसंयतम् ।
जित्वा तु पृथिवीं कृत्स्नां वशे कृत्वा नरर्षभान् ॥
राजसूयादिभिर्यज्ञैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
स्नात्वा ह्यवभृथस्नानं मोदतां बान्धवैः सह ॥
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे आशीर्भिरभिपूजयन् ।
मूर्धाभिषिक्तः कौरव्य सर्वाभरणभूषितः ॥
जयेति संस्तुतो राजा प्रददौ धनमक्षयम् ।
सर्वमूर्धावसिक्तैश्च पूजितः कुरुनन्दनः ॥
औपवाह्यमथारुह्य श्वेतच्छत्रेण शोभितः ।
राजानुगतो राजा महेन्द्र इव दैवतैः ॥
ततः प्रदक्षिणीकृत्य नगरं नागसाह्वयम् ।
प्रविवेश ततो राजा नागरैः पूजितो भृशम् ॥
मूर्धाभिषिक्तं कौन्तेयमभ्यनन्दन्त बान्धवाः ।
गान्धारिपुत्राः शोचन्तः सर्वे ते सह बान्धवैः ॥
ज्ञात्वा शोकं तु पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्नृपम् ।
समक्षं वासुदेवस्य कुरूणां च समक्षतः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें जल्दी करनेकी प्रेरणा दी । विदुरजीने धृतराष्ट्रके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिया । उसी समय, राजन्! वहाँ महर्षि कृष्णद्वैपायन पधारे । समस्त कौरवोंने अपने सुहृदोंके साथ आकर उनकी पूजा की । तब वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणों तथा मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके साथ मिलकर भगवान्
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श्रीकृष्णकी सम्मतिके अनुसार व्यासजीने विधिपूर्वक अभिषेक- कार्य सम्पन्न किया । कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्म, धौम्य, व्यास, श्रीकृष्ण, बाह्लीक और सोमदत्तने चारों वेदोंके विद्वानोंको आगे रखकर भद्रपीठपर संयमपूर्वक बैठे हुए युधिष्ठिरका उस समय अभिषेक किया और सबने यह आशीर्वाद दिया कि ' राजन्! तुम सारी पृथ्वीको जीतकर सम्पूर्ण नरेशोंको अपने अधीन करके प्रचुर दक्षिणासे युक्त राजसूय आदि यज्ञ- याग पूर्ण करनेके पश्चात् अवभृथ- स्नान करके बन्धु - बान्धवोंके साथ सुखी रहो । ' जनमेजय! यों कहकर उन सबने अपने आशीर्वादोंद्वारा युधिष्ठिरका सम्मान किया । समस्त आभूषणोंसे विभूषित, मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरने अक्षय धनका दान किया । उस समय सब लोगोंने जय-जयकारपूर्वक उनकी स्तुति की । समस्त मूर्धाभिषिक्त राजाओंने भी कुरुनन्दन युधिष्ठिरका पूजन किया । फिर वे राजोचित गजराजपर आरूढ़ हो श्वेत छत्रसे सुशोभित हुए । उनके पीछे - पीछे बहुत - से मनुष्य चल रहे थे । उस समय देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी । समस्त हस्तिनापुर नगरकी परिक्रमा करके राजाने पुनः राजधानीमें प्रवेश किया । उस समय नागरिकोंने उनका विशेष समादर किया । बन्धु - बान्धवोंने भी मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरका सादर अभिनन्दन किया । यह सब देखकर वे गान्धारीके दुर्योधन आदि सभी पुत्र अपने भाइयोंके साथ शोकातुर हो रहे थे । अपने पुत्रोंको शोक हुआ जानकर धृतराष्ट्रने भगवान् श्रीकृष्ण तथा कौरवोंके समक्ष राजा युधिष्ठिरसे ( इस प्रकार ) कहा । धृतराष्ट्रउवाच
अभिषेकं त्वया प्राप्तं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
गच्छ त्वमद्यैव नृप कृतकृत्योऽसि कौरव ॥
आयुः पुरूरवा राजन् नहुषश्च ययातिना ।
तत्रैव निवसन्ति स्म खाण्डवाह्वे नृपोत्तम ॥
राजधानी तु सर्वेषां पौरवाणां महाभुज ।
विनाशितं मुनिगणैर्लोभाद् बुधसुतस्य च ॥
तस्मात् त्वं खाण्डवप्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च कृतनिश्चयाः ॥
त्वद्भक्त्या जन्तवश्चान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम् ।
पुरं राष्ट्रं समृद्धं वै धनधान्यैः समावृतम् ॥
तस्माद् गच्छस्व कौन्तेय भ्रातृभिः सहितोऽनघ । ) धृतराष्ट्र बोले— कुरुनन्दन! तुमने वह राज्याभिषेक प्राप्त किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्लभ है । राजन्! तुम राज्य पाकर कृतार्थ हो गये । अतः आज ही खाण्डवप्रस्थ चले जाओ । नृपश्रेष्ठ! पुरूरवा, आयु, नहुष तथा ययाति खाण्डवप्रस्थमें ही
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निवास करते थे । महाबाहो! वहीं समस्त पौरव नरेशोंकी राजधानी थी । आगे चलकर मुनियोंने बुधपुत्रके लोभसे खाण्डवप्रस्थको नष्ट कर दिया था । इसलिये तुम खाण्डवप्रस्थ नगरको पुनः बसाओ और अपने राष्ट्रकी वृद्धि करो । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सबने तुम्हारे साथ वहाँ जानेका निश्चय किया है । तुममें भक्ति रखनेके कारण दूसरे लोग भी उस सुन्दर नगरका आश्रय लेंगे । निष्पाप कुन्तीकुमार! वह नगर तथा राष्ट्र समृद्धिशाली और धन- धान्यसे सम्पन्न है । अतः तुम भाइयोंसहित वहीं जाओ । वैशम्पायन उवाच प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च ॥ २६ ॥
प्रतस्थिरे ततो घोरं वनं तन्मनुजर्षभाः ।
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविशन् ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रकी बात मानकर पाण्डवोंने उन्हें प्रणाम किया और आधा राज्य पाकर वे खाण्डवप्रस्थकी ओर चल दिये, जो भयंकर वनके रूपमें था । धीरे - धीरे वे खाण्डवप्रस्थमें जा पहुँचे ॥ २६-२७ ॥
ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः ।
मण्डयांचक्रिरे तद् वै परं स्वर्गवदच्युताः ॥ २८ ॥
तदनन्तर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पाण्डवोंने श्रीकृष्णसहित वहाँ जाकर उस स्थानको उत्तम स्वर्गलोककी भाँति शोभायमान कर दिया ॥ २८ ॥
( वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम् ।
महेन्द्रश्चिन्तितो राजन् विश्वकर्माणमादिशत् ॥
फिर जगदीश्वर भगवान् वासुदेवने देवराज इन्द्रका चिन्तन किया । राजन्! उनके चिन्तन करनेपर इन्द्रदेवने ( उनके मनकी बात जानकर) विश्वकर्माको इस प्रकार आज्ञा दी । महेन्द्र उवाच
विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम् ।
इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति ॥
इन्द्र बोले — विश्वकर्मन्! महामते! ( आप जाकर खाण्डवप्रस्थ नगरका निर्माण करें । ) आजसे वह दिव्य और रमणीय नगर इन्द्रप्रस्थके नामसे विख्यात होगा । वैशम्पायन उवाच
महेन्द्रशासनाद् गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम् ।
प्रणम्य प्रणिपातर्हं किं करोमीत्यभाषत ॥
वासुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान् ।
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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महेन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माने खाण्डवप्रस्थमें जाकर वन्दनीय भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके कहा- मेरे लिये क्या आज्ञा है? उनकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा । वासुदेव उवाच कुरुष्व कुरुराजाय महेन्द्रपुरसंनिभम् । इन्द्रेण कृतनामानमिन्द्रप्रस्थं महापुरम् ॥ ) श्रीकृष्ण बोले- विश्वकर्मन्! तुम कुरुराज युधिष्ठिरके लिये महेन्द्रपुरीके समान एक महानगरका निर्माण करो। इन्द्रके निश्चय किये हुए नामके अनुसार वह इन्द्रप्रस्थ कहलायेगा |
ततः पुण्ये शिवे देशो शान्तिं कृत्वा महारथाः ।
नगरं मापयामासुर्दैपायनपुरोगमाः ॥ २ ९ ॥
तत्पश्चात् पवित्र एवं कल्याणमय प्रदेशमें शान्तिकर्म कराके महारथी पाण्डवोंने वेदव्यासजीको अगुआ बनाकर नगर बसानेके लिये जमीनका नाप करवाया ॥ २ ९ ॥
सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलंकृतम् ।
प्राकारेण च सम्पन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता ॥ ३० ॥
पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च ।
शुशुभे तत् पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥ ३१ ॥
उसके चारों ओर समुद्रकी भाँति विस्तृत एवं अगाध जलसे भरी हुई खाइयाँ बनी थीं, जो उस नगरकी शोभा बढ़ा रही थीं । श्वेत बादलों तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल चहारदीवारी शोभा दे रही थी, जो अपनी ऊँचाईसे आकाशमण्डलको व्याप्त करके खड़ी थी । जैसे नागोंसे भोगवती सुशोभित होती है, उसी प्रकार उस चहारदीवारीसे खाईसहित वह श्रेष्ठ नगर सुशोभित हो रहा था ॥ ३०-३१ ॥
द्विपक्षगरुडप्रख्यैद्वरिः सौधैश्च शोभितम् ।
गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमैः ॥ ३२ ॥
उस नगरके दरवाजे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दो पाँख फैलाये गरुड़ हों । ऐसे अनेक बड़े - बड़े फाटक और अट्टालिकाएँ उस नगरकी श्रीवृद्धि कर रही थीं । मेघोंकी घटाके समान सुशोभित तथा मन्दराचलके समान ऊँचे गोपुरोंद्वारा वह नगर सब ओरसे सुरक्षित था ॥ ३२ ॥
विविधैरपि निर्विद्धैः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः ।
शक्तिभिश्चावृतं तद्धि द्विजिह्वैरिव पन्नगैः ॥ ३३ ॥
नाना प्रकारके अभेद्य तथा सब ओरसे घिरे हुए शस्त्रागारोंमें शस्त्र संग्रह करके रखे गये थे । नगरके चारों ओर हाथसे चलायी जानेवाली लोहेकी शक्तियाँ तैयार करके रखी गयी थीं,
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जो दो जीभोंवाले साँपोंके समान जान पड़ती थीं । इन सबके द्वारा उस नगरकी सुरक्षा की गयी थी ॥ ३३ ॥
तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम् ।
तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् ॥ ३४ ॥
जिनमें अस्त्र- शस्त्रोंका अभ्यास किया जाता था, ऐसी अनेक अट्टालिकाओंसे युक्त और योद्धाओंसे सुरक्षित उस नगरकी शोभा देखते ही बनती थी । तीखे अंकुशों ( बर्छौं ), शतघ्नियों ( तोपों) और अन्यान्य युद्धसम्बन्धी यन्त्रोंके जालसे वह नगर शोभा पा रहा था ॥ ३४ ॥
आयसैश्च महाचक्रैः शुशुभे तत् पुरोत्तमम् ।
सुविभक्तमहारथ्यं देवताबाधवर्जितम् ॥ ३५ ॥
लोहेके बने हुए महान् चक्रोंद्वारा उस उत्तम नगरकी अवर्णनीय शोभा हो रही थी । वहाँ विभागपूर्वक विभिन्न स्थानोंमें जानेके लिये विशाल एवं चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं । उस नगरमें दैवी आपत्तिका नाम नहीं था ॥ ३५ ॥
विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैर्भवनोत्तमैः ।
तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥ ३६ ॥
अनेक प्रकारके श्रेष्ठ एवं शुभ्र सदनोंसे शोभित वह नगर स्वर्गलोकके समान प्रकाशित हो रहा था । उसका नाम था इन्द्रप्रस्थ ॥ ३६ ॥
मेघवृन्दमिवाकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम् ।
तत्र रम्ये शिवे देशो कौरव्यस्य निवेशनम् ॥ ३७ ॥
इन्द्रप्रस्थके रमणीय एवं शुभ प्रदेशमें कुरुराज युधिष्ठिरका सुन्दर राजभवन बना हुआ था, जो आकाशमें विद्युत्की प्रभासे व्याप्त मेघमण्डलकी भाँति देदीप्यमान था ॥ ३७ ॥
शुशुभे धनसम्पूर्ण धनाध्यक्षक्षयोपमम् ।
तत्रागच्छन् द्विजा राजन् सर्ववेदविदां वराः ॥ ३८ ॥
निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा ।
वणिजश्चाययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः ॥ ३ ९ ॥
अनन्त धनराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह भवन धनाध्यक्ष कुबेरके निवासस्थानकी समानता करता था । राजन्! सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण उस नगरमें निवास करनेके लिये आये, जो सम्पूर्ण भाषाओंके जानकार थे । उन सबको वहाँका रहना बहुत पसंद आया । अनेक दिशाओंसे धनोपार्जनकी इच्छावाले वणिक् भी उस नगरमें आये ॥ ३८-३९ ॥
सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा ।
उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः ॥ ४० ॥
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सब प्रकारकी शिल्पकलाके जानकार मनुष्य भी उन दिनों इन्द्रप्रस्थमें निवास करनेके लिये आ गये थे । नगरके चारों ओर रमणीय उद्यान थे ॥ ४० ॥
आम्रैराम्रातकैर्नीपेरशोकैश्चम्पकैस्तथा ।
पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा ॥ ४१ ॥
शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः ।
मनोहरः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः ॥ ४२ ॥
जो आम, आमड़ा, कदम्ब, अशोक, चम्पा, पुन्नाग, नागपुष्प, लकुच, कटहल, साल, ताल, तमाल, मौलसिरी और केवड़ा आदि सुन्दर फूलोंसे भरे और फलोंके भारसे झुके हुए मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ ४१-४२ ॥
प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपुष्पितैः ।
जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः ॥ ४३ ॥
करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः ।
नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः ॥ ४४ ॥
प्राचीन आँवले, लोध्र, खिले हुए अंकोल, जामुन, पाटल, कुब्जक, अतिमुक्तक लता, करवीर, पारिजात तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्ष, जिनमें सदा फल और फूल लगे रहते थे और जिनके ऊपर भाँति- भाँतिके सहस्रों पक्षी कलरव करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥
मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदैः ।
गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः ॥ ४५ ॥
मतवाले मयूरोंके केकारव तथा सदा उन्मत्त रहनेवाली कोकिलोंकी काकली वहाँ गूँजती रहती थी । उन उद्यानोंमें दर्पणके समान स्वच्छ क्रीड़ाभवन तथा नाना प्रकारके लतामण्डप बनाये गये थे ॥ ४५ ॥
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथाजगतिपर्वतैः ।
वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा ॥ ४६ ॥
सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः ।
हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः ॥ ४७ ॥
मनोहर चित्रशालाओं तथा राजाओंकी विहारयात्राके लिये निर्मित हुए कृत्रिम पर्वतोंसे भी वे उद्यान बड़ी शोभा पा रहे थे । उत्तम जलसे भरी हुई अनेक प्रकारकी बावलियाँ तथा कमल और उत्पलकी सुगन्धसे वासित अत्यन्त रमणीय सरोवर जहाँ हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षी निवास करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४६-४७ ॥
रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः ।
तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च ॥ ४८ ॥