श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1441–1450

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450

पृष्ठ 1441

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वहाँ वनसे घिरी हुई भाँति- भाँतिकी रमणीय पुष्करिणियाँ और सुरम्य एवं विशाल बहुसंख्यक तड़ाग बड़े सुन्दर जान पड़ते थे ॥ ४८ ॥

( चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णं मान्यैः शिल्पिभिरावृतम् ।

उपयोगसमर्थैश्च सर्वद्रव्यैः समावृतम् ॥

नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम् ।

मत्तवारणसम्पूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः ॥

सर्वदाभिगतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा ।

तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥

पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा ।

पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

कृतमङ्गलसत्कारो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।

द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्यानुमते स्थितः ॥

भ्रातृभिः सहितो राजन् केशवेन सहाभिभूः ।

तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्द्वारसंयुतम् ॥

वर्धमानपुरद्वारं प्रविवेश महाद्युतिः ।

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम् ॥

जयेति ब्राह्मणगिरः श्रूयन्ते च सहस्रशः ।

संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधवन्दिभिः ॥

औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च ।

कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥

प्रविश्य भवनं राजा सत्कारैरभिपूजितः ।

पूजयामास विप्रेन्द्रान् केशवेन यथाक्रमम् ॥

ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम् । गोधनैश्च समाकीर्ण सस्यवृद्धिस्तदाभवत् ॥ ) वह नगर चारों वर्णोंके लोगोंसे ठसाठस भरा था । माननीय शिल्पी वहाँ निवास करते थे । वह पुरी उपभोगमें आनेवाली समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न थी । वहाँ सदा श्रेष्ठ पुरुष रहा करते थे । असंख्य नर- नारी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे । वहाँ मतवाले हाथी, ऊँट, गायें, बैल, गदहे और बकरे आदि पशु भी सदा मौजूद रहते थे । विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई उस पुरीमें सदा साधु- महात्माओंका समागम होता था । वह इन्द्रप्रस्थ नगर स्वर्गके समान शोभा पाता था । राजन्! कौरवराज महातेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा मंगल - कृत्य कराकर द्वैपायन व्यासको आगे करके धौम्य मुनिकी सम्मतिके अनुसार भाइयों तथा भगवान् श्रीकृष्णके साथ बत्तीस दरवाजोंसे युक्त तोरणद्वारके सामने आकर वर्धमान नामक नगरद्वारमें प्रवेश किया । उस समय शंख और नगारोंकी आवाज बड़े

पृष्ठ 1442

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जोर- जोरसे सुनायी देती थी । सहस्रों ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए जयघोषका श्रवण होता था। मुनि तथा सूत, मागध और बन्दीजन राजाकी स्तुति कर रहे थे । राजा युधिष्ठिर हाथीपर बैठे हुए थे । उन्होंने राजमार्गको पार करके एक उत्तम भवनमें प्रवेश किया, जहाँ मांगलिक कृत्य सम्पन्न किया गया था । उस भवनमें प्रवेश करके भाँति- भाँतिके सत्कारोंसे सम्मानित हो राजा युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रमशः सभी शेष ब्राह्मणोंका पूजन किया । तदनन्तर अगणित नर- नारियोंसे सुशोभित वह राष्ट्र और नगर गोधनसे सम्पन्न हो गया और दिनोंदिन खेतीकी वृद्धि होने लगी ।

तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत् ।

पाण्डवानां महाराज शश्वत् प्रीतिरवर्धत ॥ ४ ९ ॥

महाराज! पुण्यात्मा मनुष्योंसे भरे हुए उस महान् राष्ट्रमें प्रवेश करनेके बाद पाण्डवोंकी प्रसन्नता निरन्तर बढ़ती गयी ॥ ४ ९ ॥

तत्र भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयने कृते ।

पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः ॥ ५० ॥

भीष्म तथा राजा धृतराष्ट्रके द्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको आधा राज्य देकर वहाँसे विदा कर देनेपर समस्त पाण्डव खाण्डवप्रस्थके निवासी हो गये ॥ ५० ॥

पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समन्वितम् ।

शुशुभे तत् पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥ ५१ ॥

इन्द्रके समान शक्तिशाली और महान् धनुर्धर पाँचों पाण्डवोंके द्वारा वह श्रेष्ठ इन्द्रप्रस्थ नगर नागोंसे युक्त भोगवतीपुरीकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ५१ ॥

( ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च ।

द्वैपायनं च सम्पूज्य विसृज्य च नराधिप ।

वार्ष्णेयमब्रवीद् राजा गन्तुकामं कृतक्षणम् ॥

तदनन्तर विश्वकर्माका पूजन करके राजाने उन्हें विदा कर दिया । फिर व्यासजीको सम्मानपूर्वक विदा देकर राजा युधिष्ठिरने जानेके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्णसे कहा । युधिष्ठिर उवाच

तव प्रसादाद् वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयानघ ।

प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम् ॥

तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च महामते ।

गतिस्त्वमन्तकाले च पाण्डवानां तु माधव ॥

मातास्माकं पिता देवो न पाण्डुं विद्म वै वयम् ।

ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान् हि नः ।

यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयानघ ॥

पृष्ठ 1443

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युधिष्ठिर बोले- निष्पाप वृष्णिनन्दन! आपकी ही कृपासे मैंने राज्य प्राप्त किया है । वीर! आपके ही प्रसादसे यह अत्यन्त दुर्गम एवं निर्जन प्रदेश आज धन- धान्यसे सम्पन्न राष्ट्र बन गया । महामते! आपकी ही दयासे हमलोग राज्यसिंहासनपर आसीन हुए हैं । माधव! अन्तकालमें भी आप ही हम पाण्डवोंकी गति हैं । आप ही हमारे माता - पिता और इष्टदेव हैं । हम पाण्डुको नहीं जानते । अनघ! आप स्वयं समझकर जो करनेयोग्य कार्य हो, वह हमसे करायें । पाण्डवोंके लिये जो अभीष्ट हो, उसी कार्यको करनेके लिये आप हमें अनुमति दें । श्रीवासुदेव उवाच

त्वत्प्रभावान्महाभाग राज्यं प्राप्तं स्वधर्मतः ।

पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात् तव प्रभो ॥

धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान् ।

यथेष्टं पालय महीं सदा धर्मधुरं वह ॥

धर्मोपदेशं संक्षेपाद् ब्राह्मणान् भज कौरव ।

अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः ।

आदृत्य तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - महाभाग! आपको अपने ही प्रभावसे अपने ही धर्मके फलस्वरूप राज्य प्राप्त हुआ है । प्रभो! जो राज्य आपके बाप- दादोंका ही है, वह आपको कैसे नहीं मिलता । धृतराष्ट्रके पुत्र दुराचारी हैं । वे पाण्डवोंका क्या कर लेंगे? आप इच्छानुसार पृथ्वीका पालन कीजिये और सदा धर्ममर्यादाकी धुरी धारण करिये । कुरुनन्दन! संक्षेपमें आपके लिये धर्मका उपदेश इतना ही है कि ब्राह्मणोंकी सेवा करिये । आज ही बड़ी जल्दीमें आपके यहाँ श्रीनारदजी पधारेंगे, उनका आदर- सत्कार करके उनकी बातें सुनिये और उनकी आज्ञाका पालन कीजिये । वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः ।

उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोऽस्तु ते ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण कुन्तीदेवीके पास गये और उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणीमें बोले – ' बुआजी! नमस्कार । अब मैं जाऊँगा (आज्ञा दीजिये ) । ' कुन्त्युवाच

जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं च केशव ।

आर्येण चापि न ज्ञातं कुन्तिभोजेन चानघ ॥

त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम् ।

पृष्ठ 1444

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त्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः ॥

सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम ।

स्मरस्वैनान् महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः ॥

कुन्ती बोली- केशव! लाक्षागृहमें जाकर मैंने जो कष्ट भोगा है, उसे मेरे पूज्य पिता कुन्तिभोज भी नहीं जान सके हैं । गोविन्द! तुम्हारी सहायतासे ही मैं इस महान् दुःख-समुद्रसे पार हुई हूँ । प्रभो! तुम अनाथोंके, विशेषतः दीन- दुःखियोंके नाथ ( रक्षक ) हो । तुम्हारे दर्शनसे हमारे सारे दुःख दूर हो जाते हैं । महामते! इन पाण्डवोंको सदा याद रखना । ये तुम्हारे शुभ चिन्तनसे ही जीवन धारण करते हैं । वैशम्पायन उवाच करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम् । गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीसे यह कहकर कि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा, प्रणाम करके, विदा ले सेवकोंसहित वहाँसे जानेका विचार किया ।

तां निवेश्य ततो वीरो रामेण सह केशवः ।

ययौ द्वारवतीं राजन् पाण्डवानुमते तदा ॥ ५२ ॥

राजन्! इस प्रकार उस पुरीको बसाकर बलरामजीके साथ वीरवर श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी अनुमति ले उस समय द्वारकापुरीको चले गये ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि पुरनिर्माणे षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें नगरनिर्माणविषयक दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९९ श्लोक मिलाकर कुल १५१ श्लोक हैं ) Fard

पृष्ठ 1445

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सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना जनमेजय उवाच

एवं सम्प्राप्य राज्यं तदिन्द्रप्रस्थं तपोधन ।

अत ऊर्ध्वं महात्मानः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा-तपोधन! इस प्रकार इन्द्रप्रस्थका राज्य प्राप्त कर लेनेके पश्चात् महात्मा पाण्डवोंने कौन- सा कार्य किया? ॥ १ ॥

सर्व एव महासत्त्वा मम पूर्वपितामहाः ।

द्रौपदी धर्मपत्नी च कथं तानन्ववर्तत ॥ २ ॥

मेरे पूर्वपितामह सभी पाण्डव महान् सत्त्व ( मनोबल ) से सम्पन्न थे । उनकी धर्मपत्नी द्रौपदीने किस प्रकार उन सबका अनुसरण किया? ॥ २ ॥

कथं च पञ्च कृष्णायामेकस्यां ते नराधिपाः ।

वर्तमाना महाभागा नाभिद्यन्त परस्परम् ॥ ३ ॥

वे महान् सौभाग्यशाली नरेश जब एक ही कृष्णाके प्रति अनुरक्त थे, तब उनमें आपसमें फूट कैसे नहीं हुई? ॥ ३ ॥

श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं विस्तरेण तपोधन ।

तेषां चेष्टितमन्योन्यं युक्तानां कृष्णया सह ॥ ४ ॥

तपोधन! द्रौपदीसे सम्बन्ध रखनेवाले उन पाण्डवोंका आपसमें कैसा बर्ताव था, यह सब मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञाताः कृष्णया सह पाण्डवाः ।

रेमिरे खाण्डवप्रस्थे प्राप्तराज्याः परंतपाः ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! धृतराष्ट्रकी आज्ञासे राज्य पाकर परंतप पाण्डव द्रौपदीके साथ खाण्डव- प्रस्थमें विहार करने लगे ॥ ५ ॥

प्राप्य राज्यं महातेजाः सत्यसंधो युधिष्ठिरः ।

पालयामास धर्मेण पृथिवीं भ्रातृभिः सह ॥ ६ ॥

सत्यप्रतिज्ञ महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर उस राज्यको पाकर अपने भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1446

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जितारयो महाप्रज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः ।

मुदं परमिकां प्राप्तास्तत्रोषुः पाण्डुनन्दनाः ॥ ७ ॥

वे सभी शत्रुओंपर विजय पा चुके थे, सभी महाबुद्धिमान् थे । सबने सत्यधर्मका आश्रय ले रखा था । इस प्रकार वे पाण्डव वहाँ बड़े आनन्दके साथ रहते थे ॥ ७ ॥

कुर्वाणाः पौरकार्याणि सर्वाणि पुरुषर्षभाः ।

आसांचक्रुर्महार्हेषु पार्थिवेष्वासनेषु च ॥ ८ ॥

नरश्रेष्ठ पाण्डव नगरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य करते हुए बहुमूल्य तथा राजोचित सिंहासनोंपर बैठा करते थे ॥ ८ ॥

अथ तेषूपविष्टेषु सर्वेष्वेव महात्मसु ।

नारदस्त्वथ देवर्षिराजगाम यदृच्छया ॥ ९ ॥

एक दिन जब वे सभी महामना पाण्डव अपने सिंहासनोंपर विराजमान थे, उसी समय देवर्षि नारद अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे ॥ ९ ॥

(पथा नक्षत्रजुष्टेन सुपर्णचरितेन च ॥

चन्द्रसूर्यप्रकाशेन सेवितेन महर्षिभिः ।

नभःस्थलेन दिव्येन दुर्लभेनातपस्विनाम् ॥

उनका आगमन आकाशमार्गसे हुआ, जिसका नक्षत्र सेवन करते हैं, जिसपर गरुड़ चलते हैं, जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश फैलता है और जो महर्षियोंसे सेवित है । जो लोग तपस्वी नहीं हैं, उनके लिये व्योममण्डलका वह दिव्य मार्ग दुर्लभ है ।

भूतार्चितो भूतधरं राष्ट्रं नगरभूषितम् ।

अवेक्षमाणो द्युतिमानाजगाम महातपाः ॥

सर्ववेदान्तगो विप्रः सर्वविद्यासु पारगः ।

परेण तपसा युक्तो ब्राह्मेण तपसा वृतः ॥

नये नीतौ च निरतो विश्रुतश्च महामुनिः । सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा पूजित महान् तपस्वी एवं तेजस्वी देवर्षि नारद बड़े - बड़े नगरोंसे विभूषित और सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रयभूत राष्ट्रोंका अवलोकन करते हुए वहाँ आये । विप्रवर नारद सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रके ज्ञाता तथा समस्त विद्याओंके पारंगत पण्डित हैं । वे परमतपस्वी तथा ब्राह्मतेजसे सम्पन्न हैं; न्यायोचित बर्ताव तथा नीतिमें निरन्तर निरत

रहनेवाले सुविख्यात महामुनि हैं ।

परात् परतरं प्राप्तो धर्मात् समभिजग्मिवान् ॥

भावितात्मा गतरजाः शान्तो मृदुर्ऋजुर्द्विजः ।

धर्मेणाधिगतः सर्वैर्देवदानवमानुषैः ॥

अक्षीणवृत्तधर्मश्च संसारभयवर्जितः ।

सर्वथा कृतमर्यादो वेदेषु विविधेषु च ॥

पृष्ठ 1447

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1447 का मूल पृष्ठ
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ऋक्सामयजुषां वेत्ता न्यायवृत्तान्तकोविदः ॥

ऋजुरारोहवाञ्छुक्लो भूयिष्ठपथिकोऽनघः ।

श्लक्ष्णया शिखयोपेतः सम्पन्नः परमत्विषा ॥

अवदाते च सूक्ष्मे च दिव्ये च रुचिरे शुभे ।

महेन्द्रदत्ते महती बिभ्रत् परमवाससी ॥

प्राप्य दुष्प्रापमन्येन ब्रह्मवर्चसमुत्तमम् ।

भवने भूमिपालस्य बृहस्पतिरिवाप्लुतः ॥

उन्होंने धर्म- बलसे परात्पर परमात्माका ज्ञान प्राप्त कर लिया है । वे शुद्धात्मा, रजोगुणरहित, शान्त, मृदु तथा सरल स्वभावके ब्राह्मण हैं । वे देवता, दानव और मनुष्य सबको धर्मतः प्राप्त होते हैं । उनका धर्म और सदाचार कभी खण्डित नहीं हुआ है । वे संसारभयसे सर्वथा रहित हैं । उन्होंने सब प्रकारसे विविध वैदिक धर्मोकी मर्यादा स्थापित की है । वे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदके विद्वान् हैं । न्यायशास्त्रके पारंगत पण्डित हैं । वे सीधे और ऊँचे कदके तथा शुक्ल वर्णके हैं। वे निष्पाप नारद अधिकांश समय यात्रामें व्यतीत करते हैं । उनके मस्तकपर सुन्दर शिखा शोभित है । वे उत्तम कान्तिसे प्रकाशित होते हैं । वे देवराज इन्द्रके दिये हुए दो बहुमूल्य वस्त्र धारण करते हैं । उनके वे दोनों वस्त्र उज्ज्वल, महीन, दिव्य, सुन्दर और शुभ हैं । दूसरोंके लिये दुर्लभ एवं उत्तम ब्रह्मतेजसे युक्त वे बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् नारदजी राजा युधिष्ठिरके महलमें उतरे ।

संहितायां च सर्वेषां स्थितस्योपस्थितस्य च ।

द्विपदस्य च धर्मस्य क्रमधर्मस्य पारगः ॥

गाथासामानुधर्मज्ञः साम्नां परमवल्गुनाम् ।

आत्मना सर्वमोक्षिभ्यः कृतिमान् कृत्यवित् तथा ॥

योक्ता धर्मे बहुविधे मनो मतिमतां वरः ।

विदितार्थः समश्चैव छेत्ता निगमसंशयान् ॥

अर्थनिर्वचने नित्यं संशयच्छिदसंशयः ।

प्रकृत्या धर्मकुशलो नानाधर्मविशारदः ॥

लोपेनागमधर्मेण संक्रमेण च वृत्तिषु ।

एकशब्दांश्च नानार्थानेकार्थांश्च पृथक्छुमतीन् ॥

पृथगर्थाभिधानांश्च प्रयोगाणामवेक्षिता ॥

संहिताशास्त्रमें सबके लिये स्थित और उपस्थित मानवधर्म तथा क्रमप्राप्त धर्मके वे पारगामी विद्वान् हैं । वे गाथा और साममन्त्रोंमें कहे हुए आनुषंगिक धर्मोंके भी ज्ञाता हैं तथा अत्यन्त मधुर सामगानके पण्डित हैं । मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले सब लोगोंके हितके लिये नारदजी स्वयं ही प्रयत्नशील रहते हैं । कब किसका क्या कर्तव्य है, इसका उन्हें पूर्ण ज्ञान है । वे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं और मनको नाना प्रकारके धर्ममें लगाये रखते हैं । उन्हें जानने

पृष्ठ 1448

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1448 का मूल पृष्ठ
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योग्य सभी अर्थोंका ज्ञान है । वे सबमें समभाव रखनेवाले हैं और वेदविषयक सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करनेवाले हैं । अर्थकी व्याख्याके समय सदा संशयोंका उच्छेद करते हैं । उनके हृदयमें संशयका लेश भी नहीं है । वे स्वभावतः धर्मनिपुण तथा नाना धर्मोंके विशेषज्ञ हैं । लोप, आगमधर्म तथा वृतिसंक्रमणके द्वारा प्रयोगमें आये हुए एक शब्दके अनेक अर्थोंको, पृथक् - पृथक् श्रवणगोचर होनेवाले अनेक शब्दोंके एक अर्थको तथा विभिन्न शब्दोंके भिन्न- भिन्न अर्थोंको वे पूर्णरूपसे देखते और समझते हैं ।

प्रमाणभूतो लोकस्य सर्वाधिकरणेषु च ।

सर्ववर्णविकारेषु नित्यं सकलपूजितः ॥

स्वरेऽस्वरे च विविधे वृत्तेषु विविधेषु च ।

समस्थानेषु सर्वेषु समाम्नायेषु धातुषु ॥

उद्देश्यानां समाख्याता सर्वमाख्यातमुद्दिशन् ।

अभिसंधिषु तत्त्वज्ञः पदान्यङ्गान्यनुस्मरन् ॥

कालधर्मेण निर्दिष्टं यथार्थं च विचारयन् ।

चिकीर्षितं च यो वेत्ता यथा लोकेन संवृतम् ॥

विभाषितं च समयं भाषितं हृदयङ्गमम् ।

आत्मने च परस्मै च स्वरसंस्कारयोगवान् ॥

एषां स्वराणां वेत्ता च बोद्धा च वचनस्वरान् ।

विज्ञाता चोक्तवाक्यानामेकतां बहुतां तथा ॥

बोद्धा हि परमार्थांश्च विविधांश्च व्यतिक्रमान् ।

अभेदतश्च बहुशो बहुशश्चापि भेदतः ॥

वचनानां च विविधानादेशांश्च समीक्षिता ।

नानार्थकुशलस्तत्र तद्धितेषु च सर्वशः ॥

परिभूषयिता वाचां वर्णतः स्वरतोऽर्थतः ।

प्रत्ययांश्च समाख्याता नियतं प्रतिधातुकम् ॥

पञ्च चाक्षरजातानि स्वरसंज्ञानि यानि च । ) सभी अधिकरणों और समस्त वर्णोंके विकारोंमें निर्णय देनेके निमित्त वे सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत हैं । सदा सब लोग उनकी पूजा करते हैं । नाना प्रकारके स्वर, व्यंजन, भाँति- भाँतिके छन्द, समान स्थानवाले सभी वर्ण, समाम्नाय तथा धातु— इन सबके उद्देश्योंकी नारदजी बहुत अच्छी व्याख्या करते हैं। सम्पूर्ण आख्यात प्रकरण ( धातुरूप तिङन्त आदि ) -का प्रतिपादन कर सकते हैं । सब प्रकारकी संधियोंके सम्पूर्ण रहस्योंको जानते हैं । पदों और अंगोंका निरन्तर स्मरण रखते हैं, काल- धर्मसे निर्दिष्ट यथार्थ तत्त्वका विचार करनेवाले हैं तथा वे लोगोंके छिपे हुए मनोभावको- वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी अच्छी तरह जानते हैं । विभाषित ( वैकल्पिक ), भाषित (निश्चयपूर्वक कथित )

पृष्ठ 1449

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1449 का मूल पृष्ठ
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और हृदयंगम किये हुए समयका उन्हें यथार्थ ज्ञान है । वे अपने तथा दूसरेके लिये स्वरसंस्कार तथा योगसाधनमें तत्पर रहते हैं । वे इन प्रत्यक्ष चलनेवाले स्वरोंको भी जानते हैं, वचन-स्वरोंका भी ज्ञान रखते हैं, कही हुई बातोंके मर्मको जानते और उनकी एकता तथा अनेकताको समझते हैं । उन्हें परमार्थका यथार्थ ज्ञान है । वे नाना प्रकारके व्यतिक्रमों ( अपराधों ) को भी जानते हैं । अभेद और भेददृष्टिसे भी बारंबार तत्त्वविचार करते रहते हैं । वे शास्त्रीय वाक्योंके विविध आदेशोंकी भी समीक्षा करनेवाले तथा नाना प्रकारके अर्थज्ञानमें कुशल हैं, तद्धित प्रत्ययोंका उन्हें पूरा ज्ञान है । वे स्वर, वर्ण और अर्थ तीनोंसे ही वाणीको विभूषित करते हैं । प्रत्येक धातुके प्रत्ययोंका नियमपूर्वक प्रतिपादन करनेवाले हैं । पाँच प्रकारके जो अक्षरसमूह तथा स्वर हैं *, उनको भी वे यथार्थरूपसे जानते हैं । तमागतमृषिं दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।

आसनं रुचिरं तस्मै प्रददौ स्वं युधिष्ठिरः ।

देवर्षेरुपविष्टस्य स्वयमर्घ्यं यथाविधि ॥ १० ॥

प्रादाद् युधिष्ठिरो धीमान् राज्यं तस्मै न्यवेदयत् ।

प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिः प्रीतमनास्तदा ॥ ११ ॥

उन्हें आया देख राजा युधिष्ठिरने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और अपना परम सुन्दर आसन उन्हें बैठनेके लिये दिया । जब देवर्षि उसपर बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उन्हें अर्घ्य निवेदन किया और उसीके साथ - साथ उन्हें अपना राज्य समर्पित कर दिया। उनकी यह पूजा ग्रहण करके देवर्षि उस समय मन -ही - मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ १०-११ ॥

आशीर्भिर्वर्धयित्वा च तमुवाचास्यतामिति ।

निषसादाभ्यनुज्ञातस्ततो राजा युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥

कथयामास कृष्णायै भगवन्तमुपस्थितम् ।

श्रुत्वैतद् द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता ॥ १३ ॥

जगाम तत्र यत्रास्ते नारदः पाण्डवैः सह ।

तस्याभिवाद्य चरणौ देवर्षेर्धर्मचारिणी ॥ १४ ॥

कृताञ्जलिः सुसंवीता स्थिताथ द्रुपदात्मजा ।

तस्याश्चापि स धर्मात्मा सत्यवागृषिसत्तमः ॥ १५ ॥

आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः ।

गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम् ॥ १६ ॥

गतायामथ कृष्णायां युधिष्ठिरपुरोगमान् ।

विविक्ते पाण्डवान् सर्वानुवाच भगवानृषिः ॥ १७ ॥

फिर आशीर्वादसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करके बोले– ' तुम भी बैठो । ' नारदकी आज्ञा पाकर राजा युधिष्ठिर बैठे और कृष्णाको कहला दिया कि स्वयं

पृष्ठ 1450

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1450 का मूल पृष्ठ
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भगवान् नारदजी पधारे हैं । यह सुनकर द्रौपदी भी पवित्र एवं एकाग्रचित हो उसी स्थानपर गयी, जहाँ पाण्डवोंके साथ नारदजी विराजमान थे । धर्मका आचरण करनेवाली कृष्णा देवर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके अपने अंगोंको ढके हुए हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी । धर्मात्मा एवं सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदने राजकुमारी द्रौपदीको नाना प्रकारके आशीर्वाद देकर उस सती- साध्वी देवीसे कहा, ' अब तुम भीतर जाओ । ' कृष्णाके चले जानेपर भगवान् देवर्षिने एकान्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंसे कहा ॥ १२–१७ ॥ नारद उवाच

पाञ्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी ।

यथा वो नात्र भेदः स्यात् तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ १८ ॥

नारदजी बोले – पाण्डवो! यशस्विनी पांचाली तुम सब लोगोंकी एक ही धर्मपत्नी है; अतः तुमलोग ऐसी नीति बना लो, जिससे तुमलोगोंमें कभी परस्पर फूट न हो ॥ १८ ॥

सुन्दोपसुन्दौ हि पुरा भ्रातरौ सहितावुभौ ।

आस्तामवध्यावन्येषां त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ॥ १ ९ ॥

पहलेकी बात है, सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर भाई- भाई थे । वे सदा साथ रहते थे एवं दूसरेके लिये अवध्य थे ( केवल आपसमें ही लड़कर वे मर सकते थे ) । उनकी तीनों लोकोंमें बड़ी ख्याति थी ॥ १ ९ ॥

एकराज्यावेकगृहावेकशय्यासनाशनौ ।

तिलोत्तमायास्तौ हेतोरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २० ॥

उनका एक ही राज्य था और एक ही घर । वे एक ही शय्यापर सोते, एक ही आसनपर बैठते और एक साथ ही भोजन करते थे । इस प्रकार आपसमें अटूट प्रेम होनेपर भी तिलोत्तमा अप्सराके लिये लड़कर उन्होंने एक- दूसरेको मार डाला ॥ २० ॥