श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1601–1610

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1601–1610

पृष्ठ 1601

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( वे बोले— ) ‘ पाण्डुनन्दन! जब तुमपर भगवान् महादेव प्रसन्न होंगे, तब मैं तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र प्रदान करूँगा ॥ १० ॥

अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन ।

तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम् ॥ ११ ॥

आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः ।

मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनंजय ॥ १२ ॥

‘ कुरुनन्दन! वह समय कब आनेवाला है, इसे भी मैं जानता हूँ । तुम्हारे महान् तपसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें सम्पूर्ण आग्नेय तथा सब प्रकारके वायव्य अस्त्र प्रदान करूँगा । धनंजय! उसी समय तुम मेरे सम्पूर्ण अस्त्रोंको ग्रहण करोगे' ॥ ११-१२ ॥

वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् ।

ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते ॥ १३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने भी यह वर माँगा कि अर्जुनके साथ मेरा प्रेम निरन्तर बढ़ता रहे ।

इन्द्रने परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णको वह वर दे दिया ॥ १३ ॥

एवं दत्त्वा वर ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः ।

हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥ १४ ॥

इस प्रकार दोनोंको वर देकर अग्निदेवकी आज्ञा ले देवताओंसहित देवराज भगवान् इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये ॥ १४ ॥

पावकश्च तदा दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् ।

अहानि पञ्च चैकं च विरराम सुतर्पितः ॥ १५ ॥

अग्निदेव भी मृगों और पक्षियोंसहित सम्पूर्ण वनको जलाकर पूर्ण तृप्त हो छः दिनोंतक विश्राम करते रहे ॥ १५ ॥

जग्ध्वा मांसानि पीत्वा च मेदांसि रुधिराणि च ।

युक्तः परमया प्रीत्या तावुवाचाच्युतार्जुनौ ॥ १६ ॥

जीव- जन्तुओंके मांस खाकर उनके मेद तथा रक्त पीकर अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निने श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कहा— ॥ १६ ॥

युवाभ्यां पुरुषाग्रयाभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् ।

अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ॥ १७ ॥

‘ वीरो! आप दोनों पुरुषरत्नोंने मुझे आनन्दपूर्वक तृप्त कर दिया । अब मैं आपको अनुमति देता हूँ, जहाँ आपकी इच्छा हो, जाइये ' ॥ १७ ॥

एवं तौ समनुज्ञातौ पावकेन महात्मना ।

अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मयस्तथा ॥ १८ ॥

परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽपि भरतर्षभ ।

रमणीये नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ॥ १९ ॥

पृष्ठ 1602

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भरतश्रेष्ठ! महात्मा अग्निदेवके इस प्रकार आज्ञा देनेपर अर्जुन, श्रीकृष्ण तथा मयासुर सबने उनकी परिक्रमा की । फिर तीनों ही यमुनानदीके रमणीय तटपर जाकर एक साथ बैठे ॥ १८-१९ ॥ इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यामादिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि वरप्रदाने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्मित एक लाख श्लोकोंकी संहिताके अंतर्गत आदिपर्वके मयदर्शनपर्वमें इन्द्रवरदानविषयक दो सौ तैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥

(आदिपर्व सम्पूर्णम्) अनुष्टुप् छन्द ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके गद्योंको अनुष्टुप्छन्द कुल अनुष्टुप्के अनुसार गिननेपर बनाकर जोड़नेपर २८३ ८८ ९०उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक- ७८७०३ ( ५११३ ) ७३६३ २६ Xदक्षिणभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक- ७१०३ ( १८३ ) आदिपर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या- ९ ६२६३

पृष्ठ 1603

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमहाभारतम् सभापर्व | सभाक्रियापर्व प्रथमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा-नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ ।

प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! खाण्डवदाहके अनन्तर मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णके पास बैठे हुए अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा करके हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें उनसे कहा ॥ २ ॥

पृष्ठ 1604

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मय उवाच

अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षतः ।

त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३ ॥

मयासुर बोला – कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है । अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले ) आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३ ॥

अर्जुन उवाच

कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर ।

प्रीतिमान् भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ४ ॥

अर्जुनने कहा - असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया । तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम जाओ । मुझपर प्रेम बनाये रखना । हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे ॥ ४ ॥

मयउवाच

युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ ।

प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1605

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मयासुर बोला — प्रभो! पुरुषोतम! आपने जो बात कही है, वह आप- जैसे महापुरुषके अनुरूप ही है; परंतु भारत! मैं बड़े प्रेमसे आपके लिये कुछ करना चाहता हूँ ॥ ५ ॥

अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः ।

सोऽहं वै त्वत्कृते कर्तुं किंचिदिच्छामि पाण्डव ॥ ६ ॥

पाण्डुनन्दन! मैं दानवोंका विश्वकर्मा एवं शिल्प- विद्याका महान् पण्डित हूँ । अतः मैं आपके लिये किसी वस्तुका निर्माण करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

( दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृताः ।

रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रशः ॥

उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च ।

विचित्राणि च शस्त्राणि रथाः कामगमास्तथा ॥

नगराणि विशालानि साट्टप्राकारतोरणैः ।

वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रशः ॥

बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् । एतत् कृतं मया सर्वं तस्मादिच्छामि फाल्गुन II ) कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें मैंने दानवोंके बहुत से महल बनाये हैं । इसके सिवा देखनेमें रमणीय, सुख और भोगसाधनोंसे सम्पन्न अनेक प्रकारके रमणीय उद्यानों, भाँति- भाँतिके सरोवरों, विचित्र अस्त्र- शस्त्रों, इच्छानुसार चलनेवाले रथों, अट्टालिकाओं, चहारदीवारियों और बड़े - बड़े फाटकोंसहित विशाल नगरों, हजारों अद्भुत एवं श्रेष्ठ वाहनों तथा बहुत--सीस मनोहर एवं अत्यन्त सुखदायक सुरंगोंका मैंने निर्माण किया है । अतः अर्जुन! मैं आपके लिये भी कुछ बनाना चाहता हूँ । अर्जुनउवाच

प्राणकृच्छ्राद् विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मया ।

एवं गते न शक्ष्यामि किंचित् कारयितुं त्वया ॥ ७ ॥

अर्जुन बोले- मयासुर! तुम मेरे द्वारा अपनेको प्राणसंकटसे मुक्त हुआ मानते हो और

इसीलिये कुछ करना चाहते हो । ऐसी दशामें मैं तुमसे कोई काम नहीं करा सकूँगा ॥ ७ ॥

न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव ।

कृष्णस्य क्रियतां किंचित् तथा प्रतिकृतं मयि ॥ ८ ॥

दानव! साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारा यह संकल्प व्यर्थ हो । इसलिये तुम भगवान् श्रीकृष्णका कोई कार्य कर दो, इससे मेरे प्रति तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हो जायगा ॥ ८ ॥

चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ ।

मुहूर्तमिव संदध्यौ किमयं चोद्यतामिति ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1606

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भरतश्रेष्ठ! तब मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णसे काम बतानेका अनुरोध किया । उसके प्रेरणा करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अनुमानतः दो घड़ीतक विचार किया कि ' इसे कौन - सा काम बताया जाय? ' ॥ ९ ॥

ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः ।

चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ॥ १० ॥

यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर ।

धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे ॥ ११ ॥

तदनन्तर मन- ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा— ‘ शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्यराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो ॥ १०-११ ॥

यां कृतां नानुकुर्वन्ति मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः ।

मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम् ॥ १२ ॥

‘वह सभाभवन ऐसा बनाओ, जिसके बन जानेपर सम्पूर्ण मनुष्यलोकके मानव देखकर विस्मित हो जायँ एवं कोई उसकी नकल न कर सके ॥ १२ ॥

यत्र दिव्यानभिप्रायान् पश्येम हि कृतांस्त्वया ।

आसुरान् मानुषांश्चैव सभां तां कुरु वै मय ॥ १३ ॥

‘ मयासुर! तुम ऐसे सभाभवनका निर्माण करो, जिसमें हम तुम्हारे द्वारा अंकित देवता, असुर और मनुष्योंकी शिल्पनिपुणताका दर्शन कर सकें ' ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा ।

विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम् ॥ १४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके मयासुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके लिये विमान- जैसी सुन्दर सभाभवन बनानेका निश्चय किया ॥ १४ ॥

ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे ।

सर्वमेतत् समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको ये सब बातें बताकर मयासुरको उनसे मिलाया ॥ १५ ॥

तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत् तदा ।

स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1607

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भारत! राजा युधिष्ठिरने उस समय मयासुरका यथायोग्य सत्कार किया और मयासुरने भी बड़े आदरके साथ उनका वह सत्कार ग्रहण किया ॥ १६ ॥

स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते ।

कथयामास दैतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत ॥ १७ ॥

जनमेजय! दैत्यराज मयने उस समय वहाँ पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाये ॥ १७ ॥

स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु ।

सभां प्रचक्रमे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥

कुछ दिनोंतक वहाँ आरामसे रहकर दैत्योंके विश्वकर्मा मयासुरने सोच-विचारकर महात्मा पाण्डवोंके लिये सभाभवन बनानेकी तैयारी की ॥ १८ ॥

अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः ।

पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकौतुकमङ्गलः ॥ १९ ॥

तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान् पायसेन सहस्रशः ।

धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ॥ २० ॥

सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् ।

दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वतः ॥ २१ ॥

उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया । किसी पवित्र तिथिको ( शुभ मुहूर्तमें ) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया । इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी ( अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी ) धरती नपवायी ॥ १ ९ –२१ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं ) OF FULL

पृष्ठ 1608

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द्वितीयोऽध्यायः श्रीकृष्णकी द्वाराकायात्रा वैशम्पायन उवाच

उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः ।

पार्थैः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! परम पूजनीय भगवान् श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे ॥ १ ॥

गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः ।

धर्मराजमथामन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः ॥ २ ॥

तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ २ ॥

ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः ।

स तया मूर्व्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ॥ ३ ॥

जगद्वन्द्य केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया ॥ ३ ॥

ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशाः ।

तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या बाष्पसमन्वितः ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले । उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ४ ॥

अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम् ।

उवाच भगवान् भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ॥ ५ ॥

भगवान्ने मंगलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी ( और उसे ढाढ़स बँधाया ) ॥ ५ ॥

तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः ।

सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः ॥ ६ ।

सुभद्राने बार - बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता-पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये ॥ ६ ॥

तामनुज्ञाय वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम् ।

ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1609

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भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले ॥ ७ ॥

ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तमः ।

द्रौपदीं सान्त्वयित्वा च आमन्त्र्य च जनार्दनः ॥ ८ ॥

भ्रातॄनभ्यगमद् विद्वान् पार्थेन सहितो बली ।

भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवामरैः ॥ ९ ॥

पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये । पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ८ - ९ ॥

यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः ।

कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान् समलंकृतः ॥ १० ॥

तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया ॥ १० ॥

अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः ।

माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ११ ॥

फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की ॥ ११ ॥

स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वरः ।

उपेत्य स यदुश्रेष्ठ बाह्यकक्षाद् विनिर्गतः ॥ १२ ॥

प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले ॥ १२ ॥

स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् दधिपात्रफलाक्षतैः ।

वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १३ ॥

उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवान्‌ने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ उन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥

काञ्चनं रथमास्थाय तार्क्ष्यकेतनमाशुगम् ।

गदाचक्रासिशार्ङ्गाद्यैरायुधैरावृतं शुभम् ॥ १४ ॥

तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते ।

प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥ १५ ॥

इसके बाद गरुडचिह्नित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शार्ङ्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो

पृष्ठ 1610

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1610 का मूल पृष्ठ
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कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की ॥ १४-१५ ॥

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः ।

अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम् ॥ १६ ॥

उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्के साथ रथपर जा बैठे ॥ १६ ॥

अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ।

उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम् ॥ १७ ॥

रुक्मदण्डं बृहद्वाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम् । कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली । फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे ॥ १७३ ॥

तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो बली ॥ १८ ॥

पृष्ठतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैः सह ।

(छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ।

वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् ॥

दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छार्ङ्गधन्वने ।