श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1871–1880
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1871–1880
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करें ॥ २१ ॥
ऋत्विग् गुरुस्तथाऽऽचार्यः स्नातको नृपतिः प्रियः ।
सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ॥ २२ ॥
श्रीकृष्ण हमारे ऋत्विक्, गुरु, आचार्य, स्नातक, राजा और प्रिय मित्र सब कुछ हैं ।
इसीलिये हमने इनकी अग्रपूजा की है ॥ २२ ॥
कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः ।
कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ॥ २३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं । यह सारा चराचर विश्व इन्हींके लिये प्रकट हुआ है ॥ २३ ॥
एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः ।
परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात् पूज्यतमोऽच्युतः ॥ २४ ॥
ये ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता तथा सम्पूर्ण भूतोंसे परे हैं; अतः भगवान् अच्युत ही सबसे बढ़कर पूजनीय हैं ॥ २४ ॥
बुद्धिर्मनो महद् वायुस्तेजोऽम्भः खं मही च या ।
चतुर्विधं च यद् भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥ २५ ॥
महत्तत्त्व, अहंकार, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज - ये चार प्रकारके प्राणी भगवान् श्रीकृष्णमें ही प्रतिष्ठित हैं ॥ २५ ॥
आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ।
दिशश्च विदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥ २६ ॥
अग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री छन्दसां मुखम् ।
राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम् ॥ २७ ॥
नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम् ।
पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुडः पततां मुखम् ॥ २८ ॥
ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गतिः ।
सदेवकेषु लोकेषु भगवान् केशवो मुखम् ॥ २ ९ ॥
सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं । जैसे वेदोंमें अग्निहोत्रकर्म, छन्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों ) में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर- नीचे, दायें - बायें, जितने भी जगत्के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं ॥ २६–२९ ॥
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[ भगवान् नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु - कैटभका वध ] (वैशम्पायन उवाच
ततो भीष्मस्य तच्छ्रुत्वा वचः काले युधिष्ठिरः ।
उवाच मतिमान् भीष्मं ततः कौरवनन्दनः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर भीष्मजीका वह समयोचित वचन सुनकर कौरवनन्दन बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा । युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणास्य देवस्य कर्माणीच्छामि सर्वशः ।
श्रोतुं भगवतस्तानि प्रब्रवीहि पितामह ॥
कर्मणामानुपूर्व्यं च प्रादुर्भावांश्च मे विभोः ।
यथा च प्रकृतिः कृष्णे तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
युधिष्ठिर बोले- पितामह! मैं इन भगवान् श्रीकृष्णके सम्पूर्ण चरित्रोंको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप उन्हें कृपापूर्वक बतावें । पितामह! भगवान्के अवतारों और चरित्रोंका क्रमशः वर्णन कीजिये । साथ ही मुझे यह भी बताइये कि श्रीकृष्णका शील-स्वभाव कैसा है? वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तदा भीष्मः प्रोवाच भरतर्षभम् ।
युधिष्ठिरममित्रघ्नं तस्मिन् क्षत्रसमागमे ॥
समक्षं वासुदेवस्य देवस्येव शतक्रतोः ।
कर्माण्यसुकराण्यन्यैराचचक्षे जनाधिप ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर भीष्मने राजाओंके उस समुदायमें देवराज इन्द्रके समान सुशोभित होनेवाले भगवान् वासुदेवके सामने ही शत्रुहन्ता भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे भगवान् श्रीकृष्णके अलौकिक कर्मोंका, जिन्हें दूसरा कोई कदापि नहीं कर सकता, वर्णन किया ।
शृण्वतां पार्थिवानां च धर्मराजस्य चान्तिके ।
इदं मतिमतां श्रेष्ठः कृष्णं प्रति विशाम्पते ॥
साम्नैवामन्त्र्य राजेन्द्र चेदिराजमरिंदमम् ।
भीमकर्मा ततो भीष्मो भूयः स इदमब्रवीत् ॥
कुरूणां चापि राजानं युधिष्ठिरमुवाच ह । धर्मराजके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण नरेश उनकी यह बात सुन रहे थे । राजन्! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीमकर्मा भीष्मने शत्रुदमन चेदिराज शिशुपालको सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें ही
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समझाकर कुरुराज युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहना आरम्भ किया । भीष्म उवाच वर्तमानामतीतां च शृणु राजन् युधिष्ठिर । ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम् । भीष्म बोले— राजा युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके दिव्य कर्मोंकी गति बड़ी गहन है । उन्होंने पूर्वकालमें और इस समय भी जो महान् कर्म किये हैं, उन्हें बताता हूँ;
सुनो ।
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः ॥
पुरा नारायणो देवः स्वयम्भूः प्रपितामहः । ये सर्वशक्तिमान् भगवान् अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त स्वरूप धारण करके स्थित हैं । पूर्वकालमें ये भगवान् श्रीकृष्ण ही नारायणरूपमें स्थित थे । ये ही स्वयम्भू एवं सम्पूर्ण
जगत्के प्रपितामह हैं ।
सहस्रशीर्षः पुरुषो ध्रुवोऽव्यक्तः सनातनः ॥
सहस्राक्षः सहस्रास्यः सहस्रचरणो विभुः ।
सहस्रबाहुः साहस्रो देवो नामसहस्रवान् ॥
इनके सहस्रों मस्तक हैं । ये ही पुरुष, ध्रुव, अव्यक्त एवं सनातन परमात्मा हैं । इनके सहस्रों नेत्र, सहस्रों मुख और सहस्रों चरण हैं । ये सर्वव्यापी परमेश्वर सहस्रों भुजाओं, सहस्रों रूपों और सहस्रों नामोंसे युक्त हैं ।
सहस्रमुकुटो देवो विश्वरूपो महाद्युतिः ।
अनेकवर्णो देवादिरव्यक्ताद् वै परे स्थितः ॥
इनके मस्तक सहस्रों मुकुटोंसे मण्डित हैं । ये महान् तेजस्वी देवता हैं । सम्पूर्ण विश्व इन्हींका स्वरूप है । इनके अनेक वर्ण हैं । ये देवताओंके भी आदि कारण हैं और अव्यक्त प्रकृतिसे परे ( अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें स्थित ) हैं ।
असृजत् सलिलं पूर्वं स च नारायणः प्रभुः ।
ततस्तु भगवांस्तोये ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ॥
उन्हीं सामर्थ्यवान् भगवान् नारायणने सबसे पहले जलकी सृष्टि की है । फिर उस जलमें उन्होंने स्वयं ही ब्रह्माजीको उत्पन्न किया ।
ब्रह्मा चतुर्मुखो लोकान् सर्वांस्तानसृजत् स्वयम् ।
आदिकाले पुरा ह्येवं सर्वलोकस्य चोद्भवः ॥
ब्रह्माजीके चार मुख हैं । उन्होंने स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है । इस प्रकार आदिकालमें समस्त जगत्की उत्पत्ति हुई । पुराथ प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
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ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे ॥ फिर प्रलयकाल आनेपर, जैसा कि पहले हुआ था, समस्त स्थावर- जंगम सृष्टिका नाश हो जाता है एवं चराचर जगत्का नाश होनेके पश्चात् ब्रह्मा आदि देवता भी अपने कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं ।
आभूतसम्प्लवे प्राप्ते प्रलीने प्रकृतौ महान् ।
एकस्तिष्ठति सर्वात्मा स तु नारायणः प्रभुः ॥
और समस्त भूतोंका प्रवाह प्रकृतिमें विलीन हो जाता है, उस समय एकमात्र सर्वात्मा भगवान् महानारायण शेष रह जाते हैं । नारायणस्य चाङ्गानि सर्वदैवानि भारत । शिरस्तस्य दिवं राजन् नाभिः खं चरणौ मही । भरतनन्दन! भगवान् नारायणके सब अंग सर्वदेवमय हैं । राजन्! द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि और पृथ्वी चरण हैं ।
अश्विनौ घ्राणयोर्देवो चक्षुषी शशिभास्करौ ।
इन्द्रवैश्वानरौ देवौ मुखं तस्य महात्मनः ॥
दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिकाके स्थानमें हैं, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं एवं इन्द्र और अग्निदेवता उन परमात्माके मुख हैं ।
अन्यानि सर्वदैवानि तस्याङ्गानि महात्मनः ।
सर्वं व्याप्य हरिस्तस्थौ सूत्रं मणिगणानिव ॥
इसी प्रकार अन्य सब देवता भी उन महात्माके विभिन्न अवयव हैं । जैसे गुँथी हुई मालाकी सभी मणियोंमें एक ही सूत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं ।
आभूतसम्प्लवान्तेऽथ दृष्ट्वा सर्वं तमोऽन्वितम् ।
नारायणो महायोगी सर्वज्ञः परमात्मवान् ॥
ब्रह्मभूतस्तदाऽऽत्मानं ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् । प्रलयकालके अन्तमें सबको अन्धकारसे व्याप्त देख सर्वज्ञ परमात्मा ब्रह्मभूत
महायोगी नारायणने स्वयं अपने - आपको ही ब्रह्मारूपमें प्रकट किया ।
सोऽध्यक्षः सर्वभूतानां प्रभूतः प्रभवोऽच्युतः ॥
सनत्कुमारं रुद्रं च मनुं चैव तपोधनान् ।
सर्वमेवासृजद् ब्रह्मा ततो लोकान् प्रजास्तथा ॥
इस प्रकार अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत और सम्पूर्ण भूतोंके अध्यक्ष श्रीहरिने ब्रह्मारूपसे प्रकट हो सनत्कुमार, रुद्र, मनु तथा तपस्वी ऋषि- मुनियोंको उत्पन्न किया । सबकी सृष्टि उन्होंने ही की । उन्हींसे सम्पूर्ण लोकों और प्रजाओंकी उत्पत्ति हुई।
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ते च तद् व्यसृजंस्तत्र प्राप्ते काले युधिष्ठिर ।
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् ॥
युधिष्ठिर! समय आनेपर उन मनु आदिने भी सृष्टिका विस्तार किया । उन सब महात्माओंसे नाना प्रकारकी सृष्टि प्रकट हुई । इस प्रकार एक ही सनातन ब्रह्म अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हो गया ।
कल्पानां बहुकोट्यश्च समतीता हि भारत ।
आभूतसम्प्लवाश्चैव बहुकोट्योऽतिचक्रमुः ॥
भरतनन्दन! अबतक कई करोड़ कल्प बीत चुके हैं और कितने ही करोड़ प्रलयकाल भी गत हो चुके हैं ।
मन्वन्तरयुगेऽजस्रं सकल्पा भूतसम्प्लवा ।
चक्रवत् परिवर्तन्ते सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥
मन्वन्तर, युग, कल्प और प्रलय - ये निरन्तर चक्रकी भाँति घूमते रहते हैं । यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय है ।
सृष्ट्वा चतुर्मुखं देवं देवो नारायणः प्रभुः ।
स लोकानां हितार्थाय क्षीरोदे वसति प्रभुः ॥
देवाधिदेव भगवान् नारायण चतुर्मुख भगवान् ब्रह्माकी सृष्टि करके सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये क्षीरसागरमें निवास करते हैं ।
ब्रह्मा च सर्वदेवानां लोकस्य च पितामहः ।
ततो नारायणो देवः सर्वस्य प्रपितामहः ॥
ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकोंके पितामह हैं, इसलिये श्रीनारायणदेव सबके प्रपितामह हैं ।
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः ।
नारायणो जगच्चक्रे प्रभवाप्ययसंहितः ॥
जो अव्यक्त होते हुए व्यक्त शरीरमें स्थित हैं, सृष्टि और प्रलयकालमें भी जो नित्य विद्यमान रहते हैं, उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान् नारायणने इस जगत्की रचना की है ।
एष नारायणो भूत्वा हरिरासीद् युधिष्ठिर ।
ब्रह्माणं शशिसूर्यौ च धर्मं चैवासृजत् स्वयम् ॥
युधिष्ठिर! इन भगवान् श्रीकृष्णने ही नारायणरूपमें स्थित होकर स्वयं ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा और धर्मकी सृष्टि की है ।
बहुशः सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यतः ।
प्रादुर्भावांस्तु वक्ष्यामि दिव्यान् देवगणैर्युतान् ॥
ये समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं और कार्यवश अनेक रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं । इनके सभी अवतार दिव्य हैं और देवगणोंसे संयुक्त भी हैं । मैं उन सबका वर्णन करता हूँ ।
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सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् ।
पूर्णे युगसहस्रेऽथ देवदेवो जगत्पतिः ॥
ब्रह्माणं कपिलं चैव परमेष्ठिनमेव च ।
देवान् सप्त ऋषींश्चैव शङ्करं च महायशाः ॥
देवाधिदेव जगदीश्वर महायशस्वी भगवान् श्रीहरि सहस्र युगोंतक शयन करनेके पश्चात् कल्पान्तकी सहस्रयुगात्मक अवधि पूरी होनेपर प्रकट होते और सृष्टिकार्यमें संलग्न हो परमेष्ठी ब्रह्मा, कपिल, देवगणों, सप्तर्षियों तथा शंकरकी उत्पत्ति करते हैं ।
सनत्कुमारं भगवान् मनुं चैव प्रजापतिम् ।
पुरा चक्रेऽथ देवादीन् प्रदीप्ताग्निसमप्रभः ॥
इसी प्रकार भगवान् श्रीहरि सनत्कुमार, मनु एवं प्रजापतिको भी उत्पन्न करते हैं । पूर्वकालमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी नारायणदेवने ही देवताओं आदिकी सृष्टि की है ।
येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
नष्टदेवासुरनरे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥
योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ भ्रातरौ मधुकैटभौ ।
हतौ भगवता तेन तयोर्दत्त्वा वृतं वरम् ॥
पहलेकी बात है, प्रलयकालमें समस्त चराचर प्राणी, देवता, असुर, मनुष्य, नाग तथा राक्षस सभी नष्ट हो चुके थे । उस समय एकार्णव ( महासागर) - की जलराशिमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दैत्य रहते थे, जिनके नाम थे - मधु और कैटभ । वे दोनों भाई युद्धकी इच्छा रखते थे । उन्हीं भगवान् नारायणने उन्हें मनोवांछित वर देकर उन दोनों दैत्योंका वध किया था ।
भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्वं मृन्मयौ द्वौ महासुरौ ।
कर्णस्रोतोद्भवौ तौ तु विष्णोस्तस्य महात्मनः ॥
कहते हैं, वे दोनों महान् असुर महात्मा भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे । पहले भगवान्ने इस पृथ्वीको आबद्ध करके मिट्टीसे ही उनकी आकृति बनायी थी ।
महार्णवे प्रस्वपतः शैलराजसमौ स्थितौ ।
तौ विवेश स्वयं वायुः ब्रह्मणा साधु चोदितः ॥
वे पर्वतराज हिमालयके समान विशाल शरीर लिये महासागरके जलमें सो रहे थे । उस समय ब्रह्माजीकी प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया ।
तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महासुरौ ।
वायुप्राणौ तु तौ दृष्ट्वा ब्रह्मा पर्यामृशच्छनैः ॥
फिर तो वे दोनों महान् असुर सम्पूर्ण द्युलोकको आच्छादित करके बढ़ने लगे । वायुदेव ही जिनके प्राण थे, उन दोनों असुरोंको देखकर ब्रह्माजीने धीरे - धीरे उनके शरीरपर हाथ फेरा ।
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एकं मृदुतरं बुद्ध्वा कठिनं बुध्य चापरम् ।
नामनी तु तयोश्चक्रे स विभुः सलिलोद्भवः ॥
एकका शरीर उन्हें अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका अत्यन्त कठोर । तब जलसे उत्पन्न होनेवाले भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण किया ।
मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैटभः स्वयम् ।
तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ ॥
यह जो मृदुल शरीरवाला असुर है, इसका नाम मधु होगा और जिसका शरीर कठोर है, वह कैटभ कहलायेगा । इस प्रकार नाम निश्चित हो जानेपर वे दोनों दैत्य बलसे उन्मत्त होकर सब ओर विचरने लगे ।
तौ पुराथ दिवं सर्वां प्राप्तौ राजन् महासुरौ ।
प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वां चेरतुर्मधुकैटभौ ॥
राजन्! सबसे पहले वे दोनों महादैत्य मधु और कैटभ द्युलोकमें पहुँचे और उस सारे लोकको आच्छादित करके सब ओर विचरने लगे ।
सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ ।
तौ गतावसुरौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत । उस समय सारा लोक जलमय हो रहा था । उसमें युद्धकी कामनासे अत्यन्त निर्भय होकर आये हुए उन दोनों असुरोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी वहीं एकार्णवरूप
जलराशिमें अन्तर्धान हो गये ।
स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिदेशात् समुत्थिते ॥
आसीदादौ स्वयंजन्म तत् पङ्कजमपङ्कजम् ।
पूजयामास' वसतिं'ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
वे भगवान् पद्मनाभ ( विष्णु ) - की नाभिसे प्रकट हुए कमलमें जा बैठे । वह कमल वहाँ पहले ही स्वयं प्रकट हुआ था । कहनेको तो वह पंकज था, परंतु पंकसे उसकी उत्पत्ति नहीं हुई थी । लोकपितामह ब्रह्माने अपने निवासके लिये उस कमलको ही पसंद किया और उसकी भूरि- भूरि सराहना की । तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखौ बहून् वर्षायुतानप्सु शयानौ न चकम्पतुः ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ ।
आजग्मतुस्तौ तं देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः ॥
भगवान् नारायण और ब्रह्मा दोनों ही अनेक सहस्र वर्षोंतक उस जलके भीतर सोते रहे; किंतु कभी तनिक भी कम्पायमान नहीं हुए । तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे दोनों असुर मधु और कैटभ उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ब्रह्माजी स्थित थे ।
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तौ दृष्ट्वा लोकनाथस्तु कोपात् संरक्तलोचनः ।
उत्पपाताथ शयनात् पद्मनाभो महाद्युतिः ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं तयोस्तस्य च वै तदा ।
एकार्णवे तदा घोरे त्रैलोक्ये जलतां गते ॥
तदभूत् तुमुलं युद्धं वर्षसङ्घान् सहस्रशः ।
न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतुः ॥
उन दोनोंको आया देख महातेजस्वी लोकनाथ भगवान् पद्मनाभ अपनी शय्यासे खड़े हो गये । क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं । फिर तो उन दोनोंके साथ उनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । उस भयानक एकार्णवमें जहाँ त्रिलोकी जलरूप हो गयी थी, सहस्रों वर्षोंतक उनका वह घमासान युद्ध चलता रहा; परंतु उस समय उस युद्धमें उन दोनों दैत्योंको तनिक भी थकावट नहीं होती थी ।
अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ ।
ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं प्रभुम् ॥
प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः ।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥
तत्पश्चात् दीर्घकाल व्यतीत होनेपर वे दोनों रणोन्मत्त दैत्य प्रसन्न होकर सर्वशक्तिमान् भगवान् नारायणसे बोले –— ' सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हारे युद्ध - कौशलसे बहुत प्रसन्न हैं । तुम हमारे लिये स्पृहणीय मृत्यु हो । हमें ऐसी जगह मारो, जहाँकी भूमि पानीमें डूबी हुई न हो ।
हतौ च तव पुत्रत्वं प्राप्नुयाव सुरोत्तम ।
यो ह्यावां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ ॥
तयोः स वचनं श्रुत्वा तदा नारायणः प्रभुः ।
तौ प्रगृह्य मृधे दैत्यौ दोर्भ्यां तौ समपीडयत् ॥
ऊरुभ्यां निधनं चक्रे तावुभौ मधुकैटभौ । ‘ तथा मरनेके पश्चात् हम दोनों तुम्हारे पुत्र हों । जो हमें युद्धमें जीत ले, हम उसीके पुत्र हों - ऐसी हमारी इच्छा है । ' उनकी बात सुनकर भगवान् नारायणने उन दोनों दैत्योंको युद्धमें पकड़कर उन्हें दोनों हाथोंसे दबाया और मधु तथा कैटभ दोनोंको अपनी जाँघोंपर
रखकर मार डाला ।
तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुर्भ्यामेकतां गतौ ॥
मेदो मुमुचतुर्दैत्यौ मथ्यमानौ जलोर्मिभिः ।
मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दधे तदा ॥
नारायणश्च भगवानसृजद् विविधाः प्रजाः ।
दैत्ययोर्मेदसाच्छन्ना सर्वा राजन् वसुन्धरा ॥
तदाप्रभृति कौन्तेय मेदिनीति स्मृता मही ।
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प्रभावात् पद्मनाभस्य शाश्वती च कृता नृणाम् ॥ मरनेपर उन दोनोंकी लाशें जलमें डूबकर एक हो गयीं । जलकी लहरोंसे मथित होकर उन दोनों दैत्योंने जो मेद छोड़ा, उससे आच्छादित होकर वहाँका जल अदृश्य हो गया । उसीपर भगवान् नारायणने नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की । राजन् कुन्तीकुमार! उन दोनों दैत्योंके मेदसे सारी वसुधा आच्छादित हो गयी, अतः तभीसे यह मही ' मेदिनी ' के नामसे प्रसिद्ध हुई । भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे यह मनुष्योंके लिये शाश्वत आधार बन गयी । (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा ] भीष्म उवाच
प्रादुर्भावसहस्राणि समतीतान्यनेकशः ।
यथाशक्ति तु वक्ष्यामि शृणु तान् कुरुनन्दन ॥
भीष्मजी कहते हैं – कुरुनन्दन! भगवान्के अब-तक कई सहस्र अवतार हो चुके हैं । मैं यहाँ कुछ अवतारोंका यथाशक्ति वर्णन करूँगा । तुम ध्यान देकर उनका वृत्तान्त सुनो ।
पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।
पुष्करे यत्र सम्भूता देवा ऋषिगणैः सह ॥
पूर्वकालमें जब भगवान् पद्मनाभ समुद्रके जलमें शयन कर रहे थे, पुष्करमें उनसे अनेक देवताओं और महर्षियोंका प्रादुर्भाव हुआ ।
एष पौष्करिको नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः ।
पुराणः कथ्यते यत्र वेदश्रुतिसमाहितः ॥
‘ यह भगवान्का ‘ पौष्करिक ' ( पुष्करसम्बन्धी ) पुरातन अवतार कहा गया है, जो वैदिक श्रुतियोंद्वारा अनुमोदित है ।
वाराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भावो महात्मनः ।
यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ॥
उज्जहार महीं तोयात् सशैलवनकाननाम् । महात्मा श्रीहरिका जो वराह नामक अवतार है, उसमें भी प्रधानतः वैदिक श्रुति ही प्रमाण है । उस अवतारके समय भगवान्ने वराहरूप धारण करके पर्वतों और वनोंसहित
सारी पृथ्वीको जलसे बाहर निकाला था ।
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ॥
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । चारों वेद ही भगवान् वराहके चार पैर थे । यूप ही उनकी दाढ़ थे । क्रतु ( यज्ञ ) ही दाँत और ‘ चिति’ ( इष्टिकाचयन) ही मुख थे । अग्नि जिह्वा, कुश रोम तथा ब्रह्म मस्तक थे । वे
महान् तपसे सम्पन्न थे ।
अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ॥
आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान् । दिन और रात ही उनके दो नेत्र थे । उनका स्वरूप दिव्य था । वेदांग ही उनके विभिन्न अंग थे । श्रुतियाँ ही उनके लिये आभूषणका काम देती थीं । घी उनकी नासिका, स्रुवा उनकी
थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी । उनका शरीर बहुत बड़ा था ।
धर्मसत्यमयः श्रीमान् कर्मविक्रमसस्कृतः ॥