श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1931–1940
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1931–1940
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गदं सारणमक्रूरं कृतवर्माणमेव च ।
चारुदेष्णं सुदेष्णं च अन्यानपि यथोचितम् ॥
परिष्वज्य च दृष्ट्वा च भगवान् भूतभावनः । भूतभावन ऐश्वर्यशाली इन्द्रने वसुदेव, उद्धव, महामति विकद्रु, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सात्यकि, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, चारुदेष्ण तथा सुदेष्ण आदि अन्य
यादवोंका भी यथोचित रीतिसे आलिंगन करके उन सबकी ओर दृष्टिपात किया ।
वृष्ण्यन्धकमहामात्रान् परिष्वज्याथ वासवः ॥
प्रगृह्य पूजां तैर्दत्तामुवाचावनताननः । इस प्रकार उन्होंने वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान व्यक्तियोंको हृदयसे लगाकर उनकी दी हुई पूजा ग्रहण की तथा मुखको नीचेकी ओर झुकाकर वे इस प्रकार बोले— इन्द्र उवाच अदित्या चोदितः कृष्ण तव मात्राहमागतः ॥ कुण्डलेऽपहृते तात भौमेन नरकेण च । इन्द्रने कहा — भैया कृष्ण! तुम्हारी माता अदितिकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ । तात!
भूमिपुत्र नरकासुरने उनके कुण्डल छीन लिये हैं ।
निदेशशब्दवाच्यस्त्वं लोकेऽस्मिन् मधुसूदन ॥
तस्माज्जहि महाभाग भूमिपुत्रं नरेश्वर । मधुसूदन! इस लोकमें माताका आदेश सुननेके पात्र केवल तुम्हीं हो । अतः महाभाग नरेश्वर! तुम भौमासुरको मार डालो । भीष्म उवाच
तमुवाच महाबाहुः प्रीयमाणो जनार्दनः ।
निर्जित्य नरकं भौममाहरिष्यामि कुण्डले ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब महाबाहु जनार्दन अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले — ' देवराज! मैं भूमिपुत्र नरकासुरको पराजित करके माताजीके कुण्डल अवश्य ला दूँगा' ।
एवमुक्त्वा तु गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत ।
प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले ॥
एतांश्चोक्त्वा तदा तत्र वासुदेवो महायशाः ।
अथारुह्य सुपर्णं वै शङ्खचक्रगदासिधृक् ॥
ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया । ऐसा कहकर भगवान् गोविन्दने बलरामजीसे बातचीत की । तत्पश्चात् प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अनुपम बलवान् साम्बसे भी इसके विषयमें वार्तालाप करके महायशस्वी इन्द्रियाधीश्वर
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भगवान् श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंका
हित करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये ।
तं प्रयान्तममित्रघ्नं देवाः सहपुरन्दराः ॥
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम् । शत्रुनाशन भगवान् श्रीकृष्णको प्रस्थान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े प्रसन्न
हुए और अच्युत भगवान् कृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हींके पीछे - पीछे चले ।
सोऽग्रयान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महासुरान् ॥
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रं ददर्श सः । भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके उन मुख्य- मुख्य राक्षसोंको मारकर मुर दैत्यके बनाये
हुए छः हजार पाशोंको देखा, जिनके किनारोंके भागोंमें छुरे लगे हुए थे ।
संच्छिद्य पाशांस्त्वस्त्रेण मुरं हत्वा सहान्वयम् ॥
शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भमवपोथयत् । भगवान्ने अपने अस्त्र ( चक्र ) - से मुर दैत्यके पाशोंको काटकर मुर नामक असुरको उसके वंशजों - सहित मार डाला और शिलाओंके समूहोंको लाँघकर निशुम्भको भी मार
गिराया ।
यः सहस्रसमस्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ॥
तं जघान महावीर्यं हयग्रीवं महाबलम् ।
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तत्पश्चात् जो अकेला ही सहस्रों योद्धाओंके समान था और सम्पूर्ण देवताओंके साथ
अकेला ही युद्ध कर सकता था, उस महाबली एवं महापराक्रमी हयग्रीवको भी मार दिया ।
अपारतेजा दुर्धर्षः सर्वयादवनन्दनः ॥
मध्ये लोहितगङ्गायां भगवान् देवकीसुतः ।
औदकायां विरूपाक्षं जघान भरतर्षभ ॥
पञ्च पञ्चजनान् घोरान् नरकस्य महासुरान् । भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले अमित तेजस्वी दुर्धर्ष वीर भगवान् देवकीनन्दनने औदकाके अन्तर्गत लोहितगंगाके बीच विरूपाक्षको तथा ' पंचजन ' नामसे
प्रसिद्ध नरकासुरके पाँच भयंकर राक्षसोंको भी मार गिराया ।
ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥
पुरमासादयामास तत्र युद्धमवर्तत । फिर भगवान् अपनी शोभासे उद्दीप्त - से दिखायी देनेवाले प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे ।
वहाँ उनका दानवोंसे फिर युद्ध छिड़ गया ।
महद् दैवासुरं युद्धं यद् वृत्तं भरतर्षभ ॥
युद्धं न स्यात् समं तेन लोकविस्मयकारकम् । भरतकुलभूषण! वह युद्ध महान् देवासुर संग्रामके रूपमें परिणत हो गया । उसके
समान लोकविस्मयकारी युद्ध दूसरा कोई नहीं हो सकता ।
चक्रलाञ्छनसंछिन्नाः शक्तिखड्गहतास्तदा ॥
निपेतुर्दानवास्तत्र समासाद्य जनार्दनम् । चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णसे भिड़कर सभी दानव वहाँ चक्रसे छिन्न-भिन्न एवं शक्ति तथा खड्गसे आहत होकर धराशायी हो गये ।
अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतप ।
निहत्य पुरुषव्याघ्रः पातालविवरं ययौ ॥
त्रासनं सुरसङ्घानां नरकं पुरुषोत्तमः ।
योधयत्यतितेजस्वी मधुवन्मधुसूदनः ॥
परंतप युधिष्ठिर! इस प्रकार आठ लाख दानवोंका संहार करके पुरुषसिंह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पातालगुफामें गये, जहाँ देवसमुदायको आतंकित करनेवाला नरकासुर रहता था । अत्यन्त तेजस्वी भगवान् मधुसूदनने मधुकी भाँति पराक्रमी नरकासुरसे युद्ध प्रारम्भ किया ।
तद् युद्धमभवद् घोरं तेन भौमेन भारत ।
कुण्डलार्थे सुरेशस्य नरकेण महात्मना ॥
भारत! देवमाता अदितिके कुण्डलोंके लिये भूमिपुत्र महाकाय नरकासुरके साथ छिड़ा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर था । मुहूर्तं लालयित्वाथ नरकं मधुसूदनः ।
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प्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलाद् बली ॥ बलवान् मधुसूदनने चक्र हाथमें लिये हुए नरकासुरके साथ दो घड़ीतक खिलवाड़ करके बलपूर्वक चक्रसे उसके मस्तकको काट डाला ।
चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि ।
उत्तमाङ्गं हताङ्गस्य वृत्रे वज्रहते यथा ॥
चक्रसे छिन्न - भिन्न होकर घायल हुए शरीरवाले नरकासुरका मस्तक वज्रके मारे हुए वृत्रासुरके सिरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ।
भूमिस्तु पतितं दृष्ट्वा ते वै प्रादाच्च कुण्डले ।
प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥
भूमिने अपने पुत्रको रणभूमिमें गिरा देख अदितिके दोनों कुण्डल लौटा दिये और महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा । भूमिरुवाच
सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव निहतः प्रभो ।
यथेच्छसि तथा क्रीडन् प्रजास्तस्यानुपालय ॥
भूमि बोली - प्रभो मधुसूदन! आपने ही इसे जन्म दिया था और आपने ही इसे मारा है । आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही लीला करते हुए नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये । श्रीभगवानुवाच
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देवानां च मुनीनां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
उद्वेजनीयो भूतानां ब्रह्मद्विट् पुरुषाधमः ॥
लोकद्विष्टः सुतस्ते तु देवारिर्लोककण्टकः । श्रीभगवान्ने कहा — भामिनि! तुम्हारा यह पुत्र देवताओं, मुनियों, पितरों, महात्माओं तथा सम्पूर्ण भूतोंके उद्वेगका पात्र हो रहा था । यह पुरुषाधम ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला, देवताओंका शत्रु तथा सम्पूर्ण विश्वका कण्टक था, इसलिये सब लोग इससे द्वेष रखते थे । सर्वलोकनमस्कार्यामदितिं बाधते बली । कुण्डले दर्पसम्पूर्णस्ततोऽसौ निहतोऽसुरः । इस बलवान् असुरने बलके घमंडमें आकर सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय देवमाता अदितिको भी कष्ट पहुँचाया और उनके कुण्डल ले लिये। इन्हीं सब कारणोंसे यह मारा गया
है ।
नैव'मन्युस्त्वया कार्यो यत् कृतं मयि भामिनि ॥
मत्प्रभावाच्च ते पुत्रो लब्धवान् गतिमुत्तमाम् । तस्माद् गच्छ महाभागे भारावतरणं कृतम् भामिनि! मैंने इस समय जो कुछ किया है, उसके लिये तुम्हें मुझपर क्षोभ नहीं करना चाहिये । महाभागे! तुम्हारे पुत्रने मेरे प्रभावसे अत्यन्त उत्तम गति प्राप्त की है; इसलिये जाओ, मैंने तुम्हारा भार उतार दिया है ।
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Gmmiel भूमिका भगवान्को अदितिके कुण्डल देना
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भीष्म उवाच
निहत्य नरकं भौम सत्यभामासहायवान् ।
सहितो लोकपालैश्च ददर्श नरकालयम् ॥
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर सत्यभामासहित भगवान् श्रीकृष्णने लोकपालोंके साथ जाकर नरकासुरके घरको देखा ।
अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य यशस्विनः ।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥
यशस्वी नरकके घरमें जाकर उन्होंने नाना प्रकारके रत्न और अक्षय धन देखा ।
मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च ।
अश्मसारानर्कमणीन् विमलान् स्फाटिकानपि ॥
मणि, मोती, मूँगे, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वस्तुएँ, पुखराज, सूर्यकान्तमणि और निर्मल स्फटिकमणिकी वस्तुएँ भी वहाँ देखनेमें आयीं ।
जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च ।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिप्रभाणि च ॥
जाम्बूनद तथा शातकुम्भसंज्ञक सुवर्णकी बनी हुई बहुत सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं ।
हिरण्यवर्णं रुचिरं श्वेतमभ्यन्तरं गृहम् ।
यदक्षयं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥
न हि राज्ञः कुबेरस्य तावद् धनसमुच्छ्रयः ।
दृष्टपूर्वः पुरा साक्षान्महेन्द्रसदनेष्वपि ॥
नरकासुरका भीतरी भवन सुवर्णके समान सुन्दर, कान्तिमान् एवं उज्ज्वल था । उसके घरमें जो असंख्य एवं अक्षय धन दिखायी दिया, उतनी धनराशि राजा कुबेरके घरमें भी नहीं है । देवराज इन्द्रके भवनमें भी पहले कभी उतना वैभव नहीं देखा गया था । इन्द्र उवाच इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च ॥
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिनः ।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥
विमलाभिः पताकाभिर्वासांसि विविधानि च ।
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः ॥
इन्द्र बोले –जनार्दन! ये जो नाना प्रकारके माणिक्य, रत्न, धन तथा सोनेकी जालियोंसे सुशोभित बड़े - बड़े हौदोंवाले, तोमरसहित पराक्रमशाली बड़े भारी गजराज एवं उनपर बिछानेके लिये मूँगेसे विभूषित कम्बल, निर्मल पताकाओंसे युक्त नाना प्रकारके वस्त्र
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आदि हैं, इन सबपर आपका अधिकार है । इन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है तथा इससे दूनी हथिनियाँ हैं ।
अष्टौ शतसहस्राणि देशजाश्चोत्तमा हयाः ।
गोभिश्चाविकृतैर्यानैः कामं तव जनार्दन ॥
जनार्दन! यहाँ आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं और बैल जुते हुए नये - नये वाहन हैं । इनमेंसे जिनकी आपको आवश्यकता हो, वे सब आपके यहाँ जा सकते हैं ।
आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च ।
कामव्याहारिणश्चैव पक्षिणः प्रियदर्शनाः ॥
चन्दनागुरुमिश्राणि यानानि विविधानि च ।
एतत् ते प्रापयिष्यामि वृष्ण्यावासमरिंदम ॥
शत्रुदमन! ये महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत- से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुमिश्रित नाना प्रकारके रथ — ये सब वस्तुएँ मैं आपके लिये वृष्णियोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा दूँगा । भीष्म उवाच
देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च ।
यानि सन्तीह रत्नानि नरकस्य निवेशने ॥
एतत् तु गरुडे सर्वं क्षिप्रमारोप्य वासवः ।
दाशार्हपतिना सार्धमुपायान्मणिपर्वतम् ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! देवता, गन्धर्व, दैत्य और असुरसम्बन्धी जितने भी रत्न नरकासुरके घरमें उपलब्ध हुए, उन्हें शीघ्र ही गरुड़पर रखकर देवराज इन्द्र दाशार्हवंशके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ मणिपर्वतपर गये ।
तत्र पुण्या ववुर्वाताः प्रभाश्चित्राः समुज्ज्वलाः ।
प्रेक्षतां सुरसङ्घानां विस्मयः समपद्यत ॥
वहाँ बड़ी पवित्र हवा बह रही थी तथा विचित्र एवं उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली हुई थी । यह सब देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ ।
त्रिदशा ऋषयश्चैव चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ।
प्रभया तस्य शैलस्य निर्विशेषमिवाभवत् ॥
आकाशमण्डलमें प्रकाशित होनेवाले देवता, ऋषि, चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वहाँ आये हुए देवगण उस पर्वतकी प्रभासे तिरस्कृत हो साधारण से प्रतीत हो रहे थे ।
अनुज्ञातस्तु रामेण वासवेन च केशवः ।
प्रीयमाणो महाबाहुर्विवेश मणिपर्वतम् ॥
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तदनन्तर बलरामजी तथा देवराज इन्द्रकी आज्ञासे महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके मणिपर्वतपर बने हुए अन्तःपुरमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया ।
तत्र वैडूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः ।
सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥
मधुसूदनने देखा; उस अन्तःपुरके द्वार और गृह वैदूर्यमणिके समान प्रकाशित हो रहे हैं । उनके फाटकोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं ।
चित्रग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः ।
हेमचित्रपताकैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥
सुवर्णमय विचित्र पताकाओंवाले महलोंसे सुशोभित वह मणिपर्वत चित्रलिखित मेघोंके समान प्रतीत होता था ।
हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च ।
तत्रस्था वरवर्णाभा ददृशुर्मधुसूदनम् ॥
गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा ।
त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम् ॥
उन महलोंमें विशाल अट्टालिकाएँ बनी थीं, जिनपर चढ़नेके लिये मणिनिर्मित सीढ़ियाँ सुशोभित हो रही थीं । वहाँ रहनेवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और सुरोंकी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंने उस स्वर्गके समान प्रदेशमें खड़े हुए अपराजित वीर भगवान् मधुसूदनको देखा ।
परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः ।
सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥
देखते - देखते ही उन सबने महाबाहु श्रीकृष्णको घेर लिया । वे सभी स्त्रियाँ एक वेणी धारण किये गेरुए वस्त्र पहने इन्द्रियसंयमपूर्वक वहाँ तपस्या करती थीं ।
व्रतसंतापजः शोको नात्र काश्चिदपीडयत् ।
अरजांसि च वासांसि बिभ्रत्यः कौशिकान्यपि ॥
समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रियः ।
ऊचुश्चैनं हृषीकेशं सर्वास्ताः कमलेक्षणाः ॥
उस समय व्रत और संतापजनित शोक उनमेंसे किसीको पीड़ा नहीं दे सका । वे निर्मल रेशमी वस्त्र पहने हुए यदुवीर श्रीकृष्णके पास जा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं । उन कमलनयनी कामिनियोंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी श्रीहरिसे इस प्रकार कहा ।
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कन्यका ऊचुः
नारदेन समाख्यातमस्माकं पुरुषोत्तम ।
आगमिष्यति गोविन्दः सुरकार्यार्थसिद्धये ॥
कन्याएँ बोलीं- पुरुषोत्तम! देवर्षि नारदने हमसे कह रखा था कि ' देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भगवान् गोविन्द यहाँ पधारेंगे ।
सोऽसुरं नरकं हत्वा निशुम्भं मुरमेव च ।
भौमं च सपरीवारं हयग्रीवं च दानवम् ॥
तथा पञ्चजनं चैव प्राप्स्यते धनमक्षयम् । ‘ एवं वे सपरिवार नरकासुर, निशुम्भ, मुर, दानव हयग्रीव तथा पंचजनको मारकर
अक्षय धन प्राप्त करेंगे ।
सोऽचिरेणैव कालेन युष्मन्मोक्ता भविष्यति ॥
एवमुक्त्वागमद् धीमान् देवर्षिर्नारदस्तथा । ‘ थोड़े ही दिनोंमें भगवान् यहाँ पधारकर तुम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करेंगे । '
ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् देवर्षि नारद यहाँसे चले गये ।
त्वां चिन्तयानाः सततं तपो घोरमुपास्महे ॥
कालेऽतीते महाबाहुं कदा द्रक्ष्याम माधवम् । हम सदा आपका ही चिन्तन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं । हमारे मनमें यह संकल्प उठता रहता था कि कितना समय बीतनेपर हमें महाबाहु माधवका दर्शन प्राप्त होगा ।