श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1941–1950
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1941–1950
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इत्येवं हृदि संकल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम ॥ तपश्चराम सततं रक्ष्यमाणा हि दानवैः । पुरुषोत्तम! यही संकल्प लेकर दानवोंद्वारा सुरक्षित हो हम सदा तपस्या करती आ रही
हैं ।
गान्धर्वेण विवाहेन विवाहं कुरु नः प्रियम् ॥
ततोऽस्मत्प्रियकामार्थं भगवान् मारुतोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं नारदेनाद्य न चिरात् तद् भविष्यति ॥
भगवन्! आप गान्धर्व विवाहकी रीतिसे हमारे साथ विवाह करके हमारा प्रिय करें । हमारे पूर्वोक्त मनोरथको जानकर भगवान् वायुदेवने भी हम सबके प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये कहा था कि ‘ देवर्षि नारदजीने जो कहा है, वह शीघ्र ही पूर्ण होगा ' । भीष्म उवाच
तासां परमनारीणामृषभाक्षं पुरस्कृतम् ।
ददृशुर्देवगन्धर्वा गृष्टीनामिव गोपतिम् ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! देवताओं तथा ग्रन्धर्वोंने देखा, वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण उन परम सुन्दरी नारियोंके समक्ष वैसे ही खड़े थे, जैसे नयी गायोंके आगे साँड़ हो ।
तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रमुदीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः ।
सम्प्रहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ॥
भगवान्के मुखचन्द्रको देखकर उन सबकी इन्द्रियाँ उल्लसित हो उठीं और वे हर्षमें भरकर महाबाहु श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार बोलीं । कन्यका ऊचुः
सत्यं बत पुरा वायुरिदमस्मानिहाब्रवीत् ।
सर्वभूतकृतज्ञश्च महर्षिरपि नारदः ॥
कन्याओंने कहा — बड़े हर्षकी बात है कि पूर्व कालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति कृतज्ञता रखनेवाले महर्षि नारदजीने जो बात कही थी, वह सत्य हो गयी ।
विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिधृक् ।
स भौमं नरकं हत्वा भर्ता वो भविता ह्यतः ॥
उन्होंने कहा था कि ‘ शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले सर्वव्यापी नारायण भगवान् विष्णु भूमिपुत्र नरकको मारकर तुमलोगोंके पति होंगे ' ।
दिष्ट्या तस्यर्षिमुख्यस्य नारदस्य महात्मनः ।
वचनं दर्शनादेव सत्यं भवितुमर्हति ॥
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ऋषियोंमें प्रधान महात्मा नारदका वह वचन आज आपके दर्शनमात्रसे सत्य होने जा रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ।
यत् प्रियं बत पश्याम वक्त्रं चन्द्रोपमं तु ते ।
दर्शनेन कृतार्थाः स्मो वयमद्य महात्मनः ॥
तभी तो आज हम आपके परम प्रिय चन्द्रतुल्य मुखका दर्शन कर रही हैं । आप परमात्माके दर्शनमात्रसे ही हम कृतार्थ हो गयीं । भीष्म उवाच उवाच स यदुश्रेष्ठः सर्वास्ता जातमन्मथाः । भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! भगवान्के प्रति उन सबके हृदयमें कामभावका संचार हो गया था । उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा । श्रीभगवानुवाच यथा ब्रूत विशालाक्ष्यस्तत् सर्वं वो भविष्यति ॥ श्रीभगवान् बोले- विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! जैसा तुम कहती हो, उसके अनुसार तुम्हारी सारी अभिलाषा पूर्ण हो जायगी । भीष्म उवाच
तानि सर्वाणि रत्नानि गमयित्वाथ किङ्करैः ।
स्त्रियश्च गमयित्वाथ देवतानृपकन्यकाः ॥
वैनतेयभुजे कृष्णो मणिपर्वतमुत्तमम् ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे भगवान् देवकीसुतः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सेवकोंद्वारा उन सब रत्नोंको तथा देवताओं एवं राजाओं आदिकी कन्याओंको द्वारका भेजकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस उत्तम मणिपर्वतको शीघ्र ही गरुड़की बाँह ( पंख या पीठ ) -पर चढ़ा दिया ।
सपक्षिगणमातङ्गं सव्यालमृगपन्नगम् ।
शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम् ॥
न्यङ्कुभिश्च वराहैश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसंकुलम् ॥
तं महेन्द्रानुजः शौरिश्चकार गरुडोपरि ।
पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाट्य मणिपर्वतम् ॥
केवल पर्वत ही नहीं, उसपर रहनेवाले जो पक्षियोंके समुदाय, हाथी, सर्प, मृग, नाग, बंदर, पत्थर, शिला, न्यंकु, वराह, रुरु मृग, झरने, बड़े - बड़े शिखर तथा विचित्र मोर आदि
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थे, उन सबके साथ मणिपर्वतको उखाड़कर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने सब प्राणियोंके देखते - देखते गरुड़पर रख लिया ।
उपेन्द्रं बलदेवं च वासवं च महाबलम् ।
तं च रत्नौघमतुलं पर्वतं च महाबलः ॥
वरुणस्यामृतं दिव्यं छत्रं चन्द्रोपमं शुभम् ।
स्वपक्षबलविक्षेपैर्महाद्रिशिखरोपमः ॥
दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन् । महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम तथा महाबलवान् इन्द्रको, उस अनुपम रत्नराशि तथा पर्वतको, वरुणदेवताके दिव्य अमृत तथा चन्द्रतुल्य उज्ज्वल शुभकारक छत्रको वहन करते हुए चल दिये । उनका शरीर विशाल पर्वतशिखरके समान था। वे अपनी पाँखोंको
बलपूर्वक हिला - हिलाकर सब दिशाओंमें भारी शोर मचाते जा रहे थे ।
आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन् ॥
संजहार महाभ्राणि वैश्वानरपथं गतः । उड़ते समय गरुड़ पर्वतोंके शिखर तोड़ डालते थे, पेड़ोंको उखाड़ फेंकते थे और
ज्योतिष्पथ ( आकाश) में चलते समय बड़े - बड़े बादलोंको अपने साथ उड़ा ले जाते थे ।
ग्रहनक्षत्रताराणां सप्तर्षीणां स्वतेजसा ॥
प्रभाजालमतिक्रम्य चन्द्रसूर्यपथं ययौ । वे अपने तेजसे ग्रह, नक्षत्र, तारों और सप्तर्षियोंके प्रकाशपुंजको तिरस्कृत करते हुए
चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे ।
मेरोः शिखरमासाद्य मध्यमं मधुसूदनः ॥
देवस्थानानि सर्वाणि ददर्श भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मधुसूदनने मेरुपर्वतके मध्यम शिखरपर पहुँचकर समस्त
देवताओंके निवासस्थानोंका दर्शन किया ।
विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च युधिष्ठिर ॥
भ्राजमानान्यतिक्रम्य अश्विनोश्च परंतप ।
प्राप्य पुण्यतमं स्थानं देवलोकमरिंदमः ॥
युधिष्ठिर! उन्होंने विश्वेदेवों, मरुद्गणों और साध्योंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँघकर अश्विनीकुमारोंके पुण्यतम लोकमें पदार्पण किया । परंतप! तत्पश्चात् शत्रुहन्ता भगवान् श्रीकृष्ण देवलोक में जा पहुँचे ।
शक्रसद्म समासाद्य चावरुह्य जनार्दनः ।
सोऽभिवाद्यादितेः पादावर्चितः सर्वदैवतैः ॥
ब्रह्मदक्षपुरोगैश्च प्रजापतिभिरेव च ।
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इन्द्रभवनके निकट जाकर भगवान् जनार्दन गरुड़परसे उतर पड़े । वहाँ उन्होंने देवमाता अदितिके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर ब्रह्मा और दक्ष आदि प्रजापतियोंने तथा सम्पूर्ण
देवताओंने उनका भी स्वागत- सत्कार किया ।
अदितेः कुण्डले दिव्ये ददावथ तदा विभुः ॥
रत्नानि च परार्घ्याणि रामेण सह केशवः । उस समय बलरामसहित भगवान् केशवने माता अदितिको दोनों दिव्य कुण्डल और
बहुमूल्य रत्न भेंट किये ।
प्रतिगृह्य च तत् सर्वमदितिर्वासवानुजम् ॥
पूजयामास दाशार्हं रामं च विगतज्वरा । वह सब ग्रहण करके माता अदितिका मानसिक दुःख दूर हो गया और उन्होंने इन्द्रके
छोटे भाई यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण और बलरामका बहुत आदर- सत्कार किया ।
शची महेन्द्रमहिषी कृष्णस्य महिषीं तदा ॥
सत्यभामां तु संगृह्य अदित्यै वै न्यवेदयत् । इन्द्रकी महारानी शचीने उस समय भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानी सत्यभामाका हाथ
पकड़कर उन्हें माता अदितिकी सेवामें पहुँचाया ।
सा तस्याः सत्यभामायाः कृष्णप्रियचिकीर्षया ॥
वरं प्रादाद् देवमाता सत्यायै विगतज्वरा । देवमाताकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी । उन्होंने श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सत्यभामाको उत्तम वर प्रदान किया । अदितिरुवाच जरां न यास्यसि वधूर्यावद् वै कृष्णमानुषम् ॥ सर्वगन्धगुणोपेता भविष्यसि वरानने । अदिति बोलीं- सुन्दर मुखवाली बहू! जबतक श्रीकृष्ण मानव- शरीरमें रहेंगे, तबतक तू वृद्धावस्थाको प्राप्त न होगी और सब प्रकारकी दिव्य सुगन्ध एवं उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती रहेगी । भीष्म उवाच विहृत्य सत्यभामा वै सह शच्या सुमध्यमा ॥ शच्यापि समनुज्ञाता ययौ कृष्णनिवेशनम् ॥ भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सुन्दरी सत्यभामा शचीदेवीके साथ घूम--फिरकर उनकी आज्ञा ले भगवान् श्रीकृष्णके विश्रामगृहमें चली गयीं ।
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैर्महर्षिगणसेवितः ।
द्वारकां प्रययौ कृष्णो देवलोकादरिंदमः ॥
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तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण महर्षियोंसे सेवित और देवताओंद्वारा पूजित होकर देवलोकसे द्वारकाको चले गये ।
सोऽतिपत्य महाबाहुर्दीर्घमध्वानमच्युतः ।
वर्धमानपुरद्वारमाससाद पुरोत्तमम् ॥
महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण लंबा मार्ग तय करके उत्तम द्वारका नगरीमें, जिसके प्रधान द्वारका नाम वर्धमान था, जा पहुँचे । ( दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[ द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश ] भीष्म उवाच
तां पुरीं द्वारकां दृष्ट्वा विभुर्नारायणो हरिः ।
हृष्टः सर्वार्थसम्पन्नां प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सर्वव्यापी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने सब प्रकारके मनोवांछित पदार्थोंसे भरी- पूरी द्वारकापुरीको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसमें प्रवेश करनेकी तैयारी की ।
सोऽपश्यद् वृक्षषण्डांश्च रम्यानारामजान् बहून् ।
समन्ततो द्वारवत्यां नानापुष्पफलान्वितान् ॥
उन्होंने देखा, द्वारकापुरीके सब ओर बगीचोंमें बहुत - से रमणीय वृक्षसमूह शोभा पा रहे हैं, जिनमें नाना प्रकारके फल और फूल लगे हुए हैं ।
अर्कचन्द्रप्रतीकाशैर्मेरुकुटनिभैर्गृहैः ।
द्वारका रचिता रम्यैः सुकृता विश्वकर्मणा ॥
वहाँके रमणीय राजसदन सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा मेरुपर्वतके शिखरोंकी भाँति गगनचुम्बी थे । उन भवनोंसे विभूषित द्वारकापुरीकी रचना साक्षात् विश्वकर्माने की थी ।
पद्मषण्डाकुलाभिश्च हंससेवितवारिभिः ।
गङ्गासिन्धुप्रकाशाभिः परिखाभिरलंकृता ॥
उस पुरीके चारों ओर बनी हुई चौड़ी खाइयाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । उनमें कमलके फूल खिले हुए थे । हंस आदि पक्षी उनके जलका सेवन करते थे । वे देखनेमें गंगा और सिन्धुके समान जान पड़ती थीं ।
प्राकारेणार्कवर्णेन पाण्डरेण विराजिता ।
वियन्मूर्ध्नि निविष्टेन द्यौरिवाभ्रपरिच्छदा ॥
सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाली ऊँची गगनचुम्बिनी श्वेत चहारदीवारीसे सुशोभित द्वारकापुरी सफेद बादलोंसे घिरी हुई देवपुरी ( अमरावती ) के समान जान पड़ती थी ।
नन्दनप्रतिमैश्चापि मिश्रकप्रतिमैर्वनैः ।
भाति चैत्ररथं दिव्यं पितामहवनं यथा ॥
वैभ्राजप्रतिमैश्चैव सर्वर्तुकुसुमोत्कटैः । भाति तारापरिक्षिप्ता द्वारका द्यौरिवाम्बरे । नन्दन और मिश्रक- जैसे वन उस पुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे । वहाँका दिव्य चैत्ररथ वन ब्रह्माजीके अलौकिक उद्यानकी भाँति शोभित था । सभी ऋतुओंके फूलोंसे भरे हुए वैभ्राज
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नामक वनके सदृश मनोहर उपवनोंसे घिरी हुई द्वारकापुरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त स्वर्गपुरी शोभा पा रही हो ।
भाति रैवतकः शैलो रम्यसानुर्महाजिरः ।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां द्वारकायां विभूषणम् ॥
रमणीय द्वारकापुरीकी पूर्वदिशामें महाकाय रैवतक पर्वत, जो उस पुरीका आभूषणरूप था, सुशोभित हो रहा था । उसके शिखर बड़े मनोहर थे ।
दक्षिणस्यां लतावेष्टः पञ्चवर्णो विराजते ।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशः पश्चिमां दिशमाश्रितः ॥
सुकक्षो राजतः शैलश्चित्रपुष्पमहावनः ।
उत्तरस्यां दिशि तथा वेणुमन्तो विराजते ॥
मन्दराद्रिप्रतीकाशः पाण्डरः पाण्डवर्षभ । पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज - सा प्रतीत होता था। पश्चिमदिशामें सुकक्ष नामक रजत- पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित महान् वन शोभा पा रहा था । पाण्डवश्रेष्ठ! इसी प्रकार
उत्तरदिशामें मन्दराचलके सदृश श्वेत वर्णवाला वेणुमन्त पर्वत शोभायमान था ।
चित्रकम्बलवर्णाभं पाञ्चजन्यवनं तथा ॥
सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति । रैवतक पर्वतके पास चित्रकम्बलके से वर्णवाले पांचजन्यवन तथा सर्वर्तुकवनकी भी
बड़ी शोभा होती थी ।
लतावेष्टं समन्तात् तु मेरुप्रभवनं महत् ॥
भाति तालवनं चैव पुष्पकं पुण्डरीकवत् । लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान् वन, तालवन तथा कमलोंसे
सुशोभित पुष्पकवन शोभा पा रहे हैं ।
सुकक्षं परिवार्यैनं चित्रपुष्पं महावनम् ॥
शतपत्रवनं चैव करवीरकुसुम्भि च । सुकक्ष पर्वतको चारों ओरसे घेरकर चित्रपुष्प नामक महावन, शतपत्रवन, करवीरवन
और कुसुम्भवन सुशोभित होते हैं ।
भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च महावनम् ॥
रमणं भावनं चैव वेणुमन्तं समन्ततः । वेणुमन्त पर्वतके सब ओर चैत्ररथ, नन्दन, रमण और भावन नामक महान् वन शोभा
पाते हैं ।
भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ॥
धनुः शतपरीणाहा केशवस्य महात्मनः ।
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भारत! महात्मा केशवकी उस पुरीमें पूर्वदिशाकी ओर एक रमणीय पुष्करिणी शोभा पाती है, जिसका विस्तार सौ धनुष है ।
महापुरीं द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्मुखैर्युताम् ।
प्रविष्टो द्वारकां रम्यां भासयन्तीं समन्ततः ॥
पचास दरवाजोंसे सुशोभित और सब ओरसे प्रकाशमान उस सुरम्य महापुरी द्वारकामें श्रीकृष्णने प्रवेश किया ।
अप्रमेयां महोत्सेधां महागाधपरिप्लवाम् ।
प्रासादवरसम्पन्नां श्वेतप्रासादशालिनीम् ॥
वह कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था । उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी । वह पुरी चारों ओर अत्यन्त अगाध जलराशिसे घिरी हुई थी । सुन्दर- सुन्दर महलोंसे भरी हुई द्वारका श्वेत अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी ।
तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैः समन्विताम् ।
आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
तीखे यन्त्र, शतघ्नी, विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े - बड़े चक्रोंसे सुरक्षित द्वारकापुरीको भगवान्ने देखा ।
अष्टौ रथसहस्राणि प्राकारे किङ्किणीकिनः ।
समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥
देवपुरीकी भाँति उसकी चहारदीवारीके निकट क्षुद्रघण्टिकाओंसे सुशोभित आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें पताकाएँ फहराती रहती थीं ।
अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् ।
द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन है एवं लम्बाई बारह योजन है अर्थात् वह कुल ९ ६ योजन विस्तृत है । उसका उपनिवेश ( समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् १ ९ २ योजन विस्तृत है । वह पुरी सब प्रकारसे अविचल है । श्रीकृष्णने उस पुरीको देखा ।
अष्टमार्गां महाकक्ष्यां महाषोडशचत्वराम् ।
एवं मार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥
उसमें जानेके लिये आठ मार्ग हैं, बड़ी - बड़ी ड्योढ़ियाँ हैं और सोलह बड़े - बड़े चौराहे हैं । इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिष्कृत द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी है ।
व्यूहानामन्तरा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ।
तत्र सा विहिता साक्षान्नगरी विश्वकर्मणा ॥
व्यूहोंके बीच - बीचमें मार्ग बने हैं, सात बड़ी - बड़ी सड़कें हैं । साक्षात् विश्वकर्माने इस द्वारकानगरीका निर्माण किया है ।
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काञ्चनैर्मणिसोपानैरुपेता जनहर्षिणी ।
गीतघोषमहाघोषैः प्रासादप्रवरैः शुभा ॥
सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे सुशोभित यह नगरी जन -जनको हर्ष प्रदान करनेवाली है । यहाँ गीतके मधुर स्वर तथा अन्य प्रकारके घोष गूँजते रहते हैं । बड़ी- बड़ी अट्टालिकाओंके कारण वह पुरी परम सुन्दर प्रतीत होती है ।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम् ।
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा भगवान् पाकशासनः ॥
नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकामें यशस्वी दशार्हवंशियोंके महल देखकर भगवान् पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई ।
समुच्छ्रितपताकानि पारिप्लवनिभानि च ।
काञ्चनाभानि भास्वन्ति मेरुकूटनिभानि च ॥
उन महलोंके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं । वे मनोहर भवन मेघोंके समान जान पड़ते थे और सुवर्णमय होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान थे । वे मेरुपर्वतके उत्तुंग शिखरोंके समान आकाशको चूम रहे थे ।
सुधापाण्डरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिच्छदैः ।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैः सर्वरत्नविभूषितैः ॥
उन गृहोंके शिखर चूनेसे लिपे -पुते और सफेद थे । उनकी छतें सुवर्णकी बनी हुई थीं । वहाँके शिखर, गुफा और शृंग — सभी रत्नमय थे । उस पुरीके भवन सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे ।
सहर्म्येः सार्धचन्द्रैश्च सनिर्यूहैः सपञ्जरैः ।
सयन्त्रगृहसम्बाधैः सधातुभिरिवाद्रिभिः ॥
( भगवान्ने देखा ) वहाँ बड़े -बड़े महल, अटारी तथा छज्जे हैं और उन छज्जोंमें लटकते हुए पक्षियोंके पिंजड़े शोभा पाते हैं । कितने ही यन्त्रगृह वहाँके महलोंकी शोभा बढ़ाते हैं । अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित होनेके कारण द्वारकाके भवन विविध धातुओंसे विभूषित पर्वतोंके समान शोभा धारण करते हैं
मणिकाञ्चनभौमैश्च सुधामृष्टतलैस्तथा ।
जाम्बूनदमयैद्वरिर्वैडूर्यविकृतार्गलैः ॥
कुछ गृह तो मणिके बने हैं, कुछ सुवर्णसे तैयार किये गये हैं और कुछ पार्थिव पदार्थों ( ईंट, पत्थर आदि ) द्वारा निर्मित हुए हैं । उन सबके निम्नभाग चूनेसे स्वच्छ किये गये हैं । उनके दरवाजे ( चौखट-किंवाड़े) जाम्बूनद सुवर्णके बने हैं और अर्गलाएँ ( सिटकनियाँ) वैदूर्यमणिसे तैयार की गयी हैं ।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शेर्महाधनपरिच्छदैः ।
रम्यसानुगुहाशृङ्गैर्विचित्रेरिव पर्वतैः ॥
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उन गृहोंका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है । वे सभी बहुमूल्य सामानोंसे भरे हैं । उनकी समतल भूमि, गुफा और शिखर सभी अत्यन्त मनोहर हैं । इससे उन भवनोंकी शोभा विचित्र पर्वतोंके समान जान पड़ती है ।
पञ्चवर्णसुवर्णैश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभैः ।
तुल्यपर्जन्यनिर्घोषैर्नानावर्णैरिवाम्बुदैः ॥
उन गृहोंमें पाँच रंगोंके सुवर्ण मढ़े गये हैं । उनसे जो बहुरंगी आभा फैलती है, वह फुलझड़ी - सी जान पड़ती है। उन गृहोंसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द होते रहते हैं । वे देखनेमें अनेक वर्णोंके बादलोंके समान जान पड़ते हैं ।
महेन्द्रशिखरप्रख्यैर्विहितैर्विश्वकर्मणा ।
आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरैः ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए वे ( ऊँचे और विशाल) भवन महेन्द्र पर्वतके शिखरोंकी शोभा धारण करते हैं । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो वे आकाशमें रेखा खींच रहे हों । उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर है ।
तैर्दाशार्हमहाभागैर्बभासे भवनद्वदैः ।
चण्डनागाकुलैर्घोरैर्हृदै भगवती यथा ॥
जैसे भोगवती गंगा प्रचण्ड नागगणोंसे भरे हुए भयंकर कुण्डोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी दशार्हकुलके महान् सौभाग्यशाली पुरुषोंसे भरे हुए उपर्युक्त भवनरूपी ह्रदोंके द्वारा शोभा पा रही है ।
कृष्णध्वजोपवाह्यैश्च दाशार्हायुधरोहितैः ।
वृष्णिमत्तमयूरैश्च स्त्रीसहस्रप्रभाकुलैः ॥
वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गृहमेघैरलङ्कृता । ददृशे द्वारकातीव मेघैर्द्यौरिव संवृता । जैसे आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित होता है, उसी प्रकार द्वारकापुरी मनोहर भवनरूपी मेघोंसे अलंकृत दिखायी देती है । ये भगवान् श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्य (प्रमुख मेघ ) के समान हैं । वृष्णिवंशी युवक मतवाले मयूरोंके समान उन भवनरूपी मेघोंको देखकर हर्षसे नाच उठते हैं । सहस्रों स्त्रियोंकी कान्ति विद्युत्की प्रभाके समान उनमें व्याप्त है । जैसे मेघ कृष्णध्वज ( अग्नि या सूर्यकिरण) के उपबाह्य ( आधेय अथवा कार्य) हैं, उसी प्रकार द्वारकाके भवन भी कृष्णध्वजसे विभूषित उपबाह्य (वाहनों ) -से सम्पन्न हैं । यदुवंशियोंके विविध प्रकारके अस्त्र - शस्त्र उन मेघसदृश महलोंमें इन्द्रधनुषकी बहुरंगी छटा
छिटकाते हैं ।
साक्षाद् भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ॥
ददृशुर्देवदेवस्य चतुर्योजनमायतम् ।
तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयं महाधनैः ॥