श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1951–1960

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960

पृष्ठ 1951

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प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः । भारत! देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका भवन, जिसे साक्षात् विश्वकर्माने अपने हाथों बनाया है, चार योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता है । उसमें कितनी बहुमूल्य सामग्रियाँ लगी हैं! इसका अनुमान लगाना असम्भव है । उस विशाल भवनके भीतर सुन्दर- सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। वह प्रासाद जगत्के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त

है । श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्रने उस द्वारकाको देखा ।

यं चकार महाबाहुस्त्वष्टा वासवचोदितः ॥

प्रासादं पद्मनाभस्य सर्वतो योजनायतम् ।

मेरोरिव गिरेः शृङ्गमुच्छ्रितं काञ्चनायुतम् ।

रुक्मिण्याः प्रवरो वासो विहितः सुमहात्मना ॥

महाबाहु विश्वकर्माने इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् पद्मनाभके लिये जिस मनोहर प्रासादका निर्माण किया है, उसका विस्तार सब ओरसे एक-एक योजनका है । उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया है, जिससे वह मेरुपर्वतके उत्तुंग शृंगकी शोभा धारण कर रहा है। वह प्रासाद महात्मा विश्वकर्माने महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया है । यह उनका सर्वोत्तम निवास है ।

सत्यभामा पुनर्वेश्म सदा वसति पाण्डरम् ।

विचित्रमणिसोपानं यं विदुः शीतवानिति ॥

श्रीकृष्णकी दूसरी पटरानी सत्यभामा सदा श्वेत- रंगके प्रासादमें निवास करती हैं, जिसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये हैं । उसमें प्रवेश करनेपर लोगोंको ( ग्रीष्म-ऋतुमें

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भी ) शीतलताका अनुभव होता है ।

विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।

व्यक्तबद्धं वनोद्देशे चतुर्दिशि महाध्वजम् ॥

निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती हैं । एक सुन्दर उद्यानमें उस भवनका निर्माण किया गया है । उसके चारों ओर ऊँची - ऊँची ध्वजाएँ फहराती रहती हैं ।

स च प्रासादमुख्योऽत्र जाम्बवत्या विभूषितः ।

प्रभया भूषणैश्चित्रैस्त्रैलोक्यमिव भासयन् ॥

यस्तु पाण्डरवर्णाभस्तयोरन्तरमाश्रितः ।

विश्वकर्माकरोदेनं कैलासशिखरोपमम् ॥

इसके सिवा वह प्रमुख प्रासाद, जो रुक्मिणी तथा सत्यभामाके महलोंके बीचमें पड़ता है और जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली रहती है, जाम्बवतीदेवीद्वारा विभूषित किया गया है । वह अपनी दिव्य प्रभा और विचित्र सजावटसे मानो तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा है । उसे भी विश्वकर्माने ही बनाया है। जाम्बवतीका वह विशाल भवन कैलास - शिखरके समान सुशोभित होता है ।

जाम्बूनदप्रदीप्ताग्रः प्रदीप्तज्वलनोपमः ।

सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः ॥

तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी ।

सुकेशी नाम विख्याता केशवेन निवेशिता ॥

जिसका दरवाजा जाम्बूनद सुवर्णके समान उद्दीप्त होता है, जो देखनेमें प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता है । विशालतामें समुद्रसे जिसकी उपमा दी जाती है, जो मेरुके नामसे विख्यात है, उस महान् प्रासादमें गान्धारराजकी कुलीन कन्या सुकेशीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया है ।

पद्मकूट इति ख्यातः पद्मवर्णो महाप्रभः ।

सुप्रभाया महाबाहो निवासः परमार्चितः ॥

महाबाहो! पद्मकूट नामसे विख्यात जो कमलके समान कान्तिवाला प्रासाद है, वह महारानी सुप्रभाका परम पूजित निवासस्थान है ।

यस्तु सूर्यप्रभो नाम प्रासादवर उच्यते ।

लक्ष्मणायाः कुरुश्रेष्ठ स दत्तः शार्ङ्गधन्वना ॥

कुरुश्रेष्ठ! जिस उत्तम प्रासादकी प्रभा सूर्यके समान है, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने महारानी लक्ष्मणाको दे रखा है । वैडूर्यवरवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः । यं विदुः सर्वभूतानि हरिरित्येव भारत ।

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वासः स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितः ॥ महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम् । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान् हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको ' श्रीहरि' ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है । उसकी देवगण भी सराहना करते हैं । भगवान् वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका

आभूषणरूप है ।

यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितः सर्वशिल्पिभिः ॥

अतीव रम्यः सोऽप्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति ।

सुदत्तायाः सुवासस्तु पूजितः सर्वशिल्पिभिः ॥

महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है । वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता- सा खड़ा है । सभी शिल्पी उसके निर्माण - कौशलकी सराहना करते हैं । उस प्रासादका नाम है केतुमान्। वह भगवान् वासुदेवकी महारानी

सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है ।

प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मनः ॥

उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मनः । वहीं ‘ विरज ’ नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य

है । वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह ( खास रहनेका स्थान ) है ।

यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम् ॥

योजनायतविष्कुम्भं सर्वरत्नमयं विभोः । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है । उसकी लंबाई - चौड़ाई एक- एक योजनकी है । भगवान्‌का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है।

तेषां तु विहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः ।

सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजाः ॥

वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं । उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं ।

घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने ।

आहृत्य यदुसिंहेन वैजयन्त्यचलो महान् ॥

द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है । यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है ।

हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्द्रद्युम्नसरो महत् ।

षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनविस्तृतम् ॥

पृष्ठ 1954

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वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है । वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है ।

सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजसः ।

पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

वहाँ सब भूतोंके देखते - देखते किन्नरोंके संगीतका महान् शब्द होता रहता है । वह भी अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है । उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है ।

आदित्यपथगं यत् तन्मेरोः शिखरमुत्तमम् ।

जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

तदप्युत्पाट्य कृच्छ्रेण स्वं निवेशनमाहृतम् ।

भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिविभूषितम् ॥

मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान् श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं । सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत् प्रकाशित है ।

यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतपः ।

पारिजातः स तत्रैव केशवेन निवेशितः ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह

पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है ।

विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमाः ॥

शालतालाश्वकर्णाश्चशतशाखाश्च रोहिणाः ।

भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पकाः ॥

खर्जूराः केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिताः । भगवान् वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े - बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है । साल, ताल, अश्वकर्ण ( कनेर ), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्लातक ( भिलावा ), कपित्थ ( कैथ ), चन्द्र ( बड़ी इलायचीके ) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक ( केवड़ा ) —ये वृक्ष वहाँ सब

ओर लगाये गये थे ।

पद्माकुलजलोपेता रक्ताः सौगन्धिकोत्पलाः ॥

मणिमौक्तिकवालूकाः पुष्करिण्यः सरांसि च ।

तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ॥

द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं । उनकी आभा लाल रंगकी है । उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं । उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण- जैसे जान पड़ते हैं । वहाँ लगाये हुए बड़े - बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा ।

पृष्ठ 1955

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आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ॥ जो वृक्ष हिमालयपर उगते हैं तथा जो नन्दनवनमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी यदुप्रवर श्रीकृष्णने वहाँ लाकर लगाया है ।

रक्तपीतारुणप्रख्याः सितपुष्पाश्च पादपाः ।

सर्वर्तुफलपूर्णास्ते तेषु काननसंधिषु ॥

कोई वृक्ष लाल रंगके हैं, कोई पीत वर्णके हैं और कोई अरुण कान्तिसे सुशोभित हैं तथा बहुत - से वृक्ष ऐसे हैं, जिनमें श्वेत रंगके पुष्प शोभा पाते हैं । द्वारकाके उपवनोंमें लगे हुए पूर्वोक्त सभी वृक्ष सम्पूर्ण ऋतुओंके फलोंसे परिपूर्ण हैं ।

सहस्रपत्रपद्माश्च मन्दराश्च सहस्रशः ।

अशोकाः कर्णिकाराश्च तिलका नागमल्लिकाः ॥

कुरवा नागपुष्पाश्च चम्पकास्तृणगुल्मकाः ।

सप्तपर्णाः कदम्बाश्च नीपाः कुरबकास्तथा ॥

केतक्यः केसराश्चैव हिन्तालतलताटकाः ।

तालाः प्रियङ्गुवकुलाः पिण्डिका बीजपूरकाः ॥

द्राक्षामलकखर्जूरा मृद्वीका जम्बुकास्तथा ।

आम्राः पनसवृक्षाश्च अङ्कोलास्तिलतिन्दुकाः ॥

लिकुचाम्रातकाश्चैव क्षीरिका कण्टकी तथा ।

नालिकेरेङ्गदाश्चैव उत्क्रोशकवनानि च ॥

वनानि च कदल्याश्च जातिमल्लिकपाटलाः ।

भल्लातककपित्थाश्च तैतभा बन्धुजीवकाः ॥

प्रवालाशोककाश्मर्यः प्राचीनाश्चैव सर्वशः ।

प्रियङ्गबदरीभिश्च यवैः स्पन्दनचन्दनैः ॥

शमीबिल्वपलाशैश्च पाटलावटपिप्पलैः ।

उदुम्बरैश्च द्विदलैः पालाशैः पारिभद्रकैः ॥

इन्द्रवृक्षार्जुनैश्चैव अश्वत्थेश्चिरिबिल्वकैः ।

सौभञ्जनकवृक्षैश्च भल्लटैरश्वसाह्वयैः ॥

सर्जेस्ताम्बूलवल्लीभिर्लवङ्गैः क्रमुकैस्तथा ।

वंशैश्च विविधैस्तत्र समन्तात् परिरोपितैः ॥

सहस्रदल कमल, सहस्रों मन्दार, अशोक, कर्णिकार, तिलक, नागमल्लिका, कुरव ( कटसरैया ), नागपुष्प, चम्पक, तृण, गुल्म, सप्तपर्ण (छितवन), कदम्ब, नीप, कुरबक, केतकी, केसर, हिंताल, तल, ताटक, ताल, प्रियंगु, वकुल ( मौलसिरी ), पिण्डिका, बीजपूर ( बिजौरा ), दाख, आँवला, खजूर, मुनक्का, जामुन, आम, कटहल, अंकोल, तिल, तिन्दुक, लिकुच ( लीची ), आमड़ा, क्षीरिका ( काकोली नामकी जड़ी या पिंडखजूर ), करटकी ( बेर),

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नारियल, इंगुद ( हिंगोट), उत्क्रोशकवन, कदलीवन, जाति ( चमेली ), मल्लिका ( मोतिया ), पाटल, भल्लातक, कपित्थ, तैतभ, बन्धुजीव ( दुपहरिया ), प्रवाल, अशोक और काश्मरी ( गाँभारी ) आदि सब प्रकारके प्राचीन वृक्ष, प्रियंगुलता, बेर, जौ, स्पन्दन, चन्दन, शमी, बिल्व, पलाश, पाटला, बड़, पीपल, गूलर, द्विदल, पालाश, पारिभद्रक, इन्द्रवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, अश्वत्थ, चिरिबिल्व, सौभंजन, भल्लट, अश्वपुष्प, सर्ज, ताम्बूललता, लवंग, सुपारी तथा नाना प्रकारके बाँस — ये सब द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णभवनके चारों ओर लगाये हैं ।

ये च नन्दनजा वृक्षा ये च चैत्ररथे वने ।

सर्वे ते यदुनाथेन समन्तात् परिरोपिताः ॥

नन्दनवनमें और चैत्ररथवनमें जो - जो वृक्ष होते हैं, वे सभी यदुपति भगवान् श्रीकृष्णने लाकर यहाँ सब ओर लगाये हैं ।

कुमुदोत्पलपूर्णाश्च वाप्यः कूपाः सहस्रशः ।

समाकुलमहावाप्यः पीता लोहितवालुकाः ॥

भगवान् श्रीकृष्णके गृहोद्यानमें कुमुद और कमलोंसे भरी हुई कितनी ही छोटी बावलियाँ हैं । सहस्रों कुएँ बने हुए हैं । जलसे भरी हुई बड़ी - बड़ी वापिकाएँ भी तैयार करायी गयी हैं, जो देखनेमें पीत वर्णकी हैं और जिनकी बालुकाएँ लाल हैं ।

तस्मिन् गृहवने नद्यः प्रसन्नसलिला ह्रदाः ।

फुल्लोत्पलजलोपेता नानाद्रुमसमाकुलाः ॥

उनके गृहोद्यानमें स्वच्छ जलसे भरे हुए कुण्डवाली कितनी ही कृत्रिम नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं, जो प्रफुल्ल उत्पलयुक्त जलसे परिपूर्ण हैं तथा जिन्हें दोनों ओरसे अनेक प्रकारके वृक्षोंने घेर रखा है ।

तस्मिन् गृहवने नद्यो मणिशर्करवालुकाः ।

मत्तबर्हिणसङ्घाश्च कोकिलाश्च मदोद्वहाः ॥

उस भवनके उद्यानकी सीमामें मणिमय कंकड़ और बालुकाओंसे सुशोभित नदियाँ निकाली गयी हैं, जहाँ मतवाले मयूरोंके झुंड विचरते हैं और मदोन्मत्त कोकिलाएँ कुहू कुहू किया करती हैं ।

बभूवुः परमोपेताः सर्वे जगतिपर्वताः ।

तत्रैव गजयूथानि तत्र गोमहिषास्तथा ॥

निवासाश्च कृतास्तत्र वराहमृगपक्षिणाम् । उस गृहोद्यानमें जगत्के सभी श्रेष्ठ पर्वत अंशतः संगृहीत हुए हैं । वहाँ हाथियोंके यूथ तथा गाय - भैंसोंके झुंड रहते हैं । वहीं जंगली सूअर, मृग और पक्षियोंके रहनेयोग्य

निवासस्थान भी बनाये गये हैं ।

विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥

व्यक्तं किष्कुशतोद्यामः सुधाकरसमप्रभः ।

पृष्ठ 1957

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विश्वकर्माद्वारा निर्मित पर्वतमाला ही उस विशाल भवनकी चहारदीवारी है । उसकी

ऊँचाई सौ हाथकी है और वह चन्द्रमाके समान अपनी श्वेत छटा छिटकाती रहती है ।

तेन ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ॥

परिक्षिप्तानि हर्म्यस्य वनान्युपवनानि च । पूर्वोक्त बड़े -बड़े पर्वत, सरिताएँ, सरोवर और प्रासादके समीपवर्ती वन - उपवन इस

चहारदीवारीसे घिरे हुए हैं ।

एवं तच्छिल्पिवर्येण विहितं विश्वकर्मणा ॥

प्रविशन्नेव गोविन्दो ददर्श परितो मुहुः । इस प्रकार शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माद्वारा बनाये हुए द्वारकानगरमें प्रवेश करते समय भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार सब ओर दृष्टिपात किया । इन्द्रः सहामरैः श्रीमांस्तत्र तत्रावलोकयत् । देवताओंके साथ श्रीमान् इन्द्रने वहाँ द्वारकाको सब ओर दृष्टि दौड़ाते हुए देखा ।

एवमालोकयांचक्रुर्द्वारकामृषभास्त्रयः ।

उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः ॥

इस प्रकार उपेन्द्र ( श्रीकृष्ण ), बलराम तथा महायशस्वी इन्द्र इन तीनों श्रेष्ठ महापुरुषोंने

द्वारकापुरीकी शोभा देखी ।

ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ॥

प्रीतः शङ्खमुपादध्मौ विद्विषां रोमहर्षणम् । तदनन्तर गरुडके ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक श्वेतवर्णवाले अपने

उस पांचजन्य शंखको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला है ।

तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चुक्षुभे भृशम् ॥

ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत् तदा । उस घोर शंखध्वनिसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सारा आकाशमण्डल गूँजने लगा ।

उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई ।

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धकाः ॥

विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् । पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुडका दर्शन कर कुकुर और अन्धकवंशी

यादव शोकरहित हो गये ।

शङ्खचक्रगदापाणिं सुपर्णशिरसि स्थितम् ॥

दृष्ट्वा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम् । भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे । वे गरुडके ऊपर बैठे थे । उनका तेज सूर्योदयके समान नूतन चेतना और उत्साह पैदा करनेवाला था । उन्हें देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ ।

पृष्ठ 1958

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ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीनां च महास्वनः ॥ सिंहनादश्च सञ्जज्ञे सर्वेषां पुरवासिनाम् । तदनन्तर तुरही और भेरियाँ बज उठीं । उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी । समस्त

पुरवासी भी सिंहनाद कर उठे ।

ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ॥

प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् । उस समय दाशार्ह, कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन

करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये ।

वासुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशंखरवैः सह ॥

उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम् । राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके वेणुनाद और शंखध्वनिके साथ उनके

महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये ।

आनन्दितुं पर्यचरन् स्वेषु वेश्मसु देवकी ॥

रोहिणी च यथोद्देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः । देवकी, रोहिणी तथा उग्रसेनकी स्त्रियाँ अपने - अपने महलोंमें भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये यथास्थान खड़ी थीं । पास आनेपर उन सबने उनका यथावत्

सत्कार किया ।

हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः ॥

एवमुक्तः स ह स्त्रीभिरीक्षितो मधुसूदनः । वे आशीर्वाद देती हुई इस प्रकार बोलीं- ' समस्त ब्राह्मणद्वेषी असुर मारे गये; अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सर्वत्र विजयी हो रहे हैं । ' स्त्रियोंने भगवान् मधुसूदनसे ऐसा कहकर

उनकी ओर देखा ।

ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात् ॥

चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम् । तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुडके द्वारा ही अपने महलमें गये । वहाँ उन परमेश्वरने एक

उपयुक्त स्थानमें मणिपर्वतको स्थापित कर दिया ।

ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः ॥

निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः । इसके बाद कमलनयन मधुसूदनने सभाभवनमें धन और रत्नोंको रखकर मन- ही - मन

पिताके दर्शनकी अभिलाषा की ।

ततः सान्दीपनिं पूर्वमुपस्पृष्ट्वा महायशाः ॥

ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महाभुजः ।

पृष्ठ 1959

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फिर विशाल एवं कुछ लाल नेत्रोंवाले उन महायशस्वी महाबाहुने पहले मन- ही-मन गुरु

सान्दीपनिके चरणोंका स्पर्श किया ।

तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दगतचेतसम् ॥

ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः । तत्पश्चात् भाई बलरामजीके साथ जाकर श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम किया । उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय

आनन्दके समुद्रके निमग्न हो गया ।

रामकृष्णौ समाश्लिष्य सर्वे चान्धकवृष्णयः ॥

अन्धक और वृष्णिवंशके सब लोगोंने बलराम और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया ।

तं तु कृष्णः समाहृत्य रत्नौघधनसंचयम् ॥

व्यभजत् सर्ववृष्णिभ्य आदध्वमिति चाब्रवीत् । भगवान् श्रीकृष्णने रत्न और धनकी उस राशिको एकत्र करके अलग - अलग बाँट दिया

और सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंसे कहा — ' यह सब आपलोग ग्रहण करें ' ।

यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान् यदुनन्दनः ॥

सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः ।

ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च ॥

व्यभजत् तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः । तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने यदुवंशियोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, उन सबसे क्रमशः मिलकर सब यादवोंको नाम ले - लेकर बुलाया और उन सबको वे सभी रत्नमय धन पृथक्- पृथक् बाँट दिये । सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रमुखैः सह ॥ शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहेरिव गिरेर्गुहा । जैसे पर्वतकी कन्दरा सिंहोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी उस समय भगवान् श्रीकृष्ण, देवराज इन्द्र तथा वृष्णिवंशी वीर पुरुषसिंहोंसे अत्यन्त शोभा पा रही थी । अथासनगतान् सर्वानुवाच विबुधाधिपः ॥

शुभया हर्षयन् वाचा महेन्द्रस्तान् महायशाः ।

कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम् ॥

जब सभी यदुवंशी अपने - अपने आसनोंपर बैठ गये, उस समय देवताओंके स्वामी महायशस्वी महेन्द्र अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा कुकुर और अन्धक आदि यादवों तथा राजा उग्रसेनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले । इन्द्र उवाच यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ।

पृष्ठ 1960

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यत् कृतं वासुदेवेन तद् वक्ष्यामि समासतः ॥ इन्द्रने कहा — यदुवंशी वीरो! परमात्मा श्रीकृष्णका मनुष्य योनिमें जिस उद्देश्यको लेकर अवतार हुआ है और भगवान् वासुदेवने इस समय जो महान् पुरुषार्थ किया है, वह सब मैं संक्षेपमें बताऊँगा ।

अयं शतसहस्राणि दानवानामरिंदमः ।

निहत्य पुण्डरीकाक्षः पातालविवरं ययौ ॥

यच्च नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।

तदिदं शौरिणा वित्तं प्रापितं भवतामिह ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन श्रीहरिने एक लाख दानवोंका संहार करके उस पाताल- विवरमें प्रवेश किया था, जहाँ पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि दैत्य भी नहीं पहुँच सके थे । भगवान् आपलोगोंके लिये यह धन वहींसे लाये हैं । सपाशं मुरमाक्रम्य पाञ्चजन्यं च धीमता । शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भः सगणो हतः । बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पाशसहित मुर नामक दैत्यको कुचलकर पंचजन नामवाले राक्षसोंका विनाश किया और शिला - समूहोंको लाँघकर सेवकगणोंसहित निशुम्भको मौतके

घाट उतार दिया ।

हयग्रीवश्च विक्रान्तो निहतो दानवो बली ॥

मथितश्च मृधे भौमः कुण्डले चाहृते पुनः ।

प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद् यशः ॥

तत्पश्चात् इन्होंने बलवान् एवं पराक्रमी दानव हयग्रीवपर आक्रमण करके उसे मार गिराया और भौमासुरका भी युद्धमें संहार कर डाला । इसके बाद केशवने माता अदितिके कुण्डल प्राप्त करके उन्हें यथास्थान पहुँचाया और स्वर्गलोक तथा देवताओंमें अपने महान् यशका विस्तार किया ।

वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।

यजन्तु विविधैः सोमैर्मखैरन्धकवृष्णयः ॥

अन्धक और वृष्णिवंशके लोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेकर शोक, भय और बाधाओंसे मुक्त हैं। अब ये सभी नाना प्रकारके यज्ञों तथा सोमरसद्वारा भगवान्का यजन करें ।

पुनर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभिः सह ।

मन्मुखा हि गमिष्यन्ति साध्याश्च मधुसूदनम् ॥

अब पुनः बाणासुरके वधका अवसर उपस्थित होनेपर मैं तथा सब देवता, वसु और साध्यगण मधुसूदन श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित होंगे । भीष्म उवाच