श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 531–540
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 531–540
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दश अध्याय | ३६१ व्यापार न करे । ब्राह्मण किसान खेती करके तिल पैदा किये हो तो उसको चनादि के लिए वैन डाले । जो पुरुष भोजन, दान और स्नान के सिवा, दूसरे कामों में तिलका उपयोग करता है वह कोड़ा होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में डूबता है । मांस, लाख बेचनेथोर लोनसे तीनपॅचनेदिनमेंसे ब्राह्मणशुद्ध होजातातुरंत हैपतित॥ होजाता६३ ॥ है । ओर दूध रसा रसैर्निमातव्या न त्वेत्र लवणं रसैः । · कृतान्नं चाकृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः ॥ ६४ ॥
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः ।
न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ ६५ ॥
ऊपर गिनाये पदार्थों को छोड़कर दूसरे शास्त्र में निषिद्ध पदार्थों,,को यदि इच्छा से बेचता है तो वह सात रात्रि के बादवैश्यपने को पाता है । गुड़ श्रादि रसोंका घी आदि रसोंसे बदला करे, किन्तु लोन का रसों से बदला न करे । पका अन्न, कच्चा श्रन्न सेर तिल दूसरे अन्न से बदल लेवे । इन विधियों से आपत्ति में पढ़ा क्षत्रिय भी वैश्यवृत्ति से जीवन निर्वाह करे | परन्तु ब्राह्मण की जीविका से कभी जीविका न करे ॥ ६४-६५ ॥
यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः ।
तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ ६६ ॥
वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ।
परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पततिजातितः ॥ ६७ ॥
1वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् ।
नाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ ६८ ॥
अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्त्तुं द्विजन्मनाम्॥ ६६। ॥
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः
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३६२ मनुस्मृति |
यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः ।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१०० ॥
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्त्रेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्षितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाडू ब्राह्मणस्त्वनयं गतः ।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥
जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी- विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना धर्म किसी श्रंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म सर्वोग पूर्ण भी अच्छा नहीं | क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी वृति से जीविका न कर सके तो शुद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर सकता है । पर जूँठा खाना श्रादि न करे और दुःख के दिन यत जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शुद्ध द्विजोंकी सेवा न कर सके और उसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हो तो शिल्प कार्य से जीविका करे । जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में स्थित जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे । क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता । श्रापचिकाल में, निति को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और जल के समान पवित्र हैं ॥ ६६-९ ०३ ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥
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दशवां अध्याय | ३६३
श्रजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पट् वुभुक्षितः ।
न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ १०५ ॥
श्वमांसमिच्छन्नात्तो ऽतुं धर्माधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ॥ १०६ ॥
भरद्वाजः क्षुधार्तस्तु सपुत्रो विजने वने ।
बीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्ष्णो महातपाः ॥ १०७ ॥
क्षुधार्त्तश्चान्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् । + चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ॥ १०८ ॥
प्राणान्त दुःख न पड़कर, जो पुरुष मनमाना न खाता है, वद फीच से श्राकाश के समान, पाप से लिप्त नहीं होता । भूखसे दुःख श्रजीगर्त ऋषि ( सौ गो के लोभ से ) पुत्र मारने को तैयार हुए थे पर उन्हें दोष नहीं लगा । धर्माधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि क्षुधा से प्राणरक्षार्थ कुत्ता का मांस खाना चाहा । महातपस्वी भरद्वाज पुत्रसहित निर्जन वन में क्षुधा से पीड़ित होकर, वृधु- नामक बढ़ई से बहुत गो दान में लीथीं । धर्माधर्म के ज्ञाता, विश्वा मित्र भूख से दुःखी होकर, चाण्डाल के हाथ से कुत्ता की जाँघ
लेकर खाने को उद्यत हुए थे । १०४ - १०८ ॥
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प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि ।
प्रतिग्रहः प्रत्यंवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ॥ १०६ ॥
'याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम् ।
प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ॥ ११० ॥
होमैरपैत्येन याजनाध्यापनैः कृतम् ।
प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ॥ १११ ॥
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" ३६४ मनुस्मृति । बान लेना, यज्ञ कराना और वेद पढ़ाना इनमें दान लेना अधम है और ग्राह्मण को मृत्यु के बाद परलोक में दुःख देता है । क्योंकि याजन और अध्यापन संस्कार वालों को कराये जाते हैं । और प्रतिग्रह शुद्र से भी लिया जाता है । अनुचित-याजन श्रौर अध्यापन का पाप जप, होम से दूर होता है और प्रतिग्रह का पाप वस्तु के त्याग से या तप से दूर होता है ॥ १०६-१११ ॥
शिलोकमप्याददीत विनोऽजीवन्यतस्ततः ।
प्रतिग्रहाच्छिलः श्रेयस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते ॥ ११२॥
सीदद्भिः कुप्यमिच्छद्भिर्धनं वा पृथिवीपतिः ।
याच्यः स्यात्स्नातकैर्विप्रैरदित्संस्त्यागमर्हति ॥ ११३ ॥
अकृतं च कृतात्क्षेत्रागौरजाविकमेव च ।
हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्वं पूर्वमदोषवत् ॥ ११४ ॥
सप्तवित्तागमा धदायो लाभःक्रयो जयः ।
प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ११५ ॥
विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः ।
धृतिर्भीक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ ११६ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं चैव प्रयोजयेत् ।
कामं तु खलु धर्मार्थ दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम्॥ ११७॥
चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि ।
प्रजा रक्षन् परं शक्त्या किल्विषात् प्रतिमुच्यते ॥११८॥
स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात्पराङ्मुखः ।
शस्त्रेण वैश्यान् रक्षित्वा धर्म्यमाहारयेबलिम्॥ ११६ ॥
किसी उपाय से, जीविका न कर सके तो ब्राह्मण शिल, उञ्छुको
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दशवां अध्याय । ३६५ भी से लेय । क्योंकि प्रतिग्रहसे शिल श्रेष्ठहै और उञ्छ उससे भी श्रेष्ठ माना जाता है । जो स्नातक ब्राह्मण निर्धनता से दुःख भोगता हो यह राजा से श्रम, परत्र या धन मांगे यदि न दे तो उसको त्यागदे । विना जोता खेत, गौ, वकरा, मेढ़ा, सोना, कथा और पका थन इनमें गले अगले से पहले पहले निर्दोष माने जाते हैं । दायभाग का दावा आदि से मिले, बेचने में मिले, विजय से मिले, ब्याज में मिले, परिश्रम से मिले या सत्पुरुषों से दान मिले ये सात प्रकार की धन की प्राप्ति धर्मानुकूलहै । विद्या, कारीगरी, नौकरी, सेवा, पशुपालन, व्यापार, खेती, सन्तोष, भिक्षा और व्याज ये देश जीविका के साधनहै । ब्राह्मण और क्षत्रिय आपति मैं भी प्याजपर धन न दें । परन्तु धर्मार्थ किसान वरीरह को थोड़े प्याजपर कुछ द्रव्य दे देवे । राजा श्रापत्ति में भी चौथा भाग लें- कर यदि प्रजा की पूरी रक्षा करे तो पातकों से छूट जातान फेरेहै ॥ युद्ध करना क्षत्रिय का निजधर्म है, इसलिए युद्ध से मुँह को ग्रहण यों की शस्त्र से रक्षा करके, अपने राजकीय -कर करे ॥ ११२-११६ ॥
धान्येऽष्टमं विश शुल्कं विंशं कार्षापणावरम् ।
कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा। ॥ १२० ॥
शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षन् क्षत्रमाराधयेद्यदि ॥१२१ ॥
धनिनं वाप्युपाराध्य वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत्
स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः ।
कृतकृत्यता ॥ १२२ ॥
जातनाह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य विप्रसेवैवयदतोन्याद्धशूद्रस्यकुरुते विशिष्टंतद्भवत्यस्यकर्म निष्फलम्कीर्त्यते । ॥ १२३। ॥ प्रकल्प्या अस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद्यथार्हतःच परिग्रहम्॥ १२४ ॥
शक्तिंचावेक्ष्य दाक्ष्यं च भृत्यानां
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३६६ मनुस्मृति ।..
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च ।
पुलकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः ॥ १.२५॥
न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति ।
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥ १२६॥
: राजा वैश्यों से श्रमका श्राठवां भाग लेय और कार्पार्पण तक सराफ़ी के लाभ पर बीसवां भाग ले और शुद्र मज़दूर, कारी- से काम कराले । ब्राह्मण की सेवासे शूद्ध जीविका न करसके तो क्षत्रिय वा धनी वैश्य की सेवा करके, जीविका करे | परन्तु लोक परलोक दोनों में सुख चाहनेवाला शूद्र ब्राह्मण की सेवा करें । अमुक शुद्र अमुक ब्राह्मण का श्राश्रित है, ऐसा कहलाने से ही शुद्र कृतार्थ होता है । ब्राह्मणसेवाही शूद्र का प्रधान कर्म है । इस के सिवा उसके कर्म निष्फल हैं । ब्राह्मण सेवकों की काम करनेकी शक्ति, बुद्धिमानी और परिवार को देखकर योग्यतानुसार अन वस्त्र, पुराने श्रोढ़ने, बिछौने वगैरह देवे । सेवक शुद्ध की लसुन आदि अभक्ष्य भक्षण से कोई पातक नहीं लगता । उनका उपनयन श्रादि संस्कार भी नहीं होता । श्रग्निहोत्रादि धर्म में उनका अधि- कार नहीं है और विना मन्त्र होम आदि का निषेध भी नहीं है । वह भक्तिले करसकता है ॥ १२०-१२६ ॥
धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तमनुष्ठिताः ।
मन्त्रवर्ण्य न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ॥ १२७ ॥
यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः ।
तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ॥ १२८ ॥
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यों धनसंचयः ।
शूद्रोऽपि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ॥ १२६ ॥
एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।..
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दश अध्याय । ३६७
यान् सम्यगनुतिष्टन्तो व्रजन्ति परमां गतिम्॥१३०॥
एप धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वएर्यस्य कीर्तितः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ १३१ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतार्या स्मृतौ दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
धर्म शुद्ध धर्म संपादन की इच्छा से मन्त्र के विना सत्पुरुषों के प्राचरण करते हुए दोष नहीं किन्तु प्रशंसा को प्राप्त होते हैं । शुद्र जैसे जैसे सदाचार का पालन करता है वैसे वैसे लोक में प्रशंसा पाता है और मरकर उत्तम लोक का भागी होता है । समर्थ भी शुद्र धनसंग्रह न करे, क्योंकि शुद्र धन पाकर ब्राह्मणों फो दुःख देता है । इसप्रकार ये सब चारों वर्णों के श्रापत्काल के धर्म कहे गए हैं । जो अपने अपने धर्म का भलीभांति सेवन करते हैं वे परमगति को पाते हैं । यह चारों वर्णों की धर्मविधि पूरी हुई । श्रव प्रायश्चित्त की विधि कहेंगे ॥ १२७-१३१ ॥ दशवां अध्याय समाप्त ॥
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३६८ मनुस्मृति । अथ एकादशोऽध्यायः ।
सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सर्ववेदसम् ।
गुर्वर्थं पितृमात्र स्वाध्यायापतापिनौ ॥ १ ॥
नवैतान् स्नातकान् विद्याब्राह्मणान् धर्मभिक्षुकान् ।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ॥ २ ॥
एतेभ्योऽपि द्विजायेभ्यो देयमन्नं सदक्षिणम् ।
इतरेभ्यो वहिर्वेदि कृतान्नं देयमुच्यते ॥ ३ ॥
सर्वरत्नानि राजा तु यथार्ह प्रतिपादयेत् ।. ब्राह्मणान् वेदविदुषो यज्ञार्थं चैव दक्षिणाम् ॥ ४ ॥
कृतदारोऽपरान् दारान् भिक्षित्वा योऽधिगच्छति ।
रतिमात्रं फलं तस्य द्रव्यदातुस्तु संततिः ॥ ५ ॥
धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत् ।
daaraag स्वर्गं समश्नुते ॥ ६ ॥
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये ।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ७ ॥
ग्यारहवां अध्याय । धर्म-भिक्षुक! सन्तानार्थ विवाह करनेवाला, यक्ष करने की इच्छावाला, मार्ग चलनेवाला, यश में सर्वस्व दक्षिणा देनेवाला, गुरु, माता और पिता के लिए धन का अर्थी, विद्यार्थी और रोगी इन नौ स्नातक ब्राह्मणों को धर्मभिक्षुक जानना चाहिए । ये सब निर्धन हो तो विद्या के अनुसार इनको दान देना चाहिए । इन ब्राह्मणों को
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ग्यारहवां अध्याय । ३६६ 1 दक्षिणापकाया अन्नके साथदेना कहान देनाहै । राजाऔर यक्षदूसरों-दक्षिणाको यज्ञमें उत्तमवेदी के बाहर की योग्यता के अनुसार देवे । जो विवाहित पुरुष भीख वस्तुओंमांगकर दूसरा विवाह करता है उसको रतिमात्र फल है और उसकी सन्तान द्रव्य देनेवाले की होती है । जो लोग विरक्त-वेद -वा- लों को यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं । जिस के पास कुटुम्बियों के निर्वाहार्थ तीन साल तक का या श्रधिकं अन हो, वह सोमयाग करने योग्य होता है ॥ १-७ ॥ श्रतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः । स पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्यानोति तत्फलम् ॥ ८ ॥ ·
शक्रः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि ।
मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ॥ ६ ॥
भृत्यानामुपरोधेन यत्करोत्योर्ध्वदेहिकम् ।
तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितस्य मृतस्य च ॥ १० ॥
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ११ ॥
यो वैश्यः स्यादुपशुनतुरसोमपः ।
कुटुम्बात्तस् तद् द्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ॥ १२ ॥
श्राहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
नहि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ॥ १३ ॥
इससे कम द्रव्य होने में जो द्विज सोमयाग करता है उसका पहला सोमयज्ञ भी नहीं पूरा पढ़ता । इसलिए दूसरा कभी न करे । जो कुटुम्ब को दुःखी होते दूसरों को धन देता है, वह पहले तो अच्छा लगता है, परन्तु परिणाम में विष के स्वाद सा भयानक मालूम होता है । वह केवल धर्म का मूंठारूप है । कुटुम्बियों को
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४०० मनुस्मृति । -दुःख देकर, जो पुरुष परलोक के लिए दानादि करता है, यह लोक- परलोक में दुःख फल को करता है । धार्मिक राजा के होते हुए क्षत्रियादि यजमानों का विशेष करके ब्राह्मण का यज्ञ किसी श्रङ्ग से रुका हो तो धनी वैश्य से जो सोमयज्ञ से रहित हो, उस के धन से मदद ले लेनी चाहिए । यज्ञ में दो वा तीन अङ्ग अधूरे हो और वैश्य से उतना धन न मिले तो शुद्ध के घर से यथेच्छ धन ले लेय, क्योंकि शूह का यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ८-१३ ॥
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ १४ ॥
श्रादाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः ।
तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ॥ १५ ॥
तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता ।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ १६ ॥
जो निहोत्री नहीं है और सौ १०० गौ का धन रखता है श्रीर जिसने यज्ञ न किया हो, पर हज़ार १००० गौ का धन हो, उन दोनों के घर से भी धन लेना चाहिए । जो ब्राह्मण नित्य दोन लेता हो पर दान देता न हो, वहभी यज्ञार्थ धन दे तो ले लेना चाहिए । इस कर्म से उसका यश और धर्म बढ़ताहै । जिसने तीन दिन तक भोजन न किया हो वह सातवीं खुराक धर्महीन पुरुष से भी श्रन्न ले लेवे तो कोई दोष नहीं है ॥ १४-१६ ॥
ख़लात्क्षेत्रादगाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते ।
आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति ॥ १७ ॥
ब्राह्मणस्वं न हर्त्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन । -: दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन् हर्तुमर्हति ॥ १८ ॥