श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 581–590
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 581–590
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ग्यारहवां अध्याय । ४४१ मास तक भीख मांगकर निर्वाह करे । द्विज, ' देवकृतस्य० इत्यादि शाकल होम के मन्त्रों से, एक वर्ष तक घी का होम करे' अथवा ' नम इन्द्रश्च० ' इत्यादि मन्त्रका एक वर्षतक पाठ करे तो महापाप से भी छूट जाता है । महापातकी एक वर्षतक भीख मांगकर खाय, सावधानी से नित्य गौश्रों के पीछे फिरे । और पवमान देवता के सूकों का पाठ करे तो शुद्ध होता है । तीन पराक व्रतों से शुद्ध, जितेन्द्रिय होकर वन में बेदसंहिता का तीन चार पाठ करे तो सब पापों से छूटता है । तीन दिन उप- वास करे, तीनों समय में स्नान करे और श्रघमर्षण-सूक्त का पाठ. करे तो सब पाप से छूटजाता है ॥ २५५-२६० ॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनम् ।
तथावसर्पणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ २६१ ॥
ear लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः ।
वेदं धारयन् विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ॥ २६२॥
ऋक्संहितां त्रिरभ्यस्य यजुषां वा समाहितः ।
सानां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६३ ॥
यथा महाहृदं प्राप्य क्षितं लोष्ट विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति ॥ २६४ ॥
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।
एष ज्ञेयदि यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २६५ ॥
क्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६६ ॥
धर्मभृगुप्रणीतायां स्मृतौ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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४४२ मनुस्मृतिप जैसे यज्ञों का राजा श्रंश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे अघमर्षण- सूक्त सब पापों का नाशक है । वेद को धारण करने वाला ब्राह्मण:चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता । जो द्विज, साव- धानी से, कसंहिता या यजुः संहिता अथवा सामसंहिता की.. ब्राह्मण उपनिषदों के सहित तीन वार श्रावृत्ति करे तो सब पापों से मुक्त होजाता है । जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ: देला गला जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं ।. ऋकू यजु और सामः वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद जानना चाहिए । जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है । सब वेदों में प्रधान तीन अक्षर का जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय प्रणव ' श्र ' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है । जो उसके स्वरूप और अर्थ को जानता है वह वेदविशारद हैं ॥ २६१-२६६ ॥ · ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ
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अथ द्वादशोऽध्यायः ।
चातुर्वएर्यस्य कृत्स्नोऽयंमुक्तो धर्मस्त्वयान्ध ।
कर्मणां फलनिर्वृत्तिं शंस नस्तत्त्वतः पराम् ॥ १ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन मानवो भृगुः ।
अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम्॥ २ ॥
शुभाशुभफलं कर्म-मनोवाग्देहसम्भवम् ।. कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ३ ॥
तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ ४ ॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ५ ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ६ ॥
प्रदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ ७ ॥
बारहवां अध्याय । कर्मफल -निर्णय ।. श्रव हे पापरहित! यह चारों वर्णों का संपूर्ण फलोंधर्म तुमनेको कहायथार्थरूप। शुभाशुभ कर्मों के दूसरे जन्म में होनेवालेभृगु से पूँछा । यह सुनकर से हम से कहिये । इस प्रकार महर्षियोंने
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४४४ मनुस्मृति | मनुपुत्र धर्मात्मा भृगु ऋषियों से कहा. इस सम्पूर्ण कर्मयोग के निर्णय को सुनोः मन, वाणी और शरीर से होनेवाला कर्म शुभ, शुभ फल देता है और उसी कर्म के अनुसार मनुष्यों का उ- म-मध्यम और प्रथम योनि में जन्म होता है । उस देही के उत्तम मध्यम- धम ओर मन-वाणी-शरीर के श्राश्रित फल देने चाले तीन प्रकार के दश लक्षणयुक्त धर्म का मनप्रवर्तक -चलाने वाला है | अन्याय से परधन हरने का विचार, दूसरे का नमल चाहना और परलोक में अश्रद्धा ये तीन प्रकार के मानस पाप- कर्म हैं । कठोर बचन कहना, झूठ बोलना, सर्व भांति की चुगली और व्यर्थ चक्रवसंद करना ये चार वाणी के पापकर्म हैं । विना दी हुई वस्तु लेना, शास्त्रविरुद्ध हिंसा और परस्त्री गमन ये तीन है शरीर के पापकर्म हैं ॥ १-७ ॥
मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् ।
वाचावाचाकृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ ८
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ ६ ॥
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च ।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ १० ॥
त्रिदण्डमेतन्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः । t कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ११ ॥
योsस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते ।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ १२ ॥
जीवसंज्ञोऽन्तरात्माऽन्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।
येन वेदयते सर्व सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १३ ॥
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बारहवां अध्याय । ४४५
तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान क्षेत्रज्ञ एव च ।
उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १४ ॥
मनुष्य मन से किए शुभाशुभ कर्मफल को मन से ही, वाणी से किये, वाणी ही और शरीर से किए कर्म का शरीर से ही फल-भो-गता है । मनुष्य शारीरक कर्मोपों से वृक्षादियोनि, वाणी के फर्मों से पक्षी और मृग की योनि और मानसिक कर्मदोषों से गाल आदि हीनयोनि में जन्म पाता है । वाणी को नियम मेरा यादव, मन को वश में रखना मनोदण्ड और शरीर को वश में रखना कायदण्ड ये तीनों जिसकी बुद्धि में स्थितपर इनहैं वह पुरुष ' त्रिदण्डी ' कहाजाता है । मनुष्य संपूर्ण जीवों तीनों गुटोंको स्थापित करने और काम-क्रोध को वशकर्ममें मेंरखनेप्रे से, सिद्धि-कृतार्थता को पाता है । जो इस शरीरजोकोकर्म करता है ' ' ( रित करता है उसको क्षेत्र कहते हैं । और सूक्ष्म श उसे 'भृतात्मा ' कहते हैं । जीव नामक दूसरापैदाअन्तरात्माहोता है । जिससे रोर ) सब शरीरधारी क्षेत्रों के साथ । वे दोनों महान सुक्ष्म जन्मों में सम्पूर्ण सुख-दुःख जाना जाताके हैसाथ मिलकर ऊंचे- नीचे शरीर और क्षेत्रमा -जीवात्मा पञ्चभूतोंके श्राश्रय से रहते हैं ॥ ८-१४ ॥ प्राणियों में स्थित होकर परमात्मा
।
असंख्या सूर्त्तयस्तस्य निष्पतन्ति शरीरतःयाः ॥ १५ ॥
उच्चावचानि भूतानि सततं चेष्टयन्ति नृणाम् ।
पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनांध्रुवम् ॥ १६ ॥
शरीरं यातनार्थीयमन्यदुत्पद्यते यातनाः ।
तेनानुभूय ता यामीः शरीरेणेहविभागशः ॥ १७ ॥
तास्व भूतमात्रासु प्रलीयन्ते विषयसङ्गजान् ।:: सोऽनुभूयासुखोदर्कान् दोषान्
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४४६ मनुस्मृति | व्यपेत कमभ्येति तावेवोभौ महौजसौ ॥ १८॥
तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह । याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ॥ १.६
eared धर्म त प्रायशो धर्ममल्पशः।
तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ॥ २० ॥
यदि तु प्रायशो धर्म सेवते धर्ममल्पशः ।
तैर्भूतैः स परित्यक्को यामीः प्राप्नोति यातनाः ॥ २१ ॥
यामीस्ता यातनाः प्राप्य स जीवो वीतकल्मषः ।
तान्येव पञ्चभूतानि पुनरप्येति भागशः ॥ २२ ॥
उल- परमात्मा के शरीर से क्षेत्रज्ञ नामक असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं । जो उत्तम श्रधम प्राणियों से निरन्तर -कर्म कराते हैं.। पापीमनुष्यों का शरीर यमयातना के लिए दूसरा सूक्ष्म-पञ्चत- न्मात्रा से उत्पन्न होता है । वह पापी उस शरीर से यमयातना 'को भोगकर फिरउन पञ्चभूतों की मात्राओं में विभाग के अनु सार लीन होजाता है । वह सुक्ष्मशरीरी जीव, दुःखों को भोग चुकने पर पापरहित होकर महान और क्षेत्र का श्राश्रय क रता है । वे महान और क्षेत्रज्ञ साथ में उस प्राणी के पुण्य -पाप का विचार करते हैं, जिनसे मिला हुआ यहां और परलोक मैं सुख-दुःख भोगता है । मनुष्यजन्म में यदि वह धर्म अधिक और अधर्म थोड़ा किए रहता है तो उन्हीं पञ्चभूतों से युक्त होकर स्वर्ग: में सुख भोगता है । यदि श्रधर्म अधिक रहता है तो मरकर यमयातना भोगता है । उन यातनाओ को भोगने के बाद निष्पाप होकर वह जीव फिर विभाग के अनुस का: श्राश्रय लेकर जन्म लेता है ॥ १५-२२ ॥ एता दृष्ट्वास्य जीवस्य गतीः स्वेनैव चेतसा ।
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बारहवां अध्याय | ४४७ धर्मतोऽधर्मतश्चैव धर्मे दध्यात्सदां मनः २३ ॥ सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन् विद्यादात्मनो गुणान्॥ यैर्व्याप्येसान्स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषतः ॥। २४ यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते । ॥ स तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ॥ २५ ॥
सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रागद्वेषौ रजः स्मृतम् ।
एतद्दृव्याप्तिप्रदे तेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ॥ २६ ॥
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षयेत् ।
प्रशान्तमित्र शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २७ ॥
यत्तु दुःखसमायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
तोऽप्रतिघं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ॥ २८ ॥
यत्तु स्यान्मोहसंयुक्रमव्यक्तविषयात्मकम् ।
प्रतप्रविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ २६ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां यः फलोदयः ।
अग्रयो मध्यो जघन्यश्च तं प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ३० ॥
गुणों का प्रभाव । इन जीवगतियों का जोकि धर्म-अधर्म से होनेवाली हैं. अपने मन से विचार करके पुरुष को सदा धर्म मैं मन टिकाना चा हिए । सत्य, रज और तम ये तीनो आत्मा प्रकृति के गुण हैं ।: इन्हीं गुणों से व्याप्त महत्तत्त्व, सारे विश्व में स्थित है! इन गुणोंको. अपनेजोभाव का करदेहडालताअधिकहै । वस्तुहोताकाहैवास्तविकतब उसज्ञानप्राणीसत्त गुण का उलटा झान तमोगुण का और राग-द्वेष रजोगुण का लक्षण
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= मनुस्मृति । है । सब प्राणियों के शरीर इन्हीं के प्रभावों से व्याप्त हो रहे हैं । जिस से श्रात्मा को सुख का ज्ञान हो शान्त शुद्ध और प्रकाश- भाव पैदा हो वह सत्त्वगुण है । आत्मा को प्रीतिकर दुःख से fear विषयों में खींचनेवाला रजोगुण होता है । जो मोह- युद्ध हो प्रकट न हो विजयी हो और तर्क या बुद्धि से न जाना जाय वह तमोगुण है | इन तीनों गुणों का जो उत्तम मध्यम-श्र घम फल होता है वह सब आगे कहा जाता है ॥ २३-३० ॥
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धर्मक्रियात्मचिन्ता च सात्त्विकं गुणलक्षणम् ॥ ३१ ॥
आरम्भरुचिताऽधैर्यमसत्कार्यपरिग्रहः ।
विषयोपसेवा चाजलं राजसं गुणलक्षणम् ॥ ३२ ॥
लोभः स्वप्नोऽधृतिः क्रौर्य नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।
याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३३ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां त्रिषु तिष्ठताम् ।
इदं सामासिकं ज्ञेयं क्रमशो गुणलक्षणम् ॥ ३४ ॥
' यत्कर्म कृत्वा कुंर्वश्च करिष्यंश्चैव लज्जति ।
तज्ज्ञेयं विदुषा सर्वं तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३५ ॥
येनास्मिन्कमर्णा लोके ख्यातिमिच्छति पुष्कलाम् ।
न च शोचत्यसंपत्तौ तद्विज्ञेयं तु राजसम् ॥ ३६ ॥
यत्सर्वेच्छति ज्ञातुं यन्न लज्जति चाचरन् ।
येनं तुष्यति चात्मास्य तत्संत्त्वगुणलक्षणम् ॥ ३७ ॥
तमसो लक्षणं कामो रजसस्त्वर्थ उच्यते ।
सत्त्वस्य लक्षणं धर्मः श्रैष्ठयमेषां यथोत्तरम् ॥ ३८ ॥
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बारहवां अध्याय | ४४६ वेद का अभ्यास, तप, शान, शौच . फर्म और आत्मचिन्तन ये सब सत्त्वगुण, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म, मैं रुचि होना, फिर धैर्य, बुरे कामों के काम हैं । श्रारम्भ भोग ये रजोगुण के काम हैं । लोभ, नींदमें फँसना और विषय- नास्तिकता, अनाचार, मांगने की आदत और, अधीरता, क्रूरता, गुण के काम हैं । इन तीनों गुणों का संक्षेप से लक्षण प्रमाद ये तमो-:- जिस कर्म को करके करते हुए या आगे करने में यो है है वह तमोगुण का लक्षण है । जिस कर्म से लोकलज्जामें प्रसिद्धिआती चाहे, पर फल न होने पर शोक न पैदा हो, वह रजोगुण का लक्षण है । जिससे ज्ञान प्राप्त करना चाहे, जिसको करने में लज्जा न आवे और जिस कर्म से मन प्रसन्न सन्तुष्ट रहे, उसको सत्वगुण का लक्षण जानना चाहिए । तम का काम, रज का अर्थ और सव का धर्म ये मुख्य लक्षण हैं । इनमें कम से अगला अगला श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ३१-३८ ॥
येन यस्तु गुणेनैषां संसारान् प्रतिपद्यते ।
तान् समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम्॥३६॥
, देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः ।
तिर्यकूत्वं तामसा नित्यमित्येषां त्रिविधा गतिः ॥ ४० ॥
त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः ।
माध्यमामा च कर्मविद्याविशेषतः ॥ ४१ ॥
स्थावराः कृमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः ।
पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ ४२ ॥
हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः ।
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥४३॥
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः । ५७
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४५० मनुस्मृति रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥
झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः ॥। द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५
राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः ।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥
इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता हैं, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं सात्त्विक गुणवाले देष-: भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते है - यह तीन प्रकार की गति है । सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार उत्तम मध्यम अ धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क छुधा, पशु और मृग, ये तमोगुणी श्रम गति है । हाथी, घोड़ा, 'शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शुकर ये तमोगुणी मध्यमगति है । चारतभाँट गरुडादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि. शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए । भल्ल, मल, गुणनट, शस्त्रकी से जीनेवालेमगति है, 1.जुनाराजामद्यपान, क्षत्रियमें, आसक्तराजपुरोहितपुरुष, येविवादरजी- करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥.
गन्ध का यक्ष विबुधानुचराश्च ये ।
तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥
तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः। ॥
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥४८॥
यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः ।
पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥