श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 591–600

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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बारहवां अध्याय | ४५१'

ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्रमेव च ।

उत्तमां सात्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥

एष सर्वः समुद्दिष्टखिप्रकारस्य कर्मणः ।

त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५.१ ॥

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च ।

पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥

यांयां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा ।

क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥

बहून् वर्षगणान् घोरान् नरकान् प्राप्य तत्क्षयात् ।-: संसारान् प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥

गन्ध, गुms, यक्ष, विद्याधर और अप्सरा ये रजोगुणी उत्तमगति है । वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानचारी देवता; नक्षत्र और दैत्य ये सत्त्वगुण की अधमगति है । यजमान, ऋषि, देवता, वेद, ज्योति, वर्ष, पितर और साध्यदेव यह सत्वगुण की मध्यमगति है | ब्रह्मा, प्रजापति, धर्म, महत्तत्त्व और प्रधान इसको सत्वगुण की उत्तमगति विद्वान् लोग कहते हैं । इस प्रकार मन, वाणी और शरीर के तीन प्रकार के कर्मों से होने बाली, त्रिगुणमयी, उत्तम मध्यम अधम तीन प्रकार की सब प्रा- शियों की गति कही गई है । इन्द्रियों में आसक्ति और धर्माचरण न करने से मूर्ख अधम मनुष्य पापयोनि को प्राप्त होते हैं । इस लोक में यह जीव जिस जिस कर्म से जिस जिस योनि में जन्म लेता है, उन सब को क्रम से सुनो-महापातकी पुरुष बहुत aar भयानक नरकों में पड़कर, पाप कट जाने पर बांकी भोग भोगने के लिए इन नीच योनियों में जन्मता है ॥ ४७-५४ ॥ -श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।

पृष्ठ 592

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४५२. मनुस्मृति । 'चाण्डालपुकसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ५५ ॥ "

कृमिकीटपतङ्गानां विभुजां चैव पक्षिणाम् ।... हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ ५६ ॥

लूता हि सरटानां च तिरवां चाम्बुचारिणाम् ।: हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ॥ ५७॥

तृणगुल्सलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि ।

क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ॥ ५८ ॥

हिंसा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः । परस्परादिनः स्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः ॥ ५६ ॥:

संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् • अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ ६० ॥

मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः ।

विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥ ६१ ॥

धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं प्लवः ।

मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम् ॥ ६२ ॥

ब्रह्महत्या करनेवाला, कुत्ता, सुअर, गधा, ऊँट, बैल, बकरा, मैड़ा, मृग, पक्षी, चाण्डाल और पुक्कस की जाति में, जन्मता है । मद्यपान करनेवाला ब्राह्मण कृमि, कीड़ा, पतंग, मैला खानेवाले. पक्षी और हिंसक प्राणियों की जाति में जन्मता है! सोना- चुरानेवाला' ब्राह्मण मकड़ी, सांप, गिरगढ़, जलज़र पक्षी, हिंसक जीव और पिशाच की योनि में जन्मता. | गुरुपत्नी-गामी पुरुष- सैकड़ों बार घास, गुल्म, लता, कच्चा मांस खानेवाले, दाढ़वाले - ओर कर कर्मियों की योनि में जन्म लेता है । हिंसक मनुष्य कश्वा मांस खानेवाले, कृमि और अभक्ष्य भक्षी होते हैं । चोर

पृष्ठ 593

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वारहवां अध्याय | ' ४५३ एक दूसरे को खानेवाले प्राणी होते हैं । चाण्डाली से संयोग फरनेवाले प्रेत होते हैं । पतितों से संसर्ग, परस्त्री और ब्राह्मण धन हरनेवाला, ब्रह्मराक्षस होता है । मणि, भोती, मूँगा और विविध रत्नों को चुराकर, हेमकार पक्षियों में जन्मता है । अन्न चुराकर चूहा कांस की चोरी से हंस, जल चुराने से. मेंढक, मधु चुराने से मक्खी, दूध की चोरी से कौना, रस चुराने से कुत्ता और घी चुराने से नौला होता है ॥ ५५–६२ ॥

मांसं गृध्रो वसां सद्गुस्तैलं तैलपकः खगः ।

चीरीत्राकस्तु लवणं वलाका शकुनिर्दधि ॥ ६३ ॥

कौशेयं तित्तिरिर्हृत्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः ।

कार्पासतान्तवं च गोधा गां वाग्गुदो गुडम् ॥ ६४ ॥

कुछन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकं तु वर्हिणः ।

श्वावित्कृतानं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ ६५ ॥

aat Hai हृत्वाग्निं गृहकारी ह्युपस्करम् । ''.. रानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ ६६ ॥

वृको मृगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः । " मृक्षः स्तोककोवार यानान्युष्ट्रः पशूनजः ॥ ६७ ॥

। यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य वलान्नरः ॥ ६८॥ अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः:

स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः । ६६ ॥ एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताःह्यनापदि॥ । स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णायान्तिः शत्रुषु॥ ७० ॥

पापान्संस्सृत्य संसारान् प्रेष्यतां

पृष्ठ 594

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-४५४ मनुस्मृति : मांस चुराने से गीध चरवी चुराने से जलकाक, तेल की चोरी से तैलपक पक्षी, लोन चुराने से भींगुर और दही की चोरी से बलाका पक्षी होता है । रेशम चुराने से तीतर, अलसी: के कपड़ों की चोरी से मेढक, कपास वस्त्र चुराने से सारसः.. गौ चुराने से गोधा और गुड़ चुराने से वाग्गुद पक्षी होता है । उत्तम सुगन्ध की चीज़ चुराने से छछुन्दरि, पत्ते-शाक चुराने से मोर, पक्वान्न चुराने पर भेड़िया और कच्चा अन चुराने से शल्यक होता है । आग चुराने से वक, सूप- मूसल चुराने पर मकड़ी और लाल वस्त्र चुराने से चकोर पक्षी होताहै । मृगया, हाथा चुराने से नाहर, घोड़ा चुराने से व्याघ्र, फल-मूल की चोरी से वानर, स्त्री चुराने से रीछ, पीनेका जल चुराने से चातक, सवारी की चोरी से ॐ और पशु की चोरी से बकरा." होताहै । मनुष्य दूसरे की कोई भी वस्तु चुराकर और विना होम हवि भोजन से अवश्य पक्षी होता है । स्त्रियां भी चोरी करने पर इन्हीं दोषों को पाती हैं और उन्हीं जन्तुओं की स्त्री बनती हैं । विना आपत्ति के अपने अपने नित्य कर्मों से पतित पुरुष पाप-योनियों में पैदा होकर, शत्रुओं के यहां दासपना को पाते हैं ॥ ६३-७० ॥ वान्ताश्शुल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ॥ ७१ ॥

मैत्रा ज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।

चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥ ७२ ॥

यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयात्मकाः ।

तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥ ७३ ॥

तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।

संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥

पृष्ठ 595

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वारहवां अध्याय । ४५५.

तामिस्रादिपु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् ।

असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च ॥ ७५ ॥

विविधाश्चैव संपीडाः काकोलूकैश्च भक्षणम् ।. करम्भवालुकातापान् कुम्भीपाकांश्च दारुणान्॥७६ ॥

संभवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः ।

शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥ ७७ ॥

असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् ।

वन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥ ७८ ॥

अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण उल्कामुख प्रेत होकर वमन खाता ', है । क्षत्रिय, कपूत प्रेत होकर विष्ठा और मुरदा, खातापीब खाताहै । अपने धर्म से भ्रष्ट वैश्यं मैत्राक्षज्योतिक प्रेत होकर । वि- है और शुद चैलाशक प्रेत होकर, कपड़े कीकरतेजूँ खाताहैं, वैसेहै वैसे पयासक्त पुरुष जैसे जैसे विषयों का सेवन। वे निर्बुद्धि उन पाप कम उनमेंके बारउनकीबार करनेकुशलतासे यहांहो जातीअनेक हैयोनियों बारमें जन्मबार लेकरजन्म दुःखहोता पाते हैं । तामिस्र आदि भयानक नरकों मेंहै । यमलोक के बन्धन है । असिपत्र आदि वनों में चलना पड़ताहैं । अनेक पीड़ाएं होती हैं, " और छेदन के दुःख भोगने खातेपड़तेहैं, जलती रेती का ताप और कौश्रा, उल्लू नोच नोच कर भोगने पड़ते हैं । दुःख से पूर्ण कुम्भीपाक यदि दारुणं नरक जन्म होते हैं । सर्दी -गर्मी की पशु आदि की योनि में वारंवारभय होते हैं । फिर फिर गर्भ में वास पीड़ा और भांति भांति के है । विविध बंधन शृङ्खला वगैरह होता है । दुःखद जन्म होताहोता है ॥ ७१-७८ ॥ काबन्धुप्रियवियोगांश्चऔर दासपना प्राप्त संत्रासं चैव दुर्जनैः । ' चार्जनम् ॥ ७६॥

द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य

पृष्ठ 596

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४५६ मनुस्मृति ।

जरी चैवाप्रतीकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम् ॥

क्लेशश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ॥ ८० ॥

यादृशेन तु भावेन यद्यत्कर्म निषेवते ।

तादृशेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥ ८१

एष सर्वः समुद्दिष्टः कर्मणां वः फलोदयः ॥

नैःश्रेयसकरं कर्म चित्रस्येदं निबोधत ॥ ८२ ॥

वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।

अहिंसा गुरुसेवा चनैःश्रेयसकरं परम् ॥ ८३॥

सर्वेषामेव चैतेषां शुभानामिहकर्मणाम् ।

किञ्चिच्छ्रेयस्करतरं कर्मोक्तं पुरुषं प्रति ॥ ८४ ॥

सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ।

तद्ध्यर्थं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ८५ ॥

षण्णामेषां तु सर्वेषां कर्मणां प्रेत्य चेह च ।

श्रेयस्करतरं ज्ञेयं सर्वदा कर्म वैदिकम् ॥ ८६ ॥

बान्धवों का वियोग, दुर्जनों का सहवास, दुःख सें'धन पाना, धन का नाश कठिनता से मित्र पाना और शत्रुओं से वैर भाव होता है । जिसका उपाय न हो सके ऐसा वुढापा श्राता है.. व्याधियों से कष्ट, नानाप्रकार के दुःख और दुर्जय मरण होता.. 'है । मनुष्य जिस भाव से जो कर्म करता है, उसके शरीर धारण करके फलों को भोगता है । यह सब कर्म फलों का वृत्त कहा गया हैं । अब ब्राह्मणों का कल्याण करनेवाला कर्म सुनोः- वेदाभ्यासः तप, आत्मज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिला, गुरुसेवा,

पृष्ठ 597

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| बारहवां अध्याय ४५७ ये कर्म ग्राह्मणों को परम हितकारी हैं । इन सब पुरुष का अधिक कल्याण करनेवाला कर्म-श्रात्मज्ञानशुभकर्मों में भी सब विद्यार्थी में श्रेष्ठ है और उससे मोक्ष मिलता है है । वह कहे छः कर्मों में लोक- परलोक दोनों में अधिक कल्याणकारी। इन ऊपर वैदिक फर्म है ॥ ७६-८६ ॥

वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः ।

अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन् क्रियाविधौ ॥८७॥

सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च ।

प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ ८८ ॥

इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते ।

निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ ८६ ॥

प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् ।

निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्चवैवै ॥ ६० ॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ६१ ॥

यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः ।

आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ६२॥

एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।

प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ६३ ॥

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ।

अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ६४ ॥

वैदिक कर्मों में ऊपर कही सब क्रियाओं का अन्तर्भाव होताऔर है । स्वर्गादि सुख और अभ्युदय करनेवाला प्रवृत्ति कर्म ५८

पृष्ठ 598

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४५८ मनुस्मृति | मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै-दिक कर्म होते हैं । इसलोक के और परलोक के सुख की कामना से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम श्रात्मज्ञानार्थ किया कर्म निवृत्त कहलाता है | प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता को और निवृत्त कर्म करने से पश्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष पाता है । सब भूतों में श्रात्मा को और श्रात्मा में सब भूतों को समान देखनेवाला श्रात्मयाजी मोक्ष को पाता है । द्विज 1 शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और वेदाभ्यास ही करे । इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म की सफलता है । द्विज श्रात्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है, अन्यथा नहीं । पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग, दिखाने वाला वेद ही नेत्र है । वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना

जानने में शक्य है और अनन्तहै । यही मर्यादा है ॥ ८७-६४ ॥

या वेदवाद्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।

सर्वास्त निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥

उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित्।

तान्यर्वाकालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ६६ ॥

चातुर्वण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति ॥ ६७ ॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।, वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥

विभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । 1

तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥

सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।

सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥

पृष्ठ 599

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बारहवां अध्याय । ४५६

यथा जातवलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान् ।

तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥ १०१ ॥

वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन् ।

इहैव लोके तिष्ठन् स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १०२ ॥

जो स्मृति वेदमूलक नहीं हैं, जो वैदिक देव-यज्ञादि को झूठा यतलानेवाले ग्रन्थहैं, उन सबको निष्फल और नरकगति देनेवाले जानना चाहिए । वेद से भिन्न-मूलक जो प्रन्थहैं वे सब उत्पन्न होते है और घोड़े समय में नष्ट होजाते हैं । वे श्राधुनिक होनेसे निष्फल और असत्यहैं । चारों वर्ण, चारों श्राश्रम, तीनों लोक और भूत, भविष्य, वर्तमान काल सब वेदहीसे प्रसिद्ध होतेहैं । शब्द,स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांच भी वेद से उत्पन्न हैं और सत्वादि गुणों के कर्म से हैं | सनातन वेद यज्ञादि से चराचर विश्व का धारण और पा न करताहै । इसलिये वेद अधिकारी के परम कल्याण का साधन है । सेनापति, राज्य, न्यायाधीश और सवका स्वामी वेदशास्त्रज्ञही होता है । जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले वृक्षों को भी भस्म करता है वैसेही वेदश अपने कर्मदोपों को भस्म करडालता है । वेद के तत्त्व को जाननेवाला चाहे जिस श्राश्रम में रहकर सोलोक में मोक्ष पाजाता है ॥ ६५-१०२ ॥

प्रज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः ।

धारिभ्योज्ञानिनः श्रेष्ठाज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ॥१०३ ॥

तो विद्या च विप्र निःश्रेयसकरं परम् । ॥तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ १०४ प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्१०५। ॥ त्र्यं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ॥ । धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना

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४६० मनुस्मृति | यस्तर्केणानुसंधते स धर्मं वेद नेतरः ॥ १०६ ॥

नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः । • मानवस्यास्य शात्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ॥ १०७ ॥

अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।

यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥ १०८॥

धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः ।

ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ १०६ ॥

दशावरा वा परिषधं धर्मं परिकल्पयेत ।

त्र्यवरा वाऽपि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ ११० ॥

अज्ञों से ग्रन्थ पढ़े हुए श्रेष्ठ हैं, उनसे धारण करनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी अर्थ समझनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी शास्त्रानुसार श्राचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं । तप और विद्या ब्राह्मण का परम हित- कारी है । ब्राह्मण तप से पाप नाश करता है और ब्रह्मविद्या से मोक्ष पाता है । धर्म के तत्त्व को जानने की इच्छावाले प्रत्यक्ष ( श्रुति ) अनुमान ( स्मृति ) और विविध शास्त्रों को भली भांति जानें । जो वेद और धर्मशास्त्र का वेद के अनुकूल तर्क से विचार करता है वह धर्म को जानता है, दूसरा नहीं जा- नता । इस प्रकार मोक्ष देनेवाले सब कर्म कहे गये हैं । श्रव इस मानव धर्मशास्त्र के रहस्य का उपदेश करते हैं:— रहस्य- उपदेश । जो धर्म इस शास्त्रमें नहीं कहे गये उनका निर्णय शिष्ट ब्राह्मणों की श्राज्ञा से जो हो वही माननीय होता है । जिन्होंने साङ्ग वेद धर्मभाव से अध्ययन किया हो उन वेद के प्रत्यक्ष प्रमाण भूत ब्रा- ह्मणों को शिष्ट जानना चाहिए । कमसे कम दश सदाचारी ब्राह्मणों की सभा या तीनही ब्राह्मणों की सभा जो धर्म बतलावें वही धर्म

जानना चाहिए । १०३-११० ॥