श्रीगणेशाय नमः।

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 401–410

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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२७२ नाट्यशास्त्रम् सूत्र में ग्रहण किया जाता तो वह उलटा कष्टदायक ( असङ्गत ) हो जाता । केवल औचित्य निर्वाह की दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि ‘ स्थायिभाव रस हो गया है । ' उस स्थायीभाव के द्वारा कारण रूप से प्रसिद्ध और आस्वादन के समय उपयोगी होने के कारण इन विभावादि का स्थायी अवलम्बन करता है । इसी दृष्टि से स्थायीभाव के रस रूप में व्यक्त होने की स्वीकृति का औचित्य माना गया है । [ अर्थात् रसास्वादन में स्थायीभाव कारण रूप विभावादि उपकारक हैं अतः उनके संयोग से ' स्थायीभाव के रस हो गया है ' ऐसा औपचारिक प्रयोग किया जाता है ] तब लौकिक जीवन की चित्तवृत्तियों के अनुमान द्वारा रसत्व कैसे स्वीकार किया जा सकता है? [ या रसत्व कहाँ से आ सकता है? ] । इसलिये अलौकिक स्वरूप रसास्वाद स्मृति, अनुमान तथा लौकिक प्रत्यक्षादि से भिन्न चमत्कार ( विलक्षण ) ही है ( यह सिद्ध होता है ) । तथा हि - लौकिकेनानुमानेन संस्कृतः प्रमदादिना ( दिन ) ताटस्थ्येन प्रतिपद्यते । अपि तु हृदयसंवादात्मक सहृदयत्वबलात् - स्मृत्यादिसोपानमारुह्येव पूर्णीभविष्यद्रसास्वादाङ्गुरीभावेनानुमान तन्मयीभावोचितचर्वणाप्राणतया । न च सा चर्वणा प्राङ्मानान्तरात् येनाधुना स्मृतिः स्यात् । न चात्र लौकिकप्रत्यक्षादिप्रमाणव्यापारः किन्त्व लौकिकविभावादिसंयोग - बलोपनतैवेयं चर्वणा । साच , तथा प्रत्यक्षानुमानागमोपमानादिलौकिकप्रमाणजनितरत्याद्यवबोधतः , सकल वैषयिकोपराग-योगिप्रत्यक्षजनिततटस्थपरसंवित्तिज्ञानात् विशिष्यते । एतेषां शून्य- शुद्धपरयोगिगतस्वात्मानन्दैकघनानुभवाच्च ताटस्थ्या - स्फुटत्व - विषयावेशवै-यथायोगमर्जनादिविघ्नान्तरोदयात् विश्येन च सौन्दर्य विरहात् । शा क्योंकि — लौकिक जगत् में अनुमान की प्रक्रिया से संस्कृत सामाजिक नाटक आदि में प्रमदादि ( आलम्बन विभवादि ) को [ लौकिक परगत रत्यादि

पृष्ठ 402

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षष्ठोऽध्यायः २७३. के समान ] तटस्थभाव से स्वीकार ( ग्रहण ) नहीं करता, किन्तु हृदय-संवादात्मक सहृदयता के आधार पर अखण्डरसास्वाद के अंकुर रूप से, अनुमान, स्मृति आदि सोपानों की प्रक्रिया के अधिरोहण के बिना ही भाव की तन्मयता से प्राप्त आस्वाद्य के प्राणभूत चर्वणा के उत्पादक रूप से प्रमदादि ( आलम्बन ) विभावों का अनुभव करता है । और यह चर्वणा रसानुभव के पूर्व किसी प्रमाण से स्थित नहीं होती, जिससे उसे स्मृति कहा जाय । ( तथा ) इसमें लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों का व्यापार भी नहीं होता क्योंकि अलौकिक विभावादि के संयोग से यह आस्वाद्यता वह वह प्राप्त प्राप्त करता करता है है ॥ और और यह वह ( ( रसचर्वणा ) ) प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आगम तथा तथा योगि प्रत्यक्ष से होनेवाले परसंवेदनात्मक तटस्थ ज्ञान से, और समस्त विषयों के प्रति वैराग्यसम्पन्न ( असम्प्रज्ञात समाधि से स्थिति ) परम - योगी में रहने वाले स्वसंवेद्य शुद्ध आत्मानन्द के अनुभव से विशिष्ट ( विलक्षण ) प्रकार वाला होता है । क्योंकि इनमें ( प्रत्यक्षादि प्रमाणों तथा योगिप्रत्य-क्षादि में ) यथायोग्य अर्जनादि रूप विघ्नों के आ जाने से और ताटस्थ्य और अस्पष्टता की स्थिति में विषयावेश की विवशता के कारण आल्हादकत्व ( सौन्दर्य ) का अभाव हो जाता है । [ और रसचर्वणा इन सभी से भिन्न ( या विपरीत ) प्रकार की होती है ] । अत्र तु स्वात्मैकगतत्वनियमासम्भवात् न विषयावेश-वैवश्यम् । स्वात्मानुप्रवेशात् परमतत्वनियमाभावात् न ताट-स्थ्यास्फुटत्वे । तद्विभावादिसाधारण्यवश सम्प्रवुद्धोचितनिजरत्यादि-वासनावेशवशाच्च न विनान्तरादीनां सम्भव इत्यवोचाम बहुशः । अतएव विभावादयो न निष्पत्तिहेतवो रसस्य, तद्बोधापगमेऽपि रससम्भवप्रसङ्गात् । और यहाँ केवल अपने आप रस के स्थित रहने के नियम के न होने से [ परमयोगी के ज्ञान के समान ] विषयावेष की विवशता नहीं रहती है, एवं अपनी आत्मा के सम्मिलित रहने से तथा परगतत्व का नियम न होने के कारण तटस्थता और अस्पष्ट प्रतीति भी नहीं होती, और उस रस के १८ ना ० शां ० प्र ०

पृष्ठ 403

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२७४ नाट्यशास्त्रम् विभावादि के साधारणीकरण की स्थिति में अपनी रत्यादि वासना के उचित रूप में उद्बुद्ध होने से अन्तर्वती अन्य ( परोक्षत्वादि ) विघ्नों की सम्भावना ( भी ) नहीं रहती है यह बात हम अनेक बार कह ( ही ) चुके हैं । अतएव विभावादि रसनिष्पत्ति के कारण ( कारकहेतु ) नहीं है; क्योंकि उनकी प्रतीति के बीत जाने पर भी रस की सम्भावना बनी रहती है । नापि ज्ञप्तिहेतवः येन प्रमाणमध्ये पतेयुः सिद्धस्य कस्यचित् प्रमेयभूतस्य रसस्याभावात् । किं तर्ह्येतद्धि विभावादयः इति? अलौकिक एवायं चर्वणोपयोगी विभावादिव्यवहारः । क्कान्यत्रेत्थं दृष्टमिति चेत्? भूषणमेतदस्माकम लौकिकत्वसिद्धौ । पानकरसास्वा-दोऽपि किं गुडमरीचादिषु दृष्ट इति समानमेतत् । और न विभावादि रस के ज्ञापक हेतु हैं जिससे कि उन्हें प्रमाणों में गिना जाए, क्योंकि पूर्वसिद्ध घट के समान रसादि की पूर्व विद्यमान सत्ता नहीं होती । ( प्रश्न ) तो फिर ये विभावादि क्या हैं? ( उत्तर ) चर्वणा में उपयोगी रहने वाला विभावादि व्यापार अलौकिक होता है ( अतः उसका लोकवत् ठीक से स्थिति - निर्देश नहीं बतलाया जा सकता है ) । इस प्रकार का पदार्थ संसार में कहाँ देखा जाय जो कार्य और ज्ञाप्य न हो? यदि ऐसा प्रश्न करते हैं तो यह सांसारिक पदार्थों से भिन्नता का रहना रस की अलौकिकत्वसिद्धि के लिये भूषणभूत है । और ठण्डाई जैसे पानक-द्रव्य के स्वाद की विशिष्टता उसके अङ्गभूत गुड, कालीमिर्च अदि में कैसे देखी जा सकेगी? यही बात यही ( रस के विषय में ) भी समानता रखती है । [ अर्थात् रसानुभव की विशिष्टता विभावादि की लौकिक स्थिति में नहीं देखी जा सकती है ] नन्नेवं रसोऽप्रमेयः स्यात्? एवं युक्तं भवितुमर्हति । रस्थ-तैकप्राणो ह्यसौ न प्रमेयादिस्वभावः । तर्हि सूत्रे निष्पत्तिरिति कथम्? नैयं रसस्यापि तु तद्विषयरसनायाः । तन्निष्पत्त्या तु यदि तदेकात्तजीवितस्य रसस्य निष्पत्तिरुच्यते न कश्चिदत्र दोषः

पृष्ठ 404

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२७५ तब तो यह प्रश्न उठेगा कि इस प्रकार रस प्रमेय नहीं रहता है? ( उत्तर ) हाँ, यह कहना भी ठीक हो सकता है; क्योंकि इसका प्राणतत्व रसमयता है और इस रूप में यह प्रमेय स्वीकार नही किया जा सकता । ( प्रश्न ) तो फिर रससूत्र में दिये गये ' निष्पत्ति ' ( पद ) से क्या अभिप्राय होगा? ( उत्तर ) भरतसूत्र में रस की निष्पत्ति नहीं कही गयी है, किन्तु उसके विषयभूत आस्वादन ( रसना ) की निष्पत्ति का उल्लेख किया गया है । और उस रसना विषयक निष्पत्ति से यदि केवल रसनाश्रित रस की निष्पत्ति का ( उपचार द्वारा ) अभिधान हो तो भी यह असंगत नहीं है । सा च रसना न प्रमाणव्यापारो न कारकव्यापारः । स्वयं तु नाप्रामाणिकी स्वयं संवेदनसिद्धत्वात् । रसना च बोधरूपैव, किन्तु बोधान्तरेभ्यो लौकिकेभ्यो विलक्षणैव, उपायानां विभावा-दीनां लौकिकवैलक्षण्यात् । तेन विभावादिसंयोगाद्रसना यतो निष्पद्यतेऽतस्तथाविधरसनागोचरो लोकोत्तरोऽर्थो रस इति तात्पर्य सूत्रस्य । रस सम्बन्धी यह आस्वादन ( रसना ) न प्रमाणों का ( अर्थात् ज्ञापक हेतु विषयक ) व्यापार और न कारक हेतु विषयक व्यापार माना जा सकता है । और इसका साक्षात् अनुभव होने से स्वसंवेदनीयता हो जाने के कारण इसे असत्य या अप्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । आस्वादन ( रसना ) प्रतीति रूपा ही है किन्तु विभावादि लौकिक प्रमाणों [ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि ] से विलक्षण होने से यह प्रतीति अन्य लौकिक ज्ञानों क्षण है । यही आस्वादनस्वरूपरसना विभावादि के संयोग से निष्पन्न होने के कारण उस प्रकार की प्रतीति का विषय होकर लोकोत्तर अर्थ में रस्यमान होने के कारण ' रस ' कहलाती है । यही ' निष्पत्ति ' का तात्पर्य यहाँ स्वीकार किया जाएगा । अयमत्र सङ्क्षेपः । मुकुटप्रतिशोर्षकादिना तावन्नटबुद्धि-राच्छाद्यते । गाढ़प्राक्तन संवित्संस्काराच्च काव्यबलानीयमानापि न तत्र रामधीर्विश्राम्यति । अत एवोभयदेशकालत्यागः । रोमाञ्चा-

पृष्ठ 405

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२७६ नाट्यशास्त्रम् दयश्च भूयसा रतिप्रतीतिकारितया दृष्टास्तथापि लौकिकदेशकाला-नियमेन तत्र रतिं गमयन्ति । यस्यां स्वात्मापि तद्वासनावत्वादनु-प्रविष्टः अत एव न तटस्थतया रत्यवगमः । न च नियतकारणतया, येनार्जनाभिष्वङ्गादिसम्भावना, न च नियतपरात्मैकगततया येन दुखद्वेषाद्युदयस्तेन साधारणीभूता सन्तानवृत्तेरेकस्या एव वा संविदो गोचरभूता रतिः शृङ्गारः । साधारणीभावना च विभावादिभिरिति । साधारणीकरण-संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि - मुकुट तथा चेहरे मुखौटे ( प्रतिशीर्षक ) आदि नेपथ्य विधान के कारण पहले नट विषयिणी बुद्धि आच्छादित की जाती है । और परम्परागत पूर्वकालिक ज्ञान, संस्कार तथा काव्य के द्वारा बलात् रामबुद्धि उसमें [ नट में ] स्थिर नहीं की जा सकती है । अतः नट से सम्बद्ध देशकालादि का परित्याग हो जाता है । और यद्यपि व्यभिचारिभाव रत्यादि की प्रतीति करवाने वाले रूप में देखे जाते हैं किन्तु फिर भी वे ( व्यभिचारी भाव तथा रोमाञ्चादि अनुभाव भी ) देशकालादि के नियम के बिना रत्यादि की प्रतीति करवाते है; जिस प्रतीति में संस्कारयुक्त होने के कारण सहृदय की अपनी आत्मा भी आ जाती है । अतएव रत्यादि की तटस्थरूप से प्रतीति नहीं होती । और न निश्चित कारणों से होती है जिससे अर्जन विषयक आवेश आदि विघ्नों की सम्भावना हो । और न निश्चित रूप से उसकी परगत ( नटगत ) प्रतीति होती है जिससे दुःख, द्वेषादि की उत्पत्ति हो । इसलिये ( क्षणिकतावादियों ( बौद्धों ) की तरह ) साधारणीभूत चित्तवृत्तिप्रवाह की अथवा ( स्थिरतावादियों या नैयायिकादि ) की तरह ) एक ही ज्ञान की विषयभूत प्रत्यक्षरूपा ' रति ' ही शृङ्गाररस है । यह साधारणीकरण विभावादि के द्वारा सम्पन्न होता है । तत्र विभावप्राधान्येन साधारणीभावो यथा— " केलीकन्दलितस्य विभ्रममधो धुर्यं वपुस्ते दृशो-ङ्गीभर कामकार्मुकमिदं नर्मकर्मक्रमः । आपातेऽपि विकारकारणमहो वक्त्राम्बुजन्मासवः सत्यं सुन्दरि वेधसस्त्रिजगतीसारं त्वमेका कृतिः ” ॥

पृष्ठ 406

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षष्ठोऽध्यायः २७७ उनमें विभाव की प्रधानता के कारण साधारणीकरण का उदाहरण: -हे सुन्दरी, ( रति क्रीड़ा रूप ) केलि से उत्पन्न विभ्रमरूप मधु को धारण करने वाला तुम्हारा शरीर है, तुम्हारी भौहों का परिहास विलास विशेष भंगी से टूटने वाला अनंग का धनुष है और तुम्हारे मुखकमल से उत्पन्न आसव केवल सूंघने के मात्र से ( बिना पिये ही ) विकार उत्पन्न करने वाला है । अतः तुम सचमुच तीनों लोकों में सारभूता ब्रह्मा की अप्रतिम रचना हो । अत्र च विभावकृतं तत्सौन्दर्य प्राधान्येन भाति । तदनुगतत्वेन केलीविभ्रमभङ्गुरनर्मवचोमहिना चानुभाववर्गो, भङ्गीक्रमविकारादि-शब्दबलाच्च विभाववर्गः प्रतिभातीति । अत एव नास्फुटत्वाशङ्कात्र रत्यास्वादमये शृङ्गारे विधेया । इसमें विभाव ( नायिकारूप आलम्बन ) की प्रधानता के कारण ( उसका ) सौन्दर्य व्यक्त हो रहा है । केलि, विभ्रम, भंगुर, नर्म आदि शब्दों द्वारा अनुभाव - वर्ग का और भंगी, क्रम, विकार आदि शब्दों की सामर्थ्य से व्यभिचारिभाव उसी विभाव के अनुगामी रूप में प्रतीत होते हैं । [ अतः विभावरूप नायिका के सन्दर्भ में स्थायीभाव ( रति ) का सहज साधारणीकरण हो जाने के कारण ] यहाँ रति आदि के आस्वाद्य शृङ्गारादि में अस्पष्टता की आशंका नहीं करना चाहिए । अनुभावप्राधान्यं यथा शुद्धसारस्वतप्रवाह पवित्र सकलवाङ्मय-महार्णवपूर्ण भावसम्पादनाद् द्विजराजस्येन्दुराजस्य-" यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् । दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥ ” इति । अनुभाव की प्रधानता के कारण साघारणीभाव का उदाहरण शुद्ध सरस्वती के प्रवाह से पवित्र समस्त वाङ्मयरूपी महार्णवा को अपनी कृतियों से परिपूर्ण करने वाले द्विजश्रेष्ठ उपाध्याय भट्टेन्दुराज का यह पद्य है:: -

पृष्ठ 407

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२७८ नाट्यशास्त्रम् जो गोपियों की आँखे कहीं रुक कर देखने में स्थिर नहीं हो पा रही हैं एवं उनके अंग कटी हुई कमलिनी के मृणालदण्ड के समान प्रतिदिन क्षीण ( और म्लान ) होते जा रहे हैं और उनके कपोलों पर दूर्वा के समान जो गहरा पीलापन दिखाई दे रहा है वह सब कृष्ण के युवक होने और गोपाङ्गनाओं के युवती होने के कारण है । ऐसे समय उनके वेष की यही दशा होती है । अत्र विश्रम्येति, बहुशः इति, प्रतिदिनमिति च पदसमर्पिता व्यभिचारिणः कृष्ण इत्यादिपदार्पितश्च विभावो गुणत्वेन प्रतिभासते । विश्रान्तिलक्षणस्तम्भविलोकन वैचित्र्यगात्रतानवतारतम्य पुलक वैवर्ण्य-प्रभृतिस्त्वनुभावसञ्चयः प्रधानतया । यहाँ ' विश्रम्य ' ' बहुशः ' तथा ' प्रतिदिन ' पदों से व्यभिचारिभाव की प्रतीति होती है तथा कृष्ण पद से प्रतीति होने वाला विभाव है जो यहाँ अप्रधान रूप से व्यक्त हो रहा है । तथा विश्रान्तिरूप स्तब्धता, देखने की विचित्रता, शरीरगत कृशता का तारतम्यभाव, रोमाञ्च तथा विवर्णता आदि अनुभाव वर्ग प्रधान रूप यहाँ से प्रतीत हो रहा है । व्यभिचारिणां तु प्राधान्यम् तद्विभावानुभावप्राधान्यकृतम् । तत्राद्यं यथा महाकवेः ( अभिनव ) कालिदासस्य ( कलशकस्य ) -" आत्तमात्तमधिकान्तमुक्षितुं कातरा शफरशङ्किनी जहौ । अञ्जलौ जलमधीरलोचना लोचनप्रतिशरीरलाञ्छितम् ” ॥ विभावों और अनुभावों के प्राधान्य से व्यभिचारि भावों का प्राधान्य कैसे हो जाता है [ अर्थात् विभाव के प्राधान्य से व्यभिचारिभाव का प्राधान्य व्यक्त होना ] इसका उदाहरण है ( अभिनव ) कालिदास ( कलशक ) का निम्न पद्य: --वह चञ्चलनयना नायिका अपने प्रियतम पर फेंकने के लिये बार-बार हाथ में लिये हुए जल को अपने नायकों की छाया पड़ने से मछली की आशंका करती हुई छोड़ देती है ।

पृष्ठ 408

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षष्ठोऽध्यायः २७ ९ इत्यत्र सुकुमारमुग्धप्रमदाजनभूषणभूतस्य व्यभिचारिवर्गस्य वितर्कत्रासशङ्कादेः प्राधान्यं तद्विभावानां प्राधान्यात् सौन्दर्या-तिशयकृतम् । आत्तमाप्तमित्याद्यर्पितानुभावर्गस्तु तदनुयायी । एवं द्वयप्राधान्ये चोदाहार्यम् । किन्तु समप्राधान्ये एव रसास्वादयोत्कर्षः । यहाँ नायिका का सौन्दर्यगत सौकुमार्य और भोलापन उनके आभूषणभूत वितर्क, त्रास तथा शंका आदि व्यभिचारिभावों की प्राधान्यता को व्यक्त करता है जो कि विभाव के प्राधान्य से उनके सौन्दर्यातिशय के कारण प्रतीत हो रहा है । यहाँ ' आत्तम् आत्तम् ' इत्यादि पदों से सूचित अनुभाव व्यभिचारिभावों के अनुगामी प्रतीत होते हैं । [ ये उदाहरण विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों के पृथक् प्राधान्य के हैं ] इसी प्रकार दो - दो की प्रधानता के उदाहरण भी समझना चाहिए । किन्तु दोनों की तुल्यप्रधानता में ' ही रसास्वाद का उत्कर्ष सम्पादित होता है । तच्च प्रबन्ध एव भवति । वस्तुतस्तु दशरूपक एव । यदाह वामनः- ' सन्दर्भेषु दशरूपकं श्रेयः ” ( काव्यालं ० सू ० १-३-३० ) " तद्विचित्रं चित्रपटवद्विशेषसाकल्यात् " ( काव्यालं ० सू ० १-३-३१ ) इति । तद्रूपसमर्पणया तु प्रबन्धे भाषा - वेष - प्रवृत्त्यौचित्यादि-कल्पनात् । तदुपजीवनेन मुक्तके । तथा च तत्र सहृदयाः पूर्वापरमुचितं परिकल्प्य ' ईडगत्र वक्तास्मिन्नवसरे ' इत्यादि बहुतरं पीठबन्धं रूपं विदधते । और वह समप्राधान्य जनित रसोत्कर्ष ' प्रबन्धकाव्य ' में ही होता है और ( केवल ) काव्य में ही क्यों, वह इसकी अपेक्षा वास्तव में दशरूपकों [ नाटकादि ] में ही होता है । जैसा कि वामन ने अपने ग्रन्थ में कहा है कि - ' प्रबन्धकाव्यों में दशरूपक ही श्रेष्ठ होते हैं ' [ का ० सू ० १-३-३० ] " क्योंकि वे चित्रपट के समान समस्त विशेषताओं से युक्त रहते हैं " [ का ० सू ० १-३-३१ ] । प्रबन्धकाव्यों में ( नाटकादि ) रूपक के समान

पृष्ठ 409

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२८० नाट्यशास्त्रम् भाषा, वेष, प्रवृत्ति के औचित्य की कल्पना द्वारा ( रसानुभूति होती है ) और उस प्रबन्ध - काव्य के आश्रित होने से मुक्तक- काव्यों में रसानुभूति संभव हो जाती है । क्योंकि उसमें सामाजिक ( सहृदय ) पुरुष मुक्तक - काव्य के सम्बन्ध में ' यह इस प्रकार का वक्ता है ' इत्यादि पूर्वापर कल्पनाएँ कर के प्रसंग के अनुकूल बहुत सी भूमिकाएँ बना डालते हैं । तेन ये काव्याभ्यासप्राक्तनपुण्यादिहेतुबलादिभिः सहृदया-स्तेषां परिमितविभावाद्यन्मीलनेऽपि परिस्फुट एवं साक्षात्कार कल्पः कान्यार्थः स्फुरति । अत एव तेषां काव्यमेव प्रीतिव्युत्पत्तिकृत्, अनपेक्षितनाट्यानामपि । तेषामपि तु नाट्ये ' निपतिताः स्फुरिताः शशिरश्मयः ' इति न्यायेन सुतरां निर्मलीकरणम् । अहृदयानाञ्च तदेव नैर्मल्याधायि यत्र पतिता गीतवाद्यगणिकादयो न व्यस नितायै पर्यवस्यन्ति नित्योपकरणात् । इसलिये जो सहृदय पुरुष काव्य के अभ्यास तथा पूर्वजन के संस्कार से परिमार्जित हैं उन्हें मुक्तक काव्य में सीमित ( परिमित ) रूप से व्यक्त विभावादि अधिक प्रत्यक्ष, स्पष्ट ( व्यापक ) तथा साक्षात्कारात्मक हो जाते हैं, जिससे काव्यार्थ [ रस ] की प्रतीत्ति निर्बाध होती है । इसलिये नाट्य की अपेक्षा न रखने वाले सहृदयों ( सामाजिकों ) के लिये काव्य ही रसप्रतीति और व्युत्पत्ति का कारण [ या देने वाला ] होता है । और ऐसे सहृदयों के द्वारा ' दर्पण पर गिरने वाली चन्द्र किरणों से जैसे उसका प्रकाश बढ़ जाता है ' इसी तरह नाट्य का रसानुभव और भी अधिक निर्मलरूप में ग्रहण किया जाता है । और उन असहृदयों के लिये भी ( वही ) नाट्य नैर्मल्य का [ अर्थात् सहृदयत्व का ] आधान करने वाला होता है जिन्हें नित्य प्रयोग के कारण अभ्यास रखने पर गीत, वाद्य तथा गणिका के नृत्य आदि कलाएँ व्यसन रूप नहीं बन जाती हों तत्र च नटो ध्यायिनामिव ध्यानपदम् । नहि तत्र ' अयमेव सिन्दूरादिमयो वासुदेवः ' इति स्मरणीयप्रतिपत्तिः, अपि तु

पृष्ठ 410

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षष्ठोऽध्यायः २८१ देवताविशेषो ध्यायिनां तदुपायद्वारेणातिस्फुटीभूतसङ्कल्पगोचरो फलकृत् । तद्वन्नाट्यप्रक्रियाद्वारोदितातिस्फुटाध्यवसायविषयितो नियत देशकालाद्य स्पष्टविधिस्थानीयोऽर्थो ' अत इदं फलम् ' इति व्युत्पत्तिं वितरति । यत्र दृश्येऽभिनयादौ चित्तवृत्त्यादौ वा न बाधकोदयः । सम्यग्ज्ञानभूतमेवेदं पूर्णम् । तेन राम इत्येव प्रतीतिः, न स्वयं न राम्रो, अन्योऽयमिति । स्फुटीकरिष्यते चैतदग्रतः । उस नाट्य में नट की स्थिति उसी प्रकार है जैसे ध्यान करने वालों के लिये ध्यान का स्थान ( मूर्ति ) होता है । यहाँ ' ये सिन्दूर आदि से युक्त वासुदेव हैं ' इस रूप में स्मरणीय ( इष्टदेव ) की प्रतीति नहीं होती है । किन्तु उस मूर्तिरूप उपाय के द्वारा देवताविषयक ध्यान स्पष्टतः संकल्प का विषय होकर फलसिद्धि का कारक होता है । इसी प्रकार नाट्य की कलात्मक प्रक्रिया के द्वारा जो ज्ञान अत्यन्त स्पष्ट रूप से उदित होता है । वह निश्चयात्मक होकर देशकाल की सीमा के स्पर्श से मुक्त होकर अर्थ की व्यञ्जना के द्वारा परिणाम या फल का विधि - स्थानीय अर्थ अर्थात् ‘ इस कर्म का यह फल होता है ' ऐसा ज्ञान करवाता है । नाट्याभिनय के देखने से सामाजिक की चित्तवृत्ति में प्रत्यक्षादि से उत्पन्न बाधाएँ नहीं आतीं, अतः यह ज्ञान पूर्ण या सम्यक् ज्ञान ही कहलाता है । अतएव यहाँ ‘ अभिनेता राम है ’ केवल इस बात की ही प्रतीति होती है " यह राम नहीं है ' या ' यह राम से अन्य ( अभिनेता ) है ' ऐसी प्रतीति नहीं होती । इसे हम आगे चल कर और अधिक स्पष्ट करेंगे । ( नाट्यशास्त्र - गद्यांश ) को ' दृष्टान्तः । अत्राह - यथाहि नाना-व्यञ्जनौषधिद्रव्यसंयोगाद्रसनिष्पत्तिर्भवति । यथा हि- गुडादि-१. को वा दृष्टान्त इति चेत् - उच्यते - ग ० । २. तथा नानाभावोपगमाद्रसनिष्पत्तिः । यथा गुडादिभिर्द्रव्यं व्यञ्जनैरोषधी भिश्च षड्रसा निवर्त्यन्ते एवं नानाभावोपहिता अपि स्थायिनो भावा रसत्व-माप्नुवन्तीति- ग ० घ ० ।