श्रीगणेशाय नमः।
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 411–420
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 411–420
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२८२ नाट्यशास्त्रम् भिर्द्रव्र्व्यञ्जनौषधिभिश्च षाडवादयो रसा निर्वर्तन्ते तथा नानाभावो -पगता ' अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्तीति । प्रश्न — क्या इस विषय में ( कोई समानता निदर्शक ) दृष्टान्त हो सकता है? उत्तर - हाँ । जैसे गुड आदि पदार्थों, भाजियों तथा ( अन्य ) जीरक, हल्दी आदि औषधियों से युक्त व्यञ्जन द्वारा छः प्रकार के ( लौकिक ) रस निष्पन्न, ( सम्पन्न आस्वादित ) होते हैं । ठीक उसी तरह अनेक भावों से युक्त स्थायीभाव रसत्व ' ' की प्राप्ति कर लेते हैं । ( अभिनवभारती - ) तत्रालौकिकोऽयमर्थो न दृष्टान्तमन्तरेण हृदयङ्गमो भवेदित्याशयेनाह को दृष्टान्त इति । बहुनां संयोगादपूर्वो रस उत्पद्यमानः क्व इष्ट इत्यर्थः । रस के अलौकिकत्व को बिना दृष्टान्त के ठीक तरह से समझा नहीं जा सकता है इस आशय से भरतमुनि कहते हैं कि- इसमें क्या दृष्टान्त है इत्यादि । अभिप्राय है कि विविध पदार्थों के संयोग से रस की उत्पत्ति कहाँ देखी गयी? [ या उसकी उत्पत्ति का प्रमाण क्या है? ] अत्र प्रश्ने भाष्येण प्रतिवचनमाह यथेत्यादिनाप्नुवन्तीत्यन्तेन । व्यञ्जनमुपसेचनद्रव्यम् । तच्च नानातिक्तमधुरचुकादिभेदाद् दधि-काञ्जिकादिओषधयश्विश्चागोधूमदलहरिद्रादयः । द्रव्यं गुडादि । एषां पाकक्रमेण सम्यग्योजनारूपात्कुशल सम्पाद्यात्संयोगात् षाडवादय इति लोकप्रसिद्धेभ्यः परस्परविविक्तेभ्यो मधुरतिक्ताम्ललवणकटु-कषायेभ्यो मिश्रेभ्यश्चः विलक्षणः षाडवशब्दवाच्यः तत्प्रधाना बहुत रा रसनयोग्याः क्रियन्ते । तथैव नानाभूतैर्विभावादिभिरुप समीपं प्रत्यक्षकल्पतां गता लोकापेक्षया ये स्थायिनो भावास्ते रस्यमानतैक-जीवनं रसत्वं तत्र प्रतिपद्यन्ते । इस प्रश्न का भरतमुनि ने अपने भाष्य [ मूल में प्रस्तुत वार्तिक भूत गद्यभाग ] के द्वारा उत्तर दिया है- ' यथा ' से लेकर ' आत ' तक के भाग से । व्यञ्जन का अर्थ है उपसेचन पदार्थ । और यह पदार्थ तिक्त, मधुर, खट्टा आ आदि भेदों से तथा १. भावोपहिता घ ० ।
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२८३ दधि, काँजी आदि प्रकारों से अनेक प्रकार का होता है । औषधियों से तात्पर्य है इमली, गेहूँ, दाल, हल्दी आदि पदार्थ । द्रव्य हैं गुड आदि । इन सबको कुशल पाचक भली प्रकार मिलाकर ' संयोग ' की स्थिति निर्माण करता है । इस तैयार किये गये ( षाडव ) पेय में लोकप्रसिद्ध मधुर, तिक्त, खट्टा, नमकीन, कडवा और कसेला आदि का अलग अलग - स्वाद नहीं होता उनके मिश्रण से एक मिश्रित या भिन्न स्वाद का ग्रहण होता है और षाडवप्रधान बहुत से आस्वाद्य पदार्थ बन जाते हैं । इसी प्रकार अनेक प्रकार के विभावादि के द्वारा ' उप ' समीपता को प्राप्त अर्थात् उत्पन्न होकर प्रत्यक्षकल्पता को प्राप्त हुए रूप में, लौकिक सन्दर्भ में या लौकिक भावों की अपेक्षा से जो स्थायीभाव हैं वे अपने रसमयतारूप प्राणतत्व के साथ नाटकादि में रसत्व को प्राप्त करते हैं । एतदुक्तं भवति । पाकरूपया सम्यग्योजनया तावदलौकिको रसो जायते । तत्र च प्रधानत्वेन जलस्य रसाभिव्यञ्जकत्वमिति व्यञ्जनं विभावस्थानीयं चिञ्चाहरिद्राद्यनुभावप्रायम् । द्रव्याणि तु गुडादि, तदीयचुकादिरसविलक्षणमधुरादियोगाद्वयभिचारिकल्प स्वात्मनि तदुपजीवनेन च परत्र च स्व - रस - सङक्रमणया वैचित्र्याधायकत्वात् । इसका आशय यह है कि- पाचन रूप सम्यक् संयोग के द्वारा - षाडवादि रूप लौकिक रस की उत्पत्ति होती है । और इस प्रकार के पदार्थों में प्रधानरूप में रस को अभिव्यञ्जक जल होता है. इसलिये उपसेचन रूप व्यञ्जन के काव्य में विभाव स्थानीय मानना चाहिए । और इमली आदि औषधियों को काव्य में अनुभाव स्थानीय समझना चाहिए । गुड आदि जो द्रव्य हैं उनके साथ खट्टे आदि रस से विलक्षण ( भिन्न ) मधुरादि रस के योग होने से उन्हें व्यभिचारिभावों के स्थान पर समझना चाहिए । और वे ( गुडादि द्रव्य ) अपने आन्तरिक स्वाद के साथ अन्य द्रव्यों में अपने रस के संक्रमण द्वारा विचित्रता का आधान करने से व्यभिचारिभाव के समान माने जा सकते हैं । अत्र तु स्थायिकल्पस्तम्मिश्रणासमयभावी रसविशेषो विभाव-
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२८४ नाट्यशास्त्रम् कल्पव्यञ्जननितो मन्तव्यः । स हि लौकिकः । अयन्तु कुशलैक-निवर्त्यस्तद्विदां रसनीयो भवति । तेनान्नस्येत्यध्याहारो न युक्तः । यथा हि दान्तिक सूत्रे स्थायिग्रहणं शल्यकल्पमिति त्रयमेवोपात्तं तथा दृष्टान्तेऽपि त्रयस्यैवोपादानं युक्तम् । परन्तु यहाँ लौकिक रसों के प्रसंग में यह कहा जा सकता है कि मिश्रणकाल में अलग - अलग द्रव्यादि में न रहने वाला रसविशेष विभाव सदृश व्यञ्जन से उत्पन्न समझना चाहिए । यह लौकिक रस है । यह लौकिक रस कुशल पाचकों द्वारा उत्पन्न किया जाकर उसके विज्ञाता जन के द्वारा आस्वादनीय होता है । इसलिये यहाँ ' अन्न ' पद का अध्याहार करना उचित नहीं है । इस लौकिक रस की प्रक्रिया को यहाँ दृष्टान्त रूप में उपस्थित किया गया है और दान्तिक काव्यरस की प्रक्रिया के द्वारा इसकी पुष्टि की गयी है अतएव जैसे दाष्टन्तिक में स्थायीभाव का ग्रहण बाधक होता है इसीलिये उसको छोड़ कर विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभाव इन तीन को ही ग्रहण किया गया है इसी प्रकार दृष्टान्त में भी अन्य को छोड़ कर व्यञ्जन रूप जल आदि विभवास्थानीय, इमली आ अनुभवस्थानीय तथा गुड आदि को व्यभिचारिभाव के स्थानीय ग्रहण करते हुए तीनों को ही ग्रहण करना उचित है । ( नाट्यशास्त्र -गद्यांश ) अत्राह - रस इति कः पदार्थः? उच्यते-आस्वाद्यमानत्वात् । कथमास्वाद्यते रसः? यथा हि नानाव्यञ्जन-संस्कृतमन्नं भुञ्जाना रसानास्वादयन्ति सुमनसः पुरुषा हर्षादींश्चाधि-गच्छन्ति, तथा नानाभावाभिनयव्यञ्जितान् वागङ्गसत्त्वोपेतान् स्थायि-भावानास्वादयन्ति । सुमनसः प्रेक्षकाः हर्षादींश्चाधिगच्छन्ति ' तस्मान्नाट्यरसाः इति व्याख्याताः । प्रश्न - रस कौन पदार्थ है? ( अर्थात् रस को रस कहने में क्या १. ' रस यह कौन पदार्थ है ' इत्यादि के द्वारा यहाँ सूत्र के लक्षणपद की व्याख्या के लिये आक्षेप ( प्रश्न ) किया गया है । रस शब्द की प्रसिद्धि या शक्ति मधुरादि १. कथमास्वाद्यो ग ० । २. अयं भागः ग — पुस्तके नास्ति ।
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षष्ठोऽध्यायः २८५ कारण है )? उत्तर — यह आस्वाद्य ( होने वाला ) –पदार्थ है । प्रश्न-रस का आस्वादन कैसे किया जाता है? उत्तर — जैसे पुरुष सुसंस्कृत ( शुद्धता से निर्मित ) अनेक व्यञ्जनों का भोजन करते हुए मधुर आदि रस, पारद, विषय, सार, जलसंस्कार, अभिनिवेश ( आग्रह ), काढ़ा, देह, धातु का सार आदि अर्थों में है । यह इसके अतिरिक्त अर्थों में प्रसिद्ध नहीं है । पर प्रस्तुत प्रसङ्ग में श्रृंगारादि अर्थ में प्रयुक्त होनेवाले रस शब्द का क्या अर्थ है और उसका क्या प्रवृत्तिनिमित्त है? यहाँ यह शब्द अपने विशिष्ट अर्थ का नियमन कैसे करता है और प्रयोक्ता की इस विशिष्ट अर्थ को ग्रहण करने में या उस अर्थ का ज्ञान करने में कैसे प्रवृत्ति होती है? प्रस्तुत प्रश्न के ये सभी अभिप्राय हैं । यहाँ प्रश्नवाक्य में प्रयुक्त ' अर्थ ' शब्द प्रवृत्तिनिमित्त का ग्राहक है । [ अ ० भा ० ] १. रस शब्द की शृङ्गारादि के लिये प्रवृत्तिनिमित्तता को बतलाने के लिये भरतमुनि ने ' आस्वाद्यमानत्वात् ' कहकर उत्तर दिया । इस प्रकार प्रवृत्ति के हेतु पर जो प्रश्न किया गया था उसका हेतुसूचक पञ्चमी विभक्ति के द्वारा उत्तर दिया गया है । अतएव रस शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त आस्वादन किया है ( यह तात्पर्य स्पष्ट हो जाता है ) । आगे रस के प्रवृत्ति निमित्त पर आक्षेप करने के लिए पुनः कहा गया कि ' इसका आस्वादन कैसे किया जाता है '? क्योंकि लोक में रसनेन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान को ' आस्वादन ' कहते हैं और शृङ्गार आदि का ज्ञान तो रसनेन्द्रिय से होता नहीं । तब उसे आस्वादन कैसे कहा जा सकता है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि यहाँ प्रयुक्त ' यथा ' शब्द इस बात का सूचक है कि यह औपचारिक क्रिया का आश्रय लेकर सादृश्य को व्यक्त करने के लिये कहा गया है । भोग्य, भोक्ता तथा फल की स्थिति सादृश्य के अनुसार होती है । जैसे नाना व्यंजन द्रव्यों से संस्कृत अन्न की आस्वाद्यता का अनुभव एकाग्रचित्त से आस्वादन करने वाले पुरुष को होता है और इस आस्वादन का फल प्रसन्नता, तृप्ति, जीवन, पुष्टि, बल आरोग्यादि प्राप्त होता है । इसी प्रकार अभिनय के द्वारा व्यक्त होने वाले रस के विषय में जान लेना चाहिए । स्थायी भाव की रस रूप में आस्वाद्यता, ( भोग्य ) एकाग्र चित्त और तन्मय हुए सामाजिक में आस्वादयितृत्व ( भोक्ता ) तथा आनन्दप्रधान धर्मादि के ज्ञान
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२८६ नाट्यशास्त्रम् ( उसमें विद्यमान ) रसों का आस्वादन कर प्रसन्न होते हैं; वैसे ही अनेक भावों ( संचारियों ) से अभिव्यक्त, वाणी ( वाचिक ) से, शरीरावयव से ( आंगिक ) तथा सत्व ( सात्विक ) से युक्त ' स्थायी ' भाव का सहृदय प्रेक्षक आस्वादन करते हैं, तथा उसे ग्रहण कर आमोदित होते हैं । इस प्रकार ' नाट्य ' में विद्यमान तथा अनुभूत रसों की व्याख्या की गयी । अत्रानुवंश्यौ श्लोकौ भवतः—
यथा बहुद्रव्ययुतैर्व्यञ्जनैर्बहुभिर्युतम् ।
आस्वादयन्ति भुञ्जाना भक्तं भक्तिविदो जनाः ॥
भावाभिनय संबद्धान्स्थायिभावांस्तथा बुधा । आस्वादयन्ति मनसा तन्मान्नाट्यरसाः स्मृताः इस विषय के निदर्शक ( संग्रह - स्वरूप ) परम्परा ३३ ॥ ॥ ३४ ॥
प्राप्त दो श्लोक एवं नैपुण्य आदि की प्राप्ति को यहाँ फल कहा गया है । अतएव कर्त्ता, कर्म तथा फल के सादृश्य के कारण विभावादि से उत्पन्न प्रतीति विशेष यहाँ आस्वादन क्रिया के रूप में वर्णित है । यहाँ कुछ व्याख्याताओं ने व्यंजनादि के आस्वादन और रसप्रतीति सादृश्य में दोष बतलाया है । उनके मत में अन्नादि के आस्वादन में तीन अवान्तर विभाग होते हैं - ( १ ) आत्मा [ आस्वादयिता ]; ( २ ) रसना [ आस्वादक इन्द्रिय, आस्वादनक्रिया ] तथा ( ३ ) मन । और यहाँ रस के विषय में केवल [ एक ] आस्वादन मात्र है । यही दोनों स्थलों में वैषम्य है । इन्हीं व्याख्याताओं ने इस विषमता के परिहारार्थ युक्ति दी है कि यहाँ आत्मा ही - स्थानान्तरिक होकर मनःस्थानीय हो जाता है और मन रसस्थानीय होता | आचार्य अभिनव का मत है कि यह तर्कना व्यर्थ है क्योंकि यहाँ भरतमुनि को रसोत्पत्ति में उपचार या सादृश्य का प्रधानरूप से प्रतिपादन मात्र अभीष्ट है । १. भुक्तं भुक्तविदो – । २. भावाभिनयसंयुक्ताः स्थायिभावास्ततो — ग ०, घ ० ।
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२८७ ( आनुवंश्य श्लोक ' ) भी है - जैसे भोजन के रस - वेत्ता अनेक पदार्थों से युक्त व्यजनों का आस्वादन करते हैं उसी प्रकार अनेक भाव तथा अभिनय युक्त स्थायीभावों का सहृदय जन मानस - आस्वादन करते हैं । इसीलिये ये स्थायीभाव नाट्य रचनाओं - में ' रस ' कहलाते हैं ॥ ३३-३४ ॥ १. आनुवंश्य श्लोक - भरत के पूर्ववर्ती आचार्यों के वचन हैं जो शिष्य तथा आचार्यों की परम्परा में चले आ रहे थे । भरत ने सूत्रार्थ - भूतं [ संक्षेप में अर्थ के प्रतिपादक होने से ] इन श्लोकों को भी ' कारिका ' मान कर गृहीत किया है । २. यहाँ ' बहुद्रव्ययुतैः ' पद से द्रव्य के रूप में गुडादि भेदों का ग्रहण किया गया है । बहुत से व्यंजन कहने से उपसेचन द्रव्य दधि, काँजी आदि का ग्रहण इष्ट है । इस प्रकार यहाँ विभावों के भेद से रसभेद की बात सूचित की गई है । ' भुञ्जाना: आस्वादयन्ति ' के द्वारा जिह्वा के भक्षणरूप व्यापार से अधिक मान-सिक व्यापार दिखलाया गया है । यह आस्वादन रसना का व्यापार न होकर मानस व्यापार है और वह मानस व्यापार स्वरूप आस्वादन शृङ्गारादि रसों के अनुभव में पूर्णतः विद्यमान रहता है । अतएव शृङ्गारादि शब्द का प्रयोग मुख्यरूप से भी किया जा सकता है किन्तु लौकिक व्यवहार में रसना व्यापार के बाद आस्वादन के अनुभव होने से यहाँ शृंगारादि के विषय में आस्वादन का प्रयोग औपचारिक है । ३. प्रस्तुत कारिका में ' भाव ' शब्द का प्रयोग विभाव तथा व्यभिचारिभाव के शुद्ध स्वरूप के प्रकट या ज्ञापित करवाने के लिये किया गया है । यहाँ ' अभिनय ' शब्द से अनुभावों का ग्रहण है और भावों से अनुभावों को अभिनय रूप होने से प्राधान्य प्राप्त करने के कारण अलग बतलाया गया है । उनसे अच्छी तरह ' संबद्ध ' अर्थात् हृदय की एकरूपता और तन्मयता प्राप्त करने वाला जो ' बुध ' या प्रमाता वह अपने हृदय में स्थायीभाव को सभी ओर से साधारणीभाव के द्वारा अभिन्न अनुभव करता है । इस कारण उसे साधारणी-करण के द्वारा अनिर्वचनीय रूप में स्थायीभावों की निर्बाध प्रतीति होती है । क्योंकि इन्द्रियों से बोध होने पर विधनों की संभावना हो सकती है किन्तु मानस आस्वादन के कारण बाधा की संभावना नहीं रहती । इस समय स्वगत या परगत भेद से शून्य प्रमाता होता है अत, स्वगतादि भेद के द्वारा होने
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२८८ नाट्यशास्त्रम् रस तथा भावों का सम्बन्ध अत्राह - किं रसेभ्यो भावानामभिनिर्वृत्तिरुताहो भावेभ्यो रसनामिति । ' उच्यते - केषांचिन्मतं परस्परसंबन्धादेषामभिनिष्प-त्तिरिति । तन्न । कस्मात्? दृश्यते हि भावेभ्यो रसानाम-भिनिर्वृत्तिर्न तु रसेभ्यो भावानामभिनिर्वृत्तिरिति । भवन्ति चात्र श्लोकाः-( वृत्ति ) प्रश्न ' क्या रस से भावों की उत्पत्ति होती है अथवा भाव से रसों की? उत्तर — बतलाते हैं । कुछ आचार्यों का मत है कि ये वाले विघ्न भी नहीं होते जिससे रसप्रतीति में विघ्न आयें । यह आस्वादन लौकिक विषय के आस्वादन और अनुभव से रहित होता है और योगिप्रत्यक्ष से भिन्न एक विलक्षण प्रकार की सुख - दुखात्मक स्थिति वाला होता है । यह आस्वादन ( चर्वण ) अनुभूत्यात्मक विलक्षणता में आह्लादात्मक होता है तथा यह विभावादि से उद्बुद्ध स्थायीभाव से प्राप्त होता है । इसका वे ही सहृदय ( ' बुध ' ) आस्वादन करते हैं - जो लौकिक प्रत्यक्ष के सम्बन्ध में चेष्टा तथा चित्तवृत्तियों के सामञ्जस्य का ज्ञान रखते हों । ये ही विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के द्वारा रस प्रतीति को ग्रहण करने के अधिकारी हैं । अतएव ' नाट्य ' अर्थात् विभावादि के समुदाय रूप से व्यक्त होने वाले ' रस ' अथवा नाट्यरूप रस ही ' नाट्यरस ' कहलाते हैं । इसका भाव यह भी हो सकता है । कि रससमुदाय ' रूप ही ' नाट्य ' है । [ अ ० भा ० ] १. अभिनेता में स्थित रसों से सामाजिक में भावों की उत्पत्ति माने जाने पर नट के द्वारा करुणरस के अभिनय से सामाजिक में शोक स्थायीभाव के उद्बुद्ध होने पर करुणरस की पुष्टि या प्रतीति होती है । अतः अभिनेता द्वारा प्रथम रसाभिनय के द्वारा समाजिकगत शोकादि स्थायीभाव की और फिर सामाजिक भाव की पुष्टि से सामाजिकगत रस की उत्पत्ति होती है । इसलिये क्या रस से भाव उत्पन्न होता है अथवा भाव से रस, यह सन्देह होता है । १. मिति केषाञ्चिन्मतम् - क ०; अत्रोयते - ग ० । २. मभिनिर्वृतिरिति ग ० । ३. वंश्ये – क; तत्र ग ० ।
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षष्ठोऽध्यायः २८ ९ पारस्परिक सम्बन्ध द्वारा उत्पन्न होते हैं । परन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि भावों से रसों की उत्पत्ति देखी जाती है रसों से भावों की नहीं । ( और इस सन्देह के कारण ही प्रस्तुत प्रश्न की प्रवृत्ति हुई ) । इसके अति-रिक्त तीसरा पक्ष यह भी है कि कालभेद से एक की दूसरे से उत्पत्ति होती है । [ आशय यह कि पहिले नटगत रस के अभिनय से भाव की उत्पत्ति होती है और बाद में सामाजिकगत भाव से सामाजिकगत रस की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार कालभेद हो जाता है ] । अथवा पहिले अनुकर्त्ता ( नट ) में अथवा अनुकार्य ( रामादि ) में भाव की उत्पत्ति होती है और फिर इस भाव के उप-चित होने पर उससे ( अनुकार्य या अनुकर्त्ता में ) रस की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार रस से भाव, भाव से रस तथा एक दूसरे से परस्पर दोनों की उत्पत्ति होने से तीन मत बन जाते हैं । ( इनमें उपचितरत्यादि को रस मानने वाले भट्टलोल्लट के मत का पहिले खण्डन किया जा चुका है । ) यहाँ ( नाट्य-शास्त्र के दूसरे व्याख्याकार ) श्रीशङ्कुक का कथन है कि अनुकर्ता के अभिनय में सामाजिक को रसों के आस्वादन रूप में अनुकार्यगत रत्यादि भावों की जो प्रतीति होती है वही सामाजिक में प्रवृत्तरस को उत्पन्न करती है । अतः भरत के द्वारा माग्यसिद्धान्तों के अनुसार यह ( भावों से रस की उत्पत्ति का ) दूसरा पक्ष है । इन्हीं दोनों मतों से तीसरा मत भी बन जाता है । पर ( शङ्कुक का ) यह कथन दोषपूर्ण है क्योंकि सामाजिक को अनुकार्य तथा अनुकर्त्ता के विभेद का ज्ञान नहीं होता और शङ्कुक के अभिमत ( ' रत्यादि तथा अनुकरण रस है ' इस ) अनुकरणवाद का खण्डन किया जा चुका है । अतएव इस पंक्ति की व्याख्या इस प्रकार होती है: क्या रसों में भावों की उत्पत्ति होती है, अथवा उसका विपर्यय है; या दोनों एक दूसरे को उत्पन्न करते हैं- ये तीन प्रश्न हैं । इन तीनों में विभावादिकों से रस की उत्पत्ति होती है यह कहा जा चुका है और यह दूसरा पक्ष पहिले ही स्वीकृत हो चुका है, [ अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा ( व्यभिचारि ) भावों से रस की उत्पत्ति होती है ] जो मुख्य पक्ष है । इस पर श्री शंकुक की आपत्ति है कि यह कैसे हो सकता है? क्योंकि लोक में विभाव, अनुभाव आदि नहीं होते, वहाँ ( लोक में ) तो उन्हें केवल कारण कार्य या अवस्था रूप ही माना जाताता है । यदि यह कहो कि वे ही १६ ना ० शा ० प्र ०
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२ ९ ० नाट्यशास्त्रम् इस विषय में ये ( परम्परा प्राप्त ) श्लोक भी ( कहे गए ) हैं-नानाभिनयसम्बद्धान्भावयन्ति ' रसानिमान् । यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः ॥ ३५ ॥
नाट्यप्रयोक्ता ' जन उन्हे ' भाव ' जाने, क्योंकि ये अनेक अभिनयों सें सम्बद्ध ( अनेक रसों ) को भावित ( उनकी मूलस्थिति को धारण ) करते हैं ॥
नानाद्रव्यै बहुविधैर्व्यञ्जनं मान्य यथा ।
एवं भावा भावयन्ति रसानभिनयैः सह ॥ ३६ ॥
जैसे अनेक प्रकारों तथा प्रभूत सामग्री से व्यञ्जनों का भावन नाट्य आदि में प्रयुक्त होने पर आस्वादन में उपयोगी होने से विभावादि रूप को प्राप्त हो जाते हैं तो फिर यह मानना होगा कि रस की कृपा से ही विभा-वादि होते हैं । और यदि यह कहो कि उन विभावादि के प्रसाद से रस की निष्पत्ति होती है तो अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है, क्योंकि विभावादि व्यवहार रस के कारण होता है और विभावादि से रस की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार ' भावों से रस की उत्पत्ति होती है ' इस स्वीकृत सिद्धान्त पर भी शंकुक के ये ही आक्षेप हैं कि एक दूसरे पर रहने वाले कार्य नहीं हो सकते । इसी के उत्तर में यहाँ भरतमुनि ने कहा है कि प्रमदादि विभावादि की प्रतीति ही रसास्वाद को उत्पन्न करती है अतएव रसों से भावों की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु भावों से रसोत्पत्ति होती है । १. नानाभिनय - भावशब्द ( के अर्थ ) का निर्वचन करने से यही बात युक्तिसंगत लगती है कि भावों से रस की उत्पत्ति होती है । यही ' नानाभिनय ' आदि कारिका से यहाँ कहा गया हैं । इस प्रकार के रसों से सम्बद्ध अर्थात् हृदयंगम होने वाले रसों को जो ' भावयन्ति ' अर्थात् उत्पन्न करते हैं, अतः ये भाव हैं । २. नानाद्रव्य - अनेक द्रव्यों के योग से जो व्यक्त होता है वह व्यञ्जन कहलाता है— इस व्युत्पत्ति के अनुसार यहाँ अनुपान - ( ठंडाई ) रस का अभि-प्राय व्यञ्जन शब्द से अभिप्रेत है । ' बहुविध ' पद व्यञ्जन का उपलक्षण है । [ अर्थात् जैसे अनेक द्रव्यों का अनुपात आस्वादन में व्यञ्जनरूप है, उसी प्रकार विविध भावों का संयोग प्रतीति रूप में रस है । ] द्रव्यों का यही बहुविधत्व १. सम्बन्धान् — ग ० ।
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२ ९ १ ( निर्माण, आस्वादन ) किया जाता है. वैसे ही भाव विभिन्न अभिनयों के द्वारा रसों को भावित करते हैं ॥ ३६ ॥
न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः ।
परस्परकृता सिद्धिस्तयोरभिनये भवेत् ॥ ३७ ॥
रस ' भावहीन नहीं होता तथा रसहीन भाव नहीं होता, इनके पार-स्परिक सम्बद्ध के सहारे से अभिनय में सिद्धि दिखाई देती है ॥ ३७ ॥
व्यञ्जनौषधिसंयोगो ' यथाऽन्न ' स्वादुतां नयेत् ।
एवं भावा रसाचैव भावयन्ति परस्परम् ॥३८ ॥
जैसे बिना औषधि ( हल्दी, मसाला आदि ) के संमिश्रण के व्यञ्जन स्वादु नही बनता इसी प्रकार रस एवं भाव परस्पर सम्मिश्रित होकर अथवा ' अभिनय ' का ' बहुविधेः ' विशेषण है, क्योंकि अभिनयों के अन्तर्गत भावों का बहुविधत्व परिलक्षित होता है, परन्तु ठंडाई आदि पेय द्रव्यों में अनेक द्रव्यों को मिलाकर एक रस बनाने के कारण ' बहुबिधत्व ' नहीं है इसलिये उसे व्यञ्जन का उपलक्षण कहा गया । १. न भाव - हीनो यह सिद्ध है कि " भाव के बिना रस नहीं होता है " क्योंकि इसीसे भरत का कथन ' भावो से रस उत्पन्न होते है ' प्रतिपादित होता है; परन्तु यहाँ तो ' भावों रसवजित ' भी कहा गया है । तब इसका अभिप्राय यह है कि लोक में रस के बिना विभावादिका व्यवहार नहीं होता । और इस पर उत्तर दिया गया हैं कि उन दोनों के पारस्परिक योग से होनेवाली सिद्धि अभिनय में होती है । क्योंकि अभिनय में रस का अनुभव होने पर उसके सहायक होने से कारणादि विभाव कहलाते हैं; इसलिये इन दोनों के योग से अभिनय की सिद्धि होना उचित ही है और दोनों का संयोग प्रयोजनीय है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष भी नहीं रहेगा ( जिसे अगले पद्य की व्याख्या में और स्पष्टतः बतला रहे हैं ) । २. व्यञ्जनोषधि — प्रस्तुत प्रसंग को उदाहरण के द्वारा बतलाते हैं - जैसे व्यञ्जन ( कांजी आदि द्रव्य ) तथा औषधियों का संयोग तथा उसका व्यञ्जन रूप १. संयोगो यथान्नं स्वादुतां नयेत् — ग ० ।