श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 831–840
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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१६०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दीर्घकालके पश्चात् सुदासकुमार मित्रसह अयोध्याके राजा हो गये ॥ १७ ॥
राजापि यजते यज्ञमस्याश्रमसमीपतः ।
अश्वमेधं महायज्ञं तं वसिष्ठोऽप्यपालयत् ॥ १८ ॥
' उन्हीं राजा मित्रसहने इस आश्रम के समीप अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया । महर्षि वसिष्ठ अपने तपो-बलसे उस यज्ञकी रक्षा करते थे ॥ १८ ॥
तत्र यशो महानासीद् बहुवर्षगणायुतः ।
समृद्धः परया लक्ष्म्या देवयज्ञसमोऽभवत् ॥ १ ९ ॥
' उनका वह महान यश बहुत वर्षोंतक यहाँ चलता रहा । वह भारी धन सम्पत्तिसे सम्पन्न यज्ञ देवताओंके यज्ञकी समानता करता था ॥ १ ९ ॥
अथावसाने यज्ञस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् ।
वसिष्ठरूपी राजानमिति होवाच राक्षसः ॥ २० ॥
' उस यज्ञकी समाप्ति होनेपर पहले के वैरका स्मरण करने-वाला वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप धारण करके राजाके पास आया और इस प्रकार बोला -- ॥ २० ॥
अद्य यज्ञावसानान्ते सामिषं भोजनं मम ।
दीयतामतिशीघ्रं वै नात्र कार्या विचारणा ॥ २१ ॥
" " राजन्! आज यज्ञकी समाप्तिका दिन है, अतः आज मुझे तुम शीघ्र ही मांसयुक्त भोजन दो । इस विषय में कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ' ॥ २१ ॥
तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं रक्षसा ब्रह्मरूपिणा ।
सूदान् संस्कारकुशलानुवाच पृथिवीपतिः ॥ २२ ॥
‘ ब्राह्मणरूपधारी राक्षसकी कही हुई बात सुनकर राजाने रसोई बनाने में कुशल रसोइयोंसे कहा ॥ २२ ॥
हविष्यं सामिषं स्वादु यथा भवति भोजनम् ।
तथा कुरुत शीघ्रं वै परितुष्येद् यथा गुरुः ॥ २३ ॥
“ तुमलोग आज शीघ्र ही मांसयुक्त हविष्य तैयार करो और उसे ऐसा बनाओ, जिससे स्वादिष्ट भोजन हो सके तथा मेरे गुरुदेव उससे संतुष्ट हो सकें ' ॥ २३ ॥
शासनात् पार्थिवेन्द्रस्य सूदः सम्भ्रान्तमानसः ।
तच्च रक्षः पुनस्तत्र सूदवेषमथाकरोत् ॥ २४ ॥
" महाराजकी इस आज्ञाको सुनते ही रसोइयेके मनमें बड़ी घबराहट पैदा हो गयी ( वह सोचने लगा, आज गुरुजी अभक्ष्य भक्षण में कैसे प्रवृत्त होंगे ) । यह देख फिर उस राक्षस-ने ही रसोइयेका वेष बना लिया ॥ २४ ॥
स मानुषमथो मांखं पार्थिवाय न्यवेदयत् ।
इदं स्वादु हविष्यं च सामिषं चान्नमाहृतम् ॥ २५ ॥
‘ उसने मनुष्यका मांस लाकर राजाको दे दिया और कहा -- " यह मांसयुक्त अन्न एवं हविष्य लाया हूँ । यह बड़ा ही स्वादिष्ट है ' ॥ २५ ॥
स भोजनं वसिष्ठाय पत्न्या सार्धमुपाहरत् ।
मदयन्त्या नरश्रेष्ठ सामिषं रक्षसा हृतम् ॥ २६ ॥
' नरश्रेष्ठ! अपनी पत्नी रानी मदयन्तीके साथ राजा मित्रसहने राक्षसके लाये हुए उस मांसयुक्त भोजनको वसिष्ठजी के सामने रक्खा || २६ ॥
ज्ञात्वा तदामिषं विप्रो मानुषं भाजनं गतम् ।
क्रोधेन महताविष्टो व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ २७ ॥
' थाली में मानव - मांस परोसा गया है, यह जानकर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ मद्दान् क्रोधसे भर गये और इस प्रकार बोले ॥२७ ॥
यस्मात् त्वं भोजनं राजन् ममैतद् दातुमिच्छसि ।
तस्माद् भोजनमेतत् ते भविष्यति न संशयः ॥ २८ ॥
" राजन्! तुम मुझे ऐसा भोजन देना चाहते हो, इसलिये यही तुम्हारा भोजन होगा; इसमें संशय नहीं है ( अर्थात् तुम मनुष्यभक्षी राक्षस हो जाओगे ) ॥ २८ ॥
ततः क्रुद्धस्तु सौदासस्तोयं जग्राह पाणिना ।
वसिष्ठं शप्तुमारेभे भार्या चैनमवारयत् ॥ २ ९ ॥
" यह सुनकर सौदासने भी कुपित और वसिष्ठ मुनिको शाप देना आरम्भ पत्नीने उन्हें रोक दिया ॥ २ ९ ॥ राजन प्रभुर्यतोऽस्माकं वसिष्ठो प्रतिशप्तुं न शक्तस्त्वं देवतुल्यं ' वे बोलीं-- ' राजन्! भगवान् स्वामी हैं; अतः आप अपने देवतुल्य नहीं दे सकते ' ॥ ३० ॥
हो हाथमें जल ले लिया किया । तबतक उनकी
भगवानृषिः ।
पुरोधसम् ॥ ३० ॥
वसिष्ठ मुनि हम सबके पुरोहितको बदले में शाप
ततः क्रोधमयं तोयं तेजोबलसमन्वितम् ।
व्यसर्जयत धर्मात्मा ततः पादौ सिषेच च ॥ ३१ ॥
' तब धर्मात्मा राजाने तेज और बलसे सम्पन्न उस क्रोध-मय जलको नीचे डाल दिया । उससे अपने दोनों पैरों को ही सींच लिया ॥ ३१ ॥
तेनास्य राशस्तौ पादौ तदा कल्माषतां गतौ ।
तदाप्रभृति राजासौ सौदासः सुमहायशाः ॥ ३२ ॥
कल्माषपादः संवृत्तः ख्यातश्चैव तथा नृपः । ऐसा करने से राजाके दोनों पैर तत्काल चितकबरे हो गये । तभी से महायशस्वी राजा सौदास कल्माषपाद ( चितकबरे पैरवाले ) हो गये और उसी नामसे उनकी ख्याति हुई ॥ ३२३ ॥
स राजा सह पत्न्या वै प्रणिपत्य मुदुर्मुहुः ।
पुनर्वसिष्ठं प्रोवाच यदुक्तं ब्रह्मरूपिणा ॥ ३३ ॥
' तदनन्तर पत्नीसहित राजाने बारंबार प्रणाम करके फिर वसिष्ठसे कहा -- ब्रह्मर्षे! आपहीका रूप धारण करके किसीने मुझे ऐसा भोजन देनेके लिये प्रेरित किया था ' ॥ ३३ ॥
तच्छ्रुत्वा पार्थिवेन्द्रस्य रक्षसा विकृतं च तत् ।
पुनः प्रोवाच राजानं वसिष्ठः पुरुषर्षभम् ॥ ३४ ॥
' राजाधिराज मित्रसहकी वह बात सुनकर और उसे
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उत्तरकाण्डे षटषष्टितमः सर्गः १६० ९ राक्षसकी करतूत जानकर वसिष्ठने पुनः उन नरश्रेष्ठ नरेशसे कहा – ॥ ३४ ॥
मया रोषपरीतेन यदिदं व्याहृतं वचः ।
नैतच्छक्यं वृथा कर्तुं प्रदास्यामि च ते वरम् ॥ ३५ ॥
“ राजन्! मैंने रोषसे भरकर जो बात कह दी है, इसे व्यर्थ नहीं किया जा सकता; परंतु इससे छूटने के लिये मैं तुम्हें एक वर दूँगा ॥ ३५ ॥
कालो द्वादशवर्षाणि शापस्यान्तो भविष्यति ।
मत् प्रसादाच्च राजेन्द्र अतीतं न स्मरिष्यसि ॥ ३६ ॥
" " राजेन्द्र! वह वर इस प्रकार है — यह शाप बारह वर्षों तक रहेगा । उसके बाद इसका अन्त हो जायगा । मेरी कृपासे तुम्हें बीती हुई बातका स्मरण नहीं रहेगा ' ॥ ३६ ॥
एवं स राजा तं शापमुपभुज्यारिसूदनः । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये प्रतिलेभे पुना राज्यं प्रजाश्चैवान्वपालयत् ॥ ३७ ॥
' इस प्रकार उस शत्रुसूदन राजाने बारह वर्षोंतक उस शापको भोगकर पुनः अपना राज्य पाया और प्रजाजनोंका निरन्तर पालन किया ॥ ३७ ॥
तस्य कल्माषपादस्य यज्ञस्यायतनं शुभम् ।
आश्रमस्य समीपेऽस्य यन्मां पृच्छसि राघव ॥ ३८ ॥
" रघुनन्दन! उन्हीं राजा कल्माषपाद के यज्ञका यह सुन्दर स्थान मेरे इस आश्रम के समीप दिखायी देता है, जिसके विषय में तुम पूछ रहे थे ' || ३८ ॥
तस्य तां पार्थिवेन्द्रस्य कथां श्रुत्वा सुदारुणाम् ।
विवेश पर्णशालायां महर्षिमभिवाद्य च ॥ ३ ९ ॥
महाराज मित्रसहकी उस अत्यन्त दारुण कथाको सुनकर शत्रुघ्न ने महर्षिको प्रणाम करके पर्णशाला में प्रवेश किया ॥ ३ ९ ॥ उत्तरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
षट्षष्टितमः सर्गः सीता के दो पुत्रों का जन्म, वाल्मीकिद्वारा उनकी रक्षाकी व्यवस्था और इस समाचार से प्रसन्न हुए शत्रुघ्नका वहाँसे प्रस्थान करके यमुनातटपर पहुँचना
यामेव रात्रिं शत्रुघ्नः पर्णशालां समाविशत् ।
तामेव रात्रिं सीतापि प्रसूता दारकद्वयम् ॥ १ ॥
जिस रातको शत्रुघ्नने पर्णशाला में प्रवेश किया था, उसी रात में सीता जीने दो पुत्रोंको जन्म दिया ॥ १ ॥
ततोऽर्धरात्रसमये बालका मुनिदारकाः ।
वाल्मीकेः प्रियमाचख्युः सीतायाः प्रसवं शुभम् ॥२ ॥
तदनन्तर आधीरातके समय कुछ मुनिकुमारोंने वाल्मीकि-जीके पास आकर उन्हें सीताजीके प्रसव होनेका शुभ एवं प्रिय समाचार सुनाया --- ॥ २ ॥
भगवन् रामपत्नी सा प्रसूता दारकद्वयम् ।
ततो रक्षां महातेजः कुरु भूतविनाशिनीम् ॥ ३ ॥
' भगवन्! श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नीने दो पुत्रोंको जन्म दिया है; अतः महातेजस्वी महर्षे! आप उनकी बाल-ग्रहजनित बाधा निवृत्त करनेवाली रक्षा करें ॥ ३ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा महर्षिः समुपागमत् ।
बालचन्द्रप्रतीकाशौ देवपुत्रौ महौजसौ ॥ ४ ॥
उन कुमारोंकी वह बात सुनकर महर्षि उस स्थानपर गये । सीताके वे दोनों पुत्र बालचन्द्रमा के समान सुन्दर तथा देव-कुमारों के समान महातेजस्वी थे ॥ ४ ॥
जगाम तत्र हृष्टात्मा ददर्श च कुमार कौ भूतघ्नीं चाकरोत् ताभ्यां रक्षां रक्षोविनाशिनीम् ॥ ५ ॥
वाल्मीकिजीने प्रसन्नचित्त होकर सूतिकागारमें प्रवेश किया और उन दोनों कुमारोंको देखा तथा उनके लिये भूतों और बा ० रा ० ५. १२. ४-राक्षसों का विनाश करनेवाली रक्षाकी व्यवस्था की ॥ ५ ॥
कुशमुष्टिमुपादाय लवं चैव तु स द्विजः ।
वाल्मीकिः प्रददौ ताभ्यां रक्षां भूतविनाशिनीम् ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षि वाल्मीकिने एक कुशाओंका मुट्ठा और उनके लव लेकर उनके द्वारा उन दोनों बालकोंकी भूत - बाधाका निवारण करने के लिये रक्षा - विधिका उपदेश दिया ॥ ६ ॥
यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः ।
निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ ७ ॥
यश्चावरो भवेत् ताभ्यां लवेन सुसमाहितः ।
निर्मार्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥ ८ ॥
" वृद्धा स्त्रियों को चाहिये कि इन दोनों बालकों में जो पहले उत्पन्न हुआ है, उसका मन्त्रद्वारा संस्कार किये हुए इन कुशसे मार्जन करें । ऐसा करनेपर उस बालकका नाम ' कुश ' होगा और उनमें जो छोटा है, उसका लवसे मार्जन करें । इससे उसका नाम ' लव ' होगा ॥ ७-८ ॥
एवं कुशलवौ नाम्ना तावुभौ यमजातकौ ।
मत्कृताभ्यां च नामभ्यां ख्यातियुक्तौ भविष्यतः ॥ ९ ॥
" इस प्रकार जुड़वें उत्पन्न हुए ये दोनों बालक क्रमशः कुश और लव नाम धारण करेंगे और मेरे द्वारा निश्चित किये गये इन्हीं नामोंसे भूमण्डलमें विख्यात होंगे ' ॥ ९ ॥
तां रक्षां जगृहस्तां च मुनिहस्तात् समाहिताः ।
अकुर्वेश्च ततो रक्षां तयोर्विगतकल्मषाः ॥ १० ॥
यह सुनकर निष्पाप वृद्धा स्त्रियोंने एकाग्रचित्त हो मुनिके
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१६१० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे हाथसे रक्षा के साधनभूत उन कुशको ले लिया और उनके द्वारा उन दोनों बालकों का मार्जन एवं संरक्षण किया ॥ १० ॥
तथा तां क्रियमाणां च वृद्धाभिर्गोत्रनाम च ।
संकीर्तनं च रामस्य सीतायाः प्रसवौ शुभौ ॥ ११ ॥
अर्धरात्रे तु शत्रुघ्नः शुश्राव सुमहत् प्रियम् ।
पर्णशालां ततो गत्वा मातर्दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥ १२ ॥
जब वृद्धा स्त्रियाँ इस आधी रातको श्रीराम और ध्वनि शत्रुघ्नजीके कानोंमें सुन्दर पुत्र होनेका संवाद शाला में गये और बोले बात है ' ॥ ११-१२ ॥ तदा तस्य प्रहृष्टस्य प्रकार रक्षा करने लगीं, उस समय सीताके नाम, गोत्र के उच्चारणकी पड़ी । साथ ही उन्हें सीताके दो प्राप्त हुआ । तब वे सीताजी की पर्ण-' माताजी! यह बड़े सौभाग्यकी
शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।
व्यतीता वार्षिकी रात्रिः श्रावणी लघुविक्रमा ॥ १३ ॥
महात्मा शत्रुघ्न उस समय इतने प्रसन्न थे कि उनकी वह वर्षाकालिक सावन की रात बात की बात में बीत गयी ॥
प्रभाते सुमहावीर्यः कृत्वा पौर्वाह्निक क्रियाम् ।
मुनिं प्राञ्जलिरामन्त्रय ययौ पश्चान्मुखः पुनः ॥ १४ ॥
सवेरा होनेपर पूर्वाह्नकालका कार्य संध्या - वन्दन आदि करके महापराक्रमी शत्रुघ्न हाथ जोड़ मुनिसे विदा ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये ॥ १४ ॥
स गत्वा यमुनातीरं सप्तरात्रोषितः पथि ।
ऋषीणां पुण्यकीर्तीनामाश्रमे वासमभ्ययात् ॥ १५ ॥
मार्ग में सात रात बिताकर वे यमुना - तटपर जा पहुँचे और वहाँ पुण्यकीर्ति महर्षियोंके आश्रम में रहने लगे ॥ १५ ॥
स तत्र मुनिभिः सार्धं भार्गवप्रमुखैर्नृपः ।
चक्रे महायशाः ॥ १६ ॥
कथाभिरभिरूपाभिर्वासं महायशस्वी राजा शत्रुघ्नने वहाँ च्यवन आदि मुनियों के साथ सुन्दर कथा - वार्ताद्वारा कालक्षेप करते हुए निवास किया ॥ स काञ्चनाद्यैर्मुनिभिः समेतै रघुप्रवीरो रजनीं तदानीम् । कथाप्रकारैर्बहुभिर्महात्मा विरामयामास नरेन्द्रसूनुः ॥ १७ ॥
इस प्रकार रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा राजकुमार शत्रुघ्न वहाँ एकत्र हुए च्यवन आदि मुनियोंके साथ नाना प्रकारकी कथाएँ सुनते हुए उन दिनों यमुनातटपर रात बिताने लगे ॥ १७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमः सर्गः मुनिका शत्रुघ्नको लवणासुरके शूलकी शक्तिका परिचय देते हुए च्यवन राजा मान्धाता वधका प्रसंग सुनाना
अथ राज्यां प्रवृत्तायां शत्रुघ्नो भृगुनन्दनम् ।
पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम् ॥ १ ॥
शूलस्य च बलं ब्रह्मन् के च पूर्व विनाशिताः ।
अनेन शूलमुख्येन द्वन्द्वयुद्धमुपागताः ॥ २ ॥
एक दिन रातके समय शत्रुघ्नने भृगुनन्दन ब्रह्मर्षि च्यवनसे पूछा- ' ब्रह्मन्! लवणासुरमें कितना बल है? उसके शूलमें कितनी शक्ति है? उस उत्तम शूलके द्वारा उसने द्वन्द्व - युद्ध में आये हुए किन - किन योद्धाओं का वध किया है? ' ॥ १-२ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।
प्रत्युवाच महातेजाश्च्यवनो रघुनन्दनम् ॥ ३ ॥
महात्मा शत्रुघ्नजीका यह वचन सुनकर महातेजस्वी च्यवनने उन रघुकुलनन्दन राजकुमारसे कहा- ॥ ३ ॥
असंख्येयानि कर्माणि यान्यस्य रघुनन्दन ।
इक्ष्वाकुवंशप्रभवे यद् वृत्तं तच्छृणुष्व मे ॥ ४ ॥
अयोध्यायां पुरा राजा युवनाश्वसुतो बली ।
मांधाता इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ॥ ५ ॥
' पूर्वकाल की बात है अयोध्यापुरी में युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता राज्य करते थे । वे बड़े बलवान्, पराक्रमी तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ ५ ॥
स कृत्वा पृथिवीं कृत्स्नां शासने पृथिवीपतिः ।
सुरलोकमितो जेतुमुद्योगमकरोन्नृपः ॥ ६ ॥
' उन पृथिवीपति नरेशने सारी पृथ्वीको अपने अधिकारमें करके यहाँसे देवलोकपर विजय पानेका उद्योग आरम्भ किया ॥ ६ ॥
इन्द्रस्य च भयं तीव्रं सुराणां च महात्मनाम् ।
मांधातरि कृतोद्योगे देवलोकजिगीषया ॥ ७ ॥
' राजा मान्धाताने जब देवलोकपर विजय पाने की इच्छा से उद्योग आरम्भ किया, तब इन्द्र तथा महामनस्वी देवताओंको
! इस लवणासुरके कर्म असंख्य हैं । उनमें से बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥ ।
' रघुनन्दन अर्धासनेन शक्रस्य राज्यार्धेन च पार्थिवः एक ऐसे कर्मका वर्णन किया जाता है, जो इक्ष्वाकुवंशी राजा प्रतिज्ञामध्यरोहत ॥ ८ ॥
मान्धाताके ऊपर घटित हुआ था । तुम उसे मेरे मुँहसे वन्द्यमानः सुरगणैः सिंहासन और उनका आधा राज्य " मैं इन्द्रका आधा सुनो ॥ ४ ॥
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उत्तरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः १६११ लेकर भूमण्डलका राजा हो देवताओंसे वन्दित होकर रहूँगा ' ऐसी प्रतिज्ञा करके वे स्वर्गलोकपर जा चढ़े ॥ ८ ॥
तस्य पापमभिप्रायं विदित्वा पाकशासनः ।
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच युवनाश्वजम् ॥ ९ ॥
' उनके खोटे अभिप्रायको जानकर पाकशासन इन्द्र उन युवनाश्व पुत्र मान्धाता के पास गये और उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए इस प्रकार बोले – ॥ ९ ॥
राजा त्वं मानुषे लोके न तावत् पुरुषर्षभ ।
अकृत्वा पृथिवीं वश्यां देवराज्यमिहेच्छसि ॥ १० ॥
“ पुरुषप्रवर! अभी तुम सारे मर्त्यलोकके भी राजा नहीं हो । समूची पृथ्वीको वशमें किये बिना ही देवताओंका राज्य कैसे लेना चाहते हो ॥ १० ॥
यदि वीर समग्रा ते मेदिनी निखिला वशे ।
देवराज्यं कुरुष्वेह सभृत्यबलवाहनः ॥ ११ ॥
" वीर! यदि सारी पृथ्वी तुम्हारे वशमें हो जाय तो तुम सेवक, सेनाओं और सवारियोंसहित यहाँ देवलोकका राज्य करना ' ॥ ११ ॥
इन्द्रमेवं ब्रुवाणं तं मांधाता वाक्यमब्रवीत् ।
क मे शक्र प्रतिहतं शासनं पृथिवीतले ॥ १२ ॥
' ऐसी बातें कहते हुए इन्द्रसे मान्धाताने पूछा - ' देवराज! बताइये तो सही, इस पृथ्वीपर कहाँ मेरे आदेशकी अवहेलना होती है ' ॥ १२ ॥
तमुवाच सहस्राक्षो लवणो नाम राक्षसः ।
मधुपुत्रो मधुवने न तेऽऽशां कुरुतेऽनघ ॥ १३ ॥
' तब इन्द्रने कहा – “ निष्पाप नरेश! मधुवनमें मधुका पुत्र लवणासुर रहता है । वह तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता ' ।
तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम् ।
व्रीडितोऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह ॥ १४ ॥
" इन्द्रकी कही हुई यह घोर अप्रिय बात सुनकर राजा मान्धाताका मुख लज्जासे झुक गया । वे कुछ बोल न सके ॥ १४ ॥
आमन्त्रय तु सहस्राक्षं प्रायात् किंचिदवाङ्मुखः ।
पुनरेवागमच्छ्रीमानिमं लोकं नरेश्वरः ॥ १५ ॥
' वे नरेश इन्द्रसे विदा ले मुँह लटकाये वहाँसे चल दिये और पुनः इस मर्त्यलोकमें ही आ पहुँचे ॥ १५ ॥
स कृत्वा हृदयेऽमर्षे सभृत्यबलवाहनः ।
आजगाम मधोः पुत्रं वशे कर्तुमरिंदमः ॥ १६ ॥
‘ उन्होंने अपने हृदयमें अमर्ष भर लिया । फिर वे शत्रु-दमन मान्धाता मधुके पुत्रको वशमें करनेके लिये सेवक, सेना और सवारियों सहित उसकी राजधानीके समीप आये ॥ १६ ॥
स काङ्गमाणो लवणं युद्धाय पुरुषर्षभः ।
दूतं सम्प्रेषयामास सकाशं लवणस्य सः ॥ १७ ॥
' उन पुरुषप्रवर नरेशने युद्धकी इच्छासे लवणके पास अपना दूत भेजा ॥ १७ ॥
स गत्वा विप्रियाण्याह बहूनि मधुनः सुतम् ।
वदन्तमेवं तं दूतं भक्षयामास राक्षसः ॥ १८ ॥
' दूतने वहाँ जाकर मधुके पुत्रको बहुत - से कटुवचन सुनाये । इस तरह कठोर बातें कहते हुए उस दूतको वह राक्षस तुरंत खा गया ॥ १८ ॥
चिरायमाणे दूते तु राजा क्रोधसमन्वितः ।
अईयामास तद् रक्षः शरवृष्ट्या समन्ततः ॥ १ ९ ॥
' जब दूतके लौटने में विलम्ब हुआ, तब राजा बड़े क्रुद्ध हुए और बाकी वर्षा करके उस राक्षसको सब ओरसे पीड़ित करने लगे ॥ १ ९ ॥
ततः प्रहस्य तद् रक्षः शूलं जग्राह पाणिना ।
वधाय सानुबन्धस्य मुमोचायुधमुत्तमम् ॥ २० ॥
' तब लवणासुरने हँसकर हाथसे वह शूल उठाया और सेवकोंसहित राजा मान्धाता का वध करने के लिये उस उत्तम अस्त्रको उनके ऊपर छोड़ दिया ॥ २० ॥
तच्छूलं दीप्यमानं तु सभृत्यबलवाहनम् ।
भस्मीकृत्वा नृपं भूयो लवणस्यागमत् करम् ॥ २१ ॥
' वह चमचमाता हुआ शूल सेवक, सेना और सवारियों-सहित राजा मान्धाताको भस्म करके फिर लवणासुरके हाथमें आ गया ॥ २१ ॥
एवं स राजा सुमहान् हतः सबलवाहनः ।
शूलस्य तु बलं सौम्य अप्रमेयमनुत्तमम् ॥ २२ ॥
' इस प्रकार सारी सेना और सवारियोंके साथ महाराज मान्धाता मारे गये T । सौम्य! उस शूलकी शक्ति असीम और सबसे बढ़ी चढ़ी है ॥ २२ ॥
श्वः प्रभाते तु लवणं वधिष्यसि न संशयः ।
अगृहीतायुधं क्षिप्रं ध्रुवो हि विजयस्तव ॥ २३ ॥
' राजन्! कल सबेरे जबतक वह राक्षस उस अस्त्रको न ले, तबतक ही शीघ्रता करनेपर तुम निःसंदेह उसका वध कर सकोगे और इस प्रकार निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी ॥ २३ ॥
लोकानां स्वस्ति चैवं स्यात् कृते कर्मणि च त्वया ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं लवणस्य दुरात्मनः ॥ २४ ॥
शूलस्य च बलं घोरमप्रमेयं नरर्षभ ।
विनाशश्चैव मांधातुर्यत्नेनाभूच्च पार्थिव ॥ २५ ॥
' तुम्हारे द्वारा यह कार्य सम्पन्न होनेपर समस्त लोकोंका कल्याण होगा । नरश्रेष्ठ! इस तरह मैंने तुम्हें दुरात्मा लवणका सारा बल बता दिया और उसके शूलकी भी घोर एवं असीम शक्तिका परिचय दे दिया । पृथ्वीनाथ! इन्द्र के प्रयत्न से उसी शूलके द्वारा राजा मान्धाताका विनाश हुआ था ॥ २४-२५ ॥ त्वं श्वः प्रभाते लवणं महात्मन् " वधिष्य से नात्र तु संशयो मे ।
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१६१२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे शूलं विना निर्गतमा मिषार्थी मांसका संग्रह करनेके लिये निकलेगा, तभी तुम उसका वध ध्रुवो जयस्ते भविता नरेन्द्र ॥ २६ ॥ कर डालोगे, इसमें संशय नहीं है । नरेन्द्र! अवश्य तुम्हारी
' महात्मन्! कल सबेरे जब वह शूल लिये बिना ही विजय होगी ' ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमः सर्गः लवणासुरका आहारके लिये निकलना, शत्रुघ्नका मधुपुरीके द्वारपर डट जाना और लौटे हुए लवणासुरके साथ उनकी रोषभरी बातचीत
कथां कथयतां तेषां जयं चाकाङ्क्षतां शुभम् ।
व्यतीता रजनी शीघ्रं शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ १ ॥
इस प्रकार कथा कहते और शुभ विजयकी आकाङ्क्षा रखते हुए उन मुनियोंकी बातें सुनते - सुनते महात्मा शत्रुघ्नकी वह रात बात की बात में बीत गयी ॥ १ ॥
ततः प्रभाते विमले तस्मिन् काले स राक्षसः ।
निर्गतस्तु पुराद् वीरो भक्ष्याहारप्रचोदितः ॥ २ ॥
तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होनेपर भक्ष्य पदार्थ एवं भोजनके संग्रहकी इच्छासे प्रेरित हो वह वीर राक्षस अपने नगर से बाहर निकला ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः शत्रुघ्नो यमुनां नदीम् ।
तीर्त्वा मधुपुरद्वार धनुष्पाणिरतिष्ठत ॥ ३ ॥
इसी बीच में वीर शत्रुघ्न यमुना नदीको पार करके हाथ में धनुष लिये मधुपुरीके द्वारपर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते क्रूरकर्मा स राक्षसः ।
आगच्छद् बहुसाहस्रं प्राणिनां भारमुद्वहन् ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् मध्याह्न होनेपर वह क्रूरकर्मा राक्षस हजारों प्राणियोंका बोझा लिये वहाँ आया ॥ ४ ॥
ततो ददर्श शत्रुघ्नं स्थितं द्वारि धृतायुधम् ।
तमुवाच ततो रक्षः किमनेन करिष्यसि ॥ ५ ॥
ईदृशानां सहस्राणि सायुधानां नराधम ।
भक्षितानि मया रोषात् कालेनानुगतो ह्यसि ॥ ६ ॥
उस समय उसने शत्रुघ्नको अस्त्र - शस्त्र लिये द्वारपर खड़ा देखा । देखकर वह राक्षस उनसे बोला- “ नराधम! इस हथियार से तू मेरा क्या कर लेगा I । तेरे जैसे हजारों अस्त्र - शस्त्र-धारी मनुष्यों को मैं रोषपूर्वक खा चुका हूँ । जान पड़ता है काल तेरे सिरपर नाच रहा है ॥ ५-६ ॥
आहारश्चाप्यसम्पूर्णो ममायं पुरुषाधम ।
स्वयं प्रविष्टोऽद्य मुखं कथमासाद्य दुर्मते ॥ ७ ॥
' पुरुषाधम! आजका यह मेरा आहार भी पूरा नहीं है ।
दुर्मते! तू स्वयं ही मेरे मुँहमें कैसे आ पड़ा? ' ॥ ७ ॥
तस्यैवं भाषमाणस्य हसतश्च मुहुर्मुहुः ।
शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो रोषादश्रूण्यवासृजत् ॥ ८ ॥
वह राक्षस इस प्रकारकी बातें कहता हुआ बारंबार हँस रहा था । यह देख पराक्रमी शत्रुघ्नके नेत्रोंसे रोषके कारण अश्रु-पात होने लगा ॥ ८ ॥
तस्य रोषाभिभूतस्य शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।
तेजोमया मरीच्यस्तु सर्वगात्रैर्विनिष्पतन् ॥ ९ ॥
रोषके वशीभूत हुए महामनस्वी शत्रुघ्न के सभी अङ्गसे तेजोमयी किरणें छिटकने लगीं ॥ ९ ॥
उवाच च सुसंक्रुद्धः शत्रुघ्नः स निशाचरम् ।
योधुमिच्छामि दुर्बुद्धे द्वन्द्वयुद्धं त्वया सह ॥ १० ॥
उस समय अत्यन्त कुपित हुए शत्रुघ्न उस निशा चरसे बोले – ' दुर्बुद्धे! मैं तेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करना चाहता हूँ ॥
पुत्रो दशरथस्याहं भ्राता रामस्य धीमतः ।
शत्रुघ्नो नाम शत्रुघ्नो वधाकाङ्क्षी तवागतः ॥ ११ ॥
" मैं महाराज दशरथका पुत्र और परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामका भाई हूँ । मेरा नाम शत्रुघ्न है और मैं कामसे भी शत्रुघ्न ( शत्रुओंका संहार करनेवाला ) ही हूँ । इस समय तेरा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ११ ॥
तस्य मे युद्धकामस्य द्वन्द्वयुद्धं प्रदीयताम् ।
शत्रुस्त्वं सर्वभूतानां न मे जीवन् गमिष्यसि ॥ १२ ॥
युद्ध करना चाहता हूँ । इसलिये तू मुझे द्वन्द्वयुद्धका अवसर दे । तू सम्पूर्ण प्राणियोंका शत्रु है; इसलिये अब मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकेगा ॥ १२ ॥
तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु राक्षसः प्रहसन्निव ।
प्रत्युवाच नरश्रेष्ठं दिष्ट्या प्राप्तोऽसि दुर्मते ॥ १३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उन नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नसे हँसता हुआ - सा बोला- ' दुर्मते! सौभाग्य की बात है कि आज तू स्वयं ही मुझे मिल गया ॥ १३ ॥
मम मातृष्वसुर्भ्राता रावणो नाम राक्षसः ।
हतो रामेण दुर्बुद्धे स्त्रीहेतोः पुरुषाधम ॥ १४ ॥
' खोटी बुद्धिवाले नराधम! रावण नामक राक्षस मेरी मौसी शूर्पणखाका भाई था, जिसे तेरे भाई रामने एक स्त्रीके लिये मार डाला ॥ १४ ॥
तच्च सर्वे मया क्षान्तं रावणस्य कुलक्षयम् ।
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उत्तरकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १६१३ अवज्ञां पुरतः कृत्वा मया यूयं विशेषतः ॥ १५ ॥
“ इतना ही नहीं, उन्होंने रावण के कुलका संहार कर दिया, तथापि मैंने वह सब कुछ सह लिया । तुमलोगोंके द्वारा की गयी अवहेलनाको सामने रखकर — प्रत्यक्ष देखकर भी तुम सबके प्रति मैंने विशेषरूपसे क्षमाभावका परिचय दिया ॥ १५ ॥
निहताश्च हि ते सर्वे परिभूतास्तृणं यथा ।
भूताश्चैव भविष्याश्च यूयं च पुरुषाधमाः ॥ १६ ॥
' जो नराधम भूतकालमें मेरा सामना करनेके लिये आये थे, उन सबको मैंने तिनकोंके समान तुच्छ समझकर तिरस्कृत किया और मार डाला । जो भविष्य में आयेंगे, उनकी भी यही दशा होगी और वर्तमानकालमें आनेवाले तुझ - जैसे नराधम भी मेरे हाथसे मरे हुए ही हैं ॥ १६ ॥
तस्य ते युद्धकामस्य युद्धं दास्यामि दुर्मते ।
तिष्ठ त्वं च मुहूर्त तु यावदायुधमानये ॥ १७ ॥
' दुर्मते! तुझे युद्धकी इच्छा है न? मैं अभी तुझे युद्धका अवसर दूँगा । तू दो घड़ी ठहर जा । तबतक मैं भी अपना अस्त्र ले आता हूँ ॥ १७ ॥
ईप्सितं यादृशं तुभ्यं सज्जये यावदायुधम् ।
तमुवाचाशु शत्रुघ्नः क्व मे जीवन गमिष्यसि ॥ १८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ' तेरे वध के लिये जैसे अस्त्रका होना मुझे अभीष्ट है, वैसे अस्त्रको पहले सुसज्जित कर लूँ; फिर युद्धका अवसर दूँगा । ' यह सुनकर शत्रुघ्न तुरंत बोल उठे- - " अब तू मेरे हाथसे जीवित बचकर कहाँ जायगा १ ॥ १८ ॥
स्वयमेवागतः शत्रुर्न मोक्तव्यः कृतात्मना ।
यो हि विक्लवया बुद्ध्या प्रसरं शत्रवे दिशेत् ।
सहतो मन्दबुद्धिः स्याद् यथा कापुरुषस्तथा ॥ १ ९ ॥
" किसी भी बुद्धिमान् पुरुषको अपने सामने आये हुए शत्रुको छोड़ना नहीं चाहिये । जो अपनी घबरायी हुईं बुद्धिके कारण शत्रुको निगल जानेका अवसर दे देता है, वह मन्दबुद्धि पुरुष कायरके समान मारा जाता है ॥ १ ९ ॥ तस्मात् सुदृष्टं कुरु जीवलोकं शरैः शितैस्त्वां विविधैर्नयामि । यमस्य गेहाभिमुखं हि पापं रिपुं त्रिलोकस्य च राघवस्य ॥ २० ॥
' अतः राक्षस! अब तू इस जीव जगत् को अच्छी तरह देख ले | मैं नाना प्रकार के तीखे बाणोंद्वारा तुझ पापीको अभी यमराजके घर की ओर भेजता हूँ; क्योंकि तू तीनों लोकोंका तथा श्रीरघुनाथजीका भी शत्रु है ' ॥ २० ॥
उत्तरकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीबाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाम्यके उत्तरकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
एकोनसप्ततितमः सर्गः शत्रुघ्न और लवणासुरका
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।
क्रोधमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
महामना शत्रुघ्न का वह भाषण सुनकर लवणासुरको बड़ा क्रोध हुआ और बोला - ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ १ ॥
पाणौ पाणि स निष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च ।
लवणो रघुशार्दूलमाह्वयामास चासकृत् ॥ २ ॥
वह हाथ - पर - हाथ रगड़ता और दाँत कटकटाता हुआ रघुकुलके सिंह शत्रुघ्नको बारंबार ललकारने लगा ॥ २ ॥
तं ब्रुवाणं तथा वाक्यं लवणं घोरदर्शनम् ।
शत्रुघ्नो देवशत्रुघ्न इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
भयंकर दिखायी देनेवाले लवणको इस प्रकार बोलते देख देवशत्रुओंका नाश करनेवाले शत्रुघ्नने यह बात कही ॥३ ॥
शत्रुघ्नो न तदा जातो यदान्ये निर्जितास्त्वया ।
तदद्य बाणाभिहतो व्रज त्वं यमसादनम् ॥ ४ ॥
' राक्षस! जब तूने दूसरे वीरोंको पराजित किया था, उस समय शत्रुघ्नका जन्म नहीं हुआ था । अतः आज मेरे इन बाणोंकी चोट खाकर तू सीधे यमलोककी राह ले ॥ ४ ॥
युद्ध तथा लवणका वध
ऋषयोऽप्यद्य पापात्मन् मया त्वां निहतं रणे ।
पश्यन्तु विप्रा विद्वांसस्त्रिदशा इव रावणम् ॥ ५ ॥
' पापात्मन्! जैसे देवताओंने रावणको धराशायी हुआ देखा था, उसी तरह विद्वान् ब्राह्मण और ऋषि आज रण-भूमिमें मेरेद्वारा मारे गये तुझ दुराचारी राक्षसको भी देखें ॥
त्वयि मद्वाणनिर्दग्धे पतितेऽद्य निशाचर ।
पुरे जनपदे चापि क्षेममेव भविष्यति ॥ ६ ॥
' निशाचर | आज मेरे बाणोंसे दग्ध होकर जब तू धरती-पर गिर जायगा, उस समय इस नगर और जनपद में भी सबका कल्याण ही होगा ॥ ६ ॥
अद्य मद्बाहुनिष्क्रान्तः शरो वज्रनिभाननः ।
प्रवेक्ष्यते ते हृदयं पद्ममंशुरिवार्कजः ॥ ७ ॥
' आज मेरी भुजाओंसे छूटा हुआ वज्र के समान मुख-वाला बाण उसी तरह तेरी छाती में धँस जायगा, जैसे सूर्य की किरण कमलकोशमें प्रविष्ट हो जाती है ' ॥ ७ ॥
एवमुक्तो महावृक्षं लवणः क्रोधमूच्छितः ।
शत्रुघ्नोरसि चिक्षेप स च तं शतधाच्छिनत् ॥ ८ ॥
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श्रीमवाल्मीकीय रामायणे १६१४ क्रोधसे मूर्च्छित - सा हो गया को हाथमें लिया, जो अपने घोर तेजसे प्रज्वलित हो दसों शत्रुघ्न के ऐसा कहनेपर लवण की छातीपर दे मारा; दिशाओं में व्याप्त - सा हो रहा था ॥ १७ ॥
और एक महान् वृक्ष लेकर उसने शत्रुघ्न परंतु शत्रुघ्नने उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये ॥ ८ ॥
तद् दृष्ट्रा विफलं कर्म राक्षसः पुनरेव तु ।
पादपान सुबहून् गृह्य शत्रुघ्नायासृजद् बली ॥ ९ ॥
वह वार खाली गया देख उस बलवान् राक्षसने पुनः बहुत - से वृक्ष ले - लेकर शत्रुघ्नपर चलाये ॥ ९ ॥
शत्रुघ्नश्चापि तेजखी वृक्षानापततो बहून् ।
चिच्छेद नतपर्वभिः ॥ १० ॥
त्रिभिश्चतुर्भिरेकैकं परंतु शत्रुघ्न भी बड़े तेजस्वी थे । उन्होंने अपने ऊपर आते हुए उन बहुसंख्यक वृक्षोंमेंसे प्रत्येकको झुकी हुई गाँठ-वाले तीन - तीन या चार - चार बाण मारकर काट डाला || १० ||
ततो बाणमयं वर्षे व्यसृजद राक्षसोपरि ।
शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो विव्यथे न स राक्षसः ॥ ११ ॥
फिर पराक्रमी शत्रुघ्नने उस राक्षसपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, किंतु वह निशाचर इससे व्यथित या विचलित नहीं हुआ ॥
ततः प्रहस्य लवणो वृक्षमुद्यम्य वीर्यवान् ।
शिरस्यभ्यहनच्छूरं स्वस्ताङ्गः स मुमोह वै ॥ १२ ॥
तब बल- विक्रमशाली लवणने हँसकर एक वृक्ष उठाया और उसे शूरवीर शत्रुघ्न सिरपर दे मारा । उसकी चोट खाकर शत्रुघ्न के सारे अङ्ग शिथिल हो गये और उन्हें मूर्छा आ गयी ॥ १२ ॥
तस्मिन् निपतिते वीरे हाहाकारो महानभूत् ।
ऋषीणां देवसंघानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ १३ ॥
वीर शत्रुघ्न के गिरते ही ऋषियों, देवसमूहों, गन्धवों और अप्सराओं में महान् हाहाकार मच गया ॥ १३ ॥
तमवज्ञाय तु हतं शत्रुघ्नं भुवि पातितम् ।
रक्षो लब्धान्तरमपि न विवेश स्वमालयम् ॥ १४ ॥
नापि शूलं प्रजग्राह तं दृष्ट्वा भुवि पातितम् ।
ततो हत इति ज्ञात्वा तान् भक्षान् समुदावहत् ॥ १५ ॥
शत्रुघ्नजीको भूमिपर गिरा देख लवणने समझा ये मर गये, इसलिये अवसर मिलनेपर भी वह राक्षस अपने घरमें नहीं गया और न शूल ही ले आया । उन्हें धराशायी हुआ देख सर्वथा मरा हुआ समझकर ही वह अपनी उस भोजनसामग्री-को एकत्र करने लगा ॥ १४-१५ ॥
मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु पुनस्तस्थौ धृतायुधः ।
शत्रुघ्नो वै पुरद्वार ऋषिभिः सम्प्रपूजितः ॥ १६ ॥
वज्राननं वज्रवेगं मेरुमन्दर संनिभम् ।
नतं पर्वसु सर्वेषु संयुगेष्वपराजितम् ॥ १८ ॥
उसका मुख और वेग वज्र के समान था । वह मेरु और मन्दराचलके समान भारी था । उसकी गाँठें झुकी हुई थीं तथा वह किसी भी युद्ध में पराजित होनेवाला नहीं था ॥ १८ ॥
असृक्चन्दनदिग्धाङ्गं चारुपत्रं पतत्त्रिणम् ।
दानवेन्द्राचलेन्द्राणामसुराणां च दारुणम् ॥ १ ९ ॥
उसका सारा अङ्ग रक्तरूपी चन्दनसे चर्चित था । पंख बड़े सुन्दर थे । वह बाण दानवराजरूपी पर्वतराजों एवं असुरों के लिये बड़ा भयंकर था ॥ १ ९ ॥
तं दीप्तमिव कालाग्नि युगान्ते समुपस्थिते ।
दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि परित्रासमुपागमन् ॥ २० ॥
वह प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रज्वलित हुई कालाग्नि के समान उद्दीप्त हो रहा था । उसे देखकर समस्त प्राणी त्रस्त हो गये ॥ २० ॥
सदेवासुरगन्धर्व मुनिभिः साप्सरोगणम् ।
जगद्धि सर्वमस्वस्थं पितामहमुपस्थितम् ॥ २१ ॥
देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराओंके साथ सारा जगत् अस्वस्थ हो ब्रह्माजी के पास पहुँचा ॥ २१ ॥
उवाच देवदेवेशं वरदं प्रपितामहम् ।
देवानां भयसम्मोहो लोकानां संक्षयं प्रति ॥ २२ ॥
जगत् के उन सभी प्राणियोंने वर देनेवाले देवदेवेश्वर प्रपितामह ब्रह्माजी से कहा- ' भगवन्! समस्त लोकोंके संहार-की सम्भावनासे देवताओं पर भी भय और मोह छा गया है ॥
कचिल्लोकक्षयो देव सम्प्राप्तो वा युगक्षयः ।
नेदृशं दृष्टपूर्व च न श्रुतं प्रपितामह ॥ २३ ॥
' देव! कहीं लोकोंका संहार तो नहीं होगा अथवा प्रलय-काल तो नहीं आ पहुँचा है? प्रपितामह । संसारकी ऐसी अवस्था न तो पहले कभी देखी गयी थी और न सुनने में ही आयी थी ' || २३ ||
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
भयकारणमयाचष्ट देवानामभयंकरः ॥ २४ ॥
उनकी यह बात सुनकर देवताओंका भय दूर करनेवाले लोकपितामह ब्रह्माने प्रस्तुत भयका कारण बताते हुए कहा ॥
उवाच मधुरां वाणीं शृणुध्वं सर्वदेवताः ।
वधाय लवणस्याजौ शरः शत्रुघ्नधारितः ॥ २५ ॥
दो ही घड़ी में शत्रुघ्न को होश आ गया । वे अस्त्र - शस्त्र तेजसा तस्य सम्मूढाः सर्वे स्मः सुरसत्तमाः । लेकर उठे और फिर नगरद्वारपर खड़े हो गये । उस समय वे मधुर वाणीमें बोले – ' सम्पूर्ण देवताओ! मेरी बात ऋषियोंने उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥ १६ ॥ सुनो । आज शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें लवणासुरका वध करने के
ततो दिव्यममोघं तं जग्राह शरमुत्तमम् । लिये जो बाण हाथमें लिया है, उसीके तेजसे हम सब लोग ज्वलन्तं तेजसा घोरं पूरयन्तं दिशो दश ॥ १७ ॥ मोहित हो रहे हैं । ये श्रेष्ठ देवता भी उसीसे घबराये हुए
तदनन्तर शत्रुघ्नने उस दिव्य, अमोध और उत्तम बाण हैं ॥ २५३ ॥
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उत्तरकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १६१५ न क I र एष पूर्वस्य देवस्य लोककर्तुः सनातनः ॥ २६ ॥
शरस्तेजोमयो वत्सा येन वै भयमागतम् । ' पुत्रो! यह तेजोमय सनातन बाण आदिपुरुष लोक-कर्ता भगवान् विष्णुका है । जिससे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है ॥ २६३ ॥
एव वै कैटभस्यार्थे मधुनश्च महाशरः ॥ २७ ॥
सृ महात्मना तेन वधार्थे दैत्ययोस्तयोः । ' परमात्मा श्रीहरिने मधु और कैटभ इन दोनों दैत्योंका वध करनेके लिये इस महान् बाणकी सृष्टि की थी ॥ २७३ ॥
एक एव प्रजानाति विष्णुस्तेजोमयं शरम् ॥ २८ ॥
एषा एव तनुः पूर्वा विष्णोस्तस्य महात्मनः । ' एकमात्र भगवान् विष्णु ही इस तेजोमय बाणको जानते हैं; क्योंकि यह बाण साक्षात् परमात्मा विष्णुकी ही प्राचीन मूर्ति है ॥ २८३ ॥
इतो गच्छत पश्यध्वं वध्यमानं महात्मना ॥ २ ९ ॥ रामानुजेन वीरेण लवणं राक्षसोत्तमम् । ' अब तुमलोग यहाँसे जाओ और श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई महामनस्वी वीर शत्रुघ्न के हाथसे राक्षसप्रवर लवणासुरका वध होता देखो ' ॥ २ ९ ३ ॥ तस्य ते देवदेवस्य निशम्य वचनं सुराः ॥ ३० ॥
आजग्मुर्यत्र युध्येते शत्रुघ्नलवणावुभौ । देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवतालोग उस स्थानपर आये, जहाँ शत्रुघ्नजी और लवणासुर दोनोंका युद्ध हो रहा था ॥ ३०३ ॥
तं शरं दिव्यसंकाशं शत्रुघ्नकरधारितम् ॥ ३१ ॥
ददृशुः सर्वभूतानि युगान्ताग्निमिवोत्थितम् । शत्रुघ्नजीके द्वारा हाथमें लिये गये उस दिव्य बाणको सभी प्राणियोंने देखा । वह प्रलयकालके अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था ॥ ३१३ ॥
आकाशमावृतं दृष्ट्वा देवैर्हि रघुनन्दनः ॥ ३२ ॥
सिंहनादं भृशं कृत्वा ददर्श लवणं पुनः । आकाशको देवताओंसे भरा हुआ देख रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नने बड़े जोरसे सिंहनाद करके लवणासुरकी ओर देखा ॥ ३२३ ॥
आइतश्च पुनस्तेन शत्रुघ्नेन महात्मना ॥ ३३ ॥
लवणः क्रोधसंयुक्तो युद्धाय समुपस्थितः । महात्मा शत्रुघ्न के पुनः ललकारनेपर लवणासुर क्रोधसे इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये भादिकाव्ये भर गया और फिर युद्ध के लिये उनके सामने आया ॥ ३३३ ॥
आकर्णात् स विकृष्याथ तद् धनुर्धन्विनां वरः ॥ ३४ ॥
स मुमोच महाबाणं लवणस्य महोरसि । तब धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुघ्नजीने अपने धनुषको कानतक खींचकर उस महाबाणको लवणासुरके विशाल वक्षःस्थल पर चलाया ॥ ३४३ ॥
उरस्तस्य विदार्याशु प्रविवेश रसातलम् ॥ ३५ ॥
गत्वा रसातलं दिव्यः शरो विबुधपूजितः ।
पुनरेवागमत् तूर्णमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् ॥ ३६ ॥
वह देवपूजित दिव्य बाण तुरंत ही उस राक्षसके हृदयको विदीर्ण करके रसातलमें घुस गया तथा फिर तत्काल ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन गया ॥ ३५-३६ । शत्रुघ्नशरनिर्भिनो लवणः स पपात सहसा भूमौ वज्राहत शत्रुनजी के बाणसे विदीर्ण होकर मारे हुए पर्वत के समान सहसा पृथ्वीपर रसातलमें जाकर वह शत्रुघ्नजीके पास आ
निशाचरः ।
इवाचलः ॥ ३७ ॥
निशाचर लवण वज्रके गिर पड़ा ॥ ३७ ॥
तच्च शूलं महद् दिव्यं हते लवणराक्षसे ।
पश्यतां सर्वदेवानां रुद्रस्य वशमन्वगात् ॥ ३८ ॥
लवणासुरके मारे जाते ही वह दिव्य एवं महान् शूल सब देवताओंके देखते - देखते भगवान् रुद्र के पास आ गया ॥ ३८ ॥
एकेषुपातेन भयं निपात्य
लोकत्रयस्यास्य रघुप्रवीरः ।
विनिर्बभावुत्तमचापबाण-स्तमः प्रणुद्येव सहस्त्ररश्मिः ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार उत्तम धनुष - बाण धारण करनेवाले रघुकुलके प्रमुख वीर शत्रुघ्न एक ही बाणके प्रहारसे तीनों लोकोंके भय-को नष्ट करके उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे- त्रिभुवनका अन्धकार दूर करके सहस्र किरणधारी सूर्यदेव प्रकाशित हो उठते हैं ॥ ३ ९ ॥ ततो हि देवा ऋषिपन्नगाश्च
प्रपूजिरे ह्यप्सरसश्च सर्वाः ।
दिष्ट्या जयो दाशरथेरवाप्त-त्यक्त्वा भयं सर्प इव प्रशान्तः ॥ ४० ॥
“ सौभाग्य की बात है कि दशरथनन्दन शत्रुघ्नने भय छोड़कर विजय प्राप्त की और सर्पके समान लवणासुर मर गया ' ऐसा कहकर देवता, ऋषि, नाग और समस्त अप्सराएँ उस समय शत्रुघ्नजी की भूरि - भूरि प्रशंसा करने लगीं ॥ ४० ॥
उत्तरकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनहत्तरखाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥
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१६१६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सप्ततितमः सर्गः देवताओंसे वरदान पा शत्रुघ्नका मधुरापुरीको बसाकर बारहवें वर्ष में वहाँसे श्रीराम के पास जानेका विचार करना
हते तु लवणे देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ।
ऊचुः सुमधुरां वाणीं शत्रुघ्नं शत्रुतापनम् ॥ १ ॥
लवणासुर के मारे जानेपर इन्द्र और अग्नि आदि देवता आकर शत्रुओंको संताप देनेवाले शत्रुघ्नसे अत्यन्त मधुर बाणीमें बोले - ॥ १ ॥
दिष्ट्या ते विजयो वत्स दिष्ट्या लवणराक्षसः । हतः पुरुषशार्दूल वरं वरय सुव्रत ' वत्स! सौभाग्य की बात है कि तुम्हें विजय और लवणासुर मारा गया । उत्तम व्रतका पालन पुरुषसिंह! तुम वर माँगो ॥ २ ॥
वरदास्तु महाबाहो सर्व एव समागताः विजयाकाङ्क्षिणस्तुभ्यममोघं दर्शनं हि नः ‘ महाबाहो! हम सब लोग तुम्हें वर देनेके ॥ २ ॥
प्राप्त हुई करनेवाले
।
॥ ३ ॥
लिये यहाँ आये हैं । हम तुम्हारी विजय चाहते थे । हमारा दर्शन अमोघ है ( अतएव तुम कोई वर माँगो ) ॥ ३ ॥
देवानां भाषितं श्रुत्वा शूरो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः प्रत्युवाच महाबाहुः शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ॥ ४ ॥
देवताओंका यह वचन सुनकर मनको वशमें रखनेवाले शूरवीर महाबाहु शत्रुध्न मस्तकपर अञ्जलि बाँध इस प्रकार बोले - ॥ ४ ॥
इयं मधुपुरी रम्या मधुरा देवनिर्मिता ।
निवेशं प्राप्नुयाच्छीघ्रमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ ५ ॥
‘ देवताओ! यह देवनिर्मित रमणीय मधुपुरी शीघ्र ही मनोहर राजधानीके रूपमें बस जाय । यही मेरे लिये श्रेष्ठ बर है ' ॥ ५ ॥
तं देवाः प्रीतमनसो बाढमित्येव राघवम् ।
भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशयः ॥ ६ ॥
तब देवताओंने उन रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नसे प्रसन्न होकर कहा — ' बहुत अच्छा ऐसा ही हो । यह रमणीय पुरी निःसंदेह शूर - वीरोंकी सेनासे सम्पन्न हो जायगी ' ॥ ६ ॥
ते तथोक्त्वा महात्मानो दिवमारुरुहुस्तदा ।
शत्रुघ्नोऽपि महातेजास्तां सेनां समुपानयत् ॥ ७ ॥
ऐसा कहकर महामनस्वी देवता उस समय स्वर्गको चले गये । महातेजस्वी शत्रुघ्नने भी गङ्गातटसे अपनी उस सेनाको बुलवाया ॥ ७ ॥
सा सेना शीघ्रमागच्छच्छ्रुत्वा शत्रुघ्नशासनम् ।
निवेशनं च शत्रुघ्नः श्रावणेन समारभत् ॥ ८ ॥
शत्रुघ्नजीका आदेश पाकर वह सेना शीघ्र चली आयी । शत्रुघ्नने श्रावणमाससे उस पुरीको बसाना आरम्भ किया ।
स पुरा दिव्यसंकाशो वर्षे द्वादशमे शुभे ।
निविष्टः शूरसेनानां विषयश्वाकुतोभयः ॥ ९ ॥
तबसे बारहवें वर्ष तक वह पुरी तथा वह शूरसेन जनपद पूर्णरूपसे बस गया । वहाँ कहीं किसीसे भय नहीं था । वह देश दिव्य सुख - सुविधाओंसे सम्पन्न था ॥ ९ ॥
क्षेत्राणि सस्ययुक्तानि काले वर्षति वासवः ।
अरोगवीरपुरुषा शत्रुघ्नभुजपालिता ॥ १० ॥
वहाँके खेत खेती से हरे - भरे हो गये । इन्द्र वहाँ समयपर वर्षा करने लगे । शत्रुघ्नजीके बाहुबलसे सुरक्षित मधुपुरी नीरोग तथा वीर पुरुषों से भरी थी ॥ १० ॥
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता ।
शोभिता गृहमुख्यैश्च चत्वरापणवीथिकैः ।
चातुर्वर्ण्यसमायुक्ता नानावाणिज्यशोभिता ॥ ११ ॥
वह पुरी यमुनाके तटपर अर्धचन्द्राकार बसी थी और अनेकानेक सुन्दर ग्रहों, चौराहों, बाजारों तथा गलियोंसे सुशोभित होती थी । उसमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे तथा नाना प्रकारके वाणिज्य - व्यवसाय उसकी शोभा बढ़ाते थे ।
यच्च तेन पुरा शुभ्रं लवणेन कृतं महत् ।
तच्छोभयति शत्रुघ्नो नानावर्णोपशोभिताम् ॥ १२ ॥
पूर्वकालमें लवणासुरने जिन विशाल गृहोंका निर्माण कराया था, उनमें सफेदी कराकर उन्हें नाना प्रकार के चित्रोंसे सुसज्जित करके शत्रुघ्नजी उनकी शोभा बढ़ाने लगे ॥ १२ ॥
आरामैश्च विहारैश्च शोभमानां समन्ततः ।
शोभितां शोभनीयैश्च तथान्यैर्दैवमानुषैः ॥ १३ ॥
अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल सब ओरसे उस पुरीको सुशोभित करते थे । देवताओं और मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य शोभनीय पदार्थ भी उस नगरीकी शोभा-वृद्धि करते थे ॥ १३ ॥
तां पुरीं दिव्यसंकाशां नानापण्योपशोभिताम् ।
नानादेशगतैश्चापि वणिग्भिरुपशोभिताम् ॥ १४ ॥
नाना प्रकारकी क्रय - विक्रय योग्य वस्तुओंसे सुशोभित वह दिव्य पुरी अनेकानेक देशोंसे आये हुए वणिग्जनोंसे शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥
तां समृद्धां समृद्धार्थः शत्रुघ्नो भरतानुजः ।
निरीक्ष्य परमप्रीतः परं हर्षमुपागमत् ॥ १५ ॥
उसे पूर्णतः समृद्धिशालिनी देख सफलमनोरथ हुए भरतानुज शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े हर्षका अनुभव करने लगे ॥ १५ ॥
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य मधुरां पुरीम् ।
रामपादौ निरीक्षेऽहं वर्षे द्वादश आगते ॥ १६ ॥
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उत्तरकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः १६१७ मधुरापुरको बसाकर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्या से आये बारहवाँ वर्ष हो गया, अब मुझे वहाँ चलकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहिये ॥ १६ ॥
ततः स ताममरपुरोपमां पुरीं निवेश्य वै विविधजनाभिसंवृताम् । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये नराधिपो रघुपतिपाददर्शने दधे मतिं रघुकुलवंशवर्धनः ॥ १७ ॥
इस प्रकार नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरी हुई उस देव-पुरीके समान मनोहर मधुरापुरीको बसाकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले राजा शत्रुघ्नने श्रीरघुनाथजी के चरणोंके दर्शनका विचार किया ॥ १७ ॥
उत्तरकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमः सर्गः शत्रुघ्नका थोड़ेसे सैनिकों के साथ अयोध्याको प्रस्थान, मार्गमें वाल्मीकिके आश्रम में रामचरितका गान सुनकर उन
ततो द्वादशमे वर्षे शत्रुघ्नो रामपालिताम् ।
अयोध्यां चकमे गन्तुमल्पभृत्य बलानुगः ॥ १ ॥
तदनन्तर बारहवें वर्ष में थोड़ेसे सेवकों और सैनिकोंको साथ ले शत्रुघ्नने श्रीरामपालित अयोध्याको जानेका विचार किया ॥ १ ॥
ततो मन्त्रिपुरोगांश्च बलमुख्यान् निवर्त्य च ।
जगाम हयमुख्येन रथानां च शतेन सः ॥ २ ॥
अतः अपने मुख्य - मुख्य मन्त्रियों तथा सेनापतियों को लौटाकर --पुरीकी रक्षा के लिये वहीं छोड़कर वे अच्छे - अच्छे घोड़े वाले सौ रथ साथ ले अयोध्याकी ओर चल पड़े ॥ २ ॥
स गत्वा गणितान् वासान् सप्ताष्टौ रघुनन्दनः ।
वाल्मीकाश्रममागत्य वासं चक्रे महायशाः ॥ ३ ॥
महायशस्वी रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न यात्रा करनेके पश्चात् मार्गमें सात - आठ परिगणित स्थानोंपर पड़ाव डालते हुए वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे और रातमें वहीं ठहरे ॥
सोऽभिवाद्य ततः पादौ वाल्मीकेः पुरुषर्षभः ।
पाद्यमर्घ्य तथातिथ्यं जग्राह मुनिहस्ततः ॥ ४ ॥
उन पुरुषप्रवर रघुवीरने वाल्मीकिजी के चरणों में प्रणाम करके उनके हाथसे पाद्य और अर्घ्यं आदि आतिथ्य सत्कारकी सामग्री ग्रहण की ॥ ४ ॥
बहुरूपाः सुमधुराः कथास्तत्र सहस्रशः ।
कथयामास स मुनिः शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ ५ ॥
वहाँ महर्षि वाल्मीकिने महात्मा शत्रुघ्नको सुनानेके लिये भाँति भाँतिकी सहस्रों सुमधुर कथाएँ कहीं ॥ ५ ॥
उवाच च मुनिर्वाक्यं लवणस्य वधाश्रितम् ।
सुदुष्करं कृतं कर्म लवणं निघ्नता त्वया ॥ ६ ॥
फिर वे लवणवधके विषयमें बोले – ' लवणासुर को मारकर तुमने अत्यन्त दुष्कर कर्म किया है ॥ ६ ॥
बहवः पार्थिवाः सौम्य हताः सबलवाहनाः ।
लवणेन महाबाहो युध्यमाना महाबलाः ॥ ७ ॥
वा ० रा ० ५. १२.५-सबका आश्चर्यचकित होना ' सौम्य! महाबाहो! लवणासुरके साथ युद्ध करके बहुत-से महाबली भूपाल सेना और सवारियोंसहित मारे गये हैं |
स त्वया निहतः पापो लीलया पुरुषर्षभ ।
जगतश्च भयं तत्र प्रशान्तं तव तेजसा ॥ ८ ॥
' पुरुषश्रेष्ठ! वही पापी लवणासुर तुम्हारे द्वारा अनायास ही मार डाला गया । उसके कारण जगत् में जो भय छा गया था, वह तुम्हारे तेजसे शान्त हो गया ॥ ८ ॥
रावणस्य वधो घोरो यत्नेन महता कृतः ।
इदं च सुमहत्कर्म त्वया कृतमयत्नतः ॥ ९ ॥
' रावणका घोर वध महान् प्रयत्नसे किया गया था; परंतु यह महान् कर्म तुमने बिना यत्नके ही सिद्ध कर दिया ॥ ९ ॥
प्रीतिश्चास्मिन् परा जाता देवानां लवणे हते ।
भूतानां चैव सर्वेषां जगतश्च प्रियं कृतम् ॥ १० ॥
‘ लवणासुरके मारे जानेसे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई । है । तुमने समस्त प्राणियों और सारे जगत्का प्रिय कार्य किया है ॥ १० ॥
तच्च युद्धं मया दृष्टं यथावत् पुरुषर्षभ ।
सभायां वासवस्याथ उपविष्टेन राघव ॥ ११ ॥
' नरश्रेष्ठ! मैं इन्द्रकी सभा में बैठा था । जब वह विमानाकार सभा युद्ध देखनेके लिये आयी, तब वहीं बैठे-बैठे मैंने भी तुम्हारे और लवणके युद्धको भलीभाँति देखा था ॥
ममापि परमा प्रीतिर्हृदि शत्रुघ्न वर्तते ।
उपाघ्रास्यामि ते मूर्ध्नि स्नेहस्यैषा परा गतिः ॥ १२ ॥
' शत्रुघ्न! मेरे हृदयमें भी तुम्हारे लिये बड़ा प्रेम है ।
अतः मैं तुम्हारा मस्तक सूँघूँगा । यही स्नेहकी पराकाष्ठा है ' ॥
इत्युक्त्वा मूर्ध्नि शत्रुघ्नमुपाघ्राय महामतिः ।
आतिथ्यमकरोत् तस्य ये च तस्य पदानुगाः ॥ १३ ॥
ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् वाल्मीकिने शत्रुघ्नका मस्तक सूँघा और उनका तथा उनके साथियोंका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १३ ॥