श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 841–850

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 841 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६१८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

स भुक्तवान् नरश्रेष्ठो गीतमाधुर्यमुत्तमम् ।

शुश्राव रामचरितं तस्मिन् काले यथाक्रमम् ॥ १४ ॥

नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भोजन किया और उस समय श्रीराम-चन्द्रजीके चरित्रका क्रमशः वर्णन सुना, जो गीतकी मधुरताके कारण बड़ा ही प्रिय एवं उत्तम जान पड़ता था ॥ १४ ॥

तन्त्रीलय समायुक्तं त्रिस्थानकरणान्वितम् ।

संस्कृतं लक्षणोपेतं समतालसमन्वितम् ॥ १५ ॥

शुश्राव रामचरितं तस्मिन् काले पुरा कृतम् । उस वेलामें उन्हें जो रामचरित सुनने को मिला, वह पहले ही काव्यबद्ध कर लिया गया था । वह काव्यगान वीणाकी लय के साथ हो रहा था । हृदय, कण्ठ और मूर्धा -इन तीन स्थानों में मन्द्र, मध्यम और तार स्वरके भेद से उच्चारित हो रहा था । संस्कृत भाषा में निर्मित होकर व्याकरण, छन्द, काव्य और संगीत - शास्त्र के लक्षणोंसे सम्पन्न था और गानोचित तालके साथ गाया गया था ॥ १५३ ॥

तान्यक्षराणि सत्यानि यथावृत्तानि पूर्वशः ॥ १६ ॥

श्रुत्वा पुरुषशार्दूलो विसंज्ञो बाप्पलोचनः । उस काव्य के सभी अक्षर एवं वाक्य सच्ची घटनाका प्रति-पादन करते थे और पहले जो वृत्तान्त घटित हो चुके थे, उनका यथार्थं परिचय दे रहे थे । वह अद्भुत काव्यगान सुनकर पुरुषसिंह शत्रुघ्न मूर्च्छित से हो गये । उनके नेत्रोंसे आँसुओं की धारा बहने लगी ॥ १६३ ॥

स मुहूर्तमिवासंज्ञो विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥

तस्मिन् गीते यथावृत्तं वर्तमानमिवाशृणोत् । वे दो घड़ीतक अचेत - से होकर बारंबार लंबी साँस खींचते रहे । उस गानमें उन्होंने बीती हुई बातोंको वर्तमानकी भाँति सुना ॥ १७३ ॥

पदानुगाश्च ये राज्ञस्तां श्रुत्वा गीतिसम्पदम् ॥ १८ ॥

अवाङ्मुखाश्च दीनाश्च ह्याश्चर्यमिति चाब्रुवन् । राजा शत्रुघ्न के जो साथी थे, वे भी उस गीत - सम्पत्तिको सुनकर दीन और नतमस्तक हो बोले- ' यह तो बड़े आश्चर्य-की बात है ' ॥ १८३ ॥

परस्परं च ये तत्र सैनिकाः सम्बभाषिरे ॥ १ ९ ॥

किमिदं क च वर्तामः किमेतत् स्वप्नदर्शनम् ।

अर्थो यो नः पुरा दृष्टस्तमाश्रमपदे पुनः ॥ २० ॥

शत्रुघ्न के जो सैनिक वहाँ मौजूद थे, वे परस्पर कहने लगे-- ' यह क्या बात है? हमलोग कहाँ हैं? यह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं । जिन बातोंको हम पहले देख चुके हैं, उन्हीं को इस आश्रमपर ज्यों - की - त्यों सुन रहे हैं ॥ १ ९ -२० ॥

शृणुमः किमिदं स्वप्ने गीतबन्धनमुत्तमम् ।

विस्मयं ते परं गत्वा शत्रुघ्नमिदमब्रुवन् ॥ २१ ॥

' क्या इस उत्तम गीतबन्धको हमलोग स्वप्न में सुन रहे हैं । " फिर अत्यन्त विस्मयमें पड़कर वे शत्रुघ्नसे बोले - ॥२१ ॥

साधु पृच्छ नरश्रेष्ठ वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ।

शत्रुघ्नस्त्वब्रवीत् सर्वान् कौतूहलसमन्वितान् ॥ २२ ॥

सैनिकानक्षमोऽस्माकं परिप्रष्टुमिहेदृशः ।

आश्चर्याणि वहनीह भवन्त्यस्याश्रमे मुनेः ॥ २३ ॥

' नरश्रेष्ठ! आप इस विषय में मुनिवर वाल्मीकिजी से भलीभाँति पूछें । ' शत्रुघ्नने कौतूहलमें भरे हुए उन सब सैनिकों से कहा - ' मुनिके इस आश्रम में ऐसी अनेक आश्चर्य-जनक घटनाएँ होती रहती हैं । उनके विषयमें उनसे कुछ पूछताछ करना हमारे लिये उचित नहीं है । २२-२३ ॥ न तु कौतूहलाइ युक्तमन्वेष्टुं तं महामुनिम् ।

एवं तद् वाक्यमुक्त्वा तु सैनिकान् रघुनन्दनः ।

अभिवाद्य महर्षि तं स्वं निवेशं ययौ तदा ॥ २४ ॥

' कौतूहलवश महामुनि वाल्मीकिसे इन बातोंके विषय में जानना या पूछना उचित न होगा । ' अपने सैनिकोंसे ऐसा कहकर रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न महर्षिको प्रणाम करके अपने खेमे में चले गये ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

द्विसप्ततितमः सर्गः वाल्मीकिजी से विदा ले शत्रुघ्नजीका अयोध्या में जाकर श्रीराम आदिसे मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरीको प्रस्थान करना तं शयानं नरव्याघ्रं निद्रा नाभ्यागमत् तदा । वीणा के लयके साथ उस रामचरित - गानका सुमधुर शब्द चिन्तयानमनेकार्थ रामगीतमनुत्तमम् ॥ १ ॥ सुनकर महात्मा शत्रुघ्न की शेष रात बहुत जल्दी बीत गयी ॥

सोते समय पुरुपसिंह शत्रुघ्न उस उत्तम श्रीरामचरित्र तस्यां रजन्यां व्युष्टायां कृत्वा पौर्वाह्निकक्रमम् । सम्बन्धी गान के विषय में अनेक प्रकारकी बातें सोचते रहे । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं शत्रुघ्नो मुनिपुङ्गवम् ॥ ३ ॥

इसलिये रातमें उन्हें बहुत देरतक नींद नहीं आयी ॥ १ ॥ जब वह रात बीती और प्रातः काल आया, तब पूर्वाह्न-तस्य शब्दं सुमधुरं तन्त्रीलयसमन्वितम् । कालोचित नित्यकर्म करके शत्रुघ्नने हाथ जोड़कर मुनिवर

श्रुत्वा रात्रिर्जगामाशु शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ २ ॥ वाल्मीकिसे कहा- ॥ ३ ॥

पृष्ठ 842

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 842 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः १६१ ९

भगवन् द्रष्टुमिच्छामि राघवं रघुनन्दनम् ।

त्वयानुज्ञातुमिच्छामि सहैभिः संशितव्रतैः ॥ ४ ॥

' भगवन्! अब मैं रघुकुलनन्दन श्रीरघुनाथजीका दर्शन करना चाहता हूँ । अतः यदि आपकी आशा हो तो कठोर व्रतका पालन करनेवाले इन साथियोंके साथ मेरी अयोध्या जाने की इच्छा है ' ॥ ४ ॥

इत्येवंवादिनं तं तु शत्रुघ्नं शत्रुसूदनम् ।

वाल्मीकिः सम्परिष्वज्य विससर्ज स राघवम् ॥ ५ ॥

इस तरह की बात कहते हुए रघुकुलभूषण शत्रुसूदन शत्रुघ्नको वाल्मीकिजी ने हृदयसे लगा लिया और जाने की आज्ञा दे दी ॥ ५ ॥

सोऽभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं रथमारुह्य सुप्रभम् ।

अयोध्यामगमत् तूर्ण राघवोत्सुकदर्शनः ॥ ६ ॥

शत्रुघ्न श्रीरघुनाथजी के दर्शन के लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिको प्रणाम करके वे एक सुन्दर दीप्तिमान् रथपर आरूढ़ हो तुरंत अयोध्या की ओर चल दिये ॥ ६ ॥

स प्रविष्टः पुरीं रम्यां श्रीमानिक्ष्वाकुनन्दनः ।

प्रविवेश महाबाहुर्यत्र रामो महाद्युतिः ॥ ७ ॥

इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु श्रीमान् शत्रुघ्न रमणीय अयोध्यापुरीमें प्रवेश करके सीधे उस राजमहलमें गये, जहाँ महातेजस्वी श्रीराम विराजमान थे ॥ ७ ॥

स रामं मन्त्रिमध्यस्थं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ।

पश्यन्नमरमध्यस्थं सहस्रनयनं यथा ॥ ८ ॥

सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ।

उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ९ ॥

जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र देवताओंके बीचमें बैठते हैं, उसी प्रकार पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले भगवान् श्रीराम मन्त्रियोंके मध्यभागमें विराजमान थे । शत्रुघ्नने अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीरामको देखा, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा - ॥ ८ - ९ ॥

यदाशतं महाराज सर्व तत् कृतवानहम् ।

हतः स लवणः पापः पुरी चास्य निवेशिता ॥ १० ॥

' महाराज! आपने मुझे जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह सब मैं कर आया हूँ । पापी लवण मारा गया और उसकी पुरी भी बस गयी ॥ १० ॥

द्वादशैतानि वर्षाणि त्वां विना रघुनन्दन ।

नोत्सहेयमहं वस्तुं त्वया विरहितो नृप ॥ ११ ॥

t " रघुनन्दन! आपका दर्शन किये बिना ये बारह वर्ष तो किसी प्रकार बीत गये; किंतु नरेश्वर! अब और अधिक काल-तक आपसे दूर रहने का मुझमें साहस नहीं है ॥ ११ ॥

स मे प्रसाद काकुत्स्थ कुरुष्वामितविक्रम ।

मातृहीनो यथा वत्सो न चिरं प्रवसाम्यहम् ॥ १२ ॥

' अमित पराक्रमी काकुत्स्थ! जैसे छोटा बच्चा अपनी माँसे अलग नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं चिरकालतक आपसे दूर नहीं रह सकूँगा । इसलिये आप मुझपर कृपा करें ' ॥ १२ ॥

एवं ब्रुवाणं शत्रुघ्नं परिष्वज्येदमत्रवीत् ।

मा विषादं कृथाः शूर नैतत् क्षत्रियचेष्टितम् ॥ १३ ॥

ऐसी बातें कहते हुए शत्रुघ्नको हृदयसे लगाकर श्रीराम-चन्द्रजीने कहा- ' शूरवीर! विषाद न करो । इस तरह कातर होना क्षत्रियोचित चेष्टा नहीं है ॥ १३ ॥

नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव ।

प्रजा च परिपाल्या हि क्षात्रधर्मेण राघव ॥ १४ ॥

' रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुखी नहीं होते हैं । रघुवीर! राजाको क्षत्रिय धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये ॥ १४ ॥

काले काले तु मां वीर अयोध्यामवलोकितुम् ।

आगच्छ त्वं नरश्रेष्ठ गन्तासि च पुरं तव ॥ १५ ॥

' नरश्रेष्ठ वीर! समय - समय पर मुझसे मिलने के लिये अयोध्या आया करो और फिर अपनी पुरीको लौट जाया करो ॥ १५ ॥

ममापि त्वं सुदयितः प्राणैरपि न संशयः ।

अवश्यं करणीयं च राज्यस्य परिपालनम् ॥ १६ ॥

' निःसंदेह तुम मुझे भी प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हो । परंतु राज्यका पालन करना भी तो आवश्यक कर्तव्य है ॥ १६ ॥

तस्मात् त्वं वस काकुत्स्थ सप्तरात्रं मया सह ।

ऊर्ध्व गन्तासि मधुरां सभृत्यबलवाहनः ॥ १७ ॥

' अतः काकुत्स्थ! अभी सात दिन तो तुम मेरे साथ रहो । उसके बाद सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मधुरापुरी-को चले जाना ' ॥ १७ ॥

रामस्यैतद् वचः श्रुत्वा धर्मयुक्तं मनोऽनुगम् ।

शत्रुघ्नो दनिया वाचा वाढमित्येव चाब्रवीत् ॥ १८ ॥

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात धर्मयुक्त होने के साथ ही मनके अनुकूल थी । इसे सुनकर शत्रुघ्नने श्रीरामवियोग के भयसे दीन वाणीद्वारा कहा - ' जैसी प्रभुकी आज्ञा ' ॥ १८ ॥

सप्तरात्रं च काकुत्स्थो राघवस्य यथाज्ञया ।

उष्य तत्र महेष्वासो गमनायोपचक्रमे ॥ १ ९ ॥

श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा से सात दिन अयोध्या में ठहरकर महाधनुर्धर ककुत्स्थकुलभूषण शत्रुघ्न वहाँसे जानेको तैयार हो गये ॥ १ ९ ॥

आमन्त्र्य तु महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।

भरतं लक्ष्मणं चैव महारथमुपारुहत् ॥ २० ॥

सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम, भरत और लक्ष्मणसे विदा ले शत्रुघ्न एक विशाल रथपर आरूढ़ हुए ॥ २० ॥

दूरं पद्भ्यामनुगतो लक्ष्मणेन महात्मना ।

पृष्ठ 843

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 843 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भरतेन च शत्रुघ्नो जगामाशु पुरीं तदा ॥ २१ ॥ लिये बहुत दूरतक पीछे - पीछे गये । तत्पश्चात् शत्रुघ्न रथके

महात्मा लक्ष्मण और भरत पैदल ही उन्हें पहुँचाने के द्वारा शीघ्र ही अपनी राजधानीकी ओर चल दिये ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७२ ॥

त्रिसप्ततितमः सर्गः एक ब्राह्मणका अपने मरे हुए बालकको राजद्वारपर लाना तथा राजाको ही दोषी बताकर

प्रस्थाप्य तु स शत्रुघ्नं भ्रातृभ्यां सह राघवः ।

प्रमुमोद सुखी राज्यं धर्मेण परिपालयन् ॥ १ ॥

शत्रुघ्नको मथुरा भेजकर भगवान् श्रीराम भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करते हुए बड़े सुख और आनन्दसे रहने लगे ॥ १ ॥

ततः कतिपयाहःसु वृद्धो जानपदो द्विजः ।

मृतं बालमुपादाय राजद्वारमुपागमत् ॥ २ ॥

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद उस जनपद के भीतर रहने-वाला एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुए बालकका शव लेकर राजद्वारपर आया ॥ २ ॥

रुदन् बहुविधा वाचः स्नेहदुःखसमन्वितः ।

असकृत् पुत्रपुत्रेति वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥

वह स्नेह और दुःखसे आकुल हो नाना प्रकारकी बातें कहता हुआ रो रहा था और बार - बार ' बेटा! बेटा! ' की पुकार मचाता हुआ इस प्रकार विलाप करता था ॥ ३ ॥

किं नु मे दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम् ।

यदहं पुत्रमेकं तु पश्यामि निधनं गतम् ॥ ४ ॥

‘ हाय! मैंने पूर्वजन्ममें कौन - सा ऐसा पाप किया था, जिसके कारण आज इन आँखोंसे मैं अपने इकलौते बेटेकी मृत्यु देख रहा हूँ ॥ ४ ॥

अप्राप्तयौवनं बालं पञ्चवर्षसहस्रकम् ।

अकाले कालमापन्नं मम दुःखाय पुत्रक ॥ ५ ॥

' बेटा! अभी तो तू बालक था । जवान भी नहीं होने पाया था । केवल पाँच हजार दिन * ( तेरह वर्ष दस महीने बीस दिन ) की तेरी अवस्था थी । तो भी तू मुझे दुःख देने-के लिये असमयमें ही कालके गाल में चला गया ॥ ५ ॥

अल्पैर होभिर्निधनं गमिष्यामि न संशयः ।

अहं च जननी चैव तव शोकेन पुत्रक ॥ ६ ॥

' वत्स! तेरे शोकसे मैं और तेरी माता — दोनों थोड़े ही दिनों में मर जायेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

* मूलमें जो ‘ पञ्चवर्षसहस्रकम् ’ पद आया है, इसमें वर्ष शब्द-का अर्थं दिन समझना चाहिये । जैसे ' सहस्रसंवत्सरं सत्रमुपासीत् इत्यादि विधि - वाक्योंमें ‘ संवत्सर ' शब्द दिवसका वाचक माना गया है । विलाप करना

न स्मराम्यनृतं ह्युक्तं न च हिंसां स्मराम्यहम् ।

सर्वेषां प्राणिनां पापं न स्मरामि कदाचन ॥ ७ ॥

" मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने झूठ बात मुँहमे निकाली हो 1 । किसीकी हिंसा की अथवा समस्त प्राणियोंमें-से किसीको भी कभी कष्ट पहुँचाया हो ॥ ७ ॥

केनाद्य दुष्कृतेनायं बाल एव ममात्मजः ।

अकृत्वा पितृकार्याणि गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ८ ॥

" फिर आज किस पापसे मेरा यह बेटा पितृकर्म किये बिना इस बाल्यावस्था में ही यमराजके घर चला गया ॥ ८ ॥

नेदृशं दृष्टपूर्व मे श्रुतं वा घोरदर्शनम् ।

मृत्युरप्राप्तकालानां रामस्य विषये ह्ययम् ॥ ९ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीके राज्य में तो अकाल मृत्युकी ऐसी भयंकर घटना न पहले कभी देखी गयी थी और न सुनने में ही आयी थी ॥ ९ ॥

रामस्य दुष्कृतं किञ्चिन्महदस्ति न संशयः ।

यथा हि विषयस्थानां बालानां मृत्युरागतः ॥ १० ॥

' निस्संदेह श्रीरामका ही कोई महान् दुष्कर्म है, जिससे इनके राज्यमें रहनेवाले बालकों की मृत्यु होने लगी ॥ १० ॥

नह्यन्यविषयस्थानां बालानां मृत्युतो भयम् ।

स राजञ्जीवयस्वैनं बालं मृत्युवशं गतम् ॥ ११ ॥

राजद्वारि मरिष्यामि पल्या सार्धमनाथवत् ।

ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव ॥ १२ ॥

" दूसरे राज्यमें रहनेवाले बालकोंको मृत्युसे भय नहीं है; अतः राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए इस बालकको जीवित कर दो, नहीं तो मैं अपनी स्त्रीके साथ इस राजद्वारपर अनाथ-की भाँति प्राण दे दूँगा । श्रीराम! फिर ब्रह्महत्याका पाप लेकर तुम सुखी होना ॥ ११-१२ ॥

भ्रातृभिः सहितो राजन् दीर्घमायुरवाप्स्यसि ।

उषिताः स्म सुखं राज्ये तवास्मिन् सुमहाबल ॥ १३ ॥

' महाबली नरेश! हम तुम्हारे राज्यमें बड़े सुखसे रहे हैं, इसलिये तुम अपने भाइयोंके साथ दीर्घजीवी होओगे ॥ १३ ॥

इदं तु पतितं तस्मात् तव राम वशे स्थितान् ।

कालस्य वशमापन्नाः स्वल्पं हि नहि नः सुखम् ॥ १४ ॥

' श्रीराम! तुम्हारे अधीन रहनेवाले हमलोगोंपर यह

पृष्ठ 844

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 844 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः १६२१ बालक - मरणरूपी दुःख सहसा आ पड़ा है, जिससे हम स्वयं भी कालके अधीन हो गये हैं; अतः तुम्हारे इस राज्यमें हमें थोड़ा - सा भी सुख नहीं मिला ॥ १४ ॥

सम्प्रत्यनाथ विषय इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।

रामं नाथमिहासाद्य बालान्तकरणं ध्रुवम् ॥ १५ ॥

‘ महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशॊका यह राज्य अब अनाथ हो गया है । श्रीरामको स्वामीके रूपमें पाकर यहाँ बालकोंकी मृत्यु अटल है ॥ १५ ॥

राजदोषैर्विपद्यन्ते प्रजा ह्यविधिपालिताः ।

असद्वृत्ते हि नृपतावकाले म्रियते जनः ॥ १६ ॥

‘ राजाके दोषसे जब प्रजाका विधिवत् पालन नहीं होता,

तभी प्रजावर्ग को ऐसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है ।

राजाके दुराचारी होने पर ही प्रजाकी अकाल मृत्यु होती है ॥

यद् वा पुरेष्वयुक्तानि जना जनपदेषु च ।

कुर्वते न च रक्षास्ति तदा कालकृतं भयम् ॥ १७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ' अथवा नगरों तथा जनपदोंमें रहनेवाले लोग जब अनुचित कर्म – पापाचार करते हैं और वहाँ रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं होती, उन्हें अनुचित कर्मसे रोकने के लिये कोई उपाय नहीं किया जाता, तभी देशकी प्रजामें अकाल मृत्युका भय प्राप्त होता है ॥ १७ ॥

सुव्यक्तं राजदोषो हि भविष्यति न संशयः ।

पुरे जनपदे चापि तथा बालवधो ह्ययम् ॥ १८ ॥

' अतः यह स्पष्ट है कि नगर या राज्यमें कहीं राजासे ही कोई अपराध हुआ होगा; तभी इस तरह बालककी मृत्यु हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है ' ॥ १८ ॥

एवं बहुविधैर्वाक्यैरुपरुध्य मुहुर्मुहुः ।

राजानं दुःखसंतप्तः सुतं तमुपगूहति ॥ १ ९ ॥

इस तरह अनेक प्रकारके वाक्योंसे उसने बारंबार राजाके सामने अपना दुःख निवेदन किया और बारंबार शोकसे संतप्त होकर वह अपने मरे हुए पुत्रको उठा - उठाकर हृदयसे लगाता रहा ॥ १ ९ ॥ उत्तरकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

चतुःसप्ततितमः सर्गः नारदजीका श्रीरामसे एक तपस्वी शुद्र के अधर्माचरणको ब्राह्मण - बालककी मृत्युमें कारण बताना

तथा तु करुणं तस्य द्विजस्य परिदेवनम् ।

शुश्राव राघवः सर्वे दुःखशोकसमन्वितम् ॥ १ ॥

महाराज श्रीरामने उस ब्राह्मणका इस तरह दुःख और शोक से भरा हुआ वह सारा करुण क्रन्दन सुना ॥ १ ॥

स दुःखेन च संतप्तो मन्त्रिणस्तानुपाह्वयत् ।

वसिष्ठं वामदेवं च भ्रातॄंश्च सह नैगमान् ॥ २ ॥

इससे वे दुःखसे संतप्त हो उठे । उन्होंने अपने मन्त्रियों-को बुलाया तथा वसिष्ठ और वामदेवको एवं महाजनों सहित अपने भाइयोंको भी आमन्त्रित किया ॥ २ ॥

ततो द्विजा वसिष्ठेन सार्धमष्टौ प्रवेशिताः ।

राजानं देवसंकाशं वर्धस्वेति ततोऽब्रुवन् ॥ ३ ॥

तदनन्तर वसिष्ठजी के साथ आठ ब्राह्मणोंने राजसभामें प्रवेश किया और उन देवतुल्य नरेशसे कहा - ' महाराज! आपकी जय हो ' ॥ ३ ॥

मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च काश्यपः ।

कात्यायनोऽथ जाबालिर्गौतमो नारदस्तथा ॥ ४ ॥

उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं- मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद ॥

एते द्विजर्षभाः सर्वे आसनेषूपवेशिताः ।

महर्षीन् समनुप्राप्तानभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ५ ॥

इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम आसनोंपर बैठाया गया । वहाँ पधारे हुए उन महर्षियोंको श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वे स्वयं भी अपने स्थानपर बैठ गये ॥ ५ ॥

मन्त्रिणो नैगमाश्चैव यथाह मनुकूलतः ।

तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् ॥ ६ ॥

राघवः सर्वमाचष्टे द्विजोऽयमुपरोधते । फिर मन्त्री और महाजनोंके साथ यथायोग्य शिष्टाचारका उन्होंने निर्वाह किया । उद्दीप्त तेजवाले वे सब लोग जब यथा-स्थान बैठ गये, तब श्रीरघुनाथजीने उनसे सब बातें बतायीं और कहा -- ' यह ब्राह्मण राजद्वारपर धरना दिये पड़ा है ' ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञो दीनस्य नारदः ॥ ७ ॥

प्रत्युवाच शुभं वाक्यमृषीणां संनिधौ स्वयम् । ब्राह्मणके दुःख से दुखी हुए उन महाराजका यह वचन सुनकर अन्य सब ऋषियोंके समीप स्वयं नारदजीने यह शुभ बात कही -- ॥ ७३ ॥

शृणु राजन् यथाकाले प्राप्तो बालस्य संक्षयः ॥ ८ ॥

श्रुत्वा कर्तव्यतां राजन् कुरुष्व रघुनन्दन । ' राजन्! जिस कारण से इस बालककी अकाल मृत्यु हुई है, वह बताता हूँ, सुनिये । रघुकुलनन्दन नरेश! मेरी बात सुनकर जो उचित कर्तव्य हो उसका पालन कीजिये ॥ ८३ ॥

पुरा कृतयुगे राजन् ब्राह्मणा वै तपखिनः ॥ ९ ॥

अब्राह्मणस्तदा राजन् न तपस्वी कथंचन । " राजन्! पहले सत्ययुगमें केवल ब्राह्मण ही तपस्वी हुआ

पृष्ठ 845

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 845 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे करते थे । महाराज! उस समय ब्राह्मणेतर मनुष्य किसी तरह तपस्या में प्रवृत्त नहीं होता था ॥ ९ ३ ॥ तस्मिन् युगे प्रज्वलिते ब्रह्मभूते त्वनावृते ॥ १० ॥

अमृत्यवस्तदा सर्वे जशिरे दीर्घदर्शिनः । ' वह युग तपस्या के तेजसे प्रकाशित होता था । उसमें ब्राह्मणोंकी ही प्रधानता थी । उस समय अज्ञानका वातावरण नहीं था । इसलिये उस युगके सभी मनुष्य अकाल - मृत्युसे रहित तथा त्रिकालदर्शी होते थे ॥ १०३ ॥

ततस्त्रेतायुगं नाम मानवानां वपुष्मताम् ॥ ११ ॥

क्षत्रिया यत्र जायन्ते पूर्वेण तपसान्विताः । ' सत्ययुग के बाद त्रेतायुग आया । इसमें सुदृढ़ शरीरवाले क्षत्रियों की प्रधानता हुई और वे क्षत्रिय भी उसी प्रकार की तपस्या करने लगे ॥ ११३ ॥

वीर्येण तपसा चैव तेऽधिकाः पूर्वजन्मनि ॥ १२ ॥

मानवा ये महात्मानस्तत्र त्रेतायुगे युगे । " परंतु त्रेतायुग में जो महात्मा पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा

सत्ययुगके लोग तप और पराक्रमकी दृष्टिसे बढ़े- चढ़े थे ।

ब्रह्म क्षत्रं च तत् सर्वं यत् पूर्वमवरं च यत् ॥ १३ ॥

युगयोरुभयोरासीत् समवीर्यसमन्वितम् । " इस प्रकार दोनों युगों में से पूर्व युगमें जहाँ ब्राह्मण उत्कृष्ट और क्षत्रिय अपकृष्ट थे, वहाँ त्रेतायुगमें वे समान - शक्तिशाली हो गये ॥ १३३ ॥

अपश्यन्तस्तु ते सर्वे विशेषमधिकं ततः ॥ १४ ॥

स्थापनं चक्रिरे तत्र चातुर्वर्ण्यस्य सम्मतम् । " तब मनु आदि सभी धर्मप्रवर्तकोंने ब्राह्मण और क्षत्रियमें एककी अपेक्षा दूसरे में कोई विशेषता या न्यूनाधिकता

न देखकर सर्वलोकसम्मत चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की स्थापना की ।

तस्मिन् युगे प्रज्वलिते धर्मभूते ह्यनावृते ॥ १५ ॥

अधर्मः पादमेकं तु पातयत् पृथिवीतले ।

अधर्मेण हि संयुक्तस्तेजो मन्दं भविष्यति ॥ १६ ॥

त्रेतायुग वर्णाश्रम धर्म - प्रधान है । वह धर्मके प्रकाशसे प्रकाशित होता है । वह धर्ममें बाधा डालनेवाले पापसे रहित है । इस युगमें अधर्मने भूतलपर अपना एक पैर रक्खा है । अधर्मसे युक्त होनेके कारण यहाँ लोगोंका तेज धीरे - धीरे घटता जायगा ॥ १५-१६ ॥

आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम् ।

अनृतं नाम तद् भूतं पादेन पृथिवीतले ॥ १७ ॥

‘ सत्ययुगमें जीविकाका साधनभूत कृषि आदि रजोगुण-मूलक कर्म ' अनृत ' कहलाता था और मलके समान अत्यन्त त्याज्य था । वह अनृत ही अधर्मका एक पाद होकर त्रेता में इस भूतलपर स्थित हुआ ॥ १७ ॥

अनृतं पातयित्वा तु पादमेकमधर्मतः ।

ततः प्रादुष्कृतं पूर्वमायुषः परिनिष्ठितम् ॥ १८ ॥

' इस प्रकार अनृत ( असत्य ) रूपी एक पैरको भूतलपर रखकर अधर्मने त्रेता में सत्ययुगकी अपेक्षा आयुको सीमित कर दिया ॥ १८ ॥

पातिते स्वनृते तस्मिन्नधर्मेण महीतले ।

शुभान्येवाचरल्लोकः सत्यधर्मपरायणः ॥ १ ९ ॥

' अतः पृथ्वीपर अधर्म के इस अनृतरूपी चरणके पड़नेपर सत्यधर्मपरायण पुरुष उस अनृतके कुपरिणामसे बचने के लिये शुभकर्मोंका ही आचरण करते हैं ॥ १ ९ ॥

त्रेतायुगे च वर्तन्ते ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च ये ।

तपोऽतप्यन्त ते सर्वे शुश्रूषामपरे जनाः ॥ २० ॥

' तथापि त्रेतायुग में जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं, वे ही सब तपस्या करते हैं । अन्य वर्णके लोग सेवा कार्य किया करते हैं ॥

स्वधर्मः परमस्तेषां वैश्यशूद्रं तदागमत् ।

पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राश्चक्रुर्विशेषतः ॥ २१ ॥

' उन चारों वर्णोंमें से वैश्य और शूद्रको सेवारूपी उत्कृष्ट धर्म स्वधर्म के रूपमें प्राप्त हुआ ( वैश्य कृषि आदिके द्वारा ब्राह्मण आदिकी सेवा करने लगे और ) शूद्र सब वर्णोंकी ( तीनों वर्णों के लोगों की ) विशेषरूपसे पूजा - आदर - सत्कार करने लगे ॥ २१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तेषामधर्मे चानृते च ह ।

ततः पूर्वे पुनर्हास मगमन्नृपसत्तम ॥ २२ ॥

' नृपश्रेष्ठ | इसी बीच में जब त्रेतायुगका अवसान होता है और वैश्यों तथा शूद्रको अधर्मके एक - पादरूप अनृतकी प्राप्ति होने लगती है, तब पूर्व वर्णवाले ब्राह्मण और क्षत्रिय फिर हासको प्राप्त होने लगते हैं ( क्योंकि उन दोनोंको अन्तिम दो वर्णोंका संसर्गजनित दोष प्राप्त हो जाता है ) ॥ २२ ॥

ततः पादमधर्मस्य द्वितीयमवतारयत् ।

ततो द्वापर संख्या सा युगस्य समजायत ॥ २३ ॥

' तदनन्तर अधर्म अपने दूसरे चरणको पृथ्वीपर उतारता है । द्वितीय पैर उतारनेके कारण ही उस युगकी ' द्वापर ' संज्ञा हो गयी है || २३ ||

तस्मिन् द्वापरसंख्ये तु वर्तमाने युगक्षये ।

अधर्मश्वानृतं चैव ववृधे पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥

' पुरुषोत्तम! उस द्वापर नामक युगमें जो अधर्मके दो चरणोंका आश्रय है -- अधर्म और अनृत दोनोंकी वृद्धि होने लगती है ॥ २४ ॥

अस्मिन् द्वापरसंख्याने तपो वैश्यान् समाविशत् ।

त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन् वर्णान् क्रमाद् वै तप आविशत् ॥ २५ ॥

" इस द्वापर युगमें तपस्यारूप कर्म वैश्योंको भी प्राप्त होता है । इस तरह तीन युगों में क्रमशः तीन वर्णोंको तपस्याका अधिकार प्राप्त होता है ॥ २५ ॥

त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन् वर्णान् धर्मश्श परिनिष्ठितः ।

न शूद्रो लभते धर्म युगतस्तु नरर्षभ ॥ २६ ॥

पृष्ठ 846

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 846 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः १६२३ ' तीन युगोंमें तीन वर्णोंका ही आश्रय लेकर तपस्यारूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है; किंतु नरश्रेष्ठ | शूद्रको इन तीनों ही युगों में तपरूपी धर्मका अधिकार नहीं प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

हीनवर्णो नृपश्रेष्ठ तप्यते सुमहत्तपः ।

भविष्यच्छूद्रयन्यां हि तपश्चर्या कलौ युगे ॥ २७ ॥

' नृपशिरोमणे! एक समय ऐसा आयगा, जब हीन वर्ण-का मनुष्य भी बड़ी भारी तपस्या करेगा । कलियुग आनेपर भविष्य में होनेवाली शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्योंके समुदाय में तपश्चर्या की प्रवृत्ति होगी ॥ २७ ॥

अधर्मः परमो राजन् द्वापरे शूद्रजन्मनः ।

स वै विषयपर्यन्ते तव राजन् महातपाः ॥ २८ ॥

अद्य तप्यति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधो ह्ययम् । " राजन्! द्वापरमें भी शूद्रका तपमें प्रवृत्त होना महान् अधर्म माना गया है । ( फिर त्रेताके लिये तो कहना ही क्या है? ) महाराज! निश्चय ही आपके राज्यकी किसी सीमापर कोई खोटी बुद्धिवाला शूद्र महान् तपका आश्रय ले तपस्या

कर रहा है, उसीके कारण इस बालककी मृत्यु हुई है ।

यो धर्मकार्य वा विषये पार्थिवस्य तु ॥ २ ९ ॥

करोति चाश्रीमूलं तत्पुरे वा दुर्मतिर्नरः ।

क्षिप्रं च नरकं याति स च राजा न संशयः ॥ ३० ॥

" जो कोई भी दुर्बुद्धि मानव जिस किसी भी राजाके राज्य इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अथवा नगर में अधर्म या न करने योग्य काम करता है, उसका वह कार्य उस राज्य के अनैश्वर्य ( दरिद्रता ) का कारण बन जाता है और वह राजा शीघ्र ही नरक में पड़ता है, इसमें संशय नहीं ॥ २ ९ -३० ॥

अधीतस्य च तप्तस्य कर्मणः सुकृतस्य च ।

षष्ठं भजति भागं तु प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३१ ॥

" इसी प्रकार जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, वह प्रजा के वेदाध्ययन, तप और शुभ कर्मोंके पुण्यका छठा भाग प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥

षड्भागस्य च भोकासौ रक्षते न प्रजाः कथम् ।

स त्वं पुरुषशार्दूल मार्गस्व विषयं स्वकम् ॥ ३२ ॥

दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर । ' पुरुषसिंह! जो प्रजाके शुभ कर्मों के छठे भागका उपभोक्ता है, वह प्रजाकी रक्षा कैसे नहीं करेगा? अतः आप अपने राज्यमें खोज कीजिये और जहाँ कोई दुष्कर्म दिखायी दे, वहाँ उसके रोकनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ३२३ ॥

एवं चेद् धर्मवृद्धिश्च नृणां वायुर्विवर्धनम् ।

भविष्यति नरश्रेष्ठ बालस्यास्य च जीवितम् ॥ ३३ ॥

' नरश्रेष्ठ! ऐसा करने से धर्म की वृद्धि होगी और मनुष्यों-की आयु बढ़ेगी । साथ ही इस बालकको भी नया जीवन प्राप्त होगा ' ॥ ३३ ॥

उत्तरकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥ ७४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

पञ्चसप्ततितमः सर्गः श्रीरामका पुष्पक विमानद्वारा अपने राज्यकी सभी दिशाओं में घूमकर दुष्कर्मका पता लगाना, किंतु सर्वत्र सत्कर्म ही देखकर दक्षिण दिशामें एक शूद्र तपस्वी के पास पहुँचना

नारदस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वामृतमयं यथा ।

प्रहर्षमतुलं लेभे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥

नारदजीके ये अमृतमय वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अपार आनन्द प्राप्त हुआ और उन्होंने लक्ष्मणजी से इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

गच्छ सौम्य द्विजश्रेष्ठं समाश्वासय सुव्रत ।

बालस्य च शरीरं तत् तैलद्रोण्यां निधापय ॥ २ ॥

गन्धैश्च परमोदारैस्तैलैश्च सुसुगन्धिभिः ।

यथा न क्षीयते बालस्तथा सौम्य विधीयताम् ॥ ३ ॥

' सौम्य! जाओ । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले! इन द्विजश्रेष्ठको सान्त्वना दो और इनके बालकका शरीर उत्तम गन्ध एवं सुगन्धसे युक्त तेलसे भरे हुए काठके बड़े कठौते या डोंगी में डुबाकर रखवा दो और ऐसी व्यवस्था कर दो जिनसे बालकका शरीर विकृत या नष्ट न होने पाये ॥ २-३ ॥

यथा शरीरो बालस्य गुप्तः सन् क्लिष्टकर्मणः ।

विपत्तिः परिभेदो वा न भवेच्च तथा कुरु ॥ ४ ॥

' शुभ कर्म करनेवाले इस बालकका शरीर जिस प्रकार सुरक्षित रहे, नष्ट या खण्डित न हो, वैसा प्रबन्ध करो ' ॥ ४ ॥

एवं संदिश्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।

मनसा पुष्पकं दध्यावागच्छेति महायशाः ॥ ५ ॥

शुभलक्षण लक्ष्मण को ऐसा संदेश दे महायशस्वी श्रीरघुनाथ-जीने मन - ही - मन पुष्पकका चिन्तन किया और कहा - ' आ जाओ ' ॥ ५ ॥

इङ्गितं स तु विज्ञाय पुष्पको हेमभूषितः ।

आजगाम मुहूर्तेन समीपे राघवस्य वै ॥ ६ ॥

श्रीरामचन्द्रजी का अभिप्राय समझकर सुवर्णभूषित पुष्पक-विमान एक ही मुहूर्त में उनके पास आ गया ॥ ६ ॥

सोऽब्रवीत् प्रणतो भूत्वा अयमस्मि नराधिप ।

वश्यस्तव महाबाहो किंकरः समुपस्थितः ॥ ७ ॥

आकर नतमस्तक हो वह बोला -- ' नरेश्वर! यह रहा मैं । महाबाहो! मैं सदा आपके अधीन रहनेवाला किङ्कर हूँ और सेवा के लिये उपस्थित हुआ हूँ ' ॥ ७ ॥

पृष्ठ 847

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 847 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

भाषितं रुचिरं श्रुत्वा पुष्पकस्य नराधिपः ।

अभिवाद्य महर्षीन् स विमानं सोऽध्य रोहत ॥ ८ ॥

पुष्पक विमानका यह मनोहर वचन सुनकर वे महाराज श्रीराम महर्षियोंको प्रणाम करके उस विमानपर आरूढ़ हुए ।

धनुर्गृहीत्वा तूणी च खङ्गं च रुचिरप्रभम् ।

निक्षिप्य नगरे चैतौ सौमित्रिभरतावुभौ ॥ ९ ॥

उन्होंने धनुष, बाणोंसे भरे हुए तरकस और एक चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली और लक्ष्मण तथा भरत— इन दोनों भाइयोंको नगरकी रक्षामें नियुक्त करके वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

प्रायात् प्रतीचीं हरितं विचिन्वंश्च ततस्ततः ।

उत्तरामगमच्छ्रीमान् दिशं हिमवतावृताम् ॥ १० ॥

श्रीमान् राम पहले तो इधर - उधर खोजते हुए पश्चिम दिशा की ओर गये । फिर हिमालयसे घिरी हुई उत्तर दिशामें जा पहुँचे ॥ १० ॥

अपश्यमानस्तत्रापि स्वल्पमप्यथ दुष्कृतम् ।

पूर्वामपि दिशं सर्वामथापश्यन्नराधिपः ॥ ११ ॥

जब उन दोनों दिशाओं में कहीं थोड़ा - सा भी दुष्कर्म नहीं दिखायी दिया, तब नरेश्वर श्रीरामने समूची पूर्व दिशाका भी निरीक्षण किया ॥ ११ ॥

प्रविशुद्धसमाचारामादर्शतलनिर्मलाम् 1 पुष्पस्थ महाबाहु स्तदापश्यन्नराधिपः ॥ १२ ॥

पुष्पकपर बैठे हुए महाबाहु राजा श्रीरामने वहाँ भी शुद्ध सदाचारका पालन होता देखा । वह दिशा भी दर्पणके समान निर्मल दिखायी दी ॥ १२ ॥

दक्षिणां दिशमाक्रामत् ततो राजर्षिनन्दनः ।

शैवलस्योत्तरे पार्श्वे ददर्श सुमहत्सरः ॥ १३ ॥

तब राजर्षिनन्दन रघुनाथजी दक्षिण दिशा की ओर गये । वहाँ शैवल पर्वतके उत्तर भागमें उन्हें एक महान् सरोवर दिखायी दिया ॥ १३ ॥

तस्मिन् सरसि तप्यन्तं तापसं सुमहत्तपः ।

ददर्श राघवः श्रीमल्लम्बमानमधोमुखम् ॥ १४ ॥

उस सरोवर के तटपर एक तपस्वी बड़ी भारी तपस्या कर

रहा था । वह नीचेको मुख किये लटका हुआ था । रघुकुल-नन्दन श्रीरामने उसे देखा ॥ १४ ॥

राघवस्तमुपागम्य तप्यन्तं तप उत्तमम् ।

उवाच च नृपो वाक्यं धन्यस्त्वमसि सुव्रत ॥ १५ ॥

कस्यां योग्यां तपोवृद्ध वर्तसे दृढविक्रम ।

कौतूहलात् त्वां पृच्छामि रामो दाशरथिर्ह्यहम् ॥ १६ ॥

देखकर राजा श्रीरघुनाथजी उम्र तपस्या करते हुए उस तपस्वी के पास आये और बोले - ' उत्तम व्रतका पालन करने-वाले तापस! तुम धन्य हो । तपस्यामें बढ़े- चढ़े सुदृढ़ पराक्रमी पुरुष! तुम किस जातिमें उत्पन्न हुए हो? मैं दशरथकुमार राम तुम्हारा परिचय जानने के कौतूहलसे ये बातें पूछ रहा हूँ ॥

कोऽर्थो मनीषितस्तुभ्यं स्वर्ग लाभोऽपरोऽथवा ।

वराश्रयो यदर्थे त्वं तपस्यन्यैः सुदुश्चरम् ॥ १७ ॥

" तुम्हें किस वस्तु को पानेकी इच्छा है? तपस्याद्वारा संतुष्ट हुए इष्टदेवतासे वर के रूपमें तुम क्या पाना चाहते हो-स्वर्ग या दूसरी कोई वस्तु? कौन - सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिये तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरोंके लिये दुष्कर है? ॥ १७ ॥

यमाश्रित्य तपस्तप्तं श्रोतुमिच्छामि तापस ।

ब्राह्मणो वासि भद्रं ते क्षत्रियो वासि दुर्जयः ।

वैश्यस्तृतीयो वर्णो वा शूद्रो वा सत्यवाग् भव ॥ १८ ॥

' तापस! जिस वस्तु के लिये तुम तपस्या में लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ । इसके सिवा यह भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय? तीसरे वर्णके वैश्य हो

अथवा शूद्र? तुम्हारा भला हो । ठीक - ठीक बताना ' ॥१८ ॥

इत्येवमुक्तः स नराधिपेन अवाक्शिरा दाशरथाय तस्मै । उवाच जातिं नृपपुङ्गवाय यत्कारणं चैव तपः प्रयत्नः ॥ १ ९ ॥ महाराज श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर नीचे सिर किये लटके हुए उस तपस्वीने उन नृपश्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीरामको अपनी जातिका परिचय दिया और जिस उद्देश्यसे उसने तपस्या के लिये प्रयास किया था, वह भी बताया ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥ ७५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

षट्सप्ततितमः सर्गः श्रीराम के द्वारा शम्बूकका वध, देवताओंद्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रमपर महर्षि अगस्त्यके द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण- दान तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । सुनकर नीचे मस्तक किये लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी अवाक्शिरास्तथाभूतो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥ इस प्रकार बोला -- ॥ १ ॥

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् रामका यह वचन शूद्रयोन्यां प्रजातोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः ।

पृष्ठ 848

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 848 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बातचीत श्रीरामकी शम्बूकसे तपस्वी शूद्र

पृष्ठ 849

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 849 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 850

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 850 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः १६२५ देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः ॥ २ ॥

' महायशस्वी श्रीराम! मैं शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ

और सदेह स्वर्गलोकमें जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ ।

इसीलिये ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ ॥ २ ॥

न मिथ्याहं वदे राम देवलोकजिगीषया ।

शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ शम्बूकं नाम नामतः ॥ ३ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम! मैं झूठ नहीं बोलता । देव-लोकपर विजय पानेकी इच्छासे ही तपस्या में लगा हूँ । आप

मुझे शूद्र समझिये । मेरा नाम शम्बूक है ' ॥ ३ ॥

भाषतस्तस्य शूद्रस्य खङ्गं सुरुचिरप्रभम् ।

निष्कृष्य कोशाद् विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः ॥ ४ ॥

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचन्द्रजीने म्यान-से चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसीसे उसका सिर काट लिया ॥ ४ ॥

तस्मिन्शूद्रे हते देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ।

साधुसाध्विति काकुत्स्थं ते शशंसुर्मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥

उस शूदका वध होते ही इन्द्र और अग्निसहित सम्पूर्ण देवता ' बहुत ठीक, बहुत ठीक ' कहकर भगवान् श्रीरामकी बारंबार प्रशंसा करने लगे ॥ ५ ॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् दिव्यानां सुसुगन्धिनाम् ।

पुष्पाणां वायुमुक्तानां सर्वतः प्रपपात ह ॥ ६ ॥

उस समय उनके ऊपर सब ओरसे वायुदेवताद्वारा बिखेरे गये दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥

सुप्रीताश्चानुवन् रामं देवाः सत्यपराक्रमम् ।

सुरकार्यमिदं देव सुकृतं ते महामते ॥ ७ ॥

वे सब देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी श्रीराम-से बोले – ' देव! महामते! आपने यह देवताओंका ही कार्य सम्पन्न किया है ॥ ७ ॥

गृहाण च वरं सौम्य यं त्वमिच्छत्यरिंदम ।

स्वर्गभाङ् नहि शूद्रोऽयं त्वत्कृते रघुनन्दन ॥ ८ ॥

' शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन सौम्य श्रीराम! आपके इस सत्कर्मसे ही यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोक में नहीं जा सका है । अतः आप जो वर चाहें माँग लें ' ॥ ८ ॥

देवानां भाषितं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सहस्राक्षं पुरंदरम् ॥ ९ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने दोनों हाथ जोड़ सहस्रनेत्रधारी देवराज इन्द्र से कहा — ॥९ ॥

यदि देवाः प्रसन्ना मे द्विजपुत्रः स जीवतु ।

दिशन्तु वरमेतं मे ईप्सितं परमं मम ॥ १० ॥

' यदि देवता मुझपर प्रसन्न हैं तो वह ब्राह्मणपुत्र जीवित

हो जाय । यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है ।

देवतालोग मुझे यही वर दें ॥ १० ॥

वा ० रा ० ५. १२. ६–

ममापचाराद् बालोऽसौ ब्राह्मणस्यैकपुत्रकः ।

अप्राप्तकालः कालेन नीतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ११ ॥

' मेरे ही किसी अपराधसे ब्राह्मणका वह इकलौता बालक असमयमें ही कालके गालमें चला गया है ॥ ११ ॥

तं जीवयत भद्रं वो नानृतं कर्तुमईथ ।

द्विजस्य संश्रुतोऽर्थो मे जीवयिष्यामि ते सुतम् ॥ १२ ॥

मैंने ब्राह्मणके सामने यह प्रतिज्ञा की है कि ' मैं आपके पुत्रको जीवित कर दूँगा । ' अतः आपलोगोंका कल्याण हो । आप उस ब्राह्मण - बालकको जीवित कर दें । मेरी बातको झूठी न करें ' ॥ १२ ॥

राघवस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा विबुधसत्तमाः ।

प्रत्यूचू राघवं प्रीता देवाः प्रीतिसमन्वितम् ॥ १३ ॥

श्रीरघुनाथ जी की यह बात सुनकर वे विबुधशिरोमणि देवता उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले—– ॥ १३ ॥

निर्वृतो भव काकुत्स्थ सोऽस्मिन्नहनि बालकः ।

जीवितं प्राप्तवान् भूयः समेतश्चापि बन्धुभिः ॥ १४ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण! आप संतुष्ट हों । वह बालक आज फिर जीवित हो गया और अपने भाई - बन्धुओंसे जा मिला ॥

यस्मिन् मुहूर्ते काकुत्स्थ शूद्रोऽयं विनिपातितः ।

तस्मिन् मुहूर्ते बालोऽसौ जीवेन समयुज्यत ॥ १५ ॥

‘ काकुत्स्थ! आपने जिस मुहूर्तमें इस शूद्रको धराशायी किया है, उसी मुहूर्त में वह बालक जी उठा है ॥ १५ ।

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते साधु याम नरर्षभ ।

अगस्त्यस्याश्रमपदं द्रष्टुमिच्छाम राघव ॥ १६ ॥

तस्य दीक्षा समाप्ता हि ब्रह्मर्षेः सुमहाद्युतेः ।

द्वादशं हि गतं वर्षे जलशय्यां समासतः ॥ १७ ॥

' नरश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो । भला हो 1 । अब हम अगस्त्याश्रमको जा रहे हैं । रघुनन्दन! हम महर्षि अगस्त्यका दर्शन करना चाहते हैं । उन्हें जलशय्या लिये पूरे बारह वर्ष बीत चुके हैं । अब उन महातेजस्वी ब्रह्मर्षिकी वह जलशयन-सम्बन्धी व्रतकी दीक्षा समाप्त हुई है ॥१६-१७ ॥

काकुत्स्थ तद् गमिष्यामो मुनिं समभिनन्दितुम् ।

त्वं चापि गच्छ भद्रं ते द्रष्टुं तमृषिसत्तमम् ॥ १८ ॥

' घुनन्दन! इसीलिये हमलोग उन महर्षिका अभिनन्दन करनेके लिये जायँगे । आपका कल्याण हो । आप भी उन मुनिश्रेष्ठका दर्शन करने के लिये चलिये ' ॥ १८ ॥

स तथेति प्रतिज्ञाय देवानां रघुनन्दनः ।

आरुरोह विमानं तं पुष्पकं हेमभूषितम् ॥ १ ९ ॥

तब ' बहुत अच्छा ' कहकर रघुकुलनन्दन श्रीराम देवताओंके सामने वहाँ जानेकी प्रतिज्ञा करके उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर चढ़े ॥ १ ९ ॥

ततो देवाः प्रयातास्ते विमानैर्वहुविस्तरैः ।

रामोऽप्यनुजगामाशु कुम्भयोने स्त पोवनम् ॥ २० ॥