श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 101–110

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * १०१ यदा पुनः रागद्वेषौ तत्प्रतिपक्षेण नियमयति, तदा शास्त्रदृष्टिः एव पुरुषो भवति, न प्रकृतिवशः । तस्मात् तयो रागद्वेषयोः वशं न आगच्छेत् । यतः तौ हि अस्य पुरुषस्य परिपन्थिनौ श्रेयो-मार्गस्य विघ्नकर्तारौ तस्करौ इव इत्यर्थः ॥ ३४ ॥ |

परंतु जब यह जीव प्रतिपक्ष - भावनासे राग-द्वेषका संयम कर लेता है, तब केवल शास्त्रदृष्टिवाला हो जाता है, फिर यह प्रकृतिके वशमें नहीं रहता । इसलिये ( कहते हैं कि ) मनुष्यको राग - द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे ( राग - द्वेष ) ही इस जीवके परिपन्थी हैं अर्थात् चोरकी भाँति कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले हैं ॥ ३४ ॥

तत्र रागद्वेषप्रयुक्तो मन्यते शास्त्रार्थम् अपि अन्यथा परधर्मः अपि धर्मत्वाद् अनुष्ठेय एव इति तद् असत्— श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः स्वधर्मे निधनं निधनं श्रेयः श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मो विगुणः अपि विगतगुणः अपि अनुष्ठीयमानः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् साद्गुण्येन सम्पादिताद् अपि । स्वधर्मे स्थितस्य निधनं मरणम् अपि श्रेयः परधर्मे स्थितस्य जीवितात्, कस्मात्, परधर्मो भयावहो नरकादिलक्षणं भयम् आवहति यतः ॥ ३५ ॥

रागद्वेषयुक्त मनुष्य तो शास्त्रके अर्थको भी उलटा मान लेता है और परधर्मको भी धर्म होनेके नाते अनुष्ठान करनेयोग्य मान बैठता है । परंतु उसका ऐसा मानना भूल है—

परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।

परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥

अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये गये अर्थात् अंग-प्रत्यंगोंसहित सम्पादन किये गये भी पर- धर्मकी अपेक्षा गुणरहित भी अनुष्ठान किया हुआ अपना धर्म कल्याणकर है अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है । पर - धर्ममें स्थित पुरुषके जीवनकी अपेक्षा स्वधर्ममें स्थित पुरुषका मरण भी श्रेष्ठ है, क्योंकि दूसरेका धर्म भयदायक है - नरक आदि रूप भयका देनेवाला है ॥ ३५ ॥

अर्जुन उवाच— यद्यपि अनर्थमूलं ‘ ध्यायतो विषयान् पुंसः ', ' रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ' इति च उक्तं विक्षिप्तम् अनवधारितं च तद् उक्तम्, तत् संक्षिप्तं निश्चितं च इदम् एव इति ज्ञातुम् इच्छन् अर्जुन उवाच ज्ञाते हि तस्मिन् तदुच्छेदाय यत्नं कुर्याम् इति— अर्जुन बोले-यद्यपि ' ध्यायतो विषयान् पुंसः ', ' रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ' इत्यादि प्रकरणोंमें अनर्थका मूल कारण बतलाया गया, पर वह भिन्न - भिन्न प्रकरणोंमें और अनिश्चितरूपसे कहा गया है । इसलिये वह ' अनर्थोंका कारण ठीक यही है । ' इस प्रकार निश्चयपूर्वक और संक्षेपसे जाननेमें आ जाय तो मैं उसके उच्छेदके लिये प्रयत्न करूँ, इस विचारसे उसके जाननेकी इच्छा करते हुए अर्जुन बोले—

पृष्ठ 102

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१०२ अथ केन अनिच्छन्नपि अथ केन हेतुभूतेन भृत्यः अयं पापं कर्म स्वयम् अनिच्छन् अपि हे बलाद् इव नियोजितो दृष्टान्तः ॥ ३६ ॥

* श्रीमद्भगवद्गीता *

प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।

वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥

प्रयुक्तः सन् राज्ञा इव हे वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुए कृष्ण! किस प्रधान चरति आचरति पूरुषः कारणसे प्रयुक्त किया हुआ यह पुरुष स्वयं न चाहता वार्ष्णेय वृष्णिकुलप्रसूत हुआ भी राजासे प्रयुक्त किये हुए सेवककी तरह राज्ञा इव इति उक्तो बलपूर्वक लगाया हुआ - सा पाप कर्मका आचरण किया करता है? ॥ ३६ ॥

शृणु त्वं तं वैरिणं सर्वानर्थकरं यं त्वं पृच्छसि — श्रीभगवानुवाच— ' ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीरणा ॥ ' ( विष्णुपु ० ६ । ५ । ७४ ) ऐश्वर्यादिषट्कं यस्मिन् वासुदेवे नित्यम् अप्रतिबद्धत्वेन सामस्त्येन च वर्तते । ' उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥ ' ( विष्णुपु ० ६ । ५ । ७८ ) उत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवो वाच्यो भगवान् इति । काम एष क्रोध एष जिसको तू पूछता है, सर्व अनर्थोंके कारणरूप उस वैरीके विषयमें सुन ( इस उद्देश्यसे ) भगवान् बोले-[ आचार्य पहले भगवान् शब्दका अर्थ करते हैं । ] ' सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, वैराग्य और मोक्ष - इन छ: का नाम भग है ' यह ऐश्वर्य आदि छहों गुण बिना प्रतिबन्धके, सम्पूर्णतासे जिस वासुदेवमें सदा रहते हैं । तथा ' उत्पत्ति और प्रलयको, भूतोंके आने और जानेको एवं विद्या और अविद्याको जो जानता है, उसका नाम भगवान् है ' अतः उत्पत्ति आदि सब विषयोंको जो भलीभाँति जानते हैं, वे वासुदेव ' भगवान् ' नामसे वाच्य हैं

रजोगुणसमुद्भवः ।

महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥

काम एष सर्वलोकशत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्, स एष कामः प्रतिहतः केनचित् क्रोधत्वेन परिणमते । अतः क्रोधः अपि एष एव । रजोगुणसमुद्भवो रजोगुणात् समुद्भवो यस्य स कामो रजोगुणसमुद्भवो रजोगुणस्य वा समुद्भवः । कामो हि उद्भूतो रजः प्रवर्तयन् पुरुषं प्रवर्तयति । यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है, जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है, वही यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है, इसलिये क्रोध भी यही है । यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है; क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है ।

पृष्ठ 103

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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * १०३ तृष्णया हि अहं कारित इति दुःखितानां रजः कार्ये सेवादौ प्रवृत्तानां प्रलापः श्रूयते । महाशनो महद् अशनम् अस्य इति महाशनः अत एव महापाप्मा । कामेन हि प्रेरितो जन्तुः पापं करोति । अतो विद्धि एनं कामम् इह संसारे वैरिणम् ॥ ३७ ॥

तथा रजोगुणके कार्य - सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि ' तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है ' इत्यादि । तथा यह काम बहुत खानेवाला है । इसलिये महापापी भी है, क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है । इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान ॥ ३७ ॥

कथं वैरी इति दृष्टान्तैः प्रत्याययति- — यह काम किस प्रकार वैरी है, सो दृष्टान्तोंसे

समझाते हैं-धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।

यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥

धूमेन सहजेन आव्रियते वह्निः प्रकाशात्मकः जैसे प्रकाशस्वरूप अग्नि अपने साथ उत्पन्न हुए अप्रकाशात्मकेन यथा वा आदर्शो मलेन च, अन्धकाररूप धूएँसे और दर्पण जैसे मलसे आच्छादित हो जाता है तथा जैसे गर्भ अपने आवरणरूप जेरसे यथा उल्बेन गर्भवेष्टनेन जरायुणा आवृत आच्छादित होता है वैसे ही उस कामसे यह ( ज्ञान )

आच्छादितो गर्भ: तथा तेन इदम् आवृतम् ॥ ३८ ॥ । ढका हुआ है ॥ ३८ ॥

किं पुनः तद् इदंशब्दवाच्यं यत् कामेन जिसका ( उपर्युक्त श्लोकमें ) ' इदम् ' शब्दसे संकेत किया गया है— - जो कामसे आच्छादित है, वह आवृतम् इति उच्यते— कौन है? सो कहा जाता है— आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय आवृतम् एतेन ज्ञानं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । ज्ञानी हि जानाति अनेन अहम् अनर्थे प्रयुक्तः पूर्वम् एव इति । दुःखी च भवति नित्यम् एव । अतः असौ ज्ञानिनो नित्यवैरी न तु मूर्खस्य । स हि कामं तृष्णाकाले मित्रम् इव पश्यन् तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते जानाति, तृष्णया अहं दुःखित्वम् आपादित इति, न पूर्वम् एव अतो ज्ञानिन एव

नित्यवैरी ।

दुष्पूरेणानलेन च ॥३ ९ ॥

ज्ञानीके ( विवेकीके ) इस कामरूप नित्य वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है । ज्ञानी ही पहलेसे जानता है कि इसके द्वारा मैं अनर्थोंमें नियुक्त किया गया हूँ । इससे वह सदा दुःखी भी होता है । इसलिये यह ज्ञानीका ही नित्य वैरी है मूर्खका नहीं; क्योंकि वह मूर्ख तो तृष्णाके समय उसको मित्रके समान समझता है । फिर जब उसका परिणामरूप दु: ख प्राप्त होता है तब समझता है कि ' तृष्णाके द्वारा मैं दुःखी किया गया हूँ ' पहले नहीं जानता, इसलिये यह ' काम ' ज्ञानीका ही नित्य वैरी है ।

पृष्ठ 104

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१०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * किंरूपेण, कामरूपेण काम इच्छा एव रूपम् कैसे कामके द्वारा ( ज्ञान आच्छादित है? इसपर कहते हैं— ) कामना - इच्छा ही जिसका स्वरूप है, अस्य इति कामरूप: तेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणम् जो अति कष्टसे पूर्ण होता है तथा जो अनल है, अस्य इति दुष्पूरः तेन अनलेन न अस्य अलं भोगोंसे कभी भी तृप्त नहीं होता, ऐसे कामनारूप पर्याप्तिः विद्यते इति अनलः तेन ॥ ३ ९ ॥ वैरीद्वारा ( ज्ञान आच्छादित है ) ॥ ३ ९ ॥ किमधिष्ठानः पुनः कामो ज्ञानस्य आवरणत्वेन ज्ञानको आच्छादित करनेवाला होनेके कारण जो वैरी सर्वस्य इति अपेक्षायाम् आह ज्ञाते हि सबका वैरी है वह काम कहाँ रहनेवाला है? अर्थात् शत्रोः अधिष्ठाने उसका आश्रय क्या है? क्योंकि शत्रुके रहनेका स्थान सुखेन शत्रुनिबर्हणं कर्तुं शक्यते जान लेनेपर सहजमें ही उसका नाश किया जा सकता इति- है । इसपर कहते हैं—

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः च अस्य कामस्य इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि यह सब इस कामके अधिष्ठानम् आश्रय उच्यते । एतैः इन्द्रियादिभिः अधिष्ठान अर्थात् रहनेके स्थान बतलाये जाते हैं । यह काम इन आश्रयभूत इन्द्रियादिके द्वारा ज्ञानको आच्छादित आश्रयैः विमोहयति विविधं मोहयति एष कामो करके इस जीवात्माको नाना प्रकारसे मोहित किया ज्ञानम् आवृत्य आच्छाद्य देहिनं शरीरिणम् ॥ ४० ॥ । करता है ॥ ४० ॥

यत एवम्— तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ पाप्मानं प्रजहि ह्येनं तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि आदौ पूर्वं नियम्य वशीकृत्य भरतर्षभ पाप्मानं पापाचारं कामं प्रजहि हि परित्यज, एनं प्रकृतं वैरिणं ज्ञान-विज्ञाननाशनम् । ज्ञानं शास्त्रत आचार्यतः च आत्मादीनाम् अवबोधः, विज्ञानं विशेषतः तदनुभवः तयोः ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयः प्राप्तिहेत्वोः नाशनं प्रजहि हि आत्मनः परित्यज इत्यर्थः ॥ ४१ ॥

जब कि ऐसा है— -नियम्य भरतर्षभ ।

ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥

इसलिये हे भरतर्षभ! तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाशक इस ऊपर बतलाये हुए वैरी पापाचारी कामका परित्याग कर । अभिप्राय यह कि शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे जो आत्मा - अनात्मा और विद्या- अविद्या आदि पदार्थोंका बोध होता है उसका नाम ' ज्ञान ' है, एवं उसका जो विशेषरूपसे अनुभव है उसका नाम विज्ञान है, अपने कल्याणकी प्राप्तिके कारणरूप उन ज्ञान और विज्ञानको यह काम नष्ट करनेवाला है, इसलिये इसका परित्याग कर ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 105

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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * १०५ इन्द्रियाणि आदौ नियम्य कामं शत्रुं पहले इन्द्रियोंको वशमें करके कामरूप शत्रुका जहि हि इति उक्तं तत्र किमाश्रयः कामं त्याग कर - ऐसा कहा, सो किसका आश्रय लेकर जह्याद् इति उच्यते— इसका त्याग करना चाहिये, यह बतलाते हैं—

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥४२ ॥

इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि पञ्च देहं स्थूलं बाह्यं परिच्छिन्नं च अपेक्ष्य सौक्ष्म्यान्तरस्थत्वव्यापि-त्वादि अपेक्ष्य पराणि प्रकृष्टानि आहुः पण्डिताः । तथा इन्द्रियेभ्यः परं मनः सङ्कल्पविकल्पा-त्मकम् । तथा मनसः तु परा बुद्धिः निश्चयात्मिका । तथा यः सर्वदृश्येभ्यो बुद्ध्यन्तेभ्यः अभ्यन्तरः, यं देहिनम् इन्द्रियादिभिः आश्रयैः युक्तः कामो ज्ञानावरणद्वारेण मोहयति इति उक्तम्, स बुद्धेः द्रष्टा परमात्मा ॥ ४२ ॥

पण्डितजन बाह्य, परिच्छिन्न और स्थूल देहकी अपेक्षा सूक्ष्म अन्तरस्थ और व्यापक आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण श्रोत्रादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंको पर अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं । तथा इन्द्रियोंकी अपेक्षा संकल्प - विकल्पात्मक मनको श्रेष्ठ कहते हैं और मनकी अपेक्षा निश्चयात्मिका बुद्धिको श्रेष्ठ बताते हैं । एवं जो बुद्धिपर्यन्त समस्त दृश्य पदार्थोंके अन्तरव्यापी है, जिसके विषयमें कहा है कि उस आत्माको इन्द्रियादि आश्रयोंसे युक्त काम ज्ञानावरणद्वारा मोहित किया करता है, वह बुद्धिका ( भी ) द्रष्टा परमात्मा ( सबसे श्रेष्ठ ) है ॥ ४२ ॥

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥

एवं बुद्धेः परम् आत्मानं बुद्ध्वा ज्ञात्वा संस्तभ्य सम्यक् स्तम्भनं कृत्वा स्वेन एव आत्मना संस्कृतेन मनसा सम्यक् समाधाय इत्यर्थः । जहि एनं शत्रुं हे महाबाहो कामरूपं दुरासदम् दुःखेन आसद आसादनं प्राप्तिः यस्य तं दुरासदं दुर्विज्ञेयानेकविशेषम् इति ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां इस प्रकार बुद्धिसे अति श्रेष्ठ आत्माको जानकर और आत्मासे ही आत्माको स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मनसे अच्छी प्रकार आत्माको समाधिस्थ करके, हे महाबाहो! इस कामरूप दुर्जय शत्रुका त्याग कर अर्थात् जो दुःखसे वशमें किया जाता है उस अनेक दुर्विज्ञेय विशेषणोंसे युक्त कामका त्याग कर दे ॥ ४३ ॥

वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूप-निषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 106

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ॐ चतुर्थोऽध्यायः यः अयं योगः अध्यायद्वयेन उक्तो ज्ञाननिष्ठालक्षणः ससन्न्यासः कर्मयोगोपायः, यस्मिन् वेदार्थः परिसमाप्तः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणः च, गीतासु च सर्वासु अयम् एव योगो विवक्षितो भगवता अतः परिसमाप्तं वेदार्थं मन्वानः तं वंशकथनेन स्तौति श्रीभगवान्– श्रीभगवानुवाच— इमं विवस्वते योगं विवस्वान्मनवे प्राह इमम् अध्यायद्वयेन उक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परि-पालयितॄणां क्षत्रियाणां बलाधानाय । तेन योग-बलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम् ॥ ब्रह्मक्षत्रपरिपालिते जगत्परिपालयितुम् अलम् । अव्ययम् अव्ययफलत्वात् । न हि अस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति । स च विवस्वान् मनवे प्राह मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत् ॥ १ ॥

एवं परम्पराप्राप्तमिमं कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें ( दूसरे और तीसरेमें ) कहा गया है, जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है, आगे सारी गीतामें भी भगवान्‌को ' योग ' शब्दसे यही ( ज्ञानयोग ) विवक्षित है, इसलिये वेदके अर्थको ( ज्ञानयोगमें ) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस ( ज्ञाननिष्ठारूप योग ) - की स्तुति करते हैं-श्रीभगवान् बोले—

प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१ ॥

जगत् - प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था; ( क्योंकि ) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय, ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं । इस योगका फल अविनाशी है, इसलिये यह अव्यय है; क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता । उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा ॥१ ॥

राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२ ॥

पृष्ठ 107

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १०७ एवं क्षत्रियपरम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयो राजानः च ते ऋषयः च राजर्षयो विदुः इमं योगम् । स योगः कालेन इह महता दीर्घेण नष्टो विच्छिन्नसम्प्रदायः संवृत्तो हे परन्तप आत्मनो विपक्षभूताः पर उच्यन्ते तान् शौर्यतेजो-गभस्तिभिः भानुः इव तापयति इति परन्तपः शत्रुतापन इत्यर्थः ॥ २ ॥

इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने— जो कि राजा और ऋषि दोनों थे — जाना । हे परंतप! ( अब ) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है । अर्थात् उसकी सम्प्रदाय - परम्परा टूट गयी है । अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं, उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह पपातप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है ॥ २ ॥

दुर्बलान् अजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगम् अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है, यह देखकर और साथ ही इमम् उपलभ्य लोकं च अपुरुषार्थसम्बन्धिनम् - लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर—

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥

स एव अयं मया ते तुभ्यम् अद्य इदानीं वही यह पुराना योग, यह सोचकर कि तू मेरा योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तः असि मे सखा च भक्त और मित्र है, अब मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि असि इति । रहस्यं हि यस्माद् एतद् उत्तमं योगो ज्ञानम् इत्यर्थः ॥३ ॥ यह ज्ञानरूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है ॥ ३ ॥

भगवता विप्रतिषिद्धम् उक्तम् इति मा भूत् भगवान्ने असङ्गत कहा, ऐसी धारणा किसीकी कस्यचिद् बुद्धिः इति परिहारार्थं चोद्यम् इव न हो जाय, अतः उसको दूर करनेके लिये शङ्का कुर्वन्– करता हुआ - सा-अर्जुन उवाच- अर्जुन बोले-अपरं भवतो

भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥

अपरम् अर्वाग् वसुदेवगृहे भवतो जन्म, आपका जन्म तो अर्वाचीन है अर्थात् अभी परं पूर्वं सर्गादौ जन्म उत्पत्तिः विवस्वत वसुदेवके घरमें हुआ है और सूर्यकी उत्पत्ति पहले आदित्यस्य । सृष्टिके आदिमें हुई थी । तत् कथम् एतद् विजानीयाम् अविरुद्धार्थतया तब मैं इस बातको अविरुद्धार्थयुक्त ( सुसङ्गत ) यः त्वम् एव आदौ प्रोक्तवान् इमं योगम्, स एव कैसे समझँ कि जिन आपने इस योगको आदिकालमें त्वम् इदानीं मह्यं प्रोक्तवान् असि इति ॥ ४ ॥ कहा था, वही आप मुझसे कह रहे हैं ॥ ४ ॥

पृष्ठ 108

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१०८ * श्रीमद्भगवद्गीता * या वासुदेवे अनीश्वरासर्वज्ञाशङ्का मूर्खाणां भगवान् श्रीवासुदेवके विषयमें मूर्खोंकी जो ऐसी तां परिहरन् श्रीभगवानुवाच यदर्थो हि अर्जुनस्य शङ्का है कि ये ईश्वर नहीं हैं, सर्वज्ञ नहीं हैं तथा जिस शङ्काको दूर करनेके लिये ही अर्जुनका यह प्रश्न है, प्रश्न: उसका निवारण करते हुए श्रीभगवान् बोले— बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न बहूनि मे मम व्यतीतानि अतिक्रान्तानि जन्मानि तव च हे अर्जुन तानि अहं वेद जाने सर्वाणि न त्वं वेत्थ जानीषे, धर्माधर्मादिप्रतिबद्ध-ज्ञानशक्तित्वात् । अहं पुनः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद् अनावरणज्ञानशक्तिः इति वेद अहं हे परन्तप ॥ ५ ॥

त्वं वेत्थ परन्तप ॥५ ॥

हे अर्जुन! मेरे और तेरे पहले बहुत जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता; क्योंकि पुण्य - पाप आदिके संस्कारोंसे तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है । परंतु मैं तो नित्य - शुद्ध - बुद्ध - मुक्त - स्वभाववाला हूँ, इस कारण मेरी ज्ञानशक्ति आवरणरहित है, इसलिये हे परन्तप! मैं ( सब कुछ ) जानता हूँ ॥ ५ ॥

कथं तर्हि तव नित्येश्वरस्य धर्माधर्माभावे तो फिर आप नित्य ईश्वरका पुण्य - पापसे सम्बन्ध न अपि जन्म इति उच्यते- होनेपर भी जन्म कैसे होता है? इसपर कहा जाता है-अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय अजः अपि जन्मरहितः अपि सन् तथा अव्ययात्मा अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावः अपि सन् तथा भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानाम् ईश्वर ईशनशीलः अपि सन्, प्रकृतिं स्वां मम वैष्णवीं मायां त्रिगुणात्मिकां यस्या वशे सर्वं जगद् वर्तते यया मोहितं सत् स्वम् आत्मानं वासुदेवं न जानाति, तां प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय वशीकृत्य सम्भवामि देहवान् इव भवामि जात इव आत्ममायया आत्मनो मायया न परमार्थतो लोकवत् ॥ ६ ॥

सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥

यद्यपि मैं अजन्मा – जन्मरहित, अव्ययात्मा-अक्षीण ज्ञानशक्ति - स्वभाववाला और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका नियमन करनेवाला ईश्वर भी हूँ, तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको, जिसके वशमें सब जगत् बर्तता है और जिससे मोहित हुआ मनुष्य वासुदेवरूप अपने - आपको नहीं जानता, उस अपनी प्रकृतिको अपने वशमें रखकर केवल अपनी लीलासे ही शरीरवाला - सा जन्म लिया हुआ-सा हो जाता हूँ; अन्य लोगोंकी भाँति वास्तवमें जन्म नहीं लेता ॥ ६ ॥

तत् च जन्म कदा किमर्थं च इति वह जन्म कब और किसलिये होता है? सो उच्यते । कहते हैं—

पृष्ठ 109

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १० ९ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति

ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७ ॥

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः हानिः वर्णा- हे भारत! वर्णाश्रम आदि जिसके लक्षण हैं एवं श्रमादिलक्षणस्य प्राणिनाम् अभ्युदयनिः श्रेयस- प्राणियोंकी उन्नति और परम कल्याणका जो साधन साधनस्य भवति भारत, अभ्युत्थानम् उद्भवः है, उस धर्मकी जब- जब हानि होती है और अधर्मका अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहं | अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है, तब - तब ही मैं मायया ॥ ७ ॥ मायासे अपने स्वरूपको रचता हूँ ॥७ ॥

किमर्थम् - किसलिये? —

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥

परित्राणाय परिरक्षणाय साधूनां सन्मार्गस्थानां सत् - मार्गमें स्थित साधुओंका परित्राण अर्थात् विनाशाय च दुष्कृतां पापकारिणाम् । किं च ( उनकी रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवाले धर्मस्य सम्यक् स्थापनं तदर्थं दुष्टोंका नाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी प्रकार धर्मसंस्थापनार्थाय स्थापना करनेके लिये मैं युग - युगमें अर्थात् प्रत्येक सम्भवामि युगे युगे प्रतियुगम् ॥ ८ ॥ युगमें प्रकट हुआ करता हूँ ॥ ८ ॥

तत्— वह-जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं देहं पुनर्जन्म पुनर्जन्म नैति नैति मामेति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥

जन्म मायारूपम्, कर्म च साधुपरित्राणादि, मेरा मायामय जन्म और साधुरक्षण आदि कर्म दिव्य मे मम दिव्यम् अप्राकृतम् ऐश्वरम् एवं यथोक्तं हैं, अर्थात् अलौकिक हैं- यानी केवल ईश्वरशक्तिसे ही यो वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावत् । होनेवाले हैं । इस प्रकार जो तत्त्वसे यथार्थ जानता है । त्यक्त्वा देहम् इमं पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिं न हे अर्जुन! वह इस शरीरको छोड़कर पुनर्जन्म एति न प्राप्नोति माम् एति आगच्छति स मुच्यते अर्थात् पुनः उत्पत्तिको प्राप्त नहीं होता, ( बल्कि ) मेरे हे अर्जुन॥९ ॥ पास आ जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥

न एष मोक्षमार्ग इदानीं प्रवृत्तः किं तर्हि यह मोक्ष - मार्ग अभी आरम्भ हुआ है, ऐसी बात

पूर्वम् अपि— नहीं, किंतु पहले भी -वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥

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११० * श्रीमद्भगवद्गीता * वीतरागभयक्रोधा रागः च भयं च क्रोधः च वीता विगता येभ्यः ते वीतरागभयक्रोधाः, मन्मया ब्रह्मविद ईश्वराभेददर्शिनः, माम् एव परमेश्वरम् उपाश्रिताः केवलज्ञाननिष्ठा इत्यर्थः । बहवः अनेके ज्ञानतपसा ज्ञानम् एव च परमात्मविषयं तपः तेन ज्ञानतपसा पूताः परां शुद्धिं गताः सन्तो मद्भावम् ईश्वरभावं मोक्षम् आगताः समनुप्राप्ताः । इतरतपोनिरपेक्षज्ञाननिष्ठा इति अस्य लिङ्गं ज्ञानतपसा इति विशेषणम् ॥ १० ॥

जिनके राग, भय और क्रोध - चले गये हैं ऐसे रागादि दोषोंसे रहित, ईश्वरमें तन्मय हुए – ईश्वरसे अपना अभेद समझनेवाले - ब्रह्मवेत्ता और मुझ परमेश्वरके ही आश्रित — केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित ऐसे बहुत - से महापुरुष परमात्मविषयक ज्ञानरूप तपसे परमशुद्धिको प्राप्त होकर मुझ ईश्वरके भावको - मोक्षको प्राप्त हो गये हैं । ‘ ज्ञानतपसा ' यह विशेषण इस बातका द्योतक है कि ज्ञाननिष्ठा अन्य तपोंकी अपेक्षा नहीं रखती ॥ १० ॥

तव तर्हि रागद्वेषौ स्तः येन केभ्यश्चिद् तब क्या आपमें रागद्वेष हैं, जिससे कि आप एव आत्मभावं प्रयच्छसि न सर्वेभ्य इति किसी - किसीको ही आत्मभाव प्रदान करते हैं, सबको उच्यते- नहीं करते! इसपर कहते हैं- — ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः मनुष्याः पार्थ पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥

ये यथा येन प्रकारेण येन प्रयोजनेन यत्फलार्थितया मां प्रपद्यन्ते, तान् तथा एव तत्फलदानेन भजामि अनुगृह्णामि अहम् इति एतत् । तेषां मोक्षं प्रति अनर्थित्वात् । न हि एकस्य मुमुक्षुत्वं फलार्थित्वं च युगपत् सम्भवति । अतो ये फलार्थिनः तान् फलप्रदानेन, ये यथोक्तकारिणः तु अफलार्थिनो मुमुक्षवः च तान् ज्ञानप्रदानेन, ये ज्ञानिनः सन्यासिनो मुमुक्षवः च तान् मोक्षप्रदानेन; तथा आर्तान् आर्तिहरणेन इति एवं यथा प्रपद्यन्ते ये तान् तथा एव भजामि इत्यर्थः । न पुनः रागद्वेषनिमित्तं मोहनिमित्तं वा कञ्चिद भजामि | जो भक्त जिस प्रकारसे - जिस प्रयोजनसे – जिस फलप्राप्तिकी इच्छासे मुझे भजते हैं, उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनकी कामनाके अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ, क्योंकि उन्हें मोक्षकी इच्छा नहीं होती । एक ही पुरुषमें मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व ( फलकी इच्छा करना ) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते । इसलिये जो फलकी इच्छावाले हैं उन्हें फल देकर, जो फलको न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले और मुमुक्षु हैं, उनको ज्ञान देकर, जो ज्ञानी, संन्यासी और मुमुक्षु हैं, उन्हें मोक्ष देकर तथा आर्तोंका दुःख दूर करके, इस प्रकार जो जिस तरहसे मुझे भजते हैं, उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ । राग - द्वेषके कारण या मोहके कारण तो मैं किसीको भी नहीं भजता ।