श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 111–120
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १११ सर्वथा अपि * सर्वावस्थस्य मम ईश्वरस्य हे पार्थ! मनुष्य सब तरहसे बर्तते हुए भी सर्वत्र वर्त्म मार्गम् अनुवर्तन्ते मनुष्याः । यत्फलार्थितया स्थित मुझ ईश्वरके ही मार्गका सब प्रकारसे अनुसरण करते हैं, जो जिस फलकी इच्छासे जिस कर्मके यस्मिन् कर्मणि अधिकृता ये प्रयतन्ते ते मनुष्या अधिकारी बने हुए ( उस कर्मके अनुरूप ) प्रयत्न करते उच्यन्ते हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैः ॥ ११ ॥ हैं, वे ही मनुष्य कहे जाते हैं ॥ ११ ॥
यदि तव ईश्वरस्य रागादिदोषाभावात् सर्वप्राणिषु अनुजिघृक्षायां तुल्यायां सर्वफल -प्रदानसमर्थे च त्वयि सति, वासुदेवः सर्वम् इति ज्ञानेन एव मुमुक्षवः सन्तः कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रतिपद्यन्ते इति शृणु तत्र कारणम्-काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यदि रागादि दोषोंका अभाव होनेके कारण सभी प्राणियोंपर आप ईश्वरकी दया समान है एवं आप सब फल देनेमें समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर - यह सारा विश्व वासुदेवरूप है - इस प्रकारके ज्ञानसे केवल आपको ही क्यों नहीं भजते? इसका कारण सुन–
यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
काङ्क्षन्तः अभीप्सन्तः कर्मणां सिद्धिं फल-निष्पत्तिं प्रार्थयन्तः, यजन्त इह अस्मिन् लोके देवता इन्द्राग्न्याद्याः- -4 अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽह-मस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम् ' ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) इति श्रुतेः । तेषां हि भिन्नदेवतायाजिनां फलाकाङ्क्षिणां क्षिप्रं शीघ्रं हि यस्मात् मानुषे लोके मनुष्यलोके हि शास्त्राधिकारः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके इति विशेषणाद् अन्येषु अपि कर्मफलसिद्धिं दर्शयति भगवान् । मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकार इति विशेष:, तेषां वर्णाश्रमाद्यधिकारिकर्मणां फल-सिद्धिः क्षिप्रं भवति कर्मजा कर्मणो जाता ॥ १२ ॥ |
कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्तिकी कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र, अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं । श्रुतिमें कहा है कि ' जो अन्य देवताकी इस भावसे उपासना करता है कि वह ( देवता ) दूसरा है और मैं ( उपासक ) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता, जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है । ' ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्योंकी इस मनुष्यलोकमें ( कर्मसे उत्पन्न हुई ) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है; क्योंकि मनुष्य-लोकमें शास्त्रका अधिकार है ( यह विशेषता है ) । ' क्षिप्रं हि मानुषे लोके ' इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं । पर मनुष्य - लोकमें वर्ण - आश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, यह विशेषता है । उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है ॥ १२ ॥
* यहाँ‘सर्वथापि ' इस कथनसे भाष्यकारका यह अभिप्राय समझमें आता है कि कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग आदि किसी भी मार्गमेंसे किसी भी देवताविशेषके आश्रित होकर बर्तनेवाले भी भगवान्के मार्गके अनुसार बर्तते हैं ( देखिये, गीता ९ । २३-२४ ) ।
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११२ * श्रीमद्भगवद्गीता * मानुषे एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारो न अन्येषु लोकेषु इति नियम: किन्निमित्त इति । अथवा वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्म अनुवर्तन्ते सर्वश इति उक्तं कस्मात पुनः कारणाद् नियमेन तव एव वर्त्म अनुवर्तन्ते न अन्यस्य इति उच्यते— चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं मनुष्यलोकमें ही वर्णाश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, अन्य लोकोंमें नहीं, यह नियम किस कारणसे है? यह बतानेके लिये ( अगला श्लोक कहते हैं ) अथवा वर्णाश्रम आदि विभागसे युक्त हुए मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं - ऐसा आपने कहा, सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं, दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते? इसपर कहते हैं—
गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
चातुर्वर्ण्यं चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्य मया ईश्वरेण सृष्टम् उत्पादितम्, ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' इत्यादिश्रुतेः, गुणकर्मविभागशो गुणविभागशः कर्मविभागशः च गुणा: सत्त्वरजस्तमांसि । तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो दमः तप इत्यादीनि कर्माणि । सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य क्षत्रियस्य शौर्यतेजः प्रभृतीनि कर्माणि । तमउपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि । रजउपसर्जनतमः प्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषा एव कर्म । इति एवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् इत्यर्थः । तत् च इदं चातुर्वर्ण्यं न अन्येषु लोकेषु अतो मानुषे लोके इति विशेषणम् । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र –इन ) चारों वर्णोंका नाम चातुर्वर्ण्य है । सत्त्व, रज, तम — इन तीनों गुणों के विभागसे तथा कर्मोंके विभागसे यह चारों वर्ण मुझ ईश्वरद्वारा रचे हुए - उत्पन्न किये हुए हैं । ' ब्राह्मण इस पुरुषका मुख हुआ ' इत्यादि श्रुतियोंसे यह प्रमाणित है । उनमेंसे सात्त्विक — सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मणके शम, दम, तप इत्यादि कर्म हैं । जिसमें सत्त्वगुण गौण है और रजोगुण प्रधान है, उस क्षत्रियके शूरवीरता, तेज प्रभृति कर्म हैं । जिसमें तमोगुण गौण और रजोगुण प्रधान है, ऐसे वैश्यके कृषि आदि कर्म हैं । तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है, उस शूद्रका केवल सेवा ही कर्म है । इस प्रकार गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं, यह अभिप्राय है । ऐसी यह चार वर्णोंकी अलग - अलग व्यवस्था दूसरे लोकोंमें नहीं है, इसलिये ( पूर्वश्लोकमें ) ' मानुषे लोके ' यह विशेषण लगाया गया है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * ११३ हन्त तर्हि चातुर्वर्ण्यसर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात् तत्फलेन युज्यसे अतो न त्वं नित्यमुक्तो नित्येश्वर इति उच्यते-यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारम् अपि सन्तं मां परमार्थतो विद्धि अकर्तारम् अत एव अव्ययम् असंसारिणं च मां विद्धि ॥ १३ ॥
यदि चातुर्वर्ण्यकी रचना आदि कर्मके आप कर्ता हैं, तब तो उसके फलसे भी आपका सम्बन्ध होता ही होगा, इसलिये आप नित्यमुक्त और नित्य - ईश्वर भी नहीं हो सकते? इसपर कहा जाता है— यद्यपि मायिक व्यवहारसे मैं उस कर्मका कर्ता हूँ, तो भी वास्तवमें मुझे तू अकर्ता ही जान; तथा इसीलिये मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ ॥ १३ ॥
येषां तु कर्मणां कर्तारं मां मन्यसे, परमार्थतः जिन कर्मोंका तू मुझे कर्ता मानता है, वास्तवमें तेषाम् अकर्ता एव अहं यतः - मैं उनका अकर्ता ही हूँ, क्योंकि—
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥१४ ॥
न मां तानि कर्माणि लिम्पन्ति देहाद्यारम्भ-कत्वेन अहङ्काराभावात् । न च तेषां कर्मणां फलेषु मे स्पृहा तृष्णा । येषां तु संसारिणाम् अहं कर्ता इति अभिमानः, कर्मसु स्पृहा तत्फलेषु च तान् कर्माणि लिम्पन्ति इति युक्तम्, तदभावाद् न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इति एवं यः अन्यः अपि माम् आत्मत्वेन अभिजानाति न अहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा इति, स कर्मभिः न बध्यते । तस्य अपि न देहाद्यारम्भकाणि कर्माणि भवन्ति इत्यर्थः ॥ १४ ॥
मुझमें अहंकारका अभाव है, इसलिये वे कर्म देहादिकी उत्पत्तिके कारण बनकर मुझे लिप्त नहीं करते और उन कर्मोंके फलमें मेरी लालसा अर्थात् तृष्णा भी नहीं है । जिन संसारी मनुष्योंका कर्मोंमें ' मैं कर्ता हूँ ' ऐसा अभिमान रहता है, एवं जिनकी उन कर्मोंमें और उनके फलोंमें लालसा रहती है, उनको कर्म लिप्त करते हैं यह ठीक है, परंतु उन दोनोंका अभाव होनेके कारण वे ( कर्म ) मुझे लिप्त नहीं कर सकते । इस प्रकार जो कोई दूसरा भी मुझे आत्मरूपसे जान लेता है कि ' मैं कर्मोंका कर्ता नहीं हूँ ' ‘ मेरी कर्मफलमें स्पृहा भी नहीं है ' वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता अर्थात् उसके भी कर्म देहादिके उत्पादक नहीं होते ॥ १४ ॥
न अहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा - मैं न तो कर्मोंका कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफलकी चाहना ही है— एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म कर्म पूर्वैरपि पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
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११४ * श्रीमद्भगवद्गीता * एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वः अपि अतिक्रान्तैः मुमुक्षुभिः, कुरु तेन कर्म एव त्वं न तूष्णीम् आसनं न अपि सन्न्यासः कर्तव्यः । तस्मात् त्वं पूर्वैः अपि अनुष्ठितत्वाद् यदि अनात्मज्ञः त्वं तदा आत्मशुद्ध्यर्थं तत्त्ववित् चेद् लोकसङ्ग्रहार्थं पूर्वैः जनकादिभिः पूर्वतरं कृतं न अधुनातनं कृतं निर्वर्तितम् ॥ १५ ॥
ऐसा समझकर ही पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंने भी कर्म किये थे । इसलिये तू भी कर्म ही कर । तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है क्योंकि पूर्वजोंने भी कर्मका आचरण किया है, इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है तब तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रहके लिये जनकादि पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए ( प्रकारसे ही ) कर्म कर, नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर * ॥ १५ ॥
तत्र कर्म चेत् कर्तव्यं त्ववचनाद् एव यदि कर्म ही कर्तव्य है तो मैं आपकी आज्ञासे करोमि अहं किं विशेषितेन पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ही करनेको तैयार हूँ फिर ' पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ' विशेषण देनेकी क्या आवश्यकता है? इसपर कहते इति, उच्यते यस्माद् महद् वैषम्यं कर्मणि, हैं कि कर्मके विषयमें बड़ी भारी विषमता है अर्थात् कथम्— कर्मका विषय बड़ा गहन है । सो किस प्रकार—
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
किं कर्म किं च अकर्म इति कवयो मेधाविनः कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस कर्मादिके अपि अत्र अस्मिन् कर्मादिविषये मोहिता मोहं विषयमें बड़े - बड़े बुद्धिमान् भी मोहित हो चुके हैं, गताः । अतः ते तुभ्यम् अहं कर्म अकर्म च इसलिये मैं तुझे वह कर्म और अकर्म बतलाऊँगा जिस प्रवक्ष्यामि यद् ज्ञात्वा विदित्वा कर्मादि मोक्ष्यसे कर्मादिको जानकर तू अशुभसे यानी संसारसे मुक्त हो अशुभात् संसारात् ॥ १६ ॥ जायगा ॥ १६ ॥
न च एतत् त्वया मन्तव्यम्, कर्म नाम तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादिचेष्टा लोकप्रसिद्धम् अकर्म तदक्रिया देहादिकी चेष्टाका नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहनेका नाम अकर्म है, उसमें जाननेकी तूष्णीम् आसनं किं तत्र बोद्धव्यम् इति । बात ही क्या है? यह तो लोकमें प्रसिद्ध ही है । क्यों कस्मात्, उच्यते— ( ऐसा नहीं समझना चाहिये? ) इसपर कहते हैं— कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं बोद्धव्यं गहना कर्मणो कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
* अर्थात् जिन कर्मोंसे न तो अन्तःकरण ही शुद्ध होता है और न लोकसंग्रह ही होता है, ऐसे आधुनिक ( लौकिक ) मनुष्योंद्वारा किये जानेवाले कर्म मत कर ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * ११५ कर्मणः शास्त्रविहितस्य हि यस्माद् अपि अस्ति बोद्धव्यं बोद्धव्यं च अस्ति एव विकर्मणः प्रतिषिद्धस्य तथा अकर्मणः च तूष्णीम्भावस्य बोद्धव्यम् अस्ति इति त्रिषु अपि अध्याहारः कर्तव्यः । यस्माद् गहना विषमा दुर्ज्ञाना, कर्मण इति उपलक्षणार्थं कर्मादीनां कर्माकर्मविकर्मणां गतिः याथात्म्यं तत्त्वम् इत्यर्थः ॥ १७ ॥
कर्मका— शास्त्रविहित क्रियाका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये, विकर्मका - शास्त्रवर्जित कर्मका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये और अकर्मका अर्थात् चुपचाप बैठ रहनेका भी ( रहस्य ) समझना चाहिये । क्योंकि कर्मोंकी अर्थात् कर्म, अकर्म और विकर्मकी गति- उनका यथार्थ स्वरूप - तत्त्व बड़ा गहन है, समझनेमें बड़ा ही कठिन है ॥ १७ ॥
किं पुनः तत्त्वं कर्मादेः यद् बोद्धव्यं वक्ष्यामि कर्मादिका वह तत्त्व क्या है जो कि जाननेयोग्य है, जिसके लिये आपने यह प्रतिज्ञा की थी कि इति प्रतिज्ञातम् उच्यते- ' कहूँगा ' । इसपर कहते हैं-कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत ॥ १८ ॥
कर्मणि कर्म क्रियते इति व्यापारमात्रं तस्मिन् कर्मणि अकर्म कर्माभावं यः पश्येद् अकर्मणि च कर्माभावे कर्तृतन्त्रत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्त्योः वस्तु अप्राप्य एव हि सर्व एव क्रियाकारकादिव्यवहारः अविद्याभूमौ एव कर्म यः पश्येत् पश्यति । स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् समस्तकर्मकृत् च स इति स्तूयते कर्माकर्मणोः इतरेतरदर्शी । ननु किम् इदं विरुद्धम् उच्यते ‘ कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इति अकर्मणि च कर्म इति । ' न हि कर्म अकर्म स्याद् अकर्म वा कर्म तत्र विरुद्धं कथं पश्येद् द्रष्टा । जो कुछ किया जाय उस चेष्टामात्रका नाम कर्म है । उस कर्ममें जो अकर्म देखता है, अर्थात् कर्मका अभाव देखता है तथा अकर्ममें- शरीरादिकी चेष्टाके अभावमें जो कर्म देखता है । अर्थात् कर्मका करना और न करना दोनों ही कर्ताके अधीन हैं । तथा आत्मतत्त्वकी प्राप्तिसे पूर्व अज्ञानावस्थामें ही सब क्रिया - कारक आदि व्यवहार है, ( इसीलिये कर्मका त्याग भी कर्म ही है * ) इस प्रकार जो अकर्ममें कर्म देखता है । वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है, वह योगी है और वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है, इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवालेकी स्तुति की जाती है । पू ० – ' जो कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है, यह विरुद्ध बात किस भावसे कही जा रही है? ' क्योंकि कर्म तो अकर्म नहीं हो सकता और अकर्म कर्म नहीं हो सकता, तब देखनेवाला विरुद्ध कैसे देखे? * कर्मोंका करना और उनका त्याग करना दोनों ही कर्ताके व्यापाराधीन हैं; जिसमें कर्ताका व्यापार है, वह प्रवृत्ति हो चाहे निवृत्ति, वास्तवमें कर्म ही है; इसलिये अहंकारपूर्वक किया हुआ कर्मत्याग भी वास्तवमें कर्म ही है ।
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११६ * श्रीमद्भगवद्गीता * ननु अकर्म एव परमार्थतः सत् कर्मवद् अवभासते मूढदृष्टेः लोकस्य तथा कर्म एव अकर्मवत् तत्र यथाभूतदर्शनार्थम् आह भगवान् ‘ कर्मणि अकर्म यः पश्येत् ' इत्यादि । अतो न विरुद्धम् । बुद्धिमत्त्वाद्युपपत्तेः च । बोद्धव्यम् । इति च यथा भूतदर्शनम् उच्यते । न च विपरीतज्ञानाद् अशुभाद् मोक्षणं स्यात् ' यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ' इति च उक्तम् । तस्मात् कर्माकर्मणी विपर्ययेण गृहीते प्राणिभिः तद्विपर्ययग्रहणनिवृत्त्यर्थं भगवतो वचनम् ' कर्मणि अकर्म यः ' इत्यादि । न च अत्र कर्माधिकरणम् अकर्म अस्ति कुण्डे बदराणि इव न अपि अकर्माधिकरणं कर्म अस्ति कर्माभावत्वाद् अकर्मणः । अतो विपरीतगृहीते एव कर्माकर्मणी लौकिकैः यथा मृगतृष्णिकायाम् उदकं शुक्तिकायां वा रजतम् । ननु कर्म कर्म एव सर्वेषां न क्वचिद् व्यभिचरति । तद् न, नौस्थस्य नावि गच्छन्त्यां तटस्थेषु अगतिषु नगेषु प्रतिकूलगतिदर्शनाद् दूरेषु चक्षुषा असन्निकृष्टेषु गच्छत्सु गत्यभावदर्शनात् । एवम् इह अपि अकर्मणि अहं करोमि इति कर्मदर्शनं कर्मणि च अकर्मदर्शनं विपरीतदर्शनं येन तन्निराकरणार्थम् उच्यते ' कर्मणि अकर्म यः पश्येत् ' इत्यादि । उ ० — वास्तवमें जो अकर्म है वही मूढमति लोगोंको कर्मके सदृश भास रहा है और उसी तरह कर्म अकर्मके सदृश भास रहा है, उसमें यथार्थ तत्त्व देखनेके लिये भगवान्ने ' कर्मणि अकर्म य: पश्येत् ' इत्यादि वाक्य कहे हैं, इसलिये ( उनका कहना ) विरुद्ध नहीं है; क्योंकि बुद्धिमान् आदि विशेषण भी तभी सम्भव हो सकते हैं । इसके सिवा यथार्थ ज्ञानको ही जाननेयोग्य कहा जा सकता है ( मिथ्या ज्ञानको नहीं ) । तथा ' जिसको जानकर अशुभसे मुक्त हो जायगा । ' यह भी कहा है सो विपरीत ज्ञानद्वारा ( जन्म-मरणरूप ) अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती । सुतरां प्राणियोंने जो कर्म और अकर्मको विपरीतरूपसे समझ रखा है, उस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ही भगवान्के ‘ कर्मण्यकर्म य: ' इत्यादि वचन हैं । यहाँ ' कुण्डेमें बेरोंकी तरह ' कर्मका आधार | अकर्म नहीं है और उसी तरह अकर्मका आधार कर्म भी नहीं है; क्योंकि कर्मके अभावका नाम अकर्म है । इसलिये ( यही सिद्ध हुआ कि ) मृगतृष्णामें जलकी भाँति एवं सीपमें चाँदीकी तरह लोगोंने कर्म और अकर्मको विपरीत मान रखा है । पू ० – कर्मको सब कर्म ही मानते हैं, इसमें कभी फेरफार नहीं होता । उ ० — यह बात नहीं, क्योंकि नाव चलते समय नौकामें बैठे हुए पुरुषको तटके अचल वृक्षोंमें प्रतिकूल गति दीखती है अर्थात् वे वृक्ष उलटे चलते हुए दीखते हैं और जो ( नक्षत्रादि ) पदार्थ नेत्रोंके पास नहीं होते, बहुत दूर होते हैं, उन चलते हुए पदार्थोंमें भी गतिका अभाव दीख पड़ता है अर्थात् वे अचल दीखते हैं । इसी तरह यहाँ भी अकर्ममें ( क्रियारहित आत्मामें ) ‘ मैं करता हूँ ' यह कर्मका देखना और ( त्यागरूप ) कर्ममें ( मैं कुछ नहीं करता इस ) अकर्मका देखना ऐसे विपरीत देखना होता है, अतः उसका निराकरण करनेके लिये ' कर्मणि अकर्म यः पश्येत् ' इत्यादि वचन भगवान् कहते हैं ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * ११७ तद् एतद् उक्तप्रतिवचनम् अपि असकृद् अत्यन्तविपरीतदर्शनभाविततया मोमुह्यमानो लोकः श्रुतम् अपि असकृत् तत्त्वं विस्मृत्य मिथ्याप्रसङ्गम् अवतार्य अवतार्य चोदयति इति पुनः पुनः उत्तरम् आह भगवान् दुर्विज्ञेयत्वं च आलक्ष्य वस्तुनः । ‘ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् ' ' न जायते म्रियते ' इत्यादिना आत्मनि कर्माभावः श्रुतिस्मृति-न्यायप्रसिद्ध उक्तो वक्ष्यमाणः च । तस्मिन् आत्मनि कर्माभावे अकर्मणि कर्मविपरीतदर्शनम् अत्यन्तनिरूढम् । यतः किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । ' देहाद्याश्रयं कर्म आत्मनि अध्यारोप्य अहं कर्ता मम एतत् कर्म मया अस्य फलं भोक्तव्यम् इति च । तथा अहं तूष्णीं भवामि येन अहं निरायासः अकर्मा सुखी स्याम् इति कार्यकरणाश्रय-व्यापारोपरमं तत्कृतं च सुखित्वम् आत्मनि अध्यारोप्य न करोमि किञ्चित् तूष्णीं सुखम् आसम् इति अभिमन्यते लोकः । तत्र इदं लोकस्य विपरीतदर्शनापनयनाय आह भगवान् ' कर्मणि अकर्म य: पश्येत् ' इत्यादि । अत्र च कर्म कर्म एव सत् कार्यकरणाश्रयं कर्मरहिते अविक्रिये आत्मनि सर्वैः अध्यस्तं यतः पण्डितः अपि अहं करोमि इति मन्यते । यद्यपि यह विषय अनेक बार शंका - समाधानोंद्वारा सिद्ध किया जा चुका है तो भी अत्यन्त विपरीत ज्ञानकी भावनासे अत्यन्त मोहित हुए लोग अनेक बार सुने हुए तत्त्वको भी भूलकर मिथ्या प्रसंग ला-लाकर शंका करने लग जाते हैं, इसलिये तथा आत्मतत्त्वको दुर्विज्ञेय समझकर भगवान् पुनः पुनः उत्तर देते हैं । श्रुति, स्मृति और न्यायसिद्ध जो आत्मामें कर्मोंका अभाव है वह ‘ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् ' ' न जायते म्रियते ' इत्यादि श्लोकोंसे कहा जा चुका और आगे भी कहा जायगा । उस क्रियारहित आत्मामें अर्थात् अकर्ममें कर्मका देखनारूप जो विपरीत दर्शन है, यह लोगोंमें अत्यन्त स्वाभाविक - सा हो गया है । क्योंकि ' कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषयमें बुद्धिमान् भी मोहित हैं । ' अर्थात् देह - इन्द्रियादिसे होनेवाले कर्मोंका आत्मामें अध्यारोप करके ' मैं कर्ता हूँ ' मेरा यह कर्म है ' ' मुझे इसका फल भोगना है ' इस प्रकार ( लोग मानते हैं । ) तथा ' मैं चुप होकर बैठता हूँ जिससे कि परिश्रमरहित और कर्मरहित होकर सुखी हो जाऊँ ' इस प्रकार देह - इन्द्रियोंके व्यापारकी उपरामताका और उससे होनेवाले सुखीपनका आत्मामें अध्यारोप करके ' मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ' ' चुपचाप सुखसे बैठा हूँ ' इस प्रकार लोग मानते हैं । लोगोंके इस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ' कर्मणि अकर्म यः पश्येत् ' इत्यादि वचन भगवान्ने कहे हैं । यहाँ देहेन्द्रियादिके आश्रयसे होनेवाला कर्म यद्यपि क्रियारूप है तो भी उसका लोगोंने कर्मरहित अविक्रिय आत्मामें अध्यारोप कर रखा है; क्योंकि शास्त्रज्ञ विद्वान् भी ' मैं करता हूँ ' ऐसा मान बैठता है ।
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११८ * श्रीमद्भगवद्गीता * अत आत्मसमवेततया सर्वलोकप्रसिद्धे कर्मणि नदीकूलस्थेषु इव वृक्षेषु गतिः प्रातिलोम्येन अकर्म कर्माभावं यथाभूतं गत्यभावम् इव वृक्षेषु यः पश्येत्, अकर्मणि च कार्यकरणव्यापारोपरमे कर्मवद् आत्मनि अध्यारोपिते तूष्णीम् अकुर्वन् सुखम् आस इति अहङ्काराभिसन्धिहेतुत्वात् तस्मिन् अकर्मणि च कर्म यः पश्येत् । य एवं कर्माकर्मविभागज्ञः स बुद्धिमान् पण्डितो मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् च सः अशुभाद् मोक्षितः कृतकृत्यो भवति इत्यर्थः । अयं श्लोकः अन्यथा व्याख्यातः कैश्चित्, कथम्, नित्यानां किल कर्मणाम् ईश्वरार्थे अनुष्ठीयमानानां तत्फलाभावाद् अकर्माणि तानि उच्यन्ते गौण्या वृत्त्या । तेषां च अकरणम् अकर्म तत् च प्रत्यवायफलत्वात् कर्म उच्यते गौण्या एव वृत्त्या । तत्र नित्ये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् फला-भावात्, यथा धेनुः अपि गौः अगौः उच्यते क्षीराख्यं फलं न प्रयच्छति इति तद्वत् । तथा नित्याकरणे तु अकर्मणि च कर्म यः पश्येद् नरकादिप्रत्यवायफलं प्रयच्छति इति । न एतद् युक्तं व्याख्यानम् एवं ज्ञानाद् अशुभाद् मोक्षानुपपत्तेः यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् । ' इति भगवता उक्तं वचनं बाध्येत । अतः नदी - तीरस्थ वृक्षोंमें भ्रमसे प्रतिकूल गति प्रतीत होनेकी भाँति अज्ञानसे आत्माके नित्य सम्बन्धी माने जाकर जो लोकमें कर्म नामसे प्रसिद्ध हो रहे हैं, उन कर्मोंमें वस्तुतः नदी - तीरस्थ वृक्षोंमें गतिका अभाव देखनेकी भाँति जो अकर्म देखता है अर्थात् कर्माभाव देखता है, तथा कर्मकी भाँति आत्मामें अज्ञानसे आरोपित किये हुए शरीर, इन्द्रिय आदिकी उपरामतारूप अकर्ममें, अर्थात् क्रियाके त्यागमें भी ' मैं कुछ न करता हुआ चुपचाप सुखपूर्वक बैठा हूँ ' इस अहंकारका सम्बन्ध होनेके कारण जो कर्म देखता है यानी उस त्यागको भी जो कर्म समझता है । इस प्रकार जो कर्म और अकर्मके विभागको ( तत्त्वसे ) जाननेवाला है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान्– पण्डित है, वह युक्त - योगी है और सम्पूर्ण कर्म करनेवाला भी वही है अर्थात् वह पुण्य - पापरूप अशुभसे मुक्त हुआ कृतकृत्य है । कई टीकाकार इस श्लोककी दूसरी तरहसे ही व्याख्या करते हैं । कैसे? ईश्वरके लिये किये जानेवाले जो ( पञ्चमहायज्ञादि ) नित्यकर्म हैं, उनका फल नहीं मिलता इस कारण वे गौणी वृत्तिसे अकर्म कहे जाते हैं? ( इसी प्रकार ) उन नित्यकर्मोंके न करनेका नाम अकर्म है, वह भी पापरूप फलके देनेवाला होनेके कारण गौणरूपसे ही कर्म कहा जाता है । जैसे कोई गौ ब्यायी हुई होनेपर भी यदि दूधरूप फल नहीं देती तो वह अगौ कह दी जाती है, वैसे ही नित्यकर्ममें, उसके फलका अभाव होनेके कारण जो अकर्म देखता है और नित्यकर्मका न करनारूप जो अकर्म है उसमें कर्म देखता है; क्योंकि वह नरकादि विपरीत फल देनेवाला है । यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार जाननेसे अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती अर्थात् जन्म-मरण - बन्धन नहीं टूट सकता । अतः यह अर्थ मान लेनेसे भगवान्के कहे हुए ये वचन कि ' जिसको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा । ' कट जायँगे ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * ११ ९ कथम्, नित्यानाम् अनुष्ठानाद् अशुभात् स्याद् नाम मोक्षणं न तु तेषां फलाभावज्ञानात् । न हि नित्यानां फलाभावज्ञानम् अशुभमुक्तिफलत्वेन चोदितं नित्यकर्मज्ञानं वा । न च भगवता एव इह उक्तम् । एतेन अकर्मणि कर्मदर्शनं प्रत्युक्तम् । न हि अकर्मणि कर्म इति दर्शनं कर्तव्यतया इह चोद्यते, नित्यस्य तु कर्तव्यतामात्रम् । न च अकरणाद् नित्यस्य प्रत्यवायो भवति इति विज्ञानात् किञ्चित् फलं स्यात् । न अपि नित्याकरणं ज्ञेयत्वेन चोदितम् । न अपि कर्म अकर्म इति मिथ्यादर्शनाद् अशुभाद् मोक्षणं बुद्धिमत्त्वं युक्तता कृत्स्नकर्म-कृत्त्वादि च फलम् उपपद्यते स्तुतिः वा । मिथ्याज्ञानम् एव हि साक्षाद् अशुभरूपं कुतः अन्यस्माद् अशुभाद् मोक्षणम्, न हि तमः तमसो निवर्तकं भवति । ननु कर्मणि यद् अकर्मदर्शनम् अकर्मणि वा कर्मदर्शनं न तद् मिथ्याज्ञानं किं तर्हि गौणं फलभावाभावनिमित्तम् । न, कर्माकर्मविज्ञानाद् अपि गौणात् फलस्य अश्रवणात् । न अपि श्रुतहान्यश्रुतपरिकल्पनया कश्चिद विशेषो लभ्यते । क्योंकि नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे तो शायद अशुभसे छुटकारा हो भी जाय, परंतु उन नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, इस ज्ञानसे तो मोक्ष हो ही नहीं सकता । क्योंकि नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, यह ज्ञान या नित्यकर्मोंका ज्ञान अशुभसे मुक्त कर देनेवाला है, ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा और न भगवान्ने ही गीताशास्त्रमें कहीं ऐसा कहा है । इसी युक्तिसे ( उनके बतलाये हुए ) अकर्ममें कर्मदर्शनका भी खण्डन हो जाता है । क्योंकि यहाँ ( गीतामें ) नित्यकर्मोंके अभावरूप अकर्ममें कर्म देखनेको कहीं कर्तव्यरूपसे विधान नहीं किया, केवल नित्यकर्मकी कर्तव्यताका विधान है । इसके सिवा ‘ नित्यकर्म न करनेसे पाप होता है ' ऐसा जान लेनेसे ही कोई फल नहीं हो सकता । और यह नित्यकर्मका न करनारूप अकर्म शास्त्रोंमें कोई जाननेयोग्य विषय भी नहीं बताया गया है । तथा इस प्रकार दूसरे टीकाकारोंके माने हुए ' कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शन ' रूप इस मिथ्यादर्शनसे ' अशुभसे मुक्ति ' ' बुद्धिमत्ता ' ' युक्तता ' ‘ सर्व - कर्मकर्तृत्व ' इत्यादि फल भी सम्भव नहीं और ऐसे मिथ्याज्ञानकी स्तुति भी नहीं बन सकती । जब कि मिथ्याज्ञान स्वयं ही अशुभरूप है, तब वह दूसरे अशुभसे किसीको कैसे मुक्त कर सकेगा? क्योंकि अन्धकार ( कभी ) अन्धकारका नाशक नहीं हो सकता । पू ० - यहाँ जो कर्ममें अकर्म देखना और अकर्ममें कर्म देखना ( उन टीकाकारोंने ) बतलाया है, वह मिथ्याज्ञान नहीं है किंतु फलके होने और न होनेके निमित्तसे गौणरूपसे देखना है । उ ० — यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि गौणरूपसे कर्मको अकर्म और अकर्मको कर्म जान लेनेसे भी कोई लाभ नहीं सुना गया । इसके सिवा श्रुतिसिद्ध बातको छोड़कर श्रुतिविरुद्ध बातकी कल्पना करनेमें कोई विशेषता भी नहीं दिखलायी देती ।
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१२० * श्रीमद्भगवद्गीता * स्वशब्देन अपि शक्यं वक्तुं नित्यकर्मणां फलं न अस्ति अकरणात् च तेषां नरकपातः स्याद् इति । तत्र व्याजेन परव्यामोहरूपेण कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इत्यादिना किम् । तत्र एवं व्याचक्षाणेन भगवता उक्तं वाक्यं लोकव्यामोहार्थम् इति व्यक्तं कल्पितं स्यात् । न च एतत् छद्मरूपेण वाक्येन रक्षणीयं वस्तु, न अपि शब्दान्तरेण पुनः पुनः उच्यमानं सुबोध स्याद् इत्येवं वक्तुं युक्तम् । ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' इति अत्र हि स्फुटतर उक्तः अर्थो न पुनः वक्तव्यो भवति । सर्वत्र च प्रशस्तं बोद्धव्यं च कर्तव्यम् एव न निष्प्रयोजनं बोद्धव्यम् इति उच्यते । न च मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं भवति तत्प्रत्युपस्थापितं वा वस्त्वाभासम् । न अपि नित्यानाम् अकरणाद् अभावात् प्रत्यवायभावोत्पत्ति: ‘ नासतो विद्यते भाव: ' ' इति वचनात् । ‘ कथमसतः सज्जायेत ' ( छा ० उ ० ६ । २ । २ ) इति च दर्शितम् । असतः सज्जन्मप्रतिषेधाद् असतः सदुत्पत्तिं ब्रुवता असद् एव सद् भवेत् सत् च असद् भवेद् इति उक्तं स्यात् । तत् च अयुक्तं सर्वप्रमाणविरोधात् । ( भगवान्को यदि यही अभीष्ट होता तो वे ) उसी प्रकारके शब्दोंसे भी स्पष्ट कह सकते थे कि ' नित्य-कर्मोंका कोई फल नहीं है और उनके न करनेसे नरक-प्राप्ति होती है । ' फिर इस प्रकार ' कर्ममें जो अकर्म देखता है ' इत्यादि दूसरोंको मोहित करनेवाले मायायुक्त वचन कहनेसे क्या प्रयोजन था । इस प्रकार उपर्युक्त अर्थ करनेवालोंका तो स्पष्ट ही यह मानना हुआ कि ' भगवान्द्वारा कहे हुए वचन संसारको मोहित करनेके लिये हैं । ' इसके सिवा न तो यह कहना ही उचित है कि यह नित्यकर्म - अनुष्ठानरूप विषय मायायुक्त वचनोंसे गुप्त रखनेयोग्य है और न यही कहना ठीक है कि ( यह विषय बड़ा गहन है इसलिये ) बारंबार दूसरे-दूसरे शब्दोंद्वारा कहनेसे सुबोध होगा । क्योंकि ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' इस श्लोकमें स्पष्ट कहे हुए अर्थको फिर कहनेकी आवश्यकता नहीं होती । तथा सभी जगह जो बात करनेयोग्य होती है, वही प्रशंसनीय और जाननेयोग्य बतलायी जाती है I । निरर्थक बातको ' जाननेयोग्य है ' ऐसा नहीं कहा जाता । मिथ्याज्ञान या उसके द्वारा स्थापित की हुई आभासमात्र वस्तु जाननेयोग्य नहीं हो सकती । इसके सिवा नित्यकर्मोंके न करनेरूप अभावसे प्रत्यवायरूप भावकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकती । क्योंकि ‘ नासतो विद्यते भाव: ' इत्यादि भगवान्के वाक्य हैं तथा ' असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? ' इत्यादि श्रुतिवाक्य भी पहले दिखलाये जा चुके हैं । इस प्रकार असत्से सत्की उत्पत्तिका निषेध कर दिया जानेपर भी जो असत्से सत्की उत्पत्ति बतलाते हैं, उनका तो यह कहना हुआ कि असत् तो सत् होता है और सत् असत् होता है, परंतु यह सब प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण अयुक्त है ।