श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 21–30
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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* शांकरभाष्य अध्याय १ * २१
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
गाण्डीव धनुष हाथसे खिसक रहा है, त्वचा बहुत जलती है, साथ ही मेरा मन भ्रमित - सा हो रहा है, ( अधिक क्या ) मैं खड़ा रहनेमें भी समर्थ निमित्तानि च पश्यामि न च श्रेयोऽनुपश्यामि हे केशव! इसके सिवा और भी सब लक्षण करके मैं कल्याण नहीं देखता ॥ ३१ ॥
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण किं नो राज्येन गोविन्द हे कृष्ण! मैं न विजय ही चाहता हूँ और भोगोंसे या जीवित रहनेसे क्या प्रयोजन है! ॥ नहीं हूँ ॥ ३० ॥
विपरीतानि केशव ।
हत्वा स्वजनमाहवे ॥
मुझे विपरीत ही दिखायी देते हैं न च राज्यं सुखानि किं भोगैर्जीवितेन न राज्य या सुख ही चाहता हूँ ३२ ॥ येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि ३१ ॥ , युद्धमें अपने कुलको नष्ट
च ।
वा ॥ ३२ ॥
। हे गोविन्द! हमें राज्यसे,
च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥
हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुख आदि इष्ट हैं, वे ये हमारे गुरु, ताऊ, चाचा, लड़के, दादा, मामा, ससुर, पोते, साले और अन्य कुटुम्बी लोग धन और प्राणोंको त्यागकर युद्धमें
एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
हे मधुसूदन! मुझपर वार करते हुए भी इन सम्बन्धियोंको त्रिलोकीका राज्य नहीं चाहता, फिर जरा - सी पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ ३५ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥
हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्र - पुत्रोंको मारनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? प्रत्युत इन पाप ही लगेगा ॥ ३६ ॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
खड़े हैं ॥ ३३-३४ ॥
३५ ॥
पानेके लिये भी मैं मारना ३६ ॥ आततायियोंको मारनेसे हमें स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७ ॥
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२२ * श्रीमद्भगवद्गीता * इसलिये हे माधव! अपने कुटुम्बी धृतराष्ट्र - पुत्रोंको मारना हमें उचित नहीं है, क्योंकि अपने कुटुम्बको नष्ट करके हम कैसे सुखी होंगे? ॥ ३७ ॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
यद्यपि लोभके कारण जिनका चित्त भ्रष्ट हो चुका है, ऐसे ये कौरव कुलक्षयजनित दोषको और मित्रोंके साथ वैर करनेमें होनेवाले पापको नहीं देख रहे हैं ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
तो भी हे जनार्दन! कुलनाशजन्य दोषको भली प्रकार जाननेवाले हमलोगोंको क्यों नहीं खोजना चाहिये?॥ ३ ९ ॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥
( यह तो सिद्ध ही है कि ) कुलका नाश होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो होनेसे सारे कुलको सब ओरसे पाप दबा लेता है ॥ ४० ॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥
३ ९ ॥
इस पापसे बचनेका उपाय ४० ॥ जाते हैं और धर्मका नाश ४१ ॥ हे कृष्ण! इस तरह पापसे घिर जानेपर उस कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, हे वार्ष्णेय! स्त्रियोंके दूषित होनेपर उस कुलमें वर्णसंकरता आ जाती है ॥ ४१ ॥
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥
वह वर्णसंकरता उन कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेका कारण बनती है, क्योंकि उनके पितरलोग पिण्डक्रिया और जलक्रिया नष्ट हो जानेके कारण अपने स्थानसे पतित हो जाते हैं ॥ ४२ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
( इस प्रकार ) वर्णसंकरताको उत्पन्न करनेवाले उपर्युक्त दोषोंसे उन कुलघातियोंके सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय १ * २३ हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो चुके हैं, ऐसे मनुष्योंका निस्सन्देह नरकमें वास होता है, ऐसा हमने सुना है ॥ ४४ ॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
अहो! शोक है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय कर बैठे हैं, जो अपने कुटुम्बका नाश करनेके लिये तैयार हो गये हैं ॥४५ ॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥
यदि मुझ शस्त्ररहित और सामना न करनेवालेको ये शस्त्रधारी धृतराष्ट्रपुत्र मार डालें तो वह मेरे लिये बहुत ही अच्छा हो ॥ ४६ ॥
सञ्जय उवाच-एवमुक्त्वार्जुनःसङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
४५ ॥
कि इस राज्यसुखके लोभसे ४६ ॥ ( दुर्योधन आदि ) रणभूमिमें विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥। ४७ ॥ संजय बोले — उस रणभूमिमें वह अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणोंसहित धनुषको छोड़ शोकाकुल चित्त हो रथके ऊपर ( पहले सैन्य देखनेके लिये जहाँ खड़ा हुआ था वहीं ) बैठ गया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्रयां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूप-निषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषाद-योगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
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द्वितीयोऽध्यायः सञ्जय उवाच-तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
संजय बोले- इस तरह आँसूभरे कातर नेत्रोंसे युक्त करुणासे घिरे हुए उस शोकातुर अर्जुनसे भगवान् मधुसूदन यह वचन कहने लगे ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच-कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२ ॥
श्रीभगवान्ने कहा – हे अर्जुन! तुझे यह श्रेष्ठ पुरुषोंसे असेवित, स्वर्गका विरोधी और अपकीर्ति करनेवाला मोह इस रणक्षेत्रमें क्यों हुआ? ॥२ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
हे पार्थ! कायरता मत ला, यह तुझमें शोभा नहीं पाती, हे शत्रुतापन! हृदयकी क्षुद्र दुर्बलताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा हो ॥ ३ ॥
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥
अर्जुनने कहा — हे मधुसूदन! रणभूमिमें पितामह भीष्म और गुरु द्रोणके साथ युद्ध कर सकूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजाके पात्र हैं ॥ ४ ॥
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह ४ ॥ मैं किस प्रकार बाणोंसे
लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥
ऐसे महानुभाव पूज्योंको न मारकर इस जगत् में भीख माँगकर खाना भी अच्छा है, क्योंकि इन गुरुजनोंको मारकर इस संसारमें रुधिरसे सने हुए अर्थ और कामरूप भोगोंको ही तो भोगूँगा अर्थात् उनको मारनेसे भी केवल भोग ही तो मिलेंगे ॥ ५ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय २ * २५
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
हम यह नहीं जानते कि हमारे लिये क्या करना अच्छा है, ( पता नहीं इस युद्ध में ) हम जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे । ( अहो! ) जिनको मारकर हम जीवित रहना भी नहीं चाहते वे ही धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे सामने खड़े हैं ॥ ६ ॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
कायरतारूप दोषसे नष्ट हुए स्वभाववाला और धर्मका निर्णय करनेमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, जो निश्चित की हुई हितकर बात हो वह मुझे बतलाइये । मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरणमें आये हुए मुझ दासको उपदेश दीजिये ॥ ७ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥
क्योंकि पृथ्वीमें निष्कण्टक धन - धान्यसम्पन्न राज्यको या देवताओंके स्वामित्वको पाकर भी मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ जो मेरी इन्द्रियोंके सुखानेवाले शोकको दूर कर सके ॥ ८ ॥
सञ्जय उवाच-एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
संजय बोले – हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र! निद्राविजयी अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कह चुकनेके बाद साफ - साफ यह बात कहकर कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, चुप हो गये ॥ ९ ॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥
हे भारत! इस तरह दोनों सेनाओंके बीचमें शोक करते हुए उस अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर यह वचन कहने लगे ॥ १० ॥
अत्र च — ‘ दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् ' इत्यारभ्य ‘ न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ' इति एतदन्तः प्राणिनां शोकमोहादिसंसारबीज-भूतदोषोद्भवकारणप्रदर्शनार्थत्वेन व्याख्येयो ग्रन्थः । यहाँ ' दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् ' इस श्लोकसे लेकर ' न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ' इस श्लोकतकके ग्रन्थकी व्याख्या यों कर लेनी चाहिये कि यह प्रकरण प्राणियोंके शोक, मोह आदि जो संसारके बीजभूत दोष हैं, उनकी उत्पत्तिका कारण दिखलानेके लिये है ।
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२६ * श्रीमद्भगवद्गीता * तथा हि अर्जुनेन राज्यगुरुपुत्रमित्रसुहृत्स्व-जनसम्बन्धिबान्धवेषु ' अहम् एषां मम एते ' इति एवं भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्तस्नेहविच्छेदादिनिमित्तौ आत्मनः शोकमोहौ प्रदर्शितौ ' कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये ' इत्यादिना । शोकमोहाभ्यां हि अभिभूतविवेकविज्ञानः स्वत एव क्षात्रधर्मे युद्धे प्रवृत्तः अपि तस्माद् युद्धाद् उपरराम । परधर्मं च भिक्षाजीवनादिकं कर्तुं प्रववृते । तथा च सर्वप्राणिनां शोकमोहादिदोषा-विष्टचेतसां स्वभावत एव स्वधर्मपरित्यागः प्रतिषिद्धसेवा च स्यात् । स्वधर्मे प्रवृत्तानाम् अपि तेषां वाड्मन: -कायादीनां प्रवृत्तिः फलाभिसन्धिपूर्विका एव साहङ्कारा च भवति । तत्र एवं सति धर्माधर्मोपचयाद् इष्टानिष्ट-जन्मसुखदुःखसम्प्राप्तिलक्षणः संसारः अनुपरतो भवति, इत्यतः संसारबीजभूतौ शोकमोहौ । तयोः च सर्वकर्मसन्यासपूर्वकाद् आत्मज्ञानाद् न अन्यतो निवृत्तिः इति, तदुपदिदिक्षुः सर्वलोकानुग्रहार्थम् अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् वासुदेवः – ‘ अशोच्यान् ' इत्यादि । तत्र केचिद् आहुः, सर्वकर्मसन्यासपूर्वकाद् आत्मज्ञाननिष्ठामात्राद् एव केवलात् कैवल्यं न प्राप्यते एव किं तर्हि अग्निहोत्रादिश्रौत-स्मार्तकर्मसहिताद् ज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इति सर्वासु गीतासु निश्चितः अर्थ इति । क्योंकि ' कथं भीष्ममहं सख्ये ' इत्यादि श्लोकोंद्वारा अर्जुनने इसी तरह राज्य, गुरुपुत्र, मित्र, सुहृद्, स्वजन, सम्बन्धी और बान्धवोंके विषयमें ' यह मेरे हैं, मैं इनका हूँ ' इस प्रकार अज्ञानजनित स्नेह - विच्छेद आदि कारणोंसे होनेवाले अपने शोक और मोह दिखाये हैं । यद्यपि ( वह अर्जुन ) स्वयं ही पहले क्षात्रधर्मरूप युद्धमें प्रवृत्त हुआ था तो भी शोक - मोहके द्वारा विवेक - विज्ञानके दब जानेपर ( वह ) उस युद्धसे रुक गया और भिक्षाद्वारा जीवन - निर्वाह करना आदि दूसरोंके धर्मका आचरण करनेके लिये प्रवृत्त हो गया । इसी तरह शोक- मोह आदि दोषोंसे जिनका चित्त घिरा हुआ हो, ऐसे सभी प्राणियोंसे स्वधर्मका त्याग और निषिद्ध धर्मका सेवन स्वाभाविक ही होता है । यदि वे स्वधर्मपालनमें लगे हुए हों तो भी उनके मन, वाणी और शरीरादिकी प्रवृत्ति फलाकांक्षापूर्वक और अहंकारसहित ही होती है । ऐसा होनेसे पुण्य - पाप दोनों बढ़ते रहनेके कारण अच्छे - बुरे जन्म और सुख - दुःखोंकी प्राप्तिरूप संसार निवृत्त नहीं हो पाता, अत: शोक और मोह यह दोनों संसारके बीजरूप हैं । इन दोनोंकी निवृत्ति सर्व - कर्म - संन्यासपूर्वक आत्मज्ञानके अतिरिक्त अन्य उपायसे नहीं हो सकती । अतः उसका ( आत्मज्ञानका ) उपदेश करनेकी इच्छावाले भगवान् वासुदेव सब लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये अर्जुनको निमित्त बनाकर कहने लगे ' अशोच्यान् ' इत्यादि । इसपर कितने ही टीकाकार कहते हैं कि केवल सर्व - कर्म - संन्यासपूर्वक आत्मज्ञान - निष्ठामात्रसे ही कैवल्यकी ( मोक्षकी ) प्राप्ति नहीं हो सकती, किंतु अग्निहोत्रादि श्रौत - स्मार्त - कर्मोंसहित ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है, यही सारी गीताका निश्चित अभिप्राय है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय २ * २७ ज्ञापकं च आहुः अस्य अर्थस्य – ' अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न न करिष्यसि ' ‘ कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ‘ कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् ' इत्यादि । हिंसादियुक्तत्वाद् वैदिकं कर्म अधर्माय इति इयम् अपि आशङ्का न कार्या, कथम्, क्षात्रं कर्म युद्धलक्षणं गुरुभ्रातृपुत्रादिहिंसालक्षणम् अत्यन्तक्रूरम् अपि स्वधर्मः इति कृत्वा न अधर्माय, तदकरणे च ' ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ' इति ब्रुवता याव -ज्जीवादिश्रुतिचोदितानां पश्वादिहिंसालक्षणानां च कर्मणां प्राग् एव न अधर्मत्वम् इति सुनिश्चितम् उक्तं भवति इति । तद् असत्, ज्ञानकर्मनिष्ठयोः विभागवचनाद् बुद्धिद्वयाश्रययोः । ' अशोच्यान् ' इत्यादिना भगवता यावत् ‘ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य ' इति एतदन्तेन ग्रन्थेन यत् परमार्थात्मतत्त्वनिरूपणं कृतं तत् साङ्ख्यम्, तद्विषया बुद्धिः आत्मनो जन्मादिषड्विक्रिया-भावाद् अकर्ता आत्मा इति प्रकरणार्थनिरूपणाद् या जायते सा साङ्ख्यबुद्धिः, सा येषां ज्ञानिनाम् उचिता भवति ते साङ्ख्याः । एतस्या बुद्धेः जन्मनः प्राग् आत्मनो देहादि-व्यतिरिक्तत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यपेक्षो धर्माधर्म -विवेकपूर्वको मोक्षसाधनानुष्ठाननिरूपणलक्षणो योग:, तद्विषया बुद्धिः योगबुद्धिः, सा येषां कर्मिणाम् उचिता भवति ते योगिनः । इस अर्थमें वे प्रमाण भी बतलाते हैं, जैसे-' अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ' ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ' कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् ' इत्यादि । ( वे यह भी कहते हैं कि ) हिंसा आदिसे युक्त होनेके कारण वैदिक कर्म अधर्मका कारण है, ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि गुरु, भ्राता और पुत्रादिकी हिंसा ही जिसका स्वरूप है ऐसा अत्यन्त क्रूर युद्धरूप क्षात्रकर्म भी स्वधर्म माना जानेके कारण अधर्मका हेतु नहीं है, ऐसा कहनेवाले तथा उसके न करनेमें ' ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ' इस प्रकार दोष बतलानेवाले भगवान्का यह कथन तो पहले ही सुनिश्चित हो जाता है कि ' जीवनपर्यन्त कर्म करें ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंद्वारा वर्णित पशु आदिकी हिंसारूप कर्मोंको करना अधर्म नहीं है । परंतु वह ( उन लोगों का कहना ) ठीक नहीं है; क्योंकि भिन्न - भिन्न दो बुद्धियोंके आश्रित रहनेवाली ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अलग - अलग वर्णन है । ' अशोच्यान् ' इस श्लोकसे लेकर ' स्वधर्ममपि चावेक्ष्य ' इस श्लोकके पहलेके प्रकरणसे भगवान्ने जिस परमार्थ- आत्मतत्त्वका निरूपण किया है वह सांख्य है, तद्विषयक जो बुद्धि है अर्थात् आत्मामें जन्मादि छहों विकारोंका अभाव होनेके कारण आत्मा अकर्ता है, इस प्रकारका जो निश्चय उक्त प्रकरणके अर्थका विवेचन करनेसे उत्पन्न होता है, वह सांख्यबुद्धि है, वह जिन ज्ञानियोंके लिये उचित होती है ( जो उसके अधिकारी हैं ) वे सांख्ययोगी हैं । इस ( उपर्युक्त ) बुद्धिके उत्पन्न होनेसे पहले-पहले, आत्माका देहादिसे पृथक्पन, कर्तापन और भोक्तापन माननेकी अपेक्षा रखनेवाला, जो धर्म-अधर्मके विवेकसे युक्त मार्ग है, मोक्षसाधनोंका अनुष्ठान करनेके लिये चेष्टा करना ही जिसका स्वरूप है, उसका नाम योग है और तद्विषयक जो बुद्धि है, वह योग - बुद्धि है, वह जिन कर्मियोंके लिये उचित होती है ( जो उसके अधिकारी हैं ) वे योगी हैं ।
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२८ * श्रीमद्भगवद्गीता * तथा च भगवता विभक्ते द्वे बुद्धी निर्दिष्टे-' एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ' इति । तयोः च साङ्ख्यबुद्ध्याश्रयां ज्ञानयोगेन निष्ठां साङ्ख्यानां विभक्तां वक्ष्यति – ' पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता ' इति । तथा च योगबुद्ध्याश्रयां कर्मयोगेन निष्ठां विभक्तां वक्ष्यति— ' कर्मयोगेन योगिनाम् ' इति । एवं साङ्ख्यबुद्धिं योगबुद्धिं च आश्रित्य द्वे निष्ठे विभक्ते भगवता एव उक्ते ज्ञानकर्मणोः कर्तृत्वाकर्तृत्वैकत्वानेकत्वबुद्ध्याश्रययोः एक-पुरुषाश्रयत्वासम्भवं पश्यता । यथा एतद् विभागवचनं तथैव दर्शितं शातपथीये ब्राह्मणे— ' एतमेव प्रव्राजिनो लोक-मिच्छन्तो ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ( बृ ० ४। ४। २२ ) इति । सर्वकर्मसन्यासं विधाय तच्छेषेण— –'किं ' किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक: ' ( बृ ० ४। ४। २२ ) इति । तत्र एव च — ‘ प्राग्दारपरिग्रहात्पुरुष आत्मा प्राकृतो धर्मजिज्ञासोत्तरकालं लोकत्रयसाधनं पुत्रं द्विप्रकारं च वित्तं मानुषं दैवं च तत्र मानुषं वित्तं कर्मरूपं पितृलोकप्राप्तिसाधनं विद्यां च दैवं वित्तं देवलोकप्राप्तिसाधनं सोऽकामयत ' ( बृ ० १। ४। १७ ) । इति अविद्याकामवत एव सर्वाणि कर्माणि श्रौतादीनि दर्शितानि । इसी प्रकार भगवान्ने ' एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ' इस श्लोकसे अलग - अलग दो बुद्धियाँ दिखलायी हैं । उन दोनों बुद्धियोंमेंसे सांख्यबुद्धिके आश्रित रहनेवाली सांख्ययोगियोंकी ज्ञानयोगसे ( होनेवाली ) निष्ठाको ' पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता ' इत्यादि वचनोंसे अलग कहेंगे । तथा योगबुद्धिके आश्रित रहनेवाली कर्मयोगसे ( होनेवाली ) निष्ठाको ' कर्मयोगेन योगिनाम् ' इत्यादि वचनोंसे अलग कहेंगे । कर्तापन - अकर्तापन और एकता - अनेकता - जैसी भिन्न - भिन्न बुद्धिके आश्रित रहनेवाले जो ज्ञान और कर्म हैं, उन दोनोंका एक पुरुषमें होना असम्भव माननेवाले भगवान्ने ही स्वयं उपर्युक्त प्रकारसे सांख्यबुद्धि और योगबुद्धिका आश्रय लेकर अलग-अलग दो निष्ठाएँ कही हैं । जिस प्रकार ( गीताशास्त्रमें ) इन दोनों निष्ठाओंका अलग - अलग वर्णन है, वैसे ही शतपथ ब्राह्मणमें भी दिखलाया गया है । ( वहाँ ) ' इस आत्मलोकको ही चाहनेवाले वैराग्यशील ब्राह्मण संन्यास लेते हैं ' इस प्रकार सर्व - कर्म - संन्यासका विधान करके उसी वाक्यके शेष वाक्यसे कहा है कि ' जिन हमलोगोंका यह आत्मा ही लोक है ( वे हम ) सन्ततिसे क्या ( सिद्ध ) करेंगे । ' वहीं यह भी कहा है कि ' प्राकृत आत्मा अर्थात् अज्ञानी मनुष्य धर्मजिज्ञासाके बाद और विवाहसे पहले तीनों लोकोंकी प्राप्तिके साधनरूप पुत्रकी तथा दैव और मानुष - ऐसे दो प्रकारके धनकी इच्छा करने लगा । इनमें पितृलोककी प्राप्तिका साधनरूप ' कर्म ' तो मानुषधन है और देवलोककी प्राप्तिका साधनरूप ' विद्या ' देवधन है । ' इस तरह ( उपर्युक्त श्रुतिमें ) अविद्या और कामनावाले पुरुषके लिये ही श्रौतादि सम्पूर्ण कर्म बताये गये हैं ।
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* शांकरभाष्य अध्याय २ * २ ९ ' तेभ्यो व्युत्थाय प्रव्रजन्ति ' ( बृ ० ४। ४। २२ ) इति व्युत्थानम् आत्मानम् एव लोकम् इच्छतः अकामस्य विहितम् । तद् एतद् विभागवचनम् अनुपपन्नं स्याद् यदि श्रौतकर्मज्ञानयोः समुच्चयः अभिप्रेतः स्याद् भगवतः । न च अर्जुनस्य प्रश्न उपपन्नो भवति । ' ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ' इत्यादिः । एकपुरुषानुष्ठेयत्वासम्भवं बुद्धिकर्मणोः भगवता पूर्वम् अनुक्तं कथम् अर्जुनः अश्रुतं बुद्धेः च कर्मणो ज्यायस्त्वं भगवति अध्यारोपयेद् मृषा एव ‘ ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः ' इति । किं च यदि बुद्धिकर्मणोः सर्वेषां समुच्चय उक्तः स्याद् अर्जुनस्य अपि स उक्त एव इति ‘ यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ' इति कथम् उभयोः उपदेशे सति अन्यतरविषयः एव प्रश्नः स्यात् । न हि पित्तप्रशमनार्थिनो वैद्येन मधुरं शीतं च भोक्तव्यम् इति उपदिष्टे तयोः अन्यतरत् पित्तप्रशमनकारणं ब्रूहि इति प्रश्नः सम्भवति । अथ अर्जुनस्य भगवदुक्तवचनार्थविवेका-नवधारणनिमित्तः प्रश्नः कल्पयेत्, तथापि भगवता प्रश्नानुरूपं प्रतिवचनं देयम्, मया बुद्धिकर्मणोः समुच्चय उक्तः किमर्थम् इत्थं त्वं भ्रान्तः असि इति । न तु पुनः प्रतिवचनम् अननुरूपं पृष्टाद् अन्यद् एव द्वे निष्ठे मया पुरा प्रोक्ते इति वक्तुं युक्तम् । ' उन सब ( कर्मों ) - से निवृत्त होकर संन्यास ग्रहण करते हैं ' इस कथनसे केवल आत्मलोकको चाहनेवाले निष्कामी पुरुषके लिये संन्यासका ही विधान किया है । यदि ( इसपर भी यह बात मानी जायगी कि ) भगवान्को श्रौतकर्म और ज्ञानका समुच्चय इष्ट है तो यह उपर्युक्त विभक्त विवेचन अयोग्य ठहरेगा । तथा ( ऐसा मान लेनेसे ) ' ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ' इत्यादि जो अर्जुनका प्रश्न है वह भी नहीं बन सकता । यदि ज्ञान और कर्मका एक पुरुषद्वारा एक साथ किया जाना असम्भव और कर्मकी अपेक्षा ज्ञानका श्रेष्ठत्व भगवान्ने पहले न कहा होता, तो इस तरह अर्जुन बिना सुनी हुई बातका झूठे ही भगवान्में अध्यारोप कैसे करता कि ' ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धि: ' । यदि सभीके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय कहा होता तो अर्जुनके लिये भी वह कहा ही गया था, फिर दोनोंका समुचित उपदेश होते हुए ' यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ' इस प्रकार दोनोंमेंसे एकके ही सम्बन्धमें प्रश्न कैसे होता? क्योंकि पित्तकी शान्ति चाहनेवालेको वैद्यके द्वारा यह उपदेश दिया जानेपर कि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करना चाहिये, रोगीका यह प्रश्न नहीं बन सकता कि उन दोनोंमेंसे किसी एकको ही पित्तकी शान्तिका उपाय बतलाइये । यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भगवान्द्वारा कहे हुए वचन न समझनेके कारण अर्जुनने प्रश्न किया है, तो फिर भगवान्को प्रश्नके अनुरूप ही यह उत्तर देना चाहिये था कि मैंने तो ज्ञान और कर्मका समुच्चय बतलाया है, तू ऐसा भ्रान्त क्यों हो रहा है? परंतु प्रश्नसे विपरीत दूसरा ही उत्तर देना कि मैंने दो निष्ठाएँ पहले कही हैं ( उपर्युक्त कल्पनाके ) उपयुक्त नहीं है ।
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३० * श्रीमद्भगवद्गीता * न अपि स्मार्तेन एव कर्मणा बुद्धेः समुच्चये अभिप्रेते विभागवचनादि सर्वम् उपपन्नम् । किं च क्षत्रियस्य युद्धं स्मार्तं कर्म स्वधर्म इति जानतः ‘ तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि ' इति उपालम्भः अनुपपन्नः । तस्माद् गीताशास्त्रे ईषन्मात्रेण अपि श्रौतेन स्मार्तेन वा कर्मणा आत्मज्ञानस्य समुच्चयो न केनचिद् दर्शयितुं शक्यः । यस्य तु अज्ञानाद् रागादिदोषतो वा कर्मणि प्रवृत्तस्य यज्ञेन दानेन तपसा वा विशुद्धसत्त्वस्य ज्ञानम् उत्पन्नं परमार्थतत्त्वविषयम् एकम् एव इदं सर्वं ब्रह्म अकर्तृ च इति । तस्य कर्मणि कर्मप्रयोजने च निवृत्ते अपि लोकसङ्ग्रहार्थं यत्नपूर्वं यथा प्रवृत्तः तथा एव कर्मणि प्रवृत्तस्य यत् प्रवृत्तिरूपं दृश्यते न तत् कर्म येन बुद्धेः समुच्चयः स्यात् । यथा भगवतो वासुदेवस्य क्षात्रकर्मचेष्टितं न ज्ञानेन समुच्चीयते पुरुषार्थसिद्धये तद्वत् फलाभिसन्ध्यहङ्काराभावस्य तुल्यत्वाद् विदुषः । तत्त्ववित् तु न अहं करोमि इति मन्यते न च तत्फलम् अभिसन्धत्ते । यथा च स्वर्गादिकामार्थिनः अग्निहोत्रादि-कामसाधनानुष्ठानाय आहिताग्नेः काम्ये एव अग्निहोत्रादौ प्रवृत्तस्य सामिकृते विनष्टे अपि कामे तद् एव अग्निहोत्रादि अनुतिष्ठतः अपि न तत्काम्यम् अग्निहोत्रादि भवति । इसके सिवा यदि केवल स्मार्त - कर्मके साथ ही ज्ञानका समुच्चय माना जाय तो भी विभक्त वर्णन आदि सब उपयुक्त नहीं ठहरते । तथा ऐसा माननेसे युद्धरूप स्मार्त - कर्म क्षत्रियका स्वधर्म है, यह जाननेवाले अर्जुनका इस प्रकार उलाहना देना भी नहीं बन सकता कि ' तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि । सुतरां यह सिद्ध हुआ कि गीताशास्त्रमें किञ्चिन्मात्र भी श्रौत या स्मार्त किसी भी कर्मके साथ आत्मज्ञानका समुच्चय कोई भी नहीं दिखा सकता । अज्ञानसे या आसक्ति आदि दोषोंसे कर्ममें लगे हुए जिस पुरुषको यज्ञसे, दानसे या तपसे अन्तः करण शुद्ध होकर परमार्थ - तत्त्वविषयक ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि यह सब एक ब्रह्म ही है और वह अकर्ता है । उसके कर्ममें कर्म और फल दोनों ही यद्यपि निवृत्त हो चुकते हैं तो भी लोकसंग्रहके लिये पहलेकी भाँति यत्नपूर्वक कर्मोंमें लगे रहनेवाले पुरुषका जो प्रवृत्ति– रूप कर्म दिखलायी देता है, वह वास्तवमें कर्म नहीं है, जिससे कि ज्ञानके साथ उसका समुच्चय हो सके । जैसे भगवान् वासुदेवद्वारा किये हुए क्षात्रकमका मोक्षकी सिद्धिके लिये ज्ञानके साथ समुच्चय नहीं होता वैसे ही फलेच्छा और अहंकारके अभावकी समानता होनेके कारण ज्ञानीके कर्मोंका भी ( ज्ञानके साथ समुच्चय नहीं होता ) । क्योंकि आत्मज्ञानी न तो ऐसा ही मानता है कि मैं करता हूँ और न उन कर्मोंका फल ही चाहता है । इसके सिवा जैसे काम - साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान करनेके लिये सकाम अग्निहोत्रादिमें लगे हुए स्वर्गादिकी कामनावाले अग्निहोत्रीकी कामना यदि आधा कर्म कर चुकनेपर नष्ट हो जाय और फिर भी उसके द्वारा वही अग्निहोत्रादि कर्म होता रहे, तो भी वह काम्य - कर्म नहीं होता ( वैसे ही ज्ञानीके कर्म भी कर्म नहीं हैं ) ।