श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 121–130
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १२१ न च निष्फलं विदध्यात् कर्म शास्त्रं दुःखस्वरूपत्वाद् दुःखस्य च बुद्धिपूर्वकतया कार्यत्वानुपपत्तेः । तदकरणे च नरकपाताभ्युपगमे अनर्थाय एव उभयथा अपि करणे अकरणे च शास्त्रं निष्फलं कल्पितं स्यात् । स्वाभ्युपगमविरोधः च नित्यं निष्फलं कर्म इति अभ्युपगम्य मोक्षफलाय इति ब्रुवतः । तस्माद् यथाश्रुत एव अर्थ: ' कर्मणि अकर्म यः ' इत्यादेः, तथा च व्याख्यातः अस्माभिः
श्लोकः ॥ १८ ॥
तद् एतत् कर्मणि अकर्मादिदर्शनं स्तूयते— यस्य सर्वे समारम्भाः तथा शास्त्र भी निरर्थक कर्मोंका विधान नहीं कर सकता, क्योंकि सभी कर्म ( परिश्रमकी दृष्टिसे ) दुःखरूप हैं और जान - बूझकर ( बिना प्रयोजन ) किसीका भी दुःखमें प्रवृत्त होना सम्भव नहीं । तथा उन नित्यकर्मोंको न करनेसे नरकप्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्रका आशय मान लेनेपर तो यह मानना हुआ कि कर्म करने और न करनेमें दोनों प्रकारसे शास्त्र अनर्थका ही कारण है, अतः व्यर्थ है । इसके सिवा, ' नित्यकर्मोंका फल नहीं है ', ऐसा मानकर फिर उनको मोक्षरूप फलके देनेवाला कहनेसे उन व्याख्याकारोंके मतमें स्ववचोविरोध भी होता है । सुतरां ' कर्मणि अकर्म य: पश्येत् ' इत्यादि श्लोकका अर्थ जैसा ( गुरुपरम्परासे ) सुना गया है, वही ठीक है और हमने भी उसीके अनुसार इस श्लोक की व्याख्या की है ॥१८ ॥
उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनकी स्तुति करते हैं—
कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १ ९ ॥
यस्य यथोक्तदर्शिनः सर्वे यावन्तः समारम्भाः कर्माणि समारभ्यन्ते इति समारम्भाः काम -सङ्कल्पवर्जिताः कामैः तत्कारणैः च सङ्कल्पैः वर्जिता मुधा एव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते, प्रवृत्तेन चेत् लोकसङ्ग्रहार्थं निवृत्तेन चेत् जीवनमात्रार्थम्, तं ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं कर्मादौ अकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तद् एव अग्निः तेन ज्ञानाग्निना दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तम् आहुः परमार्थतः पण्डितं बुधा ब्रह्मविदः ॥ १ ९ ॥ जिनका प्रारम्भ किया जाता है उनका नाम समारम्भ है, इस व्युत्पत्तिसे सम्पूर्ण कर्मोंका नाम समारम्भ है । उपर्युक्त प्रकारसे ' कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म ' देखनेवाले जिस पुरुषके समस्त समारम्भ ( कर्म ) कामनासे और कामनाके कारणरूप संकल्पोंसे भी रहित हो जाते हैं अर्थात् जिसके द्वारा बिना ही किसी अपने प्रयोजनके – यदि वह प्रवृत्तिमार्गवाला है तो लोक-संग्रहके लिये और निवृत्तिमार्गवाला है तो जीवनयात्रा-निर्वाहके लिये - केवल चेष्टामात्र ही क्रिया होती है, तथा कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनरूप ज्ञानाग्निसे जिसके पुण्य - पापरूप सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो गये हैं, ऐसे ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पुरुषको ब्रह्मवेत्ताजन वास्तवमें पण्डित कहते हैं ॥ १ ९ ॥
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१२२ * श्रीमद्भगवद्गीता * यः तु अकर्मादिदर्शी सः अकर्मादिदर्शनाद् एव निष्कर्मा सन्यासी जीवनमात्रार्थचेष्टः सन् कर्मणि न प्रवर्तते यद्यपि प्राग् विवेकतः प्रवृत्तः । यः तु प्रारब्धकर्मा सन् उत्तरकालम् उत्पन्नात्मसम्यग्दर्शनः स्यात् स कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म परित्यजति एव । स कुतश्चित् निमित्तात् कर्मपरित्यागासम्भवे सति कर्मणि तत्फले च सङ्गरहिततया स्वप्रयोजनाभावात् लोकसङ्ग्रहार्थं पूर्ववत् कर्मणि प्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति । ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात् तदीयं कर्म अकर्म एव सम्पद्यते इति एतम् अर्थं दर्शयिष्यन् आह— जो कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला है, वह यदि विवेक होनेसे पूर्व कर्मोंमें लगा हो तो भी कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मका ज्ञान हो जानेसे केवल जीवन - निर्वाहमात्रके लिये चेष्टा करता हुआ कर्मरहित संन्यासी ही हो जाता है, फिर उसकी कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती । अर्थात् जो पहले कर्म करनेवाला हो और पीछे जिसको आत्माका सम्यक् ज्ञान हुआ हो, ऐसा पुरुष कर्मोंमें कोई प्रयोजन न देखकर साधनोंसहित कर्मोंका त्याग कर ही देता है । परंतु किसी कारणसे कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर कोई ऐसा पुरुष यदि कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिरहित होकर केवल लोकसंग्रहके लिये पहलेके सदृश कर्म करता रहता है तो भी निजका प्रयोजन न रहनेके कारण ( वास्तवमें ) वह कुछ भी नहीं करता । क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्मीभूत हो जानेके कारण उसके कर्म अकर्म ही हो जाते हैं । इसी आशयको दिखानेकी इच्छासे भगवान् कहते हैं— त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव त्यक्त्वा कर्मसु अभिमानं फलासङ्गं च यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तो निराकाङ्क्षो विषयेषु इत्यर्थः । निराश्रय आश्रयरहितः । आश्रयो नाम यदाश्रित्य पुरुषार्थं सिसाधयिषति, दृष्टादृष्टेष्ट-फलसाधनाश्रयरहित इत्यर्थः । विदुषा क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म एव तस्य निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वात् । तेन एवं भूतेन प्रयोजनाभावात् ससाधनं
कर्म परित्यक्तव्यम् एव इति प्राप्ते ।
किञ्चित्करोति सः ॥२० ॥
उपर्युक्त ज्ञानके प्रभावसे कर्मोंमें अभिमान और फलासक्तिका त्याग करके जो नित्यतृप्त है अर्थात् विषय - कामनासे रहित हो गया है, तथा आश्रयसे रहित है । जिस फलका आश्रय लेकर मनुष्य पुरुषार्थ सिद्ध करनेकी इच्छा किया करता है, उसका नाम आश्रय है, ऐसे इस लोक और परलोकके इष्टफल - साधनरूप आश्रयसे जो रहित है, उस ज्ञानीद्वारा किये हुए कर्म वास्तवमें अकर्म ही हैं; क्योंकि वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न है अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण ऐसे पुरुषको साधनोंसहित कर्मोंका परित्याग कर ही देना चाहिये, ऐसी कर्तव्यता प्राप्त होनेपर भी ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १२३ ततो निर्गमासम्भवात् लोकसङ्ग्रहचिकीर्षया शिष्टविगर्हणापरिजिहीर्षया वा पूर्ववत् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वाद् न एव किञ्चित् करोति सः ॥ २० ॥
यः पुनः पूर्वोक्तविपरीतः प्राग् एव कर्मा-रम्भाद् ब्रह्मणि सर्वान्तरे प्रत्यगात्मनि निष्क्रिये सञ्जातात्मदर्शनः, स दृष्टादृष्टेष्टविषयाशीर्विवर्जिततया दृष्टादृष्टार्थे कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म सन्न्यस्य शरीरयात्रामात्रचेष्टो यतिः ज्ञाननिष्ठो मुच्यते इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह-निराशीर्यतचित्तात्मा उन कर्मोंसे निवृत्त होना असम्भव होनेके कारण लोकसंग्रहकी इच्छासे या श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा की जानेवाली निन्दाको दूर करनेकी इच्छासे यदि ( कोई ज्ञानी ) पहलेकी तरह कर्मोंमें प्रवृत्त है तो भी वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ॥ २० ॥
परंतु जो उससे विपरीत है अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाला नहीं है, कर्मोंका आरम्भ करनेसे पहले ( गृहस्थी न बनकर ब्रह्मचर्य आश्रममें ) ही जिसका सबके अन्दर व्यापक अन्तरात्मारूप निष्क्रिय ब्रह्ममें आत्मभाव प्रत्यक्ष हो गया है, वह केवल शरीरयात्राके लिये चेष्टा करनेवाला ज्ञान-निष्ठ यति, इस लोक और परलोकके समस्त इच्छित भोगोंको आशासे रहित होनेके कारण, इस लोक और परलोकके भोगरूप फल देनेवाले कर्मोंमें अपना कोई भी प्रयोजन न देखकर कर्मोंको और कर्मोंके साधनों-को त्यागकर मुक्त हो जाता है । इसी भावको दिखलानेके लिये ( अगला श्लोक ) कहते हैं—
त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
निराशीः निर्गता आशिषो यस्मात् स निराशीः यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा बाह्यः कार्यकरणसङ्घातः तौ उभौ अपि यतौ संयतौ येन स यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्तः सर्वः परिग्रहो येन स त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं केवलं तत्र अपि अभिमानवर्धितं कर्म कुर्वन् न आप्नोति न प्राप्नोति किल्बिषम् अनिष्टरूपं पापं धर्मं च । धर्मः अपि मुमुक्षोः किल्बिषम् एव बन्धापादकत्वात् । किं च शारीरं केवलं कर्म इत्यत्र किं शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म अभिप्रेतम् आहोस्वित् शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म इति । जिसकी सम्पूर्ण आशाएँ दूर हो गयी हैं, वह ' निराशीः ' है, जिसने चित्त यानी अन्तःकरणको और आत्मा यानी बाह्य कार्य - करणके संघातरूप शरीरको -इन दोनोंको भली प्रकार अपने वशमें कर लिया है वह ‘ यतचित्तात्मा ' कहलाता है, जिसने समस्त परिग्रहका अर्थात् भोगोंकी सामग्रीका सर्वथा त्याग कर दिया है, वह ' त्यक्तसर्वपरिग्रह ' है । ऐसा पुरुष केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और अभिमानरहित कर्मोंको करता हुआ पापको अर्थात् अनिष्टरूप पुण्य - पाप दोनोंको नहीं प्राप्त होता । बन्धनकारक होनेसे धर्म भी मुमुक्षुके लिये तो पाप ही है । यहाँ ' शारीरं केवलं कर्म ' इस पदमें शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं, या शरीर-निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं?
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१२४ * श्रीमद्भगवद्गीता * किं च अतो यदि शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म यदि वा शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरम् इति, उच्यते-यदा शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरम् अभिप्रेतं स्यात् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म प्रतिषिद्धम् अपि शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति ब्रुवतो विरुद्धाभिधानं प्रसज्येत । शास्त्रीयं च कर्म दृष्टादृष्टप्रयोजनं शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति अपि ब्रुवतः अप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गः । शारीरं कर्म कुर्वन् इति विशेषणात् केवलशब्दप्रयोगात् च वाङ्मनसनिर्वर्त्यं कर्म विधिप्रतिषेधविषयं धर्माधर्मशब्दवाच्यं कुर्वन् प्राप्नोति किल्बिषम् इति उक्तं स्यात् । तत्र अपि वाङ्मनसाभ्यां विहितानुष्ठानपक्षे किल्बिषप्राप्तिवचनं विरुद्धम् आपद्येत । प्रतिषिद्धसेवापक्षे अपि भूतार्थानुवादमात्रम् अनर्थकं स्यात् । यदा तु शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म अभिप्रेतं भवेत् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म विधिप्रतिषेधगम्यं शरीरवाङ्मनसनिर्वर्त्यम् अन्यद् अकुर्वन् तैः एव शरीरादिभिः शरीर-स्थितिमात्रप्रयोजनं केवलशब्दप्रयोगाद् अहं करोमि इति अभिमानवर्जितः शरीरादिचेष्टामात्रं लोकदृष्ट्या कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् । चाहे शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने जायँ या शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म ' शारीरिक कर्म ' माने जायँ, इस विवेचनसे क्या प्रयोजन है? इसपर कहते हैं— जो शरीरद्वारा होनेवाले कर्मोंका नाम शारीरिक कर्म मान लिया जाय तो इस लोकमें या परलोकमें फल देनेवाले निषिद्ध कर्मोंको भी शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भगवान् के कथनमें विरुद्ध विधानका दोष आता है । और इस लोक या परलोकमें फल देनेवाले, शास्त्रविहित कर्मोंको शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भी बिना प्राप्त हुए दोषके प्रतिषेध करनेका प्रसङ्ग आ जाता है । तथा ‘ शारीरिक कर्म करता हुआ ' इस विशेषणसे और ' केवल ' शब्दके प्रयोगसे ( उपर्युक्त मान्यताके अनुसार ) भगवान्का यह कहना हो जाता है कि ( शरीरके सिवा ) मन - वाणीद्वारा किये जानेवाले विहित और प्रतिषिद्ध कर्मोंको, जो कि धर्म और अधर्म नामसे कहे जाते हैं, करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त होता है । उसमें भी ‘ मन - वाणीद्वारा विहित कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है, ' यह कहना तो विरुद्ध विधान होगा, और ' निषिद्ध कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है, ' यह कहना अनुवादमात्र होनेसे व्यर्थ होगा । परंतु जब शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म मान लिये जायँगे, तब इसका यह अर्थ हो जायगा कि इस लोक या परलोकके भोग ही जिनका प्रयोजन है, जो विधि - निषेधात्मक शास्त्रोंद्वारा जाने जाते हैं, जो शरीर, मन या वाणीद्वारा किये जाते हैं, ऐसे अन्य कर्मोंको न करता हुआ उन शरीर, मन या वाणीसे केवल शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक कर्म लोकदृष्टिसे करता हुआ पुरुष किल्बिषको प्राप्त नहीं होता । यहाँ ' केवल ' शब्दके प्रयोगसे यह अभिप्राय है कि वह ' मैं करता हूँ ' इस अभिमानसे रहित होकर केवल लोकदृष्टिसे ही शरीर, वाणी आदिकी चेष्टामात्र करता है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १२५ एवम्भूतस्य पापशब्दवाच्यकिल्बिषप्राप्त्य-सम्भवात् किल्बिषं संसारं न आप्नोति । ज्ञानाग्निदग्धसर्वकर्मत्वाद् अप्रतिबन्धेन मुच्यते एव इति । पूर्वोक्तसम्यग्दर्शनफलानुवाद एव एषः । एवम् ' शारीरं केवलं कर्म ' इति अस्य अर्थपरिग्रहे निरवद्यं भवति ॥ २१ ॥
ऐसे पुरुषको पापरूप किल्बिष प्राप्त होना तो असम्भव है, इसलिये यहाँ यह समझना चाहिये कि वह किल्बिषको यानी संसारको प्राप्त नहीं होता । ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके समस्त कर्मोंका नाश हो जानेके कारण वह बिना किसी प्रतिबन्धके मुक्त ही हो जाता है । यह पहले कहे हुए यथार्थ आत्मज्ञानके फलका अनुवादमात्र है । ' शारीरं केवलं कर्म ' इस वाक्यका इस प्रकार अर्थ मान लेनेसे वह अर्थ निर्दोष सिद्ध होता है ॥२१ ॥
त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीर-स्थितिहेतोः परिग्रहस्य अभावाद् याचनादिना शरीरस्थितौ कर्तव्यतायां प्राप्तायाम् अयाचित -मसङ्क्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया ' ( बोधा ० स्मृ ० २१ । ८। १२ ) इत्यादिना वचनेन अनुज्ञातं यतेः शरीर-स्थितिहेतोः अन्नादेः प्राप्तिद्वारम् आविष्कुर्वन् आह- -जिसने समस्त संग्रहका त्याग कर दिया है, ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता, इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई । इसपर ' बिना याचना किये ', ' बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए ' इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादिकी प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं, उनको प्रकट करते हुए कहते हैं—
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥२२ ॥
यदृच्छालाभसन्तुष्टः अप्रार्थितोपनतो लाभो यदृच्छालाभः तेन सन्तुष्टः सञ्जातालम्प्रत्ययः । द्वन्द्वातीतो द्वन्द्वः शीतोष्णादिभिः हन्यमानः अपि अविषण्णचित्तो द्वन्द्वातीत उच्यते । विमत्सरो विगतमत्सरो निर्वैरबुद्धिः समः तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धौ असिद्धौ च । य एवम्भूतो यति: अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः लाभालाभयोः समो हर्षविषादवर्जितः कर्मादौ अकर्मादिदर्शी यथाभूतात्मदर्शननिष्ठः शरीर-जो बिना माँगे अपने - आप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कि यही पर्याप्त है, जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीत - उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता, जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैर - बुद्धिवाला है और जो अपने - आप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धि - असिद्धिमें भी सम रहता है, जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्ष - शोकसे रहित, समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला, यथार्थ आत्म-दर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले
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१२६ * श्रीमद्भगवद्गीता * स्थितिमात्रप्रयोजने भिक्षाटनादिकर्मणि शरीरादि -निर्वर्त्ये न एव किञ्चित् करोमि अहम् गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' इति एवं सदा सम्परिचक्षाण आत्मनः कर्तृत्वाभावं पश्यन् न एव किञ्चिद् भिक्षाटनादिकं कर्म करोति । लोकव्यवहारसामान्यदर्शनेन तु लौकिकैः आरोपितकर्तृत्वे भिक्षाटनादौ कर्मणि कर्ता भवति स्वानुभवेन तु शास्त्रप्रमाणादिजनितेन अकर्ता एव । स एवं पराध्यारोपितकर्तृत्व: शरीरस्थिति-मात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिकं कर्म कृत्वा अपि न निबध्यते, बन्धहेतोः कर्मणः सहेतुकस्य ज्ञानाग्निना दग्धत्वाद् इति उक्तानुवाद एव एषः ॥ २२ ॥
‘ त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् ' इति अनेन श्लोकेन यः प्रारब्धकर्मा सन् यदा निष्क्रियब्रह्मात्मदर्शन-सम्पन्नः स्यात् तदा तस्य आत्मनः कर्तृकर्म -प्रयोजनाभावदर्शिनः कर्मपरित्यागे प्राप्ते कुतश्चिद् निमित्तात् तदसम्भवे सति पूर्ववत् तस्मिन् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति स इति कर्माभावः प्रदर्शितः । यस्य एवं कर्माभावो दर्शितः तस्य एव -गतसङ्गस्य मुक्तस्य | और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता ' गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं ' इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है । ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है । परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे ( वस्तुतः ) वह अकर्ता ही रहता है । इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है, ऐसा वह पुरुष शरीर - निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता; क्योंकि ज्ञानरूप अग्रिद्वारा उसके ( समस्त ) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं । यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है ॥२२ ॥
जो कर्म करना प्रारम्भ कर चुका है, ऐसा पुरुष जब कर्म करते - करते इस ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है कि ' निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है ' तब अपने कर्ता, कर्म और प्रयोजनादिका अभाव देखनेवाले उस पुरुषके लिये कर्मोंका त्याग कर देना ही उचित होता है । किंतु किसी कारणवश कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर यदि वह पहलेकी तरह उन कर्मोंमें लगा रहे तो भी, वास्तवमें कुछ भी नहीं करता । इस प्रकार ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् ' इस श्लोकसे ( ज्ञानीके ) कर्मोंका अभाव ( अकर्मत्व ) दिखलाया जा चुका है । जिस पुरुषके कर्मोंका इस प्रकार अभाव दिखाया गया
है, उसीके ( विषयमें अगला श्लोक कहते हैं ) -ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
गतसङ्गस्य सर्वतो निवृत्तासक्तेः मुक्तस्य जिस पुरुषकी सब ओरसे आसक्ति निवृत्त हो निवृत्तधर्माधर्मादिबन्धनस्य ज्ञानावस्थितचेतसो चुकी है, जिसके पुण्य - पापरूप बन्धन छूट गये हैं, जिसका चित्त निरन्तर ज्ञानमें ही स्थित है, ऐसे केवल ज्ञाने एव अवस्थितं चेतो यस्य सः अयं यज्ञसम्पादनके लिये ही कर्मोंका आचरण करनेवाले
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १२७ ज्ञानावस्थितचेताः तस्य यज्ञाय यज्ञनिर्वृत्यर्थम् | उस सङ्गहीन मुक्त और ज्ञानावस्थितचित्त पुरुषके आचरतो निर्वर्तयतः कर्म समग्रं सहाग्रेण फलेन समग्र कर्म विलीन हो जाते हैं । ' अग्र ' शब्द फलका समग्रं कर्म तत् समग्रं प्रविलीयते वाचक है । उसके सहित कर्मोंको समग्र कर्म कहते वर्तते इति हैं, अतः यह अभिप्राय हुआ कि उसके फलसहित विनश्यति इत्यर्थः ॥ २३ ॥ समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ २३ ॥
कस्मात् पुनः कारणात् क्रियमाणं कर्म किये जानेवाले कर्म अपना कार्य आरम्भ किये स्वकार्यारम्भम् अकुर्वत् समग्रं प्रविलीयते इति बिना ही ( कुछ फल दिये बिना ही ) किस कारणसे उच्यते यतः - फलसहित विलीन हो जाते हैं? इसपर कहते हैं- — ब्रह्मार्पणं ब्रह्म ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म अर्पणं येन करणेन ब्रह्मविद् हविः अग्नौ अर्पयति तद् ब्रह्म एव इति पश्यति तस्य आत्मव्यतिरेकेण अभावं पश्यति । यथा शुक्तिकायां रजताभावं पश्यति तद् उच्यते ब्रह्म एव अर्पणम् इति, यथा यद् रजतं तत् शुक्तिका एव इति । ब्रह्म, अर्पणम् इति असमस्ते पदे । यद् अर्पणबुद्ध्या गृह्यते लोके तद् अस्य ब्रह्मविदो ब्रह्म एव इत्यर्थः । ब्रह्म हविः तथा यद् हविर्बुद्ध्या गृह्यमाणं तद् ब्रह्म एव अस्य । तथा ब्रह्माग्नौ इति समस्तं पदम् । अग्निः अपि ब्रह्म एव यत्र हूयते ब्रह्मणा कर्त्रा ब्रह्म एव कर्ता इत्यर्थः । यत् तेन हुतं हवनक्रिया तद् ब्रह्म एव । यत् तेन गन्तव्यं फलं तद् अपि ब्रह्म एव ।
ब्रह्मकर्मसमाधिना, ब्रह्म एव कर्म ब्रह्मकर्म तस्मिन् ।
ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
ब्रह्मवेत्ता पुरुष जिस साधनद्वारा अग्निमें हवि अर्पण करता है, उस साधनको ब्रह्मरूप ही देखा करता है, अर्थात् आत्माके सिवा उसका अभाव देखता है । जैसे ( सीपको जाननेवाला ) सीपमें चाँदीका अभाव देखता है, ‘ ब्रह्म ही अर्पण है ' इस पदसे भी वही बात कही जाती है । अर्थात् जैसे यह समझता है कि जो चाँदीके रूपमें दीख रही है वह सीप ही है । ( वैसे ही ब्रह्मवेत्ता भी समझता है कि जो अर्पण दीखता है वह ब्रह्म ही है ) ब्रह्म और अर्पण — यह दोनों पद अलग - अलग हैं । अभिप्राय यह कि संसारमें जो अर्पण माने जाते हैं वे स्रुक्, स्रुव आदि सब पदार्थ उस ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें ब्रह्म ही हैं । वैसे ही जो वस्तु हविरूपसे मानी जाती है वह भी उसकी दृष्टिमें ब्रह्म ही होता है । ' ब्रह्माग्नौ ' यह पद समासयुक्त है । इसलिये यह अर्थ हुआ कि ब्रह्मरूप कर्ताद्वारा जिसमें हवन किया जाता है वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और वह कर्ता भी ब्रह्म ही है और जो उसके द्वारा हवनरूप क्रिया की जाती है वह भी ब्रह्म ही है । उस ब्रह्मकर्ममें स्थित हुए पुरुषद्वारा प्राप्त करनेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है । अर्थात् ब्रह्मरूप कर्ममें
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१२८ * श्रीमद्भगवद्गीता * समाधिः यस्य स ब्रह्मकर्मसमाधिः तेन ब्रह्मकर्मसमाधिना ब्रह्म एव गन्तव्यम् । एवं लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुणा अपि क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म ब्रह्मबुद्धयुपमृदितत्वात् । एवं सति निवृत्तकर्मणः अपि सर्वकर्म-सन्यासिनः सम्यग्दर्शनस्तुत्यर्थं यज्ञत्वसम्पादनं ज्ञानस्य सुतराम् उपपद्यते, यद् अर्पणादि अधि-यज्ञे प्रसिद्धं तद् अस्य अध्यात्मं ब्रह्म एव परमार्थदर्शिन इति । अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनाम् एव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानम् अनर्थकं स्यात् । तस्माद् ब्रह्म एव इदं सर्वम् इति अभिजानतो विदुषः सर्वकर्माभावः । कारकबुद्ध्यभावात् च । न हि कारकबुद्धि-रहितं यज्ञाख्यं कर्म दृष्टम् । सर्वम् एव अग्निहोत्रादिकं कर्म शब्दसमर्पित-देवताविशेषसम्प्रदानादिकारकबुद्धिमत् कर्त्र -भिमानफलाभिसन्धिमत् च दृष्टम् । न उपमृदितक्रियाकारकफलभेदबुद्धिमत् कर्तृत्वाभिमानफलाभिसन्धिरहितं वा । इदं तु ब्रह्मबुद्धयुपमृदितार्पणादिकारक-क्रियाफलभेदबुद्धि कर्म अतः अकर्म एव तत् । | जिसके चित्तका समाधान हो चुका है उस पुरुषद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है । इस प्रकार लोकसंग्रह करना चाहनेवाले पुरुषद्वारा किये हुए कर्म भी ब्रह्मबुद्धिसे बाधित होनेके कारण अर्थात् फल उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित कर दिये जानेके कारण वास्तवमें अकर्म ही हैं । ऐसा अर्थ मान लेनेपर कर्मोंको छोड़ देनेवाले कर्म संन्यासीके ज्ञानको भी यथार्थ ज्ञानकी स्तुतिके लिये यज्ञरूप समझना भली प्रकार बन सकता है, अधियज्ञमें जो स्रुवादि वस्तुएँ प्रसिद्ध हैं वे सब इस यथार्थ ज्ञानी संन्यासीके ( सम्यक् - ज्ञानरूप ) अध्यात्मयज्ञमें ब्रह्म ही हैं । उपर्युक्त अर्थ नहीं माननेसे वास्तवमें सब ही ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल स्रुव आदिको ही विशेषतासे ब्रह्मरूप बतलाना व्यर्थ होगा । सुतरां ‘ यह सब कुछ ब्रह्म ही है ' इस प्रकार समझनेवाले ज्ञानीके लिये वास्तवमें सब कर्मोंका अभाव ही हो जाता है । तथा उसके अन्त: करणमें ( क्रिया, फल आदि ) कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिका अभाव होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है; क्योंकि कोई भी यज्ञ नामक कर्म कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिसे रहित नहीं देखा गया । अभिप्राय यह है कि अग्निहोत्रादि सभी कर्म, ( इन्द्राय वरुणाय आदि ) शब्दोंद्वारा हवि आदि द्रव्य जिनके अर्पण किये जाते हैं, उन देवताविशेषरूप सम्प्रदान आदि कारकबुद्धिवाले तथा कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे युक्त देखे गये हैं । जिसमेंसे क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी हो तथा जो कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे रहित हो ऐसा यज्ञ नहीं देखा गया । परंतु यह उपर्युक्त कर्म तो ऐसा है कि जिसमें सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण, अर्पणादि कारक, क्रिया और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है । इसलिये यह अकर्म ही है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १२ ९ तथा च दर्शितम् ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' ' कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ' ' गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' ' नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' इत्यादिभिः । तथा च दर्शयन् तत्र तत्र क्रियाकारकफल-भेदबुद्धयुपमर्दं करोति । दृष्टा च काम्याग्निहोत्रादौ कामोपमर्देन काम्याग्निहोत्रादिहानिः । तथा मतिपूर्वकामतिपूर्वकादीनां कर्मणां कार्यविशेषस्य आरम्भकत्वं दृष्टम् । तथा इह अपि ब्रह्मबुद्धयुपमृदितार्पणादि-कारकक्रियाफलभेदबुद्धेः बाह्यचेष्टामात्रेण कर्म अपि विदुषः अकर्म सम्पद्यते । अत उक्तं समग्रं प्रविलीयते इति । अत्र केचिद् आहुः यद् ब्रह्म तदर्पणादीनि । ब्रह्म एव किल अर्पणादिना पञ्चविधेन कारकात्मना व्यवस्थितं सत् तद् एव कर्म करोति । तत्र न अर्पणादिबुद्धिः निवर्त्यते किं तु अर्पणादिषु ब्रह्मबुद्धिः आधीयते । यथा प्रतिमादौ विष्ण्वादिबुद्धिः यथा वा नामादौ ब्रह्मबुद्धिः इति । सत्यम् एवम् अपि स्याद् यदि ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थं प्रकरणं न स्यात् । अत्र तु सम्यग्दर्शनं ज्ञानयज्ञशब्दितम् अनेकान् यज्ञशब्दितान् क्रियाविशेषान् उपन्यस्य ‘ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः ' इति ज्ञानं स्तौति । यही बात, ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' ' कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ' ' गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' ' नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' इत्यादि श्लोकोंद्वारा भी दिखलायी गयी है । और इसी प्रकार दिखलाते हुए भगवान् जगह-जगह क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धिका निषेध कर रहे हैं । देखा भी गया है कि सकाम अग्निहोत्रादिमें कामना न रहनेपर वे सकाम अग्निहोत्रादि नहीं रहते । ( उनकी सकामता नष्ट हो जाती है । ) तथा यह भी देखा गया है कि जान - बूझकर किये हुए और अनजानमें किये हुए कर्म भिन्न - भिन्न कार्योंके आरम्भक होते हैं अर्थात् उनका फल अलग - अलग होता है । वैसे ही यहाँ भी जिस पुरुषकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेसे ( स्रुव, हवि आदिमें ) क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है, उस ज्ञानी पुरुषके बाह्य चेष्टामात्रसे होनेवाले कर्म भी अकर्म हो जाते हैं । इसीलिये कहा है कि ' उसके फलसहित कर्म विलीन हो जाते हैं । ' इस विषयमें कोई - कोई टीकाकार कहते हैं कि जो ब्रह्म है वही स्रुव आदि है अर्थात् ब्रह्म ही स्रुव आदि पाँच प्रकारके कारकोंके रूपमें स्थित है और वही कर्म किया करता है, ( उनके सिद्धान्तानुसार ) उपर्युक्त यज्ञमें स्रुव आदि बुद्धि निवृत्त नहीं की जाती; किंतु स्रुव आदिमें ब्रह्मबुद्धि स्थापित की जाती है, जैसे कि मूर्ति आदिमें विष्णु आदि देवबुद्धि या नाम आदिमें ब्रह्मबुद्धि की जाती है । ठीक है, यदि यह प्रकरण ज्ञानयज्ञकी स्तुतिके लिये न होता तो यह अर्थ भी हो सकता था । परंतु इस प्रकरणमें तो यज्ञ नामसे कहे जानेवाले अलग - अलग बहुत - से क्रिया - भेदोंको कहकर फिर ' द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ कल्याणकर है ' इस कथनद्वारा ज्ञानयज्ञ शब्दसे कथित सम्यक् दर्शनकी करते हैं ।
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१३० * श्रीमद्भगवद्गीता * अत्र च समर्थम् इदं वचनं ब्रह्मार्पणम् इत्यादि ज्ञानस्य यज्ञत्वसम्पादने अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनाम् एव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानम् अनर्थकं स्यात् । ये तु अर्पणादिषु प्रतिमायां विष्णुदृष्टिवद् ब्रह्मदृष्टिः क्षिप्यते नामादिषु इव च इति ब्रुवते न तेषां ब्रह्मविद्या उक्ता इह विवक्षिता स्याद् अर्पणादिविषयत्वाद् ज्ञानस्य । न च दृष्टिसम्पादनज्ञानेन मोक्षफलं प्राप्यते ' ब्रह्मैव तेन गन्तव्यम् ' इति च उच्यते । विरुद्धं च सम्यग्दर्शनम् अन्तरेण मोक्षफलं प्राप्यते इति । प्रकृतविरोधः च । सम्यग्दर्शनं च प्रकृतम् । ‘ कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' इत्यत्र अन्ते च सम्यग्दर्शनं तस्य एव उपसंहारात् । ' श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः ' ' ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् ' इत्यादिना सम्यग्दर्शनस्तुतिम् एव कुर्वन् उपक्षीणः अध्यायः । तत्र अकस्माद् अर्पणादौ ब्रह्मदृष्टिः अप्रकरणे प्रतिमायाम् इव विष्णुदृष्टिः उच्यते इति अनुपपन्नम् । तस्माद् यथाव्याख्यातार्थ एव अयं
श्लोकः ॥ २४ ॥
तथा इस प्रकरणमें जो ' ब्रह्मार्पणम् ' इत्यादि वचन है, यह ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करनेमें समर्थ भी है, नहीं तो वास्तवमें सब कुछ ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल अर्पण ( स्रुव ) आदिको ही अलग करके ब्रह्मरूपसे विधान करना व्यर्थ होगा । जो ऐसा कहते हैं कि यहाँ मूर्तिमें विष्णु आदिकी दृष्टिके सदृश या नामादिमें ब्रह्मबुद्धिकी भाँति अर्पण ( स्रुव ) आदि यज्ञकी सामग्रीमें ब्रह्मबुद्धि स्थापन करायी गयी है, उनकी दृष्टिसे सम्भवतः इस प्रकरणमें ब्रह्मविद्या नहीं कही गयी है; क्योंकि ( उनके मतानुसार ) ज्ञानका विषय स्रुव आदि यज्ञकी सामग्री ही है, ब्रह्म नहीं । इस प्रकार केवल ब्रह्मदृष्टि सम्पादनरूप ज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं मिल सकता और यहाँ ( स्पष्ट ही ) यह कहा है कि उसके द्वारा प्राप्त किया जानेवाला फल ब्रह्म ही है, फिर बिना यथार्थ ज्ञानके मोक्षरूप फल मिलता है — यह कहना सर्वथा विपरीत है । इसके सिवा ( ऐसा मान लेनेसे ) प्रकरणमें भी विरोध आता है । अभिप्राय यह है कि ' जो कर्ममें अकर्म देखता है ' इस प्रकार यहाँ आरम्भमें सम्यक् ज्ञानका ही प्रकरण है तथा उसीमें उपसंहार होनेके कारण अन्तमें भी यथार्थ ज्ञानका ही प्रकरण है । क्योंकि ‘ द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है ' ' ज्ञानको पाकर परम शान्तिको तुरन्त ही प्राप्त हो जाता है ' इत्यादि वचनोंसे यथार्थ ज्ञानकी स्तुति करते हुए ही यह अध्याय समाप्त हुआ है । फिर बिना प्रकरण अकस्मात् मूर्तिमें विष्णुदृष्टिकी भाँति स्रुव आदिमें ब्रह्मदृष्टिका विधान बतलाना उपयुक्त नहीं । सुतरां जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है इस
श्लोकका अर्थ वैसा ही है ॥२४ ॥