श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 131–140

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १३१ तत्र अधुना सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं सम्पाद्य उपर्युक्त श्लोकमें यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन तत्स्तुत्यर्थम् अन्ये अपि यज्ञा उपक्षिष्यन्ते दैवम करके अब उसकी स्तुति करनेके लिये ‘ दैवम् एव ’ इत्यादि श्लोकोंसे दूसरे दूसरे यज्ञोंका भी उल्लेख एव इत्यादिना— किया जाता है-दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं दैवम् एव देवा इज्यन्ते येन यज्ञेन असौ दैवो यज्ञः तम् एव अपरे यज्ञं योगिनः कर्मिणः पर्युपासते कुर्वन्ति इत्यर्थः । ब्रह्माग्नौ ‘ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तैत्ति ० उ ० २। १ ) ‘ विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृह ० उ ० ३। ९ । २८ ) ‘ यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृह ० उ ० ३ । ४। १ ) इत्यादि-वचनोक्तम् अशनायादिसर्वसंसारधर्मवर्जितम्, नेति नेति इति निरस्ताशेषविशेषं ब्रह्मशब्देन उच्यते । ब्रह्म च तद् अग्निः च स होमाधिकरणत्व-विवक्षया ब्रह्माग्निः तस्मिन् ब्रह्माग्नौ अपरे अन्ये ब्रह्मविदः, यज्ञं यज्ञशब्दवाच्य आत्मा आत्म-नामसु यज्ञशब्दस्य पाठात् तम् आत्मानं यज्ञं परमार्थतः परम् एव ब्रह्म सन्तं बुद्ध्याद्युपाधि-संयुक्तं अध्यस्तसर्वोपाधिधर्मकम् आहुतिरूपं यज्ञेन एव आत्मना एव उक्तलक्षणेन उपजुह्वति प्रक्षिपन्ति । सोपाधिकस्य आत्मनो निरुपाधिकेन परब्रह्मस्वरूपेण एव यद् दर्शनं स तस्मिन् होमः तं कुर्वन्ति ब्रह्मात्मैकत्वदर्शननिष्ठाः

सन्यासिन इत्यर्थः ।

यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥

जिस यज्ञके द्वारा देवोंका पूजन किया जाता है वह देवसम्बन्धी यज्ञ है, अन्य ( कितने ही ) योगी अर्थात् कर्म करनेवाले लोग उस दैव यज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं । अन्य ( ब्रह्मवेत्ता पुरुष ) ब्रह्माग्निमें ( हवन करते हैं ) अर्थात् ‘ ब्रह्म सत्य - ज्ञान - अनन्तस्वरूप है ' ' विज्ञान और आनन्द ही ब्रह्म है ' ' जो साक्षात् अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है वह ब्रह्म है ' ' जो सर्वान्तर आत्मा है वह ब्रह्म है ' इत्यादि वचनोंसे जिसका वर्णन किया गया है, जो भूख - प्यास आदि समस्त सांसारिक धर्मोसे रहित है, जो ' ऐसा नहीं ' ' ऐसा नहीं ' इस प्रकार वेदवाक्योंद्वारा सब विशेषणोंसे परे बतलाया गया है, वह ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है । हवनका अधिकरण बतलानेके लिये उस ब्रह्मको ही यहाँ अग्नि कह दिया है । उस ब्रह्मरूप अग्निमें कितने ही ब्रह्मवेत्ता - ज्ञानी यज्ञद्वारा यज्ञको हवन करते हैं । आत्माके नामोंमें यज्ञ शब्दका पाठ होनेसे आत्माका नाम यज्ञ है जो कि वास्तवमें परब्रह्म ही है, परंतु बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त हुआ उपाधियोंके धर्मोंको अपनेमें मान रहा है । उस आहुतिरूप आत्माको उपर्युक्त आत्माद्वारा ही हवन करते हैं । सारांश यह कि उपाधियुक्त आत्माको जो उपाधि-रहित परब्रह्मरूपसे साक्षात् करना है, वही उसका उसमें हवन करना है; ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानमें स्थित हुए वे संन्यासी लोग ऐसा हवन किया करते हैं ।

पृष्ठ 132

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१३२ * श्रीमद्भगवद्गीता * सः अयं सम्यग्दर्शनलक्षणो यज्ञो दैवयज्ञादिषु ' श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ' इत्यादि यज्ञेषु उपक्षिप्यते ' ब्रह्मार्पणम् ' इत्यादिश्लोकैः श्लोकोंसे स्तुति करनेके लिये यह सम्यग्दर्शनरूप यज्ञ ' श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ' इत्यादिना ' ब्रह्मार्पणम् ' इत्यादि श्लोकोंद्वारा दैवयज्ञ आदि यज्ञोंमें स्तुत्यर्थम् ॥ २५ ॥ सम्मिलित किया जाता है ॥ २५ ॥

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥

श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि अन्ये योगिनः संयमाग्निषु प्रतीन्द्रियं संयमो भिद्यते इति बहुवचनम् । संयमा एव अग्नयः तेषु जुह्वति इन्द्रियसंयमम् एव कुर्वन्ति इत्यर्थः । शब्दादीन् विषयान् अन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति इन्द्रियाणि एव अग्नयः तेषु इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिः अविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्ते ॥२६ ॥

अन्य योगीजन संयमरूप अग्नियोंमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं । संयम ही अग्नियाँ हैं, उन्हींमें हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियोंका संयम करते हैं । प्रत्येक इन्द्रियका संयम भिन्न - भिन्न है, इसलिये यहाँ बहुवचनका प्रयोग किया गया है । अन्य ( साधकलोग ) इन्द्रियरूप अग्नियोंमें शब्दादि विषयोंका हवन करते हैं । इन्द्रियाँ ही अग्रियाँ हैं, उन इन्द्रियाग्नियोंमें हवन करते हैं अर्थात् उन श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रसम्मत विषयोंके ग्रहण करनेको ही होम मानते हैं ॥ २६ ॥

किंच- - तथा—

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥

सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि इन्द्रियाणां कर्माणि इन्द्रियकर्माणि तथा प्राणकर्माणि प्राणो वायुः आध्यात्मिकः तत् कर्माणि आकुञ्चनप्रसारणा - दीनि तानि च अपरे आत्मसंयमयोगाग्नौ आत्मनि संयम आत्मसंयमः स एव योगाग्निः तस्मिन् आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति ज्ञानदीपिते स्नेहेन इव प्रदीपिते विवेकविज्ञानेन उज्ज्वलभावम् आपादिते प्रविलापयन्ति इत्यर्थः ॥ २७ ॥

दूसरे साधक इन्द्रियोंके सम्पूर्ण कर्मोंको और शरीरके भीतर रहनेवाला वायु जो प्राण कहलाता है, उसके ' संकुचित होने ', ' फैलने ' आदि कर्मोंको, ज्ञानसे प्रकाशित हुई आत्मसंयमरूप योगाग्निमें हवन करते हैं । आत्मविषयक संयमका नाम आत्मसंयम है, वही यहाँ योगाग्नि है । घृतादि चिकनी वस्तुसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति विवेकविज्ञानसे उज्ज्वलताको प्राप्त हुई ( धारणा - ध्यान - समाधिरूप ) उस आत्म - संयम योगाग्निमें ( वे प्राण और इन्द्रियोंके कर्मोंको ) विलीन कर देते हैं ॥२७ ॥

पृष्ठ 133

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १३३

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥

द्रव्ययज्ञाः तीर्थेषु द्रव्यविनियोगं कुर्वन्ति ये ते द्रव्ययज्ञाः । तपोयज्ञा ये तपस्विनः ते तपोयज्ञाः प्राणायामप्रत्याहारादिलक्षणो योगो ते योगयज्ञाः । तथा अपरे स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः च यथाविधि ऋगाद्यभ्यासो यज्ञो यज्ञबुद्ध्या , योगयज्ञाः यज्ञो येषां स्वाध्यायो येषां ते स्वाध्याययज्ञा ज्ञानयज्ञा ज्ञानं शास्त्रार्थपरिज्ञानं यज्ञो येषां ते ज्ञानयज्ञाः च । यतयो यतनशीलाः संशितव्रताः सम्यक्शितानि तनूकृतानि तीक्ष्णीकृतानि व्रतानि येषां ते संशितव्रताः ॥ २८ ॥

जो यज्ञबुद्धिसे तीर्थादिमें द्रव्य लगाते हैं वे द्रव्ययज्ञा यानी द्रव्य - सम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं । जो तपस्वी हैं वे तपोयज्ञा यानी तपरूप यज्ञ करनेवाले हैं । प्राणायाम - प्रत्याहाररूप योग ही जिनका यज्ञ है वे योगयज्ञा यानी योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं । वैसे ही अन्य कई स्वाध्याययज्ञ और ज्ञानयज्ञ करनेवाले भी हैं । जिनका यथाविधि ऋग्वेद आदिका अभ्यासरूप स्वाध्याय ही यज्ञ है, वे स्वाध्याययज्ञ करनेवाले हैं और शास्त्रोंका अर्थ जाननारूप ज्ञान जिनका यज्ञ है वे ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं । इसी तरह कई यत्नशील संशित व्रतवाले हैं । जिनके व्रत - नियम अच्छी प्रकार तीक्ष्ण किये हुए यानी सूक्ष्म - शुद्ध किये हुए होते हैं वे पुरुष संशितव्रत कहलाते हैं ॥ २८ ॥

किं च- तथा— अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा अपाने अपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राण प्राणवृत्तिं पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्ति इत्यर्थः । प्राणे अपानं तथा अपरे जुह्वति रेचकाख्यं च प्राणायामं कुर्वन्ति इति एतत् । प्राणापानगती मुखनासिकाभ्यां वायोः निर्गमनं प्राणस्य गतिः तद्विपर्ययेण अधोगमनम् अपानस्य ते प्राणापानगती एते रुद्ध्वा निरुध्य प्राणायामपरायणाः प्राणायामतत्पराः कुम्भकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्ति इत्यर्थः ॥ २ ९ ॥ प्राणायामपरायणाः ॥ २ ९ । ( कोई ) अपानवायुमें प्राणवायुका हवन करते हैं अर्थात् पूरक नामक प्राणायाम किया करते हैं । वैसे ही अन्य कोई प्राणमें अपानका हवन करते हैं अर्थात् रेचक नामक प्राणायाम किया करते हैं । मुख और नासिकाके द्वारा वायुका बाहर निकलना प्राणकी गति है और उसके विपरीत ( पेटमें ) नीचेकी ओर जाना अपानकी गति है । उन प्राण और अपान दोनोंकी गतियोंको रोककर कोई अन्य लोग प्राणायाम-परायण होते हैं अर्थात् प्राणायाममें तत्पर हुए वे केवल कुम्भक नामक प्राणायाम किया करते हैं ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 134

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१३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * किं च- तथा— अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो अपरे नियताहारा नियतः परिमित आहारो येषां ते नियताहाराः सन्तः प्राणान् वायुभेदान् प्राणेषु एव जुह्वति यस्य यस्य वायोः जयः क्रियते इतरान् वायुभेदान् तस्मिन् तस्मिन् जुह्वति ते तत्र प्रविष्टा इव भवन्ति । सर्वे अपि एते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः यज्ञैः यथोक्तैः क्षपितो नाशितः कल्मषो येषां ते यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥

यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥

अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणोंको यानी वायुके भिन्न - भिन्न भेदोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं । भाव यह है कि वे जिस - जिस वायुको जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायु - भेद उसमें विलीन - से हो जाते हैं । ये सभी पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले और यज्ञोंद्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञोंद्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, वे ‘ यज्ञक्षपितकल्मष ' कहलाते हैं ॥ ३० ॥

एवं यथोक्तान् यज्ञान् निर्वर्त्य- । इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञोंका सम्पादन करके—

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥३१ ॥

यज्ञशिष्टामृतभुजो यज्ञानां शिष्टं यज्ञशिष्टं यज्ञशिष्टं च तद् अमृतं च यज्ञशिष्टामृतं तद् भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधि चोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति गच्छन्ति ब्रह्म सनातनं चिरन्तनम् । मुमुक्षवः चेत् कालातिक्रमापेक्षया इति सामर्थ्याद् गम्यते । न अयं लोकः सर्वप्राणिसाधारणः अपि अस्ति यथोक्तानां यज्ञानाम् एकः अपि यज्ञो यस्य न अस्ति स अयज्ञः तस्य कुतः अन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

यज्ञोंके शेषका नाम यज्ञशिष्ट है, वही अमृत है उसको जो भोगते हैं, वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं । उपर्युक्त यज्ञोंको करके उससे बचे हुए समयद्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्नको भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष, सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं । यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्दकी शक्तिसे यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रमकी अपेक्षासे ( मरनेके बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोकमें रहकर फिर प्रलयके समय ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ) । हे कुरुश्रेष्ठ! जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे एक भी यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञरहित पुरुषको, सब प्राणियोंके लिये जो साधारण है, ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता, फिर विशेष साधनोंद्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है? ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 135

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १३५ एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं एवं यथोक्ता बहुविधा बहुप्रकारा यज्ञा वितता विस्तीर्णा ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे । वेदद्वारेण अवगम्यमाना ब्रह्मणो मुखे वितता उच्यन्ते, तद् यथा ' वाचि हि प्राणं जुहुम ' इत्यादयः । कर्मजान् कायिकवाचिकमानसकर्मोद्भवान् विद्धि तान् सर्वान् अनात्मजान् । निर्व्यापारो हि आत्मा । अत एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे अशुभात् । न मद्व्यापारा इमे निर्व्यापारः अहम् उदासीन इति एवं ज्ञात्वा अस्मात् सम्यग्दर्शनाद् मोक्ष्यसे संसारबन्धनाद् इत्यर्थः ॥ ३२ ॥

ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥

इसी प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके यानी वेदके मुखमें विस्तृत हैं । वेदद्वारा ही सब यज्ञ जाननेमें आते हैं इसी अभिप्राय-से ' ब्रह्मके मुखमें विस्तारित हैं ' ऐसा कहा है । जैसे ' हम वाणीमें ही प्राणोंको हवन करते हैं ' इत्यादि इसी तरह अन्य सब यज्ञोंका भी वेदमें विधान है ) । उन सब यज्ञोंको तू कर्मज – कायिक, वाचिक और मानसिक क्रियाद्वारा ही होनेवाले जान, वे यज्ञ आत्मासे होनेवाले नहीं हैं, क्योंकि आत्मा हलन-चलन आदि क्रियाओंसे रहित है । सुतरां इस प्रकार जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा अर्थात् यह सब कर्म मेरे द्वारा सम्पादित नहीं हैं, मैं तो निष्क्रिय और उदासीन हूँ, इस प्रकार जानकर इस सम्यक् ज्ञानके प्रभावसे तू संसार-बन्धनसे मुक्त हो जायगा ॥ ३२ ॥

' ब्रह्मार्पणम् ' इत्यादिश्लोकेन सम्यग्दर्शनस्य ' ब्रह्मार्पणम् ' इत्यादि श्लोकद्वारा यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन किया, फिर बहुत - से यज्ञोंका वर्णन यज्ञत्वं सम्पादितं यज्ञाः च अनेके उपदिष्टाः तैः किया । अब पुरुषका इच्छित प्रयोजन जिन यज्ञोंसे सिद्ध होता है, उन उपर्युक्त अन्य यज्ञोंकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञकी सिद्धपुरुषार्थप्रयोजनैः ज्ञानं स्तूयते । कथम् — | स्तुति करते हैं । कैसे? सो कहते हैं— श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ श्रेयान् द्रव्यमयाद् द्रव्यसाधनसाध्याद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञो हे परन्तप । द्रव्यमयो हि यज्ञः फलस्य आरम्भको ज्ञानयज्ञो न फलारम्भकः अतः श्रेयान् प्रशस्यतरः । कथं यतः सर्वं कर्म समस्तम् अखिलम् अप्रतिबद्धं पार्थ ज्ञाने मोक्षसाधने सर्वतः सम्प्लुतोदक-स्थानीये परिसमाप्यते अन्तर्भवति इत्यर्थः । ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा अर्थात् द्रव्यरूप साधनद्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है । क्योंकि द्रव्यमय यज्ञ फलका आरम्भ करनेवाला है और ज्ञानयज्ञ ( जन्मादि ) फल देनेवाला नहीं है । इसलिये वह श्रेष्ठतर अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है । क्योंकि हे पार्थ! सब - के - सब कर्म मोक्षसाधनरूप ज्ञानमें, जो कि सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके समान है, समाप्त हो जाते हैं अर्थात् उन सबका ज्ञानमें अन्तर्भाव हो जाता है ।

पृष्ठ 136

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१३६ * श्रीमद्भगवद्गीता * ' यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किं च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद ' ( छा ० उ ० ४। १ । ४ ) इति श्रुतेः ॥ ३३ ॥

तद् एतद् विशिष्टं ज्ञानं तर्हि केन प्राप्यते इति उच्यते-' जैसे ( चौपड़के खेलमें कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ऐसे नामवाले जो चार पासे होते हैं उनमेंसे ) कृतयुग नामक पासेको जीत लेनेपर नीचेवाले सब पासे अपने - आप ही जीत लिये जाते हैं, ऐसे ही जिसको वह रैक्व जानता है उस ब्रह्मको जो कोई भी जान लेता है, प्रजा जो कुछ भी अच्छे कर्म करती है उन सबका फल उसे अपने - आप ही मिल जाता है । ' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥ ३३ ॥

इस प्रकारसे श्रेष्ठ बतलाया हुआ वह ज्ञान किस उपायसे मिलता है? सो कहते हैं-तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं तद् विद्धि विजानीहि येन विधिना प्राप्ते इति आचार्यान् अभिगम्य प्रणिपातेन प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातो दीर्घनमस्कारः तेन कथं बन्धः कथं मोक्षः का विद्या का च अविद्या इति परिप्रश्नेन सेवया गुरुशुश्रूषया । एवम् आदिना प्रश्रयेण आवर्जिता आचार्या उपदेक्ष्यन्ति कथयिष्यन्ति ते ज्ञानं यथोक्त-विशेषणम्, ज्ञानिनः । ज्ञानवन्तः अपि केचिद् यथावत् तत्त्व-दर्शनशीला अपरे न अतो विशिनष्टि तत्त्वदर्शिन इति । ये सम्यग्दर्शिनः तैः उपदिष्टं ज्ञानं कार्यक्षमं भवति न इतरद् इति भगवतो मतम् ॥ ३४ ॥

तथा च सति इदम् अपि समर्थं वचनम् — । यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥

वह ज्ञान जिस विधिसे प्राप्त होता है वह तू जान यानी सुन! आचार्यके समीप जाकर भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे एवं ‘ किस तरह बन्धन हुआ? ' ‘ कैसे मुक्ति होगी? ' ' विद्या क्या है? ' ‘ अविद्या क्या है? ’ इस प्रकार ( निष्कपट भावसे ) प्रश्न करनेसे और गुरुकी यथायोग्य सेवा करनेसे ( वह ज्ञान प्राप्त होता है ) । अभिप्राय यह कि इस प्रकार सेवा और विनय आदिसे प्रसन्न हुए तत्त्वदर्शी ज्ञानी आचार्य तुझे उपर्युक्त विशेषणोंवाले ज्ञानका उपदेश करेंगे । ज्ञानवान् भी कोई - कोई ही यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं, सब नहीं होते । इसलिये ज्ञानीके साथ ‘ तत्त्वदर्शी ' यह विशेषण लगाया है । इससे भगवान्का यह अभिप्राय है कि जो यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं, उनके द्वारा उपदेश किया हुआ ही ज्ञान अपने कार्यको सिद्ध करनेमें समर्थ होता है दूसरा नहीं ॥ ३४ ॥

ऐसा होनेपर यह कहना भी ठीक है-यास्यसि पाण्डव ।

येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५ ॥

पृष्ठ 137

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १३७ यद् ज्ञात्वा यद् ज्ञानं तैः उपदिष्टम् अधिगम्य प्राप्य पुनः भूयो मोहम् एवं यथा इदानीं मोहं गतः असि पुनः एवं न यास्यसि हे पाण्डव । किं च येन ज्ञानेन भूतानि अशेषेण ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि द्रक्ष्यसि साक्षाद् आत्मनि प्रत्यगात्मनि मत्संस्थानि इमानि भूतानि इति, अथो अपि मयि वासुदेवे परमेश्वरे च इमानि इति, क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धं द्रक्ष्यसि इत्यर्थः ॥ किं च एतस्य ज्ञानस्य माहात्म्यम्-हे पाण्डव! उनके द्वारा बतलाये हुए जिस ज्ञानको पाकर फिर तू इस प्रकार मोहको प्राप्त नहीं होगा, जैसे कि अब हो रहा है । तथा जिस ज्ञानके द्वारा तू सम्पूर्णतासे सब भूतोंको अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंको ' यह सब भूत मुझमें स्थित हैं ' इस प्रकार साक्षात् अपने अन्तरात्मामें ही देखेगा और मुझ वासुदेव परमेश्वरमें भी इन सब भूतोंको देखेगा । अर्थात् सभी उपनिषदोंमें जो जीवात्मा और ईश्वरकी एकता प्रसिद्ध है उसको प्रत्यक्ष अनुभव करेगा ॥ ३५ ॥

इस ज्ञानका माहात्म्य क्या है ( सो सुन ) —–

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥

अपि चेद् असि पापेभ्यः पापकृद्भ्यः सर्वेभ्य अतिशयेन पापकृत् पापकृत्तमः " सर्वं ज्ञानप्लवेन एव ज्ञानम् एव प्लवं कृत्वा वृजिनं वृजिनार्णवं पापं सन्तरिष्यसि, धर्मः अपि इह मुमुक्षोः पापम् उच्यते ॥ ३६ ॥

ज्ञानं कथं नाशयति पापम् इति सदृष्टान्तम् उच्यते-यदि तू पाप करनेवाले सब पापियोंसे अधिक पाप करनेवाला - अति पापी भी है तो भी ज्ञानरूप नौकाद्वारा अर्थात् ज्ञानको ही नौका बनाकर समस्त पापरूप समुद्रसे अच्छी तरह पार उतर जायगा । यहाँ मुमुक्षुके लिये धर्म भी पाप ही कहा जाता है ॥ ३६ ॥

ज्ञान पापको किस प्रकार नष्ट कर देता है सो दृष्टान्तसहित कहते हैं— यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥

यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः सम्यग् इद्धो दीप्तः अग्निः भस्मसाद् भस्मीभावं कुरुते अर्जुन, ज्ञानम् एव अग्निः ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा निर्बीजीकरोति इत्यर्थः । न हि साक्षाद् एव ज्ञानाग्निः कर्माणि इन्धनवद् भस्मीकर्तुं शक्नोति, तस्मात् सम्यग्दर्शनं सर्वकर्मणां निर्बीजत्वे कारणम् इति अभिप्रायः । हे अर्जुन! जैसे अच्छी प्रकारसे प्रदीप्त यानी प्रज्वलित हुआ अग्नि ईंधनको अर्थात् काष्ठके समूहको भस्मरूप कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मोंको भस्मरूप कर देता है, अर्थात् निर्बीज कर देता है । क्योंकि ईंधनकी भाँति ज्ञानरूप अग्नि कर्मोंको साक्षात् भस्मरूप नहीं कर सकता; इसलिये इसका यही अभिप्राय है कि यथार्थ ज्ञान सब कर्मोंको निर्बीज करनेका हेतु है ।

पृष्ठ 138

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१३८ * श्रीमद्भगवद्गीता * सामर्थ्याद् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वाद् उपभोगेन एव क्षीयते ॥ अतो यानि अप्रवृत्तफलानि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् कृतानि ज्ञानसहभावीनि च अतीतानेकजन्मकृतानि च तानि एव सर्वाणि भस्मसात् कुरुते ॥ ३७॥

जिस कर्मसे शरीर उत्पन्न हुआ है, वह फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुका, इसलिये उसका नाश तो उपभोगद्वारा ही होगा । यह युक्तिसिद्ध बात है । अतः इस जन्ममें ज्ञानकी उत्पत्तिसे पहले और ज्ञानके साथ - साथ किये हुए एवं पुराने अनेक जन्मोंमें किये हुए, जो कर्म अभीतक फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए हैं, उन सब कर्मोंको ही ज्ञानाग्नि भस्म करता । है ( प्रारब्ध - कर्मोंको नहीं ) ॥ ३७ ॥

यत एवम् अतः - क्योंकि ज्ञानका इतना प्रभाव है इसलिये— | न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥

न हि ज्ञानेन सदृशं तुल्यं पवित्रं पावनं ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला - शुद्ध करनेवाला शुद्धिकरम् इह विद्यते । इस लोकमें ( दूसरा कोई ) नहीं है तद् ज्ञानं स्वयम् एव योगसंसिद्धो योगेन कर्मयोग या समाधियोगद्वारा बहुत कालमें भली कर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृतो प्रकार शुद्धान्त: करण हुआ अर्थात् वैसी योग्यताको योग्यताम् आपन्नो मुमुक्षुः कालेन महता आत्मनि प्राप्त हुआ मुमुक्षु स्वयं अपने आत्मामें ही उस ज्ञानको विन्दति लभते इत्यर्थः ॥ ३८ ॥ पाता है यानी साक्षात् किया करता है ॥ ३८ ॥

येन एकान्तेन ज्ञानप्राप्तिः भवति स उपाय जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती उपदिश्यते- है वह उपाय बतलाया जाता है—

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३ ९ ॥

श्रद्धावान् श्रद्धालुः लभते ज्ञानम् । श्रद्धालुत्वे अपि भवति कश्चिद् मन्दप्रस्थान: अत आह तत्परो गुरूपासनादौ अभियुक्तः, ज्ञानलब्ध्युपाये । श्रद्धावान् तत्परः अपि अजितेन्द्रियः स्याद् इति अत आह संयतेन्द्रियः संयतानि श्रद्धावान् – श्रद्धालु मनुष्य ज्ञान प्राप्त किया करता है । श्रद्धालु होकर भी तो कोई मन्द प्रयत्नवाला हो सकता है, इसलिये कहते हैं कि तत्पर अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके गुरुशुश्रूषादि उपायोंमें जो अच्छी प्रकार लगा हुआ हो । श्रद्धावान् और तत्पर होकर भी कोई अजितेन्द्रिय हो सकता है, इसलिये कहते हैं कि संयतेन्द्रिय भी होना चाहिये । जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हों विषयेभ्यो निवर्तितानि यस्य इन्द्रियाणि स यानी विषयोंसे निवृत्त कर ली गयी हों, वह संयतेन्द्रिय संयतेन्द्रियः । कहलाता है ।

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* शांकरभाष्य अध्याय ४ * १३ ९ य एवम्भूतः श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः च सः अवश्यं ज्ञानं लभते । प्रणिपातादिः तु बाह्यः अनैकान्तिकः अपि भवति मायावित्वादिसम्भवाद् न तु तत् श्रद्धा-वत्त्वादौ इति एकान्ततो ज्ञानलब्ध्युपायः । किं पुनः ज्ञानलाभात् स्याद् इति उच्यते— ज्ञानं लब्ध्वा परां मोक्षाख्यां शान्तिम् उपरतिम् अचिरेण क्षिप्रम् एव अधिगच्छति । सम्यग्दर्शनात् क्षिप्रं मोक्षो भवति इति सर्वशास्त्रन्यायप्रसिद्धः सुनिश्चितः अर्थः ॥ ३ ९ ॥ जो इस प्रकार श्रद्धावान्, तत्पर और संयतेन्द्रिय भी होता है वह अवश्य ही ज्ञानको प्राप्त कर लेता है । जो दण्डवत् - प्रणामादि उपाय हैं वे तो बाह्य हैं, और कपटी मनुष्यद्वारा भी किये जा सकते हैं, इसलिये वे ( ज्ञानरूप फल उत्पन्न करनेमें ) अनिश्चित भी हो सकते हैं । परंतु श्रद्धालुता आदि उपायोंमें कपट नहीं चल सकता, इसलिये ये निश्चयरूपसे ज्ञानप्राप्तिके उपाय हैं । ज्ञानप्राप्तिसे क्या होगा? सो ( उत्तरार्धमें ) कहते हैं- -ज्ञानको प्राप्त होकर मनुष्य मोक्षरूप परम शान्तिको यानी उपरामताको बहुत शीघ्र - तत्काल ही प्राप्त हो जाता है । यथार्थ ज्ञानसे तुरंत ही मोक्ष हो जाता है; यह सब । शास्त्रों और युक्तियोंसे सिद्ध सुनिश्चित बात है ॥ ३ ९ ॥ अत्र संशयो न कर्तव्यः पापिष्ठो हि संशयः, इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये, क्योंकि कथम्, उच्यते— संशय बड़ा पापी है । कैसे? सो कहते हैं— अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न अज्ञः च अनात्मज्ञः अश्रद्दधानः च संशयात्मा च विनश्यति । अज्ञा श्रद्दधानौ यद्यपि विनश्यतः तथापि न तथा यथा संशयात्मा, संशयात्मा तु पापिष्ठः सर्वेषाम् । कथम्, न अयं साधारणः अपि लोकः अस्ति तथा न परो लोको न सुखम्, तत्र अपि संशयोपपत्तेः संशयात्मनः संशयचित्तस्य । तस्मात् संशयो न कर्तव्यः ॥ ४० ॥

सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥

जो अज्ञ यानी आत्मज्ञानसे रहित है, जो अश्रद्धालु है और जो संशयात्मा है - – ये तीनों नष्ट हो जाते हैं । यद्यपि अज्ञानी और अश्रद्धालु भी नष्ट होते हैं; परंतु जैसा संशयात्मा नष्ट होता है, वैसे नहीं, क्योंकि इन सबमें संशयात्मा अधिक पापी है । अधिक पापी कैसे है? ( सो कहते हैं ) संशयात्माको अर्थात् जिसके चित्तमें संशय है उस पुरुषको न तो यह साधारण मनुष्यलोक मिलता है, न परलोक मिलता है और न सुख ही मिलता है, क्योंकि वहाँ भी संशय होना सम्भव है, इसलिये संशय नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥

पृष्ठ 140

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१४० * श्रीमद्भगवद्गीता * कस्मात्– योगसन्यस्तकर्माणं आत्मवन्तं न कर्माणि योगसन्यस्तकर्माणं परमार्थदर्शनलक्षणेन योगेन सन्न्यस्तानि कर्माणि येन परमार्थदर्शिना धर्माधर्माख्यानि तं योगसन्यस्तकर्माणम् । कथं योगसन्न्यस्तकर्मा इति आह-ज्ञानेन आत्मेश्वरैकत्वदर्शनलक्षणेन सञ्छिन्न: संशयो यस्य स ज्ञानसञ्छिन्नसंशयः । य एवं योगसन्यस्तकर्मा तम् आत्मवन्तम् अप्रमत्तं गुणचेष्टारूपेण दृष्टानि कर्माणि न निबध्नन्ति अनिष्टादिरूपं फलं न आरभन्ते हे धनञ्जय ॥ ४१ ॥

कैसे?

।ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।

निबधन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥

जिस परमार्थदर्शी पुरुषने परमार्थज्ञानरूप योगके द्वारा पुण्य - पापरूप सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कर दिया हो, वह योगसंन्यस्तकर्मा है । ( उसको कर्म नहीं बाँधते । ) वह योगसंन्यस्तकर्मा कैसे है? सो कहते हैं— आत्मा और ईश्वरकी एकता - दर्शनरूप ज्ञानद्वारा जिसका संशय अच्छी प्रकार नष्ट हो चुका है, वह ' ज्ञानसंछिन्नसंशय ' कहलाता है । ( इसीलिये वह योगसंन्यस्तकर्मा है । ) जो इस प्रकार योगसंन्यस्तकर्मा है, उस आत्मवान् यानी आत्मबलसे युक्त प्रमादरहित पुरुषको हे धनंजय! ( गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं इस प्रकार ) गुणोंकी चेष्टामात्रके रूपमें समझे हुए कर्म नहीं बाँधते, अर्थात् इष्ट, अनिष्ट और मिश्र - इन तीन प्रकारके फलोंका भोग नहीं करा सकते ॥ ४१ ॥

यस्मात् कर्मयोगानुष्ठानाद् अशुद्धिक्षय-हेतुकज्ञानसञ्छिन्नसंशयो न निबध्यते, कर्मभिः ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वाद् एव । यस्मात् च ज्ञानकर्मानुष्ठानविषये संशयवान् विनश्यति -तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं क्योंकि कर्मयोगका अनुष्ठान ' करनेसे अन्तःकरणकी अशुद्धिका क्षय हो जानेपर उत्पन्न होनेवाले आत्मज्ञानसे जिसका संशय नष्ट हो गया है ऐसा पुरुष तो ज्ञानाग्निद्वारा उसके कर्म दग्ध हो जानेके कारण कर्मोंसे नहीं बँधता; तथा ज्ञानयोग और कर्मयोगके अनुष्ठानमें संशय रखनेवाला नष्ट हो जाता है—

ज्ञानासिनात्मनः ।

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥

तस्मात् पापिष्ठम् अज्ञानसम्भूतम् अज्ञानाद् । अविवेकाद् जातं हृत्स्थं हृदि बुद्धौ स्थितं ज्ञानासिना शोकमोहादिदोषहरं सम्यग्दर्शनं ज्ञानं तद् एव असिः खड्गः तेन ज्ञानासिना आत्मनः स्वस्य । आत्मविषयत्वात् संशयस्य । इसलिये अज्ञान यानी अविवेकसे उत्पन्न और अन्तःकरणमें रहनेवाले ( अपने नाशकके हेतुभूत ) इस अत्यन्त पापी अपने संशयको ज्ञानखड्गद्वारा अर्थात् शोक - मोह आदि दोनोंका नाश करनेवाला यथार्थ दर्शनरूप जो ज्ञान है वही खड्ग है उस स्वरूपज्ञानरूप खड्गद्वारा ( छेदन करके कर्मयोगमें स्थित हो ) । यहाँ संशय आत्मविषयक है इसलिये ( उसके साथ ‘ आत्मनः ’ विशेषण दिया गया है ) ।