श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 171–180

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अध्याय ६ * १७१ यः कश्चिद् ईदृशः कर्मी स कर्म्यन्तरेभ्यो विशिष्यते इति एवम् अर्थम् आह स सन्यासी च योगी च इति । सन्यासः परित्यागः स यस्य अस्ति स सन्यासी च योगी च योगः चित्तसमाधानं स यस्य अस्ति स योगी च इति एवंगुणसम्पन्नः अयं मन्तव्यः । न केवलं निरग्निः अक्रिय एव सन्यासी योगी च इति मन्तव्यः । निर्गता अग्नयः कर्माङ्गभूता यस्मात् स निरग्निः अक्रियः च अनग्निसाधना अपि अविद्यमानाः क्रियाः तपोदानादिका यस्य असौ अक्रियः ॥ १ ॥

| ऐसा जो कोई कर्मी है वह दूसरे कर्मियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, इसी अभिप्रायसे यह कहा है कि वह संन्यासी भी है और योगी भी है । संन्यास नाम त्यागका है, वह जिसमें हो वही संन्यासी है और चित्तके समाधानका नाम योग है, वह जिसमें हो वही योगी है; अतः वह कर्मयोगी भी इन गुणोंसे सम्पन्न माना जाना चाहिये । केवल अग्निरहित और क्रियारहित पुरुष ही संन्यासी और योगी है, ऐसा नहीं मानना चाहिये । कर्मोंके अङ्गभूत गार्हपत्यादि अग्नि जिससे छूट गये हैं, वह निरग्नि है और बिना अनिके होनेवाली तप - दानादि क्रिया भी जो नहीं करता वह अक्रिय है ॥ १ ॥

ननु च निरग्नेः अक्रियस्य एव श्रुतिस्मृति-योगशास्त्रेषु सन्यासित्वं योगित्वं च प्रसिद्धं कथम् इह साग्नेः सक्रियस्य सन्यासित्वं योगित्वं च अप्रसिद्धम् उच्यते इति । न एष दोषः । कयाचिद् गुणवृत्त्या उभयस्य सम्पिपादयिषितत्वात् । तत् कथम्? कर्मफलसङ्कल्पसन्यासात् सन्यासित्वं योगाङ्गत्वेन च कर्मानुष्ठानात् कर्मफलसङ्कल्पस्य वा चित्तविक्षेपहेतोः परित्यागाद् योगित्वं च इति गौणम् उभयम् । न पुनः मुख्यं सन्यासित्वं योगित्वं च अभिप्रेतम् इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह-पू ० – जब कि निरग्नि और अक्रिय पुरुषके लिये ही श्रुति, स्मृति और योगशास्त्रोंमें संन्यासित्व और योगित्व प्रसिद्ध है, तब यहाँ अग्नियुक्त और क्रियायुक्त पुरुषके लिये अप्रसिद्ध संन्यासित्व और प्रतिपादन कैसे किया जाता है? - यह दोष नहीं है; क्योंकि गुणवृत्तिसे उ०- ( किसी एक गुणविशेषको लेकर ) और योगित्व – इन दोनों भावोंको उसमें सम्पादन करना भगवान्‌को इष्ट है । पू ० – वह कैसे? योगित्वका किसी एक संन्यासित्व ( गृहस्थमें ) उ ० – - कर्मफलके संकल्पोंका त्याग होनेसे ' संन्यासित्व ' है और योगके अङ्गरूपसे कर्मोंका अनुष्ठान होनेसे या चित्तविक्षेपके कारणरूप कर्मफलके संकल्पोंका परित्याग होनेसे ' योगित्व ' है, इस प्रकार दोनों भाव ही गौणरूपसे माने गये हैं । इससे मुख्य संन्यासित्व और योगित्व इष्ट नहीं है । इसी भावको दिखलानेके लिये कहते हैं—

पृष्ठ 172

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१७२ * श्रीमद्भगवद्गीता *

यं सन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।

न ह्यसन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥

यं सर्वकर्मतत्फलपरित्यागलक्षणं परमार्थ-सन्यासम् इति प्राहुः श्रुतिस्मृतिविदः, योगं कर्मानुष्ठानलक्षणं तं परमार्थसन्न्यासं विद्धि जानीहि हे पाण्डव । कर्मयोगस्य प्रवृत्तिलक्षणस्य तद्विपरीतेन निवृत्तिलक्षणेन परमार्थसन्यासेन कीदृशं सामान्यम् अङ्गीकृत्य तद्भाव उच्यते इति अपेक्षायाम् इदम् उच्यते-अस्ति परमार्थसन्यासेन सादृश्यं कर्तृद्वारकं कर्मयोगस्य । यो हि परमार्थसन्यासी स त्यक्त-सर्वकर्मसाधनतया सर्वकर्मतत्फलविषयं सङ्कल्पं प्रवृत्तिहेतुकामकारणं सन्यस्यति । अयम् अपि कर्मयोगी कर्म कुर्वाण एव फलविषयं सङ्कल्प सन्यस्यति इति एतम् अर्थं दर्शयन् आह— न हि यस्माद् असन्यस्तसङ्कल्पः असन्न्यस्तः अपरित्यक्तः फलविषयः सङ्कल्पः अभिसन्धिः येन सः असन्यस्तसङ्कल्पः " कश्चन कश्चिद् अपि कर्मी योगी समाधानवान् भवति, न सम्भवति इत्यर्थः । फलसङ्कल्पस्य चित्तविक्षेपहेतुत्वात् । तस्माद् यः कश्चन कर्मी सन्यस्तफलसङ्कल्पो भवेत् स योगी समाधानवान् अविक्षिप्तचित्तो भवेत् चित्तविक्षेपहेतोः फलसङ्कल्पस्य सन्न्यस्त-त्वाद् इति अभिप्रायः । श्रुति स्मृतिके ज्ञाता पुरुष सर्वकर्म और उनके फलके त्यागरूप जिस भावको वास्तविक संन्यास कहते हैं, हे पाण्डव! कर्मानुष्ठानरूप योगको ( निष्काम कर्मयोगको ) भी तू वही वास्तविक संन्यास जान । प्रवृत्तिरूप कर्मयोगकी उससे विपरीत निवृत्तिरूप परमार्थ- संन्यासके साथ कैसी समानता स्वीकार करके एकता कही जाती है? ऐसा प्रश्न होनेपर यह कहा जाता है— परमार्थ - संन्यासके साथ कर्मयोगकी कर्तृविषयक समानता है; क्योंकि जो परमार्थ - संन्यासी है वह सब कर्मसाधनोंका त्याग कर चुकता है, इसलिये सब कर्मोंका और उनके फलविषयक संकल्पोंका, जो कि प्रवृत्तिहेतुक कामके कारण हैं, त्याग करता है । और यह कर्मयोगी भी कर्म करता हुआ फलविषयक संकल्पोंका त्याग करता ही है ( इस प्रकार दोनोंकी समानता है ), इस अभिप्रायको दिखलाते हुए कहते हैं— जिसने फलविषयक संकल्पोंका यानी इच्छाओंका त्याग न किया हो, ऐसा कोई भी कर्मी, योगी नहीं हो सकता । अर्थात् ऐसे पुरुषका चित्त समाधिस्थ होना सम्भव नहीं है; क्योंकि फलका संकल्प ही चित्तके विक्षेपका कारण है । इसलिये जो कोई कर्मी फलविषयक संकल्पोंका त्याग कर देता है वही योगी होता है । अभिप्राय यह है कि चित्तविक्षेपका कारण जो फलविषयक संकल्प है उसके त्यागसे ही मनुष्य समाधानयुक्त यानी चित्तविक्षेपसे रहित योगी होता है ।

पृष्ठ 173

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अध्याय ६ * १७३ एवं परमार्थसन्न्यासकर्मयोगयोः कर्तृद्वारकं इस प्रकार परमार्थ- संन्यासकी और कर्मयोगकी सन्याससामान्यम् अपेक्ष्य ' यं सत्र्यासमिति कर्त्ताके भावसे सम्बन्ध रखनेवाली जो त्यागविषयक समानता है, उसकी अपेक्षासे ही कर्मयोगकी स्तुति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ' इति कर्मयोगस्य करनेके लिये ' यं सन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि स्तुत्यर्थं सन्यासत्वम् उक्तम् ॥ २ ॥ पाण्डव ' इस श्लोकमें उसे संन्यास बतलाया है ॥ २ ॥

ध्यानयोगस्य फलनिरपेक्षः कर्मयोगो फलेच्छासे रहित जो कर्मयोग है वह ध्यानयोगका बहिरङ्गं साधनम् इति तं सन्यासत्वेन स्तुत्वा बहिरंग साधन है, इस उद्देश्यसे उसकी संन्यासरूपसे अधुना कर्मयोगस्य ध्यानयोगसाधनत्वं स्तुति करके अब यह भाव दिखलाते हैं कि कर्मयोग दर्शयति- ध्यानयोगका साधन है—

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥

आरुरुक्षोः आरोढुम् इच्छतः अनारूढस्य ध्यानयोगे अवस्थातुम् अशक्तस्य एव इत्यर्थः, कस्य आरुरुक्षोः मुनेः कर्मफलसन्यासिन इत्यर्थः । किम् आरुरुक्षोः योगं कर्म कारणं साधनम् उच्यते । योगारूढस्य पुनः तस्य एव शम उपशमः सर्वकर्मभ्यो निवृत्तिः कारणं योगारूढत्वस्य साधनम् उच्यते इत्यर्थः । यावद् यावत् कर्मभ्य उपरमते तावत् तावद् निरायासस्य जितेन्द्रियस्य चित्तं समाधीयते । तथा सति स झटिति योगारूढो भवति । तथा च उक्तं व्यासेन— ‘ नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च । शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ ' ( महा ० शान्ति १७५ । ३७ ) इति ॥ ३ ॥

जो ध्यानयोगमें आरूढ़ नहीं – ध्यानयोगमें स्थित नहीं रह सकता है, ऐसे योगारूढ़ होनेकी इच्छावाले मुनि अर्थात् कर्मफलत्यागी पुरुषके लिये ध्यानयोगपर आरूढ़ होनेका साधन ' कर्म ' बतलाया गया है । तथा वही जब योगारूढ़ हो जाता है तो उसके लिये योगारूढ़ता ( ध्यानयोगमें सदा स्थित रहनेका ) साधन शम – उपशम यानी ' सर्व कर्मोंसे निवृत्त होना ' बतलाया गया है । ( मनुष्य ) जितना - जितना कर्मोंसे उपरत होता जाता है, उतना - उतना ही उस परिश्रमरहित जितेन्द्रिय पुरुषका चित्त समाहित होता जाता है । ऐसा होनेसे वह झटपट योगारूढ़ हो जाता है । व्यासजीने भी यही कहा है कि ' ब्राह्मणके लिये दूसरा ऐसा कोई धन नहीं है, जैसा कि एकता, समता, सत्यता, शील, स्थिति, अहिंसा, आर्जव और उन - उन क्रियाओंसे उपराम होना है ' ॥ ३ ॥

पृष्ठ 174

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * अथ इदानीं कदा योगारूढो भवति इति उच्यते- -यदा हि नेन्द्रियार्थेषु सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी यदा समाधीयमानचित्तो योगी हि इन्द्रियार्थेषु इन्द्रियाणाम् अर्थाः शब्दादयः तेषु इन्द्रियार्थेषु कर्मसु च नित्यनैमित्तिककाम्यप्रतिषिद्धेषु प्रयोजनाभावबुद्ध्या न अनुषज्जते अनुषङ्गं कर्तव्यताबुद्धिं न करोति इत्यर्थः । सर्वसङ्कल्पसन्यासी सर्वान् सङ्कल्पान् इहा-मुत्रार्थकामहेतून् सन्यसितु शीलम् अस्य इति सर्वसङ्कल्पसन्यासी, योगारूढः प्राप्तयोग इति एतत् तदा तस्मिन् काले उच्यते । सर्वसङ्कल्पसन्यासी इति वचनात् सर्वान् च कामान् सर्वाणि च कर्माणि सन्यसेद् इत्यर्थः । सङ्कल्पमूला हि सर्वे कामा: -‘ सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः । ' ( मनु ० २।३ ) ' काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात् किल जायसे ॥ ' ' न त्वां सङ्कल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि ॥ ' ( महा ० शान्ति ० १७७ । २५ ) इत्यादिस्मृतेः । सर्वकामपरित्यागे च सर्वकर्मसन्न्यासः सिद्धो भवति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते ' ( बृ ० उ ० ४।४।५ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः ' यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ' ( मनु ० २। ४ ) इत्यादिस्मृतिभ्यः च । साधक कब योगारूढ़ हो जाता है, यह अब

बतलाते हैं-न कर्मस्वनुषज्जते ।

योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥

चित्तका समाधान कर लेनेवाला योगी जब इन्द्रियोंके अर्थोंमें, अर्थात् इन्द्रियोंके विषय जो शब्दादि हैं उनमें एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध कर्मोंमें अपना कुछ भी प्रयोजन न देखकर आसक्त नहीं होता, उनमें आसक्ति यानी ये मुझे करने चाहिये ऐसी बुद्धि नहीं करता । तब — उस समय वह सब संकल्पोंका त्यागी अर्थात् इस लोक और परलोकके भोगोंकी कामनाके कारणरूप सब संकल्पोंका त्याग करना जिसका स्वभाव हो चुका है, ऐसा पुरुष, योगारूढ़ यानी योगको प्राप्त हो चुका है, ऐसे कहा जाता है । ‘ सर्वसङ्कल्पसन्यासी ’ इस कथनका यह आशय है कि सब कामनाओंको और समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये । क्योंकि सब कामनाओंका मूल संकल्प ही है । स्मृतिमें भी कहा है कि - ' कामका मूल कारण संकल्प ही है । समस्त यज्ञ संकल्पसे उत्पन्न होते हैं । ' ' हे काम! मैं तेरे मूल कारणको जानता हूँ । तू निःसन्देह संकल्पसे ही उत्पन्न होता है । मैं तेरा संकल्प नहीं करूँगा, अतः फिर तू मुझे प्राप्त नहीं होगा । ' सब कामनाओंके परित्यागसे ही सर्व कर्मोंका त्याग सिद्ध हो जाता है । यह बात ‘ वह जैसी कामनावाला होता है वैसे ही निश्चयवाला होता है, जैसे निश्चयवाला होता है वही कर्म करता है ' इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित है और ' जीव जो - जो कर्म करता है वह सब कामकी ही चेष्टा है । ' इत्यादि स्मृतिसे भी प्रमाणित है ।

पृष्ठ 175

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अध्याय ६ * १७५ न्यायात् च । न हि सर्वसङ्कल्पसन्यासे कश्चित् युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है; क्योंकि सब संकल्पोंका त्याग कर देनेपर तो कोई जरा - सा हिल स्पन्दितुम् अपि शक्तः । भी नहीं सकता । तस्मात् सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी इति वचनात् सुतरां ' सर्वसङ्कल्पसंन्यासी ' कहकर भगवान् समस्त सर्वान् कामान् सर्वाणि कर्माणि च त्याजयति कामनाओंका और समस्त कर्मोंका त्याग कराते भगवान् ॥ ४ ॥ हैं ॥ ४ ॥

यदा एवं योगारूढः तदा तेन आत्मा जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब आत्मना उद्धृतो भवति संसाराद् अनर्थव्राताद् | वह अनर्थोंके समूह इस संसारसमुद्रसे स्वयं अपना अतः - उद्धार कर लेता है, इसलिये—

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥

उद्धरेत् संसारसागरे निमग्नम् आत्मना आत्मानं तत उद् ऊर्ध्वं हरेद् उद्धरेद् योगारूढतां आपादयेद् इत्यर्थः । न आत्मानम् अवसादयेद् न अधो नयेद् न अधो गमयेत् । आत्मा एव हि यस्माद् आत्मनो बन्धुः । न हि अन्यः कश्चिद् बन्धुः यः संसारमुक्तये भवति । बन्धुः अपि तावद् मोक्षं प्रति प्रतिकूल एव स्नेहादिबन्धनायतनत्वाद् तस्माद् युक्तम् अवधारणम्‘आत्मा एव हि आत्मनो बन्धुः ' इति । आत्मा एव रिपुः शत्रुः यः अन्यः अपकारी बाह्यः शत्रुः सः अपि आत्मप्रयुक्त एव इति, युक्तम् एव अवधारणम् आत्मा एव रिपुः आत्मन इति ॥ ५ ॥

संसार - सागरमें डूबे पड़े हुए अपने - आपको उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये अर्थात् योगारूढ़ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये । अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको नीचे नहीं गिरने देना चाहिये । क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है । दूसरा कोई ( ऐसा ) बन्धु नहीं है जो संसारसे मुक्त करनेवाला हो । प्रेमादि भाव बन्धनके स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी ( वास्तवमें ) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है । इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है । तथा आप ही अपना शत्रु है । जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है, इसलिये आप ही अपना शत्रु है, इस प्रकार केवल अपनेको ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 176

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * आत्मा एव बन्धुः आत्मा एव रिपुः आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना आत्मन इति उक्तम्, तत्र किंलक्षण | शत्रु है यह बात कही गयी, उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो ( आप ही ) अपना मित्र होता है और आत्मनो बन्धुः किंलक्षणो वा आत्मनो रिपुः कौन ( आप ही ) अपना शत्रु होता है? सो कहा इति उच्यते— जाता है— बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य तस्य आत्मनः स आत्मा बन्धुः येन आत्मना आत्मा एव जितः आत्मा कार्यकरणसङ्घातो येन वशीकृतो जितेन्द्रिय इत्यर्थः । अनात्मनः तु अजितात्मनः तु शत्रुत्वे शत्रुभावे वर्तेत आत्मा एव शत्रुवत्, तथा अनात्मा शत्रुः आत्मनः अपकारी तथा आत्मा आत्मनः अपकारे वर्तेत इत्यर्थः ॥ ६ ॥

वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥

उस जीवात्माका तो वही आप मित्र है कि जिसने स्वयमेव कार्य - करणके समुदाय शरीररूप आत्माको अपने वशमें कर लिया हो अर्थात् जो जितेन्द्रिय हो । जिसने ( कार्य - करणके संघात ) शरीररूप आत्माको अपने वशमें नहीं किया उसका वह आप ही शत्रुकी भाँति शत्रुभावमें बर्तता है । अर्थात् जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करनेवाला होता है, वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करनेमें लगा रहता है ॥ ६ ॥

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७ ॥

जितात्मन: कार्यकरणादिसङ्गात आत्मा जितो येन स जितात्मा, तस्य जितात्मनः, प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः सन्यासिनः परमात्मा समाहितः साक्षाद् आत्मभावेन वर्तते इत्यर्थः । किं च शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा माने अपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः ॥ ७ ॥

जिसने मन, इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस शरीरको अपने वशमें कर लिया है और जो प्रशान्त है— जिसका अन्त: करण सदा प्रसन्न रहता है उस संन्यासीको भली प्रकारसे सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे विद्यमान है । तथा वह सर्दी - गर्मी और सुख - दुःखमें एवं मान और अपमानमें यानी पूजा और तिरस्कारमें भी ( सम हो जाता है ) ॥ ७ ॥

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।

युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥

पृष्ठ 177

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा ज्ञानं शास्त्रोक्तपदार्थानां परिज्ञानं विज्ञानं तु शास्त्रतो ज्ञातानां तथा एव स्वानुभवकरणं ताभ्यां ज्ञानविज्ञानाभ्यां तृप्तः सञ्जातालम्प्रत्यय आत्मा अन्तःकरणं यस्य स ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थ: अप्रकम्प्यो भवति इत्यर्थः । विजितेन्द्रियः च । य ईदृशो युक्तः समाहित इति स उच्यते कथ्यते । स योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनो लोष्टाश्म-काञ्चनानि समानि यस्य स समलोष्टाश्म -काञ्चनः ॥ ८ ॥

अध्याय ६ * १७७ शास्त्रोक्त पदार्थोंको समझनेका नाम ' ज्ञान ' है और शास्त्रसे समझे हुए भावोंको वैसे ही अपने अन्तःकरणमें प्रत्यक्ष अनुभव करनेका नाम ' विज्ञान ' है, ऐसे ' ज्ञान ' और ' विज्ञान ' से जिसका अन्तःकरण तृप्त है अर्थात् जिसके अन्तःकरणमें ऐसा विश्वास उत्पन्न हो गया है कि ' बस ' अब कुछ भी जानना बाकी नहीं है, ऐसा जो ज्ञान - विज्ञानसे तृप्त हुए अन्तःकरणवाला है तथा जो कूटस्थ यानी अविचल और जितेन्द्रिय हो जाता है, वह युक्त यानी समाहित समाधिस्थ ) कहा जाता है । यह योगी मिट्टी, पत्थर और सुवर्णको समान समझने-वाला होता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें मिट्टी, पत्थर और सोना सब समान हैं ( एक ब्रह्मरूप है ) ॥ ८ ॥

किं च- - तथा— सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥

सुहृदित्यादिश्लोकार्धम् एकं पदम् । सुहृद् इति प्रत्युपकारम् अनपेक्ष्य उपकर्ता । मित्रं स्नेहवान् । अरिः शत्रुः । उदासीनो न कस्यचित् पक्षं भजते । मध्यस्थो यो विरुद्धयोः उभयोः हितैषी । द्वेष्य आत्मनः अप्रियः । बन्धुः सम्बन्धी इति एतेषु साधुषु शास्त्रानुवर्तिषु अपि च पापेषु प्रतिषिद्धकारिषु सर्वेषु एतेषु समबुद्धिः कः किंकर्मा इति अव्यापृतबुद्धिः इत्यर्थः । विशिष्यते विमुच्यते इति वा पाठान्तरम् । योगारूढानां सर्वेषाम् अयम् उत्तम इत्यर्थः ॥ ९ ॥

' सुहृत् ' शब्दसे लेकर आधा श्लोक एक पद है । ' सुहृत् ' - प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला, ' मित्र ' – प्रेमी, ' अरि ' – शत्रु, ' उदासीन ' – पक्षपातरहित, ' मध्यस्थ ' - जो परस्पर विरोध करनेवाले दोनोंका हितैषी हो, ' द्वेष्य ' – अपना अप्रिय और ' बन्धु'– अपना कुटुम्बी, इन सबमें तथा शास्त्रानुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें और निषिद्ध कर्म करनेवाले पापियोंमें भी जो समबुद्धिवाला है, इन सबमें कौन कैसा क्या कर रहा है ऐसे विचारमें जिसकी बुद्धि नहीं लगती है वह श्रेष्ठ है । अर्थात् ऐसा योगी सब योगारूढ़ पुरुषोंमें उत्तम है । यहाँ ‘ विशिष्यते ’ के स्थानमें ' विमुच्यते ' ( मुक्त हो जाता है ) ऐसा पाठान्तर भी है ॥९ ॥

पृष्ठ 178

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * अत एवम् उत्तमफलप्राप्तये— अतः ऐसे उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये— योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा योगी ध्यायी युञ्जीत समादध्यात् सततं सर्वदा आत्मानम् अन्तःकरणं रहसि एकान्ते गिरिगुहादौ स्थितः सन् एकाकी असहायः । रहसि स्थित एकाकी च इति विशेषणात् सन्यासं कृत्वा इत्यर्थः । यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा देहः च संयतौ यस्य स यतचित्तात्मा निराशीः वीततृष्णः अपरिग्रहः च परिग्रहरहितः । संन्यासित्वे अपि त्यक्तसर्वपरिग्रहः सन् युञ्जीत इत्यर्थः ॥ १० ॥

निराशीरपरिग्रहः ॥१० ॥

ध्यान करनेवाला योगी अकेला - किसीको साथ न लेकर पहाड़की गुफा आदि एकान्त स्थानमें स्थित हुआ, निरन्तर अपने अन्तःकरणको ध्यानमें स्थिर किया करे । ‘ एकान्त स्थानमें स्थित हुआ ' और ' अकेला ' इन विशेषणोंसे यह भाव पाया जाता है कि संन्यास ग्रहण करके योगका साधन करे । जिसका चित्त — अन्त: करण और आत्मा – शरीर ( दोनों ) जीते हुए हैं ऐसा यतचित्तात्मा, निराशी-तृष्णाहीन और संग्रहरहित होकर अर्थात् संन्यासी होनेपर भी सब संग्रहका त्याग करके योगका अभ्यास करे ॥ १० ॥

अथ इदानीं योगं युञ्जत आसनाहारविहारादीनां योगसाधनत्वेन नियमो वक्तव्यः प्राप्तयोगलक्षणं यत्फलादि च इति अत आरभ्यते । तत्र आसनम् एव तावत् प्रथमम् उच्यते— शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य नात्युच्छ्रितं नातिनीचं शुचौ शुद्धे विविक्ते स्वभावतः संस्कारतो वा देशे स्थाने, प्रतिष्ठाप्य स्थिरम् अचलम् आत्मन आसनं न अत्युच्छ्रितं न अतीव उच्छ्रितं न अपि अतिनीचं तत् च चैलाजिनकुशोत्तरम्, चैलम् योगाभ्यास करनेवालेके लिये योगके साधनरूप आसन, आहार और विहार आदिका नियम बतलाना उचित है एवं योगको प्राप्त हुए पुरुषका लक्षण और उसका फल आदि भी कहना चाहिये । इसलिये अब ( यह प्रकरण ) आरम्भ किया जाता है । उसमें पहले आसनका ही वर्णन करते हैं—

स्थिरमासनमात्मनः ।

चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥

शुद्ध स्थानमें अर्थात् जो स्वभावसे अथवा झाड़ने-बुहारने आदि संस्कारोंसे साफ किया हुआ पवित्र और एकान्त स्थान हो, उसमें अपने आसनको जो न अति ऊँचा हो और न अति नीचा हो और जिसपर क्रमसे वस्त्र, मृगचर्म और कुशा बिछाये गये हों, अविचलभावसे अजिनं कुशाः च उत्तरे यस्मिन् आसने तद् स्थापन करके । यहाँ पाठक्रमसे उन वस्त्रादिका क्रम आसनं चैलाजिनकुशोत्तरं पाठक्रमाद् विपरीतः उलटा समझना चाहिये अर्थात् पहले कुशा, उसपर अत्र क्रमः चैलादीनाम् ॥ ११ ॥ मृगचर्म और फिर उसपर वस्त्र बिछावे ॥ ११ ॥

पृष्ठ 179

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अध्याय ६ * १७ ९ प्रतिष्ठाप्य किम्- ( आसनको ) स्थिर स्थापन करके क्या करे ( सो

कहते हैं ) -तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।

उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥

तत्र तस्मिन् आसने उपविश्य योगं युञ्ज्यात् । कथम्, सर्वविषयेभ्य उपसंहृत्य एकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः चित्तं च इन्द्रियाणि च चित्तेन्द्रियाणि तेषां क्रियाः संयता तस्य स यतचित्तेन्द्रियक्रियः । स किमर्थं योगं युञ्ज्याद् इति आह- -आत्मविशुद्धये अन्तःकरणस्य विशुद्ध्यर्थम् इति एतत् ॥ १२ ॥

। उस आसनपर बैठकर योगका साधन करे । कैसे करे? मनको सब विषयोंसे हटाकर एकाग्र करके तथा यतचित्तेन्द्रियक्रिय यानी चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीतनेवाला होकर योगका साधन करे । जिसने मन और इन्द्रियोंकी क्रियाओंका संयम कर लिया हो उसको यतचित्तेन्द्रियक्रिय कहते हैं । वह किसलिये योगका साधन करे? सो कहते हैं— आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये करे ॥ १२ ॥

बाह्यम् आसनम् उक्तम् अधुना शरीरधारणं बाह्य आसनका वर्णन किया, अब शरीरको कैसे कथम् इति उच्यते— रखना चाहिये? सो कहते हैं— समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं समं कायशिरोग्रीवं कायः च शिरः च ग्रीवा च कायशिरोग्रीवं तत् समं धारयन् अचलं च समं धारयतः चलनं सम्भवति अतो विशिनष्टि अचलम् इति । स्थिरः स्थिरो भूत्वा इत्यर्थः । स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य सम्यक् प्रेक्षणं दर्शनं कृत्वा इव । इति इवशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः । न हि स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् इह विधित्सितम् ।

किं तर्हि चक्षुषोः दृष्टिसन्निपातः ।

दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥

काया, सिर और गरदनको सम और अचल भावसे धारण करके स्थिर होकर बैठे । समानभावसे धारण किये हुए कायादिका भी चलन होना सम्भव है, इसलिये ‘ अचलम् ' यह विशेषण दिया गया है । तथा अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ यानी मानो वह उधर ही अच्छी तरह देख रहा है । इस प्रकार दृष्टि करके । यहाँ ' संप्रेक्ष्य ' के साथ ' इव ' शब्द लुप्त समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ अपनी नासिकाके अग्रभागको देखनेका विधान करना अभिमत नहीं है । तो क्या है? बस, नेत्रोंकी दृष्टिको ( विषयोंकी ओरसे रोककर ) वहाँ स्थापन करना ही इष्ट है ।

पृष्ठ 180

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८० * श्रीमद्भगवद्गीता * स च अन्तःकरणसमाधानापेक्षो विविक्षितः स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् एव चेद् विवक्षितं मनः तत्र एव समाधीयते न आत्मनि । आत्मनि हि मनसः समाधानं वक्ष्यति ' आत्मसंस्थं मनः कृत्वा ' इति । तस्माद् इवशब्दलोपेन अक्ष्णोः दृष्टिसन्निपात एव सम्प्रेक्ष्य इति उच्यते । दिशः च अनवलोकयन् दिशां च अवलोकनम् अन्तरा अकुर्वन् इति एतत् ॥ १३ ॥

वह ( इस तरह दृष्टिस्थापना करना ) भी अन्त: करणके समाधानके लिये आवश्यक होनेके कारण भी अभीष्ट है । क्योंकि यदि अपनी नासिकाके अग्रभागको देखना ही विधेय माना जाय तो फिर मन वहीं स्थित होगा, आत्मामें नहीं । परंतु ( आगे चलकर ) ' आत्मसंस्थं मनः कृत्वा ' इस पदसे आत्मामें ही मनको स्थित करना बतलायेंगे । इसलिये ' इव ' शब्दके लोपद्वारा नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाना ही ' सम्प्रेक्ष्य ' इस पदसे कहा गया । इस प्रकार ( नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभाग-पर लगाकर ) तथा अन्य दिशाओंको न देखता हुआ अर्थात् बीच - बीचमें दिशाओंकी ओर दृष्टि न डालता हुआ ॥ १३ ॥

किं च- तथा—

प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥

प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं प्रशान्तात्मा विगतभीः विगतभयो ब्रह्मचारिव्रते स्थितो ब्रह्मचारिणो व्रतं ब्रह्मचर्यं गुरुशुश्रूषाभिक्षाभुक्त्यादि तस्मिन् स्थितः तदनुष्ठाता भवेद् इत्यर्थः । किं च मनः संयम्य मनसो वृत्तिः उपसंहृत्य इति एतद् मच्चित्तो मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सः अयं मच्चित्तो युक्तः समाहितः सन् आसीत उपविशेद् मत्परः अहं परो यस्य सः अयं मत्परः । भवति कश्चिद् रागी स्त्रीचित्तो न तु स्त्रियम् एव परत्वेन गृह्णाति, किं तर्हि राजानं महादेवं वा अयं तु मच्चित्तो मत्परः च ॥ १४ ॥

प्रशान्तात्मा — अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तः-करणवाला, विगतभी- निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, भिक्षा- भोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला, अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ, ऐसा होकर बैठे । कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है; परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता । तो किसको समझता है? वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है? परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है ॥ १४ ॥