श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 231–240
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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* शांकरभाष्य अध्याय ९ * २३१ तर्हि तस्य ते परमेश्वरस्य भूतग्रामं विषमं विदधतः तन्निमित्ताभ्यां धर्माधर्माभ्यां सम्बन्धः स्याद् इति इदम् आह भगवान्– न च मां तानि कर्माणि उदासीनवदासीनमसक्तं न च माम् ईशं तानि भूतग्रामस्य विषम-विसर्गनिमित्तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । तत्र कर्मणाम् असंबद्धत्वे कारणम् आह— उदासीनवद् आसीनं यथा उदासीन उपेक्षकः कश्चित् तद्वद् आसीनम् आत्मनः अविक्रियत्वात् असक्तं फलासङ्गरहितम् अभिमानवर्जितम् अहं करोमि इति तेषु कर्मसु । अतः अन्यस्य अपि कर्तृत्वाभिमानाभावः फलासङ्गाभावः च अबन्धकारणम् अन्यथा कर्मभिः बध्यते मूढः कोशकारवद् इति अभिप्रायः ॥ ९ ॥
तब तो भूतसमुदायको विषम रचनेवाले आप परमेश्वरका उस विषम रचनाजनित पुण्य - पापसे भी सम्बन्ध होता ही होगा? ऐसी शङ्का होनेपर भगवान् ये वचन बोले—
निबध्नन्ति धनञ्जय ।
तेषु कर्मसु ॥९ ॥
हे धनंजय! भूतसमुदायकी विषम रचनानिमित्तक वे कर्म, मुझ ईश्वरको बन्धनमें नहीं डालते । उन कर्मोंका सम्बन्ध न होनेमें कारण बतलाते हैं— मैं उन कर्मोंमें उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है, इसलिये जैसे कोई उदासीन - उपेक्षा करनेवाला स्थित हो उसीकी भाँति मैं स्थित रहता हूँ । तथा उन कर्मोंमें फलसम्बन्धी आसक्तिसे और ' मैं करता हूँ ' इस अभिमानसे भी मैं रहित हूँ ( इस कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते ) । इससे यह अभिप्राय समझ लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानका अभाव और फलसम्बन्धी आसक्तिका अभाव दूसरोंको भी बन्धनरहित कर देनेवाला है । इसके सिवा अन्य प्रकारसे किये हुए कर्मोंद्वारा मूर्खलोग कोशकार ( रेशमके कीड़े ) -की भाँति बन्धनमें पड़ते हैं ॥ ९ ॥
तत्र भूतग्रामम् इमं विसृजामि उदासीनवद् यहाँ यह शङ्का होती है कि ' इस भूतसमुदायको आसीनम् इति च विरुद्धम् उच्यते इति मैं रचता हूँ, तथा मैं उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ ' यह कहना परस्पर विरुद्ध है । इस शङ्काको दूर तत्परिहारार्थम् आह— करनेके लिये कहते हैं-मयाध्यक्षेण प्रकृतिः
प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
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२३२ * श्रीमद्भगवद्गीता * मया सर्वतो दृशिमात्रस्वरूपेण अविक्रिया-त्मना अध्यक्षेण मम माया त्रिगुणात्मिका अविद्यालक्षणा प्रकृतिः सूयते उत्पादयति सचराचरं जगत् । तथा च मन्त्रवर्णः— ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ' ( श्वे ० उ ० ६ । ११ ) इति । हेतुना निमित्तेन अनेन अध्यक्षत्वेन कौन्तेय जगत् सचराचरं व्यक्ताव्यक्तात्मकं विपरिवर्तते सर्वासु अवस्थासु । दृशिकर्मत्वापत्तिनिमित्ता हि जगतः सर्वा प्रवृत्तिः अहम् इदं भोक्ष्ये पश्यामि इदं शृणोमि इदं सुखम् अनुभवामि दुःखम् अनुभवामि तदर्थम् इदं करिष्यामि एतदर्थम् इदं करिष्ये इदं ज्ञास्यामि इत्याद्या अवगतिनिष्ठा अवगत्यवसाना एव । ' यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् ' ( तै ० ब्रा ० २ ८। ९ ) इत्यादयः च मन्त्रा एतम् अर्थं दर्शयन्ति । तत: च एकस्य देवस्य सर्वाध्यक्षभूत-चैतन्यमात्रस्य परमार्थतः सर्वभोगानभिसम्बन्धिनः अन्यस्य चेतनान्तरस्य अभावे भोक्तुः अन्यस्य अभावात् किन्निमित्ता इयं सृष्टिः इति अत्र प्रश्नप्रतिवचने अनुपपन्ने । ‘ को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ' ( तै ० ब्रा ० २। ८ । ९ ) इत्यादिमन्त्रवर्णेभ्यः । सब ओरसे द्रष्टामात्र ही जिसका स्वरूप है ऐसे निर्विकारस्वरूप मुझ अधिष्ठातासे ( प्रेरित होकर ) अविद्यारूप मेरी त्रिगुणमयी माया – प्रकृति समस्त चराचर जगत्को उत्पन्न किया करती है । वेद - मन्त्र भी यही बात कहते हैं कि ' समस्त भूतोंमें अदृश्यभावसे रहनेवाला एक ही देव है जो कि सर्वव्यापी और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा तथा कर्मोंका स्वामी, समस्त भूतोंका आधार, साक्षी, चेतन, शुद्ध और निर्गुण है । ' हे कुन्तीपुत्र! इसी कारणसे अर्थात् मैं इसका अध्यक्ष हूँ इसीलिये चराचरसहित साकार - निराकाररूप समस्त जगत् सब अवस्थाओंमें परिवर्तित होता रहता है, क्योंकि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ साक्षी - चेतनके ज्ञानका विषय बननेके लिये ही हैं । मैं यह खाऊँगा, यह देखता हूँ, यह सुनता हूँ, अमुक सुखका अनुभव करता हूँ, दुःख अनुभव करता हूँ, उसके लिये अमुक कार्य करूँगा, इसके लिये अमुक कार्य करूँगा, अमुक वस्तुको जानूँगा इत्यादि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ ज्ञानाधीन और ज्ञानमें ही लय हो जानेवाली हैं । ' जो इस जगत्का अध्यक्ष साक्षी चेतन है वह परम हृदयाकाशमें स्थित है ' इत्यादि मन्त्र भी यही अर्थ दिखला रहे हैं । जब कि सबका अध्यक्षरूप चैतन्यमात्र एक देव वास्तवमें समस्त भोगोंके सम्बन्धसे रहित है और उसके सिवा अन्य चेतन न होनेके कारण दूसरे भोक्ताका अभाव है तो यह सृष्टि किसके लिये है? इस प्रकारका प्रश्न और उसका उत्तर - यह दोनों ही नहीं बन सकते ( अर्थात् यह विषय अनिर्वचनीय है ) । ' ( इसको ) साक्षात् कौन जानता है - इस विषय में कौन कह सकता है? यह जगत् कहाँसे आया? किस कारण यह रचना हुई? ' इत्यादि मन्त्रोंसे ( यही बात कही गयी है ) ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ९ * २३३ दर्शितं च भगवता ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन इसके सिवा भगवान्ने भी कहा है कि ' अज्ञानसे ज्ञान आवृत हो रहा है इसलिये समस्त जीव मोहित मुह्यन्ति जन्तवः ' इति ॥ १० ॥ हो रहे हैं ' ॥ १० ॥
एवं मां नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वजन्तूनाम् इस प्रकार मैं यद्यपि नित्य - शुद्ध - बुद्ध - मुक्तस्वभाव आत्मानम् अपि सन्तम्- तथा सभी प्राणियोंका आत्मा हूँ तो भी—
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
अवजानन्ति अवज्ञां परिभवं कुर्वन्ति मां मूढा अविवेकिनो मानुषीं मनुष्यसम्बन्धिनीं तनुं देहम् आश्रितं मनुष्यदेहेन व्यवहरन्तम् इति एतत् । परं प्रकृष्टं भावं परमात्मतत्त्वम् आकाशकल्पम् आकाशाद् अपि अन्तरतमम् अजानन्तो मम भूतमहेश्वरं सर्वभूतानां महान्तम् ईश्वरं स्वम् आत्मानम् । ततः च तस्य मम अवज्ञानभावनेन आहता वराकाः ते ॥ ११ ॥
मूढ़ - अविवेकी लोग मेरे सर्व लोकोंके महान् ईश्वररूप परमभावको अर्थात् सबका अपना आत्मारूप मैं परमात्मा सब प्राणियोंका महान् ईश्वर हूँ एवं आकाशकी भाँति बल्कि आकाशकी अपेक्षा भी सूक्ष्मतर भावसे व्यापक हूँ — इस परम परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण मुझ मनुष्यदेहधारी परमात्माको तुच्छ समझते हैं अर्थात् मनुष्यरूपसे लीला करते हुए मुझ परमात्माकी अवज्ञा - अनादर करते हैं इसलिये मुझ परमात्माके निरादरकी भावनासे वे पामर जीव ( व्यर्थ ) मारे हुए पड़े हैं ॥ ११ ॥
कथम् — क्योंकि— मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
मोघाशा वृथा आशा आशिषो येषां ते मोघाशाः । तथा मोघकर्माणो यानि च अग्निहोत्रादीनि तैः अनुष्ठीयमानानि कर्माणि तानि च तेषां भगवत्परिभवात् स्वात्मभूतस्य अवज्ञानाद् मोघानि एव निष्फलानि कर्माणि भवन्ति इति मोघकर्माणः । वे मोघाशा – जिनकी आशाएँ – कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा — व्यर्थ कर्म करनेवाले होते हैं; क्योंकि उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान्का अनादर करनेके कारण निष्फल हो जाते हैं । इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं ।
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२३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * तथा मोघज्ञाना निष्फलज्ञाना ज्ञानम् अपि तेषां निष्फलम् एव स्यात् । विचेतसो विगत -विवेकाः च ते भवन्ति इति अभिप्रायः । किं च ते भवन्ति राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावम् आसुरीम् असुराणां च प्रकृतिं मोहिनीं मोहकरीं देहात्मवादिनीं श्रिता आश्रिताः छिन्धि भिन्धि पिब खाद परस्वम् अपहर इति एवं वदनशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्ति इत्यर्थः । ' असुर्या नाम ते लोका: ' ( ई ० उ ० ३ ) इति श्रुतेः ॥ १२ ॥
इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी - निष्फल ज्ञानवाले होते हैं, अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है । और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं । तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसोंके और असुरोंके स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं । अभिप्राय यह कि तोड़ो, फोड़ो, पिओ, खाओ, दूसरोंका धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं । श्रुति भी कहती है कि ' वे असुरोंके रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं ' इत्यादि ॥ १२ ॥
ये पुनः श्रद्दधाना भगवद्भक्तिलक्षणे मोक्ष- परंतु जो श्रद्धायुक्त हैं और भगवद्भक्तिरूप मोक्षमार्गमें मार्गे प्रवृत्ताः- लगे हुए हैं वे— महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा महात्मानः तु अक्षुद्रचित्ता माम् ईश्वरं पार्थ । दैवीं देवानां प्रकृतिं शमदमदया श्रद्धादिलक्षणाम् आश्रिताः सन्तः, भजन्ति सेवन्ते अनन्यमनसः अनन्यचित्ता ज्ञात्वा भूतादिं भूतानां वियदादीनां प्राणिनां च आदिं कारणम् अव्ययम् ॥ १३ ॥ ।
भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
हे पार्थ! शम, दम, दया, श्रद्धा आदि सद्गुणरूप देवोंके स्वभावका अवलम्बन करनेवाले उदारचित्त महात्मा भक्तजन, मुझ ईश्वरको सब भूतोंका अर्थात् आकाशादि पञ्चभूतोंका और समस्त प्राणियोंका भी आदिकारण जानकर एवं अविनाशी समझकर, अनन्य मनसे युक्त हुए भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं ॥ १३ ॥
कथम्— सततं कीर्तयन्तो मां नमस्यन्तश्च मां भक्त्या सततं सर्वदा भगवन्तं ब्रह्मस्वरूपं मां कीर्त-यन्तो यतन्तः च इन्द्रियोपसंहारशमदमदया-हिंसादिलक्षणैः धर्मैः प्रयतन्तः च दृढव्रता दृढं स्थिरम् अचाञ्चल्यं व्रतं येषां ते दृढव्रताः, नमस्यन्तः च मां हृदयेशयम् आत्मानं भक्त्या नित्ययुक्ताः सन्त उपासते सेवन्ते ॥ १४ ॥
किस प्रकार भजते हैं—
यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नित्ययुक्ता उपासते ॥१४ ॥
वे दृढ़व्रती भक्त अर्थात् जिनका निश्चय दृढ़ — स्थिर— अचल है ऐसे वे भक्तजन सदा – निरन्तर ब्रह्मस्वरूप मुझ भगवान्का कीर्तन करते हुए तथा इन्द्रिय - निग्रह, शम, दम, दया और अहिंसा आदि धर्मोंसे युक्त होकर प्रयत्न करते हुए एवं हृदयमें वास करनेवाले मुझ परमात्माको भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हुए और सदा मेरा चिन्तन करनेमें लगे रहकर, मेरी उपासना - सेवा करते रहते हैं ॥ १४ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय ९ * २३५ ते केन केन प्रकारेण उपासते इति वे किस - किस प्रकारसे उपासना करते हैं सो उच्यते- कहते हैं-ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ॥ एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
ज्ञानयज्ञेन ज्ञानम् एव भगवद्विषयं यज्ञः तेन ज्ञानयज्ञेन यजन्तः पूजयन्तो माम् ईश्वरं च अपि अन्ये अन्याम् उपासनां परित्यज्य उपासते । तत् च ज्ञानम् एकत्वेन एकम् एव परं ब्रह्म इति परमार्थदर्शनेन यजन्त उपासते । केचित् च पृथक्त्वेन आदित्यचन्द्रादिभेदेन स एव भगवान् विष्णुः आदित्यादिरूपेण अवस्थित इति उपासते । केचिद् बहुधा अवस्थितः स एव भगवान् सर्वतोमुखो विश्वतोमुखो विश्वरूप इति, तं विश्वरूपं सर्वतोमुखं बहुधा बहुप्रकारेण उपासते ॥ १५ ॥
कुछ ( ज्ञानीजन ) दूसरी उपासनाओंको छोड़कर भगवद्विषयक ज्ञानरूप यज्ञसे मेरा पूजन करते हुए उपासना किया करते हैं अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा एक ही है, ऐसे एकत्वरूप परमार्थज्ञानसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं । और कोई - कोई पृथक भावसे अर्थात् आदित्य, चन्द्रमा आदिके भेदसे इस प्रकार समझकर उपासना करते हैं कि वही भगवान् विष्णु, सूर्य आदिके रूपमें स्थित हुए हैं I तथा कितने ही भक्त ऐसा समझकर कि वही सब ओर मुखवाले विश्वमूर्ति भगवान् अनेक रूपसे स्थित हो रहे हैं । उन विश्वरूप विराट् भगवान्हीकी विविध प्रकारसे उपासना करते हैं ॥ १५ ॥
यदि बहुभिः प्रकारैः उपासते कथं त्वाम् । एव उपासते इति अत आह— अहं क्रतुरहं यज्ञः मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं अहं क्रतुः श्रौतकर्मभेदः अहम् एव अहं यज्ञः स्मार्तः । किं च स्वधा अन्नम् अहं पितृभ्यो यद् दीयते । अहम् औषधं सर्वप्राणिभिः यद् अद्यते तद् औषधशब्दवाच्यम् । अथवा स्वधा इति सर्वप्राणिसाधारणम् अन्नम् औषधम् इति व्याध्युपशमार्थं भेषजम् । यदि भक्तलोग बहुत प्रकारसे उपासना करते हैं तो आपकी ही उपासना कैसे करते हैं? इसपर
कहते हैं-स्वधाहमहमौषधम् ।
हुतम् ॥ १६ ॥
क्रतु — श्रौतयज्ञविशेष मैं हूँ और यज्ञ - स्मार्त-कर्मविशेष भी मैं ही हूँ । तथा जो पितरोंको दिया जाता है, वह स्वधा नामक अन्न भी मैं ही हूँ । सब प्राणियोंसे जो खायी जाती है, उसका नाम औषध है, वह औषध भी मैं ही हूँ । अथवा यों समझो कि सब प्राणियोंका साधारण अन्न ‘ स्वधा ' है और व्याधिका नाश करनेके लिये काममें ली जानेवाली भेषज ' औषध ' है ।
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२३६ * श्रीमद्भगवद्गीता * मन्त्रः अहं येन पितृभ्यो देवताभ्यः च हविः तथा जिसके द्वारा देव और पितरोंको हवि दीयते । अहम् एव आज्यं हविः च अहम् अग्निः पहुँचायी जाती है वह मन्त्र भी मैं ही हूँ । इसके अतिरिक्त मैं ही आज्य हवि - घृत हूँ, जिसमें होम यस्मिन् हूयते सः अग्निः अहम् एव अहं हुतं किया जाता है वह अग्नि भी मैं ही हूँ और मैं ही हवनकर्म च ॥ १६ ॥ हवनरूपकर्म भी हूँ ॥ १६ ॥
किं च- तथा—
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्सामयजुरेव च ॥ १७ ॥
पिता जनयिता अहम् अस्य जगतो माता जनयित्री, धाता कर्मफलस्य प्राणिभ्यो विधाता, पितामहः पितुः पिता, वेद्यं वेदितव्यम्, पवित्रं पावनम्, ओङ्कारः च ऋक्सामयजुः एव च ॥ १७ ॥
मैं ही इस जगत्का उत्पन्न करनेवाला पिता और उसकी जन्मदात्री माता हूँ तथा मैं ही प्राणियोंके कर्मफलका विधान करनेवाला विधाता और पितामह अर्थात् पिताका पिता हूँ; तथा जाननेके योग्य, पवित्र करनेवाला, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद सब कुछ मैं ही हूँ ॥ १७ ॥
किं च- तथा मैं ही—
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥१८ ॥
गतिः कर्मफलम्, भर्ता पोष्टा, प्रभुः स्वामी, साक्षी प्राणिनां कृताकृतस्य, निवासो यस्मिन् प्राणिनो निवसन्ति, शरणम् आर्तानां प्रपन्नानां आर्तिहरः, सुहृत् प्रत्युपकारानपेक्षः सन् उपकारी, प्रभव उत्पत्तिः जगतः, प्रलयः प्रलीयते यस्मिन् इति । तथा स्थानं तिष्ठति अस्मिन् इति, निधानं निक्षेपः कालान्तरोपभोग्यं प्राणिनाम्, बीजं प्ररोहकारणं प्ररोहधर्मिणाम्, अव्ययम् । गति — कर्मफल, भर्ता — सबका पोषण करनेवाला, प्रभु - सबका स्वामी, प्राणियोंके कर्म और अकर्मका साक्षी, जिसमें प्राणी निवास करते हैं वह वासस्थान, शरण अर्थात् शरणमें आये हुए दुःखियोंका दुःख दूर करनेवाला, सुहृत् – प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला, प्रभव – जगत्की उत्पत्तिका कारण और जिसमें सब लीन हो जाते हैं वह प्रलय भी मैं ही हूँ । तथा जिसमें सब स्थित होते हैं वह स्थान, प्राणियोंके कालान्तरमें उपभोग करनेयोग्य कर्मोंका भण्डाररूप निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ अर्थात् उत्पत्तिशील वस्तुओं की उत्पत्तिका अविनाशी कारण मैं ही हूँ ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ९ * २३७ यावत्संसारभावित्वाद् अव्ययम् । न हि अबीजं जबतक संसार है तबतक उसका बीज भी अवश्य रहता है, इसलिये बीजको अविनाशी कहा है; क्योंकि किञ्चित् प्ररोहति । नित्यं च प्ररोहदर्शनाद् बिना बीजके कुछ भी उत्पन्न नहीं होता और उत्पत्ति नित्य देखी जाती है, इससे यह जाना जाता है कि बीजसन्ततिः न व्येति इति गम्यते ॥ १८ ॥ बीजकी परम्पराका नाश नहीं होता ॥ १८ ॥
किं च- तथा—
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १ ९ ॥
तपामि अहम् आदित्यो भूत्वा कैश्चिद् रश्मिभिः उल्बणैः अहं वर्षं कैश्चिद् रश्मिभिः उत्सृजामि उत्सृज्य पुनः निगृह्णामि कैश्चिद् रश्मिभिः अष्टभिः मासैः पुनः उत्सृजामि प्रावृषि । अमृतं च एव देवानां मृत्युः च मर्त्यानाम् । सद् यस्य यत् सम्बन्धितया विद्यमानं तद्विपरीतम् असत् च एव अहम् अर्जुन । न पुनः अत्यन्तम् एव असद् भगवान् स्वयम् । कार्यकारणे वा सदसती । ये पूर्वोक्तैः अनुवृत्तिप्रकारैः एकत्व-पृथक्त्वादिविज्ञानैः यज्ञैः यज्ञैः मां पूजयन्त । उपासते ज्ञानविदः ते यथाविज्ञानं माम् एव प्राप्नुवन्ति ॥ १ ९ ॥ मैं ही सूर्य होकर अपनी कुछ प्रखर रश्मियोंसे सबको तपाता हूँ और कुछ किरणोंसे वर्षा करता हूँ तथा वर्षा कर चुकनेपर फिर कुछ रश्मियोंद्वारा आठ महीनेतक जलका शोषण करता रहता हूँ और वर्षाकाल आनेपर फिर बरसा देता हूँ । हे अर्जुन! देवोंका अमृत और मर्त्यलोकमें बसनेवालोंकी मृत्यु तथा सत् और असत् सब मैं ही हूँ अर्थात् जो जिसके सम्बन्धसे विद्यमान है वह और जो उसके विपरीत है वह भी मैं ही हूँ । परंतु ( यह ध्यानमें रखना चाहिये कि ) स्वयं भगवान् अत्यन्त असत् नहीं हैं । अथवा सत् और असत्का अर्थ यहाँ कार्य और कारण समझना चाहिये । जो ज्ञानी पहले कहे हुए क्रमानुसार एकत्व-पृथक्त्व आदि विज्ञानरूप यज्ञोंसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं वे अपने विज्ञानानुसार मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥ १ ९ ॥ ये पुनः अज्ञाः कामकामाः - | परंतु जो विषयवासनायुक्त अज्ञानी-त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
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२३८ * श्रीमद्भगवद्गीता * त्रैविद्या ऋग्यजुः सामविदो मां वस्वादिदेव -रूपिणं सोमपाः सोमं पिबन्ति इति सोमपाः तेन एव सोमपानेन पूतपापाः शुद्धकिल्बिषाः, यज्ञैः अग्निष्टोमादिभिः इष्ट्वा पूजयित्वा, स्वर्गतिं स्वर्गगमनम् स्वर्गतिः तां प्रार्थयन्ते । ते च पुण्यं पुण्यफलम् आसाद्य सम्प्राप्य सुरेन्द्रलोकं शतक्रतोः स्थानम् अश्नन्ति भुञ्जते दिव्यान् दिवि भवान् अप्राकृतान् देवभोगान् देवानां भोगाः तान् ॥ २० ॥
ऋक्, यजु और साम- इन तीनों वेदोंको जानने-वाले, सोमरसका पान करनेवाले और पापरहित हुए अर्थात् सोमरसका पान करनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं ऐसे सकाम पुरुष वसु आदि देवोंके रूपमें स्थित मुझ परमात्माका अग्निष्टोमादि यज्ञोंद्वारा पूजन करके स्वर्गप्राप्तिकी इच्छा करते हैं । वे अपने पुण्यके फलस्वरूप इन्द्रके स्थानको पाकर स्वर्गमें देवताओंके दिव्य भोगोंको भोगते हैं अर्थात् देवताओंके जो स्वर्गमें होनेवाले अप्राकृत भोग हैं उनको भोगते हैं ॥ २० ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रैधर्म्यमनुप्रपन्ना गतागतं ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं विस्तीर्णं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकम् इमं विशन्ति आविशन्ति । एवं हि यथोक्तेन प्रकारेण त्रैधर्म्यं केवलं वैदिकं कर्म अनुप्रपन्ना गतागतं गतं च आगतं च गतागतं गमनागमनं कामकामाः कामान् कामयन्ते इति कामकामा लभन्ते गतागतम् एव न तु स्वातन्त्र्यं क्वचिद् लभन्ते इत्यर्थः ॥ २१ ॥ ।
कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
वे उस विशाल - विस्तृत स्वर्गलोकको भोग चुकनेपर ( उसकी प्राप्तिके कारणरूप ) पुण्योंका क्षय हो जानेपर इस मृत्युलोकमें लौट आते हैं उपर्युक्त प्रकारसे केवल वैदिक कर्मोंका आश्रय लेनेवाले कामकामी - विषयवासनायुक्त मनुष्य बारम्बार आवागमनको ही प्राप्त होते रहते हैं अर्थात् जाते हैं और लौट आते हैं; इस प्रकार बराबर आवागमनको ही प्राप्त होते हैं, कहीं भी स्वतन्त्रता लाभ नहीं करते ॥ २१ ॥
ये पुनः निष्कामाः सम्यग्दर्शिनः - परंतु जो निष्कामी - पूर्ण ज्ञानी हैं-अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
अनन्या अपृथग्भूताः परं देवं नारायणम् आत्मत्वेन गताः सन्तः चिन्तयन्तो मां ये जनाः सन्यासिनः पर्युपासते, तेषां परमार्थदर्शिनां नित्याभियुक्तानां सतताभियुक्तानां योगक्षेमं योगः अप्राप्तस्य प्रापणं क्षेमः तद्रक्षणं तद् उभयं वहामि प्रापयामि अहम् । जो संन्यासी अनन्यभावसे युक्त हुए अर्थात् परमदेव मुझ नारायणको आत्मरूपसे जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ – निष्काम उपासना करते हैं, निरन्तर मुझमें ही स्थित उन परमार्थज्ञानियोंका योग-क्षेम मैं चलाता हूँ । अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम योग है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है, उनके ये दोनों काम मैं स्वयं किया करता हूँ ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ९ * २३ ९ ' ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम् ' ' स च मम प्रियः ' यस्मात् तस्मात् ते मम आत्मभूताः प्रियाः च इति । ननु अन्येषाम् अपि भक्तानां योगक्षेमं वहति एव भगवान् । सत्यम् एवं वहति एव । किं तु अयं विशेष: अन्ये ये भक्ताः ते स्वात्मार्थं स्वयम् अपि योगक्षेमम् ईहन्ते । अनन्यदर्शिनः तु न आत्मार्थं योगक्षेमम् ईहन्ते न हि ते जीविते मरणे वा आत्मनो गृधिं कुर्वन्ति केवलम् एव भगवच्छरणाः ते । अतो भगवान् एव तेषां योगक्षेमं वहति इति ॥ २२ ॥
क्योंकि ' ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ ' और ' वह मेरा प्यारा है ' इसलिये वे उपर्युक्त भक्त मेरे आत्मारूप और प्रिय हैं । पू ० — अन्य भक्तोंका योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं? उ ० — यह बात ठीक है, अवश्य भगवान् ही चलाते हैं; किंतु उसमें यह भेद है कि जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेम - सम्बन्धी चेष्टा करते हैं, पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम-सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते । क्योंकि वे जीने और मरनेमें भी अपनी वासना नहीं रखते, केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं । अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं ॥ २२ ॥
ननु अन्या अपि देवताः त्वम् एव चेत् यदि कहो कि अन्य देव भी आप ही हैं, अतः उनके भक्त भी आपहीका पूजन करते हैं तो यह बात तद्भक्ताः च त्वाम् एव यजन्ते सत्यम् एवम्- ठीक है-येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय ये अपि अन्यदेवताभक्ता अन्यासु देवतासु भक्ता अन्यदेवताभक्ताः सन्तो यजन्ते पूजयन्ते श्रद्धया आस्तिक्यबुद्ध्या अन्विता अनुगताः ते अपि माम् एव कौन्तेय यजन्ति अविधिपूर्वकम् अविधिः अज्ञानं तत्पूर्वकम् अज्ञानपूर्वकं यजन्ते इत्यर्थः ॥ २३ ॥
यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
जो कोई अन्य देवोंके भक्त - अन्य देवताओंमें भक्ति रखनेवाले, श्रद्धासे - आस्तिकबुद्धिसे युक्त हुए ( उनका ) पूजन करते हैं, हे कुन्तीपुत्र! वे भी मेरा ही पूजन करते हैं ( परंतु ) अविधिपूर्वक ( करते हैं ) । | अविधि अज्ञानको कहते हैं, सो वे अज्ञानपूर्वक मेरा पूजन करते हैं ॥ २३ ॥
कस्मात् ते अविधिपूर्वकं यजन्ते इति उच्यते उनका पूजन करना अविधिपूर्वक कैसे है? सो
यस्मात्— कहते हैं कि-अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥
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२४० * श्रीमद्भगवद्गीता * अहं हि सर्वयज्ञानां श्रौतानां स्मार्तानां च सर्वेषां यज्ञानां देवतात्मत्वेन भोक्ता च प्रभुः एव च । मत्स्वामिको हि यज्ञः ' अधियज्ञोऽहमेवात्र ' इति हि उक्तम् । तथा न तु माम् अभिजानन्ति तत्त्वेन यथावत् । अतः च अविधिपूर्वकम् इष्ट्वा यागफलात् च्यवन्ति प्रच्यवन्ते ते ॥ २४ ॥
श्रौत और स्मार्त समस्त यज्ञोंका देवतारूपसे मैं ही भोक्ता हूँ और मैं ही स्वामी हूँ । मैं ही सब यज्ञोंका स्वामी हूँ यह बात ‘ अधियज्ञोऽहमेवात्र ' इस श्लोकमें भी कही गयी है । परंतु वे अज्ञानी इस प्रकार यथार्थ तत्त्वसे मुझे नहीं जानते ॥ अतः अविधिपूर्वक पूजन करके वे यज्ञके असली फलसे गिर जाते हैं अर्थात् उनका पतन हो जाता है ॥ २४ ॥
ये अपि अन्यदेवताभक्तिमत्त्वेन अविधि- जो भक्त अन्य देवताओंकी भक्तिके रूपमें पूर्वकं यजन्ते तेषाम् अपि यागफलम् अवश्यं - अविधिपूर्वक भी मेरा पूजन करते हैं उनको भी यज्ञका भावि, कथम् - फल अवश्य मिलता है । कैसे? ( सो कहा जाता है— ) यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति यान्ति गच्छन्ति देवव्रता देवेषु व्रतं नियमो भक्ति: च येषां ते देवव्रता देवान् यान्ति । पितॄन् । अग्निष्वात्तादीन् यान्ति पितृव्रताः श्राद्धादि -क्रियापराः पितृभक्ताः । भूतानि विनायक - -मातृगणचतुर्भगिन्यादीनि यान्ति भूतेज्या भूतानां पूजकाः । यान्ति मद्याजिनो मद्यजनशीला वैष्णवा माम् एव । समाने अपि आयासे माम् एव न भजन्ते अज्ञानात् । तेन तेन ते ते अल्प- अल्प- | फलभाजो भवन्ति इत्यर्थः ॥ २५ ॥
मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥
जिनका नियम और भक्ति देवोंके लिये ही है वे देव - उपासकगण देवोंको प्राप्त होते हैं । श्राद्ध आदि क्रियाके परायण हुए पितृभक्त अग्निष्वात्तादि पितरोंको पाते हैं । भूतोंकी पूजा करनेवाले विनायक, षोडशमातृकागण और चतुर्भगिनी आदि भूतगणोंको पाते हैं तथा मेरा पूजन करनेवाले वैष्णव भक्त अवश्यमेव मुझे ही पाते हैं ॥ अभिप्राय यह कि समान परिश्रम होनेपर भी वे ( अन्य देवोपासक ) अज्ञानके कारण केवल मुझ परमेश्वरको ही नहीं भजते इसीसे वे अल्प फलके भागी होते हैं ॥ २५ ॥
न केवलं मद्भक्तानाम् अनावृत्तिलक्षणम् मेरे भक्तोंको केवल अपुनरावृत्तिरूप अनन्त फल मिलता है इतना ही नहीं, किंतु मेरी आराधना भी सुखपूर्वक की जा सकती है । कैसे? अनन्तफलं सुखाराधनः च अहं कथम्— ( सो कहते हैं - )
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥