श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 301–310
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३०१ अविद्या च सह कार्येण विद्यया हातव्या इति श्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः अवगम्यते । श्रुतयः तावत् — ' इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि: ' ( के ० उ ० २।५ ) ‘ तमेवं विद्वानमृत इह भवति ' ( नृ ० पू ० उ ० ६ ) ‘ नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वे ० उ ० ३।८ ) ' विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ' ( तै ० उ ० २। ४ ) अविदुषस्तु — ' अथ तस्य भयं भवति ' ( तै ० उ ० २ । ७ ) ' अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः ' ( क ० उ ० १। २। ५ ) ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मु ० उ ० ३ । २ । ९ ) ' अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम् ' आत्मविद्यः -‘ स इदं सर्वं भवति ' ( बृह ० उ ० १। ४। १० ) ' यदा चर्मवत् ' ( श्वे ० उ ० ६ । २० ) इत्याद्या: सहस्रशः । स्मृतयः च — ‘ अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ' ‘ इहैव तैर्जितः सर्गे येषां साम्ये स्थितं मनः ' ' समं पश्यन्हि सर्वत्र ' इत्याद्याः । न्यायतः च — ' सर्पान्कुशाग्राणि तथोदपानं ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति । अज्ञानतस्तत्र पतन्ति केचिज्ज्ञाने फलं पश्य तथा विशिष्टम् ॥ ' ( महा ० शा ० २०१ । १७ ) तथा च देहादिषु आत्मबुद्धिः अविद्वान् रागद्वेषादिप्रयुक्तो धर्माधर्मानुष्ठानकृद् जायते म्रियते च इति अवगम्यते, देहादिव्यतिरिक्तात्मदर्शिनो रागद्वेषादिप्रहाणापेक्षधर्माधर्मप्रवृत्त्युपशमाद् मुच्यन्ते इति न केनचित् प्रत्याख्यातुं शक्यं न्यायतः । इसके सिवा श्रुति, स्मृति और न्यायसे भी यही सिद्ध होता है कि विद्याके द्वारा कार्यसहित अविद्याका नाश करना चाहिये । इस विषयमें ये श्रुतियाँ ' यहाँ यदि जान लिया तो बहुत ठीक है और यदि यहाँ नहीं जाना तो बड़ी भारी हानि है ' ' उसको इस प्रकार जाननेवाला यहाँ अमृत हो जाता है ' ' परमपदकी प्राप्तिके लिये ( विद्याके सिवा ) अन्य मार्ग नहीं है ' ' विद्वान् किसीसे भी भयभीत नहीं होता । ' किंतु अज्ञानीके विषयमें ( कहा है कि ) ' उसको भय होता है ' ' जो कि अविद्याके बीचमें ही पड़े हुए हैं ' ' जो ब्रह्मको जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ' ' यह देव अन्य है और मैं अन्य हूँ इस प्रकार जो समझता है वह आत्मतत्त्वको नहीं जानता जैसे ( मनुष्योंका ) पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है ' किंतु जो आत्मज्ञानी है ( उसके विषयमें ) ' वह यह सब कुछ हो जाता है ' ' यदि आकाशको चर्मके समान लपेटा जा सके ' इत्यादि सहस्रों श्रुतियाँ हैं । तथा ये स्मृतियाँ भी हैं - ' ज्ञान अज्ञानसे ढँका हुआ है, इसलिये जीव मोहित हो रहे हैं ' ' जिनका चित्त समतामें स्थित है उन्होंने यहीं संसारको जीत लिया है ' ' सर्वत्र समानभावसे देखता हुआ ' इत्यादि । युक्तिसे भी यह बात सिद्ध है । जैसे कहा है कि ' सर्प, कुश - कण्टक और तालाबको जान लेनेपर मनुष्य उनसे बच जाते हैं, किंतु बिना जाने कई एक उनमें गिर जाते हैं, इस न्यायसे ज्ञानका जो विशेष फल है उसको समझ । ' इस प्रकार उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह ज्ञात होता है कि देहादिमें आत्मबुद्धि करनेवाला अज्ञानी राग-द्वेषादि दोषोंसे प्रेरित होकर धर्म - अधर्मरूप कर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ जन्मता और मरता रहता है, किंतु देहादिसे अतिरिक्त आत्माका साक्षात् करनेवाले पुरुषोंके राग - द्वेषादि दोष निवृत्त हो जाते हैं, इससे उनकी धर्माधर्मविषयक प्रवृत्ति शान्त हो जानेसे वे मुक्त हो जाते हैं । इस बातका कोई भी न्यायानुसार विरोध नहीं कर सकता ।
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३०२ * श्रीमद्भगवद्गीता * तत्र एवं सति क्षेत्रज्ञस्य ईश्वरस्य एव सतः अविद्याकृतोपाधिभेदतः संसारित्वम् इव भवति । यथा देहाद्यात्मत्वम् आत्मन: । सर्वजन्तूनां हि प्रसिद्धो देहादिषु अनात्मसु आत्मभावो निश्चितः अविद्याकृतः । यथा स्थाणौ पुरुषनिश्चयो न च एतावता पुरुषधर्मः स्थाणोः भवति स्थाणुधर्मो वा पुरुषस्य तथा न चैतन्यधर्मो देहस्य देहधर्मो वा चेतनस्य । सुखदुःखमोहात्मकत्वादि: आत्मनो न युक्तः अविद्याकृतत्वाविशेषाद् जरामृत्युवत् । न अतुल्यत्वाद् इति चेत्, स्थाणुपुरुषौ ज्ञेयौ एव सन्तौ ज्ञात्रा अन्योन्यस्मिन् अध्यस्तौ अविद्यया देहात्मनोः तु ज्ञेयज्ञात्रोः एव इतरेतराध्यास इति न समो दृष्टान्तः अतो देहधर्मो ज्ञेयः अपि ज्ञातुः आत्मनो भवति इति चेत् । न अचैतन्यादिप्रसङ्गात् । यदि हि ज्ञेयस्य देहादेः क्षेत्रस्य धर्माः सुखदुःखमोहेच्छादयो ज्ञातुः भवन्ति तर्हि ज्ञेयस्य क्षेत्रस्य धर्माः केचन आत्मनो भवन्ति अविद्याध्यारोपिता जरामरणादयः तु न भवन्ति इति विशेषहेतुः वक्तव्यः । न भवन्ति इति अस्ति अनुमानम् अविद्या-ध्यारोपितत्वाद् जरादिवद् इति हेयत्वाद उपादेयत्वात् च इत्यादि । अतः यह सिद्ध हुआ कि जो वास्तवमें ईश्वर ही है उस क्षेत्रज्ञको अविद्याद्वारा आरोपित उपाधिके भेदसे संसारित्व प्राप्त - सा हो जाता है, जैसे कि जीवको देहादिमें आत्मबुद्धि हो जाती है; क्योंकि समस्त जीवोंका जो देहादि अनात्म- पदार्थोंमें आत्मभाव प्रसिद्ध है, वह नि: संदेह अविद्याकृत ही है । जैसे स्तम्भमें मनुष्यबुद्धि हो जाती है, परंतु इतनेहीसे मनुष्यके धर्म स्तम्भमें और स्तम्भके धर्म मनुष्यमें नहीं आ जाते, वैसे ही चेतनके धर्म देहमें और देहके धर्म चेतनमें नहीं आ सकते । जरा और मृत्युके समान ही अविद्याके कार्य होनेसे सुख - दुःख और अज्ञान आदि भी उन्हींकी भाँति आत्माके धर्म नहीं हो सकते । पू ० – यदि ऐसा माने कि विषम होनेके कारण यह दृष्टान्त ठीक नहीं है अर्थात् स्तम्भ और पुरुष दोनों ज्ञेय वस्तु हैं, उनमें अविद्यावश ज्ञाताद्वारा एकमें एकका अध्यास किया गया है; परंतु देह और आत्मामें तो ज्ञेय और ज्ञाताका ही एक - दूसरेमें अध्यास होता है, इसलिये यह दृष्टान्त सम नहीं है, अतः यह सिद्ध होता है कि देहका ज्ञेयरूप ( सुख-दुःखादि ) धर्म भी ज्ञाता - आत्मामें होता है । उ ० — इसमें आत्माको जड़ मानने आदिका प्रसङ्ग आ जाता है, इसलिये ऐसा मानना ठीक नहीं है; क्योंकि यदि ज्ञेयरूप शरीरादि - क्षेत्रक सुख, दुःख, मोह और इच्छादि धर्म ज्ञाता ( आत्मा ) -के भी होते हैं, तो यह बतलाना चाहिये कि ज्ञेयरूप क्षेत्रके अविद्याद्वारा आरोपित कुछ धर्म तो आत्मामें होते हैं और कुछ— ' जरा - मरणादि ' नहीं होते, इस विशेषताका कारण क्या है? बल्कि, ऐसा अनुमान तो किया जा सकता है कि जरा आदिके समान अविद्याद्वारा आरोपित और त्याज्य तथा ग्राह्य होनेके कारण ये सुख - दुःखादि ( आत्माके धर्म ) नहीं हैं ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३०३ तव एवं सति कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः संसारो ज्ञेयस्थो ज्ञातरि अविद्यया अध्यारोपित इति न तेन ज्ञातुः किञ्चिद् दुष्यति । यथा बालैः अध्यारोपितेन आकाशस्य तलमलवत्त्वादिना । एवं च सति सर्वक्षेत्रेषु अपि सतो भगवतः क्षेत्रज्ञस्य ईश्वरस्य संसारित्वगन्धमात्रम् अपि न आशङ्क्यम् । न हि क्वचिद् अपि लोके अविद्याध्यस्तेन धर्मेण कस्यचिद् उपकारो अपकारो वा दृष्टः । यत् तु उक्तं न समो दृष्टान्त इति तद् असत् । कथम्— अविद्याध्यासमात्रं हि दृष्टान्तदाष्टन्तिकयोः साधर्म्यं विवक्षितम् । तद् न व्यभिचरति यत् तु ज्ञातरि व्यभिचरति इति मन्यसे तस्य अपि अनैकान्तिकत्वं दर्शितं जरादिभिः । अविद्यावत्त्वात् क्षेत्रज्ञस्य संसारित्वम् इति चेत् । न, अविद्यायाः तामसत्वात् । तामसो हि प्रत्यय आवरणात्मकत्वाद् अविद्या, विपरीत-ग्राहकः संशयोपस्थापको वा अग्रहणात्मको वा । विवेकप्रकाशभावे तदभावात् । तामसे च आवरणात्मके तिमिरादिदोषे सति अग्रहणादे: अविद्यात्रयस्य उपलब्धेः । ऐसा होनेसे यह सिद्ध हुआ कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप यह संसार ज्ञेय वस्तुमें स्थित हुआ ही अविद्याद्वारा ज्ञातामें अध्यारोपित है, अत: उससे ज्ञाताका कुछ भी नहीं बिगड़ता, जैसे कि मूर्खोद्वारा अध्यारोपित तल - मलिनतादिसे आकाशका ( कुछ भी नहीं बिगड़ता ) । अतः सब शरीरोंमें रहते हुए भी भगवान् क्षेत्रज्ञ ईश्वरमें संसारीपनके गन्धमात्रकी भी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि संसारमें कहीं भी अविद्याद्वारा आरोपित धर्मसे किसीका भी उपकार या अपकार होता नहीं देखा जाता । तुमने जो यह कहा था कि ( स्तम्भमें मनुष्यके भ्रमका ) दृष्टान्त सम नहीं है सो ( यह कहना ) भूल है । पू ० – कैसे? उ ० — अविद्याजन्य अध्यासमात्रमें ही दृष्टान्त और दार्ष्टान्तकी समानता विवक्षित है । उसमें कोई दोष नहीं आता । परंतु तुम जो यह मानते हो कि ज्ञातामें दृष्टान्त और दाष्टन्तिकी विषमताका दोष आता है, तो उसका भी अपवाद, जरा - मृत्यु आदिके दृष्टान्तसे दिखला दिया गया है I पू ० - यदि ऐसा कहें कि अविद्या- युक्त होनेसे क्षेत्रज्ञको ही संसारित्व प्राप्त हुआ, तो? उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि अविद्या तामस प्रत्यय है । तामस प्रत्यय, चाहे विपरीत ग्रहण करनेवाला ( विपर्यय ) हो, चाहे संशय उत्पन्न करनेवाला ( संशय ) हो और चाहे कुछ भी ग्रहण न करनेवाला हो, आवरणरूप होनेके कारण वह अविद्या ही है; क्योंकि विवेकरूप प्रकाशके होनेपर वह दूर हो जाता है तथा आवरणरूप तमोमय तिमिरादि दोषोंके रहते हुए ही अग्रहण आदिरूप तीन प्रकारकी अविद्याका अस्तित्व उपलब्ध होता है ।
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३०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * अत्र आह एवं तर्हि ज्ञातृधर्मः अविद्या । न करणे चक्षुषि तैमिरिकत्वादिदोषोपलब्धेः यत् तु मन्यसे ज्ञातृधर्मः अविद्या तद् एव च अविद्याधर्मवत्त्वं क्षेत्रज्ञस्य संसारित्वम् । तत्र यद् उक्तम् ईश्वर एव क्षेत्रज्ञो न संसारी इति एतद् अयुक्तम् इति । तद् न, यथा करणे चक्षुषि विपरीतग्राहकादिदोषस्य दर्शनाद् न विपरीतादिग्रहणं तन्निमित्तो वा तैमिरिकत्वादिदोषो ग्रहीतुः । चक्षुषः संस्कारेण तिमिरे अपनीते ग्रहीतुः अदर्शनाद् न ग्रहीतुः धर्मो यथा तथा सर्वत्र एव अग्रहणविपरीतसंशयप्रत्ययाः तन्निमित्ताः करणस्य एव कस्यचिद् भवितुम् अर्हन्ति न ज्ञातुः क्षेत्रज्ञस्य | संवेद्यत्वात् च तेषां प्रदीपप्रकाशवद् न ज्ञातृधर्मत्वम् । संवेद्यत्वाद् एव स्वात्म-व्यतिरिक्तसंवेद्यत्वम् । सर्वकरणवियोगे च कैवल्ये सर्ववादिभिः अविद्यादिदोषवत्त्वानभ्युपगमात् । आत्मनो यदि क्षेत्रज्ञस्य अग्न्युष्णवत् स्वो धर्मः ततो न कदाचिद् अपि तेन वियोग: स्यात् । अविक्रियस्य च व्योमवत् सर्वगतस्य अमूर्तस्य आत्मनः केनचित् संयोगवियोगा-नुपपत्तेः । सिद्धं क्षेत्रज्ञस्य नित्यम् एव ईश्वरत्वम् । पू ० – यदि यह बात है तब तो अविद्या ज्ञाताका धर्म हुआ? उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि तिमिर-रोगादिजन्य दोष चक्षु आदि करणोंमें ही देखे जाते हैं ( ज्ञाता आत्मामें नहीं ) । जो तुम ऐसा मानते हो कि ' अविद्या ज्ञाताका धर्म है और अविद्यारूप धर्मसे युक्त होना ही उसका संसारित्व है, इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि ईश्वर ही क्षेत्रज्ञ है और वह संसारी नहीं है ' सो तुम्हारा ऐसा मानना युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि नेत्ररूप करणमें विपरीत ग्राहकता आदि दोष देखे जाते हैं तो भी वे विपरीतादि ग्रहण या उनके कारणरूप तिमिरादि दोष ज्ञाताके नहीं हो जाते ( उसी प्रकार देहके धर्म भी आत्मा नहीं हो सकते ) । तथा जैसे आँखका संस्कार करके तिमिरादि प्रतिबन्धको हटा देनेपर ग्रहीता पुरुषमें वे दोष नहीं देखे जाते, इसलिये वे ग्रहीता पुरुषके धर्म नहीं हैं, वैसे ही अग्रहण, विपरीत - ग्रहण और संशय आदि प्रत्यय तथा उनके कारणरूप तिमिरादि दोष भी सर्वत्र किसी - न - किसी करणके ही हो सकते हैं - ज्ञाता पुरुषके अर्थात् क्षेत्रज्ञके नहीं । इसके सिवा वे जाननेमें आनेवाले ( ज्ञानके विषय ) होनेसे भी दीपकके प्रकाशकी भाँति ज्ञाताके धर्म नहीं हो सकते; क्योंकि वे ज्ञेय हैं, > इसलिये अपनेसे अतिरिक्त किसी अन्यद्वारा जाननेमें आनेवाले हैं । सभी आत्मवादी समस्त करणोंसे आत्माका वियोग होनेके उपरान्त कैवल्य अवस्थामें आत्माको अविद्यादि दोषोंसे रहित मानते हैं, इससे भी ( उपर्युक्त सिद्धान्त ही सिद्ध होता है ); क्योंकि यदि अग्निकी उष्णताके समान ये ( सुख - दुःखादि दोष ) क्षेत्रज्ञ आत्माके अपने धर्म हों तो उनसे उसका कभी वियोग नहीं हो सकेगा । इसके सिवा आकाशकी भाँति सर्वव्यापक, मूर्ति-रहित, निर्विकार आत्माका किसीके साथ संयोग-वियोग होना सम्भव नहीं है, इससे भी क्षेत्रज्ञकी नित्य ईश्वरता ही सिद्ध होती है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३०५ 4 अनादित्वान्निर्गुणत्वात् ' इत्यादि ईश्वरवचनात् च । ननु एवं सति संसार संसारित्वाभावे शास्त्रानर्थक्यादिदोषः स्याद् इति । न सर्वैः अभ्युपगतत्वात् । सर्वैः हि आत्मवादिभिः अभ्युपगतो दोषो न एकेन परिहर्तव्यो भवति । कथम् अभ्युपगत इति । मुक्तात्मनां संसारसंसारित्वव्यवहाराभावः सर्वैः एव आत्मवादिभिः इष्यते । न च तेषां शास्त्रानर्थक्यादिदोषप्राप्तिः अभ्युपगता । तथा नः क्षेत्रज्ञानाम् ईश्वरैकत्वे सति शास्त्रानर्थक्यं भवतु ॥ अविद्याविषये च अर्थवत्त्वम् । यथा द्वैतिनां सर्वेषां बन्धावस्थायाम् एव शास्त्राद्यर्थवत्त्वं न मुक्तावस्थायाम् एवम् । ननु आत्मनो बन्धमुक्तावस्थे परमार्थत एव वस्तुभूते द्वैतिनां नः सर्वेषाम्, अतो हेयोपादेयतत्साधनसद्भावे शास्त्राद्यर्थवत्त्वं स्यात्, अद्वैतिनां पुनः द्वैतस्य अपरमार्थत्वाद् अविद्याकृतत्वाद् बन्धावस्थायाः च आत्मनः अपरमार्थत्वे निर्विषयत्वाद् शास्त्राद्यानर्थक्यम् इति चेत् । न, आत्मनः अवस्थाभेदानुपपत्तेः । यदि तावद् आत्मनो बन्धमुक्तावस्थे युगपत् स्यातां क्रमेण वा । तथा ‘ अनादित्वान्निर्गुणत्वात् ' इत्यादि भगवान्के वचनोंसे भी क्षेत्रज्ञका नित्य ईश्वरत्व ही सिद्ध होता है । पू ० – - ऐसा मान लेनेपर तो संसार और संसारित्वका अभाव हो जानेके कारण शास्त्रकी व्यर्थता आदि दोष उपस्थित होंगे? उ ० – नहीं; क्योंकि यह दोष तो सभीने स्वीकार किया है । सभी आत्मवादियोंद्वारा स्वीकार किये हुए दोषका किसी एकके लिये ही परिहार करना आवश्यक नहीं है । पू ० – इसे सबने कैसे स्वीकार किया है? उ ० — सभी आत्मवादियोंने मुक्त आत्मामें संसार और संसारीपनके व्यवहारका अभाव माना है, परंतु ( इससे ) उनके मतमें शास्त्रकी अनर्थकता आदि दोषोंकी प्राप्ति नहीं मानी गयी । जैसे समस्त द्वैतवादियोंके मतसे बन्धावस्थामें ही शास्त्र आदिकी सार्थकता है मुक्त - अवस्थामें नहीं, वैसे ही हमारे मतमें भी जीवोंकी ईश्वरके साथ एकता हो जानेपर यदि शास्त्रकी व्यर्थता होती हो तो हो, अविद्यावस्थामें तो उसकी सार्थकता है ही । पू ० - हम सब द्वैतवादियोंके सिद्धान्तसे तो आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था वास्तवमें ही सच्ची है । अतः वे हेय, उपादेय हैं और उनके सब साधन भी सत्य हैं । इस कारण शास्त्रकी सार्थकता हो सकती है । परंतु अद्वैतवादियोंके सिद्धान्तसे तो द्वैतभाव अविद्या - जन्य और मिथ्या है, अतः आत्मामें बन्धावस्था भी वास्तवमें नहीं है, इसलिये शास्त्रका कोई विषय न रहनेके कारण शास्त्र आदिकी व्यर्थताका दोष आता है । उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्माके अवस्थाभेद सिद्ध नहीं हो सकते, यदि ( आत्मामें इनका होना ) मान भी लें तो आत्माकी ये बन्ध और मुक्त दोनों अवस्थाएँ एक साथ होनी चाहिये या क्रमसे?
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३०६ * श्रीमद्भगवद्गीता * युगपत् तावद् विरोधाद् न सम्भवतः स्थितिगती इव एकस्मिन् । क्रमभावित्वे च निर्निमित्तत्वे अनिर्मोक्षप्रसङ्गः अन्य-निमित्तत्वे च स्वतः अभावाद् अपरमार्थत्व-प्रसङ्गः । तथा च सति अभ्युपगमहानिः । किं च बन्धमुक्तावस्थयोः पौर्वापर्य-निरूपणायां बन्धावस्था पूर्वं प्रकल्प्या अनादि-मती अन्तवती च तत् च प्रमाणविरुद्धं तथा मोक्षावस्था आदिमती अनन्ता च प्रमाणविरुद्धा एव अभ्युपगम्यते । न च अवस्थावतः अवस्थान्तरं गच्छतो नित्यत्वम् उपपादयितुं शक्यम् । अथ अनित्यत्वदोषपरिहाराय बन्धमुक्तावस्था-भेदो न कल्प्यते अतो द्वैतिनाम् अपि शास्त्रानर्थक्यादिदोषः अपरिहार्य एव इति समानत्वाद् न अद्वैतवादिना परिहर्तव्यो दोषः । न च शास्त्रानर्थक्यं यथाप्रसिद्धा-विद्वत्पुरुषविषयत्वात् शास्त्रस्य । अविदुषां हि फलहेत्वोः अनात्मनोः आत्मदर्शनम्, न विदुषाम् । विदुषां हि फलहेतुभ्याम् आत्मनः अन्यत्व-दर्शने सति तयोः अहम् इति आत्मदर्शना-नुपपत्तेः । स्थिति और गतिकी भाँति परस्परविरोध होनेके कारण दोनों अवस्थाएँ एक साथ तो एकमें हो नहीं सकतीं । यदि क्रमसे होना मानें तो बिना निमित्तके बन्धावस्थाका होना माननेसे तो उससे कभी छुटकारा न होनेका प्रसङ्ग आ जायगा और किसी निमित्तसे उसका होना मानें तो स्वतः न होनेके कारण वह मिथ्या ठहरती है । ऐसा होनेपर स्वीकार किया हुआ सिद्धान्त कट जाता है । इसके सिवा बन्धावस्था और मुक्तावस्थाका आगा-पीछा निरूपण किया जानेपर पहले बन्धावस्थाका होना माना जायगा तथा उसे आदिरहित और अन्तयुक्त मानना पड़ेगा; सो यह प्रमाणविरुद्ध है, ऐसे ही मुक्तावस्थाको भी आदियुक्त और अन्तरहित प्रमाणविरुद्ध ही मानना पड़ेगा । तथा आत्माकी अवस्थावाला और एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें जानेवाला मानकर उसका नित्यत्व सिद्ध करना भी सम्भव नहीं है । जब कि आत्मामें अनित्यत्वके दोषका परिहार करनेके लिये बन्धावस्था और मुक्तावस्थाके भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती । इसलिये द्वैतवादियोंके मतसे भी शास्त्रकी व्यर्थता आदि दोष अबाध्य ही हैं । इस प्रकार दोनोंके लिये समान होनेके कारण इस दोषका परिहार केवल अद्वैतवादियोंद्वारा ही किया जाना आवश्यक नहीं है । ( हमारे मतानुसार तो वास्तवमें ) शास्त्रकी व्यर्थता है भी नहीं; क्योंकि शास्त्र लोकप्रसिद्ध अज्ञानीका ही विषय है । अज्ञानियोंका ही फल और हेतुरूप * अनात्म-वस्तुओंमें आत्मभाव होता है, विद्वानोंका नहीं । क्योंकि विद्वान्की बुद्धिमें फल और हेतुसे आत्माका पृथक्त्व प्रत्यक्ष है, इसलिये उसका उन- ( अनात्म-पदार्थों ) में ‘ यह मैं हूँ ' ऐसा आत्मभाव नहीं हो सकता । * जाति, आयु और भोगका नाम फल है और शुभाशुभ कर्म उसके हेतु यानी कारण हैं ।
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* शांकरभाष्य न हि अत्यन्तमूढ उन्मत्तादिः अपि जलाग्न्योः छायाप्रकाशयोः वा ऐकात्म्यं पश्यति किमुत विवेकी । तस्माद् न विधिप्रतिषेधशास्त्रं तावत् फलहेतुभ्याम् आत्मनः अन्यत्वदर्शिनो भवति । न हि देवदत्त त्वम् इदं कुरु इति कस्मिंश्चित् कर्मणि नियुक्ते विष्णुमित्रः अहं नियुक्त इति तत्रस्थो नियोगं शृण्वन् अपि प्रतिपद्यते । नियोगविषयविवेकाग्रहणात् तु उपपद्यते प्रति-पत्तिः यथा फलहेत्वोः अपि । ननु प्राकृतसम्बन्धापेक्षया युक्ता एव प्रति-पत्तिः शास्त्रार्थविषया फलहेतुभ्याम् अन्यात्मत्व-दर्शने अपि सति इष्टफलहेतौ प्रवर्तितः अस्मि अनिष्टफलहेतोः च निवर्तितः अस्मि इति । यथा पितृपुत्रादीनाम् इतरेतरात्मान्यत्वदर्शने सति अपि अन्योन्यनियोगप्रतिषेधार्थ प्रतिपत्तिः । न व्यतिरिक्तात्मदर्शनप्रतिपत्तेः प्राग् एव फलहेत्वोः आत्माभिमानस्य सिद्धत्वात् । प्रतिपन्ननियोगप्रतिषेधार्थौ हि फलहेतुभ्याम् आत्मनः अन्यत्वं प्रतिपद्यते न पूर्वम्, तस्माद् विधिप्रतिषेधशास्त्रम् अविद्वद्विषयम् इति सिद्धम् । ननु ' स्वर्गकामो यजेत ' ' कलञ्जं न भक्षयेत् ' इत्यादौ आत्मव्यतिरेकदर्शिनाम् अप्रवृत्तौ अध्याय १३ * ३०७ अत्यन्त मूढ़ और उन्मत्त आदि भी जल और अग्निकी या छाया और प्रकाशकी एकता नहीं मानते, फिर विवेकीकी तो बात ही क्या है? सुतरां फल और हेतुसे आत्माको भिन्न समझ लेनेवाले ज्ञानीके लिये विधि - निषेधविषयक शास्त्र नहीं है । जैसे ‘ हे देवदत्त! तू अमुक कार्य कर ' इस प्रकार किसी कर्ममें ( देवदत्तके ) नियुक्त किये जानेपर वहीं खड़ा हुआ विष्णुमित्र उस नियुक्तिको सुनकर भी, यह नहीं समझता कि मैं नियुक्त किया गया हूँ । हाँ, नियुक्तिविषयक विवेकका स्पष्ट ग्रहण न होनेसे तो ऐसा समझना ठीक हो सकता है, इसी प्रकार फल और हेतुमें भी ( अज्ञानियोंकी आत्मबुद्धि हो सकती है ) । पू ० – फल और हेतुसे आत्माके पृथक्त्वका ज्ञान हो जानेपर भी, स्वाभाविक सम्बन्धकी अपेक्षासे शास्त्रविषयक इतना बोध होना तो युक्तियुक्त ही है कि ' मैं शास्त्रद्वारा अनुकूल फल और उसके हेतुमें तो प्रवृत्त किया गया हूँ और प्रतिकूल फल और उसके हेतुसे निवृत्त किया गया हूँ ', जैसे कि पिता - पुत्र आदिका आपसमें एक - दूसरेको भिन्न समझते हुए भी एक - दूसरेके लिये किये हुए नियोग और प्रतिषेधको अपने लिये समझना देखा जाता है । उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्माके पृथक्त्वका ज्ञान होनेसे पहले - पहले ही फल और हेतुमें आत्माभिमान होना सिद्ध है । नियोग और प्रतिषेधके अभिप्रायको भली प्रकार जानकर ही मनुष्य फल और हेतुसे आत्माके पृथक्त्वको जान सकता है, उससे पहले नहीं । इससे सिद्ध हुआ कि विधिनिषेधरूप शास्त्र केवल अज्ञानीके लिये ही है । पू०— ( इस सिद्धान्तके अनुसार ) ' स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे ' ' मांस भक्षण न करे ' इत्यादि विधि - निषेध - बोधक शास्त्र - वचनोंमें आत्माका पृथक्त्व जाननेवालोंकी और केवल देहात्मवादियोंकी भी प्रवृत्ति
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३०८ * श्रीमद्भगवद्गीता * केवलदेहाद्यात्मदृष्टीनां च, अतः कर्तुः अभावात् । शास्त्रानर्थक्यम् इति चेत् । न, यथाप्रसिद्धित एव प्रवृत्तिनिवृत्त्युपपत्तेः । ईश्वरक्षेत्रज्ञैकत्वदर्शी, ब्रह्मवित् तावद् न प्रवर्तते । तथा नैरात्म्यवादी अपि न अस्ति परलोक इति न प्रवर्तते । यथाप्रसिद्धित: तु विधिप्रतिषेधशास्त्रश्रवणान्यथानुपपत्त्या अनुमितात्मास्तित्व आत्मविशेषानभिज्ञः कर्मफलसञ्जाततृष्णः श्रद्दधानतया च प्रवर्तत इति सर्वेषां नः प्रत्यक्षम्, अतो न शास्त्रानर्थक्यम् । विवेकिनाम् अप्रवृत्तिदर्शनात् तदनुगामिनाम् अप्रवृत्तौ शास्त्रानर्थक्यम् इति चेत् । न, कस्यचिद् एव विवेकोपपत्तेः । अनेकेषु हि प्राणिषु कश्चिद् एव विवेकी स्याद् यथा इदानीम् । न च विवेकिनम् अनुवर्तन्ते मूढा रागादिदोषतन्त्रत्वात् प्रवृत्तेः । अभिचरणादौ च प्रवृत्तिदर्शनात् । स्वाभाव्यात् च प्रवृत्तेः । ' स्वभावः तु प्रवर्तते ' इति हि उक्तम् । तस्माद् अविद्यामात्रं संसारो यथादृष्टविषय एव । न क्षेत्रज्ञस्य केवलस्य अविद्या तत्कार्यं च । न होनेसे कर्ताका अभाव हो जानेके कारण शास्त्रके व्यर्थ होनेका प्रसङ्ग आ जायगा? उ ० — यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रवृत्ति और निवृत्तिका होना लोकप्रसिद्धिसे ही प्रत्यक्ष है । ईश्वर और जीवात्माकी एकता देखनेवाला ब्रह्मवेत्ता कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं होता तथा आत्मसत्ताको न माननेवाला देहात्मवादी भी ' परलोक नहीं है ' ऐसा समझकर शास्त्रानुसार नहीं बर्तता यह ठीक है; परंतु लोकप्रसिद्धिसे यह तो हम सबको प्रत्यक्ष है ही कि विधि - निषेध - बोधक शास्त्र - श्रवणकी दूसरी तरह उपपत्ति न होनेके कारण जिसने आत्माके अस्तित्वका अनुमान कर लिया है एवं जो आत्माके असली तत्त्वका ज्ञाता नहीं है; जिसकी कर्मोंके फलमें तृष्णा है, ऐसा मनुष्य श्रद्धालुताके कारण ( शास्त्रानुसार कर्मोंमें ) प्रवृत्त होता है । अतः शास्त्रकी व्यर्थता नहीं है । पू ० - विवेकशील पुरुषोंकी प्रवृत्ति न देखनेसे उनका अनुकरण करनेवालोंकी भी ( शास्त्रविहित कर्मोंमें ) प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः शास्त्र व्यर्थ हो जायगा । उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि किसी एकको ही विवेक - ज्ञान प्राप्त होता है । अर्थात् अनेक प्राणियोंमेंसे कोई एक ही विवेकी होता है जैसा कि आजकल ( देखा जाता है ) । इसके सिवा मूढ़लोग विवेकियोंका अनुकरण भी नहीं करते; क्योंकि प्रवृत्ति रागादि दोषोंके अधीन हुआ करती है । ( प्रतिहिंसाके उद्देश्यसे किये जानेवाले जारण - मारण आदि ) अभिचारोंमें भी लोगोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है तथा प्रवृत्ति स्वाभाविक है । यह कहा भी है कि ' स्वभाव ही बर्तता है । ' सुतरां यह सिद्ध हुआ कि संसार अविद्यामात्र ही है और वह अज्ञानियोंका ही विषय है । केवल शुद्ध क्षेत्रज्ञमें अविद्या और उसके कार्य दोनों ही नहीं हैं ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३० ९ न च मिथ्याज्ञानं परमार्थवस्तु दूषयितुं समर्थम् । न हि ऊषरदेशं स्नेहेन पङ्कीकर्तुं शक्नोति मरीच्युदकं तथा अविद्या क्षेत्रज्ञस्य न किञ्चित् कर्तुं शक्नोति । अतः च इदम् उक्तम् ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ', ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् ' इति च । अथ किम् इदम् संसारिणाम् इव अहम् एवं मम एव इदम् इति पण्डितानाम् अपि । शृणु इदं तत् पाण्डित्यं यत् क्षेत्रे एव आत्म-दर्शनम् । यदि पुनः क्षेत्रज्ञम् अविक्रियं पश्येयुः ततो न भोगं कर्म वा आकाङ्क्षेयुः मम स्याद् इति । विक्रिया एव भोगकर्मणी । अथ एवं सति फलार्थित्वाद् अविद्वान् प्रवर्तते । विदुषः पुनः अविक्रियात्मदर्शिनः फलार्थित्वाभावात् प्रवृत्त्यनुपपत्तौ कार्यकरण-सङ्घातव्यापारोपरमे निवृत्ति: उपचर्यते । इदं च अन्यत् पाण्डित्यं कस्यचिद् अस्तु क्षेत्रज्ञ ईश्वर एवं क्षेत्रं च अन्यत् क्षेत्रज्ञस्य विषयः । अहं तु संसारी सुखी दुःखी च । संसारोपरमः च मम कर्तव्यः क्षेत्रक्षेत्रज्ञ -विज्ञानेन ध्यानेन च ईश्वरं क्षेत्रज्ञं साक्षात् कृत्वा तत्स्वरूपावस्थानेन इति । यः च एवं बुध्यते यः च बोधयति न असौ क्षेत्रज्ञ इति ॥ एवं मन्वानो यः स पण्डितापसद: संसारमोक्षयोः शास्त्रस्य च अर्थवत्त्वं करोमि इति । तथा मिथ्याज्ञान परमार्थवस्तुको दूषित करनेमें समर्थ भी नहीं है । क्योंकि जैसे ऊसर भूमिको मृगतृष्णिकाका जल अपनी आर्द्रतासे कीचड़युक्त नहीं कर सकता, वैसे ही अविद्या भी क्षेत्रज्ञका कुछ भी ( उपकार या अपकार ) करनेमें समर्थ नहीं है, इसीलिये ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ' और ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् ' यह कहा है । पू ० – तो फिर यह क्या बात है कि संसारी पुरुषोंकी भाँति पण्डितोंको भी ' मैं ऐसा हूँ ' ' यह वस्तु मेरी ही है ' ऐसी प्रतीति होती है । उ ० – सुनो, यह पाण्डित्य बस इतना ही है जो कि क्षेत्रमें ही आत्माको देखना है; परंतु यदि मनुष्य क्षेत्रज्ञको निर्विकारी समझ ले तो फिर ' मुझे अमुक भोग मिले ' या ' मैं अमुक कर्म करूँ ' ऐसी आकाङ्क्षा नहीं कर सकता, क्योंकि भोग और कर्म दोनों विकार ही तो हैं । सुतरां यह सिद्ध हुआ कि फलेच्छुक होनेके कारण अज्ञानी कर्मोंमें प्रवृत्त होता है; परंतु विकाररहित आत्माका साक्षात् कर लेनेवाले ज्ञानीमें फलेच्छाका अभाव होनेके कारण, उसकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं, अतः कार्य - करण - संघातके व्यापारकी निवृत्ति होनेपर उस ( ज्ञानी ) - में निवृत्तिका उपचार किया जाता है । किसी - किसीके मतमें यह एक प्रकारकी विद्वत्ता और भी हो सकती है कि क्षेत्रज्ञ तो ईश्वर ही है और उस क्षेत्रज्ञके ज्ञानका विषय क्षेत्र उससे अलग है तथा मैं तो ( उन दोनोंसे भिन्न ) संसारी और सुखी - दुःखी भी हूँ । मुझे क्षेत्र - क्षेत्रज्ञके ज्ञान और ध्यानद्वारा ईश्वररूप क्षेत्रज्ञका साक्षात् करके उसके स्वरूपमें स्थित होनारूप साधनसे संसारकी निवृत्ति करनी चाहिये । जो ऐसा समझता है या दूसरेको ऐसा समझाता है कि ' वह ( जीव ) क्षेत्रज्ञ ( ब्रह्म ) नहीं है तथा जो यह मानता है कि मैं ( इस प्रकारके सिद्धान्तसे ) संसार, मोक्ष और शास्त्रकी सार्थकता सिद्ध करूँगा, वह पण्डितोंमें अधम है । '
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३१० * श्रीमद्भगवद्गीता * आत्महा स्वयं मूढः अन्यान् च व्यामोहयति शास्त्रार्थसम्प्रदायरहितत्वात् श्रुतहानिम् अश्रुत-कल्पनां च कुर्वन् । तस्माद् असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविद् अपि मूर्खवद् एव उपेक्षणीयः । यत् तु उक्तम् ईश्वरस्य क्षेत्रज्ञैकत्वे संसारित्वं प्राप्नोति क्षेत्रज्ञानां च ईश्वरैकत्वे संसारिणः अभावात् संसाराभावप्रसङ्ग इति । एतौ दोषौ प्रयुक्तौ विद्याविद्ययोः वैलक्षण्याभ्युपगमाद् इति । कथम्? अविद्यापरिकल्पितदोषेण तद्विषयं वस्तु पारमार्थिकं न दुष्यति इति ॥ तथा च दृष्टान्तो दर्शितो मरीच्यम्भसा ऊषरदेशो न पङ्कीक्रियते इति ॥ संसारिणः अभावात् संसाराभावप्रसङ्ग-दोषः अपि संसारसंसारिणोः अविद्याकल्पित त्वोपपत्त्या प्रयुक्तः । ननु अविद्यावत्त्वम् एव क्षेत्रज्ञस्य संसारित्व-दोषः तत्कृतं च दुःखित्वादि प्रत्यक्षम् उपलभ्यते । न, ज्ञेयस्य क्षेत्रधर्मत्वाद् ज्ञातुः क्षेत्रज्ञस्य तत्कृतदोषानुपपत्तेः । तथा वह आत्महत्यारा, शास्त्रके अर्थकी सम्प्रदायपरम्परासे रहित होनेके कारण, श्रुतिविहित अर्थका त्याग और वेदविरुद्ध अर्थकी कल्पना करके स्वयं मोहित हो रहा है और दूसरोंको भी मोहित करता है । सुतरां जो शास्त्रार्थकी परम्पराको जाननेवाला नहीं है, वह समस्त शास्त्रोंका ज्ञाता भी हो तो भी मूर्खोके समान उपेक्षणीय ही है । और जो यह कहा था कि ईश्वरकी क्षेत्रज्ञके साथ एकता माननेसे तो ईश्वरमें संसारीपन आ जाता है और क्षेत्रज्ञोंकी ईश्वरके साथ एकता माननेसे कोई संसारी न रहनेके कारण संसारके अभावका प्रसङ्ग आ जाता है, सो विद्या और अविद्याकी विलक्षणता-के प्रतिपादनसे इन दोनों दोषोंका ही परिहार कर दिया गया । पू ० – कैसे? उ ० — ‘ अविद्याद्वारा कल्पित किये हुए दोषसे तद्विषयक पारमार्थिक ( असली ) वस्तु दूषित नहीं होती, इस कथनसे पहली शङ्काका निराकरण किया गया और वैसे ही यह दृष्टान्त भी दिखलाया कि मृगतृष्णिकाके जलसे ऊसर भूमि पङ्कयुक्त नहीं की जा सकती । तथा संसारीका अभाव होनेसे संसारके अभावके प्रसङ्गका जो दोष बतलाया था, उसका भी संसार संसारित्वकी अविद्याकल्पित उपपत्तिको स्वीकार करके निराकरण कर दिया गया । ' पू ० - क्षेत्रज्ञका अविद्यायुक्त होना ही तो संसारित्वरूप दोष है, क्योंकि उससे होनेवाले दुःखित्व आदि दोष प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । उ ० — यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि जो कुछ ज्ञेय है — जाननेमें आता है, वह सब क्षेत्रका ही धर्म है, इसलिये उसके किये हुए दोष ज्ञाता क्षेत्रज्ञके नहीं हो सकते ।