श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 311–320

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३११ यावत्किञ्चित् क्षेत्रज्ञस्य दोषजातम् अविद्य-मानम् आसञ्जयसि तस्य ज्ञेयत्वोपपत्तेः क्षेत्र-धर्मत्वम् एव न क्षेत्रज्ञधर्मत्वम् ॥ न च तेन क्षेत्रज्ञो दुष्यति ज्ञेयेन ज्ञातुः संसर्गानुपपत्तेः । यदि हि संसर्गः स्यात् ज्ञेयत्वम् एव न उपपद्येत । यदि आत्मनो धर्मः अविद्यावत्त्वं दुःखित्वादि च कथं भोः प्रत्यक्षम् उपलभ्यते कथं वा क्षेत्रज्ञधर्मः । ज्ञेयं च सर्वं क्षेत्रं ज्ञाता एव क्षेत्रज्ञ इति अवधारिते अविद्यादुःखित्वादेः क्षेत्रज्ञधर्मत्वं तस्य च प्रत्यक्षोपलभ्यत्वम् इति विरुद्धम् उच्यते अविद्यामात्रावष्टम्भात् केवलम् । अत्र आह सा अविद्या कस्य इति । यस्य दृश्यते तस्य एव । कस्य दृश्यते इति । अत्र उच्यते अविद्या कस्य दृश्यते इति प्रश्नो निरर्थकः । कथम्? दृश्यते चेद् अविद्या तद्वन्तम् अपि पश्यसि । न च तद्वति उपलभ्यमाने सा कस्य इति प्रश्नो युक्तः । न हि गोमति उपलभ्यमाने गावः कस्य इति प्रश्नः अर्थवान् भवेत् । ननु विषयो दृष्टान्तो गवां तद्वतः च प्रत्यक्षत्वात् सम्बन्धः अपि प्रत्यक्ष इति प्रश्नो निरर्थकः, न तथा अविद्या तद्वान् च प्रत्यक्षौ यतः प्रश्नो निरर्थकः स्यात् । तू क्षेत्रज्ञपर वास्तवमें बिना हुए ही जो कुछ भी दोष लाद रहा है, वे सब ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्रके ही धर्म हैं, क्षेत्रज्ञके नहीं । उनसे क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) दूषित नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञेयके साथ ज्ञाताका संसर्ग नहीं हो सकता । यदि उनका संसर्ग मान लिया जाय तो ( ज्ञेयका ) ज्ञेयत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता । अभिप्राय यह है कि यदि अविद्यायुक्त होना और दुःखी होना आदि आत्माके धर्म हैं तो वे प्रत्यक्ष कैसे दीखते हैं? और वे क्षेत्रज्ञके धर्म हो भी कैसे सकते हैं? क्योंकि जो कुछ भी ज्ञेय वस्तु है वह सब क्षेत्र है और क्षेत्रज्ञ ज्ञाता है, ऐसा सिद्धान्त स्थापित किये जानेपर फिर अविद्यायुक्त होना और दुःखी होना आदि दोषोंको क्षेत्रज्ञके धर्म बतलाना और उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि भी मानना, यह सब अज्ञानमात्रके आश्रयसे केवल विरुद्ध प्रलाप करना है । पू ० – वह अविद्या किसमें है? उ ० – जिसमें दीखती है उसीमें । पू ० - किसमें दीखती है? उ०— ' अविद्या किसमें दीखती है ' – यह प्रश्न ही निरर्थक है । पू ० – किस प्रकार? उ ० — यदि अविद्या दीखती है तो उससे जो युक्त है उसको भी तू अवश्य देखता ही होगा? फिर अविद्यावान्‌की उपलब्धि हो जानेपर वह अविद्या किसमें है, यह पूछना ठीक नहीं है । क्योंकि गौवालेको देख लेनेपर ' यह गौ किसकी है? ' यह पूछना सार्थक नहीं हो सकता । पू ० — तुम्हारा यह दृष्टान्त विषय है । गौ और उसका स्वामी तो प्रत्यक्ष होनेके कारण उनका सम्बन्ध भी प्रत्यक्ष है, इसलिये ( उनके सम्बन्धके विषयमें ) प्रश्न निरर्थक है, परंतु उनकी भाँति अविद्यावान् और अविद्या तो प्रत्यक्ष नहीं हैं, जिससे कि यह प्रश्न निरर्थक माना जाय?

पृष्ठ 312

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३१२ * श्रीमद्भगवद्गीता * अप्रत्यक्षेण अविद्यावता अविद्यासम्बन्धे ज्ञाते किं तव स्यात् । अविद्याया अनर्थहेतुत्वात् परिहर्तव्या स्यात् । यस्य अविद्या सतां परिहरिष्यति । ननु मम एव अविद्या । जानासि तर्हि अविद्यां तद्वन्तं च आत्मानम् । जानामि न तु प्रत्यक्षेण । अनुमानेन चेद् जानासि कथं सम्बन्ध-ग्रहणम् । न हि तव ज्ञातुः ज्ञेयभूतया अविद्यया तत्काले सम्बन्धो ग्रहीतुं शक्यते । अविद्याया विषयत्वेन एव ज्ञातुः उपयुक्तत्वात् । न च ज्ञातुः अविद्यायाः च सम्बन्धस्य यो ग्रहीता ज्ञानं च अन्यत् तद्विषयं सम्भवति अनवस्थाप्राप्तेः । यदि ज्ञाता अपि ज्ञेयसम्बन्धो ज्ञायेत अन्यो ज्ञाता कल्प्यः स्यात् तस्य अपि अन्यः तस्य अपि अन्य इति अनवस्था अपरिहार्या । यदि पुनः अविद्या ज्ञेया अन्यद् वा ज्ञेयं ज्ञेयम् एव तथा ज्ञाता अपि ज्ञाता एव न ज्ञेयं भवति । तदा च एवम् अविद्यादुःखित्वाद्यैः न ज्ञातुः क्षेत्रज्ञस्य किञ्चिद् दुष्यति । ननु अयम् एव दोषो यद् दोषवत्क्षेत्र-विज्ञातृत्वम् । उ ० — अप्रत्यक्ष अविद्यावान् के साथ अविद्याका सम्बन्ध जान लेनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? पू ० – अविद्या अनर्थकी हेतु है, इसलिये उसका त्याग किया जा सकेगा । उ ० — जिसमें अविद्या है, वह उसका स्वयं त्याग कर देगा । पू ० – मुझमें ही तो अविद्या है । — - तब तो तू अविद्या और उससे युक्त अपने-उ ० आपको जानता है । पू ० – जानता तो हूँ; परंतु प्रत्यक्षरूपसे नहीं । उ ० — यदि अनुमानसे जानता है तो ( तुझ ज्ञाता और अविद्याके ) सम्बन्धका ग्रहण कैसे हुआ? क्योंकि उस समय ( अविद्याको अनुमानसे जाननेके कालमें ) तुझ ज्ञाताका ज्ञेयरूप अविद्याके साथ सम्बन्ध ग्रहण नहीं किया जा सकता, कारण यह है कि ज्ञाताका विषय मानकर ही अविद्याका उपयोग किया गया है । तथा ज्ञाता और अविद्याके सम्बन्धको जो ग्रहण करनेवाला है वह तथा उस ( अविद्या और ज्ञाताके सम्बन्ध ) -को विषय करनेवाला कोई दूसरा ज्ञान ये दोनों ही सम्भव नहीं हैं । क्योंकि ऐसा होनेसे अनवस्थादोष प्राप्त होता है अर्थात् यदि ज्ञाता और ज्ञेय - ज्ञाताका सम्बन्ध ये भी ( किसीके द्वारा ) जाने जाते हैं, ऐसा माना जाय तो उसका ज्ञाता किसी औरको मानना होगा । फिर उसका भी दूसरा और उसका भी दूसरा ज्ञाता मानना होगा, इस प्रकार यह अनवस्था अनिवार्य हो जायगी । परंतु ज्ञेय चाहे अविद्या हो अथवा और कुछ हो, ज्ञेय ज्ञेय ही रहेगा ( ज्ञाता नहीं हो सकता ) वैसे ही ज्ञाता भी ज्ञाता ही रहेगा, ज्ञेय नहीं हो सकता, जब कि ऐसा है तो अविद्या या दु: खित्व आदि दोषोंसे ज्ञाता— क्षेत्रज्ञका कुछ भी दूषित नहीं हो सकता । पू ० – यही उसका दोष है जो कि वह दोषयुक्त क्षेत्रका ज्ञाता है

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३१३ न, विज्ञानस्वरूपस्य एव अविक्रियस्य विज्ञातृत्वोपचारात् । यथा उष्णतामात्रेण अग्नेः तप्तिक्रियोपचारः तद्वत् । यथा अत्र भगवता क्रियाकारकफलात्म-त्वाभाव आत्मनि स्वत एव दर्शितः अविद्याध्या-रोपितैः एव क्रियाकारकादि आत्मनि उपचर्यते तथा तत्र तत्र ‘ य एनं वेत्ति हन्तारम् ' ' प्रकृते: क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वश: ' ' नादत्ते कस्यचित्पापम् ' इत्यादिप्रकरणेषु दर्शितः तथा एव च व्याख्यातम् अस्माभिः उत्तरेषु च प्रकरणेषु दर्शयिष्यामः । हन्त तर्हि आत्मनि क्रियाकारकफलात्म-तायाः स्वतः अभावे अविद्यया च अध्यारोपि -तत्वे कर्माणि अविद्वत्कर्तव्यानि एव न विदुषाम् इति प्राप्तम् । सत्यम् एवं प्राप्तम्, एतद् एव च ' न हि देहभृता शक्यम् ' इति अत्र दर्शयिष्यामः । सर्वशास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे च ' समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ' इति अत्र विशेषतो दर्शयिष्यामः अलम् इह बहुप्रपञ्चेन इति उपसंह्रियते ॥ २ ॥

उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्मा विज्ञानस्वरूप और अविक्रिय है, उसमें ( इस ) ज्ञातापनका उपचारमात्र किया जाता है, जैसे कि उष्णतामात्र स्वभाव होनेसे अग्निमें तपानेकी क्रियाका उपचार किया जाता है । जैसे भगवान्ने यहाँ ( इस प्रकरणमें ) यह दिखाया है कि आत्मामें स्वभावसे ही क्रिया, कारक और फलात्मत्वका अभाव है, केवल अविद्याद्वारा अध्यारोपित होनेके कारण क्रिया, कारक आदि आत्मामें उपचरित होते हैं, वैसे ही, ' जो इसे मारनेवाला जानता है ' ' प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब कर्म किये जाते हैं ' ( वह विभु ) किसीके पाप - पुण्यको ग्रहण नहीं करता ' इत्यादि प्रकरणों में जगह - जगह दिखाया गया है और इसी प्रकार हमने व्याख्या भी की है, तथा आगेके प्रकरणोंमें भी हम दिखलायेंगे । पू ० — तब तो आत्मामें स्वभावसे क्रिया, कारक और फलात्मत्वका अभाव सिद्ध होनेसे तथा ये सब अविद्याद्वारा अध्यारोपित सिद्ध होनेसे यही निश्चय हुआ कि कर्म अविद्वान्‌को ही कर्तव्य है, विद्वान्‌को नहीं । उ ० — ठीक यही सिद्ध हुआ । इसी बातको हम न हि देहभृता शक्यम् ' इस प्रकारणमें और सारे गीता - शास्त्र के उपसंहार - प्रकरणमें दिखलायेंगे । तथा ' समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ' इस

श्लोकके अर्थमें विशेषरूपसे दिखायेंगे । बस, यहाँ

अब और अधिक विस्तारकी आवश्यकता नहीं है, इसलिये उपसंहार किया जाता है ॥ २ ॥

' इदं शरीरम् ' इत्यादि श्लोकोपदिष्टस्य ' इदं शरीरम् ' इत्यादि श्लोकोंद्वारा उपदेश किये क्षेत्राध्यायार्थस्य सङ्ग्रहश्लोकः अयम् उपन्यस्यते हुए क्षेत्राध्यायके अर्थका संक्षेपरूप यह ' तत्क्षेत्रं यच्च ' इत्यादि श्लोक कहा जाता है; क्योंकि जिस अर्थका तत् क्षेत्रं यत् च इत्यादि व्याचिख्यासितस्य हि विस्तारपूर्वक वर्णन करना हो, उसका संक्षेप पहले अर्थस्य सङ्ग्रहोपन्यासो न्याय्य इति । कह देना उचित ही है— तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥

पृष्ठ 314

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३१४ * श्रीमद्भगवद्गीता * यद् निर्दिष्टम् इदं शरीरम् इति तत् तच्छब्देन परामृशति । यत् च इदं निर्दिष्टं क्षेत्रं तद् यादृग् यादृशं स्वकीयैः धर्मैः । च शब्दः समुच्चयार्थो यद्विकारि यो विकारः अस्य तद् यद्विकारि यतो यस्मात् च यत् कार्यम् उत्पद्यते इति वाक्यशेषः । स च यः क्षेत्रज्ञो निर्दिष्टः स यत्प्रभावो ये प्रभावा उपाधिकृताः शक्तयो यस्य स यत्प्रभावः च । तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं यथाविशेषितं समासेन सङ्क्षेपेण मे मम वाक्यतः शृणु श्रुत्वा अवधारय इत्यर्थः ॥ ३ ॥

जिसका पहले ‘ इदं शरीरम् ' इत्यादि ( वाक्य ) से वर्णन किया गया है, यहाँ ' तत् ' शब्दसे उसीका संकेत करते हैं । यह जो पूर्वोक्त क्षेत्र है वह जैसा है अर्थात् अपने धर्मोंके कारण वह जिस प्रकारका है तथा जैसे विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो कार्य उत्पन्न होता है - यहाँ ' च ' शब्द समुच्चयके लिये है; और ' कार्य उत्पन्न होता है ' यह वाक्यशेष है । तथा जिसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है वह भी जिस प्रभाववाला अर्थात् जिन - जिन उपाधिकृत शक्तियोंवाला है, उन क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनोंका उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त यथार्थ स्वरूप तू मुझसे संक्षेपसे सुन अर्थात् सुनकर निश्चय कर ॥ ३ ॥

तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं विवक्षितं श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये, उस कहे जानेवाले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके यथार्थ स्वरूपकी स्तौति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनार्थम् । स्तुति करते हैं-ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव ऋषिभिः वसिष्ठादिभिः बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्, छन्दोभि: छन्दांसि ऋगादीनि तैः छन्दोभिः विविधैः नानाप्रकारैः पृथग् विवेकतो गीतम् । किं च ब्रह्मसूत्रपदैः च एव ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणि तैः पद्यते गम्यते ज्ञायते ब्रह्म इति तानि पदानि उच्यन्ते । तैः एव च क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं गीतम् इति अनुवर्तते । ' आत्मेत्येवोपासीत ' ( बृह ० उ ० १ । ४। ७ ) इत्यादिभिः हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते । हेतुमद्भिः युक्तियुक्तैः विनिश्चितैः न संशयरूपैः निश्चितप्रत्ययोत्पादकैः इत्यर्थः ॥ ४ ॥

हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥

( यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ) वसिष्ठादि ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और ऋग्वेदादि नाना प्रकारके श्रुतिवाक्योंद्वारा भी पृथक् - पृथक् –विवेचनपूर्वक कहा गया है । तथा संशयरहित निश्चित ज्ञान उत्पन्न करनेवाले; विनिश्चित और युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंसे भी कहा गया है । जो वाक्य ब्रह्मके सूचक हैं उसका नाम ' ब्रह्मसूत्र ' है, उनके द्वारा ब्रह्म पाया जाता है — जाना जाता है, इसलिये उनको ' पद ' कहते हैं, उनसे भी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व कहा गया है; क्योंकि ' केवल आत्मा ही सब कुछ है ' ‘ ऐसी उपासना करनी चाहिये ' इत्यादि ब्रह्मसूचक पदोंसे ही आत्मा जाना जाता है ॥ ४ ॥

पृष्ठ 315

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३१५ स्तुत्या अभिमुखीभूताय अर्जुनाय आह- इस प्रकार स्तुति सुनकर सम्मुख हुए अर्जुनसे भगवान् कहते हैं— महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि महान्ति च तानि सर्वविकार-व्यापकत्वाद् भूतानि च सूक्ष्माणि । स्थूलानि तु इन्द्रियगोचरशब्देन अभिधायिष्यन्ते । अहङ्कारो महाभूतकारणम् अहम्प्रत्ययलक्षणः । अहङ्कारकारणं बुद्धिः अध्यवसायलक्षणा । तत्कारणम् अव्यक्तम् एव च न व्यक्तम् अव्यक्तम् अव्याकृतम् ईश्वरशक्ति: ' मम माया दुरत्यया ' इति उक्तम् । एवशब्दः प्रकृत्यवधारणार्थ एतावती एव अष्टधा भिन्ना प्रकृतिः । च शब्दो भेद समुच्चयार्थः । इन्द्रियाणि दश श्रोत्रादीनि पञ्च बुद्धयुत्पादक-त्वाद् बुद्धीन्द्रियाणि वाक्याण्यादीनि पञ्च कर्मनिर्वर्तकत्वात् कर्मेन्द्रियाणि तानि दश । एकं च किं तद् मन एकादशं सङ्कल्पाद्यात्मकम् । पञ्च च इन्द्रियगोचराः शब्दादयो विषयाः । तानि एतानि साङ्ख्याः चतुर्विंशतितत्त्वानि आचक्षते ॥ ५ ॥

पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥

महाभूत यानी सूक्ष्मभूत, वे सब विकारोंमें व्यापक होनेके कारण महान् भी हैं और भूत भी हैं, इसलिये वे महाभूत कहे जाते हैं । स्थूल पञ्चभूत तो इन्द्रियगोचर-शब्दसे कहे जायँगे, इसलिये यहाँ महाभूत - शब्दसे सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोंका ग्रहण है । महाभूतोंका कारण अहं - प्रत्ययरूप अहंकार तथा अहंकारकी कारणरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि और उसकी भी कारणरूपा अव्यक्त प्रकृति; अर्थात् जो व्यक्त नहीं है ऐसी अव्यक्त नामक अव्याकृत — ईश्वर-शक्ति जो कि ' मम माया दुरत्यया ' इत्यादि वचनोंसे कही गयी है । यहाँ ' एव ' शब्द प्रकृतिको विशेषरूपसे बतलाने के लिये है और ' च ' शब्द सारे भेदका समुच्चय करनेके लिये है । अभिप्राय यह कि यही आठ प्रकारसे विभक्त हुई अपरा प्रकृति है । तथा दस इन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत्रादि पाँच ज्ञान उत्पन्न करनेवाली होनेके कारण ज्ञानेन्द्रियाँ और वाणी आदि पाँच कर्म सम्पादन करनेवाली होनेसे कर्मेन्द्रियाँ और एक ग्यारहवाँ संकल्प - विकल्पात्मक मन तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच इन्द्रियोंके विषय । इन सबको ही सांख्यमतावलम्बी चौबीस तत्त्व कहते हैं ॥५ ॥

अथ इदानीम् आत्मगुणा इति यान् आचक्षते अब ' जिन इच्छा आदिको वैशेषिकमतावलम्बी वैशेषिकाः ते अपि क्षेत्रधर्मा एव न तु क्षेत्रज्ञस्य आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं इति आह भगवान्- आत्माके नहीं ' यह बात भगवान् कहते हैं—

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥६ ॥

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३१६ * श्रीमद्भगवद्गीता * इच्छा यज्जातीयं सुखहेतुम् अर्थम् उपलब्धवान् पूर्वं पुनः तज्जातीयम् उपलभमानः तम् आदातुम् इच्छति सुखहेतुः इति सा इयम् इच्छा अन्तःकरणधर्मो ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् । तथा द्वेषो यज्जातीयम् अर्थं दुःखहेतुत्वेन अनुभूतवान् पुनः तज्जातीयम् उपलभमानः तं द्वेष्टि सः अयं द्वेषो ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् एव । तथा सुखम् अनुकूलं प्रसन्नं सत्त्वात्मकं ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् एव । दुःखं प्रतिकूलात्मकं ज्ञेयत्वात् तद् अपि क्षेत्रम् । सङ्घातो देहेन्द्रियाणां संहतिः तस्याम् अभिव्यक्ता अन्तः करणवृत्तिः तप्ते इव लोहपिण्डे अग्निः आत्मचैतन्याभासरसविद्धा चेतना सा च क्षेत्रं ज्ञेयत्वात् । धृतिः यया अवसादप्राप्तानि देहेन्द्रियाणि थ्रियन्ते सा च ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् । सर्वान्तःकरणधर्मोपलक्षणार्थम् इच्छादि-ग्रहणम् यत उक्तं तद् उपसंहरति— एतत क्षेत्रं समासेन सविकारं सह विकारेण महदादिना उदाहृतम् उक्तम् । यस्य क्षेत्रभेद -जातस्य संहतिः इदं शरीरं क्षेत्रम् इति उक्तं तत् क्षेत्रं व्याख्यातं महाभूतादिभेदभिन्नं धृत्यन्तम् ॥ ६ ॥

इच्छा - जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया हो, " फिर वैसे ही पदार्थके प्राप्त होनेपर उसको सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है, उस चाहका नाम ' इच्छा ' है, वह अन्तःकरणका धर्म है और ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र है । तथा द्वेष - – जिस प्रकारके पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव किया हो, फिर उसी जातिके पदार्थके प्राप्त होनेपर जो उससे मनुष्य द्वेष करता है, उस भावका नाम ' द्वेष ' है, वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है । उसी प्रकार सुख, जो कि अनुकूल, प्रसन्नतारूप और सात्त्विक है, ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है तथा प्रतिकूलतारूप दुःख भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र है । देह और इन्द्रियोंका समूह संघात कहलाता है । उसमें प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो कि ' अग्नि प्रज्वलित लोहपिण्डकी भाँति ' आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है,, वह चेतना भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है । व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि जिससे धारण किये जाते हैं, वह धृति भी ज्ञेय होनेसे क्षेत्र ही है । अन्तःकरणके समस्त धर्मोंका संकेत करनेके लिये यहाँ इच्छादि धर्मोंका ग्रहण किया गया है । जो कुछ कहा गया है, उसका उपसंहार करते हैं— महत्तत्त्वादि विकारोंके सहित क्षेत्रका यह स्वरूप संक्षेपसे कहा गया । अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह ' यह शरीर क्षेत्र है ' ऐसा कहा गया है, महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे विभिन्न हुए उस क्षेत्रकी व्याख्या कर दी गयी ॥ ६ ॥

पृष्ठ 317

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३१७ क्षेत्रज्ञो वक्ष्यमाणविशेषणो यस्य सप्रभावस्य क्षेत्रज्ञस्य परिज्ञानाद् अमृतत्वं भवति तं ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ' इत्यादिना सविशेषणं स्वयम् एव वक्ष्यति भगवान् । अधुना तु तज्ज्ञानसाधनगणम् अमानित्वादि-लक्षणं यस्मिन् सति तज्ज्ञेयविज्ञाने योग्य अधिकृतो भवति यत्परः सन्न्यासी ज्ञाननिष्ठ उच्यते, तम्, अमानित्वादिगणं ज्ञानसाधनत्वाद् ज्ञानशब्दवाच्यं विदधाति भगवान्-अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा आचार्योपासनं शौचं अमानित्वं मानिनो भावो मानित्वम् आत्मनः श्लाघनं तदभावः अमानित्वम् । अदम्भित्वं स्वधर्मप्रकटीकरणं दम्भित्वं तदभावः अदम्भित्वम् । अहिंसा अहिंसनं प्राणिनाम् अपीडनम् । क्षान्तिः परापराधप्राप्तौ अविक्रिया । आर्जवम् ऋजुभावो अवक्रत्वम् । आचार्योपासनं मोक्षसाधनोपदेष्टुः आचार्यस्य शुश्रूषादिप्रयोगेण सेवनम् । शौचं कायमलानां मृज्जलाभ्यां प्रक्षालनम् अन्तः च मनसः प्रतिपक्षभावनया रागादिमलानाम् अपनयनं शौचम् । जो आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त क्षेत्रज्ञ है, जिस क्षेत्रज्ञको प्रभावसहित जान लेनेसे ( मनुष्य ) अमृतरूप हो जाता है, उसको भगवान् स्वयं आगे चलकर ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ' इत्यादि वचनोंसे विशेषणोंके सहित कहेंगे । यहाँ पहले उस ( क्षेत्रज्ञ ) - के जाननेका उपायरूप जो अमानित्व आदि साधनसमुदाय है, जिसके होनेसे उस ज्ञेयको जाननेके लिये मनुष्य योग्य अधिकारी बन जाता है, जिसके परायण हुआ संन्यासी ज्ञाननिष्ठ कहा जाता है और जो ज्ञानका साधन होनेके कारण ज्ञान नामसे पुकारा जाता है, उस अमानित्वादि गुणसमुदायका भगवान् विधान करते हैं—–

क्षान्तिरार्जवम् ।

स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥

अमानित्व — मानीका भाव अर्थात् अपना बड़प्पन प्रकट करना जो मानित्व है, उसका अभाव अमानित्व कहलाता है I अदम्भित्व — अपने धर्मको प्रकट करना दम्भित्व है; उसका अभाव अदम्भित्व कहा जाता है । अहिंसा — हिंसा न करना अर्थात् प्राणियोंको कष्ट न देना । क्षमा – - दूसरोंका अपने प्रति अपराध देखकर भी विकाररहित रहना । आर्जव — सरलता, अकुटिलता । आचार्यकी उपासना – मोक्षसाधनका उपदेश करनेवाले गुरुका शुश्रूषा आदि प्रयोगोंसे सेवन करना । शौच - शारीरिक मलोंको मिट्टी और जल आदिसे साफ करना और अन्तःकरणके राग - द्वेष आदि मलोंको प्रतिपक्ष - भावनासे * दूर करना । * जिस दोषको दूर करना हो उसके विरोधी गुणकी भावना करनेका नाम ' प्रतिपक्ष - भावना है । '

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३१८ * श्रीमद्भगवद्गीता * स्थैर्यं स्थिरभावो मोक्षमार्गे एव कृताध्यवसायत्वम् । आत्मविनिग्रह आत्मनः अपकारकस्य आत्मशब्दवाच्यस्य कार्यकरणसङ्घातस्य विनिग्रहः स्वभावेन सर्वतः प्रवृत्तस्य सन्मार्गे एव निरोध आत्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥

स्थिरता — स्थिरभाव, मोक्षमार्गमें ही निश्चित निष्ठा कर लेना । आत्मविनिग्रह— आत्माका अपकार करनेवाला और आत्मा शब्दसे कहे जानेवाला, जो कार्य - करणका संघातरूप यह शरीर है, इसका निग्रह अर्थात् इसे स्वाभाविक प्रवृत्तिसे हटाकर सन्मार्गमें ही नियुक्त कर रखना ॥ ७ ॥

किं च- तथा— |

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥८ ॥

इन्द्रियार्थेषु शब्दादिषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु विरागभावो वैराग्यम् । अनहङ्कारः अहङ्काराभाव एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनं जन्म च मृत्युः च जरा च व्याधयः च दुःखानि च तेषु जन्मादिदुःखान्तेषु प्रत्येकं दोषानुदर्शनम् । जन्मनि गर्भवासयोनिद्वारा निःसरणं दोषः तस्य अनुदर्शनम् आलोचनम्, तथा मृत्यौ दोषानुदर्शनम्, तथा जरायां प्रज्ञाशक्तितेजो निरोधदोषानुदर्शनं परिभूतता च इति । तथा व्याधिषु शिरोरोगादिषु दोषानुदर्शनम्, तथा दुःखेषु अध्यात्माधिभूताधिदैवनिमित्तेषु । अथवा दुःखानि एव दोषो दुःखदोषः तस्य जन्मादिषु पूर्ववद् अनुदर्शनम् । दुःखं जन्म दुःखं मृत्युः दुःखं जरा दुःखं व्याधयः । दुःखनिमित्तत्त्वाद् जन्मादयो दुःखं न पुनः स्वरूपेण एव दुःखम् इति । इन्द्रियोंके शब्दादि विषयोंमें वैराग्य अर्थात् ऐहिक और पारलौकिक भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अनहंकार — अहंकारका अभाव । तथा जन्म, मृत्यु, जरा, रोग और दुःखोंमें अर्थात् जन्मसे लेकर दुःखपर्यन्त प्रत्येकमें अलग - अलग दोषोंका देखना । जन्ममें गर्भवास और योनिद्वारा बाहर निकलनारूप जो दोष है उसको देखना – उसपर विचार करना । वैसे ही मृत्युमें दोष देखना, एवं बुढ़ापेमें प्रज्ञाशक्ति और तेजका तिरोभाव और तिरस्काररूप दोष देखना, तथा सिर- पीड़ादि रोगरूप व्याधियोंमें दोषोंका देखना, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवके निमित्तसे होनेवाले तीनों प्रकारके दुःखोंमें दोष देखना । अथवा ( यह भी अर्थ किया जा सकता है कि ) दुःख ही दोष है, इस दुःखरूप दोषको पहले कहे हुए प्रकारसे जन्मादिमें देखना अर्थात् जन्म दुःखमय है, मरना दुःख है, बुढ़ापा दुःख है और सब रोग दुःख हैं - इस प्रकार देखना, परंतु ( यह ध्यान रहे कि ) ये जन्मादि दुःखके कारण होनेसे ही दुःख हैं, स्वरूपसे दुःख नहीं हैं ।

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३१ ९ एवं जन्मादिषु दुःखदोषानुदर्शनाद् देहेन्द्रियविषयभोगेषु वैराग्यम् उपजायते । ततः प्रत्यगात्मनि प्रवृत्तिः करणानाम् आत्म- । दर्शनाय । एवं ज्ञानहेतुत्वाद् ज्ञानम् उच्यते जन्मादिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥

इस प्रकार जन्मादिमें दुःस्वरूप दोषको बारंबार देखनेसे शरीर, इन्द्रिय और विषयभोगोंमें वैराग्य उत्पन्न हो जाता है । उससे मन - इन्द्रियादि करणोंकी आत्मसाक्षात्कार करनेके लिये अन्तरात्मामें प्रवृत्ति हो जाती है । इस प्रकार ज्ञानका कारण होनेसे जन्मादिमें दुःखरूप दोषकी बारंबार आलोचना करना ' ज्ञान ' कहा जाता है ॥ ८ ॥

किं च- तथा—

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥

असक्तिः सक्तिः सङ्गनिमित्तेषु विषयेषु प्रीतिमात्रं तदभावः असक्तिः । अनभिष्वङ्गः अभिष्वङ्गाभावः । अभिष्वङ्गः नाम सक्तिविशेष एव अनन्यात्मभावनालक्षणः । यथा अन्यस्मिन् सुखिनि दुःखिनि वा अहम् एव सुखी दुःखी च जीवति मृते वा अहम् एव जीवामि मरिष्यामि च इति । क्व इति आह, पुत्रदारगृहादिषु, पुत्रेषु दारेषु गृहेषु, आदिग्रहणाद् अन्येषु अपि अत्यन्तेष्टेषु दासवर्गादिषु । तत् च उभयं ज्ञानार्थत्वाद् ज्ञानम् उच्यते । ' नित्यं च समचित्तत्वं तुल्यचित्तता, क्व, इष्टानिष्टोपपत्तिषु इष्टानाम् अनिष्टानां च उपपत्तयः सम्प्राप्तयः तासु इष्टानिष्टोपपत्तिषु नित्यम् एव तुल्यचित्तता, इष्टोपपत्तिषु न हृष्यति न कुप्यति च अनिष्टोपपत्तिषु । तत् च एतद् नित्यं समचित्तत्वं ज्ञानम् ॥ ९ ॥

असक्ति — आसक्ति - निमित्तक विषयोंमें प्रीतिमात्रका नाम सक्ति है, उसका अभाव । अनभिष्वंग – अभिष्वंगका अभाव । मोहपूर्वक अनन्य आत्मभावनारूप जो विशेष आसक्ति है उसका नाम अभिष्वंग है । जैसे दूसरेके सुखी या दुःखी होनेपर यह मानना कि मैं ही सुखी - दुःखी हूँ । अथवा किसी अन्यके जीने - मरनेपर मैं ही जीता हूँ या मर जाऊँगा, ऐसा मानना । ( ऐसा अभिष्वंग ) कहाँ होता है? ( सो कहते हैं ) पुत्र, स्त्री और घर आदिमें अर्थात् पुत्रमें स्त्रीमें, घरमें तथा आदि शब्दका ग्रहण होनेसे अन्य जो कोई दासवर्ग आदि अत्यन्त प्रिय होते हैं उनमें भी । असक्ति और अनभिष्वंग ये दोनों ही ज्ञानके साधन हैं, इसलिये इनको भी ज्ञान कहते हैं तथा नित्य समचित्तता अर्थात् निरन्तर चित्तकी समानता - किसमें? इष्ट अथवा अनिष्टकी प्राप्तिमें, अर्थात् प्रिय और अप्रियकी जो बारंबार प्राप्ति होती रहती है उसमें सदा ही चित्तका सम रहना । इस साधनवाला प्रियकी प्राप्तिमें हर्षित नहीं होता और अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त नहीं होता । इस प्रकारकी जो चित्तकी नित्य समता है वह भी ' ज्ञान ' है ॥ ९ ॥

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३२० * श्रीमद्भगवद्गीता * किं च- | तथा—

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१० ॥

मयि च ईश्वरे अनन्ययोगेन अपृथक्समाधिना न अन्यो भगवतो वासुदेवात् परः अस्ति अतः स एव नो गतिः इति एवं निश्चिता अव्यभि-चारिणी बुद्धिः अनन्ययोगः तेन भजनं भक्तिः न व्यभिचरणशीला अव्यभिचारिणी । सा च ज्ञानम् । विविक्तदेशसेवित्वं विविक्तः स्वभावतः संस्कारेण वा अशुच्यादिभिः सर्पव्याघ्रादिभिः च रहितः अरण्यनदीपुलिनदेवगृहादिभिः विविक्तो देशः तं सेवितं शीलम् यस्य इति विविक्तदेशसेवी तद्भावो विविक्तदेशसेवित्वम् । विविक्तेषु हि देशेषु चित्तं प्रसीदति यतः तत आत्मादिभावना विविक्ते उपजायते अतो विविक्तदेशसेवित्वं ज्ञानम् उच्यते । अरतिः अरमणं जनसंसदि जनानां प्राकृतानां संस्कारशून्यानाम् अविनीतानां संसत् समवायो जनसंसत् न संस्कारवतां विनीतानां संसतु, तस्या ज्ञानोपकारकत्वात्, अतः प्राकृतजनसंसदि अरतिः ज्ञानार्थत्वाद् ज्ञानम् ॥ १० ॥

मुझ ईश्वरमें अनन्य योगसे — एकत्वरूप समाधियोगसे अव्यभिचारिणी भक्ति । भगवान् वासुदेवसे पर अन्य कोई भी नहीं है, अतः वही हमारी परमगति है, इस प्रकारकी जो निश्चित अविचल बुद्धि है वही अनन्य योग है, उससे युक्त होकर भजन करना ही ‘ कभी विचलित न होनेवाली अव्यभिचारिणी भक्ति ' है, वह भी ज्ञान है । विविक्तदेशसेवित्व — एकान्त पवित्रदेश - सेवनका स्वभाव । जो देश स्वभावसे पवित्र हो या झाड़ने - बुहारने आदि संस्कारोंसे शुद्ध किया गया हो तथा सर्प - व्याघ्र आदि जन्तुओंसे रहित हो, ऐसे वन, नदी - तीर या देवालय आदि विविक्त ( एकान्त — पवित्र ) देशको सेवन करनेका जिसका स्वभाव है, वह विविक्तदेशसेवी कहलाता है, उसका भाव विविक्तदेशसेवित्व है । क्योंकि निर्जन - पवित्र देशमें ही चित्त प्रसन्न और स्वच्छ होता है, इसलिये विविक्तदेशमें आत्मादिकी भावना प्रकट होती है,, अतः विविक्तदेश- सेवन करनेके स्वभावको ‘ ज्ञान ' कहा जाता है । तथा जनसमुदायमें अप्रीति । यहाँ विनय - भावरहित संस्कार - शून्य प्राकृत पुरुषोंके समुदायका नाम ही जनसमुदाय है । विनययुक्त संस्कारसम्पन्न मनुष्योंका समुदाय जनसमुदाय नहीं है; क्योंकि वह तो ज्ञानमें सहायक है । सुतरां प्राकृतजनसमुदायमें प्रीतिका अभाव ज्ञानका साधन होनेके कारण ' ज्ञान ' है ॥ १० ॥

किं च- तथा—

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥