श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 321–330

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३२१ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् आत्मादिविषयं ज्ञानम् अध्यात्मज्ञानं तस्मिन् नित्यभावो नित्यत्वम् । अमानित्वादीनां ज्ञानसाधनानां भावना-परिपाकनिमित्तं तत्त्वज्ञानं तस्य अर्थो मोक्षः संसारोपरमः तस्य आलोचनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्, तत्त्वज्ञानफलालोचने हि तत्साधनानुष्ठाने प्रवृत्तिः स्याद् इति । एतद् अमानित्वादितत्त्वज्ञानार्थदर्शनान्तम् उक्तं ज्ञानम् इति प्रोक्तं ज्ञानार्थत्वात् । अज्ञानं यद् अतः अस्माद् यथोक्ताद् अन्यथा विपर्ययेण मानित्वं दम्भित्वं हिंसा अक्षान्तिः अनार्जवम् इत्यादि अज्ञानं विज्ञेयं परिहरणाय संसारप्रवृत्तिकारणत्वाद् इति ॥ ११ ॥

अध्यात्मज्ञाननित्यत्व आत्मादिविषयक ज्ञानका नाम अध्यात्मज्ञान है, उसमें नित्यस्थिति । तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचना अर्थात् अमानित्वादि ज्ञान - साधनोंकी परिपक्व भावनासे उत्पन्न होनेवाला जो तत्त्वज्ञान है उसका अर्थ जो संसारकी उपरतिरूप मोक्ष है, उसकी आलोचना । क्योंकि तत्त्वज्ञानके फलकी आलोचना करनेसे ही उसके साधनोंमें प्रवृत्ति होगी । ' अमानित्व ' से लेकर तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचनापर्यन्त कहा हुआ समस्त साधनसमुदाय ज्ञानका साधन होनेके कारण ' ज्ञान ' इस नामसे कहा गया है । इससे अर्थात् उपर्युक्त ज्ञानसाधनोंके समुदायसे विपरीत जो मानित्व, दम्भित्व, हिंसा, क्षमाका अभाव, कुटिलता इत्यादि अवगुणसमुदाय है वह संसारमें प्रवृत्त करनेका हेतु होनेसे उसे त्याग करनेके लिये अज्ञान समझना चाहिये ॥ ११ ॥

यथोक्तेन ज्ञानेन ज्ञातव्यं किम् इति आकाङ्क्षायाम् आह ज्ञेयं यत् तद् इत्यादि । ननु यमा नियमाः च अमानित्वादयो न तैः ज्ञेयं ज्ञायते । न हि अमानित्वादि कस्यचिद् वस्तुनः परिच्छेदकं दृष्टम् । सर्वत्र एव च यद् विषयं ज्ञानं तद् एव तस्य ज्ञेयस्य परिच्छेदकं दृश्यते । न हि अन्यविषयेण ज्ञानेन अन्यद् उपलभ्यते । यथा घटविषयेण ज्ञानेन अग्निः । न एष दोषो ज्ञाननिमित्तत्वाद् ज्ञानम् उच्यते इति हि अवोचाम । ज्ञानसहकारिकारण-त्वात् च-उपर्युक्त ज्ञानद्वारा जाननेयोग्य क्या है? इस आकाङ्कापर ' ज्ञेयं यत्तत् ' इत्यादि श्लोक कहते हैं— पू ० – अमानित्व आदि गुण तो यम और नियम हैं, उनसे ज्ञेय वस्तु नहीं जानी जा सकती; क्योंकि अमानित्वादि सद्गुण किसी वस्तुके ज्ञापक नहीं देखे । गये हैं । सभी जगह यह देखा जाता है कि जो ज्ञान जिस वस्तुको विषय करनेवाला होता है वही उसका ज्ञापक होता है, अन्य वस्तुविषयक ज्ञानसे अन्य वस्तु नहीं जानी जाती । जैसे घटविषयक ज्ञानसे अग्नि नहीं जाना जाता । उ ० - यह दोष नहीं है, क्योंकि हम पहले ही कह चुके हैं कि यह अमानित्वादि सद्गुण ज्ञानके साधन होनेसे और उसके सहकारी कारण होनेसे ' ज्ञान ' नामसे कहे गये हैं—

पृष्ठ 322

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३२२ * श्रीमद्भगवद्गीता * ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि अनादिमत्परं ब्रह्म न ज्ञेयं ज्ञातव्यं यत् तत् प्रवक्ष्यामि प्रकर्षेण यथावद् वक्ष्यामि । किं फलं तद् इति प्ररोचनेन श्रोतुः अभि-मुखीकरणाय आह— यद् ज्ञेयं ज्ञात्वा अमृतम् अमृतत्वम् अश्नुते न पुनः म्रियते इत्यर्थः । अनादिमद् आदिः अस्य अस्ति इति आदि-मद् न आदिमद् अनादिमत् । किं तत् परं निरतिशयं ब्रह्म ज्ञेयम् इति प्रकृतम् । अत्र केचिद् अनादि मत्परम् इति पदं छिन्दन्ति बहुव्रीहिणा उक्ते अर्थे मतुप आनर्थक्यम् अनिष्टं स्याद् इति । अर्थविशेषं च दर्शयन्ति अहं वासुदेवाख्या परा शक्तिः यस्य तद् मत्परम् इति । सत्यम् एवम् अपुनरुक्तं स्याद् अर्थः चेत् सम्भवति न तु अर्थ: सम्भवति, ब्रह्मणः सर्वविशेषप्रतिषेधेन एव विजिज्ञापयिषितत्वाद् न सत् तद् न असद् उच्यते इति । विशिष्टशक्तिमत्त्वप्रदर्शनं विशेषप्रतिषेधः च इति विप्रतिषिद्धम् । तस्माद् मतुपो बहुव्रीहिणा समानार्थत्वे अपि प्रयोगः श्लोकपूरणार्थः ।

यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।

सत्तन्नासदुच्यते ॥१२ ॥

जो जाननेयोग्य है उसको भली प्रकार यथार्थ रूपसे कहूँगा । वह ज्ञेय कैसे फलवाला है? यह बात, श्रोतामें रुचि उत्पन्न करके उसे सम्मुख करनेके लिये कहते हैं— जिस जाननेयोग्य ( परमात्माके स्वरूप ) - को जानकर ( मनुष्य ) अमृतको अर्थात् अमरभावको लाभ कर लेता है, फिर नहीं मरता । वह ज्ञेय अनादिमत् है । जिसकी आदि हो वह आदिमत् और जो आदिमत् न हो वह अनादिमत् कहलाता है । वह कौन है? वही परम - निरतिशय ब्रह्म जो कि इस प्रकरणमें ज्ञेयरूपसे वर्णित है । यहाँ कई एक टीकाकार ' अनादि ' ' मत्परम् ' इस प्रकार पदच्छेद करते हैं । ( कारण यह बतलाते हैं कि ) बहुव्रीहि समासद्वारा बतलाये हुए अर्थमें ‘ मतुप् ’ प्रत्ययके प्रयोगकी निरर्थकता है, अतः वह अनिष्ट है । वे ( टीकाकार ऐसा पदच्छेद करके ) अलग अर्थ भी दिखाते हैं कि ‘ मैं वासुदेव कृष्ण ही जिसकी परम शक्ति हूँ वह ज्ञेय मत्पर है । ' ठीक है, यदि उपर्युक्त अर्थ सम्भव होता तो ऐसा पदच्छेद करनेसे पुनरुक्तिके दोषका निवारण हो सकता था, परंतु यह अर्थ ही सम्भव नहीं है; क्योंकि यहाँ ब्रह्मका स्वरूप ' न सत्तन्नासदुच्यते ' आदि वचनोंसे सर्व विशेषणोंके प्रतिषेधद्वारा ही बतलाना इष्ट है । ज्ञेयको किसी विशेष शक्तिवाला बतलाना और विशेषणोंका प्रतिषेध भी करते जाना यह परस्परविरुद्ध है । सुतरां ( यही समझना चाहिये कि ) मतुप् प्रत्ययका और बहुव्रीहि समासका समान अर्थ होनेपर भी यहाँ श्लोकपूर्तिके लिये यह प्रयोग किया गया है ।

पृष्ठ 323

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३२३ अमृतत्वफलं ज्ञेयं मया उच्यते इति प्ररोचनेन अभिमुखीकृत्य आह— न सत् तद् ज्ञेयम् उच्यते इति न अपि असत् तद् उच्यते । ननु महता परिकरबन्धेन कण्ठरवेण उद्धुष्य ज्ञेयं प्रवक्ष्यामि इति अननुरूपम् उक्तं न सत् तद् न असद् उच्यते इति । न, अनुरूपम् एव उक्तम् । कथं सर्वासु हि उपनिषत्सु ज्ञेयं ब्रह्म ‘ नेति नेति ' ( बृह ० उ ० ४ । ४। २२ ) ‘ अस्थूलमनणु ' ( बृह ० उ ० ३ । ३ । ८ ) इत्यादिविशेषप्रतिषेधेन एव निर्दिश्यते न इदं तद् इति वाचः अगोचरत्वात् । ननु न तद् अस्ति यद् वस्तु अस्तिशब्देन न उच्यते । अथ अस्तिशब्देन न उच्यते न अस्ति तद् ज्ञेयम् । विप्रतिषिद्धं च ज्ञेयं तद् अस्तिशब्देन न उच्यते इति च । न तावद् न अस्ति नास्तिबुद्ध्यविषयत्वात् । ननु सर्वा बुद्धयः अस्तिनास्तिबुद्ध्यनुगता एव । तत्र एवं सति ज्ञेयम् अपि अस्तिबुद्ध्यनुगत प्रत्ययविषयं वा स्याद् नास्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्यय-विषयं वा स्यात् । न, अतीन्द्रियत्वेन उभयबुद्ध्यनुगतप्रत्यया-विषयत्वात् । यद् हि इन्द्रियगम्यं वस्तु घटादिकं तद् अस्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्ययविषयं वा स्याद् नास्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्ययविषयं वा स्यात् । ‘ जिसका फल अमृतत्व है ऐसा ज्ञेय मेरे द्वारा कहा जाता है ' इस कथनसे रुचि उत्पन्न कर ( अर्जुनको ) सम्मुख करके कहते हैं— उस ज्ञेयको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है । पू ० – कटिबद्ध होकर बड़े गम्भीर स्वरसे यह घोषणा करके कि ' मैं ज्ञेय वस्तुको भली प्रकार बतलाऊँगा ' फिर यह कहना कि ' वह न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही ' उस घोषणाके अनुरूप नहीं है । - यह नहीं, भगवान्‌का कहना तो प्रतिज्ञाके अनुरूप उ०- ही है; क्योंकि वाणीका विषय न होनेके कारण सब उपनिषदोंमें भी ज्ञेय ब्रह्म ' ऐसा नहीं, ऐसा नहीं ' ' स्थूल नहीं, सूक्ष्म नहीं ' इस प्रकार विशेषोंके प्रतिषेधद्वारा ही लक्ष्य कराया गया है, ऐसा नहीं कहा गया कि वह ज्ञेय अमुक है । पू ० – जो वस्तु ' अस्ति ' शब्दसे नहीं कही जा सकती, वह है भी नहीं । यदि ज्ञेय ‘ अस्ति ’ शब्दसे नहीं कहा जा सकता तो वह भी वास्तवमें नहीं है । फिर यह कहना अति विरुद्ध है कि वह ' ज्ञेय ' है और " ' अस्ति ' शब्दसे नहीं कहा जा सकता । उ ० — वह ( ब्रह्म ) नहीं है, सो नहीं; क्योंकि वह ' नहीं है ' इस ज्ञानका भी विषय नहीं है । पू ० – सभी ज्ञान ‘ अस्ति ' या ' नास्ति ' इन बुद्धियोंमेंसे ही किसी एकके अनुगत होते हैं । इसलिये ज्ञेय भी या तो ' अस्ति ' ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा या ' नास्ति ' ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा । उ ० - - यह बात नहीं है । क्योंकि वह ब्रह्म इन्द्रियोंसे अगोचर होनेके कारण दोनों प्रकारके ही ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है । इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें आनेवाले जो कोई घट आदि पदार्थ होते हैं, वे ही या तो ' अस्ति ' इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके या ‘ नास्ति ' इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके विषय होते हैं

पृष्ठ 324

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३२४ * श्रीमद्भगवद्गीता * इदं तु ज्ञेयम् अतीन्द्रियत्वेन शब्दैकप्रमाण-गम्यत्वाद् न घटादिवद् उभयबुद्ध्यनुगत-प्रत्ययविषयम् इति अतो न सत् तद् न असद् इति उच्यते । यत् तु उक्तं विरुद्धम् उच्यते ज्ञेयं तद् न सत् तद् न असद् उच्यते इति । न विरुद्धम् । — अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ' ( के ० उ ० १ । ३ ) इति श्रुतेः । श्रुतिः अपि विरुद्धार्था इति चेद् यथा यज्ञाय शालाम् आरभ्य ' को हि तद् वेद यद्यमुष्मिँल्लोकेऽस्ति वा न वेति ' ( तै ० सं ० ६ । १ । १ ) एवम् इति चेत् । न, विदिताविदिताभ्याम् अन्यत्वश्रुतेः अवश्यविज्ञेयार्थप्रतिपादनपरत्वात्।'यद्यमुष्मिन् ' इत्यादि तु विधिशेषः अर्थवादः । उपपत्तेः च सदसदादिशब्दैः ब्रह्म न उच्यते इति । सर्वो हि शब्दः अर्थप्रकाशनाय प्रयुक्तः श्रूयमाणः च श्रोतृभिः जातिक्रिया -गुणसम्बन्धद्वारेण सङ्केतग्रहणसव्यपेक्षः अर्थं प्रत्याययति । न अन्यथा अदृष्टत्वात् । तद् यथा गौः अश्व इति वा जातितः, पचति पठति इति वा क्रियातः, शुक्लः कृष्ण इति वा गुणतः, धनी गोमान् इति वा सम्बन्धतः । परंतु यह ज्ञेय ( ब्रह्म ) इन्द्रियातीत होनेके कारण केवल एक शब्दप्रमाणसे ही प्रमाणित हो सकता है, इसलिये घट आदि पदार्थोंकी भाँति यह ' है ' ' नहीं है ' इन दोनों प्रकारके ही ज्ञानोंके अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है, सुतरां वह न तो सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है । तथा तुमने जो यह कहा कि ज्ञेय है किंतु वह न सत् कहा जाता है और न असत् कहा जाता है, यह कहना विरुद्ध है, सो विरुद्ध नहीं है; क्योंकि ‘ वह ब्रह्म जाने हुएसे और न जाने हुएसे भी अन्य है ' इस श्रुतिप्रमाणसे यह बात सिद्ध है । पू ० – - यदि यह श्रुति भी विरुद्ध अर्थवाली हो तो? अर्थात् जैसे यज्ञके लिये यज्ञशाला बनानेका विधान करके वहाँ कहा है कि ' उस बातको कौन जानता है कि परलोकमें यह सब है या नहीं ' इस श्रुतिके समान यह श्रुति भी विरुद्धार्थयुक्त हो तो? उ ० - - यह बात नहीं है; क्योंकि यह जाने हुएसे और न जाने हुएसे विलक्षणत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुति निस्सन्देह अवश्य ही ज्ञेय पदार्थका होना प्रतिपादन करनेवाली है और ' यह सब परलोकमें है या नहीं ' इत्यादि श्रुति - वाक्य विधिके अन्तका अर्थवाद है ( अतः उसके साथ इसकी समानता नहीं हो सकती ) । युक्तिसे भी यह बात सिद्ध है कि ब्रह्म सत् - असत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अर्थका प्रकाश करनेके लिये वक्ताद्वारा बोले जानेवाले और श्रोताद्वारा सुने जानेवाले सभी शब्द जाति, क्रिया, गुण और सम्बन्धद्वारा संकेत ग्रहण करवाकर ही अर्थकी प्रतीति कराते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं । कारण, अन्य प्रकारसे प्रतीति होती नहीं देखी जाती । जैसे गौ या घोड़ा यह जातिसे, पकाना या पढ़ना यह क्रियासे, सफेद या काला यह गुणसे और धनवान् या गौओंवाला यह सम्बन्धसे ( जाने जाते हैं । इसी तरह सबका ज्ञान होता है ) ।

पृष्ठ 325

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३२५ न तु ब्रह्म जातिमद् अतो न सदादिशब्द-वाच्यं न अपि गुणवद् येन गुणशब्देन उच्येत निर्गुणत्वाद् न अपि क्रियाशब्दवाच्यं निष्क्रियत्वात् । ‘ निष्कलं निष्क्रियं शान्तम् ' ( श्वे ० उ ० ६। १ ९ ) इति श्रुतेः । न च सम्बन्धि एकत्वाद् अद्वयत्वाद् अविषयत्वाद् आत्मत्वात् च न केनचित् शब्देन उच्यते इति युक्तम् ' यतो वाचो निवर्तन्ते ' ( तै ० उ ० २।४ । ९ ) इत्यादि श्रुतिभ्यः च ॥ १२ ॥

परंतु ब्रह्म जातिवाला नहीं है, इसलिये सत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता; निर्गुण होनेके कारण वह गुणवान् भी नहीं है, जिससे कि गुणवाचक शब्दोंसे कहा जा सके और क्रियारहित होनेके कारण क्रियावाचक शब्दोंसे भी नहीं कहा जा सकता । ' ब्रह्म कलारहित, क्रियारहित और शान्त है ' इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है । तथा एक, अद्वितीय, इन्द्रियोंका अविषय और आत्मरूप होनेके कारण ( वह ब्रह्म ) किसीका सम्बन्धी भी नहीं है । अतः यह कहना उचित ही है कि ब्रह्म किसी भी शब्दसे नहीं कहा जा सकता । ' जहाँसे वाणी निवृत्त हो जाती है ' इत्यादि श्रुति - प्रमाणोंसे भी यही बात सिद्ध होती है ॥ १२ ॥

सच्छब्दप्रत्ययाविषयत्वाद् असत्त्वाशङ्कायां वह ' ज्ञेय ' सत् शब्दद्वारा होनेवाली प्रतीतिका ज्ञेयस्य सर्वप्राणिकरणोपाधिद्वारेण विषय नहीं है, इससे उसके न होनेकी आशङ्का होनेपर उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये, समस्त तदस्तित्वं प्रतिपादयन् तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थम् प्राणियोंकी इन्द्रियादि उपाधियोंद्वारा उस ज्ञेयके आह- अस्तित्वका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥

सर्वतः पाणिपादं सर्वतः पाणयः पादाः च अस्य इति सर्वतः पाणिपादं तद् ज्ञेयम् । सर्वप्राणिकरणोपाधिभिः क्षेत्रज्ञास्तित्वं विभाव्यते । क्षेत्रज्ञः च क्षेत्रोपाधित उच्यते । क्षेत्रं च पाणिपादादिभिः अनेकधा भिन्नम् । क्षेत्रोपाधिभेदकृतं विशेषजातं मिथ्या एव क्षेत्रज्ञस्य इति तदपनयनेन ज्ञेयत्वम् उक्तम् ' न सत्तन्नासदुच्यते ' इति । वह ज्ञेय सब ओर हाथ - पैरवाला है अर्थात् उसके हाथ - पैर सर्वत्र फैले हुए हैं । सब प्राणियोंकी इन्द्रियरूप उपाधियोंद्वारा क्षेत्रज्ञका अस्तित्व प्रकट होता है । क्षेत्ररूप उपाधिके कारण ही वह ज्ञेय क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । क्षेत्ररूप उपाधि हाथ, पैर आदि भेदसे अनेक प्रकार विभक्त है । वास्तवमें, क्षेत्रकी उपाधियोंके भेदसे किये हुए समस्त भेद क्षेत्रज्ञमें मिथ्या ही हैं, अतः उनको हटाकर ज्ञेयका स्वरूप ' वह न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है ' ऐसे बतलाया गया है ।

पृष्ठ 326

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३२६ * श्रीमद्भगवद्गीता * उपाधिकृतं मिथ्यारूपम् अपि अस्तित्वाधि-गमाय ज्ञेयधर्मवद् परिकल्प्य उच्यते सर्वत: पाणिपादम् इत्यादि । तथा हि सम्प्रदायविदां वचनम् -4 अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते ' इति । सर्वत्र सर्वदेहावयवत्वेन गम्यमानाः पाणिपादादयो ज्ञेयशक्तिसद्भावनिमित्तस्वकार्या इति ज्ञेयसद्भावे लिङ्गानि ज्ञेयस्य इति उपचारत उच्यन्ते । तथा व्याख्येयम् अन्यत् । सर्वतः पाणिपादं तद् ज्ञेयम् । सर्वतोऽक्षि-शिरोमुखं सर्वत्र अक्षीणि शिरांसि मुखानि च यस्य तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमत् श्रुतिः श्रवणेन्द्रियं तद् यस्य तत् श्रुतिमद् लोके प्राणिनिकाये सर्वम् आवृत्य संव्याप्य तिष्ठति स्थितिं लभते ॥ १३ ॥

तथा ज्ञेयका अस्तित्व समझानेके लिये उपाधिकृत मिथ्यारूपको भी उसके धर्मकी भाँति कल्पना करके उसको ' सब ओरसे हाथ - पैरवाला ' है, इत्यादि प्रकारसे बतलाया जाता है । सम्प्रदाय - परम्पराको जाननेवालोंका भी यही कहना है कि ' अध्यारोप और अपवादद्वारा प्रपञ्चरहित परमात्माकी व्याख्या की जाती है । ' सर्वत्र अर्थात् सब शरीरोंके अंगरूपसे स्थित हाथ, पैर आदि इन्द्रियाँ ज्ञेय शक्तिकी सत्तासे ही स्वकार्यमें समर्थ हो रही हैं, अतः ये सब ज्ञेयकी सत्ताके चिह्न होनेके कारण उपचारसे ज्ञेयके ( धर्म ) कहे जाते हैं । ऐसे ही और सबकी भी व्याख्या कर लेनी चाहिये । वह ज्ञेय सब ओर हाथ - पैरवाला है तथा सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला है - जिसके आँख, सिर और मुख सर्वत्र हों, वह सर्वतोऽक्षिशिरोमुख कहलाता है तथा वह सब ओर कानवाला है - जिसके श्रुति अर्थात् श्रवणेन्द्रिय हो वह श्रुतिमत् ( कानवाला ) कहा जाता है । इस लोकमें – समस्त प्राणिसमुदायमें वह सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १३ ॥

उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रियाध्यारोपणाद् उपाधिरूप हाथ, पैर आदि इन्द्रियोंके अध्यारोपसे ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का मा भूद् इति एवमर्थः किसीको ऐसी शङ्का न हो कि ज्ञेय उन उपाधियोंवाला

श्लोकारम्भः - है, इस अभिप्रायसे यह श्लोक कहते हैं—

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वाणि च तानि । इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रिया-ख्यानि अन्तःकरणे च बुद्धिमनसी ज्ञेयोपाधि-त्वस्य तुल्यत्वात् सर्वेन्द्रियग्रहणेन गृह्यन्ते । अपि च अन्तःकरणोपाधिद्वारेण एव श्रोत्रादीनाम् अपि उपाधित्वम् इति । वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंके गुणोंसे अवभासित ( प्रतीत ) होनेवाला है । यहाँ श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ, वाकू आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन और बुद्धि ये दोनों अन्त: करण – इन सबका सर्व इन्द्रियोंके नामसे ग्रहण है; क्योंकि अन्त: करण भी ज्ञेयकी उपाधिके रूपमें अन्य इन्द्रियोंके समान ही है, बल्कि श्रोत्रादिका भी उपाधित्व अन्त: करणरूप उपाधिके द्वारा ही है ।

पृष्ठ 327

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३२७ अतः अन्तःकरणबहिष्करणोपाधिभूतैः सर्वेन्द्रियगुणैः अध्यवसायसङ्कल्पश्रवण-वचनादिभिः अवभासते इति सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियव्यापारैः व्यापृतम् इव तद् ज्ञेयम् इत्यर्थः । ' ध्यायतीव लेलायतीव ' ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ७ ) इति श्रुतेः । कस्मात् पुनः कारणाद् न व्यापृतम् एव इति गृह्यते इति अत आह— सर्वेन्द्रियविवर्जितं सर्वकरणरहितम् इत्यर्थः । अतो न करणव्यापारैः व्यापृतं तद् ज्ञेयम् । यः तु अयं मन्त्रः—— अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: ' ( श्वे ० उ ० ३। १ ९ ) इत्यादिः स सर्वेन्द्रियोपाधिगुणानुगुण्य-भजनशक्तिमत् तद् ज्ञेयम् इति एवं प्रदर्शनार्थो न तु साक्षाद् एव जवनादिक्रियावत्त्व-प्रदर्शनार्थः । ' अन्धो मणिमविन्दत ' ( तै ० आ ० १ । ११ ) इत्यादिमन्त्रार्थवत् तस्य मन्त्रस्य अर्थः । यस्मात् सर्वकरणवर्जितं ज्ञेयं तस्माद् असक्तं सर्वसंश्लेषवर्जितम् । यद्यपि एवं तथापि सर्वभृत् च एव । सदास्पदं हि सर्वं सर्वत्र सबुद्ध्यनुगमात् । न हि मृगतृष्णिकादयः अपि निरास्पदा भवन्ति । अतः सर्वभृत् सर्वं बिभर्ति इति । इसलिये यह अभिप्राय है कि उपाधिरूप अन्तः-करण और बाह्यकरण, इन सभी इन्द्रियोंके गुण जो निश्चय, संकल्प, श्रवण और भाषण आदि हैं, उनके द्वारा वह ज्ञेय प्रतिभासित होता है अर्थात् उन इन्द्रियोंकी क्रियासे वह क्रियावान् - सा दिखलायी देता है । ' ध्यान करता हुआ - सा, चेष्टा करता हुआ - सा ' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । तो फिर उस ज्ञेयको स्वयं क्रिया करनेवाला ही क्यों नहीं मान लिया जाता? इसपर कहते हैं— वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है अर्थात् सब करणोंसे रहित है । इसलिये वह इन्द्रियोंके व्यापारसे ( वास्तवमें ) व्यापारवाला नहीं होता । यह जो मन्त्र है कि ' वह ( ईश्वर ) बिना पैर और हाथके चलता और ग्रहण करता है, बिना चक्षुके देखता और बिना कानोंके सुनता है ' सो इस अभिप्रायको दिखानेके लिये है कि वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियरूप उपाधियोंके गुणोंकी अनुरूपता प्राप्त करनेमें समर्थ है, उसे साक्षात् गमनादि क्रियाओंसे युक्त बतलानेके लिये यह मन्त्र नहीं है । ' अन्धेने मणि प्राप्त की ' इत्यादि मन्त्रोंके अर्थकी भाँति उस मन्त्रका अर्थ है! वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है, इसलिये संगरहित है अर्थात् सब प्रकारके सम्बन्धोंसे रहित है । यद्यपि यह बात है तो भी वह ज्ञेय सबको धारण करनेवाला है । सद्बुद्धि सर्वत्र व्याप्त है, अतः सत् ही सबका अधिष्ठान है । मृगतृष्णिकादि मिथ्या पदार्थ भी बिना अधिष्ठानके नहीं होते, इसलिये वह ज्ञेय सबका धारण करनेवाला है ।

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३२८ * श्रीमद्भगवद्गीता * स्याद् इदं च अन्यद् ज्ञेयस्य सत्त्वाधिगम- उस ज्ञेयकी सत्ताको बतलानेवाला यह दूसरा द्वारं निर्गुणं सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः तैः वर्जितं साधन भी है । वह ज्ञेय निर्गुण यानी सत्त्व, रज और तद् ज्ञेयं तथापि गुणभोक्तृ च गुणानां तम- इन तीनों गुणोंसे अतीत है तो भी गुणोंका भोक्ता सत्त्वरजस्तमसां शब्दादिद्वारेण सुखदुःख- है अर्थात् वह ज्ञेय सुख - दुःख और मोहके रूपमें मोहाकारपरिणतानां भोक्तृ च उपलब्ध तद् परिणत हुए तीनों गुणोंका शब्दादिद्वारा भोग करनेवाला— ज्ञेयम् इत्यर्थः ॥ १४ ॥ उन्हें उपलब्ध करनेवाला है ॥ १४ ॥

किं च-बहिरन्तश्च भूतानामचरं सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं बहिः त्वक्पर्यन्तं देहम् आत्मत्वेन अविद्या-कल्पितम् अपेक्ष्य तम् एव अवधिं कृत्वा बहिः उच्यते । तथा प्रत्यगात्मानम् अपेक्ष्य देहम् एव अवधिं कृत्वा अन्तः उच्यते । बहिः अन्तः च इति उक्ते मध्ये अभावे प्राप्ते इदम् उच्यते— अचरं चरम् एव च यत् चराचरं देहाभासम् अपि तद् एव ज्ञेयं यथा रज्जुसर्पाभासः । यदि अचरं चरम् एव च व्यवहारविषयं सर्वं ज्ञेयं किमर्थम् इदम् इति सर्वैः न विज्ञेयम्, इति उच्यते- -सत्यम्, सर्वाभासं तत् तथापि व्योमवत् सूक्ष्मम् अतः सूक्ष्मत्वात् स्वेन रूपेण तद् ज्ञेयम् अपि अविज्ञेयम् अविदुषाम् । विदुषां तु ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ० उ ० ७ । २५। २ ) ‘ ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( बृह ० उ ० २ । ५ । १ ) इत्यादिप्रमाणतो नित्यं विज्ञातम् — तथा—

चरमेव च ।

चान्तिके च तत् ॥१५ ॥

अविद्याद्वारा आत्मभावसे कल्पित शरीरको त्वचापर्यन्त अवधि मानकर उसीकी अपेक्षासे ज्ञेयको उसके बाहर बतलाते हैं । वैसे ही अन्तरात्माको लक्ष्य करके तथा शरीरको ही अवधि मानकर ज्ञेयको उसके भीतर ( व्याप्त ) बतलाया जाता है । बाहर और भीतर व्याप्त है - ऐसा कहने से मध्यमें उसका अभाव प्राप्त हुआ, इसलिये कहते हैं— चर और अचररूप भी वही है अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले जो चर - अचररूप शरीरके आभास हैं, वह भी उस ज्ञेयका ही स्वरूप है । यदि चर और अचररूप समस्त व्यवहारका विषय वह ज्ञेय ( परमात्मा ) ही है, तो फिर वह ‘ यह है ' इस प्रकार सबसे क्यों नहीं जाना जा सकता? इसपर कहते हैं— ठीक है, सारा दृश्य उसीका स्वरूप है, तो भी वह ज्ञेय आकाशकी भाँति अति सूक्ष्म है । अतः यद्यपि वह आत्मरूपसे ज्ञेय है, तो भी सूक्ष्म होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये अविज्ञेय ही है ज्ञानी पुरुषोंके लिये तो, ' यह सब कुछ आत्मा ही है ' ' यह सब कुछ ब्रह्म ही है ' इत्यादि प्रमाणोंसे वह सदा ही प्रत्यक्ष रहता है ।

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३२ ९ अविज्ञाततया दूरस्थं वर्षसहस्त्रकोट्यापि वह ज्ञेय अज्ञात होनेके कारण और हजारों-करोड़ों वर्षोंतक भी प्राप्त न हो सकनेके कारण अविदुषाम् अप्राप्यत्वाद् अन्तिके च तद् अज्ञानियोंके लिये बहुत दूर है, किंतु ज्ञानियोंका तो आत्मत्वाद् विदुषाम् ॥ १५ ॥ वह आत्मा ही है; अतः उनके निकट ही है ॥ १५ ॥

किं च- तथा—

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥

अविभक्तं च प्रतिदेहं व्योमवत् तद् एकं भूतेषु सर्वप्राणिषु विभक्तम् इव च स्थितं देहेषु एव विभाव्यमानत्वात् । भूतभर्तृ च भूतानि बिभर्ति इति तद् ज्ञेयं भूतभर्तृ च स्थितिकाले । प्रलयकाले ग्रसिष्णु ग्रसनशीलम् । उत्पत्तिकाले प्रभविष्णु च प्रभवनशीलम् । यथा रज्ज्वादिः सर्पादेः मिथ्याकल्पितस्य ॥ १६ ॥

वह ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके समान अविभक्त और एक है । तो भी समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआ-सा स्थित है; क्योंकि उसकी प्रतीति शरीरोंमें ही हो रही है । तथा वह ज्ञेय स्थितिकालमें भूतभर्तृ - भूतोंका धारण - पोषण करनेवाला, प्रलयकालमें ग्रसिष्णु– सबका संहार करनेवाला और उत्पत्तिके समय प्रभविष्णु— सबको उत्पन्न करनेवाला है, जैसे कि मिथ्याकल्पित सर्पादिके ( उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कारण ) रज्जु आदि होते हैं ॥ १६ ॥

किं च सर्वत्र विद्यमानं सद् न उपलभ्यते यदि सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी ज्ञेय प्रत्यक्ष नहीं होता, तो क्या वह अन्धकार है? नहीं चेद् ज्ञेयं तमः तर्हि । न किं तर्हि - तो क्या है— ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि ज्योतिषाम् आदित्यानाम् अपि तद् ज्ञेयं ज्योतिः । आत्मचैतन्यज्योतिषा इद्धानि हि आदित्यादीनि ज्योतींषि दीप्यन्ते । ' येन सूर्यस्तपति तेजसेद्ध: ' ' तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' ( श्वे ० उ ० ६ । १४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । स्मृतेः च इह एव ' यदादित्यगतं

तेज: ' इत्यादेः ।

सर्वस्य विष्ठितम् ॥१७ ॥

वह ज्ञेय ( परमात्मा ) समस्त सूर्यादि ज्योतियोंका भी परम ज्योति है; क्योंकि आत्मचैतन्यके प्रकाशसे देदीप्यमान होकर ही ये सूर्य आदि समस्त ज्योतियाँ प्रकाशित हो रही हैं । ' जिस तेजसे प्रदीप्त होकर सूर्य तपता है ' ' उसीके प्रकाशसे यह सब कुछ प्रकाशित है ' इत्यादि श्रुतिप्रमाणोंसे और यहीं कहे हुए ' यदादित्यगतं तेजः ' इत्यादि स्मृतिवाक्योंसे भी उपर्युक्त बात ही सिद्ध होती है ।

पृष्ठ 330

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३३० * श्रीमद्भगवद्गीता * तमसः अज्ञानात् परम् अस्पृष्टम् उच्यते । ज्ञानादेः दुःसम्पादनबुद्ध्या प्राप्तावसादस्य उत्तम्भनार्थम् आह— ज्ञानम् अमानित्वादि । ज्ञेयम् ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ' इत्यादिना उक्तम् ज्ञानगम्यं ज्ञेयम् एव ज्ञातं सद् ज्ञानफलम् इति ज्ञानगम्यम् उच्यते । ज्ञायमानं तु ज्ञेयम् । तद् एतत् त्रयम् अपि हृदि बुद्धौ सर्वस्य प्राणिजातस्य विष्ठितं विशेषेण स्थितम् । तत्र एव हि त्रयं विभाव्यते ॥ १७ ॥

तथा वह ज्ञेय अन्धकारसे - अज्ञानसे परे अर्थात् अस्पृष्ट बतलाया जाता है । ज्ञान आदिका सम्पादन करना बहुत दुर्घट है— ऐसी बुद्धिसे उत्साहरहित - खिन्नचित्त हुए साधकको उत्साहित करनेके लिये कहते हैं-ज्ञान अर्थात् अमानित्व आदि ज्ञानके साधन, ज्ञेय अर्थात् ‘ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ' इत्यादि वाक्योंसे बतलाया हुआ परमात्माका स्वरूप और ज्ञानगम्य – ज्ञेय ही जान लिया जानेपर ज्ञानका फल होनेके कारण ( पहले ) ज्ञानगम्य कहा जाता है और जब जान लिया जाता है उस अवस्थामें ज्ञेय कहलाता है । ये तीनों ही समस्त प्राणिमात्रके अन्तःकरणमें विशेषरूपसे स्थित हैं; क्योंकि ये तीनों वहीं प्रकाशित होते हैं ॥ १७ ॥

यथोक्तार्थोपसंहारार्थः अयं श्लोक उपर्युक्त समस्त अर्थका उपसंहार करनेके लिये आरभ्यते— यह श्लोक आरम्भ किया जाता है— इति क्षेत्रं क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय इति एवं क्षेत्रं महाभूतादि धृत्यन्तं तथा ज्ञानम् अमानित्वादि तत्त्वज्ञानार्थदर्शनपर्यन्तं ज्ञेयं च ' ज्ञेयं यत्तत् ' इत्यादि ' तमसः परमुच्यते ' इत्येवमन्तम् उक्तं समासतः सङ्क्षेपतः । एतावान् सर्वो हि वेदार्थो गीतार्थः च उपसंहृत्य उक्तः । अस्मिन् सम्यग्दर्शने कः अधिक्रियते इति उच्यते-मद्भक्तो मयि ईश्वरे सर्वज्ञे परमगुरौ वासुदेवे समर्पितसर्वात्मभावो यत् पश्यति शृणोति स्पृशति वा सर्वम् एव भगवान् वासुदेव इति

एवं ग्रहाविष्टबुद्धिः मद्भक्तः ।

मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥

इस प्रकार यह महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त क्षेत्रका स्वरूप, ' अमानित्व ' आदिसे लेकर‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शन ’ पर्यन्त ज्ञानका स्वरूप और ' ज्ञेयं यत्तत् ' यहाँसे लेकर ' तमसः परमुच्यते ' यहाँतक ज्ञेयका स्वरूप, संक्षेपसे कह दिया गया । यह सब वेदोंका और गीताका अर्थ इकट्ठा करके कहा गया है । इस यथार्थ ज्ञानका अधिकारी कौन है, सो कहा जाता है— मेरा भक्त अर्थात् मुझ सर्वज्ञ, परमगुरु, वासुदेव परमेश्वरमें अपने सारे भावोंको जिसने अर्पण कर दिया है । जिस किसी भी वस्तुको देखता, सुनता और स्पर्श करता है, उस सबमें ' सब कुछ भगवान् वासुदेव ही है ' ऐसी निश्चित बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है ।