श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 331–340

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३३१ स एतद् यथोक्तं सम्यग्दर्शनं विज्ञाय मद्भावाय वह उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानको समझकर मेरे भावको मम भावो मद्भावः परमात्मभावः तस्मै मद्भावाय अर्थात् मेरा जो परमात्मभाव है, उसको प्राप्त करनेमें उपपद्यते मोक्षं गच्छति ॥ १८ ॥ समर्थ होता है, अर्थात् मोक्ष - लाभ कर लेता है ॥ १८ ॥

तत्र सप्तमे ईश्वरस्य द्वे प्रकृती उपन्यस्ते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे । एतद्योनीनि भूतानि इति च उक्तम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वययोनित्वं कथं भूतानाम् इति अयम् अर्थः अधुना उच्यते-सातवें अध्यायमें ईश्वरकी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप अपरा और परा — दो प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये दोनों प्रकृतियाँ समस्त प्राणियोंकी योनि ( कारण ) हैं । अब यह बात | बतलायी जाती है कि वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों प्रकृतियाँ सब भूतोंकी योनि किस प्रकार हैं-प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १ ९ ॥ प्रकृतिं पुरुषं च एव ईश्वरस्य प्रकृती तौ प्रकृतिपुरुषौ उभौ अपि अनादी विद्धि । न विद्यते आदिः ययोः तौ अनादी । नित्येश्वरत्वाद् ईश्वरस्य तत्प्रकृत्योः अपि युक्तं नित्यत्वेन भवितुम् । प्रकृतिद्वयवत्वम् एव हि ईश्वरस्य ईश्वरत्वम् । याभ्यां प्रकृतिभ्याम् ईश्वरो जगदुत्पत्ति-स्थितिप्रलयहेतुः ते द्वे अनादी सत्यौ संसारस्य कारणम् । न आदी अनादी इति तत्पुरुषसमासं केचिद् वर्णयन्ति । तेन हि किल ईश्वरस्य कारणत्वं सिध्यति । यदि पुनः प्रकृतिपुरुषौ एव नित्यौ स्यातां तत्कृतम् एव जगद् न ईश्वरस्य जगतः कर्तृत्वम् । तद् असत्, प्राक् प्रकृतिपुरुषयोः उत्पत्तेः ईशितव्याभावाद् ईश्वरस्य अनीश्वरत्वप्रसङ्गात् । प्रकृति और पुरुष जो कि ईश्वरकी प्रकृतियाँ हैं, उन दोनोंको ही तू अनादि जान । जिनका आदि न हो उनका नाम अनादि है । ईश्वरका ईश्वरत्व नित्य होनेके कारण उसकी दोनों प्रकृतियोंका भी नित्य होना उचित ही है; क्योंकि इन दोनों प्रकृतियोंसे युक्त होना ही ईश्वरकी ईश्वरता है । जिन दोनों प्रकृतियोंद्वारा ईश्वर जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण है, वे दोनों अनादिसिद्ध ही संसारकी कारण हैं । कोई - कोई टीकाकार ' जो आदि ( कारण ) नहीं हैं वे अनादि कहे जाते हैं, इस प्रकार यहाँ तत्पुरुष-समासका वर्णन करते हैं ( और कहते हैं कि ) इससे केवल ईश्वर ही जगत्का कारण है, यह बात सिद्ध होती है । यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य माना जाय तो संसार उन्हींका रचा हुआ माना जायगा, ईश्वर जगत्का कर्ता सिद्ध न होगा । ' किंतु ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि ( यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य न माने तो ) प्रकृति और पुरुषकी उत्पत्तिसे पूर्व शासन करने योग्य वस्तुका अभाव होनेसे ईश्वरमें अनीश्वरताका प्रसङ्ग आ जाता है ।

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३३२ * श्रीमद्भगवद्गीता * संसारस्य निर्निमित्तत्वे अनिर्मोक्षत्वप्रसङ्गात् शास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गाद् बन्धमोक्षाभावप्रसङ्गात् च । नित्यत्वे पुनः ईश्वरस्य प्रकृत्योः सर्वम् एतद् उपपन्नं भवेत् । कथम्— विकारान् च गुणान् च एव वक्ष्यमाणान् विकारान् बुद्ध्यादिदेहेन्द्रियान् तान् गुणान् च सुखदुःखमोहप्रत्ययाकारपरिणतान् विद्धि जानीहि प्रकृतिसम्भवान् । प्रकृतिः ईश्वरस्य विकारकारणशक्तिः त्रिगुणात्मिका माया सा सम्भवो येषां विकाराणां गुणानां च तान् विकारान् गुणान् च विद्धि प्रकृतिसम्भवान् प्रकृतिपरिणामान् ॥ १ ९ ॥ तथा संसारको बिना निमित्तके उत्पन्न हुआ माननेसे उसके अन्तके अभावका प्रसङ्ग, शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग और बन्ध - मोक्षके अभावका प्रसङ्ग प्राप्त होता है, ( इसलिये भी उपर्युक्त अर्थ ठीक नहीं है । ) परंतु ईश्वरकी इन दोनों प्रकृतियोंको नित्य मान लेनेसे यह सब व्यवस्था ठीक हो जाती है । कैसे? ( सो कहते हैं— ) विकारोंको और गुणों को तू प्रकृतिसे उत्पन्न जान अर्थात् बुद्धिसे लेकर शरीर और इन्द्रियोंतक अगले

श्लोकमें बतलाये हुए विकारोंको तथा सुख - दुःख

और मोह आदि वृत्तियोंके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान । अभिप्राय यह है कि विकारोंकी कारणरूपा जो ईश्वरकी त्रिगुणमयी मायाशक्ति है, उसका नाम प्रकृति है । वह जिन विकारों और गुणोंको उत्पन्न करनेवाली है, उन विकारों और गुणोंको तू प्रकृतिजनित— प्रकृतिके ही परिणाम समझ ॥ १ ९ ॥ के पुनः ते विकारा गुणाः प्रकृतिसे उत्पन्न हुए वे विकार और गुण कौन-प्रकृतिसम्भवाः से हैं? -कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥

कार्यकरणकर्तृत्वे कार्यं शरीरं करणानि तत्स्थानि त्रयोदश । देहस्य आरम्भकाणि भूतानि विषयाः च प्रकृतिसम्भवा विकाराः पूर्वोक्ता इह कार्यग्रहणेन गृह्यन्ते, गुणाः च प्रकृतिसम्भवाः सुखदुःख -मोहात्मकाः करणाश्रयत्वात् करणग्रहणेन गृह्यन्ते । कार्य शरीरको कहते हैं और उसमें स्थित ( मन, बुद्धि, अहंकार तथा दस इन्द्रियाँ - ये ) तेरह करण हैं । इनके कर्तापनमें ( हेतु प्रकृति है ) । शरीरको उत्पन्न करनेवाले पाँच भूत और शब्द आदि पाँच विषय ये पहले कहे हुए प्रकृतिजन्य दस विकार तो यहाँ कार्यके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं और सुख - दुःख, मोह आदिके रूपमें परिणत हुए प्रकृतिजन्य समस्त गुण बुद्धि आदि करणोंके आश्रित होनेके कारण करणोंके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं ।

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३३३ तेषां कार्यकरणानां कर्तृत्वम् उत्पादकत्वं यत् तत् कार्यकरणकर्तृत्वं तस्मिन् कार्यकरण-कर्तृत्वे हेतुः कारणम् आरम्भकत्वेन प्रकृति: उच्यते । एवं कार्यकरणकर्तृत्वेन संसारस्य कारणं प्रकृतिः । कार्यकारणकर्तृत्वे इति अस्मिन् अपि पाठे कार्यं यद् यस्य विपरिणामः तत् तस्य कार्यं विकारो विकारि कारणं तयोः विकार विकारिणोः कार्यकारणयोः कर्तृत्वे इति । अथवा षोडश विकाराः कार्यम्, सप्त प्रकृतिविकृतयः कारणम्, तानि एव कार्यकारणानि उच्यन्ते । तेषां कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः उच्यते आरम्भकत्वेन एव । पुरुषः च संसारस्य कारणं यथा स्यात् तद् उच्यते-पुरुषोः जीवः क्षेत्रज्ञो भोक्ता इति पर्याय: सुखदुःखानां भोग्यानां भोक्तृत्वे उपलब्धृत्वे हेतुः उच्यते । कथं पुनः अनेन कार्यकरणकर्तृत्वेन सुख-दुःखभोक्तृत्वेन च प्रकृतिपुरुषयोः संसार-कारणत्वम् उच्यते इति । अत्र उच्यते । कार्यकरणसुखदुःखरूपेण हेतुफलात्मना प्रकृतेः परिणामाभावे पुरुषस्य चेतनस्य असति तदुपलब्धृत्वे कुतः संसारः स्यात् । यदा पुनः कार्यकरणरूपेण हेतुफलात्मना परिणतया प्रकृत्या भोग्यया पुरुषस्य तद्विपरीतस्य भोक्तृत्वेन अविद्यारूपः संयोगः स्यात् तदा संसारः स्याद् इति । ' उन कार्य और करणोंका जो कर्तापन अर्थात् उनको उत्पन्न करनेका भाव है उसका नाम कार्यकरण-कर्तृत्व है, उन कार्यकरणोंके कर्तृत्वमें आरम्भ करनेवाली होनेसे प्रकृति कारण कही जाती है । इस प्रकार कार्यकरणोंको उत्पन्न करनेवाली होनेसे प्रकृति संसारकी कारण है । ‘ कार्यकारणकर्तृत्वे ' ऐसा पाठ माननेसे भी यही अर्थ होगा कि जो जिसका परिणाम है, वह उसका कार्य अर्थात् विकार है और कारण विकारी - विकृत होनेवाला है । उन विकारी और विकाररूप कारण और कार्योंके उत्पन्न करनेमें ( प्रकृति हेतु है ) । अथवा सोलह विकार तो कार्य और सात प्रकृति-विकृति कारण हैं, इस प्रकार ये ( तेईस तत्त्व ) ही कार्यकारणके नामसे कहे जाते हैं । इनके कर्तापनमें प्रारम्भकत्वसे ही प्रकृति हेतु कही जाती है । पुरुष भी जिस प्रकार संसारका कारण होता है, सो कहा जाता है— पुरुष अर्थात् जीव, क्षेत्रज्ञ, " भोक्ता इत्यादि जिसके पर्याय शब्द हैं, वह सुख - दुःख आदि भोगोंके भोक्तापनमें अर्थात् उनका उपभोग करनेमें हेतु कहा जाता पू ० – परंतु इस कार्यकरणके कर्तापनसे और सुख - दुःखके भोक्तापनसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको संसारका कारण कैसे बतलाया जाता है? उ ० – कार्यकरण और सुख - दुःखादिरूप हेतु और फलके आकारमें प्रकृतिका परिणाम न होनेपर तथा चेतन पुरुषमें उन सबका भोक्तापन न होनेसे संसार कैसे सिद्ध होगा । जब कार्यकरणरूप हेतु और फलके आकारमें परिणत हुई भोग्यरूपा प्रकृतिके साथ उससे विपरीत धर्मवाले पुरुषका, भोक्ता भावसे अविद्यारूप संयोग होगा, तभी संसार ( प्रतीत ) होगा ।

पृष्ठ 334

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३३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * अतो यत् प्रकृतिपुरुषयोः कार्यकरणकर्तृत्वेन सुखदुःखभोक्तृत्वेन च संसारकारणत्वम् उक्तं तद् युक्तम् । कः पुनः अयं संसारो नाम, सुखदुःखसम्भोगः संसारः पुरुषस्य च सुखदुःखानां सम्भोक्तृत्वं संसारित्वम् इति ॥ २० ॥

इसलिये प्रकृतिके कार्यकरणविषयक कर्तापन और पुरुषके सुख - दुःखविषयक भोक्तापनको लेकर जो उन दोनोंका संसार - कारणत्व प्रतिपादन किया गया, वह उचित ही है I पू ० – तो यह संसारनामक वस्तु क्या है? उ ० – सुख - दुःखोंका भोग ही संसार है और पुरुषमें जो सुख - दुःखोंका भोक्तृत्व है, यही उसका संसारित्व है ॥ २० ॥

यत् पुरुषस्य सुखदुःखानां भोक्तृत्वं यह जो कहा कि सुख - दु: खोंका भोक्तृत्व ही संसारित्वम् इति उक्तं तस्य तत् किन्निमित्तम् पुरुषका संसारित्व है, सो वह उसमें किस कारणसे इति उच्यते- है? यह बतलाते हैं— पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य पुरुषो भोक्ता प्रकृतिस्थः प्रकृतौ अविद्या-लक्षणायां कार्यकरणरूपेण परिणतायां स्थितः प्रकृतिस्थः प्रकृतिम् आत्मत्वेन गत इति एतद् हि यस्मात् तस्माद् भुङ्क्ते उपलभते इत्यर्थ: । प्रकृतिजान् प्रकृतितो जातान् सुखदुःख -मोहाकाराभिव्यक्तान् गुणान् सुखी दुःखी मूढः पण्डितः अहम् इति एवम् । सत्याम् अपि अविद्यायां सुखदुःखमोहेषु गुणेषु भुज्यमानेषु यः सङ्ग आत्मभावः संसारस्य स प्रधानं कारणं जन्मनः ' स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति ' ( बृ ० उ ० ४। ४। ५ ) इत्यादि श्रुतेः । तद् एतद् आह कारणं हेतुः गुणसङ्गो गुणेषु

सङ्गः अस्य पुरुषस्य भोक्तुः सदसद्योनिजन्मसु ।

सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥

क्योंकि पुरुष - जीवात्मा प्रकृतिमें स्थित है अर्थात् कार्य और करणके रूपमें परिणत हुई अविद्यारूपा प्रकृतिमें स्थित है - प्रकृतिको अपना स्वरूप मानता है, इसलिये वह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सुख - दुःख और मोहरूपसे प्रकट गुणोंको ' मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, मूढ़ हूँ, पण्डित हूँ ' इस प्रकार मानता हुआ भोगता है अर्थात् उनका उपभोग करता है । यद्यपि जन्मका कारण अविद्या है तो भी भोगे जाते हुए सुख - दुःख और मोहरूप गुणोंमें जो आसक्त हो जाना है— तद्रूप हो जाना है, वह जन्मरूप संसारका प्रधान कारण है । ' वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही कर्म करता है ' इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है । इसी बातको भगवान् कहते हैं कि गुणोंका सङ्ग ही अर्थात् गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुषके अच्छी - बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है ।

पृष्ठ 335

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३३५ सत्यः च असत्यः च योनयः सदसद्योनयः तासु सदसद्योनिषु जन्मानि सदसद्योनिजन्मानि तेषु सदसद्योनिजन्मसु विषयभूतेषु कारणं गुणसङ्गः । अथवा सदसद्योनिजन्मसु अस्य संसारस्य कारणं गुणसङ्ग इति संसारपदम् अध्याहार्यम् । सद्योनयो देवादियोनयः असद्योनयः पश्वादियोनयः । सामर्थ्यात् सदसद्योनयो मनुष्ययोनयः अपि अविरुद्धा द्रष्टव्याः । एतद् उक्तं भवति प्रकृतिस्थत्वाख्या अविद्या गुणेषु स सङ्गः कामः संसारस्य कारणम् इति । तत् च परिवर्जनाय उच्यते । अस्य च निवृत्तिकारणं ज्ञानवैराग्ये ससंन्यासे गीताशास्त्रे प्रसिद्धम् । तत् च ज्ञानं पुरस्ताद् उपन्यस्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञ -विषयम् । ‘ यज्ज्ञात्वामृतमश्रुते ' इति उक्तं च अन्यापोहेन अतद्धर्माध्यारोपेण च ॥ २१ ॥

अच्छी और बुरी योनियोंका नाम सदसत् योनि है, उनमें जन्मोंका होना सदसद्योनिजन्म है, इन भोग्यरूप सदसद्योनिजन्मोंका कारण गुणोंका सङ्ग ही है । अथवा संसारपदका अध्याहार करके यह अर्थ कर लेना चाहिये कि अच्छी और बुरी योनियोंमें जन्म लेकर गुणोंका सङ्ग करना ही इस संसारका कारण है । देवादि योनियाँ सत् योनि हैं और पशु आदि योनियाँ असत् योनि हैं । प्रकरणकी सामर्थ्यसे मनुष्य-योनियोंको भी सत् - असत् योनियाँ माननेमें ( किसी प्रकारका ) विरोध नहीं समझना चाहिये । कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनारूप अविद्या और गुणोंका सङ्ग - आसक्ति ये ही दोनों संसारके कारण हैं और वे छोड़नेके लिये ही बतलाये गये हैं । गीताशास्त्रमें इनकी निवृत्तिके साधन संन्यासके सहित ज्ञान और वैराग्य प्रसिद्ध हैं । वह क्षेत्रक्षेत्रज्ञविषयक ज्ञान पहले बतलाया ही गया है । साथ ही ( ' न सत्तन्नासदुच्यते ' इत्यादि कथनसे ) अन्यों ( धर्मों ) - का निषेध करके और ( ‘ सर्वतः पाणिपादम् ' इत्यादि कथनसे ) अनात्म धर्मोंका अध्यारोप करके ज्ञेयके स्वरूपका भी ' यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ' आदि वचनोंसे प्रतिपादन किया गया है ॥ २१ ॥

तस्य एव पुनः साक्षाद् निर्देशः क्रियते —1 उसीका फिर साक्षात् निर्देश किया जाता है- I

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥२२ ॥

उपद्रष्टा समीपस्थः सन् द्रष्टा स्वयम् अव्यापृतो ( यह आत्मा ) उपद्रष्टा है अर्थात् स्वयं क्रिया यथा ऋत्विग्यजमानेषु यज्ञकर्मव्यापृतेषु न करता हुआ पासमें स्थित होकर देखनेवाला है । जैसे कोई यज्ञविद्यामें कुशल अन्य पुरुष स्वयं तटस्थः अन्यः अव्यापृतो यज्ञविद्याकुशल यज्ञ न करता हुआ, यज्ञकर्ममें लगे हुए पुरोहित

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३३६ * श्रीमद्भगवद्गीता * ऋत्विग्यजमानव्यापारगुणदोषाणाम् ईक्षिता तद्वत् कार्यकरणव्यापारेषु अव्यापृतः अन्यो विलक्षणः तेषां कार्यकरणानां सव्यापाराणां सामीप्येन द्रष्टा उपद्रष्टा । अथवा देहचक्षुर्मनोबुद्ध्यात्मानो द्रष्टारः, तेषां बाह्यो द्रष्टा देहः, तत आरभ्य अन्तरतमः च प्रत्यक्समीप आत्मा द्रष्टा यतः परो अन्तरो न अस्ति द्रष्टा स अतिशयसामीप्येन द्रष्टृत्वाद् उपद्रष्टा स्यात् । यज्ञोपद्रष्टृवद् वा सर्वविषयीकरणाद् उपद्रष्टा । अनुमन्ता च अनुमोदनम् अनुमननं कुर्वत्सु तत्क्रियासु परितोषः तत्कर्ता अनुमन्ता च । अथवा अनुमन्ता कार्यकरणप्रवृत्तिषु स्वयम् अप्रवृत्तः अपि प्रवृत्त इव तदनुकूलो विभाव्यते तेन अनुमन्ता । अथवा प्रवृत्तान् स्वव्यापारेषु तत्साक्षिभूतः कदाचिद् अपि न निवारयति इति अनुमन्ता । भर्ता भरणं नाम देहेन्द्रियमनोबुद्धीनां संहतानां चैतन्यात्मपारार्थ्येन निमित्तभूतेन चैतन्याभासानां यत् स्वरूपधारणं तत् चैतन्यात्मकृतम् एव इति भर्ता आत्मा इति उच्यते । भोक्ता अग्न्युष्णवद् नित्यचैतन्यस्वरूपेण बुद्धेः सुखदुःखमोहात्मकाः प्रत्ययाः सर्वविषय-विषयाः चैतन्यात्मग्रस्ता इव जायमाना विभक्ता विभाव्यन्ते इति भोक्ता आत्मा उच्यते । | और यजमानोंद्वारा किये हुए कर्मसम्बन्धी गुण-दोषोंको तटस्थभावसे देखता है, उसी प्रकार कार्य और करणोंके व्यापारमें स्वयं न लगा हुआ उनसे अन्य - विलक्षण आत्मा उन व्यापारयुक्त कार्य और करणोंको समीपस्थभावसे देखनेवाला है । अथवा देह, चक्षु, मन, बुद्धि और आत्मा - ये सभी द्रष्टा हैं, उनमें बाह्य द्रष्टा शरीर है और उससे लेकर उन सबकी अपेक्षा अन्तरतम - समीपस्थ द्रष्टा अन्तरात्मा है । जिसकी अपेक्षा और कोई आन्तरिक द्रष्टा न हो, वह अतिशय सामीप्यभावसे देखनेवाला होनेके कारण उपद्रष्टा होता है ( अतः आत्मा उपद्रष्टा है ) । अथवा ( यों समझो कि ) यज्ञके उपद्रष्टाकी भाँति सबका अनुभव करनेवाला होनेसे आत्मा उपद्रष्टा है । तथा यह अनुमन्ता है- क्रिया करनेमें लगे हुए अन्तःकरण और इन्द्रियादिकी क्रियाओंमें संतोषरूप अनुमोदनका नाम अनुमनन है, उसका करनेवाला है । अथवा यह इसीलिये अनुमन्ता है कि कार्यकरणकी प्रवृत्तिमें स्वयं प्रवृत्त न होता हुआ भी उनके अनुकूल प्रवृत्त हुआ - सा दीखता है । अथवा अपने व्यापारमें लगे हुए अन्त: करण और इन्द्रियादिको उनका साक्षी होकर भी कभी निवारण नहीं करता, इसलिये अनुमन्ता है । तथा यह भर्ता है, चैतन्यस्वरूप आत्माके भोग और अपवर्गकी सिद्धिके निमित्तसे संहत हुए चैतन्यके आभासरूप शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका स्वरूप धारण करना भी भरण है और वह चैतन्यरूप आत्माका ही किया हुआ है, इसलिये आत्माको भर्ता कहते हैं । आत्मा भोक्ता है । अग्निके उष्णत्वकी भाँति नित्य-चैतन्य आत्मसत्तासे समस्त विषयोंमें पृथक् - पृथक् होनेवाली जो बुद्धिकी सुख - दुःख और मोहरूप प्रतीतियाँ हैं, वे सब चैतन्य आत्माद्वारा ग्रस्त की हुई - सी दीखती हैं, अतः आत्माको भोक्ता कहा जाता है ।

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३३७ महेश्वरः सर्वात्मत्वात् स्वतन्त्रत्वात् च महान् ईश्वरः च इति महेश्वरः । परमात्मा देहादीनां बुद्ध्यन्तानां प्रत्यगात्म-त्वेन कल्पितानाम् अविद्यया परम उपद्रष्टृ -त्वादिलक्षण आत्मा इति परमात्मा । ' सोऽन्तः परमात्मा ' इति अनेन शब्देन च अपि उक्तः कथितः श्रुतौ । क्व असौ, अस्मिन् देहे पुरुषः परः अव्यक्तात् । ‘ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृत: ' इति यो वक्ष्यमाणः ‘ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ' इति उपन्यस्तो व्याख्याय उपसंहृतः च ॥ २२ ॥

आत्मा महेश्वर है । वह सबका आत्मा होनेके कारण और स्वतन्त्र होनेके कारण महान् ईश्वर है, इसलिये महेश्वर है । वह परमात्मा है । अविद्याद्वारा प्रत्यक् आत्मारूप माने हुए जो शरीरसे लेकर बुद्धिपर्यन्त ( आत्मशब्दवाच्य पदार्थ ) हैं । उन सबसे उपद्रष्टा आदि लक्षणोंवाला आत्मा परम ( श्रेष्ठ ) है – इसलिये वह परमात्मा है । श्रुतिमें भी ' वह भीतर व्यापक परमात्मा है ' इन शब्दोंसे उसका वर्णन किया गया है । ऐसा आत्मा कहाँ है; वह अव्यक्तसे पर पुरुष इसी शरीरमें है जो कि ' उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृत: ' इस प्रकार आगे कहा जायगा और जो ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ' इस प्रकार पहले कहा जा चुका है तथा जिसकी व्याख्या करके उपसंहार किया गया है ॥ २२ ॥

तम् एवं यथोक्तलक्षणम् आत्मानम्— इस प्रकार उस उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको— य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि वर्तमानोऽपि न न स स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥

य एवं यथोक्तप्रकारेण वेत्ति पुरुषं साक्षाद् उस पुरुषको जो मनुष्य उपर्युक्त प्रकारसे अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे कि ' यही मैं हूँ ' अहम् इति प्रकृतिं च यथोक्ताम् अविद्यालक्षणां इस प्रकार जानता है और उपर्युक्त अविद्यारूप प्रकृतिको भी, अपने विकाररूप गुणोंके सहित, गुणैः स्वविकारैः सह निवर्तिताम् अभावम् विद्याद्वारा निवृत्त की हुई - अभावको प्राप्त की आपादितां विद्या । हुई जानता है । सर्वथा सर्वप्रकारेण वर्तमानः अपि स भूयः वह सब प्रकारसे वर्तता हुआ भी, इस पुनः पतिते अस्मिन् विद्वच्छरीरे देहान्तराय न विद्वत् - शरीरके नाश होनेपर फिर दूसरे शरीरमें अभिजायते न उत्पद्यते देहान्तरं न गृह्णाति जन्म नहीं लेता अर्थात् दूसरे शरीरको ग्रहण नहीं इत्यर्थः । करता ।

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३३८ * श्रीमद्भगवद्गीता * अपिशब्दात् किमु वक्तव्यं स्ववृत्तस्थो न जायते इति अभिप्रायः । ननु यद्यपि ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं पुन-र्जन्माभाव उक्तः तथापि प्राग् ज्ञानोत्पत्तेः कृतानां कर्मणाम् उत्तरकालभाविनां च यानि च अतिक्रान्तानेकजन्मकृतानि तेषां फलम् अदत्त्वा नाशो न युक्त इति स्युः त्रीणि जन्मानि । कृतविप्रणाशो हि न युक्त इति यथा फले प्रवृत्तानाम् आरब्धजन्मनां कर्मणाम् । न च कर्मणां विशेषः अवगम्यते । तस्मात् त्रिप्रकाराणि अपि कर्माणि त्रीणि जन्मानि आरभेरन् संहतानि वा सर्वाणि एकं जन्म आरभेरन् । अन्यथा कृतविनाशे सति सर्वत्र अनाश्वास-प्रसङ्गः शास्त्रानर्थक्यं च स्याद् इति अत इदम् अयुक्तम् उक्तं न स भूयः अभिजायते इति । न ‘ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' ( मु ० उ ० २। २ । ८ ) ‘ ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मु ० उ ० ३ । २ । ९ ) ‘ तस्य तावदेव चिरम् ' ( छा ० उ ० ६। १४ । २ ) ' इषीकातूलवत् सर्वाणि कर्माणि प्रदूयन्ते ' ( छा ० उ ० ५। २४। ३ ) इत्यादिश्रुतिशतेभ्य उक्तो विदुषः सर्वकर्मदाहः । इह अपि च उक्तः ' यथैधांसि ' इत्यादिना सर्वकर्मदाहो वक्ष्यति च । उपपत्तेः च । अविद्याकामक्लेशबीज-निमित्तानि हि कर्माणि जन्मान्तराङ्कुरम् आरभन्ते । ' अपि ' शब्दसे यह अभिप्राय है कि अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुकूल बर्तनेवाला पुनः उत्पन्न नहीं होता, इसमें तो कहना ही क्या है? पू ० — यद्यपि ज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया है, तथापि ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए, ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् किये जानेवाले और अनेक भूतपूर्व जन्मोंमें किये हुए जो कर्म हैं, फल प्रदान किये बिना उनका नाश मानना युक्तियुक्त नहीं है, अत: ( ज्ञान प्राप्त होनेके बाद भी ) तीन जन्म और होने चाहिये । अभिप्राय यह है कि सभी कर्म समान हैं, उनमें कोई भेद प्रतीत नहीं होता, अतः फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए जन्मारम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्मोंके समान ही किये हुए अन्य कर्मोंका भी ( बिना फल दिये ) नाश ( मानना ) उचित नहीं, सुतरां तीनों प्रकारके कर्म तीन जन्मोंका आरम्भ करेंगे अथवा सब मिलकर एक जन्मका ही आरम्भ करेंगे ( ऐसा मानना चाहिये ) । नहीं तो किये हुए कर्मोंका ( बिना फल दिये ) नाश माननेसे, सर्वत्र अविश्वासका प्रसंग आ जायगा और शास्त्रकी व्यर्थता सिद्ध हो जायगी । अतः यह कहना कि ' वह फिर जन्म नहीं लेता ' ठीक नहीं है । उ ० — यह बात नहीं; क्योंकि ' इसके समस्त कर्म क्षय हो जाते हैं ' ' ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है ' ' उसके ( मोक्षमें ) तभीतककी देर है ' ' अग्निमें तृणके अग्रभागकी भाँति उसके समस्त कर्म भस्म हो जाते हैं ' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा विद्वान्के सब कर्मोंका दाह होना कहा गया है । यहाँ गीताशास्त्रमें भी ' यथैधांसि ' इत्यादि श्लोकमें समस्त कर्मोंका दाह कहा गया है और आगे भी कहेंगे । युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है; क्योंकि अविद्या, कामना आदि क्लेशरूप बीजोंसे युक्त हुए ही कारणरूप कर्म अन्य जन्मरूप अंकुरका आरम्भ किया करते हैं ।

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* शांकरभाष्य अध्याय १३ * ३३ ९ इह अपि च साहंकाराभिसन्धीनि कर्माणि फलारम्भकाणि न इतराणि इति तत्र तत्र भगवता उक्तम् । ' बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः'-इति च । अस्तु तावद् ज्ञानोत्पत्त्युत्तरकालकृतानां कर्मणां ज्ञानेन दाहो ज्ञानसहभावित्वात् । न तु इह जन्मनि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक्कृतानाम् अतीतानेकजन्मान्तरकृतानां च दाहो युक्तः । न, ' सर्वकर्माणि ' इति विशेषणात् । ज्ञानोत्तरकालभाविनाम् एव सर्वकर्मणाम् इति चेत् । न, सङ्कोचे कारणानुपपत्तेः । यत् तु उक्तं यथा वर्तमानजन्मारम्भकाणि कर्माणि न क्षीयन्ते फलदानाय प्रवृत्तानि एव सति अपि ज्ञाने, तथा अनारब्धफलानाम् अपि कर्मणा क्षयो न युक्त इति । तद् असत् । कथम्, तेषां मुक्तेषुवत् प्रवृत्तफलत्वात् । यथा पूर्वं लक्ष्यवेधाय मुक्त इषुः धनुषो लक्ष्यवेधोत्तरकालम् अपि आरब्धवेगक्षयात् पतनेन एव निवर्तते एवं शरीरारम्भकं कर्म शरीरस्थितिप्रयोजने निवृत्ते अपि आसंस्कार-वेगक्षयात् पूर्ववद् वर्तते एव । यहाँ गीताशास्त्रमें भी भगवान्ने जगह - जगह कहा है कि अहंकार और फलाकाङ्क्षायुक्त कर्म ही फलका आरम्भ करनेवाले होते हैं,, अन्य नहीं । तथा ‘ जैसे अग्निमें दग्ध हुए बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञानसे दग्ध हुए क्लेशोंद्वारा आत्मा पुनः शरीर ग्रहण नहीं करता ' ऐसा भी ( शास्त्रोंका वचन है ) । पू ० – ज्ञान होनेके पश्चात् किये हुए कर्मोंका ज्ञानद्वारा दाह हो सकता है; क्योंकि वे ज्ञानके साथ होते हैं । परंतु इस जन्ममें ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए और भूतपूर्व अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंका, ज्ञानद्वारा नाश मानना उचित नहीं । उ ० - - यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि ' सारे कर्म ( दग्ध हो जाते हैं ) ' ऐसा विशेषण दिया गया है । पू ० – यदि ऐसा मानें कि ज्ञानके पश्चात् होनेवाले सब कर्मोंका ही ( ज्ञानद्वारा दाह होता है तो? ) उ ० - - यह बात नहीं है । क्योंकि ( इस प्रकारके ) संकोचका ( कोई ) कारण नहीं सिद्ध होता । तुमने जो कहा कि जैसे ज्ञान हो जानेपर भी, वर्तमान जन्मका आरम्भ करनेवाले, फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए प्रारब्धकर्म नष्ट नहीं होते, वैसे ही जिनका फल आरम्भ नहीं हुआ है, उन कर्मोंका भी नाश ( मानना ) युक्तियुक्त नहीं है, सो ऐसा कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि वे प्रारब्धकर्म छोड़े हुए बाणकी भाँति फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं, इसलिये ( उनका फल अवश्य होता है, पर अन्यका नहीं ) । जैसे पहले लक्ष्यका वेध करनेके लिये धनुषसे छोड़ा हुआ बाण, लक्ष्यवेध हो जानेके पश्चात् भी आरम्भ हुए वेगका नाश होनेपर गिरकर ही शान्त होता है, वैसे ही शरीरका आरम्भ करनेवाले प्रारब्धकर्म भी, शरीर-स्थितिरूप प्रयोजनके निवृत्त हो जानेपर भी, जबतक संस्कारोंका वेग क्षय नहीं हो जाता, तबतक पहलेकी भाँति वर्तते ही रहते हैं ।

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३४० * श्रीमद्भगवद्गीता * स एव इषुः प्रवृत्तिनिमित्तानारब्धवेगः तु अमुक्तो धनुषि प्रयुक्तः अपि उपसंह्रियते तथा अनारब्धफलानि कर्माणि स्वाश्रयस्थानि एव ज्ञानेन निर्बीजीक्रियन्ते । इति पतिते अस्मिन् विद्वच्छरीरे ' न स भूयोऽभिजायते ' इति युक्तम् एव उक्तम् इति सिद्धम् ॥ २३ ॥

वही बाण, जिसका प्रवृत्तिके लिये वेग आरम्भ नहीं हुआ है - जो छोड़ा नहीं गया है, यदि धनुषपर चढ़ा भी लिया गया हो तो भी उसको रोका जा सकता है, वैसे ही जिन कर्मोंके फलका आरम्भ नहीं हुआ है, वे अपने आश्रयमें स्थित हुए ही ज्ञानद्वारा निर्बीज किये जा सकते हैं । अतः इस विद्वत् - शरीरके गिरनेके पीछे ' वह फिर उत्पन्न नहीं होता ' यह कहना उचित ही है, यह बात सिद्ध हुई ॥ २३ ॥

अत्र आत्मदर्शने उपायविकल्पा इमे ध्यानादय उच्यन्ते-ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति अन्ये साङ्ख्येन साङ्ख्येन योगेन ध्यानेन ध्यानं नाम शब्दादिभ्यो विषयेभ्यः श्रोत्रादीनि करणानि मनसि उपसंहृत्य मनः च प्रत्यक् चेतयितरि एकाग्रतया यत् चिन्तनं तद् ध्यानम् । तथा ‘ ध्यायतीव बकः ' 4 ध्यायतीव पृथिवी ध्यायन्तीव पर्वताः ' ( छा ० उ ० ७। ६ । १ ) इति उपमोपादानात् तैलधारावत् सन्ततः अविच्छिन्नप्रत्ययो ध्यानं तेन ध्यानेन आत्मनि बुद्धौ पश्यन्ति आत्मानं प्रत्यक् चेतनम् आत्मना ध्यानसंस्कृतेन अन्तःकरणेन केचिद् योगिनः । अन्ये साङ्ख्येन योगेन साङ्ख्यं नाम -इमे सत्त्वरजस्तमांसि गुणा मया दृश्या अहं तेभ्यः अन्यः तद्व्यापारसाक्षिभूतो नित्यो गुणविलक्षण आत्मा इति चिन्तनम् एष साङ्ख्यो योगः तेन पश्यन्ति आत्मानम् आत्मना इति वर्तते । यहाँ आत्मदर्शनके विषयमें ये ध्यान आदि भिन्न-भिन्न साधन विकल्पसे कहे जाते हैं-केचिदात्मानमात्मना । कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥

शब्दादि विषयोंसे श्रोत्रादि इन्द्रियोंको हटाकर उनका मनमें निरोध करके और मनको अन्तरात्मामें ( निरोध करके ) जो एकाग्रभावसे चिन्तन करते रहना है, उसका नाम ध्यान है । तथा ' जैसे बगुला ध्यान करता है ' ' जैसे पृथिवी ध्यान करती है ' ' जैसे पर्वत ध्यान करते हैं ' इत्यादि उपमा दी जानेके कारण तैलधाराकी भाँति निरन्तर अविच्छिन्नभावसे चिन्तन करनेका नाम ध्यान है, उस ध्यानद्वारा कितने ही योगीलोग आत्मामें – बुद्धिमें, आत्माको यानी प्रत्यक् चेतनको आत्मासे – ध्यानाभ्यासद्वारा शुद्ध हुए अन्तःकरणसे - देखते हैं । अन्य कई योगीजन सांख्ययोगके द्वारा ( देखते हैं हैं ) ) - – ' सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण मुझसे देखे जानेवाले हैं और मैं उनसे भिन्न उनके व्यापारका साक्षी, उन गुणोंसे विलक्षण और नित्य ( चेतन ) आत्मा हूँ ' इस प्रकारके चिन्तनका नाम सांख्य है, यही योग है, ऐसे सांख्ययोगके द्वारा - ' आत्मामें आत्माको देखते हैं । '