श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 421–430
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४२१ यथा रजतत्वं न शुक्तिकायाः । यथा वा तलमलवत्त्वं बालैः गमितम् अविद्यया न आकाशस्य । तथा अधिष्ठानादिविक्रिया अपि तेषाम् एव इति न आत्मनः । तस्माद् युक्तम् उक्तम् अहङ्कृतत्वबुद्धि-लेपाभावाद् विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति । ' नायं हन्ति न हन्यते ' इति प्रतिज्ञाय ' न जायते ' इत्यादिहेतुवचनेन अविक्रियत्वम् आत्मन उक्त्वा ‘ वेदाविनाशिनम् ' इति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ सङ्क्षेपत उक्त्वा मध्ये प्रसारितां च तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा इह उपसंहरति शास्त्रार्थपिण्डीकरणाय विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति । एवं च सति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्तौ अविद्याकृताशेषकर्मसन्यासोपपत्तेः सन्यासिनाम् अनिष्टादि त्रिविधं कर्मणः फलं न भवति इति उपपन्नं तद्विपर्ययात् च इतरेषां भवति इति एतत् च अपरिहार्यम् इति एष गीताशास्त्रस्य अर्थ उपसंहृतः । स एष सर्ववेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैः विचार्य प्रतिपत्तव्य इति तत्र तत्र प्रकरणविभागेन दर्शितः अस्माभिः शास्त्र-न्यायानुसारेण ॥ १७ ॥
जैसे सीपमें आरोपित चाँदीपन सीपका नहीं होता एवं जैसे मूर्खोद्वारा आकाशमें आरोपित की हुई तलमलीनता आकाशकी नहीं हो सकती, वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंके विकार भी उनके ही हैं, आत्माके नहीं । सुतरां यह ठीक ही कहा है कि ' मैं कर्ता हूँ ' ऐसी भावनाका और बुद्धिके लेपका अभाव होनेके कारण, पूर्ण ज्ञानी ' न मारता है और न बँधता है । ' दूसरे अध्यायमें ' यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है ' इस प्रकार प्रतिज्ञा करके, ' न जायते ' इत्यादि हेतुयुक्त वचनोंसे आत्माका अविक्रियत्व बतलाकर, फिर ' वेदाविनाशिनम् ' इस श्लोकसे उपदेशके आदिमें विद्वानके लिये संक्षेपमें कर्माधिकारकी निवृत्ति कहकर, जगह- जगह, प्रसङ्ग लाकर बीच - बीचमें जिसका विस्तार किया गया है, ऐसी कर्माधिकारकी निवृत्तिका, अब शास्त्रके अर्थका संग्रह करनेके लिये ' विद्वान् न मारता है और न बँधता है ' इस कथनसे उपसंहार करते हैं I सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान्में देहधारी-पनका अभिमान न होनेके कारण उसके अविद्याकर्तृक समस्त कर्मोंका संन्यास हो सकता है, इसलिये संन्यासियोंको अनिष्ट आदि तीन प्रकारके कर्मफल नहीं मिलते । साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे ( कर्माधिकारी ) इससे विपरीत होते हैं । इस कारण तीन प्रकारके कर्मफल ( अवश्य ) मिलते हैं । इस प्रकार यह गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार किया गया । ऐसा यह समस्त वेदोंके अर्थका सार, निपुण-बुद्धिवाले पण्डितोंद्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है । इस विचारसे हमने जगह - जगह प्रकरणोंका विभाग करके, शास्त्र - न्यायानुसार इस तत्त्वको दिखलाया है ॥ १७ ॥
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४२२ * श्रीमद्भगवद्गीता * अथ इदानीं कर्मणां प्रवर्तकम् उच्यते— इस प्रकार शास्त्रके आशयका उपसंहार करके अब कर्मोंका प्रवर्तक बतलाया जाता है— ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्म कर्तेति कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
ज्ञानं ज्ञायते अनेन इति सर्वविषयम् अविशेषेण उच्यते । तथा ज्ञेयं ज्ञातव्यं तद् अपि सामान्येन एव सर्वम् उच्यते । तथा परिज्ञाता उपाधिलक्षणः अविद्याकल्पितो भोक्ता इति एतत् त्रयम् एषाम् अविशेषेण सर्वकर्मणां प्रवर्तिका त्रिविधा त्रिप्रकारा कर्मचोदना । ज्ञानादीनां हि त्रयाणां सन्निपाते हानो-पादानादिप्रयोजनः सर्वकर्मारम्भः स्यात् । ततः पञ्चभिः अधिष्ठानादिभिः आरब्धं वाङ्मनःकायाश्रयभेदेन त्रिधा राशीभूतं त्रिषु करणादिषु सङ्गृह्यते इति एतद् उच्यते— करणं क्रियते अनेन इति बाह्यं श्रोत्रादि, अन्तःस्थं बुद्ध्यादि, कर्म ईप्सिततमं कर्तुः क्रियया व्याप्यमानम्, कर्ता करणानां व्यापारयिता उपाधिलक्षण इति त्रिविधः त्रिप्रकार: कर्मसङ्ग्रहः । सङ्गृह्यते अस्मिन् इति सङ्ग्रहः कर्मणः सङ्ग्रहः कर्मसङ्ग्रहः । कर्म एषु हि त्रिषुः समवैति तेन अयं त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
ज्ञान — जिसके द्वारा कोई पदार्थ जाना जाय । यहाँ ज्ञान शब्दसे सामान्य भावसे सर्व पदार्थविषयक ज्ञान कहा गया है । वैसे ही ज्ञेय अर्थात् जाननेमें आनेवाला पदार्थ, यह भी सामान्य भावसे समस्तका ही वर्णन है । तथा परिज्ञाता अर्थात् उपाधियुक्त अविद्याकल्पित भोक्ता, इस प्रकार जो यह इन तीनोंका समुदाय है, यही सामान्य भावसे समस्त कर्मोंकी प्रवर्तक तीन प्रकारकी ' कर्मचोदना ' है । क्योंकि उक्त ज्ञान आदि तीनोंके सम्मिलित होनेपर ही त्याग और ग्रहण आदि जिनके प्रयोजन हैं, ऐसे समस्त कर्मोंका आरम्भ होता है । अब अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंसे जिसकी उत्पत्ति है तथा मन, वाणी और शरीररूप आश्रयोंके भेदसे जिसके तीन वर्ग किये गये हैं, ऐसे समस्त कर्म, करण आदि तीन कारकोंमें संगृहीत हैं । यह बात बतलायी जाती है-' करण'– जिसके द्वारा कर्म किया जाय, अर्थात् श्रोत्रादि दस बाह्य इन्द्रियाँ और बुद्धि आदि चार अन्तःकरण । ‘ कर्म’– जो कर्ताका अत्यन्त इष्ट हो और क्रियाद्वारा सम्पादन किया जाय । ' कर्ता'– श्रोत्रादि करणोंको अपने - अपने व्यापारमें नियुक्त करनेवाला उपाधिस्वरूप जीव । इस प्रकार यह त्रिविध ' कर्मसंग्रह ' है I जिनमें कुछ संगृहीत किया जाय उसका नाम संग्रह है, अतः कर्मोंके संग्रहका नाम कर्मसंग्रह है;
क्योंकि इन तीन कारकोंमें ही कर्म संगृहीत है ।
इसलिये यह तीन प्रकारका कर्मसंग्रह है ॥ १८ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४२३ अथ इदानीं क्रियाकारकफलानां सर्वेषां क्रिया, कारक और फल सभी त्रिगुणात्मक हैं, सत्त्वरजस्तमोगुणभेदतः त्रिविधो अतः सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके भेदसे गुणात्मकत्वात् उन सबका त्रिविध भेद बतलाना है । सो आरम्भ
भेदो वक्तव्य इति आरभ्यते- करते हैं-ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १ ९ ॥
ज्ञानं कर्म च कर्म क्रिया, न कारकं पारि-भाषिकम् ईप्सिततमं कर्म, कर्ता च निर्वर्तकः क्रियाणां त्रिधा एव अवधारणं गुणव्यतिरिक्त-जात्यन्तराभावप्रदर्शनार्थं गुणभेदतः सत्त्वादि-भेदेन इत्यर्थः, प्रोच्यते कथ्यते गुणसङ्ख्याने कापिले शास्त्रे, तद् अपि गुणसङ्ख्यानं शास्त्रं गुणभोक्तृ-विषये प्रमाणम् एव परमार्थब्रह्मैकत्वविषये यद्यपि विरुध्यते । ते हि कापिला गुणगौणव्यापारनिरूपणे अभियुक्ता इति तत् शास्त्रम् अपि वक्ष्यमाणार्थ -स्तुत्यर्थत्वेन उपादीयते इति न विरोधः । यथावद् यथान्यायं यथाशास्त्रं शृणु तानि अपि ज्ञानादीनि तद्भेदजातानि गुणभेदकृतानि शृणु वक्ष्यमाणे अर्थे मनः समाधिं कुरु इत्यर्थः ॥ १ ९ ॥ यहाँ कर्म शब्दका अर्थ क्रिया है, कर्ताका अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं । ज्ञान, कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला — ये तीनों ही, गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रोंमें अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्रमें गुणोंके भेदसे यानी सात्त्विक आदि भेदसे, प्रत्येक तीन - तीन प्रकारके बतलाये गये हैं । यहाँ त्रिधाके साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है कि उक्त तीनों पदार्थ गुणोंसे अतिरिक्त अन्य जातिके नहीं हैं । वह गुणोंकी संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थ - ब्रह्मकी एकताके विषयमें ( भगवान्के सिद्धान्तसे ) विरुद्ध है तो भी गुणोंके भोक्ता ( जीव ) -के विषयमें तो प्रमाण है ही । वे कापिलसांख्यके अनुयायी, गुण और गुणके व्यापारका निरूपण करनेमें निपुण हैं । इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्रायकी स्तुति करनेके लिये प्रमाणरूपसे ग्रहण किया जाता है, सुतरां कोई विरोध नहीं है । उनको अर्थात् ज्ञान, कर्म और कर्ताको तथा गुणोंके अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदोंको, तू यथावत् — जैसा शास्त्रमें न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन; अर्थात् आगे कही जानेवाली बातमें चित्त लगा ॥ १ ९ ॥ ज्ञानस्य तु तावत् त्रिविधत्वम् उच्यते- पहले ( तीन श्लोकोंद्वारा ) ज्ञानके तीन भेद कहे जाते हैं ।
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४२४ * श्रीमद्भगवद्गीता * सर्वभूतेषु येनैकं अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं सर्वभूतेषु अव्यक्तादिस्थावरान्तेषु भूतेषु येन ज्ञानेन एकं भावं वस्तु भावशब्दो वस्तुवाची एकम् आत्मवस्तु इत्यर्थः । अव्ययं न व्येति स्वात्मना धर्मैः वा कूटस्थनित्यम् इत्यर्थः । ईक्षते येन ज्ञानेन पश्यति । तं च भावम् अविभक्तं प्रतिदेहं विभक्तेषु देहभेदेषु न विभक्तं तद् आत्मवस्तु व्योमवद् निरन्तरम् इत्यर्थः । तद् ज्ञानम् अद्वैतात्मदर्शनं सात्त्विकं सम्यग्दर्शनं विद्धि इति । यानि द्वैतदर्शनानि असम्यग्भूतानि राजसानि तामसानि च इति न साक्षात् संसारोच्छित्तये भवन्ति ॥ २० ॥
भावमव्ययमीक्षते ।
विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥
जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंमें एकभाव - एक आत्मवस्तु, जो कि अपने स्वरूपसे या धर्मसे कभी क्षय नहीं होता, ऐसा अविनाशी और कूटस्थ नित्यतत्त्व देखता है । यहाँ भाव शब्द वस्तु - वाचक है । तथा ( जिस ज्ञानके द्वारा ) उस आत्मतत्त्वको अलग - अलग प्रत्येक शरीरमें विभागरहित अर्थात् आकाशके समान समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको अर्थात् अद्वैतभावसे आत्मसाक्षात्कार कर लेनेको तू सात्त्विक ज्ञानपूर्ण ज्ञान जान । जो द्वैतदर्शनरूप अयथार्थ ज्ञान है, वे राजस-तामस हैं, अतः वे संसारका उच्छेद करनेमें साक्षात् हेतु नहीं हैं ॥ २० ॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥२१ ॥
पृथक्त्वेन तु भेदेन प्रतिशरीरम् अन्यत्वेन यद् ज्ञानं नानाभावान् भिन्नान् आत्मनः पृथग्विधान् पृथक्प्रकारान् भिन्नलक्षणान् इत्यर्थः । वेत्ति विजानाति यद् ज्ञानं सर्वेषु भूतेषु । ज्ञानस्य कर्तृत्वासम्भवाद् येन ज्ञानेन वेत्ति इत्यर्थः तद् ज्ञानं विद्धि राजसं रजोनिर्वृत्तम् ॥ २१ ॥
और जो ज्ञान, सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न - भिन्न प्रकारके भिन्न - भिन्न भावोंको, आत्मासे अलग विलक्षण पृथक्-रूपसे देखता है, अर्थात् प्रत्येक शरीरमें अलग - अलग अपनेसे दूसरा आत्मा समझता है, उस ज्ञानको तू राजस यानी रजोगुणसे उत्पन्न हुआ जान । ज्ञानमें कर्तापन होना असम्भव है, इसलिये ' जो ज्ञान देखता है ' इसका आशय यह है कि ' जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य देखता है ' ॥ २१ ॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥२२ ॥
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* शांकरभाष्य यत् तु ज्ञानं कृत्स्नवत् समस्तवत् सर्वविषयम् इव एकस्मिन् कार्ये देहे बहिः वा प्रतिमादौ सक्तम् एतावान् एव आत्मा ईश्वरो वा न अतः परम् अस्ति इति यथा नग्नक्षपणकादीनां शरीरानुवर्ती देहपरिमाणो जीव ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्र इति एवम् एकस्मिन् कार्ये सक्तम् । अहैतुकं हेतुवर्जितं निर्युक्तिकम् अतत्त्वार्थवद् यथाभूतः अर्थः तत्त्वार्थः सः अस्य ज्ञेयभूतः अस्ति इति तत्त्वार्थवद् न तत्त्वार्थवद् अतत्त्वार्थ-वद् अहेतुकत्वाद् एव अल्पं च अल्पविषय-त्वाद् अल्पफलत्वाद् वा तत् तामसम् उदाहृतम् । तामसानां हि प्राणिनाम् अविवेकिनाम् ईदृशं ज्ञानं दृश्यते ॥ २२ ॥
अध्याय १८ * ४२५ जो ज्ञान, किसी एक कार्यमें, शरीरमें या शरीरसे बाहर प्रतिमादिमें, सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है, अर्थात् ( यह समझता है कि ) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है, जैसे दिगम्बर जैनियोंका ( माना हुआ ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ ( की प्रतिमा ) -मात्र ही ईश्वर है, इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है । तथा जो हेतुरहित - युक्तिरहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है । यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है, ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो, वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है । एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है, वह ज्ञान तामस कहा गया है; क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियोंमें ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है ॥ २२ ॥
अथ कर्मणः त्रैविध्यम् उच्यते- अब कर्मके तीन भेद कहे जाते हैं-नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म नियतं नित्यं सङ्गरहितम् आसक्तिवर्जितम् । अरागद्वेषतः कृतं रागप्रयुक्तेन द्वेषप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेषतः कृतं तद्विपरीतं कृतम् अराग-द्वेषतः कृतम् अफलप्रेप्सुना फलं प्रेप्सति इति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेन अफल-प्रेप्सुना कर्त्रा कृतं कर्म यत् तत् सात्त्विकम् उच्यते ॥ २३ ॥
यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
जो कर्म नियत – नित्य है तथा सङ्ग - आसक्तिसे रहित है और फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग - द्वेषके किया गया है, वह सात्त्विक कहा जाता है । जो कर्म रागसे या द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है, वह राग - द्वेषसे किया हुआ कहलाता है और जो उससे विपरीत है वह बिना राग - द्वेषके किया हुआ है । जो कर्ता कर्मफलको चाहता है, वह कर्मफलप्रेप्सु अर्थात् कर्मफलकी तृष्णावाला होता है और जो उससे विपरीत है वह कर्मफलको न चाहनेवाला है ॥ २३ ॥
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४२६ * श्रीमद्भगवद्गीता * यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं यत् तु कामेप्सुना फलप्रेप्सुना इत्यर्थः कर्म साहङ्कारेण वा— साहङ्कारेण इति न तत्त्वज्ञानापेक्षया । किं तर्हि लौकिकश्रोत्रियनिरहङ्कारापेक्षया । यो हि परमार्थनिरहङ्कार आत्मविद् न तस्य कामेप्सुत्वबहुलायासकर्तृत्वप्राप्तिः अस्ति । सात्त्विकस्य अपि कर्मणः अनात्मवित् साहङ्कारः कर्ता किम् उत राजसतामसयोः । लोके अनात्मविद् अपि श्रोत्रियो निरहङ्कार उच्यते निरहङ्कारः अयं ब्राह्मण इति । तस्मात् तदपेक्षया एव साहङ्कारेण वा इति उक्तम् । पुनः शब्द पादपूरणार्थः । क्रियते बहुलायासं कर्त्रा महता आयासेन निर्वर्त्यते तत् कर्म राजसम् उदाहृतम् ॥ २४ ॥
तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
जो कर्म, भोगरूप फलकी इच्छावाले पुरुषद्वारा या अहंकारयुक्त पुरुषद्वारा ( किया जाता है ) । इस श्लोक में ' साहङ्कारेण ' पद तत्त्वज्ञानकी अपेक्षासे नहीं है । तो क्या है? वेद - शास्त्रको जाननेवाले लौकिक निरहङ्कारीकी अपेक्षासे है; क्योंकि जो वास्तविक निरहङ्कारी आत्मवेत्ता है, उसमें तो फलेच्छुकता और बहुत परिश्रमयुक्त कर्तृत्वकी आशंका ही नहीं हो सकती । सात्त्विक कर्मका भी कर्ता, आत्मतत्त्वको न जाननेवाला अहंकारयुक्त मनुष्य ही होता है, फिर राजस - तामस कर्मोंके कर्ताकी तो बात ही क्या है? संसारमें आत्मतत्त्वको न जाननेवाला भी, वेदशास्त्रका ज्ञाता पुरुष निरहङ्कारी कहा जाता है । जैसे ' अमुक ब्राह्मण निरहङ्कारी है ' ऐसा प्रयोग होता है । सुतरां ऐसे पुरुषकी अपेक्षासे ही इस श्लोक में ' साहङ्कारेण वा ' यह वचन कहा गया है । ' पुनः ' शब्द पाद- पूर्ण करनेके लिये है । तथा जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त है, अर्थात् करनेवाला जिसको बहुत परिश्रमसे कर पाता है, वह कर्म राजस कहा गया है ॥ २४ ॥
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म अनुबन्धं पश्चाद् भावि यद् वस्तु सः अनुबन्ध उच्यते तं च अनुबन्धम्, क्षयं यस्मिन् कर्मणि क्रियमाणे शक्तिक्षयः अर्थक्षयो वा स्यात् तं क्षयं हिंसां प्राणिपीडाम् अनपेक्ष्य च पौरुषं
पुरुषकारं शक्नोमि इदं कर्म समापयितुम् इति ।
यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥।
अनुबन्धको - अन्तमें होनेवाला जो परिणाम है उसे अनुबन्ध कहते हैं, उसको, क्षयको – कर्मके करनेमें जो शक्तिका या धनका क्षय होता है उसको, हिंसाको – प्राणियोंकी पीड़ाको और पौरुषको —— अमुक कर्मको मैं समाप्त कर सकता हूँ ' ऐसी अपनी सामर्थ्यको, इस प्रकार अनुबन्धसे लेकर
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४२७ एवम् आत्मसामर्थ्यम् इति एतानि | पौरुषतक इन समस्त भावोंकी अपेक्षा न करके— अनुबन्धादीनि अनपेक्ष्य पौरुषान्तानि मोहाद् इनकी परवा न करके, जो धर्म मोहसे - अज्ञानसे अविवेकत आरभ्यते कर्म यत् तत् तामसं आरम्भ किया जाता है, वह तामस - तमोगुणपूर्वक तमोनिर्वृत्तम् उच्यते ॥ २५ ॥ किया हुआ कहा जाता है ॥ २५ ॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥२६ ॥
मुक्तसङ्गो मुक्तः परित्यक्तः सङ्गो येन स मुक्तसङ्गः अनहंवादी न अहंवदनशीलो धृत्युत्साहसमन्वितो धृतिः धारणम् उत्साह उद्यमः ताभ्यां समन्वितः संयुक्तो धृत्युत्साहसमन्वितः, सिद्ध्यसिद्ध्योः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धौ असिद्धौ च सिद्ध्यसिद्धयोः निर्विकारः केवलं शास्त्रप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागादिना यः स निर्विकार उच्यते । एवम्भूतः कर्ता यः स सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥
जो कर्ता मुक्तसङ्ग है- जिसने आसक्तिका त्याग कर दिया है, जो निरहंवादी है - जिसका ' मैं कर्ता हूँ ' ऐसे कहनेका स्वभाव नहीं रह गया है, जो धृति और उत्साहसे युक्त है - धृति यानी धारणाशक्ति और उत्साह यानी उद्यम – इन दोनोंसे जो युक्त है, तथा जो किये हुए कर्मके फलकी सिद्धि होने या न होनेमें निर्विकार है । जो ऐसा कर्ता है, वह सात्त्विक कहा जाता है । जो केवल शास्त्रप्रमाणसे ही कर्ममें प्रयुक्त होता है, फलेच्छा या आसक्ति आदिसे नहीं, वह निर्विकार कहा जाता है ॥ २६ ॥
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७ ॥
रागी रागः अस्य अस्ति इति रागी, कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलार्थी लुब्धः परद्रव्येषु सञ्जाततृष्णः तीर्थादौ च स्वद्रव्यापरित्यागी । हिंसात्मकः परपीडास्वभावः अशुचिः बाह्यान्तः शौचवर्जितो हर्षशोकान्वित इष्टप्राप्तौ हर्षः अनिष्टप्राप्तौ इष्टवियोगे च शोकः ताभ्यां हर्षशोकाभ्याम् अन्वितः संयुक्तः तस्य एव च कर्मणः सम्पत्तिविपत्त्योः हर्षशोकौ स्यातां ताभ्यां संयुक्तो यः कर्ता स राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
जो कर्ता रागी है - जिसमें राग यानी आसक्ति विद्यमान है, जो कर्मफलको चाहनेवाला है— कर्मफलकी इच्छा रखता है, जो लोभी यानी दूसरोंके धनमें तृष्णा रखनेवाला है और तीर्थादि ( उपयुक्त देशकाल ) -में भी अपने धनको खर्च करनेवाला नहीं है । तथा जो हिंसात्मक - दूसरोंको कष्ट पहुँचानेके स्वभाववाला, अशुचि - बाहरी और भीतरी दोनों प्रकारके शुद्धिसे रहित और हर्ष - शोकसे लिप्त यानी इष्ट पदार्थकी प्राप्तिमें हर्ष एवं अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टके वियोगमें होनेवाला शोक – इन दोनों प्रकारके भावोंसे युक्त है - ऐसे पुरुषको ही कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें हर्ष - शोक हुआ करते हैं, अतः जो कर्ता उन दोनोंसे युक्त है, वह राजस कहा जाता है ॥ २७ ॥
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४२८ * श्रीमद्भगवद्गीता *
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
अयुक्तः असमाहितः, प्राकृतः अत्यन्तासंस्कृत-बुद्धिः बालसमः, स्तब्धो दण्डवद् न नमति कस्मैचित्, शठो मायावी शक्तिगूहनकारी, नैष्कृतिकः परवृत्तिच्छेदनपरः, अलसः अप्रवृत्ति -शीलः कर्तव्येषु अपि, विषादी सर्वदा अवसन्न-स्वभावः, दीर्घसूत्री च कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणो यद् अद्य श्वो वा कर्तव्यं तद् मासेन अपि न करोति यः च एवम्भूतः कर्ता स तामस उच्यते ॥ २८ ॥
जो कर्ता अयुक्त है - जिसका चित्त समाहित नहीं है, जो बालकके समान प्राकृत – अत्यन्त संस्कारहीन बुद्धिवाला है, जो स्तब्ध है - दण्डकी भाँति किसीके सामने नहीं झुकता, जो शठ अर्थात् अपनी सामर्थ्यको गुप्त रखनेवाला कपटी है, जो नैष्कृतिक — दूसरोंकी वृत्तिका छेदन करनेमें तत्पर और आलसी है - जिसका कर्तव्य- कार्यमें भी प्रवृत्त होनेका स्वभाव नहीं है, जो विषादी - सदा शोकयुक्त स्वभाववाला और दीर्घसूत्री है - कर्तव्यमें बहुत विलम्ब करनेवाला है अर्थात् आज या कल कर लेनेयोग्य कार्यको महीनेभरमें भी समाप्त नहीं कर पाता, जो ऐसा कर्ता है वह तामस कहा जाता है ॥ २८ ॥
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २ ९ ॥
बुद्धेः भेदं धृतेः च एव भेदं गुणत: सत्त्वादिगुणतः त्रिविधं शृणु इति सूत्रोपन्यासः, प्रोच्यमानं कथ्यमानम् अशेषेण निरवशेषतो यथावत् पृथक्त्वेन विवेकतो धनञ्जय । दिग्विजये मानुषं दैवं च प्रभूतं धनम् अजयत् तेन असौ धनञ्जयः अर्जुनः ॥ २ ९ ॥ हे धनञ्जय! बुद्धि और धृतिके भी सत्त्वादि गुणोंके अनुसार तीन - तीन प्रकारके भेद तू विभागपूर्वक सम्पूर्णतासे यथावत् कहे हुए सुन । यह सूत्ररूपसे कहना है । दिग्विजयके समय अर्जुनने मनुष्योंका और देवोंका बहुत - सा धन जीता था, इसलिये उसका नाम धनञ्जय हुआ ॥ २ ९ ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
प्रवृत्तिं च प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्धहेतुः कर्ममार्गः जो बुद्धि, प्रवृत्तिको -बन्धनके हेतुरूप कर्ममार्गको निवृत्तिं च निवृत्तिः मोक्षहेतुः सन्यासमार्गः और निवृत्तिको - मोक्षके हेतुरूप संन्यासमार्गको जानती है । बन्ध और मोक्षके साथ प्रवृत्ति और निवृत्तिकी बन्धमोक्षसमानवाक्यत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्ती समानवाक्यता है, इससे यह निश्चय होता है कि प्रवृत्ति कर्मसन्यासमार्गों इति अवगम्यते । और निवृत्तिका अर्थ कर्ममार्ग और संन्यासमार्ग ही है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४२ ९ कार्याकार्ये विहितप्रतिषिद्धे कर्तव्याकर्तव्ये करणाकरणे इति एतत्, कस्य, देशकालाद्य-पेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणाम् । भयाभये बिभेति अस्माद् इति भयं तद्विपरीतम् अभयं भयं च अभयं च भयाभये दृष्टादृष्टविषययोः भयाभययोः कारणे इत्यर्थः । बन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेत्ति विजानाति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ।
तत्र ज्ञानं बुद्धेः वृत्तिः बुद्धिः तु वृत्तिमती ।
धृतिः अपि वृत्तिविशेष एव बुद्धेः ॥ ३० ॥
तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको - विधि और प्रतिषेधको, यानी करनेयोग्य और न करनेयोग्यको ( भी जानती है ) । यह कहना किसके सम्बन्धमें है? देश - काल आदिकी अपेक्षासे जिनके दृष्ट और अदृष्ट फल होते हैं, उन कर्मोंके सम्बन्धमें । तथा जो बुद्धि भय और अभयको - ( जानती है ) । जिससे मनुष्य भयभीत होता है, उसका नाम भय है और उससे विपरीतका नाम अभय है; उन दोनोंको, यानी दृष्टादृष्टविषयक जो भय और अभय हैं उन दोनोंके कारणोंको जानती है, एवं हेतुसहित बन्धन और मोक्षको भी जानती है, हे पार्थ! वह बुद्धि सात्त्विकी है । पहले जो ज्ञान कहा गया है, वह बुद्धिकी एक वृत्तिविशेष है और बुद्धि वृत्तिवाली है । धृति भी बुद्धिकी वृत्तिविशेष ही है ॥ ३० ॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
यया धर्मं शास्त्रचोदितम् अधर्मं च तत्प्रतिषिद्धं हे पार्थ! जिस बुद्धिके द्वारा मनुष्य शास्त्रविहित कार्यं च अकार्यम् एव च पूर्वोक्ते एव कार्याकार्ये धर्मको और शास्त्रप्रतिषिद्ध अधर्मको, एवं पूर्वोक्त अयथावद् न यथावत् सर्वतो निर्णयेन न प्रजानाति कर्तव्य और अकर्तव्यको " यथार्थरूपसे - सर्वतोभावसे बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ निर्णयपूर्वक नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥ ३१ ॥
अधर्मं धर्ममिति या सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः अधर्मं प्रतिषिद्धं धर्मं विहितम् इति या मन्यते जानाति तमसा आवृता सती सर्वार्थान् सर्वान् एव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतान् च विपरीतान् एव विजानाति बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
मन्यते तमसावृता ।
सा पार्थ तामसी ॥३२ ॥
हे पार्थ! जो तमोगुणसे आवृत हुई बुद्धि अधर्मको— निषिद्ध कार्यको धर्म मान लेती है, यानी शास्त्रविहित मान लेती है, तथा जाननेयोग्य अन्यान्य समस्त पदार्थोंको भी, जो विपरीत ही समझती है, वह तामसी है ॥ ३२ ॥
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४३० * श्रीमद्भगवद्गीता * धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः धृत्या यया अव्यभिचारिण्या इति व्यवहितेन सम्बन्धः, धारयते किम्, मनः प्राणेन्द्रियक्रिया मनः च प्राणाः च इन्द्रियाणि च मनः प्राणेन्द्रियाणि तेषां क्रियाः चेष्टाः ता उच्छास्त्रमार्गप्रवृत्तेः धारयति । धृत्या हि धार्यमाणा उच्छास्त्रविषया न भवन्ति । योगेन समाधिना अव्यभिचारिण्या नित्यसमाध्यनुगतया इत्यर्थः । एतद् उक्तं भवति अव्यभिचारिण्या धृत्या मनःप्राणेन्द्रियक्रिया धारयमाणो योगेन धारयति इति । या एवंलक्षणा धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
4 ' धृति ' शब्दके साथ दूर पड़े हुए ' अव्यभिचारिणी ' शब्दका सम्बन्ध है । जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा, अर्थात् सदा समाधिमें लगी हुई जिस धारणाके द्वारा, समाधियोगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं अर्थात् मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्तिसे रोकी जाती हैं, ( वह धृति सात्त्विकी है ) । ( सात्त्विकी ) धृतिद्वारा धारण की हुई ( इन्द्रियाँ ) ही शास्त्रविरुद्ध विषयमें प्रवृत्त नहीं होतीं । कहनेका तात्पर्य यह है कि धारण करनेवाला मनुष्य, जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा समाधि-योगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको धारण किया करता है, हे पार्थ! वह इस प्रकारकी धृति सात्त्विकी है ॥३३ ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
यया तु धर्मकामार्थान् धर्मः च कामः च अर्थः च धर्मकामार्थाः तान् धर्मकामार्थान् धृत्या यया धारयते मनसि नित्यकर्तव्यरूपान् अवधारयते हे अर्जुन । प्रसङ्गेन यस्य यस्य धर्मादेः धारणप्रसङ्गः तेन तेन प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी च भवति यः पुरुषः तस्य धृतिः या सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
हे अर्जुन! जिस धृतिके द्वारा मनुष्य धर्म, काम और अर्थोंको धारण करता है, अर्थात् जिस धृतिद्वारा मनुष्य इन सबको मनमें अवश्यकर्तव्यरूपसे निश्चय किया करता है । तथा जिस - जिस धर्म, अर्थ आदिके धारण करनेका प्रसङ्ग आता है, उस उस प्रसङ्गसे ही जो मनुष्य फल चाहनेवाला है, हे पार्थ! उसकी जो धृति । है वह राजसी होती है ॥ ३४ ॥
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा तामसी मता ॥ ३५ ॥