श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 441–450

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 441 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४४१ किं च असत: च सद्भावे सतः च असद्भावे न क्वचित् प्रमाणप्रमेयव्यवहारे विश्वासः कस्यचित् स्यात् । सत् सद् एव असद् असद् । एव इति निश्चयानुपपत्तेः । किं च उत्पद्यते इति द्व्यणुकादेः द्रव्यस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धम् आहुः । प्रागुत्पत्तेः च असत् पश्चात् स्वकारणव्यापारम् अपेक्ष्य स्वकारणैः परमाणुभिः सत्तया च समवाय-लक्षणेन सम्बन्धेन सम्बध्यते सम्बद्धं सत् कारणसमवेतं सद् भवति । तत्र वक्तव्यं कथम् असतः सत् कारणं भवेत् सम्बन्धो वा केनचित् । न हि वन्ध्यापुत्रस्य सत्ता सम्बन्धो वा कारणं वा केनचित् प्रमाणतः कल्पयितुं शक्यम् । ननु न एव वैशेषिकैः अभावस्य सम्बन्धः कल्प्यते द्व्यणुकादीनां हि द्रव्याणां स्वकारणेन समवायलक्षणः सम्बन्धः सताम् एव उच्यते इति । न; सम्बन्धात् प्राक् सत्त्वानभ्युपगमात् । न हि वैशेषिकैः कुलालदण्डचक्रादिव्यापारात् प्राग् घटादीनाम् अस्तित्वम् इष्यते । न च मृद एव घटाद्याकारप्राप्तिम् इच्छन्ति । ततः च असत् एव सम्बन्धः पारिशेष्याद् इष्टो भवति । ननु असतः अपि समवायलक्षणः सम्बन्धो न विरुद्धः । तथा असत्का सत् और सत्का असत् होना मान लेनेपर तो किसीका प्रमाण- प्रमेय - व्यवहारमें कहीं विश्वास ही नहीं रहेगा; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे फिर यह निश्चय नहीं होगा कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है । इसके सिवा वे ' उत्पन्न होता है ' इस वाक्यसे द्व्यणुक आदि द्रव्यका अपने कारण और सत्तासे सम्बन्ध होना बतलाते हैं अर्थात् उत्पत्तिसे पहले कार्य असत् होता है, फिर अपने कारणके व्यापारकी अपेक्षासे ( सहायतासे ) अपने कारणरूप परमाणुओंसे और सत्तासे समवायरूप सम्बन्धके द्वारा संगठित हो जाता है और संगठित होकर कारणसे मिलकर सत् हो जाता है । इसपर उनको बतलाना चाहिये कि असत्का कारण सत् कैसे हो सकता है? और असत्का किसीके साथ सम्बन्ध भी कैसे हो सकता है? क्योंकि वन्ध्यापुत्रकी सत्ता, उसका किसी सत् पदार्थके साथ सम्बन्ध अथवा उसका कारण किसीके भी द्वारा प्रमाणपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकता । पू ० — वैशेषिक - मतवादी अभावका सम्बन्ध नहीं मानते । वे तो भावरूप द्व्यणुक आदि द्रव्योंका ही अपने कारणके साथ समवायरूप सम्बन्ध बतलाते हैं । उ ० — यह बात नहीं है; क्योंकि ( उनके मतमें ) कार्य - कारणका सम्बन्ध होनेसे पहले कार्यकी सत्ता नहीं मानी गयी । अर्थात् वैशेषिक- मतावलम्बी कुम्हार और दण्ड - चक्र आदिकी क्रिया आरम्भ होनेसे पहले घट आदिका अस्तित्व नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि मिट्टीको ही घटादिके आकारकी प्राप्ति हुई है । इसलिये अन्तमें असत्का ही सम्बन्ध मानना सिद्ध होता है । पू ० - असत्का भी समवायरूप सम्बन्ध होना विरुद्ध नहीं है ।

पृष्ठ 442

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 442 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४२ * श्रीमद्भगवद्गीता * न; वन्ध्यापुत्रादीनाम् अदर्शनात् । घटादेः एव प्रागभावस्य स्वकारणसम्बन्धो भवति न वन्ध्यापुत्रादेः अभावस्य तुल्यत्वे अपि इति विशेषः अभावस्य वक्तव्यः । एकस्य अभावो द्वयोः अभावः सर्वस्य अभावः प्रागभावः प्रध्वंसाभाव इतरेतराभावः अत्यन्ताभाव इति लक्षणतो न केनचिद विशेषो दर्शयितुं शक्यः । असति च विशेषे घटस्य प्रागभाव एव कुलालादिभिः घटभावम् आपद्यते सम्बध्यते च भावेन कपालाख्येन स्वकारणेन सर्व-व्यवहारयोग्यः च भवति न तु घटस्य एव प्रध्वंसाभावः अभावत्वे सति अपि इति प्रध्वंसाद्यभावानां न क्वचिद् व्यवहारयोग्यत्वं प्रागभावस्य एव द्व्यणुकादिद्रव्याख्यस्य उत्पत्त्यादिव्यवहारार्हत्वम् इति एतत् असमञ्जसम् अभावत्वाविशेषाद् अत्यन्तप्रध्वंसा -भावयोः इव । ननु न एव अस्माभिः प्रागभावस्य भावापत्तिः उच्यते । भावस्य एव हि तर्हि भावापत्तिः यथा घटस्य घटापत्तिः पटस्य वा पटापत्तिः । एतद् अपि अभावस्य भावापत्तििवद् एव प्रमाणविरुद्धम् । साङ्ख्यस्य अपि यः परिणामपक्षः सः अपि अपूर्वधर्मोत्पत्तिविनाशाङ्गीकरणाद् वैशेषिक-पक्षाद् न विशिष्यते । उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वन्ध्यापुत्र आदिका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता । अभावकी समानता होनेपर भी यदि कहो कि घटादिके प्रागभावका ही अपने कारणके साथ सम्बन्ध होता है, वन्ध्यापुत्रादिके अभावका अभावोंका भेद बतलाना चाहिये । एकका अभाव, दोका अभाव, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव, इन लक्षणोंसे कोई भी अभावकी दिखला सकता । फिर किसी प्रकारकी विशेषता यह कहना कि घटका प्रागभाव ही नहीं, तो इनके सबका अभाव, अत्यन्ताभाव-विशेषता नहीं न होते हुए भी कुम्हार आदिके द्वारा घटभावको प्राप्त होता है तथा उसका कपाल नामक अपने कारणरूप भावसे सम्बन्ध होता है और वह सब व्यवहारके योग्य भी होता है । परंतु उसी घटका जो प्रध्वंसाभाव है, वह अभावत्वमें समान होनेपर भी सम्बन्धित नहीं होता । इस तरह प्रध्वंसादि अभावोंको किसी भी अवस्थामें व्यवहारके योग्य न मानना और केवल द्व्यणुक आदि द्रव्य नामक प्रागभावको ही उत्पत्ति आदि व्यवहारके योग्य मानना, असमञ्जसरूप ही है; क्योंकि अत्यन्ताभाव और प्रध्वंसाभावके समान ही प्रागभावका भी अभावत्व है, उसमें कोई विशेषता नहीं है । पू ० – हमने प्रागभावका भावरूप होना नहीं बतलाया है । उ ० - तब तो तुमने भावका ही भावरूप हो जाना कहा है, जैसे घटका घटरूप हो जाना, वस्त्रका वस्त्ररूप हो जाना; परंतु यह भी अभावके भावरूप होनेकी भाँति ही प्रमाण - विरुद्ध है । सांख्य - मतावलम्बियोंका जो परिणामवाद है, उसमें अपूर्व धर्मकी उत्पत्ति और विनाश स्वीकार किया जानेके कारण, वह भी ( इस विषय में ) वैशेषिक-मतसे कुछ विशेषता नहीं रखता ।

पृष्ठ 443

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 443 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य अभिव्यक्तितिरोभावाङ्गीकरणे अपि अभिव्यक्तितिरोभावयोः विद्यमानत्वाविद्यमान-त्वनिरूपणे पूर्ववद् एव प्रमाणविरोधः । एतेन कारणस्य एव संस्थानम् उत्पत्त्यादि इति एतद् अपि प्रत्युक्तम् । पारिशेष्यात् सद् एकम् एव वस्तु अविद्यया उत्पत्तिविनाशादिधर्मैः नटवद् अनेकधा विकल्प्यते इति इदं भागवतं मतम् उक्तम् ‘ नासतो विद्यते भाव: ' इति अस्मिन् श्लोके । सत्प्रत्ययस्य अव्यभिचाराद् व्यभिचारात् च इतरेषाम् इति । कथं तर्हि आत्मनः अविक्रियत्वे अशेषतः कर्मणः त्यागो न उपपद्यते इति । यदि वस्तुभूता गुणा यदि वा अविद्या-कल्पिताः तद्धर्मः कर्म तदा आत्मनि अविद्याध्यारोपितम् एव इति अविद्वान् न हि कश्चित् क्षणमपि अशेषतः त्यक्तुं शक्नोति इति उक्तम् । विद्वान् तु पुनः विद्यया अविद्यायां निवृत्तायां शक्नोति एव अशेषतः कर्म परित्यक्तुम् अविद्याध्यारोपितस्य शेषानुपपत्तेः । न हि तैमिरिकदृष्ट्या अध्यारोपितस्य द्विचन्द्रादेः तिमिरापगमे शेषः अवतिष्ठते । अध्याय १८ * ४४३ अभिव्यक्ति ( प्रकट होना ) और तिरोभाव ( छिप जाना ) स्वीकार करनेसे भी अभिव्यक्ति और तिरोभावकी विद्यमानता और अविद्यमानताका निरूपण करनेमें पहलेकी भाँति ही प्रमाणसे विरोध होगा । इस विवेचनसे ' कारणका कार्यरूपमें स्थित होना ही उत्पत्ति आदि हैं ' ऐसा निरूपण करनेवाले मतका भी खण्डन हो जाता है । इन सब मतोंका खण्डन हो जानेपर अन्तमें यही सिद्ध होता है कि ' एक ही सत्य तत्त्व ( आत्मा ) अविद्याद्वारा नटकी भाँति उत्पत्ति, विनाश आदि धर्मोंसे अनेक रूपमें कल्पित होता है । ' यही भगवान्का अभिप्राय ' नासतो विद्यते भाव: ' इस श्लोकमें बतलाया गया है; क्योंकि सत्प्रत्ययका व्यभिचार नहीं होता और अन्य ( असत् ) प्रत्ययोंका व्यभिचार होता है ( अतः सत् ही एकमात्र तत्त्व है ) । पू ० – यदि ( भगवान्के मतमें ) आत्मा निर्विकार है तो ( वे ) यह कैसे कहते हैं कि ' अशेषतः कर्मोंका त्याग नहीं हो सकता? ' उ ० — शरीर - इन्द्रियादिरूप गुण चाहे सत्य वस्तु हों, चाहे अविद्याकल्पित हों, जब कर्म उन्हींका धर्म है, तब आत्मामें तो वह अविद्याध्यारोपित ही है । इस कारण ' कोई भी अज्ञानी अशेषतः कर्मोंका त्याग क्षणभर भी नहीं कर सकता ' यह कहा गया है । परंतु विद्याद्वारा अविद्या निवृत्त हो जानेपर ज्ञानी तो कर्मोंका अशेषतः त्याग कर ही सकता है; क्योंकि अविद्या नष्ट होनेके उपरान्त, अविद्यासे अध्यारोपित वस्तुका अंश बाकी नहीं रह सकता । ( यह प्रत्यक्ष ही है कि ) तिमिर - रोगसे विकृत हुई दृष्टिद्वारा अध्यारोपित दो चन्द्रमा आदिका कुछ भी अंश तिमिर - रोग नष्ट हो जानेपर शेष नहीं रहता ।

पृष्ठ 444

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 444 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * एवं च सति इदं वचनम् उपपन्नम् ‘ सर्व- सुतरां ' सब कर्मोंको मनसे छोड़कर ' इत्यादि कर्माणि मनसा ' इत्यादि ' स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः कथन ठीक ही हैं । तथा ' अपने - अपने कर्मोंमें लगे हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त होते हैं ' ' मनुष्य अपने संसिद्धिं लभते नरः ’ ‘ स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं कर्मोंसे उसकी पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है ' -विन्दति मानवः ' इति च ॥ ४८ ॥ ये कथन भी ठीक हैं ॥ ४८ ॥

या च कर्मजा सिद्धिः उक्ता ज्ञाननिष्ठा- ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि योग्यतालक्षणा तस्याः फलभूता नैष्कर्म्यसिद्धिः कही गयी है, उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि ज्ञाननिष्ठालक्षणा वक्तव्या इति श्लोक भी कही जानी चाहिये । इसलिये अगला श्लोक आरभ्यते- आरम्भ किया जाता है— असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां असक्तबुद्धिः असक्ता सङ्गरहिता बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य सः असक्तबुद्धिः सर्वत्र पुत्रदारादिषु आसक्ति निमित्तेषु । जितात्मा जितो वशीकृत आत्मा अन्तःकरणं यस्य स जितात्मा । विगतस्पृहो विगता स्पृहा तृष्णा देहजीवित-भोगेषु यस्मात् स विगतस्पृहः । य एवम्भूत आत्मज्ञः स नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्माद् निष्क्रियब्रह्मात्म-सम्बोधात् स निष्कर्मा तस्य भावो नैष्कर्म्यं नैष्कर्म्यं च तत् सिद्धिः च सा नैष्कर्म्यसिद्धिः नैष्कर्म्यस्य वा सिद्धिः निष्क्रियात्मस्वरूपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिः निष्पत्तिः तां नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां प्रकृष्टां कर्मजसिद्धिविलक्षणां सद्योमुक्त्यवस्थानरूपां सन्यासेन सम्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्म-सन्यासेन अधिगच्छति प्राप्नोति । तथा च उक्तम् ‘ सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नास्ते ' इति ॥ ४ ९ ॥ सन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४ ९ ॥ जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है - पुत्र, स्त्री आदि जो आसक्तिके स्थान हैं, उन सबमें जिसका अन्तःकरण आसक्तिसे- प्रीतिसे रहित हो चुका है । जो जितात्मा है - जिसका आत्मा यानी अन्त: करण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है । जो स्पृहारहित है – शरीर, जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा - तृष्णा नष्ट हो गयी है । जो ऐसा आत्मज्ञानी है, वह परम नैष्कर्म्य-सिद्धिको ( प्राप्त करता है ) । निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह ' निष्कर्मा ' है । उसके भावका नाम ' नैष्कर्म्य ' है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम ' नैष्कर्म्यसिद्धि ' है । अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप निष्कर्मताका सिद्ध होना ही ' नैष्कर्म्यसिद्धि ' है । ऐसी जो कर्मजनित सिद्धिसे विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होनारूप उत्तम सिद्धि है, उसको संन्यासके द्वारा, यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा लाभ करता है; ऐसा ही कहा भी है कि ' सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है ' ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 445

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 445 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेन ईश्वराभ्यर्चन-रूपेण जनितां प्रागुक्तलक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्य उत्पन्नात्मविवेकज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठारूपा नैष्कर्म्यलक्षणा सिद्धिः येन क्रमेण भवति तद् वक्तव्यम् इति आह— अध्याय १८ * ४४५ पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई ज्ञाननिष्ठा - प्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है, उस पुरुषको जिस क्रमसे केवल आत्म - ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है, वह ( क्रम ) बतलाना है, अतः कहते हैं— सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा सिद्धिं प्राप्तः स्वकर्मणा ईश्वरं समभ्यर्च्य तत्प्रसादजां कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यता-लक्षणां सिद्धिं प्राप्तः सिद्धिं प्राप्त इति तदनुवाद उत्तरार्थः । किं तद् उत्तरं यदर्थः अनुवाद इति उच्यते । यथा येन प्रकारेण ज्ञाननिष्ठारूपेण ब्रह्म परमात्मानम् आप्नोति तथा तं प्रकारं ज्ञाननिष्ठा -प्राप्तिक्रमं मे मम वचनाद् निबोध त्वं निश्चयेन अवधारय इति एतत् । किं विस्तरेण, न इति आह समासेन एव सङ्क्षेपेण एव हे कौन्तेय । यथा ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध इति अनेन या प्रतिज्ञाता ब्रह्म-प्राप्तिः ताम् इदन्तया दर्शयितुम् आह निष्ठा ज्ञानस्य या परा इति, निष्ठा पर्यवसानं परि-समाप्तिः इति एतत् । कस्य, ब्रह्मज्ञानस्य या परा परिसमाप्तिः । कीदृशी सा, यादृशम् आत्मज्ञानम् । कीदृक् तत्, यादृश आत्मा । कीदृशः असौ, यादृशो

भगवता उक्त उपनिषद्वाक्यैः च न्यायतः च ।

ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥

सिद्धिको प्राप्त हुआ, अर्थात् अपने कर्मोंद्वारा ईश्वरकी पूजा करके, उसकी कृपासे उत्पन्न हुई शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठा - प्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष - यह पुनरुक्ति आगे कहे जानेवाले वचनोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये है । वे आगे कहे जानेवाले वचन कौन - से हैं जिनके लिये पुनरुक्ति है? सो बतलाते हैं— जिस ज्ञाननिष्ठारूप प्रकारसे ( साधक ) ब्रह्मको-परमात्माको पाता है, उस प्रकारको यानी ज्ञाननिष्ठा-प्राप्तिके क्रमको तू मेरे वचनोंसे निश्चयपूर्वक समझ । क्या ( उसका ) विस्तारपूर्वक ( वर्णन करेंगे? ) इसपर कहते हैं कि नहीं । हे कौन्तेय! समाससे अर्थात् संक्षेपसे ही, जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसे समझ । इस वाक्यसे जिस ब्रह्म - प्राप्तिके लिये प्रतिज्ञा की थी, उसे इदंरूपसे ( स्पष्ट ) दिखानेके लिये कहते हैं कि ज्ञानकी जो परानिष्ठा है उसको सुन । अन्तिम अवधि- परिसमाप्तिका नाम निष्ठा है । ऐसी जो ब्रह्मज्ञानकी परमावधि है ( उसको सुन ) । वह ( ब्रह्मज्ञानकी निष्ठा ) कैसी है? जैसा कि आत्मज्ञान है । वह कैसा है? जैसा आत्मा है । वह ( आत्मा ) कैसा है? जैसा भगवान्ने बतलाया है तथा जैसा उपनिषद्वाक्योंद्वारा कहा गया है और जैसा न्यायसे सिद्ध है ।

पृष्ठ 446

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 446 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४६ * श्रीमद्भगवद्गीता * ननु विषयाकारं ज्ञानं न विषयो न अपि आकारवान् आत्मा इष्यते क्वचित् । ननु‘आदित्यवर्णम् ' ‘ भारूपः’‘स्वयञ्ज्योतिः ’ इति आकारवत्त्वम् आत्मनः श्रूयते । न, तमोरूपत्वप्रतिषेधार्थत्वात् तेषां वाक्या-नाम् । द्रव्यगुणाद्याकारप्रतिषेधे आत्मनः तमोरूपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिषेधार्थानि ' आदित्यवर्णम् ' इत्यादिवाक्यानि, ‘ अरूपम् ' इति च विशेषतो रूपप्रतिषेधात् । अविषयत्वात् च ' न सदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । ' ( श्वे ० उ ० ४। २० ) ' अशब्दमस्पर्शम् ' ( क ० उ ० १ । ३ । १५ ) इत्याद्यैः । तस्माद् आत्माकारं ज्ञानम् इति अनुपपन्नम् । कथं तर्हि आत्मनो ज्ञानम् । सर्वं हि यद्विषयं ज्ञानं तत्तदाकारं भवति निराकार: च आत्मा इति उक्तम् । ज्ञानात्मनोः च उभयोः निराकारत्वे कथं तद्भावनानिष्ठ इति । न, अत्यन्तनिर्मलत्वस्वच्छत्वसूक्ष्मत्वोपपत्तेः आत्मनो बुद्धेः च आत्मसमनैर्मल्याद्युपपत्तेः आत्मचैतन्याकाराभासत्वोपपत्तिः । बुद्ध्याभासं मनः तदाभासानि इन्द्रियाणि इन्द्रियाभासः च देहः अतो लौकिकैः देहमात्रे एव आत्मदृष्टिः क्रियते । पू ० - ज्ञान विषयाकार होता है, परंतु आत्मा न तो कहीं भी विषय माना जाता है और न आकारवान् ही । उ ० — किंतु ‘ आदित्यवर्ण ' ' प्रकाशस्वरूप ' ' स्वयं-ज्योति ' इस तरह आत्माका आकारवान् होना तो श्रुतिमें कहा है । पू ० – यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे वाक्य तमःस्वरूपत्वका निषेध करनेके लिये कहे गये हैं अर्थात् आत्मामें द्रव्यगुण आदिके आकारका प्रतिषेध करनेपर जो आत्माके अन्धकाररूप माने जानेकी आशङ्का होती है, उसका प्रतिषेध करनेके लिये ही ' आदित्यवर्णम् ' इत्यादि वाक्य हैं; क्योंकि ‘ अरूपम् ’ आदि वाक्योंसे विशेषतः रूपका प्रतिषेध किया गया है और ' इसका ( आत्माका ) रूप इन्द्रियोंके सामने नहीं ठहरता " इसको ( आत्माको ) कोई भी आँखोंसे नहीं देख सकता ' ' यह अशब्द है, अस्पर्श है ' इत्यादि वचनोंसे भी आत्मा किसीका विषय नहीं है, यह बात कही गयी है । सुतरां ' जैसा आत्मा है वैसा ही ज्ञान है ' यह कहना युक्तियुक्त नहीं है । तब फिर आत्माका ज्ञान कैसे होता है? क्योंकि सभी ज्ञान जिसको विषय करते हैं उसीके आकारवाले होते हैं और ‘ आत्मा निराकार है ' ऐसा कहा है । फिर ज्ञान और आत्मा दोनों निराकार होनेसे उसमें भावना और निष्ठा कैसे हो सकती है? उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्माका अत्यन्त निर्मलत्व, स्वच्छत्व और सूक्ष्मत्व सिद्ध है और बुद्धिका भी आत्माके सदृश निर्मलत्व आदि सिद्ध है, इसलिये उसका आत्मचैतन्यके आकारसे आभासित होना बन सकता है । बुद्धिसे आभासित मन, मनसे आभासित इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंसे आभासित स्थूल शरीर है । इसलिये सांसारिक मनुष्य देहमात्रमें ही आत्मदृष्टि करते हैं ।

पृष्ठ 447

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 447 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य देहचैतन्यवादिनः च लोकायतिकाः चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुष इति आहुः तथा अन्ये इन्द्रियचैतन्यवादिनः । अन्ये मनश्चैतन्य वादिनः । अन्ये बुद्धिचैतन्यवादिनः । ततः अपि अन्तरव्यक्तम् अव्याकृताख्यम् । अविद्यावस्थम् आत्मत्वेन प्रतिपन्नाः केचित् । सर्वत्र हि बुद्ध्यादिदेहान्ते आत्मचैतन्या-भासता आत्मभ्रान्तिकारणम् इति । अत आत्मविषयं ज्ञानं न विधातव्यम्, किं तर्हि, नामरूपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिः एव कार्या न आत्मचैतन्यविज्ञानम् अविद्याध्यारोपित सर्वपदार्थाकारैः एव विशिष्टतया गृह्य-माणत्वात् । अत एव हि विज्ञानवादिनो बौद्धा विज्ञान-व्यतिरेकेण वस्तु एव न अस्ति इति प्रतिपन्नाः | प्रमाणान्तरनिरपेक्षतां च स्वसंविदितत्वाभ्युप-गमेन । तस्माद् अविद्याध्यारोपणनिराकरणमात्रं ब्रह्मणि कर्तव्यं न तु ब्रह्मज्ञाने यत्नः अत्यन्तप्रसिद्धत्वात् । अविद्याकल्पितनामरूपविशेषाकारापहृत-बुद्धित्वाद् अत्यन्तप्रसिद्धं सुविज्ञेयम् आसन्नतरम् आत्मभूतम् अपि अप्रसिद्धं दुर्विज्ञेयम् अतिदूरम् अन्यद् इव च प्रतिभाति अविवेकिनाम् । बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां तु लब्धगुर्वात्म-प्रसादानां न अतः परं सुखं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं अध्याय १८ * ४४७ देहात्मवादी लोकायतिक, ' चेतनताविशिष्ट शरीर ही आत्मा है ' ऐसा कहते हैं, दूसरे, इन्द्रियोंको चेतन कहनेवाले हैं तथा कोई मनको और कोई बुद्धिको चेतन कहनेवाले हैं । कितने ही उस बुद्धिके भी भीतर व्याप्त, अव्यक्तको – अव्याकृतसंज्ञक अविद्यावस्थ ( चिदा-भास ) - को आत्मरूपसे समझनेवाले हैं । बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त सभी जगह आत्म-चैतन्यका आभास ही उनमें आत्माकी भ्रान्तिका कारण है । अतः ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्मविषयक ज्ञान विधेय नहीं है । तो क्या विधेय है? नाम - रूप आदि अनात्मा वस्तुओंका जो आत्मामें अध्यारोप है उसकी निवृत्ति ही कर्तव्य है | आत्मचैतन्यका विज्ञान प्राप्त करना नहीं है; क्योंकि ज्ञान अविद्याद्वारा आरोपित समस्त पदार्थोंके आकारमें ही विशेषरूपसे ग्रहण किया हुआ है । यही कारण है कि विज्ञानवादी बौद्ध ' विज्ञानसे अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ही नहीं है ' इस प्रकार मानते हैं; और उस ज्ञानको स्वसंवेद्य माननेके कारण प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं मानते । सुतरां ब्रह्ममें जो अविद्याद्वारा अध्यारोप किया गया है, उसका निराकरणमात्र कर्तव्य है । ब्रह्मज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो अत्यन्त प्रसिद्ध ही है । ब्रह्म यद्यपि अत्यन्त प्रसिद्ध, सुविज्ञेय, अति समीप और आत्मस्वरूप है तो भी वह विवेकरहित मनुष्योंको अविद्याकल्पित नाम - रूपके भेदसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो जानेके कारण अप्रसिद्ध, दुर्विज्ञेय, अति दूर और दूसरा - सा प्रतीत हो रहा है । परंतु जिनकी बाह्याकार बुद्धि निवृत्त हो गयी है, जिन्होंने गुरु और आत्माकी कृपा लाभ कर ली है, उनके लिये इससे अधिक सुप्रसिद्ध, सुविज्ञेय,

पृष्ठ 448

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 448 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४८ * श्रीमद्भगवद्गीता * स्वासन्नम् अस्ति । तथा च उक्तम् ' प्रत्यक्षावगमं धर्म्यम् ' इत्यादि । केचित् तु पण्डितम्मन्या निराकारत्वाद् आत्मवस्तु न उपैति बुद्धिः अतो दुःसाध्या सम्यग्ज्ञाननिष्ठा इति आहुः । सत्यम् एवम्, गुरुसम्प्रदायरहितानाम् अश्रुत-वेदान्तानाम् अत्यन्तबहिर्विषयासक्तबुद्धीनां सम्यक्प्रमाणेषु अकृतश्रमाणाम्, तद्विपरीतानां तु लौकिकग्राह्यग्राहकद्वैतवस्तुनि सद्बुद्धिः नितरां दुःसम्पाद्या आत्मचैतन्यव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्य अनुपलब्धेः । यथा च एतद् एवम् एव न अन्यथा इति अवोचाम । उक्तं च भगवता – ' यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ' इति । तस्माद् बाह्याकारभेदबुद्धिनिवृत्तिः एव आत्मस्वरूपालम्बने कारणम् । न हि आत्मा नाम कस्यचित् कदाचिद् अप्रसिद्धः प्राप्यो हेय उपादेयो वा । अप्रसिद्धे हि तस्मिन् आत्मनि अस्वार्थाः सर्वाः प्रवृत्तयः प्रसज्येरन् । न च देहाद्यचेत-नार्थत्वं शक्यं कल्पयितुम् । न च सुखार्थं सुखं दुःखार्थं वा दुःखम् आत्मावगत्यवसा-नार्थत्वात् च सर्वव्यवहारस्य । तस्माद् यथा स्वदेहस्य परिच्छेदाय न प्रमाणान्तरापेक्षा ततः अपि आत्मनः अन्तर -| सुखस्वरूप और अपने समीप कुछ भी नहीं है । ' प्रत्यक्ष- उपलब्ध धर्ममय ' इत्यादि वाक्योंसे भी यही बात कही गयी है । कितने ही अपनेको पण्डित माननेवाले यों कहते हैं कि आत्मतत्त्व निराकार होनेके कारण उसको बुद्धि नहीं पा सकती; अतः सम्यग् ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्य है । ठीक है, जो गुरु- परम्परासे रहित हैं, जिन्होंने वेदान्त - वाक्योंको ( विधिपूर्वक ) नहीं सुना है, जिनकी बुद्धि सांसारिक विषयोंमें अत्यन्त आसक्त हो रही है, जिन्होंने यथार्थ ज्ञान करानेवाले प्रमाणोंमें परिश्रम नहीं किया है, उनके लिये यही बात है । परंतु जो उनसे विपरीत हैं, उनके लिये तो लौकिक ग्राह्य - ग्राहक-भेदयुक्त वस्तुओंमें सद्भाव सम्पादन करना ( इनको सत्य समझना ) अत्यन्त कठिन है; क्योंकि उनको आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त दूसरी वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं होती । यह ठीक इसी तरह है, अन्यथा नहीं है । यह बात हम पहले सिद्ध कर आये हैं और भगवान्ने भी कहा है कि ' जिसमें सब प्राणी जागते हैं, ज्ञानी मुनिकी वही रात्रि है ' इत्यादि । सुतरां आत्मस्वरूपके अवलम्बनमें, बाह्य नानाकार भेदबुद्धिकी निवृत्ति ही कारण है; क्योंकि आत्मा कभी किसीके भी लिये अप्रसिद्ध, प्राप्तव्य, त्याज्य या उपादेय नहीं हो सकता । आत्माको अप्रसिद्ध मान लेनेपर तो सभी प्रवृत्तियोंको निरर्थक मानना सिद्ध होगा । इसके सिवा न तो यह कल्पना की जा सकती है कि अचेतन शरीरादिके लिये ( सब कर्म किये जाते हैं ) और न यही कि सुखके लिये सुख है या दुःखके लिये दुःख है; क्योंकि सारे व्यवहारका प्रयोजन अन्तमें आत्माके ज्ञानका विषय बन जाना है । इसलिये, जैसे अपने शरीरको जाननेके लिये अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, वैसे ही आत्मा उससे भी अधिक अन्तरतम होनेके कारण

पृष्ठ 449

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 449 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* शांकरभाष्य तमत्वात् तदवगतिं प्रति न प्रमाणान्तरापेक्षा । इति आत्मज्ञाननिष्ठा विवेकिनां सुप्रसिद्धा इति सिद्धम् । येषाम् अपि निराकारं ज्ञानम् अप्रत्यक्षं तेषाम् अपि ज्ञानवशा एव ज्ञेयावगतिः इति ज्ञानम् अत्यन्तं प्रसिद्धं सुखादिवद् एवं इति अभ्युपगन्तव्यम् । जिज्ञासानुपपत्तेः च । अप्रसिद्धं चेद् ज्ञानं ज्ञेयवद् जिज्ञास्येत । तथा ज्ञेयं घटादिलक्षणं ज्ञानेन ज्ञाता व्याप्तुम् इच्छति तथा ज्ञानम् अपि ज्ञानान्तरेण ज्ञाता व्याप्तुम् इच्छेत् । न च एतद् अस्ति । अतः अत्यन्तप्रसिद्धं ज्ञानं ज्ञाता अपि अत एव प्रसिद्ध इति । तस्माद् ज्ञाने यत्नो

न कर्तव्यः किं तु अनात्मबुद्धिनिवृत्तौ एव ।

तस्माद् ज्ञाननिष्ठा सुसम्पाद्या ॥ ५० ॥

अध्याय १८ * ४४ ९ आत्माको जाननेके लिये प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है; अतः यह सिद्ध हुआ कि विवेकियोंके लिये आत्मज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्ध है । जिनके मतमें ज्ञान निराकार और अप्रत्यक्ष है उनको भी ज्ञेयका बोध ( अनुभव ) ज्ञानके ही अधीन होनेके कारण सुखादिकी तरह ही ज्ञान अत्यन्त प्रसिद्ध है, यह मान लेना चाहिये । तथा ज्ञानको जाननेके लिये जिज्ञासा नहीं होती, इसलिये भी ( यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान प्रत्यक्ष है ) यदि ज्ञान अप्रत्यक्ष होता तो अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी तरह उसको भी जाननेके लिये इच्छा की जाती, अर्थात् जैसे ज्ञाता ( पुरुष ) घटादिरूप ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञानके द्वारा अनुभव करना चाहता है, उसी तरह उस ज्ञानको भी अन्य ज्ञानके द्वारा जाननेकी इच्छा करता, परंतु यह बात नहीं है । सुतरां ज्ञान अत्यन्त प्रत्यक्ष है और इसीलिये ज्ञाता भी अत्यन्त ही प्रत्यक्ष है । अतः ज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है, किंतु अनात्मबुद्धिकी निवृत्तिके लिये ही कर्तव्य है; इसीलिये ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्य है ॥ ५० ॥

सा इयं ज्ञानस्य परा निष्ठा उच्यते कथं वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी कार्या इति- चाहिये? सो कहते हैं—

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।

शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥५१ ॥

बुद्ध्या अध्यवसायात्मिकया विशुद्धया विशुद्ध — कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे सम्पन्न मायारहितया युक्तः सम्पन्नो धृत्या धैर्येण पुरुष, धैर्यसे कार्य - करणके संघातरूप आत्माको आत्मानं कार्यकरणसङ्घातं नियम्य च नियमनं ( शरीरको ) संयम करके - वशमें करके शब्दादि कृत्वा वशीकृत्य शब्दादीन् शब्द आदिः येषां विषयोंको, अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी ते शब्दादयः तान् विषयान् त्यक्त्वा । सामर्थ्यात् विषयोंको छोड़कर, प्रकरणके अनुसार यहाँ यह शरीरस्थितिमात्रान् केवलान् मुक्त्वा ततः अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन

पृष्ठ 450

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 450 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४५० * श्रीमद्भगवद्गीता * अधिकान् सुखार्थान् त्यक्त्वा इत्यर्थः । विषयोंकी आवश्यकता है, उनसे अतिरिक्त सुखभोगके शरीरस्थित्यर्थत्वेन प्राप्तेषु च रागद्वेषौ व्युदस्य च लिये जो अधिक विषय हैं, उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी राग-परित्यज्य ॥ ५१ ॥ द्वेषका अभाव करके - त्याग करके ॥ ५१ ॥

ततः उसके बाद—

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।

ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥५२ ॥

विविक्तसेवी अरण्यनदीपुलिनगिरिगुहादीन् विविक्तान् देशान् सेवितुं शीलम् अस्य इति विविक्तसेवी । लघ्वाशी लघ्वशनशीलः । विविक्तसेवालघ्वशनयोः निद्रादिदोषनिवर्तकत्वेन चित्तप्रसादहेतुत्वाद् ग्रहणम् । यतवाक्कायमानसो वाक् च कायः च मानसं च यतानि संयतानि यस्य ज्ञाननिष्ठस्य स ज्ञाननिष्ठो यतिः यतवाक्कायमानसः स्यात् । एवम् उपरतसर्वकरणः सन्, ध्यानयोगपरो ध्यानम् आत्मस्वरूपचिन्तनं योग आत्मविषये एव एकाग्रीकरणं तौ ध्यानयोगौ परत्वेन कर्तव्यौ यस्य स ध्यान-योगपरः । नित्यं नित्यग्रहणं मन्त्रजपाद्यन्य-कर्तव्याभावप्रदर्शनार्थम् । वैराग्यं विरागभावो दृष्टादृष्टेषु विषयेषु वैतृष्ण्यं समुपाश्रितः सम्यग् उपाश्रितो नित्यम् एव इत्यर्थः ॥ ५२ ॥

विविक्त देशका सेवन करनेवाला - अर्थात् वन, नदी - तीर, पहाड़की गुफा आदि एकान्त देशका सेवन करना ही जिसका स्वभाव है ऐसा, और हलका आहार करनेवाला होकर, ' एकान्त - सेवन ' और ' हलका भोजन ' यह दोनों निद्रादि दोषोंके निवर्तक होनेसे चित्तकी स्वच्छतामें हेतु हैं, इसलिये इनका ग्रहण किया गया है । तथा मन, वाणी और शरीरको वशमें करनेवाला होकर, अर्थात् जिस ज्ञाननिष्ठ यतिके काया, मन और वाणी तीनों जीते हुए होते हैं, वह ' यतवाक्कायमानस ' होता है - इस प्रकार सब इन्द्रियोंको कर्मोंसे उपराम करके, तथा नित्य ध्यानयोगके परायण रहता हुआ, आत्मस्वरूप - चिन्तनका नाम ध्यान है और आत्मामें चित्तको एकाग्र करनेका नाम योग है, यह दोनों प्रधानरूपसे जिसके कर्तव्य हों उसका नाम ध्यानयोगपरायण है, उसके साथ नित्य पदका ग्रहण मन्त्र - जप आदि अन्य कर्तव्योंका अभाव दिखानेके लिये किया गया है । तथा इस लोक और परलोकके भोगोंमें तृष्णाका अभावरूप जो वैराग्य है, उसके आश्रित होकर अर्थात् सदा वैराग्यसम्पन्न होकर ॥ ५२ ॥

किं च- तथा—

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥५३ ॥