श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 451–460

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४५१ अहङ्कारम् अहङ्करणम् अहङ्कारो देहेन्द्रियादिषु तम् बलं सामर्थ्यं कामरागादियुक्तं न इतरत् शरीरादिसामर्थ्यं स्वाभाविकत्वेन त्यागस्य अशक्यत्वात् । दर्पो नाम हर्षानन्तरभावी धर्मातिक्रमहेतुः ‘ हृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममति-क्रामति ' इति स्मरणात् तं च । कामम् इच्छां क्रोधं द्वेषं परिग्रहम् इन्द्रिय-मनोगतदोषपरित्यागे अपि शरीरधारणप्रसङ्गेन धर्मानुष्ठाननिमित्तेन वा बाह्यः परिग्रहः प्राप्तः तं च विमुच्य परित्यज्य, परमहंसपरिव्राजको भूत्वा देहजीवनमात्रे अपि निर्गतममभावो निर्मम: अत एव शान्त उपरतः । यः संहृतायासो यतिः ज्ञाननिष्ठो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय कल्पते समर्थो भवति ॥ ५३ ॥

अनेन क्रमेण— अहंकार, बल और दर्पको छोड़कर शरीर -इन्द्रियादिमें अहंभाव करनेका नाम ' अहंकार ' है कामना और आसक्तिसे युक्त जो सामर्थ्य है उसका नाम ‘ बल ' है; यहाँ शरीरादिकी साधारण सामर्थ्यका नाम बल नहीं है, क्योंकि वह स्वाभाविक है, इसलिये उसका त्याग अशक्य है, हर्षके साथ होनेवाला और धर्म - उल्लङ्घनका कारण जो गर्व है उसका नाम ‘ दर्प ' है; क्योंकि स्मृतिमें कहा है कि ' हर्षयुक्त पुरुष दर्प करता है, दर्प करनेवाला धर्मका उल्लङ्घन किया करता है ' इत्यादि । तथा इच्छाका नाम काम है, द्वेषका नाम क्रोध है, इनका और परिग्रहका भी त्याग करके अर्थात् इन्द्रिय और मनमें रहनेवाले दोषोंका त्याग करनेके पश्चात् भी शरीर धारणके प्रसङ्गसे या धर्मानुष्ठानके निमित्तसे जो बाह्य संग्रहकी प्राप्ति होती है उसका भी परित्याग करके, तथा परमहंस परिव्राजक ( संन्यासी ) होकर एवं देहजीवनमात्रमें भी ममतारहित और इसीलिये जो शान्त - उपरतियुक्त है, ऐसा जो सब परिश्रमोंसे रहित ज्ञाननिष्ठ यति है, वह ब्रह्मरूप होनेके योग्य होता है ॥ ५३ ॥

इस क्रमसे— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते लभते पराम् ॥५४ ॥

ब्रह्मभूतो ब्रह्मप्राप्तः प्रसन्नात्मा लब्धाध्यात्म-प्रसादो न शोचति किञ्चिद् अर्थवैकल्याम् आत्मनो वैगुण्यं च उद्दिश्य न शोचति न सन्तप्यते न काङ्क्षति । ब्रह्मभूतस्य अयं स्वभावः अनूद्यते न शोचति न काङ्क्षति इति । ब्रह्मको प्राप्त हुआ, प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष न शोक करता है और न आकांक्षा ही करता है । अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है । ‘ न शोचति न काङ्क्षति ' इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है ।

पृष्ठ 452

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४५२ * श्रीमद्भगवद्गीता * न हि अप्राप्तविषयाकाङ्क्षा ब्रह्मविद उपपद्यते । न हृष्यति इति वा पाठ: । समः सर्वेषु भूतेषु आत्मौपम्येन सर्वेषु भूतेषु सुखं दुःखं वा समम् एव पश्यति इत्यर्थो न आत्मसमदर्शनम् इह तस्य वक्ष्यमाणत्वात् ' भक्त्या मामभिजानाति ' इति । एवम्भूतो ज्ञाननिष्ठो मद्भक्तिं मयि परमेश्वरे भक्तिं भजनं पराम् उत्तमां ज्ञानलक्षणां चतुर्थी लभते ' चतुर्विधा भजन्ते माम् ' इति उक्तम् ॥ ५४॥ ।

ततो ज्ञानलक्षणया-क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकांक्षा बन ही नहीं सकती । अथवा ' न काङ्क्षति ' की जगह ' न हृष्यति ' ऐसा पाठ समझना चाहिये । तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है । इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है; क्योंकि वह तो ' भक्त्या मामभिजानाति ' इस पदसे आगे कहा जायगा । ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष, मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है, अर्थात् ' चतुर्विधा भजन्ते माम् ' इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है ॥ ५४ ॥

उसके बाद उस ज्ञानलक्षणा-भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् अहम् उपाधिकृतविस्तरभेदो यः च अहं विध्वस्त-सर्वोपाधिभेद उत्तमपुरुष आकाशकल्पः तं माम् अद्वैतं चैतन्यमात्रैकरसम् अजम् अजरम् अमरम् अभयम् अनिधनं तत्त्वतः अभिजानाति । ततो माम् एवं तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरं माम् एव । न अत्र ज्ञानानन्तरप्रवेशक्रिये भिन्ने विवक्षिते ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इति, किं तर्हि, फलान्तराभावज्ञानमात्रम् एव ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ' इति उक्तत्वात् । ननु विरुद्धम् इदम् उक्तं ज्ञानस्य या परा निष्ठा तया माम् अभिजानाति इति । कथं विरुद्धम् इति चेद् उच्यते, यदा एव यस्मिन् विशते तदनन्तरम् ॥५५ ॥

भक्तिसे मैं जितना हूँ और जो हूँ, उसको तत्त्वसे जान लेता है । अभिप्राय यह है कि मैं जितना हूँ, यानी उपाधिकृत विस्तारभेदसे जितना हूँ और जो हूँ, यानी वास्तवमें समस्त उपाधिभेदसे रहित, उत्तमपुरुष और आकाशकी तरह ( व्याप्त ) जो मैं हूँ, उस अद्वैत, अजर, अमर, अभय और निधनरहित मुझको तत्त्वसे जान लेता है । फिर मुझे इस तरह तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझमें ही प्रवेश कर जाता है । यहाँ ‘ ज्ञात्वा ' ‘ विशते तदनन्तरम् ' इस कथनसे ज्ञान और उसके अनन्तर प्रवेशक्रिया, यह दोनों भिन्न-भिन्न विवक्षित नहीं हैं । तो क्या है? फलान्तरके अभावका ज्ञानमात्र ही विवक्षित है; क्योंकि ' क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही समझ ' ऐसे कहा गया है । पू ० – यह कहना विरुद्ध है कि ज्ञानकी जो परा निष्ठा है उससे मुझे जानता है । यदि कहो कि विरुद्ध कैसे है तो बतलाते हैं, जब ज्ञाताको

पृष्ठ 453

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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४५३ विषये ज्ञानम् उत्पद्यते ज्ञातुः तदा एव तं विषयम् अभिजानाति ज्ञाता इति न ज्ञाननिष्ठां ज्ञानावृत्तिलक्षणाम् अपेक्षते इति । ततः च ज्ञानेन न अभिजानाति ज्ञानावृत्त्या तु ज्ञाननिष्ठया अभिजानाति इति । न एष दोषो ज्ञानस्य स्वात्मोत्पत्तिपरिपाक-हेतुयुक्तस्य प्रतिपक्षविहीनस्य यद् आत्मानुभव-निश्चयावसानत्वं तस्य निष्ठाशब्दाभिलापात् । शास्त्राचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिपरिपाकहेतुं सहकारिकारणं बुद्धिविशुद्धयादि अमानित्वादि च अपेक्ष्य जनितस्य क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्व-ज्ञानस्य कर्त्रादिकारक भेदबुद्धिनिबन्धन -सर्वकर्मसन्याससहितस्य स्वात्मानुभवनिश्चय-रूपेण यद् अवस्थानं सा परा ज्ञाननिष्ठा इति उच्यते । सा इयं ज्ञाननिष्ठा आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिः इति उक्ता । तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतः अभिजानाति । यदनन्तरम् एव ईश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिः अशेषतो निवर्तते । अतो ज्ञाननिष्ठालक्षणया भक्त्या माम् अभिजानाति इति वचनं न विरुध्यते । अत्र च सर्वं निवृत्तिविधायि शास्त्रं वेदान्तेतिहासपुराणस्मृतिलक्षणम् अर्थवद् भवति । ' विदित्वा व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ' ( बृह ० उ ० ३। ५ १ ) ' तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः ' ( ना ० उ ० २। ७ ९ ) ' न्यास एवात्यरेचयत् ' ( ना ० उ ० २। ७८ ) इति सन्यासः कर्मणां न्यासो | जिस विषयका ज्ञान होता है, वह उसी समय उस विषयको जान लेता है, ज्ञानकी बारम्बार आवृत्ति करनारूप ज्ञाननिष्ठाकी अपेक्षा नहीं करता । इसलिये ' वह ( ज्ञेय पदार्थको ) ज्ञानसे नहीं जानता, ज्ञानावृत्तिरूप ज्ञाननिष्ठासे जानता है ' यह कहना विरुद्ध है । उ ० – - यह दोष नहीं है; क्योंकि अपनी उत्पत्ति और परिपाक हेतुओंसे युक्त एवं विरोधरहित ज्ञानका जो अपने स्वरूपानुभवमें निश्चयरूपसे पर्यवसान — स्थित हो जाना है, उसीको निष्ठा शब्दसे कहा गया है I अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्ति और परिपाकके हेतु, जो विशुद्ध - बुद्धि आदि और अमानित्वादि सहकारी कारण हैं, उनकी सहायतासे, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुआ, जो ' मैं कर्ता हूँ, मेरा यह कर्म है ' इत्यादि कारक-भेदबुद्धिजनित समस्त कर्मोंके संन्याससहित क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताका ज्ञान है, उसका जो अपने स्वरूपके अनुभवमें निश्चयरूपसे स्थित रहना है, उसे ' परा ज्ञाननिष्ठा ' कहते हैं । वही यह ज्ञाननिष्ठा आर्त आदि तीन भक्तियोंकी अपेक्षासे चतुर्थ परा भक्ति कही गयी है । उस ( ज्ञान-निष्ठारूप ) परा भक्तिसे भगवान्‌को तत्त्वसे जानता है जिससे उसी समय ईश्वर और क्षेत्रज्ञविषयक भेदबुद्धि पूर्णरूपसे निवृत्त हो जाती है । इसलिये ज्ञाननिष्ठारूप भक्तिसे मुझे जानता है यह कहना विरुद्ध नहीं होता । ऐसा मान लेनेसे वेदान्त, इतिहास, पुराण और स्मृतिरूप समस्त निवृत्तिविधायक शास्त्र सार्थक हो जाते हैं अर्थात् उन सबका अभिप्राय सिद्ध हो जाता है । ' आत्माको जानकर ( तीनों तरहकी एषणाओंसे ) विरक्त होकर फिर भिक्षाचरण करते हैं ', ' पुरुषार्थका अन्तरंग साधन होनेके कारण संन्यास हो इन सब तपोंमें अधिक कहा गया है ', ' अकेला संन्यास ही उन सबको उल्लङ्घन कर जाता है ', कर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है,

पृष्ठ 454

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४५४ * श्रीमद्भगवद्गीता * ' वेदानिमं च लोकममुं च परित्यज्य ' ( आप ० ध ० १। २३। १३ ) ‘ त्यज धर्ममधर्मं च ' ( महा ० शां ० ३२ ९ । ४० ) इत्यादि । इह च दर्शितानि वाक्यानि । न च तेषां वाक्यानाम् आनर्थक्यं युक्तम् । न च अर्थवादत्वं स्वप्रकरणस्थत्वात् । प्रत्यगात्माविक्रियस्वरूपनिष्ठत्वात् च मोक्षस्य । न हि पूर्वसमुद्रं जिगमिषो: प्राति -लोम्येन प्रत्यक्समुद्रं जिगमिषुणा समानमार्गत्वं सम्भवति । प्रत्यगात्मविषयप्रत्ययसन्तानकरणाभिनिवेशः च ज्ञाननिष्ठा । सा च प्रत्यक्समुद्रगमनवत् कर्मणा सहभावित्वेन विरुध्यते । पर्वतसर्षपयोः इव अन्तरवान् विरोधः प्रमाणविदां निश्चितः । तस्मात् सर्वकर्मसन्या -सेन एव ज्ञाननिष्ठा कार्या इति सिद्धम् ॥ ५५ ॥

| ' वेदोंको तथा इस लोक और परलोकको परित्याग करके ', ' धर्म - अधर्मको छोड़ ' इत्यादि शास्त्रवाक्य हैं । तथा यहाँ भी ( संन्यासपरक ) बहुत - से वचन दिखाये गये हैं । उन सब वचनोंको व्यर्थ मानना उचित नहीं और अर्थवादरूप मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि वे अपने प्रकरणमें स्थित हैं । इसके सिवा अन्तरात्माके अविक्रियस्वरूपमें निश्चयरूपसे स्थित हो जाना ही मोक्ष है । इसलिये भी ( पूर्वोक्त बात ही सिद्ध होती है ); क्योंकि पूर्वसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेका उसके प्रतिकूल पश्चिमसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेके साथ समान मार्ग नहीं हो सकता । अन्तरात्मविषयक प्रतीतिका निरन्तरता रखनेके आग्रहका नाम ' ज्ञाननिष्ठा ' है । उसका कर्मोंके साथ रहना ( पूर्वकी ओर जानेकी इच्छावालेके लिये ) पश्चिमसमुद्रकी ओर जानेकी मार्गकी भाँति विरुद्ध है । प्रमाणवेत्ताओंने उनका पर्वत और राईके समान भेद निश्चित किया है । सुतरां यह सिद्ध हुआ कि सर्वकर्म-संन्यासपूर्वक ही ज्ञाननिष्ठा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥

स्वकर्मणा भगवतः अभ्यर्चनभक्तियोगस्य सिद्धिप्राप्तिः फलं ज्ञाननिष्ठायोग्यता । यन्निमित्ता ज्ञाननिष्ठा मोक्षफलावसाना स भगवद्भक्तियोगः अधुना स्तूयते शास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदार्व्याय-अपने कर्मोंद्वारा भगवान्‌की पूजा करनारूप भक्तियोगकी सिद्धि, अर्थात् फल, ज्ञाननिष्ठाकी योग्यता है । जिस ( भक्तियोग ) - से होनेवाली ज्ञाननिष्ठा, अन्तमें मोक्षरूप फल देनेवाली होती है, उस भगवद्भक्ति-योगकी अब शास्त्राभिप्रायके उपसंहार - प्रकरणमें, शास्त्र-अभिप्रायके निश्चयको दृढ़ करनेके लिये स्तुति की जाती है—

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥

सर्वकर्माणि प्रतिषिद्धानि अपि सदा कुर्वाणः सदा सब कर्मोंको करनेवाला अर्थात् निषिद्ध कर्मों-अनुतिष्ठन् मद्व्यपाश्रयः अहं वासुदेव ईश्वरो को भी करनेवाला जो मद्व्यपाश्रय भक्त है - जिसका

पृष्ठ 455

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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४५५ व्यपाश्रयो यस्य स मद्व्यपाश्रयो मय्यर्पित | मैं वासुदेव ही पूर्ण आश्रय हूँ, ऐसा मुझे ही अपना सर्वात्मभाव इत्यर्थः । सः अपि मत्प्रसादाद् मम सब कुछ अर्पण कर देनेवाला जो भक्त है, वह भी ईश्वरस्य प्रसादाद् अवाप्नोति शाश्वतं नित्यं वैष्णवं मुझ ईश्वरके अनुग्रहसे, विष्णुके शाश्वत – नित्य— पदम् अव्ययम् ॥ ५६ ॥ अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥

यस्माद् एवं तस्मात्— जब कि यह बात है इसलिये -चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥

चेतसा विवेकबुद्धया सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयि ईश्वरे सन्न्यस्य ' यत्करोषि यदश्नासि ' इति उक्तन्यायेन मत्परः अहं वासुदेवः परो यस्य तव स त्वं मत्परः सन् बुद्धियोगं मयि समाहितबुद्धित्वं बुद्धियोगः तं बुद्धियोगम् उपाश्रित्य आश्रयः अनन्यशरणत्वं मच्चित्तो मयि एव चित्तं यस्य तव स त्वं मच्चित्तः सततं सर्वदा भव ॥ ५७ ॥

तू दृष्ट और अदृष्ट फलवाले समस्त कर्मोंको विवेक - बुद्धिसे अर्थात् ' यत्करोषि यदश्नासि ' इस

श्लोकमें बतलाये हुए भावसे, मुझ ईश्वरमें समर्पण

करके तथा मेरे परायण होकर, अर्थात् मैं वासुदेव ही जिसका पर ( परमगति ) हूँ, ऐसा होकर, मुझमें बुद्धिको स्थिर करनारूप बुद्धि - योगका आश्रय लेकर - बुद्धियोगके अनन्यशरण होकर, निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो, अर्थात् जिसका निरन्तर मुझमें ही चित्त रहे, ऐसा हो ॥ ५७ ॥

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि सर्वाणि दुस्तराणि मुझमें चित्तवाला होकर तू समस्त कठिनाइयोंको संसारहेतुजातानि मत्प्रसादात् तरिष्यसि | अर्थात् जन्म - मरणरूप संसारके समस्त कारणोंको मेरे अतिक्रमिष्यसि । अथ चेद् यदि त्वं मदुक्तम् अनुग्रहसे तर जायगा - – सबसे पार हो जायगा । परंतु अहङ्कारात् पण्डितः अहम् इति न श्रोष्यसि यदि तू मेरे कहे हुए वचनोंको अहंकारसे ' मैं पण्डित न ग्रहीष्यसि ततः त्वं विनङ्क्ष्यसि विनाशं हूँ ऐसा समझकर नहीं सुनेगा - ग्रहण नहीं करेगा, गमिष्यसि ॥ ५८ ॥ तो नष्ट हो जायगा- नाशको प्राप्त हो जायगा ॥ ५८ ॥

इदं च त्वया न मन्तव्यं स्वतन्त्रः अहं तुझे यह भी नहीं समझना चाहिये कि मैं स्वतन्त्र किमर्थं परोक्तं करिष्यामि इति - हूँ, दूसरेका कहना क्यों करूँ? –

पृष्ठ 456

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४५६ * श्रीमद्भगवद्गीता *

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५ ९ ॥

यत् च एतत् त्वम् अहङ्कारम् आश्रित्य न जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान योत्स्ये इति न युद्धं करिष्यामि इति मन्यसे रहा है - ऐसा निश्चय कर रहा है कि मैं युद्ध नहीं चिन्तयसि निश्चयं करोषि मिथ्या एष व्यवसायो करूँगा सो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; क्योंकि निश्चयः ते तव यस्मात् प्रकृतिः क्षत्रस्वभावः त्वां तेरी प्रकृत - तेरा क्षत्रिय - स्वभाव तुझे युद्धमें नियुक्त नियोक्ष्यति ॥ ५ ९ ॥ कर देगा ॥ ५ ९ ॥ यस्मात् च— क्योंकि— |

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।

कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥६० ॥

स्वभावजेन शौर्यादिना यथोक्तेन कौन्तेय हे कौन्तेय! तू उपर्युक्त शूरवीरता आदि अपने निबद्धो निश्चयेन बद्धः स्वेन आत्मीयेन कर्मणा स्वाभाविक कर्मोंद्वारा निबद्ध हुआ - दृढ़तासे बँधा कर्तुं न इच्छसि यत् कर्म मोहाद् अविवेकतः हुआ है, इसलिये जो कर्म तू मोहसे - अविवेकके करिष्यसि अवशः अपि परवश एव तत् कारण नहीं करना चाहता है, वही कर्म विवश होकर कर्म ॥ ६० ॥ करेगा ॥ ६० ॥

यस्मात्— क्योंकि-ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥

ईश्वरः ईशनशीलो नारायणः सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे हृदयदेशे अर्जुन शुक्लान्त-रात्मस्वभावो विशुद्धान्तःकरण इति । ' अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च ' ( ऋ ० सं ० ६ । ९ । १ ) इति दर्शनात् । तिष्ठति स्थितिं लभते । स कथं तिष्ठति इति आह-भ्रामयन् भ्रमणं कारयन् सर्वभूतानि यन्त्रा-रूढानि यन्त्राणि आरूढानि अधिष्ठितानि इव हे अर्जुन! ईश्वर अर्थात् सबका शासन करनेवाला नारायण समस्त प्राणियोंके हृदयदेशमें स्थित है । जो शुक्ल स्वच्छ - शुद्ध अन्तरात्मा - स्वभाववाला हो अर्थात् पवित्र अन्तःकरणयुक्त हो उसका नाम अर्जुन है; क्योंकि ' अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च ' इस कथनमें अर्जुन शब्द शुद्धताका वाचक देखा गया है । वह ( ईश्वर ) कैसे स्थित है? सो कहते हैं— समस्त प्राणियोंको, यन्त्रपर आरूढ़ हुई - चढ़ी हुई कठपुतलियोंकी भाँति, भ्रमाता हुआ - भ्रमण कराता

पृष्ठ 457

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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४५७ इति इवशब्दः अत्र द्रष्टव्यः । यथा दारुकृत - | हुआ स्थित है । यहाँ इव ( भाँति ) शब्द अधिक समझना चाहिये, अर्थात् जैसे यन्त्रपर आरूढ़ कठपुतली पुरुषादीनि यन्त्रारूढानि मायया छद्मना | आदिको ( खिलाड़ी ) मायासे भ्रमाता हुआ स्थित रहता है, उसी तरह ईश्वर सबके हृदयमें स्थित है, इस भ्रामयन् तिष्ठति इति सम्बन्धः ६१ ॥ प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ६१ ॥

तमेव शरणं गच्छ तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं तम् एव ईश्वरं शरणम् आश्रयं संसारार्ति-हरणार्थं गच्छ आश्रयं सर्वभावेन सर्वात्मना हे भारत ततः तत्प्रसादाद् ईश्वरानुग्रहात् परां प्रकृष्टां शान्तिं पराम् उपरतिं स्थानं च मम विष्णोः परमं पदम् अवाप्स्यसि शाश्वतं नित्यम् ॥ ६२ ॥

सर्वभावेन भारत ।

प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥

हे भारत! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें जा अर्थात् संसारके समस्त क्लेशोंका नाश करनेके लिये मन, वाणी और शरीरद्वारा सब प्रकारसे उस ईश्वरका ही आश्रय ग्रहण कर । फिर उस ईश्वरके अनुग्रहसे परम - उत्तम शान्तिको, अर्थात् उपरतिको और शाश्वत स्थानको अर्थात् मुझ विष्णुके परम नित्यधामको प्राप्त करेगा ॥ ६२ ॥

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

इति एतत् ते तुभ्यं ज्ञानम् आख्यातं कथितं मुझ सर्वज्ञ ईश्वरने तुझसे यह गुह्यसे भी गुह्य गुह्याद् गोप्याद् गुह्यतरम् अतिशयेन गुह्यं रहस्यम् अत्यन्त गोपनीय रहस्ययुक्त ज्ञान कहा है । इस इत्यर्थो मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण विमृश्य विमर्शनम् उपर्युक्त शास्त्रको, अर्थात् ऊपर कहे हुए समस्त आलोचनं कृत्वा एतद् यथोक्तं शास्त्रम् अर्थको पूर्णरूपसे विचारकर - इसके विषयमें भली-अशेषेण समस्तं यथोक्तं च अर्थजातं यथा प्रकार आलोचना करके, तेरी जैसी इच्छा हो वैसे इच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ ही कर ॥ ६३ ॥

भूयः अपि मया उच्यमानं शृणु- फिर भी मैं जो कुछ कहता हूँ उसे सुन-सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥६४ ॥

सर्वगुह्यतमं सर्वगुह्येभ्यः अत्यन्तरहस्यम् उक्तम् | सर्व गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य - रहस्ययुक्त मेरे परम अपि असकृद् भूयः पुनः शृणु मे मम परमं प्रकृष्टं उत्तम वचन तू फिर भी सुन; अर्थात् जो वचन मैंने वचो वाक्यम् । पहले अनेक बार कहे हैं उनको तू फिरसे सुन ।

पृष्ठ 458

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४५८ * श्रीमद्भगवद्गीता * न भयाद् न अपि अर्थकारणाद् वा वक्ष्यामि मैं ( जो कुछ कहूँगा वह ) भयसे अथवा स्वार्थके किं तर्हि इष्टः प्रियः असि मे मम दृढम् अव्यभि- लिये नहीं कहूँगा; किंतु तू मेरा दृढ़ ऐकान्तिक प्रिय चारेण इति कृत्वा ततः तेन कारणेन वक्ष्यामि है, यह समझकर - केवल इसी कारणसे तेरे हितकी कथयिष्यामि ते हितं परं ज्ञानप्राप्तिसाधनम् । बात अर्थात् परम ज्ञानप्राप्तिका साधन कहूँगा; क्योंकि तद् हि सर्वहितानां हिततमम् च ॥ ६४ ॥ यही साधन सब हितोंमें उत्तम हित है ॥ ६४ ॥

किं तद् इति आह- वे वचन कौन - से हैं? सो कहते हैं— मन्मना भव मद्भक्तो

मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

मन्मना भव मच्चित्तो भव मद्भक्तो भव मद्भजनो भव मद्याजी मद्यजनशीलो भव मां नमस्कुरु नमस्कारम् अपि मम एव कुरु । तत्र एवं वर्तमानो वासुदेवे एव सर्वसमर्पित-साध्यसाधनप्रयोजनो माम् एव एष्यसि आ -गमिष्यसि । सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञां करोमि एतस्मिन् वस्तुनि इत्यर्थः । यतः प्रियः असि मे । एवं भगवतः सत्यप्रतिज्ञत्वं बुद्ध्वा भगवद्भक्तेः अवश्यम्भाविमोक्षफलम् अवधार्य भगवच्छरणैकपरायणो भवेद् इति वाक्यार्थः ॥ ६५ ॥

तू मुझमें मनवाला अर्थात् मुझमें चित्तवाला हो, मेरा भक्त अर्थात् मेरा ही भजन करनेवाला हो और मेरा ही पूजन करनेवाला हो, तथा मुझे ही नमस्कार कर, अर्थात् नमस्कार भी मुझे ही किया कर इस प्रकार करता हुआ, अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही ( अपने ) समस्त साध्य, साधन और प्रयोजनको समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा । इस विषय में मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा प्रिय है । कहनेका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान्‌को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवान्की भक्तिका फल निःसन्देह – ऐकान्तिक मोक्ष है - यह समझकर, मनुष्यको केवल एकमात्र भगवान्की । शरणमें ही तत्पर हो जाना चाहिये ॥ ६५ ॥

कर्मयोगनिष्ठायाः परमरहस्यम् ईश्वरशरणताम् कर्मयोगनिष्ठाके परम रहस्य ईश्वरशरणागतिका उपसंहृत्य अथ इदानीं कर्मयोगनिष्ठाफलं उपसंहार करके, उसके पश्चात् अब कर्मयोगनिष्ठाका सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तविहितं वक्तव्यम् इति फलस्वरूप, समस्त वेदान्तोंमें कहा हुआ यथार्थ ज्ञान आह- कहना है, इसलिये ( भगवान् ) बोले—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 459

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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४५ ९ सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माः च सर्वधर्माः तान् । धर्मशब्देन अत्र अधर्मः अपि गृह्यते नैष्कर्म्यस्य विवक्षितत्वात् ' नाविरतो दुश्चरितात् ' ( क ० उ ० १। २ । २४ ) ' त्यज धर्ममधर्मं च ' ( महा ० शान्ति ० ३२ ९ । ४० ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । सर्वधर्मान् परित्यज्य सन्यस्य सर्वकर्माणि इति एतत् । माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणविवर्जितम् अहम् एव इति एवम् एकं शरणं व्रज न मत्तः अन्यद् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः । अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्म-भावप्रकाशीकरणेन । उक्तं च- ' नाशयाम्यात्म-भावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ' इति अतो मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः ॥ ६६ ॥

समस्त धर्मोंको, अर्थात् जितने भी धर्म हैं उन सबको, यहाँ नैष्कर्म्य ( कर्माभाव ) -का प्रतिपादन करना है, इसलिये ‘ धर्म ' शब्दसे अधर्मका भी ग्रहण किया जाता है । ' जो बुरे चरित्रोंसे विरक्त नहीं हुआ ' ' धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़ ' इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है । सब धर्मोंको छोड़कर — सर्व - कर्मोंका संन्यास करके, मुझ एककी शरणमें आ, अर्थात् मैं जो कि सबका आत्मा, समभावसे सर्व - भूतोंमें स्थित, ईश्वर, अच्युत तथा गर्भ, जन्म, जरा और मरणसे रहित हूँ, उस एकके इस प्रकार शरण हो । अभिप्राय यह कि ' मुझ परमेश्वरसे अन्य कुछ है ही नहीं ' ऐसा निश्चय कर । तुझ इस प्रकार निश्चयवालेको मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराके, समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापोंसे मुक्त कर दूँगा । पहले कहा भी है कि - ' मैं हृदयमें स्थित हुआ प्रकाशमय ज्ञान - दीपकसे ( अज्ञानजनित अन्धकारका ) नाश करता हूँ ' इसलिये तू शोक न कर अर्थात् चिन्ता मत कर ॥ ६६ ॥

( शास्त्रके उपसंहारका प्रकरण ) अस्मिन् हि गीताशास्त्रे परं निःश्रेयस-साधनं निश्चितं किं ज्ञानं किं कर्म वा आहोस्विद् उभयम् इति । कुतः सन्देहः? ' यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ' ' ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ' इत्यादीनि वाक्यानि केवलाद् ज्ञानाद् निः श्रेयसप्राप्तिं दर्शयन्ति ‘ कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ‘ कुरु कर्मैव ' इत्येवमादीनि कर्मणाम् अवश्यकर्तव्यतां दर्शयन्ति । एवं ज्ञानकर्मणोः कर्तव्यतोपदेशात् समुच्चितयोः अपि निःश्रेयसहेतुत्वं स्याद् इति भवेत् संशयः । किं पुनरत्र मीमांसाफलम् । यह विचार करना चाहिये कि इस गीताशास्त्रमें निश्चय किया हुआ, परम कल्याण ( मोक्ष ) -का साधन ज्ञान है या कर्म, अथवा दोनों? पू ० — यह सन्देह क्यों होता है? उ ० – ' जिसको जानकर अमरता प्राप्त कर लेता है ' ' तदनन्तर मुझे तत्त्वसे जानकर मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है ' इत्यादि वाक्य तो केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति दिखला रहे हैं; तथा ' तेरा कर्ममें ही अधिकार है ' ' तू कर्म ही कर ' इत्यादि वाक्य कर्मोंकी अवश्य-कर्तव्यता दिखला रहे हैं । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनोंकी कर्तव्यताका उपदेश होनेसे ऐसा संशय भी हो सकता है सम्भवतः दोनों समुच्चित ( मिलकर ) ही मोक्षके साधन होंगे । पू ० – परंतु इस मीमांसाका फल क्या होगा?

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४६० * श्रीमद्भगवद्गीता * ननु एतद् एव एषाम् अन्यतमस्य परम- उ ० — यही कि इन तीनोंमेंसे किसी एकको ही निःश्रेयससाधनत्वावधारणम् । अतो विस्तीर्णतरं परम कल्याणका साधन निश्चय करना । अतः इसकी मीमांस्यम् एतत् । विस्तारपूर्वक मीमांसा कर लेनी चाहिये । ( सिद्धान्तका प्रतिपादन ) आत्मज्ञानस्य तु केवलस्य निःश्रेयस-हेतुत्वं भेदप्रत्ययनिवर्तकत्वेन कैवल्यफलावसान-त्वात् । क्रियाकारकफलभेदबुद्धिः अविद्यया आत्मनि नित्यप्रवृत्ता मम कर्म अहं कर्ता अमुष्मै फलाय इदं कर्म करिष्यामि इति इयम् अविद्या अनादिकालप्रवृत्ता । अस्या अविद्याया निवर्तकम् अयम् अहम् अस्मि केवलः अकर्ता अक्रियः अफलो न मत्तः अन्यः अस्ति कश्चिद् इति एवंरूपम् आत्म-विषयं ज्ञानम् उत्पद्यमानं कर्मप्रवृत्तिहेतुभूताया भेदबुद्धेः निवर्तकत्वात् । तु शब्दः पक्षद्वयव्यावृत्त्यर्थो न केवलेभ्यः कर्मभ्यो न च ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां निःश्रेयसप्राप्तिः इति पक्षद्वयं निवर्तयति । अकार्यत्वात् च निःश्रेयस्य कर्मसाधन-त्वानुपपत्तिः । न हि नित्यं वस्तु कर्मणा ज्ञानेन वा क्रियते । केवलं ज्ञानम् अपि अनर्थकं तर्हि? न अविद्यानिवर्तकत्वे सति दृष्टकैवल्य-फलावसानत्वात् । अविद्यातमोनिवर्तकस्य ज्ञानस्य दृष्टं कैवल्यफलावसानत्वम् । रज्ज्वादिविषये सर्पाद्यज्ञानतमोनिवर्तकप्रदीप केवल आत्मज्ञान ही परम कल्याण ( मोक्ष ) - का हेतु ( साधन ) है; क्योंकि भेद - प्रतीतिका निवर्तक होनेके कारण, कैवल्य ( मोक्ष ) की प्राप्ति ही उसकी अवधि है । आत्मामें क्रिया, कारक और फलविषयक भेद-बुद्धि अविद्याके कारण सदासे प्रवृत्त हो रही है।‘कर्म मेरे हैं, मैं उनका कर्ता हूँ, मैं अमुक फलके लिये यह कर्म करता हूँ ' यह अविद्या अनादिकालसे प्रवृत्त हो रही है । ' यह केवल, ( एकमात्र ) अकर्ता, क्रियारहित और फलसे रहित आत्मा मैं हूँ, मुझसे भिन्न और कोई भी नहीं है ' ऐसा आत्मविषयक ज्ञान इस अविद्याका नाशक है; क्योंकि यह उत्पन्न होते ही, कर्म - प्रवृत्तिकी हेतुरूप भेदबुद्धिका नाश करनेवाला है । उपर्युक्त वाक्यमें ' तु ' शब्द दोनों पक्षोंकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् मोक्ष न तो केवल कर्मसे मिलता है और न ज्ञान - कर्मके समुच्चयसे ही । इस प्रकार ‘ तु ’ शब्द दोनों पक्षोंका खण्डन करता I मोक्ष अकार्य अर्थात् स्वतः सिद्ध है, इसलिये कर्मोंको उसका साधन मानना नहीं बन सकता; क्योंकि कोई भी नित्य ( स्वतः सिद्ध ) वस्तु कर्म या ज्ञानसे उत्पन्न नहीं की जाती । पू ० – तब तो केवल ज्ञान भी व्यर्थ ही है? उ०- - यह बात नहीं है; क्योंकि अविद्याका नाशक होनेके कारण उसकी मोक्षप्राप्तिरूप फल-पर्यन्तता प्रत्यक्ष है । अर्थात् जैसे दीपकके प्रकाश-का, रज्जु आदि वस्तुओंमें होनेवाली सर्पादिकी भ्रान्तिको और अन्धकारको नष्ट कर देना ही फल है और जैसे उस प्रकाशका फल सर्पविषयक