श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 461–470
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४६१ प्रकाशफलवत्, विनिवृत्तसर्पविकल्परज्जु -कैवल्यावसान हि प्रकाशफलं तथा ज्ञानम् । दृष्टार्थानां च छिदिक्रियाग्निमन्थनादीनां व्यापृतकर्त्रादिकारकाणां द्वैधीभावाग्नि-दर्शनादिफलाद् अन्यफले कर्मान्तरे व्यापारा-नुपपत्तिः यथा तथा ज्ञाननिष्ठाक्रियायां दृष्टार्थायां व्यापृतस्य ज्ञात्रादिकारकस्य । आत्मकैवल्यफलाद् अन्यफले कर्मान्तरे प्रवृत्तिः अनुपपन्ना इति न ज्ञाननिष्ठा कर्मसहिता उपपद्यते । भुज्यग्निहोत्रादिक्रियावत् स्याद् इति चेत् । न,, कैवल्यफले ज्ञाने क्रियाफलार्थित्वा -नुपपत्तेः । कैवल्यफले हि ज्ञाने प्राप्ते सर्वतः -सम्प्लुतोदके फले कूपतडागादिक्रियाफलार्थि-त्वाभाववत् फलान्तरे तत्साधनभूतायां वा क्रियायाम् अर्थित्वानुपपत्तिः । न हि राज्यप्राप्तिफले कर्मणि व्यापृतस्य क्षेत्रप्राप्तिफले व्यापारोपपत्तिः तद्विषयं च अर्थित्वम् । तस्माद् न कर्मणः अस्ति निःश्रेयससाधन-त्वम् । न च ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोः न अपि ज्ञानस्य कैवल्यफलस्य कर्मसाहाय्यापेक्षा अविद्यानिवर्तकत्वेन विरोधात् । | विकल्पको हटाकर, केवल रज्जुको प्रत्यक्ष कराके समाप्त हो जाता है, वैसे ही अविद्यारूप अन्धकारके नाशक आत्मज्ञानका भी फल, केवल आत्मस्वरूपको प्रत्यक्ष कराके ही समाप्त होता देखा गया है । जिनका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी जो लकड़ीको चीरना अथवा अरणीमन्थनद्वारा अग्नि उत्पन्न करना आदि क्रियाएँ हैं, उनमें लगे हुए कर्ता आदि कारकोंकी, जैसे अलग - अलग टुकड़े हो जाना, अथवा अग्नि प्रज्वलित हो जाना आदि फलसे अतिरिक्त किसी अन्य फल देनेवाले कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती, वैसे ही जिसका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी ज्ञाननिष्ठारूप क्रियामें लगे हुए ज्ञाता आदि कारकोंकी भी आत्मकैवल्यरूप फलसे अतिरिक्त फलवाले किसी अन्य कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती । अतः ज्ञाननिष्ठा कर्मसहित नहीं हो सकती । यदि कहो कि भोजन और अग्निहोत्र आदि क्रियाओंके समान ( इसमें भी समुच्चय ) हो सकता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिसका फल कैवल्य ( मोक्ष ) है, उस ज्ञानके प्राप्त होनेके पश्चात् कर्मफलकी इच्छा नहीं रह सकती, जैसे सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर कूप - तालाब आदिकी जलके लिये चाह नहीं रहती, उसी प्रकार मोक्ष जिसका फल है, ऐसे ज्ञानकी प्राप्ति होनेके बाद क्षणिक सुखरूप फलान्तरकी या उसकी साधनभूत क्रियाकी इच्छुकता नहीं रह सकती । क्योंकि जो मनुष्य राज्य प्राप्त करा देनेवाले कर्ममें लगा हुआ है उसकी प्रवृत्ति, क्षेत्र प्राप्ति ही जिसका फल है ऐसे कर्ममें नहीं होती और उस कर्मके फलकी इच्छा भी नहीं होती । सुतरां यह सिद्ध हुआ कि परम कल्याणका साधन न तो कर्म है और न ज्ञान - कर्मका समुच्चय ही है तथा कैवल्य ( मोक्ष ) ही जिसका फल है, ऐसे ज्ञानको कर्मोंकी सहायता भी अपेक्षित नहीं है; क्योंकि ज्ञान अविद्याका नाशक है; इसलिये उसका कर्मोंसे विरोध है ।
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४६२ * श्रीमद्भगवद्गीता * न हि तमः तमसो निवर्तकम् अतः केवलम् एवं ज्ञानं निःश्रेयससाधनम् इति । न, नित्याकरणे प्रत्यवायप्राप्तेः कैवल्यस्य च नित्यत्वात् । यत् तावत् केवलज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इति एतद् असत् । यतो नित्यानां कर्मणां श्रुत्युक्तानाम् अकरणे प्रत्यवायो नरकादिप्राप्तिलक्षणः स्यात् । ननु एवं तर्हि कर्मभ्यो मोक्षो नास्ति इति अनिर्मोक्ष एव । न एष दोषः, नित्यत्वाद् मोक्षस्य । नित्यानां कर्मणाम् अनुष्ठानात् प्रत्यवायस्य अप्राप्तिः । प्रतिषिद्धस्य च अकरणाद् अनिष्ट-शरीरानुपपत्तिः । काम्यानां च वर्जनाद् इष्टशरीरानुपपत्तिः । वर्तमानशरीरारम्भकस्य च कर्मणः फलोपभोगक्षये पतिते अस्मिन् शरीरे देहान्तरोत्पत्तौ च कारणाभावाद् आत्मनो रागादीनां च अकरणात् स्वरूपाव-स्थानम् एव कैवल्यम् इति अप्रयत्नकैवल्यम् इति । अतिक्रान्तानेकजन्मान्तरकृतस्य स्वर्ग-नरकादिप्राप्तिफलस्य अनारब्धकार्यस्य उपभोगा- | नुपपत्तेः क्षयाभाव इति चेद् । न, नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखोपभोगस्य तत्फलोपभोगत्वोपपत्तेः । प्रायश्चित्तवद् वा पूर्वोपात्तदुरितक्षयार्थत्वाद् नित्यकर्मणाम् । आरब्धानां च उपभोगेन एव कर्मणां क्षीणत्वाद् अपूर्वाणां च कर्मणाम् अनारम्भे अयत्नसिद्धं कैवल्यम् इति । यह प्रसिद्ध ही है कि अन्धकारका नाशक अन्धकार नहीं हो सकता । इसलिये केवल ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है । पू ० – यह सिद्धान्त ठीक नहीं; क्योंकि नित्यकर्मोंके न करनेसे प्रत्यवाय होता है और मोक्ष नित्य है । भाव यह कि — पहले जो यह कहा गया कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष मिलता है, ठीक नहीं; क्योंकि वेद - शास्त्रमें कहे हुए नित्यकर्मोंके न करनेसे नरकादिकी प्राप्तिरूप प्रत्यवाय होगा । यदि कहो कि ऐसा होनेसे तो कर्मोंसे छुटकारा ही न होगा, अतः मोक्षके अभावका प्रसङ्ग आ जायगा, तो ऐसा दोष नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्यसिद्ध है । नित्यकर्मोंका आचरण करनेसे तो प्रत्यवाय न होगा, निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर देनेसे अनिष्ट ( बुरे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी, काम्यकर्मोंका त्याग कर देनेके कारण इष्ट ( अच्छे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी तथा वर्तमान शरीरको उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका, फलके उपभोगसे क्षय हो जानेपर, इस शरीरका नाश हो जानेके पश्चात्, दूसरे शरीरकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं रहनेसे तथा शरीरसम्बन्धी आसक्ति आदिके न करनेसे, जो स्वरूपमें स्थित हो जाना है वही कैवल्य है, अतः बिना प्रयत्नके ही कैवल्य सिद्ध हो जायगा । उ ० – - किंतु भूतपूर्व अनेक जन्मोंके किये हुए जो स्वर्ग - नरक आदिकी प्राप्तिरूप फल देनेवाले अनेक अनारब्धफल - सञ्चित कर्म हैं, उनके फलका उपभोग न होनेके कारण, उनका तो नाश नहीं होगा - ऐसा कहें तो? पू ० – यह बात नहीं है; क्योंकि नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखभोगको, उस कर्मोंके फलका उपभोग माना जा सकता है । अथवा प्रायश्चित्तकी भाँति नित्यकर्म भी पूर्वकृत पापका नाश करनेवाले मान लिये जायँगे तथा प्रारब्धकर्मका फलभोगसे नाश हो जायगा, फिर नये कर्मोंका आरम्भ न करनेसे ' कैवल्य ' बिना यज्ञके सिद्ध हो जायगा ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४६३ न, ‘ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वे ० उ ० ३ । ८ ) इति विद्याया अन्यः पन्था मोक्षाय न विद्यते इति श्रुतेः चर्मवत् आकाशवेष्टनासम्भववद् अविदुषो मोक्षासम्भवश्रुतेः । ज्ञानात् कैवल्यम् आप्नोति इति च पुराणस्मृतेः । अनारब्धफलानां पुण्यानां कर्मणां क्षया-नुपपत्तेः च । यथा पूर्वोपात्तानां दुरितानाम् अनारब्धफलानां सम्भवः तथा पुण्यानाम् अपि अनारब्धफलानां स्यात् सम्भवः । तेषां च देहान्तरम् अकृत्वा क्षयानुपपत्तौ मोक्षा-नुपपत्तिः । धर्माधर्महेतूनां च रागद्वेषमोहानाम् अन्यत्र आत्मज्ञानाद् उच्छेदानुपपत्तेः धर्माधर्मोच्छेदा-नुपपत्तिः । नित्यानां च कर्मणां पुण्यलोकफलश्रुतेः ‘ वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः ' ( आ ० स्मृ ० २।२ । २। ३ ) इत्यादिस्मृतेः च कर्मक्षयानुपपत्तिः । ये तु आहुः नित्यानि कर्माणि दुःखरूप-त्वाद् पूर्वकृतदुरितकर्मणां फलम् एव न तु तेषां स्वरूपव्यतिरेकेण अन्यत् फलम् अस्ति अश्रुत-त्वाद् जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् इति । न, अप्रवृत्तानां फलदानासम्भवात्, दुःखफल-विशेषानुपपत्तिः च स्यात् । उ ० — यह सिद्धान्त ठीक नहीं है; क्योंकि ' उस ( परमात्मा ) को जानकर ही मनुष्य मृत्युसे तरता है; मोक्ष - प्राप्तिके लिये दूसरा मार्ग नहीं है ' इस प्रकार मोक्षके लिये विद्याके अतिरिक्त अन्य मार्गका अभाव बतलानेवाली श्रुति है; तथा जैसे चमड़ेकी भाँति आकाशको लपेटना असम्भव है, उसी प्रकार अज्ञानीकी मुक्ति असम्भव बतलानेवाली भी श्रुति है, एवं पुराण और स्मृतियोंमें भी यही कहा गया है कि ज्ञानसे ही कैवल्यकी प्राप्ति होती है । इसके सिवा ( उस सिद्धान्तमें ) जिनका फल मिलना आरम्भ नहीं हुआ है ऐसे पूर्वकृत पुण्योंके नाशकी उत्पत्ति न होनेसे भी यह पक्ष ठीक नहीं है । अर्थात् जिस प्रकार पूर्वकृत सञ्चित पुण्योंका होना सम्भव है, उसी प्रकार सञ्चित पापोंका होना भी सम्भव है ही; अतः देहान्तरको उत्पन्न किये बिना उनका क्षय सम्भव न होनेसे ( इस पक्षके अनुसार ) मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा । इसके सिवा, पुण्य- - पापके कारणरूप राग, द्वेष और मोह आदि दोषोंका, बिना आत्मज्ञानके मूलोच्छेद होना सम्भव न होनेके कारण भी पुण्य - पापका उच्छेद होना सम्भव नहीं । तथा श्रुतिमें नित्यकर्मोंका पुण्यलोककी प्राप्तिरूप फल बतलाया जानेके कारण और ' अपने कर्मोंमें स्थित वर्णाश्रमावलम्बी ' इत्यादि स्मृतिवाक्योंद्वारा भी यही बात कही जानेके कारण भी कर्मोंका क्षय ( मानना ) सिद्ध नहीं होता । तथा जो यह कहते हैं कि नित्यकर्म दुःखरूप होनेके कारण पूर्वकृत पापोंका फल ही है, उनका अपने स्वरूपसे अतिरिक्त और कोई फल नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनका कोई फल नहीं बतलाया गया तथा उनका ' विधान जीवननिर्वाह आदिके लिये किया गया है । ' उनका कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जो कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए, उनका फल होना असम्भव है और नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम, अन्य कर्मका फलविशेष है यह बात भी सिद्ध नहीं की जा सकेगी ।
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४६४ * श्रीमद्भगवद्गीता * यद् उक्तं पूर्वजन्मकृतदुरितानां कर्मणां फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं भुज्यते इति तद् असत् । न हि मरणकाले फलदानाय अनङ्कुरीभूतस्य कर्मणः फलम् अन्यकर्मारब्धे जन्मनि उपभुज्यते इति उपपत्तिः । अन्यथा स्वर्गफलोपभोगाय अग्निहोत्रादि कर्मारब्धे जन्मनि नरककर्मफलोपभोगा-नुपपत्तिः न स्यात् । तस्य दुरितदुःखविशेषफलत्वानुपपत्तेः च, अनेकेषु हि दुरितेषु सम्भवत्सु भिन्नदुःखसाधन-फलेषु नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमात्रफलेषु कल्प्यमानेषु द्वन्द्वरोगादिबाधानिमित्तं न हि शक्यते कल्पयितुं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितफलं न शिरसा पाषाण-वहनादिदुःखम् इति । अप्रकृतं च इदम् उच्यते नित्यकर्मानुष्ठाना-यासदुःखं पूर्वकृतदुरितकर्मफलम् इति । कथम्, अप्रसूतफलस्य पूर्वकृतदुरितस्य क्षयो न उपपद्यते इति प्रकृतं तत्र प्रसूतफलस्य कर्मणः फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् आह भवान् न अप्रसूतफलस्य इति । तुमने जो यह कहा कि पूर्वजन्मकृत पापकर्मोंका फल, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखके द्वारा भोगा जाता है, सो ठीक नहीं; क्योंकि मरनेके समय जो कर्म भविष्यमें फल देनेके लिये अङ्कुरित नहीं हुए उनका फल दूसरे कर्मोंद्वारा उत्पन्न हुए शरीरमें भोगा जाता है, यह कहना युक्तियुक्त नहीं है । यदि ऐसा न हो तो स्वर्गरूप फलका भोग करनेके लिये अग्निहोत्रादि कर्मोंसे उत्पन्न हुए जन्ममें नरकके कारणभूत कर्मोंका फल भोगा जाना भी युक्तिविरुद्ध नहीं होगा । इसके सिवा यह ( नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होने-वाला परिश्रमरूप दु: ख ) पापोंकी फलरूप दुःख-विशेष सिद्ध न हो सकनेके कारण भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि भिन्न - भिन्न प्रकारके दुःख-साधनरूप फल देनेवाले, अनेक ( सञ्चित ) पापोंके होनेकी सम्भावना होते हुए भी नित्यकर्म अनुष्ठानके परिश्रममात्रको ही उन सबका फल मान लेनेपर शीतोष्णादि द्वन्द्वोंकी अथवा रोगादिकी पीड़ासे होने-वाले दुःखोंको पापोंका फल नहीं माना जा सकेगा; तथा यह हो भी कैसे सकता है कि नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम ही पूर्वकृत पापोंका फल है, सिरपर पत्थर आदि ढोनेका दुःख उसका फल नहीं? इसके सिवा, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख पूर्वकृत पापोंका फल है, यह कहना प्रकरणविरुद्ध भी है । पू ० — कैसे? उ ० – जो पूर्वकृत पाप, फल देनेके लिये अङ्करित नहीं हुए हैं, उसका क्षय नहीं हो सकता ऐसा प्रकरण है, उसमें तुमने फल देनेके लिये प्रस्तुत हुए पूर्वकृत पापोंका ही फल, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख बतलाया है, जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत नहीं हुए हैं उनका फल नहीं बतलाया ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४६५ अथ सर्वम् एव पूर्वकृतं दुरितं प्रसूतफलम् एव इति मन्यते भवान् ततो नित्यकर्मानुष्ठाना-यासदुःखम् एव फलम् इति विशेषणम् अयुक्तं नित्यकर्मविध्यानर्थक्यप्रसङ्गः च उपभोगेन एव प्रसूतफलस्य दुरितकर्मणः क्षयोपपत्तेः । किं च श्रुतस्य नित्यस्य दुःखं कर्मणः चेत् फलम्, नित्यकर्मानुष्ठानायासाद् एव तद् दृश्यते व्यायामादिवत् तद् अन्यस्य इति कल्पना-नुपपत्तिः । जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् नित्यानां कर्मणाम्, प्रायश्चित्तवत् पूर्वकृतदुरितफल -त्वानुपपत्तिः । यस्मिन् पापकर्मनिमित्ते यद्विहितं प्रायश्चित्तं न तु तस्य पापस्य तत् फलम् । अथ तस्य एव पापस्य निमित्तस्य प्रायश्चित्तदुःखं फलं जीवनादिनिमित्तम् अपि नित्यकर्मानुष्ठा-नायासदुःखं जीवनादिनिमित्तस्य एव तत् फलं प्रसज्येत नित्यप्रायश्चित्तयोः नैमित्तिक-त्वाविशेषात् । किं च अन्यद् नित्यस्य काम्यस्य च अग्निहोत्रादेः अनुष्ठानायासदुःखस्य तुल्यत्वाद् नित्यानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितस्य फलं न तु काम्यानुष्ठानायासदुःखम् इति विशेषो न अस्ति इति तद् अपि पूर्वकृत -दुरितफलं प्रसज्येत । यदि तुम यह मानते हो कि पूर्वकृत सभी पाप-कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं, तो फिर नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका परिश्रमरूप दु: ख ही उनका फल है, यह विशेषण देना अयुक्त ठहरता है । और नित्यकर्मविधायक शास्त्रको भी व्यर्थ माननेका प्रसङ्ग आ जाता है । क्योंकि फल देनेके लिये अङ्कुरित हुए पापोंका तो उपभोगसे ही क्षय जो जायगा ( उनके लिये नित्यकर्मोंकी क्या आवश्यकता है ) । इसके सिवा ( वास्तवमें ) वेद - विहित नित्यकर्मोंसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख यदि कर्मका फल हो तो वह उन ( विहित नित्यकर्मों ) - का ही फल होना चाहिये; क्योंकि वह व्यायाम आदिकी भाँति उनके ही अनुष्ठानसे होता हुआ दिखलायी देता है, अत: यह कल्पना करना कि ' वह किसी अन्य कर्मका फल है ' युक्तियुक्त नहीं है । नित्यकर्मोंका विधान जीवनादिके लिये किया गया है इसलिये भी नित्यकर्मोंको प्रायश्चित्तकी भाँति पूर्वकृत पापोंका फल मानना युक्तियुक्त नहीं है । जिस पापकर्मके लिये जो प्रायश्चित्त विहित है, वह उस पापका फल नहीं है । तथापि यदि ऐसा मानें कि प्रायश्चित्तरूप दुःख ( जिसके लिये प्रायश्चित्त किया जाय ) उस पापरूप निमित्तका ही फल होता है, तो जीवनादिके लिये किये जानेवाले नित्यकर्मोंका परिश्रमरूप दुःख भी जीवन आदि हेतुओंका ही फल सिद्ध होगा; क्योंकि नित्य और प्रायश्चित्त ये दोनों ही किसी - न - किसी निमित्तसे किये जानेवाले हैं, इनमें कोई भेद नहीं है । इसके सिवा दूसरा दोष यह भी है कि नित्यकर्मके परिश्रमकी और काम्य - अग्निहोत्रादि कर्मके परिश्रमकी समानता होनेके कारण, नित्यकर्मका परिश्रम ही पूर्वकृत पापका फल है, काम्य- कर्मानुष्ठानका परिश्रमरूप दु: ख उसका फल नहीं है, ऐसा माननेके लिये कोई विशेष कारण नहीं है, अतः वह काम्यकर्मका परिश्रमरूप दुःख भी पूर्वकृत पापका ही फल माना जायगा ।
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४६६ * श्रीमद्भगवद्गीता * तथा च सति नित्यानां फलाश्रवणात् तद्विधानान्यथानुपपत्तेः च नित्यानुष्ठानायास -दुःखं पूर्वकृतदुरितफलम् इति अर्थापत्तिकल्पना अनुपपन्ना । एवं विधानान्यथानुपपत्तेः अनुष्ठानायास-दुःखव्यतिरिक्तफलत्वानुमानात् च नित्यानाम् । विरोधात् च । विरुद्धं च इदम् उच्यते नित्यकर्मणि अनुष्ठीयमाने अन्यस्य कर्मणः फलं भुज्यते इति अभ्युपगम्यमाने स एव उपभोगो नित्यस्य कर्मणः फलम् इति नित्यस्य कर्मणः फलाभाव इति च विरुद्धम् उच्यते । किं च काम्याग्निहोत्रादौ अनुष्ठीयमाने नित्यम् अपि अग्निहोत्रादि तन्त्रेण एव अनुष्ठितं भवति इति तदायासदुःखेन एव काम्याग्नि-होत्रादिफलम् उपक्षीणं स्यात् तत्तन्त्रत्वात् । अथ काम्याग्निहोत्रादिफलम् अन्यद् एव स्वर्गादि तदनुष्ठानायासदुःखम् अपि भिन्न प्रसज्येत । न च तद् अस्ति दृष्टविरोधात् । न हि काम्यानुष्ठानायासदुःखात् केवलनित्यानुष्ठाना-यासदुःखं विद्यते । किं च अन्यद् अविहितम् अप्रतिषिद्धं च कर्म तत्कालफलं न तु शास्त्रचोदितं प्रतिषिद्धं वा ऐसा होनेसे ‘ नित्यकर्मोंका फल नहीं बतलाया गया है और उनके अनुष्ठानका विधान किया गया है, उस विधानकी अन्य प्रकारसे उपपत्ति न होनेके कारण, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला दुःख, पूर्वकृत पापोंका ही फल है, इस प्रकारकी जो अर्थापत्तिकी कल्पना की गयी थी, उसका खण्डन हो गया । इस तरह प्रकारान्तरसे नित्यकर्मोंके विधानकी अनुपपत्ति होनेसे और नित्यकर्मोंका अनुष्ठानसम्बन्धी परिश्रमरूप दुःखके सिवा दूसरा फल होता है, ऐसा अनुमान होनेसे भी ( यह पक्ष खण्डित हो जाता है ) । इसके सिवा ऐसा माननेमें विरोध होनेके कारण भी ( यह पक्ष कट जाता है ) । नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए दूसरे कर्मोंका फल भोगा जाता है, ऐसा मान लेनेसे यह कहना होता है कि वह उपभोग ही नित्यकर्मका फल है और साथ ही यह भी प्रतिपादन करते जाते हो कि नित्यकर्मका फल नहीं है; अतः यह कथन परस्पर विरुद्ध होता है । इसके अतिरिक्त, ( तुम्हारे मतानुसार ) काम्य-अग्निहोत्रादिका अनुष्ठान करते हुए तन्त्रसे नित्य-अग्रिहोत्रादि भी उन्हींके साथ अनुष्ठित हो जाते हैं । अतः उस परिश्रमरूप दुःखभोगसे ही काम्य-अग्निहोत्रादिका फल भी क्षीण हो जायगा; क्योंकि वह उसके अधीन है । यदि ऐसा मानें कि काम्य - अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि प्राप्तिरूप दूसरा ही फल होता है तो उनके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखको भी नित्यकर्मके परिश्रमसे भिन्न मानना आवश्यक होगा । परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध होनेके कारण यह नहीं हो सकता । क्योंकि काम्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाले परिश्रमरूप दुःखसे, केवल नित्यकर्म - अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखका भेद नहीं है । इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि जो कर्म न विहित हो और न प्रतिषिद्ध हो, वही तत्काल फल देनेवाला होता है, शास्त्रविहित या प्रतिषिद्ध कर्म तत्काल फल देनेवाला नहीं होता । यदि ऐसा
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* शांकरभाष्य तत्कालफलम् । भवेद् यदि तदा स्वर्गादिषु अपि । अदृष्टफलशासने च उद्यमो न स्यात् । अग्निहोत्रादीनाम् एव कर्मस्वरूपाविशेषे अनुष्ठानायासदुःखमात्रेण उपक्षयः । काम्यानां च स्वर्गादिमहाफलत्वम् अङ्गेतिकर्तव्यता-द्याधिक्ये त तु असति फलकामित्वमात्रेण इति न शक्यं कल्पयितुम् । तस्माद् न नित्यानां कर्मणाम् अदृष्टफलाभावः कदाचिद् अपि उपपद्यते । अतः च अविद्या पूर्वकस्य कर्मणो विद्या एव शुभस्य अशुभस्य वा क्षयकारणम् अशेषतो न नित्यकर्मानुष्ठानम् । अविद्याकामबीजं हि सर्वम् एव कर्म । तथा च उपपादितम् । अविद्वद्विषयं कर्म विद्वद्विषया च सर्वकर्मसन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा । ' उभौ तौ न विजानीतः ' ' वेदाविनाशिनं नित्यम् ' ' ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ' ' अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ' ' तत्त्ववित्तु ' ' गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ' ' सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते ' ' नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' अर्थाद् अज्ञः करोमि इति । आरुरुक्षोः कर्म कारणम् आरूढस्य योगस्थस्य शम एव कारणम् । उदाराः त्रयः अपि अज्ञाः, ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम् । अज्ञाः कर्मिणो गतागतं कामकामा लभन्ते । अनन्याः चिन्तयन्तो मां नित्ययुक्ता यथोक्तम् आत्मानम् आकाशकल्पम् अकल्मषम् उपासते । अध्याय १८ * ४६७ होता तो स्वर्ग आदि लोकोंका प्रतिपादन करनेमें और अदृष्ट फलोंके बतलानेमें शास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होती । कर्मत्वमें किसी प्रकारका भेद न होनेपर तथा अंग और इतिकर्तव्यता आदिकी कोई विशेषता न होनेपर भी केवल नित्य - अग्निहोत्रादिका फल तो अनुष्ठान-जनित परिश्रमरूप दुःखके उपभोगसे क्षय हो जाता है और फलेच्छुकतामात्रकी अधिकतासे काम्य-अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि महाफल होता है, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । सुतरां नित्यकर्मोंका अदृष्ट फल नहीं होता यह बात कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अविद्यापूर्वक होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्मोंका, अशेषत: नाश करनेवाला हेतु, विद्या ( ज्ञान ) ही है, नित्यकर्मका अनुष्ठान नहीं । क्योंकि सभी कर्म अविद्या और कामनामूलक हैं । ऐसा ही हमने सिद्ध किया है कि अज्ञानीका विषय कर्म है और ज्ञानीका विषय सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा है । ' उभौ तौ न विजानीतः ' ' वेदाविनाशिनं नित्यम् ' ' ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ' ' अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ' ' तत्त्ववित्तु ' ' गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ' ' सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते ' ' नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' इत्यादि वाक्योंके अर्थसे यही सिद्ध होता है कि अज्ञानी ही ‘ मैं कर्म करता हूँ ' ऐसा मानता है ( ज्ञानी नहीं ) । आरुरुक्षुके लिये कर्म कर्तव्य बतलाये हैं और आरूढके लिये अर्थात् योगस्थ पुरुषके लिये उपशम कर्तव्य बतलाया है । तथा ( ऐसा भी कहा है कि ) ‘ तीनों प्रकारके अज्ञानी भक्त भी उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, ऐसा मैं मानता हूँ । ' कर्म करनेवाले सकाम अज्ञानी लोग आवागमन-को प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त नित्ययुक्त होकर चिन्तन करते हुए आत्मस्वरूप, आकाशके सदृश, मुझ निष्पाप परमात्माकी उपासना किया करते हैं I
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४६८ * श्रीमद्भगवद्गीता * ‘ ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते । ' अर्थाद् न कर्मिणः अज्ञा उपयान्ति । भगवत्कर्मकारिणो ये युक्ततमा अपि कर्मिणः अज्ञाः ते उत्तरोत्तरहीनफलत्यागा-वसानसाधनाः । अनिर्देश्याक्षरोपासकाः तु ' अद्वेष्टा सर्व-भूतानाम् ' इत्यादि आअध्यायपरिसमाप्ति उक्त-साधनाः क्षेत्राध्यायाद्यध्यायत्रयोक्तज्ञान-साधनाः च । अधिष्ठानादिपञ्चहेतुकसर्वकर्मसन्यासिनाम् आत्मैकत्वाकर्तृत्वज्ञानवतां परस्यां ज्ञाननिष्ठायां वर्तमानानां भगवत्तत्त्वविदाम् अनिष्टादिकर्म -फलत्रयं परमहंसपरिव्राजकानाम् एवं लब्धभग-वत्स्वरूपात्मैकत्वशरणानां न भवति । भवति एव अन्येषाम् अज्ञानां कर्मिणाम् असन्यासिनाम इति एष गीताशास्त्रोक्तस्य कर्तव्याकर्तव्यार्थस्य विभागः । अविद्यापूर्वकत्वं सर्वस्य कर्मणः असिद्धम् इति चेत् । न, ब्रह्महत्यादिवत् । यद्यपि शास्त्रावगतं नित्यं कर्म तथापि अविद्यावत एव भवति । यथा प्रतिषेधशास्त्रावगतम् अपि ब्रह्महत्यादि-लक्षणं कर्म अनर्थकारणम् अविद्याकामादिदोष-' उनको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं ' इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म करनेवाले अज्ञानी भगवानको प्राप्त नहीं होते । भगवदर्थ कर्म करनेवाले जो युक्ततम होनेपर भी कर्मी होनेके नाते अज्ञानी हैं, वे चित्तसमाधानसे लेकर कर्मफलत्यागपर्यन्त उत्तरोत्तर हीन बतलाये हुए साधनोंसे युक्त होते हैं तथा जो अनिर्देश्य अक्षरके उपासक हैं वे ' अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् ' आदिसे लेकर, बारहवें अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त बतलाये हुए साधनोंसे सम्पन्न और तेरहवें अध्यायसे लेकर तीन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञान - साधनोंसे भी युक्त होते हैं । अधिष्ठानादि पाँच जिसके कारण हैं, ऐसे समस्त कर्मोंका जो संन्यास करनेवाले हैं, जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्वको जाननेवाले हैं, जो ज्ञानकी परानिष्ठामें स्थित हो गये हैं, जो भगवत्स्वरूप और आत्माके एकत्वज्ञानकी शरण हो चुके हैं, ऐसे भगवान्के तत्त्वको जाननेवाले परमहंस परिव्राजकोंको इष्ट - अनिष्ट और मिश्र - ऐसा त्रिविध कर्मफल नहीं मिलता । इनसे अन्य जो संन्यास न करनेवाले कर्म-परायण अज्ञानी हैं, उनको कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है; यही गीताशास्त्रमें कहे हुए कर्तव्य और अकर्तव्यका विभाग है । पू ० – सभी कर्मोंको अविद्यामूलक मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है । उ ० — नहीं, ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्मोंकी भाँति ( सभी कर्म अविद्यामूलक हैं ) नित्यकर्म यद्यपि शास्त्रप्रतिपादित हैं तो भी वे अविद्यायुक्त पुरुषके ही कर्म हैं । जैसे प्रतिषेध - शास्त्रसे कहे हुए भी अनर्थके कारणरूप ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्म अविद्या और कामनादि दोषोंसे युक्त पुरुषके द्वारा ही हो सकते हैं;
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४६ ९ वतो भवति अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः तथा नित्यनैमित्तिककाम्यानि अपि इति । व्यतिरिक्तात्मनि अज्ञाते प्रवृत्तिः नित्यादि-कर्मसु अनुपपन्ना इति चेत् । न, चलनात्मकस्य कर्मणः अनात्मकर्तृकस्य अहं करोमि इति प्रवृत्तिदर्शनात् । देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो न मिथ्या इति चेत् । न, तत्कार्येषु अपि गौणत्वोपपत्तेः । आत्मीये देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो यथा आत्मीये पुत्रे ‘ आत्मा वै पुत्र नामासि ' ( तै ० सं ० २ । ११ ) इति लोके च अपि मम प्राण एव अयं गौः इति तद्वद् न एव अयं मिथ्याप्रत्ययः, मिथ्याप्रत्ययः तु स्थाणुपुरुषयोः अगृह्यमाणविशेषयोः । न गौणप्रत्ययस्य मुख्यकार्यार्थत्वम् अधि-करणस्तुत्यर्थत्वाद् लुप्तोपमाशब्देन । यथा सिंहो देवदत्तः अग्निः माणवक इति सिंह इव अग्निः इव क्रौर्यपैङ्गल्यादिसामान्य-वत्त्वाद् देवदत्तमाणवकाधिकरणस्तुत्यर्थम् एव, न तु सिंहकार्यम् अग्निकार्यं वा गौणशब्दप्रत्यय-| क्योंकि दूसरी तरह उनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती । उसी प्रकार नित्य - नैमित्तिक और काम्य आदि कर्म भी अविद्या और कामनासे युक्त मनुष्यसे ही हो सकते हैं । पू ० – परंतु आत्माको शरीरसे पृथक् समझे बिना नित्य - नैमित्तिक आदि कर्मोंमें प्रवृत्तिका होना असम्भव है । उ ० - - यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मा जिसका कर्ता नहीं है ऐसे चलनरूप कर्ममें ( अज्ञानियों-की ) ' मैं करता हूँ ' ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है । यदि कहो कि शरीर आदिमें जो अहंभाव है वह गौण है, मिथ्या नहीं है । तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे उनके कार्यमें भी गौणता सिद्ध होगी । पू ० – जैसे ‘ हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है ' इस श्रुतिवाक्यके अनुसार, अपने पुत्रमें ‘ अहंभाव ’ होता है तथा संसारमें भी जैसे ' यह गौ मेरा प्राण ही है ' इस प्रकार प्रिय वस्तुमें ' अहंभाव ' होता देखा जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरादि संघातमें भी अहंभाव गौण ही है । यह प्रतीति मिथ्या नहीं है । मिथ्या प्रतीति तो वह है कि जो स्थाणु और पुरुषके भेदको न जानकर स्थाणुमें पुरुषकी प्रतीति होती है । उ०— ( यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि ) गौण प्रयोग लुप्तोपमा शब्दद्वारा अधिकरणकी स्तुति करनेके लिये होता है, इसलिये गौण प्रतीतिसे मुख्यके कार्यकी सिद्धि नहीं होती । जैसे कोई कहे कि देवदत्त सिंह है या बालक अग्नि है, तो उसका यह कहना, ' देवदत्त सिंहके सदृश क्रूर और बालक अग्निके समान पिङ्गल ( गौर ) वर्ण ', इस प्रकारकी समानताके कारण देवदत्त और बालकरूप अधिष्ठानकी स्तुतिके लिये ही है । क्योंकि गौण शब्द या गौण ज्ञानसे कोई सिंहका कार्य ( किसीको भक्षण कर जाना ) या अग्निका कार्य ( किसीको जला डालना ) सिद्ध
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४७० * श्रीमद्भगवद्गीता * निमित्तं किञ्चित् साध्यते, मिथ्याप्रत्ययकार्यं तु अनर्थम् अनुभवति । गौणप्रत्ययविषयं च जानाति न एष सिंहो देवदत्तः स्याद् न अयम् अग्निः माणवक इति । तथा गौणेन देहादिसङ्घातेन आत्मना कृतं कर्म न मुख्येन अहम्प्रत्ययविषयेण आत्मना कृतं स्यात् । न हि गौणसिंहाग्निभ्यां कृतं कर्म मुख्यसिंहाग्निभ्यां कृतं स्यात् । न च क्रौर्येण पैङ्गल्येन वा मुख्यसिंहाग्न्योः कार्यं किञ्चित् क्रियते स्तुत्यर्थत्वेन उप-क्षीणत्वात् । स्तूयमानौ च जानीतो न अहं सिंहो न अहम् अग्निः इति, न सिंहस्य कर्म मम अग्नेः च इति, तथा न सङ्घातस्य कर्म मम मुख्यस्य आत्मन इति प्रत्ययो युक्ततरः स्याद् न पुनः अहं कर्ता मम कर्म इति । यत् च आहुः आत्मीयैः स्मृतीच्छाप्रयत्नैः कर्महेतुभिः आत्मा करोति इति । न तेषां मिथ्याप्रत्ययपूर्वकत्वात् । मिथ्याप्रत्यय-निमित्तेष्टानिष्टानुभूतक्रियाफलजनितसंस्कार-पूर्वका हि स्मृतीच्छाप्रयत्नादयः । यथा अस्मिन् जन्मनि देहादिसङ्घाताभिमान-रागद्वेषादिकृतौ धर्माधर्मौ तत्फलानुभवः च तथा अतीते अतीततरे अपि जन्मनि इति । नहीं किया जा सकता । परंतु मिथ्या प्रत्ययका कार्य ( जन्म - मरणरूप ) अनर्थ, ( मनुष्य ) अनुभव कर रहा है । इसके सिवा गौण प्रतीतिके विषयको मनुष्य ऐसा जानता भी है कि वास्तवमें यह देवदत्त सिंह नहीं है और यह बालक अग्नि नहीं है । ( यदि उपर्युक्त प्रकारसे शरीरादि संघातमें भी आत्मभाव गौण होता तो ) शरीरादिके संघातरूप गौण आत्माद्वारा किये हुए कर्म, अहंभावके मुख्य विषय आत्माके किये हुए नहीं माने जाते । क्योंकि गौण सिंह ( देवदत्त ) और गौण अग्नि ( बालक ) द्वारा किये हुए कर्म मुख्य सिंह और अग्निके नहीं माने जाते । तथा उस क्रूरता और पिङ्गलताद्वारा कोई मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे केवल स्तुतिके लिये कहे हुए होनेसे हीनशक्ति हैं । जिनकी स्तुति की जाती है वे ( देवदत्त और बालक ) भी यह जानते हैं कि ' मैं सिंह नहीं हूँ ', ‘ मैं अग्नि नहीं हूँ ' तथा ' सिंहका कर्म मेरा नहीं है ', ' अग्निका कर्म मेरा नहीं है । ' इसी प्रकार ( यदि शरीर आदिमें गौण भावना होती तो ) संघातके कर्म मुझ मुख्य आत्माके नहीं हैं ऐसी ही प्रतीति होनी चाहिये थी, ऐसी नहीं कि ‘ मैं कर्ता हूँ ', ' मेरे कर्म हैं ' ( सुतरां यह सिद्ध हुआ कि शरीरमें आत्मभाव गौण नहीं, मिथ्या है ) । जो ऐसा कहते हैं कि अपने स्मृति, इच्छा और प्रयत्न इन कर्महेतुओंके द्वारा आत्मा कर्म किया करता है, उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि ये सब मिथ्या प्रतीतिपूर्वक ही होनेवाले हैं । अर्थात् स्मृति इच्छा और प्रयत्न आदि सब मिथ्या प्रतीतिसे होनेवाले, इष्ट-अनिष्टरूप अनुभूत कर्मफलजनित संस्कारोंको लेकर ही होते हैं । जिस प्रकार इस वर्तमान जन्ममें धर्म, अधर्म और उनके फलोंका अनुभव ( सुख - दुःख ) शरीरादि संघातमें आत्मबुद्धि और राग - द्वेषादिद्वारा किये हुए होते हैं, वैसे ही भूतपूर्व जन्ममें और उससे पहलेके जन्मोंमें भी थे ।