श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 471–480
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४७१ अनादिः अविद्याकृतः संसारः अतीतः अनागतः च अनुमेयः । तत: च सर्वकर्मसन्यासाद् ज्ञाननिष्ठायाम् आत्यन्तिकः संसारोपरम इति सिद्धम् । अविद्यात्मकत्वात् च देहाभिमानस्य तन्निवृत्तौ देहानुपपत्तेः संसारानुपपत्तिः । देहादिसङ्घाते आत्माभिमानः अविद्यात्मकः । न हि लोके गवादिभ्यः अन्यः अहं मत्तः च अन्ये गवादय इति जानन् तेषु अहम् इति प्रत्ययं मन्यते कश्चित् । अजानन् तु स्थाणौ पुरुषविज्ञानवद् अविवेकतो देहादिसङ्घाते कुर्याद् अहम् इति प्रत्ययं न विवेकतो जानन् । यः तु ' आत्मा वै पुत्र नामासि ' ( तै ० सं ० २। ११ ) इति पुत्रे अहम्प्रत्ययः स तु जन्यजनकसम्बन्धनिमित्तो गौणः । गौणेन च आत्मना भोजनादिवत् परमार्थकार्यं न शक्यते कर्तुं गौणसिंहाग्निभ्यां मुख्यसिंहाग्निकार्यवत् । अदृष्टविषयचोदनाप्रामाण्याद् आत्मकर्तव्यं गौणैः देहेन्द्रियात्मभिः क्रियते इति चेत् । न, अविद्याकृतात्मकत्वात् तेषाम् । न गौणा आत्मानो देहेन्द्रियादयः । | इस न्याय से यह अनुमान करना चाहिये कि यह बीता हुआ और आगे होनेवाला ( जन्म - मरणरूप ) संसार अनादि एवं अविद्याकर्तृक ही है । इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञाननिष्ठामें सर्व-कर्मोंके संन्यास से संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि देहाभिमान अविद्यारूप है, अतः उसकी निवृत्ति हो जानेपर शरीरान्तरकी प्राप्ति न होनेके कारण ( जन्म - मरणरूप ) संसारकी प्राप्ति नहीं हो सकती । शरीरादि संघातमें जो आत्माभिमान है वह अविद्यारूप है; क्योंकि संसारमें भी ‘ मैं गौ आदिसे अन्य हूँ और गौ आदि वस्तुएँ मुझसे अन्य हैं ' ऐसा जाननेवाला कोई भी मनुष्य उनमें ऐसी बुद्धि नहीं करता कि ' यह मैं हूँ । ' न जाननेवाला ही स्थाणुमें पुरुषकी भ्रान्तिके समान अविवेकके कारण, शरीरादि संघातमें ' मैं हूँ ' ऐसा आत्मभाव कर सकता है; पर विवेकपूर्वक जाननेवाला नहीं कर सकता । तथा पुत्रमें जो ' हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है ' ऐसी आत्मबुद्धि है, वह जन्य - जनक - सम्बन्धके कारण होनेवाली गौण बुद्धि है, उस गौण आत्मा ( पुत्र ) - से भोजन आदिकी भाँति कोई मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता । जैसे कि गौण सिंह और गौण अग्निरूप देवदत्त और बालकद्वारा, मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता । पू ० ० - – स्वर्गादि अदृष्ट पदार्थोंके लिये कर्मोंका विधान करनेवाली श्रुतिका प्रमाणत्व होनेसे, यह सिद्ध होता है कि शरीर - इन्द्रिय आदि गौण आत्माओंके द्वारा मुख्य आत्माके कार्य किये जाते हैं । उ ० — ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनका आत्मत्व अविद्याकर्तृक है । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय आदि गौण आत्मा नहीं हैं ( किंतु मिथ्या हैं ) । १ - जैसे पुत्रके भोजन करनेसे पिता तृप्त नहीं हो सकता उसी प्रकार गौण आत्मासे मुख्य आत्माका कोई भी कार्य नहीं हो सकता ।
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४७२ * श्रीमद्भगवद्गीता * कथं तर्हि । मिथ्याप्रत्ययेन एव असङ्गस्य आत्मनः सङ्गत्यात्मत्वम् आपाद्यते तद्भावे भावात् तदभावे च अभावात् । अविवेकिनां हि अज्ञानकाले बालानां दृश्यते दीर्घः अहं गौरः अहम् इति देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो न तु विवेकिनाम् अन्यः अहं देहादिसङ्घाताद् इति ज्ञानवतां तत्काले देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो भवति । तस्माद् मिथ्याप्रत्ययाभावे अभावात् तत्कृत एव न गौणः । पृथग्गृह्यमाणविशेषसामान्ययोः हि सिंह-देवदत्तयोः अग्निमाणवकयोः वा गौणः प्रत्ययः शब्दप्रयोगो वा स्याद् न अगृह्यमाणसामान्य -विशेषयोः । यत् तु उक्तं श्रुतिप्रामाण्याद् इति । न, तत् प्रामाण्यस्य अदृष्टविषयत्वात् । प्रत्यक्षादि प्रमाणानुपलब्धे हि विषये अग्निहोत्रादिसाध्य -साधनसम्बन्धे श्रुतेः प्रामाण्यं न प्रत्यक्षादिविषये अदृष्टदर्शनार्थत्वात् प्रामाण्यस्य । तस्माद् न दृष्टमिथ्याज्ञाननिमित्तस्य अहम्प्रत्ययस्य देहादिसङ्घाते गौणत्वं कल्पयितुं शक्यम् । पू ० – तो फिर ( इनमें आत्मभाव ) कैसे होता है? उ ० — मिथ्या प्रतीतिसे ही सङ्गरहित आत्माकी सङ्गति मानकर, इनसे आत्मभाव किया जाता है; क्योंकि उस मिथ्याप्रतीतिके रहते हुए ही उनमें आत्मभावकी सत्ता है, उसके अभावसे आत्मभावना-का भी अभाव हो जाता है । अभिप्राय यह कि मूर्ख अज्ञानियोंका ही अज्ञान -कालमें ' मैं बड़ा हूँ, मैं गौर हूँ ' इस प्रकार शरीर-इन्द्रिय आदिके संघातमें आत्माभिमान देखा जाता है । परंतु ' मैं शरीरादि संघातसे अलग हूँ ' ऐसा समझनेवाले विवेकशीलोंकी, उस समय शरीरादि संघातमें अहंबुद्धि नहीं होती । सुतरां, मिथ्याप्रतीतिके अभावसे देहात्मबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण, यह सिद्ध होता है कि शरीरादिमें आत्मबुद्धि अविद्याकृत ही है, गौण नहीं । जिनकी समानता और विशेषता अलग - अलग समझ ली गयी है, ऐसे सिंह और देवदत्तमें या अग्नि और बालक आदिमें ही गौण प्रतीति या गौण शब्दका प्रयोग हो सकता है; जिनकी समानता और विशेषता नहीं समझी गयी उनमें नहीं । तुमने जो कहा कि श्रुतिको प्रमाणरूप माननेसे यह पक्ष सिद्ध होता है वह भी ठीक नहीं; क्योंकि उसकी प्रमाणता अदृष्टविषयक है । अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध न होनेवाले अग्निहोत्रादिके, साध्य, साधन और सम्बन्धके विषयमें ही श्रुतिकी प्रमाणता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध हो जानेवाले विषयोंमें नहीं । क्योंकि श्रुतिकी प्रमाणता अदृष्ट विषयको दिखलानेके लिये ही है ( अर्थात् अप्रत्यक्ष विषयको बतलाना ही उसका काम है ) । सुतरां देहादि - संघातमें, प्रत्यक्ष ही मिथ्या ज्ञानसे होनेवाली अहंप्रतीतिको, गौण मानना नहीं बन सकता ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४७३ न हि श्रुतिशतम् अपि शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति ब्रुवत् प्रामाण्यम् उपैति । यदि ब्रूयात् शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति अथापि अर्थान्तरं श्रुतेः विवक्षितं कल्प्यं प्रामाण्यान्यथानुपपत्तेः न तु प्रमाणान्तरविरुद्धं स्ववचनविरुद्धं वा । कर्मणो मिथ्याप्रत्ययवत्कर्तृकत्वात् कर्त्तुः अभावे श्रुतेः अप्रामाण्यम् इति चेत् । न, ब्रह्मविद्यायाम् अर्थवत्त्वोपपत्तेः । कर्मविधिश्रुतिवद् ब्रह्मविद्याविधिश्रुतेः । अप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत् । न, बाधकप्रत्ययानुपपत्तेः । यथा ब्रह्मविद्या-विधिश्रुत्या आत्मनि अवगते देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो बाध्यते तथा आत्मनि एव आत्मावगतिः न कदाचित् केनचित् कथञ्चिद् अपि बाधितुं शक्या फलाव्यतिरेकावगतेः यथा अग्निः उष्णः प्रकाशः च इति । न च कर्मविधिश्रुतेः अप्रामाण्यम्, पूर्वपूर्व-प्रवृत्तिनिरोधेन उत्तरोत्तरापूर्वप्रवृत्तिजननस्य प्रत्यगात्माभिमुख्यप्रवृत्त्युत्पादनार्थत्वात् । मिथ्यात्वे अपि उपायस्य उपेयसत्यतया सत्यत्वम् एव स्याद् यथा अर्थवादानां विधिशेषाणाम् । क्योंकि ‘ अग्नि ठण्डा है या अप्रकाशक है ' ऐसा कहनेवाली सैकड़ों श्रुतियाँ भी प्रमाणरूप नहीं मानी जा सकतीं । यदि श्रुति ऐसा कहे कि ' अग्नि ठण्डा है अथवा अप्रकाशक है ' तो ऐसा मान लेना चाहिये कि श्रुतिको कोई और ही अर्थ अभीष्ट है । क्योंकि अन्य प्रकारसे उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती । परंतु प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके विरुद्ध या श्रुतिके अपने वचनोंके विरुद्ध श्रुतिके अर्थकी कल्पना करना उचित नहीं । पू ० – कर्म मिथ्या ज्ञानयुक्त पुरुषद्वारा ही किये जानेवाले हैं, ऐसा माननेसे वास्तवमें कर्ताका अभाव हो जानेके कारण श्रुतिकी अप्रमाणता ( अनर्थकता ) ही सिद्ध होती है ऐसा कहें तो? उ ० – नहीं, क्योंकि ब्रह्मविद्यामें उसकी सार्थकता सिद्ध होती है । पू ० - कर्मविधायक श्रुतिकी भाँति ब्रह्मविद्या-विधायक श्रुतिकी अप्रमाणताका प्रसङ्ग आ जायगा, ऐसा माने तो? उ ० — यह ठीक नहीं, क्योंकि उसका कोई बाधक प्रत्यय नहीं हो सकता । अर्थात् जैसे ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिद्वारा आत्मसाक्षात्कार हो जानेपर, देहादि संघातमें आत्मबुद्धि बाधित हो जाती है, वैसे आत्मामें ही होनेवाला आत्मभावका बोध किसीके द्वारा किसी भी कालमें किसी प्रकार भी बाधित नहीं किया जा सकता । क्योंकि वह आत्मज्ञान स्वयं ही फल है, उससे भिन्न किसी अन्य फलकी प्राप्ति नहीं है, जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है । इसके सिवा ( वास्तवमें ) कर्मविधायक श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है, क्योंकि वह पूर्व - पूर्व ( स्वाभाविक ) प्रवृत्तियोंको रोक - रोककर उत्तरोत्तर नयी-नयी ( शास्त्रीय ) प्रवृत्तिको उत्पन्न करती हुई ( अन्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा साधकको ) अन्तरात्माके सम्मुख करनेवाली प्रवृत्ति उत्पन्न करती है । अतः उपाय मिथ्या होते हुए भी, उपेयकी सत्यतासे, II उसकी सत्यता ही है; जैसे कि विधिवाक्यके अन्तमें कहे जानेवाले अर्थवादवाक्योंकी सत्यता मानी जाती है ।
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४७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * लोके अपि बालोन्मत्तादीनां पय आदौ पाययितव्ये चूडावर्धनादिवचनम् । प्रकारान्तरस्थानां च साक्षाद् एव प्रामाण्य-सिद्धिः प्राग् आत्मज्ञानाद् देहाभिमाननिमित्त-प्रत्यक्षादिप्रामाण्यवत् । यत् तु मन्यसे स्वयम् अव्याप्रियमाणः अपि आत्मा सन्निधिमात्रेण करोति तद् एव च मुख्यं कर्तृत्वम् आत्मनः यथा राजा युध्यमानेषु योधेषु युध्यते इति प्रसिद्धं स्वयम् अयुध्यमानः अपि सन्निधानाद् एव जितः पराजितः च इति च तथा सेनापतिः वाचा एव करोति क्रियाफलसम्बन्धः च राज्ञः सेनापतेः च दृष्टः, यथा च ऋत्विक्कर्म यजमानस्य, तथा देहादीनां कर्म आत्मकृतं स्यात् तत्फलस्य आत्मगामित्वात् । यथा च भ्रामकस्य लोहभ्रामयितृत्त्वाद् अव्यापृतस्य एव मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा च आत्मन इति । तद् असत्, अकुर्वतः कारकत्वप्रसङ्गात् । कारकम् अनेकप्रकारम् इति चेत् । न, राजप्रभृतीनां मुख्यस्य अपि कर्तृत्वस्य दर्शनात् । राजा तावत् स्वव्यापारेण अपि युध्यते योधानां योधयितृत्वेन धनदानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा जयपराजयफलोप-भोगे । लोकव्यवहारमें भी ( देखा जाता है कि ) उन्मत्त और बालक आदिको दूध आदि पिलानेके लिये चोटी बढ़ने आदिकी बात कही जाती है । तथा आत्मज्ञान होनेसे पहले, देहाभिमाननिमित्तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके प्रमाणत्वकी भाँति प्रकारान्तरमें स्थित ( कर्मविधायक ) श्रुतियोंकी साक्षात् प्रमाणता भी सिद्ध होती है । तुम जो यह मानते हो कि आत्मा स्वयं क्रिया न करता हुआ भी संनिधिमात्रसे कर्म करता है, यही आत्माका मुख्य कर्तापन है । जैसे राजा स्वयं युद्ध न करते हुए भी संनिधिमात्रसे ही अन्य योद्धाओंके युद्ध करनेसे ' राजा युद्ध करता है ' ऐसे कहा जाता है तथा ' वह जीत गया, हार गया ' ऐसे भी कहा जाता है । इसी प्रकार सेनापति भी केवल वाणीसे ही आज्ञा करता है । फिर भी राजा और सेनापतिका उस क्रियाके फलसे सम्बन्ध होता देखा जाता है । तथा जैसे ऋत्विक्के कर्म यजमानके माने जाते हैं, वैसे ही देहादि संघातके कर्म आत्मकृत हो सकते हैं, क्योंकि उनका फल आत्माको ही मिलता है । तथा जैसे भ्रामक ( भ्रमण करानेवाला चुम्बक ) स्वयं क्रिया नहीं करता, तो भी वह लोहेका चलाने-वाला है, इसलिये उसीका मुख्य कर्तापन है, वैसे ही आत्माका मुख्य कर्तापन है । ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे न करनेवालेको कारक माननेका प्रसङ्ग आ जायगा । यदि कहो कि कारक तो अनेक प्रकारके होते हैं, तो भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं; क्योंकि राजा आदिका मुख्य कर्तापन भी देखा जाता है । अर्थात् राजा अपने निजी व्यापारद्वारा भी युद्ध करता है । तथा योद्धाओंसे युद्ध कराने और उन्हें धन देनेसे भी नि: सन्देह उसका मुख्य कर्तापन है, उसी प्रकार जय - पराजय आदि फलभोगोंमें भी उसकी मुख्यता है ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४७५ तथा यजमानस्य अपि प्रधानत्यागेन दक्षिणादानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वम् । तस्माद् अव्यापृतस्य कर्तृत्वोपचारो यः स गौण इति अवगम्यते । यदि मुख्यं कर्तृत्वं स्वव्यापारलक्षणं न उपलभ्यते राजयजमानप्रभृतीनां तदा सन्निधिमात्रेण अपि कर्तृत्वं मुख्यं परिकल्प्येत यथा भ्रामकस्य लोहभ्रामणेन न तथा राजयजमानादीनां स्वव्यापारो न उपलभ्यते । तस्मात् सन्निधि-मात्रेण अपि कर्तृत्वं गौणम् एव । तथा च सति तत्फलसम्बन्धः अपि गौण एव स्यात् । न गौणेन मुख्यं कार्यं निर्वर्त्यते । तस्माद् असद् एव एतद् गीयते देहादीनां व्यापारेण अव्यापृत आत्मा कर्ता भोक्ता च स्याद् इति । भ्रान्तिनिमित्तं तु सर्वम् उपपद्यते । यथा स्वप्ने मायायां च एवम् । न च देहाद्यात्मा-प्रत्ययभ्रान्तिसन्तानविच्छेदेषु सुषुप्तिसमाध्यादिषु कर्तृत्वभोक्तृत्वादिः अनर्थ उपलभ्यते । तस्माद् भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्त एव अयं संसारभ्रमो न तु परमार्थ इति सम्यग्दर्शनाद् अत्यन्तम् एव उपरम इति सिद्धम् ॥ ६६ ॥
वैसे ही यजमानका भी प्रधान आहुति स्वयं देनेके कारण और दक्षिणा देनेके कारण निःसन्देह मुख्य कर्तृत्व है । इससे यह निश्चित होता है कि क्रियारहित वस्तुमें जो कर्तापनका उपचार है वह गौण है । यदि राजा और यजमान आदिमें स्वव्यापाररूप मुख्य कर्तापन न पाया जाता तो उनका संनिधिमात्रसे भी मुख्य कर्तापन माना जा सकता था, जैसे कि लोहेको चलानेमें चुम्बकका संनिधिमात्रसे मुख्य कर्तापन माना जाता है, परंतु चुम्बककी भाँति राजा और यजमानका स्वव्यापार उपलब्ध न होता हो— ऐसी बात नहीं है । सुतरां संनिधिमात्रसे जो कर्तापन है वह भी गौण ही है । ऐसा होनेसे उसके फलका सम्बन्ध भी गौण ही होगा, क्योंकि गौण कर्ताद्वारा मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता । अतः यह मिथ्या ही कहा जाता है कि ' निष्क्रिय आत्मा देहादिकी क्रियासे कर्ता - भोक्ता हो जाता है । ' परंतु भ्रान्तिके कारण सब कुछ हो सकता है । जैसे कि स्वप्न और मायामें होता है । परंतु शरीरादिमें आत्मबुद्धिरूप अज्ञान - सन्ततिका विच्छेद हो जानेपर, सुषुप्ति और समाधि आदि अवस्थाओंमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थ उपलब्ध नहीं होता । इससे यह सिद्ध हुआ कि यह संसारभ्रम मिथ्या ज्ञान - निमित्तक ही है, वास्तविक नहीं, अतः पूर्ण तत्त्वज्ञानसे उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है ॥ ६६ ॥
सर्वं गीताशास्त्रार्थम् उपसंहृत्य अस्मिन् इस अठारहवें अध्यायमें समस्त गीताशास्त्रके अध्याये विशेषतः च अन्ते इह शास्त्रार्थ - अर्थका उपसंहार करके फिर विशेषरूपसे इस अन्तिम
श्लोकमें शास्त्रके अभिप्रायको दृढ़ करनेके लिये
दार्ख्याय सङ्क्षेपत उपसंहारं कृत्वा अथ इदानीं संक्षेपसे उपसंहार करके, अब शास्त्र - सम्प्रदायकी शास्त्रसम्प्रदायविधिम् आह- विधि बतलाते हैं ।
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४७६ * श्रीमद्भगवद्गीता *
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
इदं शास्त्रं ते तव हिताय मया उक्तं संसारविच्छित्तये अतपस्काय तपोरहिताय न वाच्यम् इति व्यवहितेन सम्बध्यते । तपस्विने अपि अभक्ताय गुरुदेवभक्ति-रहिताय कदाचन कस्याञ्चिद् अपि अवस्थायां न वाच्यम् । भक्तः तपस्वी अपि सन् अशुश्रूषुः यो भवति तस्मै अपि न वाच्यम् । न च यो मां वासुदेवं प्राकृतं मनुष्यं मत्वा अभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोषाध्यारोपणेन मम ईश्वरत्वम् अजानन् न सहते असौ अपि अयोग्यः तस्मै अपि न वाच्यम् । भगवति भक्ताय तपस्विने शुश्रूषवे अनसूयवे च वाच्यं शास्त्रम् इति सामर्थ्याद् गम्यते । तत्र मेधाविने तपस्विने वा इति अनयोः विकल्पदर्शनात् शुश्रूषाभक्तियुक्ताय तपस्विने तद्युक्ताय मेधाविने वा वाच्यम् । शुश्रूषाभक्ति-वियुक्ताय न तपस्विने न अपि मेधाविने वाच्यम् । भगवति असूयायुक्ताय समस्तगुणवते अपि न वाच्यम् । गुरुशुश्रूषाभक्तिमते च वाच्यम् इति एष शास्त्रसम्प्रदायविधिः ॥ ६७ ॥
तेरे हितके लिये अर्थात् संसारका उच्छेद करनेके लिये, कहा हुआ यह शास्त्र, तपरहित मनुष्यको नहीं सुनाना चाहिये । इस प्रकार ' वाच्यम् ' इस व्यवधानयुक्त पदसे ‘ न ' का सम्बन्ध है । तपस्वी होनेपर भी जो अभक्त हो अर्थात् गुरु या देवतामें भक्ति रखनेवाला न हो उसे कभी - किसी अवस्थामें भी नहीं सुनाना चाहिये । भक्त और तपस्वी होकर भी जो शुश्रूषु ( सुननेका इच्छुक ) न हो उसे भी नहीं सुनाना चाहिये । तथा जो मुझ वासुदेवको प्राकृत मनुष्य मान-कर, मुझमें दोष - दृष्टि करता हो, मुझे ईश्वर न जाननेसे, मुझमें आत्मप्रशंसादि दोषोंका अध्यारोप करके, मेरे ईश्वरत्वको सहन न कर सकता हो वह भी अयोग्य है, " उसे भी ( यह शास्त्र ) नहीं सुनाना चाहिये । अर्थापत्तिसे यह निश्चय होता है कि यह शास्त्र भगवान् में भक्ति रखनेवाले, तपस्वी, शुश्रूषायुक्त और दोष- दृष्टिरहित पुरुषको ही सुनाना चाहिये । अन्य स्मृतियोंमें मेधावीको या तपस्वीको, इस प्रकार इन दोनोंका विकल्प देखा जाता है, इसलिये यह समझना चाहिये कि शुश्रूषा और भक्तियुक्त तपस्वीको अथवा इन तीनों गुणोंसे युक्त मेधावीको यह शास्त्र सुनाना चाहिये । शुश्रूषा और भक्तिसे रहित तपस्वी या मेधावी किसीको भी नहीं सुनाना चाहिये । भगवान्में दोष - दृष्टि रखनेवाला तो यदि सर्वगुण-सम्पन्न हो, तो भी उसे नहीं सुनाना चाहिये । गुरु-शुश्रूषा और भक्ति - युक्त पुरुषको ही सुनाना चाहिये । इस प्रकार यह शास्त्र - सम्प्रदायकी विधि है ॥६७ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४७७ सम्प्रदायस्य कर्तुः फलम् इदानीम् आह— अब इस शास्त्र - परम्पराको चलानेवालोंके लिये फल बतलाते हैं— य इमं परमं
परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८ ॥
य इमं यथोक्तं परमं निःश्रेयसार्थं केशवार्जुनयोः संवादरूपं ग्रन्थं गुह्यं गोप्यं मद्भक्तेषु मयि भक्तिमत्सु अभिधास्यति वक्ष्यति ग्रन्थतः अर्थतः च स्थापयिष्यति इत्यर्थः । यथा त्वयि मया । भक्तेः पुनः ग्रहणात् तद्भक्तिमात्रेण केवलेन शास्त्रसम्प्रदाने पात्रं भवति इति गम्यते । कथम् अभिधास्यति इति उच्यते-भक्तिं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः शुश्रूषा मया क्रियते इति एवं कृत्वा इत्यर्थः । तस्य इदं फलं माम् एव एष्यति मुच्यते एव अत्र संशयो न कर्तव्यः ॥ ६८ ॥
जो मनुष्य, परम कल्याण जिसका फल है ऐसे इस उपर्युक्त कृष्णार्जुन - संवादरूप अत्यन्त गोप्य गीताग्रन्थको मुझमें भक्ति रखनेवाले भक्तोंमें सुनावेगा— ग्रन्थरूपसे या अर्थरूपसे स्थापित करेगा, अर्थात् जैसे मैंने तुझे सुनाया है वैसे ही सुनावेगा— यहाँ भक्तिका पुनः ग्रहण होनेसे यह पाया जाता है कि मनुष्य केवल भगवान्की भक्तिसे ही शास्त्र प्रदानका पात्र हो जाता है । कैसे सुनावेगा सो बतलाते हैं । मुझमें पराभक्ति करके, अर्थात् परमगुरु भगवान्की मैं यह सेवा करता हूँ ऐसा समझकर, ( जो इसे सुनावेगा ) उसका यह फल है कि वह मुझे ही प्राप्त हो जायगा अर्थात् निःसंदेह मुक्त हो जायगा — इसमें संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६८ ॥
किं च- तथा—
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६ ९ ॥
न च तस्मात् शास्त्रसम्प्रदायकृतो मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये कश्चिद् मे मम प्रियकृत्तमः अतिशयेन प्रियकृत् ततः अन्यः प्रियकृत्तमो न अस्ति एव इत्यर्थो वर्तमानेषु । न च भविता भविष्यति अपि काले तस्माद् द्वितीयः अन्यः प्रियतरो भुवि लोके अस्मिन् ॥ ६ ९ ॥ उस गीताशास्त्रकी परम्परा चलानेवाले भक्तसे बढ़कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करनेवाला, मनुष्योंमें, कोई भी नहीं है । अर्थात् वह मेरा अतिशय प्रिय करनेवाला है, वर्तमान मनुष्योंमें उससे बढ़कर प्रियतम कार्य करनेवाला और कोई नहीं है, तथा भविष्यमें भी इस भूलोकमें उससे बढ़कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा ॥ ६ ९ ॥
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४७८ * श्रीमद्भगवद्गीता *
यः अपि— जो भी कोई-अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥७० ॥
अध्येष्यते च पठिष्यति य इमं धर्म्यं धर्माद अनपेतं संवादरूपं ग्रन्थम् आवयोः तेन इदं कृतं स्यात् । ज्ञानयज्ञेन विधिजपोपांशुमानसानां यज्ञानां ज्ञानयज्ञो मानसत्वाद् विशिष्टतम इति अतः तेन ज्ञानयज्ञेन गीताशास्त्रस्य अध्ययनं स्तूयते । फलविधिः एव वा देवतादिविषयज्ञान-यज्ञफलतुल्यम् अस्य फलं भवति इति । तेन अध्ययनेन अहम् इष्टः पूजितः स्यां भवेयम् इति मे मम मतिः निश्चयः ॥ ७० ॥
। जो मनुष्य, हम दोनोंके संवादरूप इस धर्मयुक्त गीताग्रन्थको पढ़ेगा, उसके द्वारा यह होगा कि मैं ज्ञानयज्ञसे ( पूजित होऊँगा ), विधियज्ञ, जपयज्ञ, उपांशुयज्ञ और मानसयज्ञ – इन चार यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ मानस है इसलिये श्रेष्ठतम है । अतः उस ज्ञानयज्ञकी समानतासे गीताशास्त्रके अध्ययनकी स्तुति करते हैं । अथवा यों समझो कि यह फलविधि है, यानी इसका फल देवतादिविषयक ज्ञानयज्ञके समान होता है । उस अध्ययनसे मैं ( ज्ञानयज्ञद्वारा ) पूजित होता हूँ, ऐसा मेरा निश्चय है ॥ ७० ॥
अथ श्रोतुः इदं फलम्— तथा श्रोताको यह ( आगे बतलाया जानेवाला )
फल मिलता है-श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
श्रद्धावान् श्रद्दधानः अनसूयः च असूयावर्जितः जो मनुष्य, इस ग्रन्थको श्रद्धायुक्त और दोष-सन् इमं ग्रन्थं शृणुयादपि यो नरः अपि शब्दात दृष्टिरहित होकर केवल सुनता ही है, वह भी पापोंसे किमुत अर्थज्ञानवान् मुक्त होकर, पुण्यकारियोंके अर्थात् अग्निहोत्रादि सः अपि पापाद् मुक्तः श्रेष्ठकर्म करनेवालोंके, शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता शुभान् प्रशस्तान् लोकान् प्राप्नुयात् है । ‘ अपि ' शब्दसे यह पाया जाता है कि अर्थ पुण्यकर्मणाम् अग्निहोत्रादिकर्मवताम् ॥ ७१ ॥ समझनेवालेकी तो बात ही क्या है? ॥ ७१ ॥
शिष्यस्य शास्त्रार्थग्रहणाग्रहणविवेकबुभुत्सया शिष्यने शास्त्रका अभिप्राय ग्रहण किया या नहीं; यह विवेचन करनेके लिये भगवान् पूछते हैं । इसमें पृच्छति । तदग्रहणे ज्ञाते पुनः ग्राहयिष्यामि पूछनेवालेका यह अभिप्राय है कि शास्त्रका अभिप्राय श्रोताने ग्रहण नहीं किया है - यह मालूम होनेपर, उपायान्तरेण अपि इति प्रष्टुः अभिप्रायः । फिर किसी और उपायसे ग्रहण कराऊँगा ।
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* शांकरभाष्य अध्याय १८ * ४७ ९ यत्नान्तरम् आस्थाय शिष्यः कृतार्थः कर्तव्य इसके द्वारा आचार्यका यह कर्तव्य प्रदर्शित किया जाता है कि दूसरे उपायको स्वीकार करके किसी भी इति आचार्यधर्मः प्रदर्शितो भवति- प्रकारसे शिष्यको कृतार्थ करना चाहिये-कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
कच्चित् किम् एतद् मया उक्तं श्रुतं श्रवणेन अवधारितं पार्थ किं त्वया एकाग्रेण चेतसा चित्तेन किं वा प्रमादितम् । कच्चिद् अज्ञानसम्मोहः अज्ञाननिमित्तः सम्मोहो विचित्तभावः अविवेकता स्वाभाविकः किं प्रनष्टः । यदर्थः अयं शास्त्रश्रवणायासः तव मम च उपदेष्टृत्वायासः प्रवृत्तः ते तव धनञ्जय ॥ ७२ ॥
अर्जुन उवाच— नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा | हे पार्थ! क्या तूने मुझसे कहे हुए इस शास्त्रको एकाग्रचित्तसे सुना, सुनकर बुद्धिमें स्थिर किया? अथवा सुना - अनसुना कर दिया? हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह– स्वाभाविक अविवेकता - चित्तका मूढभाव सर्वथा नष्ट हो गया, जिसके लिये कि तेरा यह शास्त्रश्रवण-विषयक परिश्रम और मेरा वक्तृत्वविषयक परिश्रम हुआ है ॥ ७२ ॥
| अर्जुन बोला—
त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
नष्टो मोहः अज्ञानजः समस्तसंसारानर्थहेतुः सागर इव दुस्तरः । स्मृति: च आत्मतत्त्वविषया लब्धा । यस्या लाभात् सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः । त्वत्प्रसादात् तव प्रसादाद् मया त्वत्प्रसादम् आश्रितेन अच्युत । अनेन मोहनाशप्रश्नप्रतिवचनेन सर्व-शास्त्रार्थज्ञानफलम् एतावद् एव इति निश्चितं दर्शितं भवति यद् उत अज्ञानासम्मोहनाश आत्मस्मृतिलाभः च इति । तथा च श्रुतौ ' अनात्मवित् शोचामि, ' ( छा ० उ ० ७। १ । ३ ) इति उपन्यस्य आत्मज्ञाने सर्वग्रन्थिविप्रमोक्ष उक्तः । हे अच्युत! मेरा अज्ञानजन्य मोह, जो कि समस्त संसाररूप अनर्थका कारण था और समुद्रकी भाँति दुस्तर था, नष्ट हो गया है । और हे अच्युत! आपकी कृपाके आश्रित होकर मैंने आपकी कृपासे आत्मविषयक ऐसी स्मृति भी प्राप्त कर ली है कि जिसके प्राप्त होनेसे समस्त ग्रन्थियाँ – संशय विच्छिन्न हो जाते हैं । इस मोहनाशविषयक प्रश्नोत्तरसे यह बात निश्चितरूपसे दिखलायी गयी है कि जो यह अज्ञानजनित मोहका नाश और आत्मविषयक स्मृतिका लाभ है, बस, इतना ही समस्त शास्त्रोंके अर्थज्ञानका फल है । इसी तरह ( छान्दोग्य ) श्रुतिमें भी ' मैं आत्माको न जाननेवाला शोक करता हूँ ' इस प्रकार प्रकरण उठाकर आत्मज्ञान होनेपर समस्त ग्रन्थियोंका विच्छेद बतलाया है ।
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४८० * श्रीमद्भगवद्गीता * ' भिद्यते हृदयग्रन्थिः ' ( मु ० उ ० २ । २ । ८ ) ' तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ' ( ई ० उ ० ७ ) इति च मन्त्रवर्णः । अथ इदानीं त्वच्छासने स्थितः अस्मि गतसन्देहो मुक्तसंशयः करिष्ये वचनं तव अहं त्वत्प्रसादात् कृतार्थो न मम कर्तव्यम् अस्ति इति अभिप्राय: ॥ ७३ ॥
तथा ' हृदयकी ग्रन्थि विच्छिन्न हो जाती है ' ' वहाँ एकताका अनुभव करनेवालेको कैसा मोह और कैसा शोक? ' इत्यादि मन्त्रवर्ण भी हैं । अब मैं संशयरहित हुआ आपकी आज्ञाके अधीन खड़ा हूँ । मैं आपका कहना करूँगा । अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ ( अब ) मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है ॥ ७३ ॥
परिसमाप्तः शास्त्रार्थः अथ इदानीं शास्त्रका अभिप्राय समाप्त हो चुका । अब कथाका कथासम्बन्धप्रदर्शनार्थं सञ्जय उवाच - सम्बन्ध दिखलानेके लिये संजय बोला -इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिमम श्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
इति एवम् अहं वासुदेवस्य पार्थस्य च इस प्रकार मैंने यह उपर्युक्त अद्भुत - अत्यन्त महात्मनः संवादम् इमं यथोक्तम् अश्रौषं विस्मयकारक रोमाञ्च करनेवाला श्रीवासुदेवभगवान् श्रुतवान् अस्मि अद्भुतम् अत्यन्तविस्मयकरं रोमहर्षणं रोमाञ्चकरम् ॥ ७४ ॥ और महात्मा अर्जुनका संवाद सुना ॥ ७४ ॥
तं च इमम्— और इसे -व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
व्यासप्रसादात् ततो श्रुतवान् एतं संवादं गुह्यम् योगार्थत्वात् संवादम् इमं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् न परम्परातः ॥ ७५ ॥
दिव्यचक्षुर्लाभात् अहं परं योगं योगम् एव वा कथयतः स्वयं मैंने ( भगवान् ) व्यासजीकी कृपासे उनसे दिव्यचक्षु पाकर इस परम गुह्य संवादको और परम योगको ( सुना ) अथवा ( यों समझो कि ) योगविषयक होनेसे यह संवाद ही योग है, अतः इस संवादरूप योगको मैंने योगेश्वर भगव श्रीकृष्णसे, साक्षात् स्वयं कहते हुए सुना है, परम्परासे नहीं ॥ ७५ ॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं पुण्यं हृष्यामि हृष्यामि च च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥