श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 71–80

श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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* शांकरभाष्य अध्याय २ * ७१ अयुक्तस्य कस्माद् बुद्धिः न अस्ति इति उच्यते-इन्द्रियाणां हि चरतां तदस्य हरति प्रज्ञां इन्द्रियाणां हि यस्मात् चरतां स्वस्वविषयेषु प्रवर्तमानानां यद् मनः अनुविधीयते अनुप्रवर्तते तद् इन्द्रियविषयविकल्पने प्रवृत्तं मनः अस्य यतेः हरति प्रज्ञाम् आत्मानात्मविवेकजां नाशयति । कथम्, वायुः नावम् इव अम्भसि उदके जिगमिषतां मार्गाद् उद्धृत्य उन्मार्गे यथा वायुः नावं प्रवर्तयति एवम् आत्मविषयां प्रज्ञां हृत्वा मनो विषयविषयां करोति ॥ ६७ ॥

अयुक्त पुरुषमें बुद्धि क्यों नहीं होती? इसपर

कहते हैं-यन्मनोऽनुविधीयते ।

वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥

क्योंकि अपने - अपने विषयमें विचरनेवाली अर्थात् विषयोंमें प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंमेंसे जिसके पीछे - पीछे यह मन जाता है — विषयोंमें प्रवृत्त होता है वह उस इन्द्रियके विषयको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें लगा हुआ मन इस साधककी आत्म - अनात्मसम्बन्धी विवेक - ज्ञानसे उत्पन्न हुई बुद्धिको हर लेता है अर्थात् नष्ट कर देता है । कैसे? जैसे जलमें नौकाको वायु हर लेता है वैसे ही, अर्थात् जैसे जलमें चलनेकी इच्छावाले पुरुषोंकी नौकाको वायु गन्तव्य मार्गसे हटाकर उलटे मार्गपर ले जाता है वैसे ही यह मन आत्मविषयक बुद्धिको विचलित करके विषयविषयक बना देता है ॥ ६७ ॥

' यततो ह्यपि ' इति उपन्यस्तस्य अर्थस्य ' यततो ह्यपि ' इस श्लोकसे प्रतिपादित अर्थकी अनेकधा उपपत्तिम् उक्त्वा तं च अर्थम् उपपाद्य अनेक प्रकारसे उपपत्ति बतलाकर उस अभिप्रायको उपसंहरति- सिद्ध करके अब उसका उपसंहार करते हैं— तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य इन्द्रियाणां प्रवृत्तौ दोष उपपादितो यस्मात् — तस्माद् यस्य यतेः हे महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः सर्वप्रकारैः मानसादिभेदैः इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः शब्दादिभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥

यः अयं लौकिको वैदिकः च व्यवहारः स उत्पन्नविवेकज्ञानस्य स्थितप्रज्ञस्य अविद्याकार्य-त्वाद् अविद्यानिवृत्तौ निवर्तते । अविद्यायाः च विद्याविरोधाद् निवृत्तिः इति एतम् अर्थं स्फुटीकुर्वन् आह— प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥

क्योंकि इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें दोष सिद्ध किया जा चुका है, इसलिये हे महाबाहो! जिस साधककी इन्द्रियाँ अपने - अपने शब्दादि विषयोंसे सब प्रकारसे अर्थात् | मानसिक आदि भेदोंसे निगृहीत की जा चुकी हैं ( वशमें की हुई हैं ) उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ॥ ६८ ॥

यह जो लौकिक और वैदिक व्यवहार है वह सब-का - सब अविद्याका कार्य है, अतः जिसको विवेक-ज्ञान प्राप्त हो गया है, ऐसे स्थितप्रज्ञके लिये अविद्याकी निवृत्तिके साथ - ही - साथ ( यह व्यवहार भी ) निवृत्त हो जाता है और अविद्याका विद्याके साथ विरोध होनेके कारण उसकी भी निवृत्ति हो जाती है । इस अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए कहते हैं- -

पृष्ठ 72

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७२ * श्रीमद्भगवद्गीता * या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा या निशा रात्रिः सर्वपदार्थानाम् अविवेककरी तमःस्वभावत्वात् सर्वेषां भूतानां सर्वभूतानाम् । किं तत्, परमार्थतत्त्वं स्थितप्रज्ञस्य विषयः । यथा नक्तञ्चराणाम् अहः एव सद् अन्येषां निशा भवति तद्वद् नक्तञ्चरस्थानीयानाम् अज्ञानां सर्वभूतानां निशा इव निशा परमार्थतत्त्वम् अगोचरत्वाद् अतद्बुद्धीनाम् । तस्यां परमार्थतत्त्वलक्षणायाम् अज्ञान-निद्रायाः प्रबुद्धो जागर्ति संयमी संयमवान् जितेन्द्रियो योगी इत्यर्थः । यस्यां ग्राह्यग्राहकभेदलक्षणायाम् अविद्या-निशायां प्रसुप्तानि एव भूतानि जाग्रति इति उच्यते यस्यां निशायां प्रसुप्ता इव स्वप्नदृशः सा निशा अविद्यारूपत्वात् परमार्थतत्त्वं पश्यतो मुनेः । अतः कर्माणि अविद्यावस्थायाम् एव चोद्यन्ते न विद्यावस्थायाम् । विद्यायां हि सत्याम् उदिते सवितरि शार्वरम् इव तमः प्रणाशम् उपगच्छति अविद्या । प्राग् विद्योत्पत्तेः अविद्या प्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणा क्रियाकारकफलभेदरूपा सती सर्वकर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते । न अप्रमाणबुद्ध्या

गृह्यमाणायाः कर्महेतुत्वोपपत्तिः ।

निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६ ९ ॥

तामस स्वभावके कारण सब पदार्थोंका अविवेक करानेवाली रात्रिका नाम निशा है । सब भूतोंकी जो निशा अर्थात् रात्रि है-वह ( निशा ) क्या है? ( उ ० ) परमार्थतत्त्व, जो कि स्थितप्रज्ञका विषय है ( ज्ञेय है ) । जैसे उल्लू आदि रजनीचरोंके लिये दूसरोंका दिन भी रात होती है वैसे ही निशाचरस्थानीय जो सम्पूर्ण अज्ञानी मनुष्य हैं, जिनमें परमार्थतत्त्व - विषयक बुद्धि नहीं है, उन सब भूतोंके लिये अज्ञात होनेके कारण यह परमार्थतत्त्व रात्रिकी भाँति रात्रि है । उस परमार्थतत्त्वरूप रात्रिमें अज्ञाननिद्रासे जगा हुआ संयमी अर्थात् जितेन्द्रिय - योगी जागता है । ग्राह्य - ग्राहकभेदरूप जिस अविद्यारात्रिमें सोते हुए भी सब प्राणी जागते हैं ऐसे कहा जाता है अर्थात् जिस रात्रिमें सब प्राणी सोते हुए स्वप्न देखनेवालोंके सदृश जागते हैं । वह ( सारा दृश्य ) अविद्यारूप होनेके कारण परमार्थतत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये रात्रि है । सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) अविद्या - अवस्थामें ही ( मनुष्यके लिये ) कर्मोंका विधान किया जाता है, विद्यावस्थामें नहीं; क्योंकि जैसे सूर्यके उदय होनेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञान उदय होनेपर अज्ञान नष्ट हो जाता है । ज्ञानोत्पत्तिसे पहले - पहले प्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई अविद्या ही क्रिया, कारक और फल आदिके भेदोंमें परिणत होकर सब कर्म करवानेका हेतु बन सकती है, अप्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई ( अविद्या ) कर्म करवानेका कारण नहीं बन सकती ।

पृष्ठ 73

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* शांकरभाष्य अध्याय २ * ७३ प्रमाणभूतेन वेदेन मम चोदितं कर्तव्यं कर्म इति हि कर्मणि कर्ता प्रवर्तते न अविद्यामात्रम् इदं सर्वं निशा इव इति । यस्य पुनः निशा इव अविद्यामात्रम् इदं सर्वं भेदजातम् इति ज्ञानं तस्य आत्मज्ञस्य सर्वकर्मसन्यासे एव अधिकारो न प्रवृत्तौ । तथा च दर्शयिष्यति – ' तबुद्धयस्तदात्मानः ' इत्यादिना ज्ञाननिष्ठायाम् एव तस्य अधिकारम् । तत्र अपि प्रवर्तकप्रमाणाभावे प्रवृत्त्यनुपपत्तिः इति चेत् । न, स्वात्मविषयत्वाद् आत्मज्ञानस्य । न हि आत्मनः स्वात्मनि प्रवर्तकप्रमाणापेक्षता आत्मत्वाद् एव तदन्तत्वात् च सर्वप्रमाणानां प्रमाणत्वस्य । न हि आत्मस्वरूपाधिगमे सति पुनः प्रमाणप्रमेयव्यवहारः सम्भवति । प्रमातृत्वं हि आत्मनो निवर्तयति अन्त्यं प्रमाणम् । निवर्तयद् एव च अप्रमाणीभवति स्वप्नकालप्रमाणम् इव प्रबोधे । लोके च वस्त्वधिगमे प्रवृत्तिहेतुत्वादर्शनात् प्रमाणस्य । तस्माद् न आत्मविदः कर्मणि अधिकार इति सिद्धम् ॥ ६ ९ ॥ क्योंकि प्रमाणस्वरूप वेदने मेरे लिये अमुक कर्तव्य - कर्मोंका विधान किया है, ऐसा मानकर ही कर्ता कर्ममें प्रवृत्त होता है, यह सब रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र है, इस तरह समझकर नहीं होता । जिसको ऐसा ज्ञान प्राप्त हो गया है कि यह सारा दृश्य रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र ही है, उस आत्मज्ञानीका तो सर्व कर्मोंके संन्यासमें ही अधिकार है, प्रवृत्तिमें नहीं । इस प्रकार ' तद्बुद्धयस्तदात्मानः ' इत्यादि श्लोकोंसे उस ज्ञानीका अधिकार ज्ञाननिष्ठामें ही दिखलायेंगे । पू ० – उस ज्ञाननिष्ठामें भी ( तत्त्ववेत्ताको ) प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणका ( विधिवाक्यका ) अभाव है, इसलिये उसमें भी उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती । उ ० — यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मज्ञान अपने स्वरूपको विषय करनेवाला है, अतः अपने स्वरूपज्ञानके विषयमें प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती । वह आत्मज्ञान स्वयं आत्मा होने कारण स्वतःसिद्ध है और उसीमें सब प्रमाणोंके प्रमाणत्वका अन्त है अर्थात् आत्मज्ञान होनेतक ही प्रमाणोंका प्रमाणत्व है, अतः आत्मस्वरूपका साक्षात् होनेके बाद प्रमाण और प्रमेयका व्यवहार नहीं बन सकता । ( आत्मज्ञानरूप ) अन्तिम प्रमाण, आत्माके प्रमातापनको भी निवृत्त कर देता है । उसको निवृत्त करता हुआ वह स्वयं भी जागनेके बाद स्वप्नकालके प्रमाणकी भाँति अप्रमाणी हो जाता है अर्थात् लुप्त हो जाता क्योंकि व्यवहारमें भी वस्तु प्राप्त होनेके बाद कोई प्रमाण ( उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये ) प्रवृत्तिका हेतु होता नहीं देखा जाता । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि आत्मज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 74

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७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * विदुषः त्यक्तैषणस्य स्थितप्रज्ञस्य यतेः एव जिसने तीनों एषणाओंका त्याग कर दिया है, ऐसे स्थितप्रज्ञ विद्वान् संन्यासीको ही मोक्ष मिलता है, मोक्षप्राप्तिः न तु असन्यासिनः कामकामिन भोगोंकी कामना करनेवाले असंन्यासीको नहीं । इस अभिप्रायको दृष्टान्तद्वारा प्रतिपादन करनेकी इच्छा इति एतम् अर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपादयिष्यन् आह— | करते हुए भगवान् कहते हैं—

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

आपूर्यमाणम् अद्भिः अचलप्रतिष्ठम् अचलतया प्रतिष्ठा अवस्थितिः यस्य तम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः सर्वतोगताः प्रविशन्ति स्वात्मस्थम् अविक्रियम् एव सन्तं यद्वत्, तद्वत् कामा विषयसन्निधौ अपि सर्वत इच्छाविशेषा यं पुरुषं समुद्रम् इव आपः अविकुर्वन्तः प्रविशन्ति सर्वे आत्मनि एव प्रलीयन्ते न स्वात्मवशं कुर्वन्ति । स शान्तिं मोक्षम् आप्नोति न इतरः कामकामी काम्यन्ते इति कामा विषयाः तान् कामयितुं शीलं यस्य स कामकामी न एव प्राप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥

जिस प्रकार, जलसे परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठावाले समुद्र अर्थात् अचल भावसे जिसकी प्रतिष्ठा — स्थिति है ऐसे अपनी मर्यादामें स्थित, समुद्रमें सब ओरसे गये हुए जल, उसमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं । उसी प्रकार विषयोंका सङ्ग होनेपर भी जिस पुरुषमें समस्त इच्छाएँ समुद्रमें जलकी भाँति कोई भी विकार उत्पन्न न करती हुई सब ओरसे प्रवेश कर जाती हैं अर्थात् जिसकी समस्त कामनाएँ आत्मामें लीन हो जाती हैं, उसको अपने वशमें नहीं कर सकतीं-उस पुरुषको शान्ति अर्थात् मोक्ष मिलता है, दूसरेको अर्थात् भोगोंकी कामना करनेवालेको नहीं मिलता । अभिप्राय यह कि जिनको पानेके लिये इच्छा की जाती है उन भोगोंका नाम काम है, उनको पानेकी इच्छा करना जिसका स्वभाव है वह कामकामी है, वह उस शान्तिको कभी नहीं पाता ॥ ७० ॥

यस्माद् एवं तस्मात् — क्योंकि ऐसा है इसलिये—

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

विहाय परित्यज्य कामान् यः सन्न्यासी जो संन्यासी पुरुष, सम्पूर्ण कामनाओंको और पुमान् सर्वान् अशेषत: कात्स्र्त्स्न्येन चरति भोगोंको अशेषत: त्यागकर अर्थात् केवल जीवनमात्रके जीवनमात्रचेष्टाशेष: पर्यटति इत्यर्थः । निमित्त ही चेष्टा करनेवाला होकर विचरता है । निःस्पृहः शरीरजीवनमात्रे अपि निर्गता स्पृहा तथा जो स्पृहासे रहित हुआ है, अर्थात् शरीर-यस्य स निःस्पृहः सन् । जीवनमात्रमें भी जिसकी लालसा नहीं है ।

पृष्ठ 75

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* शांकरभाष्य अध्याय २ * ७५ निर्ममः शरीरजीवनमात्राक्षिप्तपरिग्रहे अपि मम इदम् इति अभिनिवेशवर्जितः । निरहङ्कारो विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसम्भावना-रहित इत्यर्थः । स एवम्भूतः स्थितप्रज्ञो ब्रह्मवित् शान्तिं सर्वसंसारदुःखोपरमलक्षणां निर्वाणाख्याम् अधि-गच्छति प्राप्नोति ब्रह्मभूतो भवति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥

ममतासे रहित है अर्थात् शरीर - जीवनमात्रके लिये आवश्यक पदार्थोंके संग्रहमें भी ' यह मेरा है ' ऐसे भावसे रहित है । तथा अहंकारसे रहित है अर्थात् विद्वत्ता आदिके सम्बन्धसे होनेवाले आत्माभिमानसे भी रहित है । वह ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता - ज्ञानी संसारके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिरूप मोक्ष नामक परम शान्तिको पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ ७१ ॥

सा एषा ज्ञाननिष्ठा स्तूयते - ( अब ) उस उपर्युक्त ज्ञाननिष्ठाकी स्तुति की जाती है-एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि एषा यथोक्ता ब्राह्मी ब्रह्मणि भवा इयं स्थितिः सर्वं कर्म सन्यस्य ब्रह्मरूपेण एव अवस्थानम् इति एतत् । हे पार्थ न एनां स्थितिं प्राप्य लब्ध्वा विमुह्यति न मोहं प्राप्नोति । स्थित्वा अस्यां स्थितौ ब्राह्मयां यथोक्तायाम् अन्तकाले अपि अन्ते वयसि अपि ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मनिर्वृतिं मोक्षं ऋच्छति गच्छति, किमु वक्तव्यं ब्रह्मचर्याद् एव सन्न्यस्य यावज्जीवं यो ब्रह्मणि एव अवतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति इति ॥ ७२ ॥

ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥

यह उपर्युक्त अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्ममें होनेवाली स्थिति है, अर्थात् सर्वकर्मोंका संन्यास करके केवल ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाना है हे पार्थ! इस स्थितिको पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता अर्थात् मोहको प्राप्त नहीं होता । अन्तकालमें - अन्तके वयमें भी इस उपर्युक्त ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर मनुष्य, ब्रह्ममें लीनतारूप मोक्षको लाभ करता है । फिर जो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करके जीवनपर्यन्त ब्रह्ममें स्थित रहता है वह ब्रह्मनिर्वाणको प्राप्त होता है, इसमें तो कहना ही क्या है? ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

पृष्ठ 76

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ॐ तृतीयोऽध्यायः शास्त्रस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिविषयभूते द्वे बुद्धी भगवता निर्दिष्टे, साङ्ख्ये बुद्धिः योगे बुद्धिः इति च । तत्र ‘ प्रजहाति यदा कामान् ' इति आरभ्य आ - अध्यायपरिसमाप्तेः साङ्ख्यबुद्ध्याश्रितानां सन्यासं कर्तव्यम् उक्त्वा तेषां तन्निष्ठतया एव च कृतार्थता उक्ता – ' एषा ब्राह्मी स्थिति: ' इति । अर्जुनाय च ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ‘ मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ' इति कर्म एव कर्तव्यम् उक्तवान् योगबुद्धिम् आश्रित्य, न तत एव श्रेयः प्राप्तिम् उक्तवान् । तद् एतद् आलक्ष्य पर्याकुलीभूतबुद्धिः अर्जुन उवाच-कथं भक्ताय श्रेयोऽर्थिने यत् साक्षात् श्रेयःसाधनं साङ्ख्यबुद्धिनिष्ठां श्रावयित्वा मां कर्मणि दृष्टानेकानर्थयुक्ते पारम्पर्येण अपि अनैकान्तिकश्रेयःप्राप्तिफले नियुञ्ज्याद् इति युक्तः पर्याकुलीभावः अर्जुनस्य । तदनुरूपः च प्रश्न: ‘ ज्यायसी चेत् ' इत्यादिः । प्रश्नापाकरणवाक्यं च भगवता उक्तं यथोक्तविभागविषये शास्त्रे । केचित् तु अर्जुनस्य प्रश्नार्थम् अन्यथा कल्पयित्वा तत्प्रतिकूलं भगवतः प्रतिवचनं इस गीताशास्त्रके दूसरे अध्यायमें भगवान्ने प्रवृत्तिविषयक योगबुद्धि और निवृत्तिविषयक सांख्यबुद्धि-ऐसी दो बुद्धियाँ दिखलायी हैं । वहाँ सांख्यबुद्धिका आश्रय लेनेवालोंके लिये ' प्रजहाति यदा कामान् ' इस श्लोकसे लेकर अध्यायसमाप्तितक, सर्वकर्मोंका त्याग करना कर्तव्य बतलाकर ' एषा ब्राह्मी स्थिति: ' इस श्लोकमें उसी ज्ञाननिष्ठासे उनका कृतार्थ होना बतलाया है । परंतु अर्जुनको ' तेरा कर्ममें ही अधिकार है ' कर्म न करनेमें तेरी प्रीति न होनी चाहिये ' इत्यादि वचनोंसे ( ऐसा कहा कि ) योगबुद्धिका आश्रय लेकर तुझे कर्म ही करना चाहिये, ( पर ) उसीसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं बतलायी । इस बातको विचारकर अर्जुनकी बुद्धि व्याकुल हो गयी और वे बोले – ( ' ज्यायसी चेत् ' इत्यादि ) । कल्याण चाहनेवाले भक्तके लिये मोक्षका साक्षात् साधन जो सांख्यबुद्धि- निष्ठा है उसे सुनाकर भी जो प्रत्यक्षीकृत अनेक अनर्थोंसे युक्त हैं और क्रमसे आगे बढ़नेपर भी ( इसी जन्ममें ) एकमात्र मोक्षकी प्राप्तिरूप फल जिनका निश्चित नहीं है ऐसे कर्मोंमें मुझे भगवान् क्यों लगाते हैं । इस प्रकार अर्जुनका व्याकुल होना उचित ही है । और उस व्याकुलताके अनुकूल ही यह ' ज्यायसी चेत् ' इत्यादि प्रश्न है । इस प्रश्नको निवृत्त करनेवाले वचन भी भगवान्ने पूर्वोक्त विभागविषयक शास्त्रमें ( जहाँ ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अलग - अलग वर्णन है ) कहे हैं । तो भी कितने ही टीकाकार अर्जुनके प्रश्नका प्रयोजन दूसरी तरह मानकर उससे विपरीत भगवान्का

पृष्ठ 77

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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ७७ वर्णयन्ति । यथा च आत्मना सम्बन्धग्रन्थे । गीतार्थो निरूपितः तत्प्रतिकूलं च इह पुनः प्रश्नप्रतिवचनयोः अर्थं निरूपयन्ति । कथम्, तत्र सम्बन्धग्रन्थे तावत् — सर्वेषाम् आश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो गीताशास्त्रे निरूपितः अर्थ इति उक्तम्, पुनः विशेषितं च यावज्जीवश्रुतिचोदितानि कर्माणि परित्यज्य केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षः प्राप्यते इति एतद् एकान्तेन एव प्रतिषिद्धम् इति । इह तु आश्रमविकल्पं दर्शयता यावज्जीव-श्रुतिचोदितानाम् एव कर्मणां परित्याग उक्तः । तत् कथम् ईदृशं विरुद्धम् अर्थम् अर्जुनाय ब्रूयात् भगवान्, श्रोता वा कथं विरुद्धम् अर्थम् अवधारयेत् । तत्र एतत् स्याद् गृहस्थानाम् एव श्रौतकर्म-परित्यागेन केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षः प्रतिषिध्यते न तु आश्रमान्तराणाम् इति । एतद् अपि पूर्वोत्तरविरुद्धम् एव । कथम्, सर्वाश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो गीता -शास्त्रे निश्चितः अर्थ इति प्रतिज्ञाय इह कथं तद्विरुद्धं केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षं ब्रूयाद् आश्रमान्तराणाम् । अथ मतं श्रौतकर्मापेक्षया एतद् वचनं केवलाद् एव ज्ञानात् श्रौतकर्मरहिताद् गृहस्थानां मोक्षः प्रतिषिध्यते इति । तत्र गृहस्थानां विद्यमानम् अपि स्मार्तं कर्म अविद्यमानवद् उपेक्ष्य ज्ञानाद् एव केवलाद् न मोक्ष इति उच्यते इति । उत्तर बतलाते हैं तथा पहले भूमिकामें स्वयं जैसा गीताका तात्पर्य बतला आये हैं, उससे भी यहाँ प्रश्न और उत्तरका अर्थ विपरीत प्रतिपादन करते हैं । कैसे? ( सो कहते हैं कि ) - वहाँ भूमिकामें तो ( उन टीकाकारोंने ) ऐसे कहा है कि गीताशास्त्रमें सब आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय निरूपण किया है और विशेषरूपसे यह भी कहा है कि ' जबतक जीवे अग्निहोत्रादि कर्म करता रहे ' इत्यादि श्रुतिविहित कर्मोंका त्याग करके केवल ज्ञानसे मोक्ष प्राप्त होता है, इस सिद्धान्तका गीताशास्त्रमें निश्चितरूपसे निषेध है । परंतु यहाँ ( तीसरे अध्यायमें ) उन्होंने आश्रमोंका विकल्प दिखलाते हुए ‘ जबतक जीवे ' इत्यादि श्रुतिविहित कर्मोंका ही त्याग बतलाया है । इससे यह शङ्का होती है कि इस प्रकारके विरुद्ध अर्थवाले वचन भगवान् अर्जुनसे कैसे कहते और सुननेवाला ( अर्जुन ) भी ऐसे विरुद्ध अर्थको कैसे स्वीकार करता? पू ० - यदि वहाँ ( भूमिका में ) ऐसा अभिप्राय हो कि गृहस्थके लिये ही श्रौत - कर्मके त्यागपूर्वक केवल ज्ञानसे मोक्षप्राप्तिका निषेध किया है, दूसरे आश्रमवालोंके लिये नहीं, तो? उ ० | - - यह भी पूर्वापरविरुद्ध ही है; क्योंकि सभी आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय गीताशास्त्रका निश्चित अभिप्राय है ' ऐसी प्रतिज्ञा करके उसके विपरीत यहाँ दूसरे आश्रमवालोंके लिये वे केवल ज्ञानसे मोक्ष कैसे बतलाते? पू ० – कदाचित् ऐसा मान लें कि यह कहना श्रौतकर्मकी अपेक्षासे है अर्थात् श्रौतकर्मसे रहित केवल ज्ञानसे गृहस्थोंके लिये मोक्षका निषेध किया गया है, उसमें जो केवल ज्ञानसे गृहस्थोंका मोक्ष नहीं होता, ऐसा कहा है वह विद्यमान स्मार्त - कर्मकी भी अविद्यमानके सदृश उपेक्षा करके कहा है ।

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७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * एतद् अपि विरुद्धम् । कथम्, गृहस्थस्य एव स्मार्तकर्मणा समुच्चिताद् ज्ञानाद् मोक्षः प्रतिषिध्यते न तु आश्रमान्तराणाम् इति कथं विवेकिभिः शक्यम् अवधारयितुम् । किं च यदि मोक्षसाधनत्वेन स्मार्तानि कर्माणि ऊर्ध्वरेतसां समुच्चीयन्ते समुच्चीयन्ते तथा गृहस्थस्य अपि इष्यतां स्मार्तैः एव समुच्चयो न श्रौतैः । अथ श्रौतैः स्मार्तैः च गृहस्थस्य एव समुच्चयो मोक्षाय ऊर्ध्वरेतसां तु स्मार्तकर्ममात्रसमुच्चिताद् ज्ञानाद् मोक्ष इति । तत्र एवं सति गृहस्थस्य आयासबाहुल्यं श्रौतं स्मार्तं च बहुदुःखरूपं कर्म शिरसि अरोपितं स्यात् । अथ गृहस्थस्य एव आयासबाहुल्यकारणाद् मोक्षः स्याद् न आश्रमान्तराणां श्रौतनित्यकर्म-रहितत्वाद् इति । तद् अपि असत् । सर्वोपनिषत्सु इतिहास-पुराणयोगशास्त्रे च ज्ञानाङ्गत्वेन मुमुक्षोः सर्व-कर्मसन्यासविधानाद् आश्रमविकल्पसमुच्चय-विधानात् च श्रुतिस्मृत्योः । सिद्धः तर्हि सर्वाश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयः । न, मुमुक्षोः सर्वकर्मसन्यासविधानात् । उ ० — यह भी विरुद्ध है; क्योंकि ' गृहस्थके लिये ही केवल स्मार्तकर्मके साथ मिले हुए ज्ञानसे मोक्षका प्रतिषेध किया है, दूसरे आश्रमवालोंके लिये नहीं'– यह विचारवान् मनुष्य कैसे मान सकते हैं? दूसरी बात यह भी है कि यदि ऊर्ध्वरेताओंको मोक्षप्राप्तिके लिये ज्ञानके साथ केवल स्मार्त - कर्मके समुच्चयकी ही आवश्यकता है तो इस न्यायसे गृहस्थोंके लिये भी केवल स्मार्त - कर्मोंके साथ ही ज्ञानका समुच्चय आवश्यक समझा जाना चाहिये, श्रौतकर्मोंके साथ नहीं । पू ० – - यदि ऐसा मानें कि गृहस्थको ही मोक्षके लिये श्रौत और स्मार्त दोनों प्रकारके कर्मोंके साथ ज्ञानके समुच्चयकी आवश्यकता है, ऊर्ध्वरेताओंका तो केवल स्मार्त - कर्मयुक्त ज्ञानसे मोक्ष हो जाता है? उ ० – ऐसा मान लेनेसे तो गृहस्थके ही सिरपर विशेष परिश्रमयुक्त और अति दुःखरूप श्रौत - स्मार्त दोनों प्रकारके कर्मोंका बोझ लादना हुआ । पू ० – यदि कहा जाय कि बहुत परिश्रम होनेके कारण गृहस्थकी ही मुक्ति होती है, ( अन्य आश्रमोंमें ) श्रौत नित्यकर्मोंका अभाव होनेके कारण अन्य आश्रमवालोंका मोक्ष नहीं होता तो? उ ० — यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सब उपनिषद्, इतिहास, पुराण और योगशास्त्रोंमें मुमुक्षुके लिये ज्ञानका अंग मानकर सब कर्मोंके संन्यासका विधान किया है तथा श्रुति - स्मृतियोंमें आश्रमोंके विकल्प और समुच्चयका भी विधान है । * पू ० – तब तो सभी आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय सिद्ध हो जाता है । उ ० – नहीं; क्योंकि मुमुक्षुके लिये सर्व कर्मोंके त्यागका विधान है । * ब्रह्मचर्यसे गृहस्थ, गृहस्थसे वानप्रस्थ और वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण करना चाहिये; यह समुच्चयका विधान है और ब्रह्मचर्यसे अथवा गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण करे, यह आश्रमोंके विकल्पका विधान है ।

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श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित, पृष्ठ 79 का मूल पृष्ठ
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ७ ९ ' व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति । ' ( बृह ० उ ० ३ । ५। १ ) ' तस्मात्सन्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः । ' ( ना ० उ ० २ । ७ ९ ) ' न्यास एवात्यरेचयत् ' ( ना ० उ ० २। ७८ ) इति ' न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः ' ( ना ० उ ० २ । १२ ) इति च।‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' ( जाबा ० उ ० ४ ) इत्याद्याः श्रुतयः ।

त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज ।

उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज ॥

संसारमेव निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया ।

प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहाः परं वैराग्यमाश्रिताः ॥

इति बृहस्पतिः अपि कचं प्रति ।

कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।

तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥

( महा ० शान्ति ० २४१ । ७ ) इति शुकानुशासनम् । इह अपि ' सर्वकर्माणि मनसा इत्यादि । मोक्षस्य च अकार्यत्वाद् कर्मानर्थक्यम् । नित्यानि प्रत्यवायपरिहारार्थम् इति चेत् । सन्न्यस्य ' मुमुक्षोः अनुष्ठेयानि न, असन्यासिविषयत्वात् प्रत्यवायप्राप्तेः, न हि अग्निकार्याद्यकरणात् सन्यासिनः प्रत्यवायः कल्पयितुं शक्यो यथा ब्रह्मचारिणाम् असन्यासिनाम् अपि कर्मिणाम् । * विहित कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे जो पाप लगता ' सब प्रकारके भोगोंसे विरक्त होकर भिक्षावृत्तिका अवलम्बन करते हैं । ' ' इसलिये इन सब तपोंमें संन्यासको ही श्रेष्ठ कहते हैं । ' ' संन्यास ही श्रेष्ठ बताया गया है ' ' न कर्मसे, न प्रजासे, न धनसे, पर केवल त्यागसे ही कई एक महापुरुष अमृतत्वको प्राप्त हुए हैं । ' ' ब्रह्मचर्यसे ही संन्यास ग्रहण करें । ' इत्यादि श्रुतिवचन हैं । बृहस्पतिने भी कचसे कहा है कि ' धर्म और अधर्मको छोड़, सत्य और झूठ दोनोंको छोड़, सत्य और झूठ दोनोंको छोड़कर जिस ( अहंकार ) से इनको छोड़ता है उसको भी छोड़ । ' ' संसारको साररहित देखकर परवैराग्यके आश्रित हुए पुरुष, सार वस्तुके दर्शनकी इच्छासे विवाह किये बिना ( ब्रह्मचर्य आश्रमसे ) ही संन्यास ग्रहण करते हैं । ' व्यासजीने भी शुकदेवजीको शिक्षा देते समय कहा है कि ' जीव कर्मोंसे बँधता है और ज्ञानसे मुक्त होता है, इसलिये आत्मतत्त्वके ज्ञाता यति कर्म नहीं करते । ' यहाँ ( गीतामें ) भी ' सब कर्मोंको मनसे छोड़कर ' इत्यादि वचन कहे हैं । मोक्ष अकार्य है अर्थात् किसी क्रियासे प्राप्त होनेवाला नहीं है, इससे भी मुमुक्षुके लिये कर्म व्यर्थ है । पू ० - यदि ऐसा कहें कि प्रत्यवाय * दूर करनेके लिये नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करना आवश्यक है, तो? उ ० — यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यवायकी प्राप्ति संन्यासीके लिये नहीं, असंन्यासीके लिये है । जो संन्यासी नहीं है, ऐसे कर्म करनेवाले गृहस्थोंको और , ब्रह्मचारियोंको भी जिस प्रकार विहित कर्म न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वैसे अग्निहोत्रादि कर्म न करनेसे संन्यासीके लिये प्रत्यवाय - प्राप्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती । है, उसका नाम प्रत्यवाय है ।

पृष्ठ 80

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८० * श्रीमद्भगवद्गीता * न तावद् नित्यानां कर्मणाम् अभावाद् एव भावरूपस्य प्रत्यवायस्य उत्पत्तिः कल्पयितुं शक्या ‘ कथमसतः सज्जायेत ' ( छा ० उ ० ६।२ । २ ) इति असतः सज्जन्मासम्भवश्रुतेः । यदि विहिताकरणाद् असम्भाव्यम् अपि प्रत्यवायं ब्रूयाद् वेदः तदा अनर्थकरो वेदः अप्रमाणम् इति उक्तं स्यात् । विहितस्य करणाकरणयोः दुःखमात्र-फलत्वात् । तथा च कारकं शास्त्रं न ज्ञापकम् इति अनुपपन्नार्थं कल्पितं स्यात् । न च एतद् इष्टम् । तस्माद् न सन्यासिनां कर्माणि अतो ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तिः । ' ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धि: ' इति । अर्जुनस्य प्रश्नानुपपत्तेः च । यदि हि भगवता द्वितीये अध्याये ज्ञानं कर्म च समुच्चयेन त्वया अनुष्ठेयम् इति उक्तं स्यात् ततः अर्जुनस्य प्रश्नः अनुपपन्नो ‘ ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः जनार्दन ' इति । अर्जुनाय चेद् बुद्धिकर्मणी त्वया अनुष्ठेये इति उक्ते या कर्मणो ज्यायसी बुद्धिः सा अपि उक्ता एव इति ' तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ' इति प्रश्नो न कथञ्चन उपपद्यते । तथा नित्यकर्मोंके अभावसे ही भावरूप प्रत्यवायके उत्पन्न होनेकी भी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ‘ असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? ' इस प्रकार अभावसे भावकी उत्पत्तिको असम्भव बतलानेवाले श्रुतिके वचन हैं । यदि कहो कि ( कर्मोंके अभावसे भावरूप प्रत्यवाय ) असम्भव होनेपर भी विहित कर्मोंके न करनेसे प्रत्यवायका होना वेद बतलाता है, तब तो यह कहना हुआ कि वेद अनर्थकारक और अप्रामाणिक है । क्योंकि ( ऐसा माननेसे ) वेदविहित कर्मोंके करने और न करने दोनोंहीमें केवल दुःख ही फल हुआ । इसके सिवा शास्त्र ज्ञापक नहीं बल्कि कारक है अर्थात् अपूर्व शक्ति उत्पन्न करनेवाला है, ऐसा युक्तिशून्य अर्थ भी मानना हुआ * । यह किसीको इष्ट नहीं है । सुतरां यह सिद्ध हुआ कि संन्यासियोंके लिये कर्म नहीं है, अतएव ज्ञान- कर्मका समुच्चय भी युक्तियुक्त नहीं है । तथा ‘ ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिः ' इत्यादि अर्जुनके प्रश्नोंकी संगति नहीं बैठनेके कारण भी ज्ञान और कर्मका समुच्चय नहीं बन सकता । क्योंकि यदि दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा होता कि ज्ञान और कर्म दोनोंका तुझे एक साथ अनुष्ठान करना चाहिये तो फिर अर्जुनका यह पूछना नहीं बनता कि ' हे जनार्दन! यदि कर्मोंकी अपेक्षा आप ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं ' इत्यादि । यदि भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा हो कि तुझे ज्ञान और कर्मका एक साथ अनुष्ठान करना चाहिये, तब जो कर्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, उस ज्ञानका ( सम्पादन करनेके लिये ) भी कह ही दिया गया, फिर यह पूछना किसी तरह भी नहीं बन सकता कि ‘ तो हे केशव! मुझे घोर कर्मोंमें क्यों लगाते हैं । ' * वास्तवमें शास्त्र केवल पदार्थोंकी शक्तिको बतलानेवाला है, उसमें नवीन शक्ति उत्पन्न करनेवाला नहीं है ।